चंडीगढ़ (शक्तियों का प्रत्यायोजन) अधिनियम, 1987
(1988 का अधिनियम संख्यांक 2)
[3 जनवरी, 1988]
चंडीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक में निहित
शक्तियों के प्रत्यायोजन का उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के अड़तीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम और विस्तार-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम चंडीगढ़ (शक्तियों का प्रत्यायोजन) अधिनियम, 1987 है ।
(2) इसका विस्तार संपूर्ण चंडीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र पर है ।
2. परिभाषा-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, प्रशासक" से राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 239 के अधीन नियुक्त किया गया चंडीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र का प्रशासक अभिप्रेत है ।
3. प्रशासक में निहित शक्तियों, आदि का प्रत्यायोजन-(1) चंडीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त किसी विधि के अधीन जिस शक्ति, प्राधिकार या अधिकारिता का प्रयोग, अथवा जिस कर्तव्य का निर्वहन प्रशासक कर सकता है उसका प्रयोग या निर्वहन ऐसे अधिकारी या अन्य प्राधिकारी द्वारा भी किया जा सकेगा जो केंद्रीय सरकार या प्रशासक द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट किया जाए ।
(2) प्रशासक किसी अपील या पुनरीक्षण आवेदन या किसी अन्य मामले को, जो निष्पादन के लिए उसके समक्ष लंबित है, किसी ऐसे अधिकारी या अन्य प्राधिकारी को अंतरित कर सकता है जो उसका निष्पादन करने के लिए उपधारा (1) के अधीन सक्षम है ।
(3) प्रशासक किसी ऐसी अपील या पुनरीक्षण आवेदन या किसी अन्य मामले को जो उसका निष्पादन करने के लिए उपधारा (1) के अधीन सक्षम अधिकारी या अन्य प्राधिकारी के समक्ष लंबित है, स्वयं उसका निष्पादन करने के लिए प्रत्याहृत कर सकता है ।
4. विधिमान्यकरण-किसी न्यायालय या अधिकरण या अन्य प्राधिकरण के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, चंडीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त किसी विधि के अधीन, जिस शक्ति, प्राधिकार या अधिकारिता का प्रयोग अथवा जिस कर्तव्य का निर्वहन प्रशासक कर सकता है उसका प्रयोग या निर्वहन जहां इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व किसी अन्य अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा किया गया हो वहां यह समझा जाएगा कि ऐसी शक्ति, प्राधिकार या अधिकारिता का प्रयोग या कर्तव्य का निर्वहन ऐसे अधिकारी या अन्य प्राधिकारी द्वारा विधिमान्य और प्रभावी रूप से किया गया था मानो धारा 3 की उपधारा (1) के उपबंध सभी ऐसे तात्त्विक समयों पर प्रवृत्त थे जब ऐसी शक्ति, प्राधिकार या अधिकारिता का प्रयोग या ऐसे कर्तव्य का निर्वहन किया गया था और वह अधिकारी या अन्य प्राधिकारी केंद्रीय सरकार या प्रशासक द्वारा उक्त उपधारा के अधीन उस निमित्त अधिकारी या अन्य प्राधिकारी के रूप में विनिर्दिष्ट किया गया था, और तद्नुसार, कोई वाद या अन्य कार्यवाही किसी न्यायालय या अधिकरण में या अन्य प्राधिकरण के समक्ष इस आधार पर संस्थित नहीं की जाएगी या चलाई नहीं जाएगी या जारी नहीं रखी जाएगी कि ऐसा अधिकारी या अन्य प्राधिकारी ऐसी शक्ति, प्राधिकार या अधिकारिता का प्रयोग करने या ऐसे कर्तव्य का निर्वहन करने के लिए सक्षम नहीं था ।
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