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उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 ( Industries (Development and Regulation) Act, 1951 )


 

उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951

(1951 का अधिनियम संख्यांक 65)

[31 अक्तूबर, 1951]

कतिपय उद्योगों के विकास और विनियमन

का उपबंध करने के लिए

अधिनियम

संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: - 

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 है

(2) इसका विस्तार ॥। संपूर्ण भारत पर है  

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे

2. संघ द्वारा नियंत्रण की समीचीनता के बारे में घोषणा-इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि लोकहित में यह समीचीन है कि पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट उद्योगों को संघ अपने नियंत्रण के अधीन ले ले  

3. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित हो

() सलाहकार परिषद्" से धारा 5 के अधीन स्थापित केन्द्रीय सलाहकार परिषद् अभिप्रेत है

 [(कक) आनुषंगिक औद्योगिक उपक्रम" से ऐसा औद्योगिक उपक्रम अभिप्रेत है जो धारा 11 की उपधारा (1) के परन्तुक और उस उपधारा के अधीन विनिर्दिष्ट अपेक्षाओं के अनुसार, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए आनुषंगिक औद्योगिक उपक्रम माना जाने का हकदार है;]

 [ [(कख) चालू आस्तियां" से बैंक अतिशेष और नकदी अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत ऐसी अन्य आस्तियां या आरक्षितियां हैं जो कारबार के मामूली अनुक्रम में बारह मास से अनधिक की अवधि के भीतर नकदी के रूप में वसूली किए जाने या विक्रय किए जाने या उपभोग किए जाने के लिए प्रत्याशित हैं, जैसे, व्यापार-स्टाक, माल के विक्रय और की गई सेवाओं के लिए विविध ऋणियों से शोध्य रकमें, अग्रिम कर संदाय तथा भुगतान किए जाने वाले बिल, किन्तु इनके अन्तर्गत किसी भविष्य निधि, पेंशन, निधि, उपदान निधि या औद्योगिक उपक्रम का स्वामित्व रखने वाली किसी कम्पनी द्वारा कर्मचारियों के कल्याण के लिए अनुरक्षित किसी अन्य निधि में जमा राशियां नहीं हैं ;

6[(कग)] चालू दायित्व" से वे दायित्व अभिप्रेत हैं जिनका मांग पर या उनके उपगत होने की तारीख से बारह मास की अवधि के भीतर निर्वहन किया जाना है और इनके अन्तर्गत कोई ऐसा चालू दायित्व है जो धारा 18चख के अधीन निलम्बित किया गया है;] 

() विकास परिषद्" से धारा 6 के अधीन स्थापित विकास परिषद् अभिप्रेत है

 [(खख) विद्यमान औद्योगिक उपक्रम" से अभिप्रेत है :-

() मूल रूप से अधिनियमित पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट उद्योगों में से किसी से सम्बद्ध औद्योगिक उपक्रम की दशा में ऐसा औद्योगिक उपक्रम जो इस अधिनियम के प्रारंभ पर विद्यमान था या जिसकी स्थापना के लिए प्रभावी कार्रवाई ऐसे प्रारंभ से पूर्ण की जा चुकी थी; और 

() पहली अनुसूची के संशोधन द्वारा उसमें जोड़े गए उद्योगों में से किसी से सम्बद्ध औद्योगिक उपक्रम की दशा में ऐसा औद्योगिक उपक्रम जो ऐसे संशोधन के प्रवृत्त होने पर विद्यमान है या जिसकी स्थापना के लिए प्रभावी कार्रवाई ऐसे संशोधन के प्रवृत्त होने से पूर्व की जा चुकी थी ;] 

() कारखाना" से अपनी प्रसीमाओं सहित कोई ऐसा परिसर अभिप्रेत है जिसके किसी भाग में कोई विनिर्माण प्रक्रिया,-

(i) शक्ति की सहायता से की जा रही है या मामूली तौर से की जाती है, परन्तु तब जबकि उसमें पचास या अधिक कर्मकार काम कर रहे हैं या पूर्ववर्ती बारह मास में किसी दिन काम कर रहे थे

(ii) शक्ति की सहायता के बिना की जा रही है, परन्तु तब जबकि उमसें एक सौ या उससे अधिक कर्मकार काम कर रहे हैं या पूर्ववर्ती बारह मास में किसी दिन काम रहे थे और परन्तु यह और भी कि ऐसे परिसर के किसी भाग में कोई विनिर्माण प्रक्रिया शक्ति की सहायता से नहीं की जा रही है ;

 [(गग) उच्च न्यायालय" से वह उच्च न्यायालय अभिप्रेत है जो उस स्थान के संबंध में अधिकारिता रखता है, जहां किसी कम्पनी का रजिस्ट्रीकृत कार्यालय स्थित है ;]

() औद्योगिक उपक्रम" से किसी अनुसूचित उद्योग से सम्बद्ध कोई उपक्रम अभिप्रेत है जो एक या अधिक कारखानों में किसी व्यक्ति या प्राधिकारी द्वारा जिसके अन्तर्गत सरकार भी है, चलाया जा रहा है  

 [(घघ) ऐसे औद्योगिक उपक्रम के संबंध में जो रजिस्ट्रीकृत है या जिसकी बाबत अनुज्ञप्ति या अनुज्ञा इस अधिनियम के अधीन दी गई है, नई वस्तु" से अभिप्रेत है,-

() पहली अनुसूची में किसी ऐसी मद के अधीन आने वाली कोई वस्तु जो उस मद से भिन्न है, जिसके अधीन, यथास्थिति, रजिस्ट्रीकरण की या अनुज्ञप्ति या अनुज्ञा देने की तारीख को उस औद्योगिक उपक्रम में मामूली तौर से विनिर्मित या उत्पादित वस्तुएं आती हैं

() कोई वस्तु जिस पर ऐसा चिह्न लगा हुआ है जो ट्रेड मार्क्स ऐक्ट, 1940 (1940 का 5)  में परिभाषित है या जो किसी पेटेंट की विषय है यदि, यथास्थिति, रजिस्ट्रीकरण की या अनुज्ञप्ति या अनुज्ञा देने की तारीख को वह औद्योगिक उपक्रम ऐसी वस्तु जिस पर वह चिह्न लगा हुआ है या जो उस पेटेंट की विषय है विनिर्मित या उत्पादित नहीं कर रहा था ;] 

() अधिसूचित आदेश" से राजपत्र में अधिसूचित आदेश अभिप्रेत है

() किसी औद्योगिक उपक्रम के संबंध में स्वामी" से कोई ऐसा व्यक्ति या प्राधिकारी अभिप्रेत है जिसका उपक्रम के कार्यकलाप पर अन्ितम नियंत्रण है, और जहां उक्त कार्यकलाप किसी प्रबंधक, प्रबंध निदेशक या प्रबंध अभिकर्ता को सौंपे जाते हैं, वहां ऐसा प्रबंधक, प्रबंध निदेशक या प्रबंध अभिकर्ता उस उपक्रम का स्वामी समझा जाएगा

() विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है

() अनुसूची" से इस अधिनियम की कोई अनुसूची अभिप्रेत है

() अनुसूचित उद्योग" से पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट उद्योगों में से कोई अभिप्रेत है

 [() लघु औद्योगिक उपक्रम" से ऐसा औद्योगिक उपक्रम अभिप्रेत है जो धारा 11 की उपधारा (1) के अधीन विनिर्दिष्ट अपेक्षाओं के अनुसार, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए लघु औद्योगिक उपक्रम माना जाने का हकदार है ]

1[ [()] उन शब्दों और पदों के जो इसमें प्रयुक्त हैं किन्तु, इस अधिनियम में परिभाषित नहीं हैं और कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में परिभाषित हैं वही अर्थ होंगे जो उनके उस अधिनियम में हैं

4. [व्यावृत्ति]-उद्योग (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 1953 (1953 का 26) की धारा 3 द्वारा (1-10-1953 से) निरसित

 

अध्याय 2

केन्द्रीय सलाहकार परिषद् और विकास परिषद्

5. केन्द्रीय सलाहकार परिषद् की स्थापना और उसका गठन तथा उसके कृत्य-(1) अनुसूचित उद्योगों के विकास और विनियमन से सम्बद्ध विषयों के बारे में अपने को सलाह देने के प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार अधिसूचित आदेश द्वारा, एक परिषद् स्थापित कर सकेगी जो केन्द्रीय सलाहकार परिषद् कहलाएगी  

(2) सलाहकार परिषद् एक अध्यक्ष और तीस से अनधिक ऐसे अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगी, जो सभी केन्द्रीय सरकार द्वारा उन व्यक्तियों में से नियुक्त किए जाएंगे जो उसकी राय में निम्नलिखित के हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए समर्थ है :-

() अनुसूचित उद्योगों में औद्योगिक उपक्रमों के स्वामी

() अनुसूचित उद्योगों में औद्योगिक उपक्रमों में नियोजित व्यक्ति

() अनुसूचित उद्योगों द्वारा विनिर्मित या उत्पादित माल के उपभोक्ता

() ऐसे अन्य व्यक्तियों के वर्ग जिनके अन्तर्गत प्रारंभिक उत्पादक हैं जिनका केन्द्रीय सरकार की राय में सलाहकार परिषद् में प्रतिनिधित्व होना चाहिए  

(3) सलाहकार परिषद् के सदस्यों की पदावधि, अपने कृत्यों के निवर्हन में उनके द्वारा अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया और उनमें आकस्मिक रिक्तियों को भरने की रीति ऐसी होगी जो विहित की जाए

(4) केन्द्रीय सरकार

() उपधारा (3) के अधीन बनाए जाने वाले नियमों से भिन्न किन्हीं नियमों के बनाने के बारे में सलाहकार परिषद् से परामर्श करेगी

                                                                                                                                                     

और इस अधिनियम के प्रशासन से सम्बन्धित किसी ऐसे अन्य विषय की बाबत, जिसके बारे में सलाहकार परिषद् की सलाह प्राप्त करना केन्द्रीय सरकार आवश्यक समझे सलाहकार परिषद् से परामर्श कर सकेगी

6. विकास परिषदों की स्थापना और उनका गठन तथा उनके कृत्य-(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचित आदेश द्वारा, किसी अनुसचित उद्योग या अनुसूचित उद्योगों के समूह के लिए व्यक्तियों का एक निकाय स्थापित कर सकेगी जो विकास परिषद् कहलाएगा और जिसमें ऐसे सदस्य होंगे जो केन्द्रीय सरकार की राय में

() अनुसूचित उद्योग या अनुसूचित उद्योगों के समूह में औद्योगिक उपक्रमों के स्वामियों के हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए समर्थ व्यक्ति हैं

() अनुसूचित उद्योग या अनुसूचित उद्योगों के समूह के तकनीकी और अन्य पहलुओं से सम्बद्ध विषयों की विशेष जानकारी रखने वाले व्यक्ति हैं

() अनुसूचित उद्योग या अनुसूचित उद्योगों के समूह में औद्योगिक उपक्रमों में नियोजित व्यक्तियों के हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए समर्थ व्यक्ति हैं

() पूर्वोक्त प्रवर्गों में से किसी में आने वाले ऐसे व्यक्ति जो अनुसूचित उद्योग या अनुसूचित उद्योगों के समूह द्वारा विनिर्मित या उत्पादित माल के उपभोक्ताओं के हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए समर्थ हैं  

(2) विकास परिषद् के सदस्यों की संख्या और पदावधि, और अपने कृत्यों के निर्वहन में उनके द्वारा अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया तथा उनमें आकस्मिक रिक्तियों को भरने की रीति ऐसी होगी जो विहित की जाए  

(3) प्रत्येक विकास परिषद्, इस अधिनियम के आधार पर, ऐसे नाम से, जैसा उसे स्थापित करने वाले अधिसूचित आदेश में विनिर्दिष्ट हो, निगमित निकाय होगी, और सम्पत्ति का धारण और अन्तरण कर सकेगी, तथा उक्त नाम से वह वाद लाएगी और उस पर वाद लाया जाएगा  

(4) विकास परिषद् दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट प्रकार के कृत्यों में से ऐसे कृत्यों का निष्पादन करेगी जो उसे केन्द्रीय सरकार द्वारा सौंपे जांए और विकास परिषद् द्वारा जिनके प्रयोग के लिए उपबन्ध करना केन्द्रीय सरकार को समीचीन प्रतीत होता है जिससे कि अनुसूचित उद्योग या अनुसूचित उद्योगों के समूह में, जिसके लिए विकास परिषद् स्थापित की गई हैं, दक्षता या उत्पादकता में वृद्धि हो, अथवा जिससे ऐसी सेवा में सुधार या विकास हो, जो सेवा ऐसा उद्योग या उद्योगों का समूह समाज की करता है या कर सकता है अथवा जिससे ऐसा उद्योग या उद्योगों का समूह ऐसी सेवाएं और अधिक मितव्ययिता से करने के लिए समर्थ हो सके  

(5) विकास परिषद् ऐसे अन्य कृत्यों का पालन भी करेगी जिनके पालन करने की उससे अपेक्षा इस अधिनियम के किसी अन्य उपबन्ध के द्वारा या अधीन की जाए

7. विकास परिषदों की रिपोर्ट और लेखा-(1) विकास परिषद् प्रतिवर्ष एक रिपोर्ट तैयार करेगी और केन्द्रीय सरकार को तथा सलाहकार परिषद् को भेजेगी जिसमें यह वर्णित होगा कि गत सम्पूरित वित्तीय वर्ष के दौरान उसके कृत्यों के निर्वहन में क्या किया गया है

(2) रिपोर्ट में उस वर्ष के लिए विकास परिषद् के लेखाओं का एक विवरण होगा और वह उसके लेखाओं को संपरीक्षा हो जाने के पश्चात् यथाशीघ्र किसी ऐसी रिपोर्ट की एक प्रति के सहित भेज दिया जाएगा जो उन लेखाओं के बारे में लेखा परीक्षाओं ने दी है

(3) लेखाओं का विवरण ऐसे प्ररूप में होगा जो विहित किया जाए और वह ऐसा प्ररूप होगा जो सर्वोत्तम वाणिज्यिक मानकों के अनुरूप होगा और विवरण में परिषद् के सदस्यों और अधिकारियों को उस वर्ष के दौरान किए गए पारिश्रमिक और भत्तों का योग दिया होगा

(4) विकास परिषद् की या उसके लेखाओं के बारे में लेखापरीक्षकों द्वारा दी गई ऐसी प्रत्येक रिपोर्ट की एक प्रति केन्द्रीय सरकार द्वारा संसद् के समक्ष रखी जाएगी

8. विकास परिषदों का विघटन-(1) यदि केन्द्रीय सरकार का समाधान हो जाता है कि कोई विकास परिषद् अस्तित्व में नहीं रहनी चाहिए, तो वह अधिसूचित आदेश द्वारा उस विकास परिषद् को विघटित कर सकेगी  

