सिक्का-निर्माण अधिनियम, 2011
(2011 का अधिनियम संख्यांक 11)
[1 सितम्बर, 2011]
सिक्का-निर्माण और टकसाल, सिक्का-निर्माण के संरक्षण से संबंधित
विधियों को समेकित करने और सिक्कों को गलाने या नष्ट
करने का प्रतिषेध और उन्हें निर्गमित करने के लिए
बनाने या रखने का प्रतिषेध करने तथा उससे
संबंधित या उसके आनुषंगिक
विषयों का उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के बासठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम सिक्का-निर्माण अधिनियम, 2011 है ।
(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) सिक्के" से ऐसा सिक्का अभिप्रेत है, जो सरकार या इस निमित्त सरकार द्वारा सशक्त किसी अन्य प्राधिकारी द्वारा स्टांपित किसी धातु या किसी अन्य पदार्थ का बना है और जो एक वैध-मुद्रा है, जिसके अंतर्गत स्मारक सिक्का और भारत सरकार का एक रुपए का नोट भी है ।
स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए यह स्पष्ट किया जाता है सिक्के" के अंतर्गत किसी बैंक, डाकघर या वित्तीय संस्था द्वारा जारी किए गए क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, पोस्टल आर्डर और ई-धन नहीं है;
(ख) स्मारक सिक्के" से किसी विशेष अवसर या घटना की स्मृति में सरकार द्वारा या इस निमित्त सरकार द्वारा सशक्त किसी अन्य प्राधिकारी द्वारा स्टांपित और भारतीय मुद्रा में अभिव्यक्त कोई सिक्का अभिप्रेत है;
(ग) विरूपित" से किसी सिक्के की सतह या आकार का किसी प्रकार का कर्तन, रेतन, स्टांपित करना या ऐसा अन्य परिवर्तन अभिप्रेत है, जिसका उचित घिसाई के प्रभावों के कारण भिन्न होना आसानी से पहचाना जा सकता है;
(घ) सरकार" से केंद्रीय सरकार अभिप्रेत है;
(ङ) निर्गमित करने" से किसी सिक्के को धन के रूप में प्रयोग के लिए परिचालन में लाना अभिप्रेत है;
(च) धातु" से कोई धातु, आधार धातु, मिश्रातु, सोना, चांदी या ऐसा अन्य पदार्थ अभिप्रेत है, जो किसी सिक्के के प्रयोजन के लिए सरकार द्वारा विहित किया जाए;
(छ) टकसाल" से स्टांपित धातु द्वारा सिक्का बनाने के लिए कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन विरचित और निगमित भारतीय सुरक्षा मुद्रण और मुद्रा निर्माण निगम लिमिटेड या सरकार द्वारा या सरकार के प्राधिकार के अधीन स्थापित कोई अन्य संगठन अभिप्रेत है;
(ज) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;
(झ) प्रतिशत" से किसी सिक्के के लिए विहित धातुओं का प्रतिशत अभिप्रेत है;
(ञ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(ट) उपचार" से मानक वजन और शुद्धता में अंतर अभिप्रेत है;
(ठ) मानक वजन" से किसी सिक्के के लिए विहित वजन अभिप्रेत है ।
अध्याय 2
टकसालों की स्थापना
3. टकसालें स्थापित और समाप्त करने की शक्ति-सरकार, अधिसूचना द्वारा, -
(क) किसी स्थान पर कोई टकसाल स्थापित कर सकेगी, जिसका प्रबंध उसके द्वारा या ऐसे किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किया जा सकेगा, जो इस प्रयोजन के लिए प्राधिकृत किया जाए:
परंतु इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व स्थापित टकसालें, इस धारा के अधीन सरकार द्वारा स्थापित की गई समझी जाएंगी:
परंतु यह और कि जहां सरकार की यह राय है कि लोकहित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है, वहां वह भारत की सीमाओं के भीतर या बाहर किसी संगठन या किसी विदेशी सरकार द्वारा सिक्कों की ढलाई प्राधिकृत कर सकेगी और अपने प्राधिकार के अधीन निर्गमन के लिए आयात के रूप में या अन्यथा ऐसे सिक्कों का अर्जन कर सकेगी;