(2) उपधारा (1) के अधीन किसी विकास परिषद् के विघटन पर उस विकास परिषद् की आस्तियां, उसके दायित्वों की, यदि कोई हों, उनसे पूर्ति कर दी जाने के पश्चात्, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय सरकार में निहित हो जाएंगी  

9. कुछ दशाओं में अनुसूचित उद्योगों पर उपकर का अधिरोपण-(1) किसी ऐसे अनुसूचित उद्योगों में जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित आदेश द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किया जाए, विनिर्मित या उत्पादित सभी माल पर इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उपकर के रूप में ऐसी दर पर, जो उस अधिसूचित आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, उत्पाद-शुल्क उदृगृहीत और संगृहीत किया जा सकेगा तथा विभिन्न माल या माल के विभिन्न वर्गों के लिए विभिन्न दरें विनिर्दिष्ट की जा सकेंगी :

परन्तु ऐसी कोई दर किसी भी दशा में माल के मूल्य के दो आने प्रतिशत से अधिक नहीं होगी

स्पष्टीकरण-इस उपधारा में किसी माल के सम्बन्ध में मूल्य" शब्द से वह थोक नकद कीमत समझी जाएगी जिस पर कि समान प्रकार और क्वालिटी का ऐसा माल, व्यापार बट्टे और तत्समय देय शुल्क की रकम के सिवाय किसी अन्य कमी या कटौती के बिना, विनिर्माण के स्थान पर तथा वहां से उसके हटाए जाने के समय पर परिदान के लिए विक्रय किया जाता है या किया जा सकता है  

(2) उपकर ऐसे अन्तरालों पर इतने समय के अन्दर और ऐसी रीति से देय होगा जो विहित की जाए और इस निमित्त बनाए गए किन्हीं नियमों में उपकर के तत्परता से संदाय करने पर रिबेट देने के लिए उपबन्ध हो सकेगा

(3) उक्त उपकर की वसूली उसी रीति से की जा सकेगी जिससे भू-राजस्व की बकाया वसूल की जाती है

(4) केन्द्रीय सरकार, किसी अनुसूचित उद्योग या अनुसूचित उद्योगों द्वारा विनिर्मित या उत्पादित माल के सम्बन्ध में इस धारा के अधीन संगृहीत उपकर के आगम उस उद्योग के समूह के लिए स्थापित विकास परिषद् को सौंप सकेगी और जहां वह वैसा करती है वहां विकास परिषद् उक्त आगमों का उपयोग निम्नलिखित के लिए करेगी :-

() उस अनुसूचित उद्योग या अनुसूचित उद्योगों के समूह के सम्बन्ध में, जिसकी बाबत विकास परिषद् स्थापित की गई है, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान की अभिवृद्धि;  

() ऐसे उद्योग या उद्योगों के समूह के उत्पादों के सम्बन्ध में डिजाइन और क्वालिटी में सुधार की अभिवृद्धि

() ऐसे उद्योग या उद्योगों के समूह में तकनीकियों और श्रमिकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था

() उसके कृत्यों के प्रयोग में किए जाने वाले व्यय की और ऐसे प्रशासन व्यय की पूर्ति, जो विहित किया जाए   

अध्याय 3

अनुसूचित उद्योगों का विनियमन

10. विद्यमान औद्योगिक उपक्रमों का रजिस्ट्रीकरण- [(1) प्रत्येक विद्यमान औद्योगिक उपक्रम का स्वामी, जो केन्द्रीय सरकार हो, ऐसी अवधि के अन्दर, जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा साधारणतया औद्योगिक उपक्रमों के सम्बन्ध में या उनके किसी वर्ग के सम्बन्ध में इस निमित्त नियत करे, उस उपक्रम को विहित रूप से रजिस्टर कराएगा ]

(2) केन्द्रीय सरकार भी प्रत्येक ऐसे विद्यमान औद्योगिक उपक्रम को, जिसकी वह स्वामी है, उसी रीति से रजिस्टर कराएगी

 [(3) जहां कोई औद्योगिक उपक्रम इस धारा के अधीन रजिस्टर किया जाता है, वहां यथास्थिति, उस उपक्रम के स्वामी या केन्द्रीय सरकार को एक रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दिया जाएगा  [जिसमें औद्योगिक उपक्रम की उत्पादन क्षमता और ऐसी अन्य विशिष्टियां होंगी जो विहित की जाएंट।]

 [(4) प्रत्येक औद्योगिक उपक्रम का स्वामी, जिसे औद्योगिक (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 1973 (1973 का 67) के प्रारंभ के पहले इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दिया गया है, यदि उपक्रम ऐसे वर्ग के उपक्रमों के अन्तर्गत आता है, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे तो, ऐसी अवधि के भीतर, जो ऐसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, औद्योगिक उपक्रम की उत्पादन क्षमता और अन्य विहित विशिष्टियां रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र में दर्ज करने के लिए उक्त रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र प्रस्तुत करेगा

(5) उपधारा (3) के अधीन दिए गए किसी रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र में उत्पादन क्षमता विनिर्दिष्ट करने में, केन्द्रीय सरकार, ऐसे औद्योगिक उपक्रम की, जो उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए किए गए आवेदन में विनिर्दिष्ट है, उत्पादन या प्रतिष्ठापित क्षमता, उस तारीख के, जिसको उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन किया गया था, ठीक पहले उत्पादन के स्तर, औद्योगिक (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 1973 के संसद् में पुरःस्थापन के ठीक तीन पूर्ववर्ती वर्षों के दौरान उच्चतम वार्षिक उत्पादन के स्तर, उस मात्रा, जिस तक उक्त अवधि के दौरान उत्पादन का निर्यात के लिए उपयोग किया गया था और केन्द्रीय सरकार द्वारा सुसंगत समझी जाने वाली ऐसी अन्य बातों पर, जिनके अन्तर्गत सुसंगत अवधि के दौरान किसी कारण से क्षमता के कम उपयोजन, यदि कोई हो, की मात्रा है, विचार करेगी ]

 [10. कुछ दशाओं में रजिस्ट्रीकरण का प्रतिसंहरण-यदि केन्द्रीय सरकार का समाधान हो जाता है कि किसी औद्योगिक उपक्रम का रजिस्ट्रीकरण किसी आवश्यक तथ्य के बारे में दुर्व्यपदेशन द्वारा अभिप्राप्त किया गया है या इस अधिनियम के अधीन अनुदत्त किसी छूट के उसको लागू हो जाने के कारण किसी औद्योगिक उपक्रम का इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण नहीं होना चाहिए या कि किसी अन्य कारण से वह रजिस्ट्रीकरण निरर्थक या अप्रवर्तनशील हो गया है और इसलिए उसका प्रतिसंहरण अपेक्षित है तो केन्द्रीय सरकार उस उपक्रम के स्वामी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् रजिस्ट्रीकरण को प्रतिसंहृत कर सकेगी ]

11. नए औद्योगिक उपक्रामों का अनुज्ञापन-(1) कोई व्यक्ति या केन्द्रीय सरकार से भिन्न कोई प्राधिकारी, इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् कोई नया औद्योगिक उपक्रम केन्द्रीय सरकार द्वारा उस निमित्त दी गई अनुज्ञप्ति के अधीन और उसके अनुसार ही स्थापित करेगा अन्यथा नहीं :

परन्तु केन्द्रीय सरकार से भिन्न कोई सरकार केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुज्ञा से नया औद्योगिक उपक्रम स्थापित कर सकेगी

(2) उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञप्ति या अनुज्ञा में विशिष्टतया उपक्रम के स्थान के और आकार के सम्बन्ध में न्यूनतम मानकों के बारे में शर्तों सहित, जो उसमें उपबन्धित होंगी, ऐसी शर्तें हो सकेंगी, जो केन्द्रीय सरकार धारा 30 के अधीन बनाए गए नियमों के, यदि कोई हों, अनुसार अधिरोपित करना ठीक समझे

 [11. नई वस्तुओं के उत्पादन और विनिर्माण के लिए अनुज्ञप्ति-किसी औद्योगिक उपक्रम का, जो धारा 10 के अधीन रजिस्ट्रीकृत है या जिसके संबंध में अनुज्ञप्ति या अनुज्ञा धारा 11 के अधीन दी गई है, स्वामी, जो केन्द्रीय सरकार नहीं है, किसी नई वस्तु का उत्पादन या विनिर्माण तब तक नहीं करेगा जब तक कि-

() धारा 10 के अधीन रजिस्ट्रीकृत औद्योगिक उपक्रम की दशा में उसने ऐसी नई वस्तु के उत्पादन या विनिर्माण के लिए अनुज्ञप्ति अभिप्राप्त नहीं कर ली है; और

() ऐसे औद्योगिक उपक्रम की दशा में, जिसके सम्बन्ध में अनुज्ञप्ति या अनुज्ञा धारा 11 के अधीन दी गई है उसने विद्यमान अनुज्ञप्ति या अनुज्ञा को विहित रीति से संशोधित नहीं करा लिया है ]

 [11. केन्द्रीय सरकार की उन अपेक्षाओं को विनिर्दिष्ट करने की शक्ति, जिनका लघु औद्योगिक उपक्रमों द्वारा अनुपालन किया जाएगा-(1) केन्द्रीय सरकार यह अभिनिश्चित करने की दृष्टि से कि किन आनुषंगिक और लघु औद्योगिक उपक्रमों को इस अधिनियम के अधीन अनुपोषक उपायों, छूटों या अन्य अनुकूल व्यवहार की आवश्यकता है, ताकि वे अपनी वर्धिष्णुता और सामर्थ्य इस प्रकार बनाए रख सकें कि वे-

() देश की औद्योगिक अर्थ-व्यवस्था की सामंजस्यपूर्ण रीति से प्रोन्नति करने और बेकारी की समस्या को सलुझाने में; और

() यह सुनिश्चित करने में कि समुदाय के भौतिक साधनों के स्वामित्व और नियंत्रण का वितरण इस प्रकार से किया जाए कि उससे सामूहिक हित का सर्वोत्तम साधन हो,

प्रभावकारी हों, उपधारा (2) में वर्णित बातों को ध्यान में रखते हुए, अधिसूचित आदेश द्वारा, वे अपेक्षाएं विनिर्दिष्ट कर सकेंगी, जिनका किसी औद्योगिक उपक्रम द्वारा अनुपालन किया जाएगा, ताकि उसे इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए आनुषंगिक या लघु औद्योगिक उपक्रम माना जा सके तथा विभिन्न प्रयोजनों के लिए या विभिन्न वस्तुओं के विनिर्माण या उत्पादन में लगे औद्योगिक उपक्रमों की बाबत इस प्रकार भिन्न-भिन्न अपेक्षाएं विनिर्दिष्ट की जा सकेंगी :

                परन्तु किसी औद्योगिक उपक्रम को आनुषंगिक औद्योगिक उपक्रम नहीं माना जाएगा जब तक कि वह-

(i) पुर्जों, संघटकों, उपसमन्वायोजनों, उपकरणों या मध्यवर्तियों के विनिर्माण में, अथवा

(ii) अन्य वस्तुओं के उत्पादन के लिए अन्य यूनिटों को, यथास्थिति, सेवाएं देने या अपने उत्पादन के या अपनी कुल सेवाओं के पचास प्रतिशत से अनधिक का प्रदाय करने या देने में,

लगा हो या लगने वाला हो

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट बातें निम्नलिखित हैं, अर्थात् :-

                () औद्योगिक उपक्रम द्वारा निम्नलिखित में विनिधान :-

(i) संयंत्र और मशीनरी, या

(ii) भूमि, भवन, संयंत्र और मशीनरी;

                                () औद्योगिक उपक्रम के स्वामित्व की प्रकृति;

                                () औद्योगिक उपक्रम में नियोजित कर्मकारों की संख्या की अल्पता;

                                () औद्योगिक उपक्रम के उत्पाद की प्रकृति, लागत और क्वालिटी;

() औद्योगिक उपक्रम द्वारा किसी संयंत्र या मशीनरी का आयात किए जाने के लिए अपेक्षित विदेशी मुद्रा, यदि कोई हो; और

() अन्य ऐसी ही सुसंगत बातें, जो विहित की जाएं

(3) उपधारा (1) के अधीन किए जाने के लिए प्रस्थापित प्रत्येक अधिसूचित आदेश की एक प्रति संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखी जाएगी यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी यदि उस सत्र के पूर्वोक्त या आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन प्रस्थापित अधिसूचित आदेश में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं, तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि उस आदेश का जारी किया जाना अननुमोदित कर दिया जाना चाहिए, तो वह आदेश नहीं किया जाएगा

(4) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, ऐसा औद्योगिक उपक्रम, जो उद्योग (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 1984 के प्रारंभ के ठीक पहले, तत्समय प्रवृत्त विधि के अनुसार, आनुषंगिक या लघु औद्योगिक उपक्रम की परिभाषा के अधीन आता था, ऐसे प्रारम्भ के पश्चात्, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए तब तक आनुषंगिक या लघु औद्योगिक उपक्रम माना जाता रहेगा जब तक कि पूर्वोक्त परिभाषा को उपधारा (1) के अधीन किए गए किसी अधिसूचित आदेश द्वारा परिवर्तित या अतिष्ठित नहीं कर दिया जाता ]

12. कुछ दशाओं में अनुज्ञप्तियों का प्रतिसंहरण और संशोधन-(1) यदि केन्द्रीय सरकार का इस निमित्त उसको निर्देश किए जाने पर, या अन्यथा, समाधान हो जाता है कि कोई व्यक्ति या प्राधिकारी, जिसको धारा 11 के अधीन अनुज्ञप्ति दी गई है उचित कारण के बिना ऐसा नया औद्योगिक उपक्रम जिसके सम्बन्ध में वह अनुज्ञप्ति दी गई है उसके लिए विनिर्दिष्ट समय के अन्दर या ऐसे बढ़ाए गए समय के अन्दर जिसे केन्द्रीय सरकार किसी मामले में बढ़ाना ठीक समझे, स्थापित करने में असफल रहा है या स्थापित करने के लिए प्रभावी कार्रवाई करने में असफल रहा है तो वह अनुज्ञप्ति को प्रतिसंहृत कर सकेगी

(2) किन्हीं नियमों के, जो इस निमित्त बनाए जाएं, अधीन रहते हुए केन्द्रीय सरकार धारा 11 के अधीन दी गई किसी अनुज्ञप्ति में परिवर्तन या संशोधन भी कर सकेगी :

परन्तु किसी भी ऐसी शक्ति का प्रयोग इस निमित्त दी गई अनुज्ञप्ति के अनुसार नए औद्योगिक उपक्रम को स्थापित करने के लिए प्रभावी कार्रवाई करने के पश्चात् नहीं किया जाएगा