(ख) किसी टकसाल को समाप्त कर सकेगी ।
अध्याय 3
सिक्का-निर्माण
4. सिक्कों के मूल्य-वर्ग, उनकी विमाएं, डिजाइन और संरचना-टकसालों में या धारा 3 के परंतुक के अधीन प्राधिकृत किसी अन्य स्थान में एक हजार रुपए से अनधिक ऐसे मूल्य-वर्ग और ऐसी विमाओं और डिजाइनों के तथा ऐसी धातुओं या ऐसी संरचना की मिश्रित धातुओं या किसी अन्य पदार्थ के सिक्के ढाले जा सकेंगे, जो सरकार द्वारा विहित किया जाए ।
5. मानक वजन और उपचार-धारा 4 के उपबंधों के अधीन ढाले गए किसी भी मूल्य-वर्ग के सिक्के का मानक वजन तथा ऐसे सिक्कों को बनाने में अनुज्ञात उपचार ऐसा होगा, जो केंद्रीय सराकर द्वारा, समय-समय पर, इस निमित्त विहित किया जाए ।
6. सिक्का कब वैध निविदा है-(1) धारा 4 के प्राधिकार के अधीन निर्गमित सिक्के संदाय में या लेखे में निम्नानुसार वैध-निविदा होंगे: -
(क) एक रुपए से अन्यून किसी मूल्य-वर्ग का सिक्का, एक हजार रुपए से अनधिक किसी धनराशि के लिए;
(ख) आधे रुपए का सिक्का, दस रुपए से अनधिक किसी धनराशि के लिए;
(ग) कोई अन्य सिक्का, एक रुपए से अनधिक किसी धनराशि के लिए:
परंतु सिक्का विरूपित न हुआ हो और उसका वजन इतना कम न हुआ हो कि वह उतने वजन से कम रह गया हो, जितना उसके लिए विहित किया जाए ।
(2) नया पैसा श्रृंखला में सभी नए सिक्के, जो भारतीय सिक्का-निर्माण (संशोधन) अधिनियम, 1964 (1964 का 17) के प्रारंभ से पूर्व जारी की गई भारत सरकार के वित्त मंत्रालय, आर्थिक कार्य विभाग की अधिसूचना सं०का०नि०आ० 1120, तारीख 11 मई, 1956 के अधीन उस रूप में अभिहित किए गए हैं, संदाय में या लेखे में निम्नानुसार वैध-निविदा बने रहेंगे, -
(क) आधे रुपए या पचास नए पैसे का सिक्का, दस रुपए से अनधिक किसी धनराशि के लिए,
(ख) कोई अन्य सिक्का, एक रुपए से अनधिक किसी भी धनराशि के लिए ।
7. सिक्का-निर्माण की दशमलव प्रणाली-(1) रुपए को एक सौ इकाइयों में विभाजित किया जाएगा और किसी ऐसी इकाई को सरकार द्वारा, अधिसूचना द्वारा, ऐसे नाम से अभिहित किया जा सकेगा, जो वह ठीक समझे ।
(2) किसी अधिनियमिति में या किसी अधिनियमिति के अधीन किसी अधिसूचना, नियम या आदेश में या किसी संविदा, विलेख या अन्य लिखत में आने, पैसे और पाई में अभिव्यक्त किसी मूल्य के प्रति सभी निर्देंशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उपधारा (1) में निर्दिष्ट इकाइयों में अभिव्यक्त उसके उस मूल्य के प्रति निर्देश हैं, जो उपधारा (1) में निर्दिष्ट एक सौ इकाई की सोलह आने, चौंसठ पैसे या एक सौ बानवे पाई की दर से उसका संपरिवर्तन करने पर प्राप्त होती है ।
(3) किसी अधिनियमिति या किसी अधिनियमिति के अधीन किसी अधिसूचना, नियम या आदेश में या किसी संविदा, विलेख या अन्य लिखत में नया पैसा या नए पैसे में किसी मूल्य के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस मूल्य के प्रति निर्देश हैं, जो उपधारा (1) में निर्दिष्ट इकाइयों में क्रमशः अभिव्यक्त हैं ।
8. सिक्का वापस लेने की शक्ति-धारा 6 में किसी बात के होते हुए भी, सरकार, अधिसूचना द्वारा, ऐसी तारीख से, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, किसी सिक्के को, चाहे वह किसी भी तारीख या मूल्य-वर्ग का हो, वापस ले सकेगी और इस प्रकार विनिर्दिष्ट तारीख को और से ही वह सिक्का उस सीमा तक के सिवाय, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, वैध-निविदा नहीं रह जाएगा ।
अध्याय 4
वजन में कम हुए, विरूपित और खोटे सिक्के