 [(3) इस धारा के उपबन्ध धारा 11 के अधीन दी गई अनुज्ञप्ति के सम्बन्ध में या जहां अनुज्ञप्ति उस धारा के अधीन संशोधित की गई है वहां उसके संशोधन के सम्बन्ध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे धारा 11 के अधीन दी गई अनुज्ञप्ति के सम्बन्ध में लागू होते हैं ]

 [13. विशेष दशाओं में औद्योगिक उपक्रमों के अनुज्ञापन के लिए अतिरिक्त उपबन्ध-(1) किसी औद्योगिक उपक्रम का स्वामी, जो केन्द्रीय सरकार नहीं है-

() ऐसे औद्योगिक उपक्रम की दशा में, जो धारा 10 के अधीन रजिस्टर किए जाने के लिए अपेक्षित हैं किन्तु जो उस धारा के अधीन उस प्रयोजन के लिए नियत समय के अन्दर रजिस्टर नहीं किया गया है ऐसी अवधि की समाप्ति के पश्चात् उस उपक्रम का कारबार; या

() ऐसे औद्योगिक उपक्रम की दशा में, जिसकी बाबत रजिस्ट्रीकरण धारा 10  ॥। के अधीन प्रतिसंहृत किया गया है, प्रतिसंहरण के पश्चात् उस उपक्रम का कारबार; या

() ऐसे औद्योगिक उपक्रम की दशा में, जिसको इस अधिनियम के उपबन्ध मूल रूप में लागू नहीं होते थे किन्तु  किसी कारण से इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् लागू हो गए, उस तारीख से, जिसको उस अधिनियम के उपबन्ध ऐसे लागू हुए, तीन मास की समाप्ति के पश्चात् उस उपक्रम का कारबार; या

() ऐसे औद्योगिक उपक्रम का, जो रजिस्टर किया गया है  [या जिसकी बाबत अनुज्ञप्ति या अनुज्ञा दी गई है,] किसी प्रकार का पर्याप्त विस्तार, या

() ऐसे औद्योगिक उपक्रम के, जो रजिस्टर किया गया है, सम्पूर्ण या किसी भाग के अवस्थान का परिवर्तन,

केन्द्रीय सरकार द्वारा उस निमित्त दी गई अनुज्ञप्ति के अधीन और उसके अनुसार, और राज्य सरकार की दशा में, केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुज्ञा के अधीन और उसके अनुसार ही करेगा, अन्यथा नहीं

(2) धारा 11 की उपधारा (2) और धारा 12 के उपबन्ध इस धारा में निर्दिष्ट किसी औद्योगिक उपक्रम को अनुज्ञाप्तियों या अनुज्ञाएं देने के सम्बन्ध में, जहां तक हो सके वैसे ही लागू होंगे जैसे वे किसी नए औद्योगिक उपक्रम को अनुज्ञप्ति या अनुज्ञा देने के सम्बन्ध में लागू होते हैं

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए पर्याप्त विस्तार" से किसी विद्यमान औद्योगिक उपक्रम का ऐसा विस्तार अभिप्रेत है जो उस उपक्रम की उत्पादन-क्षमता को पर्याप्त रूप से बढ़ाता है, या ऐसे स्वरूप का है कि उससे वस्तुतः एक नया औद्योगिक उपक्रम बन जाता है, किन्तु इसके अन्तर्गत कोई ऐसा विस्तार नहीं है जो उपक्रम के स्वरूप और ऐसे विस्तार से सम्बद्ध परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उसके लिए प्रसामान्य है ]

14. अनुज्ञप्ति या अनुज्ञा के अनुदान के लिए प्रक्रिया- [धारा 11, धारा 11,  [धारा 13 या धारा 29]] के अधीन कोई अनुज्ञप्ति या अनुज्ञा अनुदत्त करने से पूर्व केन्द्रीय सरकार ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी से, जिसे वह उस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे, अपेक्षा कर सकेगी कि वह उस निमित्त प्राप्त आवेदनों के सम्बन्ध में विस्तृत और पूरा अन्वेषण करे और ऐसे अन्वेषण के परिणाम की उसको रिपोर्ट दे तथा ऐसा अन्वेषण करने में वह अधिकारी या प्राधिकारी ऐसी प्रक्रिया का अनुपालन करेगा जो विहित की जाए

15. अनुसूचित उद्योगों या औद्योगिक उपक्रमों के बारे में अन्वेषण कराने की शक्ति-जहां केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि-

                () किसी अनुसूचित उद्योग या औद्योगिक उपक्रम या उपक्रमों के सम्बन्ध में-

(i) किसी ऐसी वस्तु या वस्तुओं के वर्ग के, जो उस उद्योग से सम्बद्ध है या, यथास्थिति, उस औद्योगिक उपक्रम या उपक्रमों में विनिर्मित या उत्पादित किया जाता है, उत्पादन के परिमाग में पर्याप्त कमी हुई है या होनी संभाव्य है, जिसके लिए वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कोई औचित्य नहीं है; या

(ii) किसी ऐसी वस्तु या वस्तुओं के वर्ग की क्वालिटी में, जो उस उद्योग से सम्बद्ध है या, यथास्थिति, उस औद्योगिक उपक्रम या उपक्रमों में विनिर्मित या उत्पादित किया जाता है ऐसा स्पष्ट ह्रास हुआ है या होना संभाव्य है जो बचाया जा सकता था या बचाया जा सकता है; या

(iii) किसी ऐसी वस्तु या वस्तुओं के वर्ग की, जो उस उद्योग से सम्बद्ध है या, यथास्थिति, उस औद्योगिक उपक्रम या उपक्रमों में विनिर्मित या उत्पादित किया जाता है, कीमत में वृद्धि हुई है या होनी संभाव्य है जिसके लिए कोई औचित्य नहीं है; या

(iv) राष्ट्रीय महत्व के किन्हीं साधनों को, जो, यथास्थिति, उस उद्योग या उस औद्योगिक उपक्रम या उपक्रमों में प्रयुक्त किए जाते हैं, संरक्षित करने के प्रयोजन के लिए कार्रवाई करना, जो इस अध्याय में उपबन्धित है, आवश्यक है; या

 [() किसी औद्योगिक उपक्रम का प्रबंध संबंधित अनुसूचित उद्योग के लिए या लोक हित के लिए अत्यन्त हानिकर रीति से किया जा रहा है,]

वहां केन्द्रीय सरकार मामले की परिस्थितियों का विस्तृत और पूरा अन्वेषण ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय द्वारा कर सकेगी या करा सकेगी जिसे वह उस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे

 [15. किसी समापनाधीन कम्पनी के कार्यकलापों का अन्वेषण करने की शक्ति-(1) जहां किसी औद्योगिक उपक्रम का स्वामित्व रखने वाली किसी कम्पनी का परिसमापन उच्च न्यायालय द्वारा या उसके पर्यवेक्षणाधीन किया जा रहा है और उस कम्पनी का कारबार चालू नहीं रखा जा रहा है, वहां केन्द्रीय सरकार, यदि उसकी यह राय है कि जनसाधरण के हित में और विशिष्टतया संबंधित अनुसूचित उद्योग से संबद्ध वस्तुओं या वस्तुओं के वर्ग के उत्पादन, पूर्ति या वितरण के हित में उस औद्योगिक उपक्रम को चलाने या पुनः चालू करने की संभावना का अन्वेषण आवश्यक है, तो वह उच्च न्यायालय से ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय द्वारा, जिसे उस प्रयोजन के लिए वह सरकार नियुक्त करे, ऐसी संभावना का अन्वेषण करने या अन्वेषण कराने की अनुज्ञा के लिए आवेदन कर सकेगी

(2) जहां उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा कोई आवेदन किया जाता है वहां उच्च न्यायालय कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, आवेदित अनुज्ञा प्रदान करेगा ]

16. धारा 15 के अधीन अन्वेषण के पूरा होने पर केन्द्रीय सरकार की शक्तियां-(1) यदि कोई ऐसा अन्वेषण, जो धारा 15 में निर्दिष्ट है, करने या कराने के पश्चात् केन्द्रीय सरकार का समाधान हो जाता है कि इस धारा के अधीन कार्रवाई वांछनीय है तो वह संबंधित औद्योगिक उपक्रम या उपक्रमों को ऐसे निदेश दे सकेगी जो निम्नलिखित सभी प्रयोजनों या उनमें से किसी के लिए उन परिस्थितियों में समुचित हो, अर्थात्: -

() उस औद्योगिक उपक्रम या उपक्रमों द्वारा किसी वस्तु या वस्तुओं के वर्ग के उत्पादन का विनियमन और उत्पादन के मानक नियत करना;

() उस औद्योगिक उपक्रम या उपक्रमों से ऐसी कार्रवाई की अपेक्षा करना जो केन्द्रीय सरकार उस उद्योग के विकास को, जिससे वह उपक्रम या वे उपक्रम सम्बद्ध है या हैं, बढ़ावा देने के लिए आवश्यक समझे

() उस औद्योगिक उपक्रम या उपक्रमों को कोई ऐसा कार्य करने या पद्धति अपनाने से रोकना जिससे उसकी या उनकी क्षमता, उत्पादन या आर्थिक मूल्य कम हो जाए;

() किसी वस्तु या वस्तुओं के वर्ग की, जो अन्वेषण की विषयवस्तु रहे हैं, कीमतों का नियंत्रण या उनके वितरण का विनियमन

                (2) जहां किसी उद्योग या औद्योगिक उपक्रम या उपक्रमों से सम्बद्ध कोई मामला अन्वेषणाधीन है वहां केन्द्रीय सरकार, सम्बन्धित औद्योगिक उपक्रम या उपक्रमों को उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रकार का कोई निदेश किसी समय दे सकेगी और ऐसा कोई निदेश तब तक प्रभावी रहेगा जब तक उसे केन्द्रीय सरकार द्वारा परिवर्तित या प्रतिसंहृत नहीं कर दिया जाता है

17. [कुछ मामलों में केन्द्रीय सरकार द्वारा सीधे नियंत्रण के लिए विशेष उपबंध ]-औद्योगिक (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 1953 (1953 का 26) की धारा 12 द्वारा (1-10-1953 से) निरसित

18. धारा 15 के अधीन नियुक्त व्यक्ति तथा व्यक्तियों के निकाय की किसी अन्वेषण में सहायता मांगने की शक्ति-(1) धारा 15 [या धारा 15] के अधीन अन्वेषण करने के लिए नियुक्त व्यक्ति या व्यक्तियों का निकाय ऐसे एक या अधिक व्यक्तियों को जो अन्वेषण से सम्बद्ध किसी विषय की विशिष्ष्ट जानकारी रखते हों अन्वेषण करने में अपनी सहायता के लिए चुन सकेगा

(2) ऐसे नियुक्त व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय को शपथ पर साक्ष्य लेने (जिसे लेने के लिए उसे इसके द्वारा सशक्त किया जाता है) और साक्षियों के हाजिर कराने तथा दस्तावेजों और भौतिक पदार्थों को पेश कराने के प्रयोजन के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन सिविल न्यायालय की सब शक्तियां होंगी और वह व्यक्ति या व्यक्तियों का निकाय दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) की धारा 195 और अध्याय 35 के सभी प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायाल यसमझा जाएगा

[अध्याय 3

कुछ दशाओं में केन्द्रीय सरकार द्वारा औद्योगिक उपक्रमों का सीधा प्रबंध या नियंत्रण

18. कुछ दशाओं में किसी औद्योगिक उपक्रम का प्रबन्ध या नियंत्रण ग्रहण करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) यदि केन्द्रीय सरकार की राय है कि-

() कोई औद्योगिक उपक्रम, जिसको धारा 16 के अनुसरण में निदेश दिए गए हैं ऐसे निदेशों का पालन करने में असफल रहा है, या

() किसी औद्योगिक उपक्रम का प्रबंध, जिसके सम्बन्ध में धारा 15 के अधीन अन्वेषण किया गया है (चाहे धारा 16 के अनुसरण में उस उपक्रम को निदेश दिए गए हों या नहीं) संबंधित अनुसूचित उद्योग या लोकहित के लिए अत्यन्त हानिकर रीति से किया जा रहा है,

तो केन्द्रीय सरकार अधिसूचित आदेश द्वारा किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय को उस सम्पूर्ण उपक्रम या उनके किसी भाग का प्रबंध-ग्रहण करने के लिए, या उस सम्पूर्ण उपक्रम के या उसके किसी भाग के संबंध में नियंत्रण के ऐसे कृत्यों का, जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं, प्रयोग करने के लिए, प्राधिकृत कर सकेगी

 [परन्तु यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि लोकहित में यह समीचीन है कि ऐसे किसी अधिसूचित आदेश का प्रभाव पूर्वोक्त पांच वर्ष की समाप्ति के पश्चात् जारी रहना चाहिए तो वह ऐसे जारी रहने के लिए निदेश एक समय पर दो वर्ष से अनधिक की इतनी अवधि के लिए जो उस निदेश में विनिर्दिष्ट की जाए समय-समय पर दे सकेगी, किन्तु इस प्रकार कि ऐसे जारी रहने की कुल अवधि (पांच वर्ष की उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात्)  [बारह वर्ष] से अधिक होगी और जहां ऐसा कोई निदेश दिया जाता है वहां उसकी एक प्रति यथाशीघ्र संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखी जाएगी ]

स्पष्टीकरण-किसी औद्योगिक उपक्रम का, जो कम्पनी है, इस धारा के अधीन प्रबंध ग्रहण करने के लिए व्यक्तियों के किसी निकाय को प्राधिकृत करने की शक्ति के अन्तर्गत किसी व्यक्ति, फर्म या कम्पनी को, ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर जो केन्द्रीय सरकार ठीक समझे उस औद्योगिक उपक्रम का प्रबंध अभिकर्ता नियुक्त करने की शक्ति भी है

 [18कक. कुछ परिस्थितियों में अन्वेषण के बिना औद्योगिक उपक्रमों को ग्रहण करने की शक्ति-(1) इस अधिनियम के किसी अन्य उपबन्ध पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना यदि अपने कब्जे में दस्तावेजों या अन्य साक्ष्य के आधार पर किसी औद्योगिक उपक्रम के संबंध में केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि-

() ऐसे औद्योगिक उपक्रम के भारसाधक व्यक्तियों ने बिना सोचे-विचारे विनिधान द्वारा या औद्योगिक उपक्रम की आस्तियों पर बिना सोचे-विचारे विल्लंगमों के सृजन द्वारा या निधियों के अपयोजन द्वारा ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जिससे औद्योगिक उपक्रम में विनिर्मित या उत्पादित वस्तुओं के उत्पादन पर प्रभाव पड़ने की संभावना है तथा किसी ऐसी स्थिति का निवारण करने के लिए तुरन्त कार्रवाई करना आवश्यक है; या