9. वजन में कम हुए या विरूपित किए गए सिक्कों को काटने की कतिपय व्यक्तियों की शक्ति-(1) जहां कोई ऐसा सिक्का, जो सरकार द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन ढाला और निर्गमित किया गया है, इस धारा के अधीन कार्य करने के लिए उसके द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति को निविदत्त किया जाता है और ऐसे व्यक्ति के पास यह विश्वास करने का कारण है कि वह सिक्का, -
(क) वजन में इतना कम हो गया है जिससे उसमें वह प्रतिशतता अधिक हो गई है जो धारा 5 में यथा उपबंधित मानक वजन से कम है; या
(ख) विरूपित किया गया है, वहां वह स्वयं या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उस सिक्के को काट या तोड़ देगा ।
(2) उपधारा (1) के खंड (क) के उपबंधों के अधीन सिक्के को काटने या तोड़ने वाला कोई व्यक्ति सिक्के के अंकित मूल्य पर उसे प्राप्त करेगा और उसके लिए संदाय करेगा ।
(3) उपधारा (1) के खंड (ख) के उपबंधों के अधीन सिक्कों को काटने या तोड़ने वाला कोई व्यक्ति निम्नलिखित प्रक्रिया का पालन करेगा, अर्थात्ः-
(क) यदि उस व्यक्ति के पास यह विश्वास करने का कारण है कि सिक्के को कपटपूर्वक विरूपित किया गया है तो वह उसके टुकड़ों को सिक्का निविदत्त करने वाले व्यक्ति को वापस कर देगा, जो ऐसे काटे या तोड़े जाने के कारण हुई हानि को वहन करेगा;
(ख) यदि उस व्यक्ति के पास यह विश्वास करने का कारण है कि सिक्के को कपटपूर्वक विरूपित नहीं किया गया है तो वह सिक्के के अंकित मूल्य पर उसे प्राप्त करेगा और उसके लिए संदाय करेगा ।
10. खोटे सिक्कों को काटने की कतिपय व्यक्तियों की शक्ति-जहां सरकार द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन ढाले गए या निर्गमित किसी सिक्के को धारा 9 के अधीन सरकार द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति को निविदत्त किया जाता है और ऐसे व्यक्ति के पास यह विश्वास करने का कारण है कि वह सिक्का खोटा है तो वह स्वयं या किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से सिक्के को काट या तोड़ देगा और निविदत करने वाला ऐसे काटने या तोड़ने से हुई हानि को वहन करेगा ।
11. अपने कृत्यों को प्रत्यायोजित करने की टकसाल की शक्ति-टकसाल लिखित में सरकार के किसी अन्य संगठन को वापस लिए गए सिक्कों को गलाने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा या उक्त प्रयोजन के लिए ऐसे संगठन की कोई सहायता ले सकेगा ।
स्पस्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, संगठन" से गलाने की सुविधाएं रखने वाली कोई सरकारी औद्योगिक इकाई या पब्िलक सेक्टर उपक्रम अभिप्रेत है ।
अध्याय 5
अपराध और शास्ित
12. सिक्कों का निर्माण करने या उन्हें गलाने या नष्ट करने का प्रतिषेध-(1) कोई व्यक्ति, -
(i) किसी धातु के टुकड़े का सरकार के प्राधिकार के सिवाय धन के रूप में प्रयोग किए जाने के लिए आशयित सिक्के के रूप में, चाहे स्टांपित हो या अस्टांपित, उपयोग नहीं करेगा; या
(ii) किसी सिक्के को गलाएगा या नष्ट नहीं करेगा; या
(iii) सिक्के का उपयोग विनिमय के माध्यम के रूप में करने से अन्यथा नहीं करेगा; या
(iv) अपने कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में, -
(क) कोई गलाया हुआ सिक्का नहीं रखेगा, चाहे वह गलाई हुई अवस्था में हो या ठोस अवस्था में हो; या
(ख) कोई सिक्का नष्ट या विकृत अवस्था में नहीं रखेगा; या
(ग) सिक्कों को अपनी उचित आवश्यकताओं से सारतः अधिक मात्रा में, ऐसे सिक्कों का उनके अंकित मूल्य से भिन्न मूल्य पर विक्रय करने के प्रयोजन के लिए या उन्हें गलाने या नष्ट करने या विनिमय के माध्यम से अन्यथा इन सिक्कों का व्ययन करने के लिए नहीं रखेगा ।