() वह (चाहे औद्योगिक उपक्रम का स्वामित्व रखने वाली कम्पनी के स्वेच्छया परिसमापन के कारण या किसी अन्य कारण से) कम से कम तीन मास की अवधि से बन्द है और इस प्रकार का बन्द किया जाना सम्बद्ध अनुसूचित उद्योग पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है तथा उस औद्योगिक उपक्रम का स्वामित्व रखने वाली कम्पनी की वित्तीय स्थिति और उस उपक्रम के संयंत्र और मशीनरी की दशा ऐसी है कि उस उपक्रम को पुनः चालू किया जाना सम्भव है और इस प्रकार उसका पुनः चालू किया जाना जनसाधारण के हितों के लिए आवश्यक है,  

तो केन्द्रीय सरकार अधिसूचित आदेश द्वारा किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय को (जिसे इसके पश्चात् प्राधिकृत व्यक्ति" कहा गया है) उस सम्पूर्ण औद्योगिक उपक्रम या उसके किसी भाग का प्रबन्ध ग्रहण करने के लिए या उस सम्पूर्ण उपक्रम या उसके किसी भाग के संबंध में नियंत्रण के ऐसे कृत्यों का जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं प्रयोग करने के लिए, प्राधिकृत कर सकेगी

                (2) धारा 18 की उपधारा (2) के उपबंध उपधारा (1) के अधीन किए गए किसी अधिसूचित अदेश को जहां तक हो सके वैसे ही लागू होंगे जैसे वे धारा 18 की उपधारा (1) के अधीन किए गए किसी अधिसूचित आदेश को लागू होते हैं

(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) की कोई बात किसी ऐसी कम्पनी के स्वामित्वाधीन औद्योगिक उपक्रम को लागू नहीं होगी जिसका परिसमापन न्यायालय द्वारा या उसके पर्यवेक्षणाधीन किया जा रहा है

(4) जहां उपधारा (1) के अधीन कोई अधिसूचित आदेश किया गया है, वहां चाहे किसी न्यायालय के आदेश द्वारा या उसके अधीन या किसी संविदा या लिखत के द्वारा या उसके अधीन या अन्यथा उस औद्योगिक उपक्रम के प्रबन्ध या नियंत्रण का तत्समय भारसाधन रखने वाला व्यक्ति या व्यक्तियों का निकाय, ऐसे आदेश, संविदा, लिखत या अन्य ठहराव में किसी बात के होते हुए भी उस औद्योगिक उपक्रम का, यथास्थिति, प्रबन्ध या नियंत्रण उस प्राधिकृत व्यक्ति को तुरन्त सौंप देगा

(5) धारा 18 से धारा 18 के (जिनमें ये दोनों धाराएं सम्मिलित हैं) उपबन्ध, उस औद्योगिक उपक्रम को या उसके संबंध में जिसकी बाबत उपधारा (1) के अधीन कोई अधिसूचित आदेश किया गया है जहां तक हो सके वैसे ही लागू होंगे जैसे वे किसी ऐसे औद्योगिक उपक्रम को लागू होते हैं जिसकी बाबत धारा 18 के अधीन कोई अधिसूचित आदेश जारी किया गया है ]

18. धारा 18 के अधीन अधिसूचित आदेश का प्रभाव-(1) धारा 18 के अधीन किसी औद्योगिक उपक्रम का प्रबंध-ग्रहण करने के लिए प्राधिकृत करने वाले अधिसूचित आदेश के निकाले जाने पर-

() प्रबंध के भारसाधक सभी व्यक्तियों के बारे में, जिनके अन्तर्गत अधिसूचित आदेश के निकाले जाने के ठीक पहले उस औद्योगिक उपक्रम के प्रबन्धकों और निदेशकों के रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति हैं यह समझा जाएगा कि उन्होंने उस हैसियत से अपने पद रिक्त कर दिए हैं: -

() उस औद्योगिक उपक्रम और उसके किसी प्रबंध अभिकर्ता या किसी निदेशक के बीच, जो अधिसूचित आदेश के निकाले जाने से ठीक पहले उस हैसियत में पद धारण कर रहा था, कोई प्रबन्ध संविदा समाप्त हुई समझी जाएगी;

() धारा 18 के अधीन नियुक्त प्रबन्ध अभिकर्ता, यदि कोई हो, इण्डियन कम्पनीज ऐक्ट, 1913 (1913 का 7) के और उस औद्योगिक उपक्रम के ज्ञापन और संगम अनुच्छेदों के अनुसरण में सम्यक् रूप से नियुक्त प्रबंध अभिकर्ता समझा जाएगा और उक्त ऐक्ट के तथा ज्ञापन और संगम अनुच्छेदों के उपबन्ध, इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए तदनुसार लागू होंगे, किन्तु कोई भी ऐसा प्रबंध अभिकर्ता केन्द्रीय सरकार की पूर्व सहमति के बिना पद से नहीं हटाया जाएगा

() धारा 18 के अधीन प्रबंध-ग्रहण करने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति या व्यक्तियों का निकाय ऐसी सभी कार्रवाइयां करेगा जो उस सभी सम्पत्ति, चीज-बस्त और अनुयोज्य दावों को जिनका कि वह औद्योगिक उपक्रम हकदार है या हकदार प्रतीत होता है अपनी अभिरक्षा या अपने नियंत्रण में लेने के लिए आवश्यक हों, और उस औद्योगिक उपक्रम की सभी सम्पत्ति और चीज-बस्त अधिसूचित आदेश की तारीख से, यथास्थिति, उस व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय की अभिरक्षा में समझी जाएगी; और

() किसी औद्योगिक उपक्रम का, जो कम्पनी है, धारा 18 के अधीन प्रबंध ग्रहण करने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति, यदि कोई हो, सभी प्रयोजनों के लिए इण्डियन कम्पनीज ऐक्ट, 19131 (1913 का 7) के अधीन सम्यक् रूप से गठित उस औद्योगिक उपक्रम के निदेशक होंगे और उस औद्योगिक उपक्रम के निदेशकों की सभी शक्तियों का, चाहे ऐसी शक्तियां उक्त ऐक्ट से या उस औद्योगिक उपक्रम के ज्ञापन या संगम अनुच्छेदों से अथवा किसी भी अन्य स्रोत से व्युत्पन्न हों, प्रयोग करने के हकदार केवल वे ही होंगे

                (2) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों और केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण के अधीन रहते हुए, किसी औद्योगिक उपक्रम या प्रबंध ग्रहण करने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति या व्यक्तियों का निकाय ऐसी कार्रवाई करेगा जो उस औद्योगिक उपक्रम के कारबार का प्रबंध दक्षतापूर्ण करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक हो और ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करेगा तथा उसके ऐसे अन्य कर्तव्य होंगे जो विहित किए जाएं

(3) जहां कोई व्यक्ति या व्यक्तियों का निकाय किसी औद्योगिक उपक्रम के संबंध में नियंत्रण के किन्हीं कृत्यों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत किया गया है वहां वह उपक्रम अधिसूचित आदेश के उपबंधों के अनुसार प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा दिए गए किन्हीं निदेशों के अनुसार चलाया जाएगा तथा उस उपक्रम या उसके भाग के संबंध में प्रबंध के किन्हीं कृत्यों को करने वाला कोई व्यक्ति ऐसे सभी निदेशों का अनुपालन करेगा

(4) धारा  [18] के अधीन प्राधिकृत व्यक्ति या व्यक्तियों का निकाय, औद्योगिक उपक्रम के ज्ञापन या संगम अनुच्छेदों में किसी बात के होते हुए भी, अपने कृत्यों का प्रयोग किन्हीं ऐसे निदेशों के अनुसार करेगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा दिए जाएं किन्तु इस प्रकार कि उसे या उन्हें किसी अन्य व्यक्ति को इस धारा के अधीन ऐसे कोई निदेश देने की शक्ति, जो किसी अधिनियम या उस उपक्रम को चलाने वाले प्राधिकारी के कृत्यों को अवधारित करने वाली लिखत के उपबंधों से असंगत हो, वहां तक होगी जहां तक कि अधिसूचित आदेश द्वारा विनिर्दिष्टतया उपबंधित हो अन्यथा नहीं

18. असद्भावपूर्वक की गई संविदाएं आदि रद्द की जा सकेंगी या उनमें परिवर्तन किया जा सकेगा-धारा 18 के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना धारा 18 के अधीन किसी औद्योगिक उपक्रम का प्रबंध ग्रहण करने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति या व्यक्तियों का निकाय किसी भी ऐसी संविदा या करार को जो उस औद्योगिक उपक्रम और किसी अन्य व्यक्ति के बीच धारा 18 के अधीन अधिसूचित आदेश जारी किए जाने के पूर्व किसी भी समय किया गया है, रद्द करने या उसमें परिवर्तन करने के प्रयोजन के लिए आवेदन इस निमित्त अधिकारिता रखने वाले किसी भी न्यायालय में केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से कर सकेगा और यदि सम्यक् जांच के पश्चात् न्यायालय का समाधान हो जाता है कि ऐसी संविदा या ऐसा करार असद्भावपूर्वक किया गया था और वह औद्योगिक उपक्रम के हित के लिए हानिकर है तो वह उस संविदा या करार को (चाहे अशर्त या ऐसी शर्तों के अधीन जो वह अधिरोपित करना ठीक समझे) रद्द या उसमें परिवर्तन करने वाला आदेश दे सकेगा और वह संविदा या करार तदनुसार प्रभावी होगा

18. पद या संविदा की समाप्ति के लिए प्रतिकर का अधिकार होना-तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी कोई व्यक्ति जो धारा 18 के खंड () के उपबंधों के कारण किसी पद पर नहीं रह जाता है या जिसकी प्रबंधक संविदा उस धारा के खंड () के उपबंधों के कारण समाप्त हो जाती है, उस पद हानि के लिए या अपनी प्रबंध संविदा की समय पूर्व समाप्ति के लिए किसी प्रतिकर का हकदार नहीं होगा:

परन्तु इस धारा की कोई बात ऐसे किसी व्यक्ति के उस औद्योगिक उपक्रम से ऐसे धन वसूल करने के अधिकार पर प्रभाव नहीं डालेगी जो ऐसे प्रतिकर के तौर पर वसूली योग्य होने से अन्यथा वसूली योग्य है

18. 1913 के अधिनियम 7 का लागू होना-(1) जहां किसी औद्योगिक उपक्रम का प्रबंध, जो इण्डियन कम्पनीज ऐक्ट, 1913 में यथापरिभाषित कम्पनी है, केन्द्रीय सरकार द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है वहां उक्त अधिनियम में या ऐसे उपक्रम में ज्ञापन या संगम अनुच्छेदों में किसी बात के होते हुए भी-

() ऐसे उपक्रम के शेयरधारकों या किसी अन्य व्यक्ति के लिए यह विधिपूर्ण नहीं होगा कि वे उस उपक्रम का निदेशक होने के लिए किसी व्यक्ति को नामनिर्देशित या नियुक्त करें;

() ऐसे उपक्रम के शेयरधारकों के किसी अधिवेशन में पारित किसी संकल्प को तब तक प्रभावशील नहीं किया जाएगा जब तक वह केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित नहीं कर दिया गया है;

() ऐसे उपक्रम के परिसमापन के लिए या उसके सम्बन्ध में रिसीवर की नियुक्ति के लिए कोई भी कार्यवाही किसी न्यायालय में केन्द्रीय सरकार की सहमति से ही हो सकेगी अन्यथा नहीं

(2) उपधारा (1) के उपबन्धों के और इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के तथा ऐसे अन्य अपवादों, निर्बन्धनों और परिसीमाओं के, यदि कोई हों, जिन्हें केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, अधीन रहते हुए इण्डियन कम्पनीज ऐक्ट, 19131 (1913 का 17) ऐसे उपक्रम को उसी रीति से लागू रहेगा जैसे वह धारा 18 के अधीन अधिसूचित आदेश के जारी किए जाने से पूर्व उसे लागू था

18. धारा 18 के अधीन अधिसूचित आदेश को रद्द करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-यदि औद्योगिक उपक्रम के स्वामी के आवेदन पर या अन्यथा केन्द्रीय सरकार को किसी समय यह प्रतीत होता है कि धारा 18 के अधीन किए गए आदेश का प्रयोजन पूरा हो गया है या किसी अन्य कारण से यह आवश्यक नहीं है कि वह आदेश प्रवृत्त रहे, तो केन्द्रीय सरकार अधिसूचित आदेश द्वारा ऐसे आदेश को रद्द कर सकेगी और ऐसे किसी आदेश के रद्द किए जाने पर उस औद्योगिक उपक्रम का, यथास्थिति, प्रबंध या नियंत्रण उस उपक्रम के स्वामी में निहित हो जाएगा ]

[अध्याय 3कक

समापनाधीन कम्पनियों के स्वामित्व में औद्योगिक उपक्रमों का प्रबन्ध या नियंत्रण

                18चक. उच्च न्यायालय की अनुज्ञा से औद्योगिक उपक्रमों का प्रबंध या नियंत्रण ग्रहण करने के लिए व्यक्तियों को प्राधिकृत करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि ऐसे किसी उपक्रम को, जिसकी बाबत धारा 15 के अधीन अन्वेषण किया जा चुका है, चलाने या पुनः चालू करने की संभावनाएं हैं तथा अनुसूचित उद्योग से संबंधित उन वस्तुओं या उस वर्ग की वस्तुओं के जिनकी जनसाधारण को आवश्यकता है, उत्पादन, पूर्ति या वितरण को बनाए रखने या बढ़ाने के लिए, यथास्थिति, चलाया या पुनः चालू किया जाना चाहिए तो वह सरकार उस औद्योगिक उपक्रम का प्रबंध ग्रहण करने या उस संपूर्ण औद्योगिक उपक्रम या उसके किसी भाग के संबंध में नियंत्रण के ऐसे कृत्यों का, जो उस आवेदन में विनिर्दिष्ट किए जाएं, प्रयोग करने के लिए किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय को नियुक्त करने की अनुज्ञा के लिए उच्च न्यायालय से आवेदन कर सकेगी

                (2) जहां उपधारा (1) के अधीन आवेदन किया जाता है वहां उच्च न्यायालय ऐसा आदेश करेगा जो केन्द्रीय सरकार को, इस बात के लिए सशक्त करे कि केन्द्रीय सरकार किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय को (जिसे इसमें इसके पश्चात् प्राधिकृत व्यक्ति" कहा गया है) उस औद्योगिक उपक्रम का प्रबंध ग्रहण करने या उस संपूर्ण औद्योगिक उपक्रम के या उसके किसी भाग के (जिसे इसमें इसके पश्चात् सम्बद्ध भाग" कहा गया है) सम्बन्ध में नियंत्रण के कृत्यों का पांच वर्ष से अनधिक की अवधि के लिए प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगी :

                परन्तु यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि जनसाधरण के हित में समीचीन है कि पूर्वोक्त पांच वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् भी वह प्राधिकृत व्यक्ति, यथास्थिति, उस औद्योगिक उपक्रम का प्रबंध करने या उस सम्बद्ध भाग की बाबत नियंत्रण के कृत्यों का प्रयोग करने के लिए बना रहना चाहिए तो वह एक बार में दो वर्ष से अनधिक की किसी ऐसी अवधि के लिए जो आवेदन में विनिर्दिष्ट की जाएं, ऐसे प्रबंध को या नियंत्रण के कृत्यों को चालू रखने के लिए उच्च न्यायालय से आवेदन कर सकेगी और तब उच्च न्यायालय उस प्राधिकृत व्यक्ति को औद्योगिक उपक्रम का प्रबंध या उस सम्बद्ध भाग की बाबत नियंत्रण के कृत्यों का प्रयोग करते रहने की अनुज्ञा प्रदान करने वाला आदेश कर सकेगा :

                परन्तु यह और भी कि (पांच वर्ष की प्रारम्भिक अवधि के पश्चात्) इस प्रकार चालू रखने की कुल अवधि किसी भी दशा में  [बारह वर्ष] से अधिक होने दी जाएगी

(3) जहां उपधारा (2) के अधीन उच्च न्यायालय द्वारा कोई आदेश किया गया है वहां उच्च न्यायालय शासकीय समापक को या किसी ऐसे अन्य व्यक्ति को जो चाहे किसी न्यायालय के आदेश द्वारा या उसके अधीन या किसी संविदा या लिखत द्वारा या उसके अधीन या अन्यथा उस औद्योगिक उपक्रम के प्रबन्ध या नियन्त्रण का तत्समय भारसाधन रखता है, यथास्थिति, ऐसे उपक्रम या सम्बद्ध भाग का प्रबन्ध प्राधिकृत व्यक्ति को सौंप देने का निदेश देगा और तब वह प्राधिकृत व्यक्ति, यथास्थिति, उस उपक्रम या सम्बद्ध भाग की बाबत, शासकीय समापन समझा जाएगा

(4) प्राधिकृत व्यक्ति को औद्योगिक उपक्रम या सम्बद्ध भाग का कब्जा सौंपने से पूर्व शासकीय समापक, यथास्थिति, उस औद्योगिक उपक्रम या सम्बद्ध भाग की सभी आस्तियों और दायित्वों की एक पूर्ण तालिका धारा 18चछ में विनिर्दिष्ट रीति से बनाएगा और उस तालिका की एक प्रति प्राधिकृत व्यक्ति को परिदत्त करेगा जो उसकी शुद्धता को सत्यापित करने के पश्चात् उसकी दूसरी प्रति पर अपने द्वारा तालिका प्राप्त किए जाने के साक्ष्य के रूप में, हस्ताक्षर करेगा

(5) औद्योगिक उपक्रम का प्रबंध ग्रहण करने के पश्चात् या सम्बद्ध भाग की बाबत नियन्त्रण के कृत्यों का प्रयोग करना प्रारम्भ करने के पश्चात् प्राधिकृत व्यक्ति उस औद्योगिक उपक्रम या सम्बद्ध भाग को इस प्रकार चलाने की तुरन्त कार्रवाई करेगा जिससे कि उसके उत्पादन को बनाए रखा जाना सुनिश्चित हो जाए

(6) औद्योगिक उपक्रम या सम्बद्ध भाग को चलाने के प्रयोजनार्थ प्राधिकृत व्यक्ति ऐसे निबन्धनों और शर्तों तथा ऐसी परिसीमाओं और निर्बन्धनों के अधीन रहते हुए, जो विहित की जाएं कोई धन उधार ले सकेगा और उस प्रयोजन के लिए, यथास्थिति, उस औद्योगिक उपक्रम या उस सम्बद्ध भाग की चालू आस्तियों पर प्लवमान भार का सृजन कर सकेगा

(7) जहां प्राधिकृत व्यक्ति की राय यह है कि औद्योगिक उपक्रम या सम्बद्ध भाग की किसी भी मशीनरी का प्रतिस्थापन या उसकी मरम्मत कराना उस औद्योगिक उपक्रम या उस समबद्ध भाग को दक्षतापूर्ण चलाने के प्रयोजनार्थ आवश्यक है तो वह ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर तथा ऐसी परिसीमाओं और निर्बन्धनों के अधीन रहते हुए जो विहित किए जाएं, यथास्थिति, ऐसा प्रतिस्थापन या ऐसी मरम्मत कराएगा

(8) प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा अभिप्राप्त किया गया उधार, उस औद्योगिक उपक्रम या सम्बद्ध भाग की आस्तियों में से, ऐसी रीति से और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विहित की जाएं, वसूल किया जाएगा

(9) औद्योगिक उपक्रम को चलाने या सम्बद्ध भाग की बाबत नियंत्रण के कृत्यों का प्रयोग करने के प्रयोजनार्थ प्राधिकृत व्यक्ति उस औद्योगिक उपक्रम के उन भूतपूर्व कर्मचारियों को नियोजित कर सकेगा जो ऐसे उपक्रम का स्वामित्व रखने वाली कम्पनी के परिसमापन के कारण सेवोन्मुक्त हो गए थे तथा प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा नियोजित किए गए ऐसे हर एक व्यक्ति के बारे में यह समझा जाएगा कि उसने कम्पनी के साथ सेवा की नई संविदा की है

(10) कम्पनी के परिसमापन की कार्यवाहियां, वहां तक जहां तक कि उनका संबंध-

() किसी ऐसे औद्योगिक उपक्रम में है जिसका प्रबन्ध इस धारा के अधीन प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा ग्रहण कर लिया गया है, या

() किसी ऐसे संबद्ध भाग से है जिसकी बाबत इस धारा के अधीन प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा नियंत्रण के किसी कृत्य का प्रयोग किया जा रहा है,

ऐसे प्रबन्ध या नियंत्रण की अवधि के दौरान रुकी रहेंगी और ऐसे उपक्रम या सम्बद्ध भाग के संबंध में किसी अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता या दायित्व के प्रवर्तन के लिए परिसीमाकाल की संगणना करने में वह अवधि जिसके दौरान ऐसी कार्यवाहियां रुकी रही हों अपवर्जित कर दी जाएगी

अध्याय 3कख

कुछ औद्योगिक उपक्रमों को राहत देने की शक्ति

18चख. ऐसे औद्योगिक उपक्रमों के संबंध में जिनका प्रबन्ध या नियंत्रण धारा 18, धारा 18कक या धारा 18चक के अधीन ग्रहण किया जा चुका है कुछ घोषणाएं करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) ऐसे औद्योगिक उपक्रम या उसके किसी भाग के संबंध में जिसका प्रबंध या नियंत्रण धारा 18 के अधीन चाहे उद्योग (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 1971 (1971 का 72) के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात् या धारा 18कक या धारा 18चक के अधीन ग्रहण कर लिया गया है, यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि किसी अनुसूचित उद्योग के उत्पादन में गिरावट को रोकने की दृष्टि से जनसाधारण के हित में, ऐसा करना आवश्यक है तो केन्द्रीय सरकार अधिसूचित आदेश द्वारा, यह घोषणा कर सकेगी कि-

() ऐसे औद्योगिक उपक्रम को तीसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट सभी अधिनियमितियां या उनमें से कोई लागू नहीं होगी या ऐसे अनुकूलनों सहित, चाहे वे अनुकूलन, उपान्तरण, परिवर्धन या लोप के तौर पर हों (किन्तु जो उक्त अधिनियमितियों की नीति पर प्रभाव डालते हों) जो उस अधिसूचित आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, लागू होगी; या

() ऐसे अधिसूचित आदेश के जारी किए जाने की तारीख से ठीक पूर्व प्रवृत्त संविदाओं, सम्पत्ति के हस्तांतरण पत्रों, करारों, परिनिर्धारणों, पंचाटों, स्थायी आदेशों या अन्य लिखतों का या उनमें से किसी का (जिसका ऐसा औद्योगिक उपक्रम या ऐसे उपक्रम का स्वामित्व रखने वाली कम्पनी पक्षकार है या जो ऐसे औद्योगिक उपक्रम या कम्पनी को लागू है) प्रवर्तन निलंबित रहेगा या उक्त तारीख से पूर्व उसके अधीन प्रोद्भूत या उद्भूत सभी अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यताएं और दायित्व या उनमें से कोई निलंबित रहेंगे या ऐसे अनुकूलनों सहित तथा ऐसी रीति से, जो अधिसूचित आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, प्रवर्तनीय होंगे

                (2) उपधारा (1) के अधीन किया गया अधिसूचित आदेश प्रथमतः एक वर्ष की अवधि के लिए प्रवृत्त रहेगा, किन्तु उस अधिसूचित आदेश की अस्तित्वावधि अतिरिक्त अधिसूचित आदेश द्वारा एक समय में एक वर्ष से अनधिक की अवधि के लिए बढ़ाई जा सकेगी:

                परन्तु ऐसा कोई भी अधिसूचित आदेश किसी भी दशा में-

() ऐसी अवधि की जिसके लिए धारा 18, धारा 18कक या धारा 18चक के अधीन औद्योगिक उपक्रम का प्रबन्ध ग्रहण किया गया था, समाप्ति के पश्चात्; या

() प्रथम अधिसूचित आदेश के जारी किए जाने की तारीख से कुल मिलाकर [आठ वर्ष] से अधिक की अवधि के लिए,

इनमें से जो भी पूर्वतर हो, प्रवर्तन में नहीं रहेगा

(3) उपधारा (1) के अधीन किया गया कोई भी अधिसूचित आदेश, किसी अन्य विधि, करार या लिखत अथवा किसी न्यायालय, अधिकरण, अधिकारी या अन्य प्राधिकारी की किसी डिक्री या आदेश या किसी निवेदन, परिनिर्धारण या स्थायी आदेश में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, प्रभावी होगा

(4) उपधारा (1) के खण्ड () में निर्दिष्ट और उस उपधारा के अधीन किए गए किसी अधिसूचित आदेश द्वारा निलंबित या उपान्तरित किसी अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता या दायित्व के प्रवर्तन के लिए कोई उपचार उस अधिसूचित आदेश के निबंधनों के अनुसार निलंबित या उपान्तरित रहेगा, और किसी न्यायालय, अधिकरण, अधिकारी या अन्य प्राधिकारी के समक्ष इससे संबंधित सभी लम्बित कार्यवाहियां तदनुसार रुकी रहेंगी या ऐसे अनुकूलनों के अधीन रहते हुए चालू रहेंगी, किन्तु इस प्रकार कि अधिसूचित आदेश के प्रभावी रहने की दशा में-

() इस प्रकार निलम्बित या उपान्तरित कोई भी अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता या दायित्व पुनःप्रवर्तित हो जाएगा और ऐसे प्रवर्तनीय होगा मानो वह अधिसूचित आदेश कभी किया ही नहीं गया था;

() इस प्रकार रुकी हुई कोई भी कार्यवाही उसी प्रक्रम से जिस पर वह उस समय पहुंच चुकी थी जब वह रुक गई थी किसी ऐसी विधि के, जो उस समय प्रवृत्त हो, उपबंधों के अधीन रहते हुए की जाएगी

                (5) उपधारा (1) के खण्ड () में निर्दिष्ट किसी अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता या दायित्व के प्रवर्तन के परिसीमाकाल की संगणना करने में वह अवधि जिसके दौरान वह या उसके प्रवर्तन का उपचार निलंबित रहा है, अपवर्जित कर दी जाएगी

अध्याय 3कग

कम्पनियों का समापन या पुनर्गठन

18चग. प्रबंधित कम्पनी के कार्यकलापों और कार्यकरण की रिपोर्ट मांगने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-जहां धारा 18 के अधीन किसी औद्योगिक उपक्रम का प्रबन्ध या नियंत्रण चाहे उद्योग (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 1971 (1971 का 72), के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात् या धारा 18कक या धारा 18चक के अधीन ग्रहण किया गया है, वहां केन्द्रीय सरकार प्राधिकृत व्यक्ति से, ऐसे प्रबन्ध या नियंत्रण के चालू रहने के दौरान किसी भी समय उस औद्योगिक उपक्रम के कार्यकलापों और कार्यकरण की रिपोर्ट मांग सकेगी और रिपोर्ट भेजते समय प्राधिकृत व्यक्ति धारा 18चछ के अधीन तैयार की गई तालिका और सदस्यों और लेनदारों की सूचियों का ध्यान रखेगा

18चघ. प्रबंधित कम्पनी के संबंध में केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय-(1) यदि प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा भेजी गई रिपोर्ट के प्राप्त होने पर, -

() औद्योगिक उपक्रम का स्वामित्व रखने वाली किसी ऐसी कम्पनी के संबंध में, जिसका परिसमापन उच्च न्यायालय द्वारा नहीं किया जा रहा है, केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि उस कम्पनी की वित्तीय दशा और अन्य परिस्थितियां ऐसी हैं कि वह अपनी चालू आस्तियों में से अपने चालू दायित्वों की पूर्ति करने की स्थिति में नहीं है तो वह सरकार, यदि वह जनसाधारण के हित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन समझती है तो, आदेश द्वारा, यह विनिश्चित कर सकेगी, कि उस औद्योगिक उपक्रम का धारा 18चङ में उपबन्धित रीति से चालू समुत्थान के रूप में विक्रय किया जाए और साथ ही साथ उच्च न्यायालय द्वारा उस कम्पनी के परिसमापन के लिए कार्यवाहियां प्रारम्भ की जाएं;

() औद्योगिक उपक्रम का स्वामित्व रखने वाली किसी ऐसी कम्पनी के संबंध में जिसका परिसमापन उच्च न्यायालय द्वारा किया जा रहा है केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि उसकी आस्तियां और दायित्व ऐसे हैं कि उसके लेनदारों और अभिदायों के हित में उस औद्योगिक उपक्रम का धारा 18चङ में उपबन्धित रीति से, चालू समुत्थान के रूप में, विक्रय किया जाना चाहिए तो वह आदेश द्वारा, तदनुसार विनिश्चय कर सकेगी

                (2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी यदि प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत की गई रिपोर्ट के प्राप्त होने पर केन्द्रीय सरकार का समाधान हो जाता है कि-

                                () जनसाधारण के हित में; या

                                () शेयरधारकों के हित में; या

                                () औद्योगिक उपक्रम का स्वामित्व रखने वाली कम्पनी का उचित प्रबन्ध सुनिश्चित करने के लिए,

ऐसा करना आवश्यक है तो वह सरकार, आदेश द्वारा, उस औद्योगिक उपक्रम का स्वामित्व रखने वाली कम्पनी के पुनर्गठन की कोई स्कीम तैयार करने का विनिश्चय कर सकेगी:

                परन्तु किसी ऐसी कम्पनी के संबंध में जिसका परिसमापन उच्च न्यायालय द्वारा या उसके पर्यवेक्षणाधीन किया जा रहा है, उस न्यायालय की पूर्व अनुज्ञा के बिना ऐसी कोई स्कीम तैयार नहीं की जएगी

(3) धारा 18 के अधीन ग्रहण किए गए किसी उपक्रम के संबंध में धारा 18 के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रयोक्तव्य शक्तियां धारा 18कक या धारा 18चक के अधीन ग्रहण किए गए उपक्रम के संबंध में भी प्रयोक्तव्य होंगी किन्तु ऐसी शक्तियों का प्रयोग इस धारा की, यथास्थिति, उपधारा (1) के अधीन या उपधारा (2) के अधीन कोई आदेश किए जाने के पश्चात् नहीं किया जाएगा

18चङ. उपबन्ध, जब सरकार धारा 18चघ (1) में विनिर्दिष्ट कार्रवाई का अनुसरण करने का विनिश्चय करती है-(1) इसमें इसके पश्चात् अधिकथित उपबंध तब लागू होंगे जब केन्द्रीय सरकार यह विनिश्चित करती है कि धारा 18चघ की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट कार्रवाई का अनुसरण किया जाना चाहिए, अर्थात्: -

() किसी औद्योगिक उपक्रम का स्वामित्व रखने वाली किसी कम्पनी के संबंध में धारा 18चघ की उपधारा (1) के खण्ड () में विनिर्दिष्ट कार्रवाई का अनुसरण किए जाने के केन्द्रीय सरकार के विनिश्चय को कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 433 में विनिर्दिष्ट वह आधार समझा जाएगा जिसके अनुसार किसी कम्पनी का परिसमापन उच्च न्यायालय द्वारा किया जा सकता है

() केन्द्रीय सरकार के, धारा 18चघ की उपधारा (1) के खण्ड () में विनिर्दिष्ट विनिश्चय किए जाने के पश्चात् प्राधिकृत व्यक्ति यथाशीघ्र, उच्च न्यायालय को उस औद्योगिक उपक्रम का स्वामित्व रखने वाली कम्पनी के परिसमापन के लिए आवेदन करेगा;

() जब प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा औद्योगिक उपक्रम का स्वामित्व रखने वाली कम्पनी का परिसमापन उच्च न्यायालय द्वारा किए जाने के लिए खण्ड () के अधीन आवेदन किया जाता है तब उच्च न्यायालय उस कम्पनी के परिसमापन का आदेश करेगा, और कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में किसी बात के होते हुए भी उस उपक्रम के संबंध में प्राधिकृत व्यक्ति शासकीय समापक नियुक्त करेगा;

() जब कभी केन्द्रीय सरकार धारा 18चघ की उपधारा (1) के खण्ड () के अधीन यह विनिश्चय करती है कि औद्योगिक उपक्रम चालू समुत्थान के रूप में विक्रय किया जाना चाहिए तो वह अपने विनिश्चय की एक प्रति उच्च न्यायालय के समक्ष रखवाएगी;

() जब तक कि इस धारा के अनुसरण में, धारा 18चघ की उपधारा (1) के खण्ड () या खण्ड () में निर्दिष्ट औद्योगिक उपक्रम का क्रय या विक्रय नहीं हो जाता है तब तक प्राधिकृत व्यक्ति उस कम्पनी की परिसमापन कार्यवाहियों में, उक्त उपक्रम के संबंध में, शासकीय समापक के कृत्य करता रहेगा तथा इसके पश्चात् कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 448 के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त शासकीय समापक कार्यभार संभाल लेगा और उक्त कार्यवाहियों में शासकीय समापक के रूप में कृत्य करेगा

(2) प्राधिकृत व्यक्ति केन्द्रीय सरकार को यह रिपोर्ट करेगा कि उस औद्योगिक उपक्रम की चालू समुत्थान के रूप में विक्रय के लिए आरक्षित कीमत क्या होनी चाहिए

(3) उपधारा (2) के अधीन रिपोर्ट करते समय प्राधिकृत व्यक्ति निम्नलिखित बातों का ध्यान रखेगा: -

() उस तारीख को जिसको कि धारा 18चघ के अधीन आदेश किया जाता है औद्योगिक उपक्रम का स्वामित्व रखने वाली कम्पनी की वित्तीय दशा-

(i) जैसी कि वह उसकी लेखा बहियों में दी गई है;

(ii) जैसी कि वह उक्त तारीख के ठीक पूर्ववर्ती पांच वर्ष की अवधि के दौरान उसके तुलन-पत्र और लाभ-हानि लेखे में दी गई है;

() औद्योगिक उपक्रम को चलाने में लाभदायी उपयोग के लिए उनकी उपयुक्तता की दृष्टि से संयंत्र, मशीनरी, उपकरणों और अन्य उपस्करों की दशा और प्रकृति;

() प्रतिभूत और अप्रतिभूत ऋणों के मद्धे दायित्व की कुल रकम जिसके अन्तर्गत बैंकों पर ओवरड्राफ्ट, यदि कोई हो, तथा कर्मचारियों के सेवान्त प्रसुविधाओं और अन्य उधारों के मद्धे दायित्व तथा कम्पनी के अन्य दायित्व भी हैं; तथा

() अन्य सुसंगत बातें जिनके अन्तर्गत यह बात भी है कि औद्योगिक उपक्रम का सभी विल्लंगमों से रहित विक्रय किया जाएगा

                (4) प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा अवधारित आरक्षित कीमत की सूचना ऐसे औद्योगिक उपक्रम का स्वामित्व रखने वाली कम्पनी के सदस्यों और लेनदारों को, प्राधिकृत व्यक्ति के माध्यम से, केन्द्रीय सरकार को विनिर्दिष्ट समय के भीतर अभ्यावेदन करने के लिए, ऐसी रीति से दी जाएगी जो विहित की जाए और केन्द्रीय सरकार प्राप्त अभ्यावेदनों और प्राधिकृत व्यक्ति की रिपोर्ट पर विचार करने के पश्चात् आरक्षित कीमत का अवधारण करेगी

(5) प्राधिकृत व्यक्ति इसके पश्चात्, उच्च न्यायालय की अनुज्ञा से, जनसाधारण से ऐसी रीति से निविदाएं आमंत्रित करेगा जो उच्च न्यायालय उस औद्योगिक उपक्रम के एक चालू समुत्थान के रूप में विक्रय के लिए अवधारित करे किन्तु यह इस शर्त के अधीन रहते हुए होगा कि उसका विक्रय सबसे ऊंची कीमत की, जो उपधारा (4) के अधीन अवधारित आरक्षित कीमत से कम नहीं होगी, स्थापना करने वाले व्यक्ति को किया जाएगा:

परन्तु उच्च न्यायालय ऐसी अनुज्ञा देने से इन्कार नहीं करेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि कम्पनी अपनी चालू आस्तियों से अपने चालू दायित्वों की पूर्ति करने की स्थिति में नहीं है

(6) औद्योगिक उपक्रम का चालू समुत्थान के रूप से विक्रय सबसे ऊंची बोली लगाने वाले व्यक्ति को तब ही किया जाएगा जबकि उसके लिए उसके द्वारा प्रस्थापित कीमत आरक्षित कीमत से कम नहीं है

(7) जहां कीमत की कोई प्रस्थापना आरक्षित कीमत के बराबर या उससे अधिक नहीं है वहां केन्द्रीय सरकार औद्योगिक उपक्रम को आरक्षित कीमत पर क्रय कर लेगी

(8) () किसी अन्य ऐसी राशि सहित जो किसी अभिदायी क्रेता या किसी अन्य व्यक्ति से जिससे कम्पनी को कोई धन शोध्य है, चालू समुत्थान के रूप में औद्योगिक उपक्रम के विक्रय से प्राप्त हुई रकम का उपयोग, कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के उपबंधों के अनुसार कम्पनी के दायित्वों का उन्मोचन करने के लिए और अतिशेष को, यदि कोई हो, कम्पनी के सदस्यों में वितरित करने के लिए किया जाएगा

() अन्य बातों के संबंध में, कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के वे उपबंध जो उच्च न्यायालय द्वारा किसी कम्पनी के परिसमापन के संबंध में हैं, जहां तक हो सकें, लागू होंगे

(9) जब किसी औद्योगिक उपक्रम का उपधारा (6) के अधीन विक्रय किसी व्यक्ति को किया गया है या उपधारा (7) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा उसे क्रय कर लिया गया है तब उस औद्योगिक उपक्रम से संबंधित वे सभी आस्तियां जो धारा 18चछ के खण्ड () के उपखण्ड (i) में निर्दिष्ट की गई हैं और क्रय या विक्रय के समय विद्यमान हैं, क्रेता को सभी विल्लंगमों से रहित अंतरित की जाएंगी तथा उसमें निहित हो जाएंगी  

18चच. उपबन्ध, जब सरकार धारा 18चघ (2) में विनिर्दिष्ट कार्रवाई का अनुसरण करने का विनिश्चय करती है-(1) जहां किसी मामले में केन्द्रीय सरकार यह विनिश्चय करती है कि धारा 18चघ की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट कार्रवाई का अनुसरण किया जाना चाहिए वहां वह उस उपधारा के उपबंधों के अधीन रहते हुए औद्योगिक उपक्रम का स्वामित्व रखने वाली कम्पनी के पुनर्गठन के लिए प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा एक स्कीम, इसमें इसके पश्चात् उपबन्धों के अनुसार, तैयार कराएगी तथा प्राधिकृत व्यक्ति उस स्कीम को उस सरकार के अनुमोदनार्थ प्रस्तुत करेगा

(2) औद्योगिक उपक्रम का स्वामित्व रखने वाली कम्पनी के पुनर्गठन के लिए स्कीम में निम्नलिखित सभी विषयों के लिए या उनमें से किसी के लिए उपबंध हो सकेंगे, अर्थात्: -

() कम्पनी के पुनर्गठन किए जाने पर उसका गठन, नाम और रजिस्ट्रीकृत कार्यालय, पूंजी, आस्तियां, शक्तियां, अधिकार, हित, प्राधिकार और विशेषाधिकार तथा दायित्व, कर्तव्य और बाध्यताएं;

() निदेशक-बोर्ड में कोई परिवर्तन, या कम्पनी के पुनर्गठन पर उसके नए निदेशक-बोर्ड की नियुक्ति और वह प्राधिकारी जिसके द्वारा, वह रीति जिससे और वे अन्य निबंधन और शर्तें जिन पर ऐसा परिवर्तन या नियुक्ति की जाएगी तथा नए निदेशक-बोर्ड की या किसी नए निदेशक की नियुक्ति की दशा में वह अवधि जिसके लिए ऐसी नियुक्ति की जाएगी;

() पुनर्गठित कम्पनी में नियंत्रक हित का अतिरिक्त निदेशकों की नियुक्ति द्वारा या अतिरिक्त शेयरों के आबंटन द्वारा केन्द्रीय सरकार में निहित किया जाना;

() कम्पनी के पुनर्गठन पर ऐसे पुनर्गठन को प्रभावी बनाने के लिए कम्पनी के ज्ञापन और संगम अनुच्छेदों में परिवर्तन;

() स्कीम के उपबंधों के अधीन रहते हुए कम्पनी के पुनर्गठन पर किसी ऐसी कार्रवाई या कार्यवाही का, जो उसके पुनर्गठन की तारीख के ठीक पूर्व कम्पनी के विरुद्ध लम्बित है, कम्पनी द्वारा या उसके विरुद्ध चालू रखा जाना;

() सदस्यों और लेनदारों के हितों या अधिकारों में, जो कम्पनी के पुनर्गठन के पूर्व कम्पनी में या उसके विरुद्ध उनके हैं उस विस्तार तक जिस तक कि केन्द्रीय सरकार जनसाधारण के हित में या सदस्यों या लेनदारों के हित में या कम्पनी के कारबार को बनाए रखने के लिए आवश्यक समझे, कटौती करना:

परन्तु इस खण्ड की किसी बात से यह नहीं समझा जाएगा कि वह किसी लेनदार के (जिसके अन्तर्गत सरकार भी है) ऐसे किसी उधार या अधिदाय के संबंध में, जो उस लेनदार द्वारा कम्पनी को धारा 18, धारा 18कक या धारा 18चक के अधीन उस कम्पनी के औद्योगिक उपक्रम का प्रबन्ध ग्रहण किए जाने की तारीख के पश्चात् दिया गया है, हित या अधिकारों की कटौती करने के लिए प्राधिकृत करती है;

() लेनदारों को उनके उन दावों की पूर्ण तुष्टि में नकद या अन्यथा संदाय जो-

(i) कम्पनी के पुनर्गठन के पूर्व कम्पनी में या उसके विरुद्ध उनके हित और अधिकारों के संबंध में है; अथवा

(ii) जहां कम्पनी में या उसके विरुद्ध उनके हित या अधिकारों में खण्ड () के अधीन कटौती कर दी गई है वहां इस प्रकार कटौती किए गए हितों और अधिकारों के संबंध में हैं;

() कम्पनी के सदस्यों को उसके पुनर्गठन के पूर्व उसमें उनके द्वारा धारित शेयरों के लिए [चाहे उन शेयरों में उनके हित की खण्ड () के अधीन कटौती की गई हो या नहींट उसके पुनर्गठन पर कम्पनी में शेयरों का आबंटन और जहां किन्हीं सदस्यों को शेयर आबंटित करना संभव नहीं है वहां उन सदस्यों को-

(1) कम्पनी के पुनर्गठन के पूर्व उसके शेयरों में उनके हित की बाबत; अथवा

(2) जहां ऐसे हित में खण्ड () के अधीन कटौती की गई है वहां इस प्रकार कटौती किए गए शेयरों में उनके हित की बाबत,

उनके दावे की पूर्ण तुष्टि में नकद संदाय;

() केन्द्रीय सरकार द्वारा कम्पनी के सदस्यों से बात चीत करके उनके निजी शेयरों को नकद संदाय पर उन सदस्यों से अर्जित करने के लिए प्रस्थापना जो-

(1) कम्पनी के पुनर्गठन के पूर्व उसके शेयरों से उनके हित की बाबत; अथवा

(2) जहां ऐसे हित में खण्ड () के अधीन कटौती की गई है वहां इस प्रकार कटौती किए गए शेयरों में उनके हित की बाबत,

उनके दावे की पूर्ण तुष्टि में उनके शेयर केन्द्रीय सरकार को विक्रय करने के लिए तैयार हों;