स्पष्टीकरण-किसी व्यक्ति की सिक्कों की उचित आवश्यकताओं के अवधारण के प्रयोजनों के लिए, निम्नलिखित बातों का सम्यक् ध्यान रखा जाएगा-
(i) सिक्कों की उसकी कुल दैनिक आवश्यकताएं;
(ii) उसके कारबार, उपजीविका या वृत्ति की प्रकृति;
(iii) सिक्कों के अर्जन का उसका ढंग; और
(iv) वह रीति, जिसमें और स्थान, जहां उसके द्वारा ऐसे सिक्के कब्जे में रखे गए, धारित या नियंत्रित किए गए है ।
(2) जो कोई ऐसी धातु या सामग्री को अपने कब्जे में रखे हुए पाया जाता है, जिसमें मिश्रातु उन्हीं अनुपातों में हो, जिनमें वे किसी सिक्के के विनिर्माण में प्रयुक्त किए गए हैं, उसके बारे में, जब तक तत्प्रतिकूल साबित न किया जाए, यह उपधारणा की जाएगी कि उसने उपधारा (1) के उपबंधों का उल्लंघन किया है ।
(3) इस धारा की कोई बात, -
(i) ऐसे किसी व्यक्ति को लागू नहीं होगी, जिसके कब्जे में कोई धातु या गैर-पुनः चक्रण योग्य सिक्का-निर्माण धातु की स्क्रैपें या कतरनें, आदि पाई जाती हैं, जिन्हें वह किसी टकसाल द्वारा नीलामियों द्वारा विधिमान्य व्ययन के परिणामस्वरूप इस प्रकार कब्जे में रखता हो;
(ii) टकसाल, भारतीय रिजर्व बैंक और उसके प्राधिकृत अभिकर्ताओं और सरकार के प्राधिकार द्वारा या उसके अधीन दिए गए आदेशों की सीमा तक सिक्कों या सिक्का ब्लैंकों के प्रदायकर्ताओं को, उनके प्रदाय या सरकार द्वारा दिए गए आदेशों के पूरा होने तक, लागू नहीं होगी;
(iii) ऐसे किसी भावी प्रदायकर्ता को लागू नहीं होगी, जो उसके द्वारा क्रय किए गए विधिमान्य निविदा दस्तावेजों के संबंध में नमूनों के रूप में सिक्के या सिक्का ब्लैंकों का प्रदाय करने का आशय रखता है, परंतु यह तब जबकि मात्रा प्रदाय किए जाने वाले नमूनों की मात्रा के युक्तियुक्त अनुरूप हो ।
13. धारा 12 के उल्लघंन के लिए शास्ति-जो कोई, धारा 12 के किन्हीं उपबंधों का उल्लंघन करेगा, ऐसे कारावास से, जो सात वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माने से, दंडनीय होगा ।
14. धन के रूप में प्रयुक्त किए जाने के लिए धातु के टुकड़ों का विधिविरुद्ध निर्माण करने, उसे निर्गमित करने या कब्जे में रखने का प्रतिषेध और उसके लिए शास्ति-(1) कोई व्यक्ति, -
(क) धारा 4 के अधीन यथा उपबंधित के सिवाय, सिक्के के प्रयोजन के लिए किसी धातु के टुकड़े का निर्माण नहीं करेगा या उसे निर्गमित नहीं करेगा या निर्गमित करने का प्रयास नहीं करेगा;
(ख) किसी धातु टुकड़े को विनिमय के किसी माध्यम के लिए धन के रूप में प्रयोग हेतु टुकड़ा निर्गमित करने के आशय से कब्जे में, अभिरक्षा में या नियंत्रण में नहीं रखेगा ।
(2) जो कोई उपधारा (1) के उपबंधों का उल्लंघन करेगा, ऐसे कारावास से, जो एक वर्ष तक का हो सकेगा, या जुर्माने से या दोनों से, दंडनीय होगा:
परंतु यदि इस धारा के अधीन दोषसिद्ध किए गए किसी व्यक्ति को पुनः सिद्धदोष ठहराया जाता है तो वह ऐसे कारावास से, जो तीन वर्ष तक का हो सकेगा, या जुर्माने से या दोनों से, दंडनीय होगा ।
15. सिक्के के रूप में प्रयोग के लिए धातु के टुकड़े लाने का प्रतिषेध और उसके लिए शास्ित-(1) कोई व्यक्ति सिक्के के रूप में प्रयुक्त किए जाने के लिए धातु के किसी टुकड़े को, सरकार के प्राधिकार या उसकी अनुमति के सिवाय, समुद्री मार्ग या भू-मार्ग या वायु मार्ग द्वारा भारत में नहीं लाएगा ।
(2) जो कोई उपधारा (1) के उपबंधों का उल्लंघन करेगा, ऐसे कारावास से, जो सात वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माने से, दंडनीय होगा ।
16. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो अपराध किए जाने के समय, कंपनी का भारसाधक था और उसके कारबार के संचालन के लिए उत्तरदायी था, अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने तथा दंडित किए जाने का भागी होगा:
परंतु इस उपधारा की कोई बात किसी व्यक्ति को किसी दंड के लिए भागी नहीं बनाएगी, यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि अपराध किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता के कारण किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां कंपनी का ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने तथा दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -
(क) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत कोई फर्म, सोसाइटी या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है; और
(ख) निदेशक" से, -
(i) किसी फर्म के संबंध में, फर्म का कोई भागीदार या स्वामी अभिप्रेत है;
(ii) किसी सोसाइटी या व्यष्टियों के अन्य संगम के संबंध में, ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जिसे सोसाइटी या अन्य संगम के नियमों के अधीन, यथास्थिति, सोसाइटी या व्यष्टियों के अन्य संगम के कार्यकलापों का प्रबंध सौंपा गया है ।
अध्याय 6
प्रकीर्ण
17. समपहरण-ऐसा सिक्का या धातु, जिसके संबंध में इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किया गया है, सरकार को समहृत हो जाएगा ।
18. अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 का इस अधिनियम के अधीन अपराधों को लागू न होना-अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 (1958 का 20) की कोई बात इस अधिनियम के अधीन अपराधों को लागू नहीं होगी ।
19. अपराधों का संज्ञेय, जमानतीय और अशमनीय होना-दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन अपराध संज्ञेय और जमानीय होंगे, किंतु शमनीय नहीं होंगे ।
20. 1934 के अधिनियम 2 का संशोधन-भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 में, -
(i) धारा 2 के खंड (घ) में, भारतीय सिक्का-निर्माण अधिनियम, 1906" (1906 का 3) शब्दों और अंकों के स्थान पर, सिक्का-निर्माण अधिनियम, 2011" शब्द और अंक रखे जाएंगे;
(ii) धारा, 39 में, भारतीय सिक्का-निर्माण अधिनियम, 1906" (1906 का 3) शब्दों और अंकों के स्थान पर, दोनों स्थानों पर, जहां वे आते हैं, सिक्का-निर्माण अधिनियम, 2011" शब्द और अंक रखे जाएंगे ।
21. अपराधों का संक्षिप्त विचारण किया जाना-दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 260 में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन अपराधों का प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट या मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट द्वारा संक्षिप्त विचारण किया जा सकेगा ।
22. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन या उनके अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी ।
23. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों:
परंतु इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ से पांच वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
24. नियम बनने की शक्ति-(1) सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम, निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्ः-
(क) धारा 2 के खंड (च) के अधीन किसी सिक्के का निर्माण करने के प्रयोजन के लिए धातु का उपयोग;
(ख) धारा 2 के खंड (झ) के अधीन किसी सिक्के के लिए धातुओं का प्रतिशत;
(ग) धारा 2 के खंड (ठ) के अधीन किसी सिक्के का मानक वजन;