() धारा 18 या धारा 18कक या धारा 18चक के अधीन कम्पनी का प्रबन्ध ग्रहण किए जाने के पश्चात् कम्पनी द्वारा पुरोधृत किए गए किन्हीं डिबेंचरों का या उस तारीख के पश्चात् कम्पनी द्वारा अभिप्राप्त किए गए किन्हीं उधारों का या ऐसे डिबेंचरों या उधारों के किसी भाग का कम्पनी के शेयरों में संपरिवर्तन और उन शेयरों का, यथास्थिति, ऐसे डिबेंचर धारकों या लेनदारों को आबंटन;

() नए शेयर पुरोधृत करके कम्पनी की पूंजी में वृद्धि और ऐसे नए शेयरों का केन्द्रीय सरकार को आबंटन;

() कम्पनी के पुनर्गठन पर कम्पनी में ही उसके ऐसे कर्मचारियों की सेवाओं को जिन्हें केन्द्रीय सरकार स्कीम में ही विनिर्दिष्ट करे, ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर जो केन्द्रीय सरकार उचित समझे, चालू रखना;

() खंड () में किसी बात के होते हुए भी, जहां कम्पनी के किन्हीं ऐसे कर्मचारियों ने जिनकी सेवाएं खंड () के अधीन चालू रखी गई हैं, उस तारीख के जिसको कि उच्च न्यायालय द्वारा स्कीम मंजूर की जाती है, ठीक पश्चात् के एक मास की समाप्ति के पूर्व किसी भी समय कम्पनी को इस आशय की लिखित सूचना दे दी है कि वे कम्पनी के पुनर्गठन पर उसके कर्मचारी नहीं रहेंगे वहां ऐसे कर्मचारियों को और उन अन्य कर्मचारियों को, जिनकी सेवाएं कम्पनी के पुनर्गठन पर चालू नहीं रखी गई हैं, उस प्रतिकर का, यदि कोई हो, जिसके वे औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) के अधीन हकदार हैं और ऐसी पेंशन, उपदान, भविष्य निधि और अन्य सेवानिवृत्ति फायदों का जो उसके पुनर्गठन की तारीख के ठीक पूर्व कम्पनी के नियमों या, प्राधिकारों के अधीन मामूली तौर से उन्हें अनुज्ञेय है, संदाय;

() कम्पनी के पुनर्गठन के लिए कोई अन्य निबन्धन और शर्तें;

() ऐसी आनुषंगिक, पारिणामिक और अनुपूरक बातें जो कम्पनी के पुनर्गठन का पूर्ण और प्रभावी रूप से कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं

                (3) () केन्द्रीय सरकार द्वारा यथा अनुमोदित स्कीम के प्ररूप की एक प्रति कम्पनी को, उन रजिस्ट्रीकृत ट्रेड-यूनियनों को, यदि कोई हों, कम्पनी के कर्मचारी जिनके सदस्य हैं, और उसके लेनदारों को ऐसी अवधि के भीतर जो केन्द्रीय सरकार इस प्रयोजन के लिए विनिर्दिष्ट करे, उनके सुझावों और आक्षेपों के लिए, यदि कोई हों, भेजी जाएगी;

                () केन्द्रीय सरकार स्कीम के प्रारूप में कम्पनी से, उन रजिस्ट्रीकृत ट्रेड-यूनियनों से, यदि कोई हों, कम्पनी के कर्मचारी जिनके सदस्य हैं, और कम्पनी के किन्हीं सदस्यों या लेनदारों से प्राप्त सुझावों और आक्षेपों को ध्यान में रखते हुए ऐसे उपान्तर, यदि कोई हों, कर सकेगी जो वह आवश्यक समझे

(4) तत्पश्चात् स्कीम उच्च न्यायालय के समक्ष उसकी मंजूरी के लिए रखी जाएगी और यदि उच्च न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि स्कीम जनसाधारण के हित में है या शेयरधारकों के हित में है या कम्पनी का उचित प्रबन्ध सुनिश्चित करने के लिए है या कम्पनी के सदस्यों और लेनदारों के लिए ऋजु और युक्तियुक्त है तो वह कम्पनी और उसके सदस्यों और लेनदारों को हेतुक दर्शित करने का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् स्कीम को ऐसे किसी उपान्तर के बिना या ऐसे उपान्तरों सहित जो वह आवश्यक समझे, मंजूर कर सकेगा  

(5) उच्च न्यायालय द्वारा इस प्रकार मंजूर की गई स्कीम उस तारीख को प्रवृत्त होगी जो वह न्यायालय इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे:

परन्तु स्कीम के विभिन्न उपबन्धों के लिए विभिन्न तारीखें विनिर्दिष्ट की जा सकेंगी

(6) उपधारा (4) के अधीन उच्च न्यायालय द्वारा दी गई मंजूरी इस बात का निश्चायक साक्ष्य होगी कि कम्पनी के पुनर्गठन से सम्बन्धित इस धारा की सभी अपेक्षाओं का अनुपालन किया गया है और मंजूर की गई स्कीम की ऐसी प्रति जिसे उच्च न्यायालय उनकी सत्य प्रति के रूप में प्रमाणित करे सभी विधिक कार्यवाहियों में (चाहे आरम्भिक कार्यवाहियों में या अपील में या अन्यथा) उसी सीमा तक साक्ष्य के रूप में ग्राह्य होगी जिस तक कि मूल स्कीम ऐसे ग्राह्य है

(7) स्कीम के या उसके किसी उपबन्ध के प्रवर्तन में आने की तारीख से ही स्कीम या ऐसा उपबन्ध कम्पनी पर तथा कम्पनी के सभी सदस्यों और अन्य लेनदारों और कर्मचारियों पर और किसी ऐसे अन्य व्यक्ति पर जो भी कम्पनी के सम्बन्ध में कोई अधिकार या दायित्व रखता हो, आबद्धकर होगा

(8) स्कीम के या उसके किसी उपबन्ध के प्रवर्तन में आने पर प्राधिकृत व्यक्ति कृत्य करना समाप्त कर देगा और पुनर्गठित कम्पनी का प्रबन्ध स्कीम में उपबन्धित रीति से निदेशक बोर्ड द्वारा ग्रहण कर लिया जाएगा

(9) स्कीम की प्रतियां, न्यायालय द्वारा स्कीम के मंजूर किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी

(10) इस धारा और इसके अधीन बनाई गई किसी स्कीम के उपबन्ध कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 391 से धारा 394 में (जिनके अन्तर्गत ये दोनों धाराएं भी सम्मिलित हैं) किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे

18चछ. प्रबन्धित कम्पनी की आस्तियों और दायित्वों की तालिका तथा उसके सदस्यों और लेनदारों की सूची की तैयारी-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, धारा 18 या धारा 18कक या धारा 18चक के अधीन किसी कम्पनी के औद्योगिक उपक्रम का प्रबन्ध ग्रहण करने के पश्चात्, यथाशीघ्र प्राधिकृत व्यक्ति, -

                () निम्नलिखित के सम्बन्ध में पूर्ण तालिका तैयार करेगा-

(i) वह सभी जंगम और स्थावर संपत्ति जो औद्योगिक उपक्रम के ग्रहण किए जाने के पूर्व कम्पनी के स्वामित्व, कब्जे, शक्ति या नियंत्रण में, चाहे भारत के भीतर या बाहर हो, जिसके अन्तर्गत भूमि, भवन, संकर्म, कर्मशालाएं, भंडारगृह, उपकरण, संयंत्र, मशीनरी, मोटर गाड़ियां तथा अन्य यान, उत्पादन, भंडारकरण या अभिवहन के अनुक्रम में सामग्री का स्टाक, कच्चा माल, रोकड़ बाकी, नकदी, बैंक में या किसी अन्य व्यक्ति या निकाय के पास किए गए निक्षेप या उधार, आरक्षित निधियां, विनिधान और बही ऋण तथा ऐसी सम्पत्ति से उत्पन्न होने वाले अन्य सभी अधिकार और हित भी हैं; तथा उससे सम्बद्ध सभी लेखा पुस्तकें, रजिस्टर, मानचित्र, रेखांक, सेक्शन, रेखाचित्र, अभिलेख, सम्पत्ति के स्वामित्व या हक की दस्तावेजें तथा किसी भी प्रकृति की सभी अन्य दस्तावेजें; और

(ii) कम्पनी के किसी भी प्रकार के सभी उधार, दायित्व और बाध्यताएं जिनके अन्तर्गत उसके कर्मचारियों के लिए सेवांत प्रसुविधाओं के मद्धे वे दायित्व भी हैं, जो नियत दिन के ठीक पूर्व अस्तित्वशील हैं;

() कम्पनी के सदस्यों की और लेनदारों की जैसे कि वे औद्योगिक उपक्रम के ग्रहण किए जाने की तारीख को हैं पृथक्-पृथक् सूचियां तैयार करेगा और लेनदारों की सूची में प्रतिभूत लेनदार तथा अप्रतिभूत लेनदार पृथक्-पृथक् दिखाए जाएंगे:

                परन्तु जहां किसी कम्पनी के औद्योगिक उपक्रम का प्रबंध उद्योग (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 1971के प्रारंभ के पूर्व उक्त धारा 18 के अधीन ग्रहण किया गया है वहां प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा उपयुक्त कृत्यों का पालन ऐसे प्रारम्भ से छह मास के भीतर किया जाएगा

18चज. वादों और कार्यवाहियों का रोका जाना-किसी ऐसी कम्पनी की दशा में जिसकी बाबत धारा 18चघ के अधीन आदेश किया गया है उस कम्पनी के विरुद्ध कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार या उस सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी या प्राधिकारी की पूर्व अनुज्ञा से ही संस्थित की जाएगी या चालू रखी जाएगी अन्यथा नहीं

अध्याय 3

कुछ वस्तुओं के प्रदाय, वितरण, कीमत आदि का नियंत्रण

18. कुछ वस्तुओं के प्रदाय, वितरण, कीमत आदि को नियंत्रित करने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, जहां तक उसे किसी अनुसूचित उद्योग से सम्बद्ध किसी वस्तु या वस्तुओं के वर्ग या साम्यापूर्ण वितरण और उचित कीमतों पर उनकी उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत होता है, इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध में किसी बात के होते हुए भी, उसके प्रदाय और वितरण तथा उसमें व्यापार और वाणिज्य के विनियमन के लिए उपबंध, अधिसूचित आदेश द्वारा कर सकेगी

(2) उपधारा (1) द्वारा प्रदत्त शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना उसके अधीन किए गए अधिसूचित आदेश में निम्नलिखित के लिए उपबंध हो सकेगा, अर्थात्: -

                () उन कीमतों का नियंत्रण, जिन पर किसी ऐसी वस्तु या उसके वर्ग का क्रय या विक्रय किया जा सकेगा;

() किसी ऐसी वस्तु या उसके वर्ग के वितरण, परिवहन, व्ययन, अर्जन, कब्जे, उपयोग या उपभोग का अनुज्ञप्तियों या अनुज्ञापत्रों द्वारा या अन्यथा विनियमन;

() मामूली तौर पर विक्रय के लिए रखी गई किसी ऐसी वस्तु या उसके वर्ग को विक्रय से रोक रखने का प्रतिषेध;

() किसी ऐसी वस्तु या उसके वर्ग को विनिर्मित, उत्पादित करने या स्टाक में रखने वाले किसी व्यक्ति से विनिर्दिष्ट अवधि के दौरान ऐसे विनिर्मित या उत्पादित उन सम्पूर्ण वस्तुओं या उनके किसी भाग का या ऐसे स्टाक में रखी गई उन सम्पूर्ण वस्तुओं या उनके किसी भाग का ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के वर्ग को और ऐसी परिस्थितियों में विक्रय करने की अपेक्षा करना, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं;

() ऐसी किसी वस्तु या उसके वर्ग से सम्बद्ध ऐसे वर्ग के किन्हीं वाणिज्यिक या वित्तीय संव्यवहारों का विनियमन या प्रतिषेध जो आदेश देने वाले प्राधिकारी की राय में लोकहित के लिए हानिकर हैं या यदि अविनियमित रहें तो हानिकर हो सकते हैं;

() किसी ऐसी वस्तु या उसके वर्ग के वितरण और उसमें व्यापार या वाणिज्य में लगे हुए व्यक्तियों से यह अपेक्षा करना कि वे विक्रय के लिए अभिदर्शित या आशयित वस्तुओं पर विक्रय कीमत अंकित करें या विक्रय के लिए रखी गई वस्तुओं की कीमतों की सूचियों को परिसर पर किसी सुगम स्थान पर प्रदर्शित करें तथा स्टाक में ऐसी किन्हीं वस्तुओं के कुल परिमाण का एक विवरण भी प्रत्येक मास के प्रथम दिन या ऐसे अन्य समय पर जो विहित किया जाए उसी प्रकार प्रदर्शित करें

() पूर्वोक्त बातों में से किसी का विनियमन या प्रतिषेध करने की दृष्टि से किसी जानकारी या आंकड़ों का संग्रहण; और

() कोई आनुषंगिक या अनुपूरक विषय जिनके अन्तर्गत विशिष्टतया अनुज्ञप्तियों, अनुज्ञापत्रों या अन्य दस्तावेजों का अनुदान और उनके लिए दी जाने वाली फीसें भी हैं

(3) जहां कोई व्यक्ति किसी वस्तु का विक्रय उपधारा (2) के खण्ड () के प्रति निर्देश से दिए गए किसी आदेश के अनुसरण में करता है वहां उसे उसके लिए निम्नलिखित कीमत दी जाएगी: -

() जहां कीमत नियंत्रित कीमत से, यदि कोई हो, संगत रहकर करार पाई जा सकती है वहां वह करार पाई गई कीमत;

() जहां ऐसा कोई करार नहीं हो सकता वहां इस धारा के अधीन नियत नियंत्रित कीमत के, यदि कोई हो, प्रति निर्देश से परिकलित कीमत;

() जहां तो खंड () और खंड () ही लागू होता है वहां उस परिक्षेत्र में विक्रय की तारीख को अभिभावी बाजार दर पर परिकलित कीमत

                (4) इस धारा द्वारा प्रदत्त किसी शक्ति के प्रयोग में कोई आदेश किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा

(5) जहां कोई आदेश इस धारा द्वारा प्रदत्त किसी शक्ति के प्रयोग में किसी प्राधिकारी द्वारा किया गया और हस्ताक्षरित तात्पर्यित है, वहां न्यायालय भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) के अर्थ में यह उपधारणा करेगा कि ऐसा आदेश उस प्राधिकारी द्वारा ऐसे किया गया था

स्पष्टीकरण-इस धारा में किसी अनुसूचित उद्योग से सम्बद्ध वस्तु या वस्तुओं का वर्ग" पद के अन्तर्गत भारत में आयात की गई कोई ऐसी वस्तु या वस्तुओं का वर्ग है जो उसी प्रकार या वर्णन का है जैसा कि अनुसूचित उद्योग में विनिर्मित या उत्पादित वस्तु या वस्तुओं का वर्ग