(घ) धारा 4 के अधीन सिक्कों के लिए विमाएं, डिजाइन, धातुएं, मिश्रित धातुएं या उनकी संरचना;
(ङ) धारा 5 के अधीन सिक्कों का मानक वजन और उनका निर्माण करने में अनुज्ञात उपचार ।
25. नियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, उसके बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह नियम ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह नियम निष्प्रभाव हो जाएगा । किंतु नियम के इस प्रकार परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
26. टकसालों में अन्य सिक्कों का निर्माण करने के संबंध में व्यावृत्ति-इस अधिनियम की किसी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह भारत में किसी टकसाल में ऐसे सिक्के बनाए जाने को प्रतिषिद्ध या निर्बंधित करती है, जो भारत की सीमाओं से बाहर किसी राज्यक्षेत्र की विदेशी सरकार द्वारा धन के रूप में जारी किए जाने के लिए आशयित है ।
27. निरसन और व्यावृत्ति-(1) निम्नलिखित अधिनियमितियां इसके द्वारा निरसित की जाती हैंः-
(क) धातु सिक्का अधिनियम, 1889 (1889 का 1);
(ख) सिक्का-निर्माण अधिनियम, 1906 (1906 का 3);
(ग) कांस्य सिक्का (वैध-मुद्रा) अधिनियम, 1918 (1918 का 22);
(घ) करेंसी आध्यादेश, 1940 (1940 का अध्यादेश 4);
(ङ) छोटे सिक्के (अपराध) अधिनियम, 1971 (1971 का 52) ।
(2) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अधिनियमिति का इस अधिनियम द्वारा निरसन, -
(क) ऐसी किसी अन्य अधिनियमितियों और अध्यादेश को प्रभावित नहीं करेगा, जिसमें निरसित अधिनियमिति अथवा अध्यादेश को लागू, समाविष्ट या निर्दिष्ट किया गया है;
(ख) पहले से की गई या सहन की गई किसी बात की विधिमान्यता, उसके विधिविरुद्ध होने, प्रभाव या परिणामों अथवा पहले से अर्जित या उद्भूत या उपगत किए गए किसी अधिकार, हक, बाध्यता या दायित्व अथवा उसके संबंध में किसी उपचार या कार्रवाई को या पहले से अनुदत्त किसी ऋण, शास्ति, बाध्यता, दायित्व, दावे या मांग या किसी क्षतिपूर्ति की या उससे किसी निर्मुक्ति या उन्मुक्ति अथवा किसी पूर्व कार्य या बात के सबूत को प्रभावित नहीं करेगा;
(ग) किसी सिद्धांत या विधि के नियम या स्थापित अधिकारिता, वाद के प्ररूप या प्रक्रम, व्यवसाय या प्रक्रिया या विद्यमान प्रथा, रूढ़ि, विशेषाधिकार, निर्बंधन, छूट, पद या नियुक्ति को इस बात के होते हुए भी प्रभावित नहीं करेगा कि उनकी क्रमशः इसके द्वारा निरसित किसी अधिनियमिति अथवा अध्यादेश द्वारा, उसमें या उससे किसी रीति मे पुष्टि की गई है या मान्यता प्रदान की गई है या व्युत्पन्न हुई हैं;
(3) उपधारा (1) में विशिष्ट विषयों का उल्लेख निरसनों के प्रभाव के संबंध में साधारण खंड अधिनियम, 1897(1897 का 10) की धारा 6 के साधारण लागू होने पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला या उसको प्रभावित करने वाला नहीं माना जाएगा ।
28. विद्यमान सिक्कों का बना रहना-धारा 27 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अधिनियमितियों और अध्यादेश के निरसन के होते हुए भी, -
(क) उक्त अधिनियमितियों के अधीन निर्गमित सभी सिक्कों; और
(ख) करेंसी अध्यादेश, 1940 (1940 का अध्यादेश 4) के अधीन जारी भारत सरकार का एक रुपए का नोट को, जो सिक्का-निर्माण अधिनियम, 2011 के आरंभ होने से ठीक पूर्व वैध निविदा थे, सिक्के के समान माना जाएगा तथा इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन सभी प्रयोजनों अथवा भुगतान के लिए वैध निविदा बना रहेगा ।
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