अध्याय 4

प्रकीर्ण

                19. निरीक्षण की शक्तियां-(1) किसी औद्योगिक उपक्रम की स्थिति या कार्यकरण अभिनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए या इस अधिनियम में अथवा इसके अधीन बनाए गए नियमों में वर्णित किसी अन्य प्रयोजन के लिए, केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति को यह अधिकार होगा कि वह-

                                () किसी परिसर में प्रवेश करे और उसका निरीक्षण करे;

() किसी औद्योगिक उपक्रम का नियंत्रण रखने वाले या उसके संबंध में नियोजित किसी व्यक्ति के कब्जे या शक्ति में किसी दस्तावेज, बही, रजिस्टर या अभिलेख के पेश किए जाने का आदेश करे; और

() किसी औद्योगिक उपक्रम पर नियंत्रण रखने वाले या उसके संबंध में नियोजित किसी व्यक्ति की परीक्षा करे

                (2) केन्द्रीय सरकार द्वारा उपधारा (1) के अधीन प्राधिकृत कोई व्यक्ति भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझा जाएगा

20. औद्योगिक उपक्रमों का प्रबंध या नियंत्रण ग्रहण करने का साधारण प्रतिषेध-इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् कोई राज्य सरकार या स्थानीय प्राधिकारी किसी औद्योगिक उपक्रम का प्रबंध या नियंत्रण, तत्समय प्रवृत्त किसी ऐसी विधि के अधीन ग्रहण करने के लिए, जो किसी ऐसी सरकार या स्थानीय प्राधिकारी को वैसा करने के लिए प्राधिकृत करती है, सक्षम नहीं होगा

21. विकास परिषदों के कुछ प्रशासनिक व्ययों का संसद् द्वारा उपबंधित धन में से दिया जाना-ऐसे प्रशासनिक व्यय जो विकास परिषद् के उन अधिकारियों की उपलब्धियों से सम्बद्ध हैं, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा या उसके अनुमोदन से नियुक्त किए जाएं, संसद् द्वारा उपबन्धित धन में से चुकाए जाएंगे

22. विकास परिषदों को निदेश देने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के प्रयोग में प्रत्येक विकास परिषद् का मार्गदर्शन ऐसे निदेशों से होगा जो, केन्द्रीय सरकार द्वारा उसे दिए जाएं और ऐसे निदेशों के अन्तर्गत उस रीति और प्रयोजन से सम्बद्ध निदेश भी हो सकेंगे जिससे या जिसके लिए धारा 9 के अधीन उद्गृहीत उपकर के कोई आगम, जो उसे दिए गए हों, व्यय किए जाएंगे

 [23. कुछ मामलों के बारे में केन्द्रीय सरकार के विनिश्चय का अन्तिम होना-यदि इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए कोई प्रश्न उठता है कि क्या-

() किसी औद्योगिक उपक्रम का पर्याप्त विस्तार हुआ है, या

() कोई औद्योगिक उपक्रम किसी नई वस्तु का उत्पादन या विनिर्माण कर रहा है,

तो, उस पर केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अन्तिम होगा ]

24. शास्तियां- [(1) यदि कोई व्यक्ति निम्नलिखित का उल्लंघन करेगा या उल्लंघन करने का प्रयत्न करेगा या उल्लंघन का दुष्प्रेरण करेगा, अर्थात्: -

(i) धारा 10 की उपधारा (1) [या उपधारा (4)] के या धारा 11 की उपधारा (1) के या धारा 11 के या धारा 13 की उपधारा (1) के [या [धारा 29 की उपधारा (2)], उपधारा (2), उपधारा (2), उपधारा (2) और उपधारा (2)] का उपबंध, या

(ii) धारा 16 के या धारा 18 की उपधारा (3) के अधीन दिया गया कोई निदेश, या

(iii) धारा 18 के अधीन किया गया कोई आदेश,

(iv) कोई नियम जिसका उल्लंघन इस धारा के अधीन दण्डनीय है, तो वह कारावास से जो छह मास तक का हो सकेगा, या जुर्माने से जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से, और जारी रहने वाले उल्लंघन की दशा में अतिरिक्त जुर्माने से जो उस प्रत्येक दिन के लिए जिसके दौरान ऐसा उल्लंघन, प्रथम बार ऐसे उल्लंघन के लिए दोषसिद्धि के पश्चात् जारी रहता है, पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा ]

(2) यदि उक्त उपबंधों में से किसी का उल्लंघन करने वाला व्यक्ति कम्पनी है, तो प्रत्येक व्यक्ति जो उस उल्लंघन के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कम्पनी भी ऐसे उल्लंघन के दोषी समझे जाएंगे तथा तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्रवाई किए जाने और दण्डित किए जाने के भागी होंगे :

परन्तु इस उपधारा की कोई भी बात किसी ऐसे व्यक्ति को इस अधिनियम में उपबंधित किसी दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी

(3) उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया है तथा यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक या प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा तथा तदनुसार अपने विरुद्ध कार्रवाई किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-

() कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है; तथा

() फर्म के संबंध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है

 [24. मिथ्या कथन के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति,-

() जब उससे इस अधिनियम द्वारा या इस अधिनियम के अधीन किसी आदेश द्वारा कोई कथन करने या कोई जानकारी देने की अपेक्षा की जाए, कोई ऐसा कथन करेगा या कोई ऐसी जानकारी देगा जिसका कोई महत्वपूर्ण अंश मिथ्या है और जिसके मिथ्या होने का उसे ज्ञान है या यह विश्वास करने का उचित कारण है कि वह मिथ्या है या जिसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है; या

() यथा पूर्वोक्त कोई कथन किसी बही, लेखा, अभिलेख, घोषणा, विवरणी या अन्य दस्तावेज में करेगा जिसे रखने या देने के लिए वह इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी आदेश द्वारा अपेक्षित है,

तो वह कारावास से जो तीन मास तक का हो सकेगा, या जुर्माने से जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से, दण्डनीय होगा ]

 [25. शक्तियों का प्रत्यायोजन-(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचित आदेश द्वारा, निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा प्रयोक्तव्य कोई शक्ति (जो उसे धारा 16,  [धारा 18, धारा 18कक और धारा 18चक] द्वारा प्रदत्त शक्तियों से भिन्न है) ऐसे विषयों के संबंध में और ऐसी शर्तों के यदि कोई हों, अधीन रहते हुए, जो निदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा भी (जिन पदों के अन्तर्गत कोई विकास परिषद्, राज्य सरकार या केन्द्रीय सरकार के अधीनस्थ अधिकारी या प्राधिकारी भी है) प्रयोक्तव्य होगी जो निदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं

(2) उपधारा (1) के अधीन निदेश के आधार पर राज्य सरकार द्वारा प्रयोक्तव्य कोई शक्ति उस दशा के सिवाय जो ऐसे निदेश में अन्यथा उपबंधित हो उस राज्य सरकार के अधीनस्थ ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा भी प्रयोक्तव्य होगी जिसे वह अधिसूचित आदेश द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे

26. निदेश देने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के या इसके अधीन किए गए किसी आदेश या निदेश के उपबन्धों में से किसी के किसी राज्य में निष्पादन के बारे में उस राज्य की सरकार को निदेश दे सकेगी

27. अपराधों का संज्ञान-कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का संज्ञान ऐसा अपराध गठित करने वाले तथ्यों के विषय में ऐसे व्यक्ति की, जो भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 में यथापरिभाषित लोक सेवक हो, लिखित रिपोर्ट पर ही करेगा अन्यथा नहीं

28. कतिय मामलों से सबूत का भार-जहां कोई व्यक्ति धारा 18 के अधीन किए गए ऐसे आदेश का उल्लंघन करने के लिए अभियोजित किया जाता है जो उसे विधिपूर्वक प्राधिकार के बिना अथवा किसी अनुज्ञापत्र, अनुज्ञप्ति या अन्य दस्तावेज के बिना कोई कार्य करने से या किसी वस्तु को कब्जे में रखने से प्रतिषिद्ध करता है वहां यह साबित करने का भार कि उसके पास ऐसा प्राधिकार, अनुज्ञापत्र, अनुज्ञप्ति या अन्य दस्तावेज है उसी पर होगा

29. न्यायालयों की अधिकारिता-(1) उपधारा (2) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए कोई प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट से अवर कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा

(2) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) की धारा 260 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अपराध का संक्षेपतः विचारण करने के लिए तत्समय सशक्त कोई मजिस्ट्रेट या मजिस्ट्रेटों का न्यायपीठ अभियोजन द्वारा इस निमित्त आवेदन किए जाने पर किसी ऐसे अपराध का विचारण जो धारा 18 के अधीन किए गए आदेश का उल्लंघन है, उक्त संहिता की धारा 262 से धारा 265 के उपबंधों के अनुसार कर सकेगा

29. जुर्मानों के संबंध में विशेष उपबंध-दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) की धारा 32 में किसी बात के होते हुए भी किसी प्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट या किसी प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट के लिए इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध से सिद्धदोष किसी व्यक्ति पर एक हजार रुपए से अधिक जुर्माने का दण्डादेश पारित करना विधिपूर्ण होगा

29. विशेष दशाओं में छूट देने की शक्ति- [(1)] यदि किसी औद्योगिक उपक्रम में नियोजित कर्मकारों की छोटी संख्या को या किसी औद्योगिक उपक्रम में विनिहित रकम को या छोटे उपक्रमों को साधारणतया प्रोत्साहन देने की वांछनीयता को या किसी अनुसूचित उद्योग के विकास के प्रक्रम को ध्यान में रखते हुए केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि इस अधिनियम के सभी या किन्हीं उपबन्धों को उस पर लागू करना लोकहित में नहीं होगा तो वह राजपत्र में अधिसूचना द्वारा किसी औद्योगिक उपक्रम या औद्योगिक उपक्रमों के वर्ग या किसी अनुसूचित उद्योग या अनुसूचित उद्योगों के वर्ग को जो वह अधिसूचना में विनिर्दिष्ट करे इस अधिनियम के या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या आदेश के सभी या किन्हीं उपबंधों के प्रवर्तन से छूट ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए दे सकेगी जो अधिरोपित करना वह ठीक समझे

 [(2) जहां उपधारा (1) के अधीन कोई छूट देने वाली कोई अधिसूचना रद्द की जाती है वहां किसी ऐसे औद्योगिक उपक्रम का स्वामी, जिसको धारा 10, धारा 11, धारा 11 या धारा 13 की उपधारा (1) के खंड () के उपबंध लागू होते यदि उपधारा (1) के अधीन अधिसूचना नहीं निकाली गई होती, ऐसी अवधि की समाप्ति के पश्चात् जो उस छूट को रद्द करने वाली अधिसूचना में विनिर्दिष्ट हो, उस उपक्रम का कारबार केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त दी गई अनुज्ञप्ति के अधीन और अनुसार ही और राज्य सरकार की दशा में केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुज्ञा के अधीन और अनुसार ही चलाएगा अन्यथा नहीं

 [(2) विशिष्टतया और उपधारा (1) के उपबन्धों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, यदि केन्द्रीय सरकार का उपधारा (2) के अधीन गठित सलाहकार समिति द्वारा उससे की गई सिफारिशों पर विचार करने के पश्चात् यह समाधान हो जाता है कि आनुषंगिक या लघु औद्योगिक उपक्रमों के विकास और विस्तारण के लिए ऐसा करना आवश्यक है तो वह अधिसूचित आदेश द्वारा, निदेश कर सकेगी कि पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट कोई वस्तु या किसी वर्ग की वस्तुएं, उस तारीख से ही, जो अधिसूचित आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् आरक्षण की तारीख" कहा गया है) आनुषंगिक या लघु औद्योगिक उपक्रमों द्वारा अनन्यतः उत्पादन के लिए आरक्षित की जाएं (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् आरक्षित वस्तु" कहा गया है)

(2) केन्द्रीय सरकार किसी ऐसी वस्तु या किसी ऐसे वर्ग की वस्तुओं की प्रकृति का अवधारण करने की दृष्टि से, जो आनुषंगिक या लघु औद्योगिक उपक्रमों में द्वारा उत्पादन के लिए आरक्षित की जाएं, ऐसी सलाहकार समिति गठित करेगी जिसमें ऐसे व्यक्ति होंगे जिनके पास उस सरकार की राय में, उस विषय पर सलाह देने के लिए आवश्यक विशेषज्ञता है

(2) सलाहकार समिति निम्नलिखित विषयों पर विचार करने के पश्चात्, केन्द्रीय सरकार को अपनी सिफारिशें भेजेगी, अर्थात्: -

() ऐसी वस्तु या ऐसे वर्ग की वस्तुओं का प्रकार, जिनका आनुषंगिक या लघु औद्योगिक उपक्रमों द्वारा मितव्यय से उत्पादन किया जा सकता है;

() ऐसी वस्तु या ऐसे वर्ग की वस्तुओं के आनुषंगिक या लघु औद्योगिक उपक्रमों द्वारा उत्पादन से कितने व्यक्तियों का नियोजन होने की संभावना है;

() उद्योग में उद्यमवृत्ति के प्रोत्साहन और प्रसार की संभावना;

() जनसामान्य के लिए अहितकर रूप में आर्थिक शक्ति के संकेन्द्रण का निवारण; और

() ऐसे अन्य विषय जो सलाहकार समिति उचित समझे

(2) किसी औद्योगिक उपक्रम द्वारा (जो आनुषंगिक या लघु औद्योगिक उपक्रम नहीं है), जो कि आरक्षण की तारीख को किसी आरक्षित वस्तु या किसी वर्ग की आरक्षित वस्तुओं के उत्पादन में लगा हुआ है या जिसने ऐसे उत्पादन के लिए प्रभावी कदम उठा लिए हैं, किसी आरक्षित वस्तु  या किसी वर्ग की आरक्षित वस्तुओं का उत्पादन, यथास्थिति, उद्योग (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 1984 के प्रारम्भ के या आरक्षण की तारीख के पश्चात् इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, ऐसी शर्तों के अधीन होगा जो केन्द्रीय सरकार अधिसूचित आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे

(2) उपधारा (2) के अधीन कोई शर्त विनिर्दिष्ट करते समय केन्द्रीय सरकार किसी आरक्षित वस्तु या किसी वर्ग की आरक्षित वस्तुओं के उत्पादन के उस स्तर पर, जो उपधारा (2) में निर्दिष्ट औद्योगिक उपक्रम द्वारा आरक्षण की तारीख के ठीक पहले प्राप्त कर लिया गया है तथा अन्य ऐसी बातों पर, जो सुसंगत हों, विचार करेगी

(2) प्रत्येक ऐसा व्यक्ति या प्राधिकारी जो केन्द्रीय सरकार नहीं है और जो किसी ऐसी वस्तु या ऐसे वर्ग की वस्तुओं के, जो बाद में आनुषंगिक या लघु औद्योगिक उपक्रमों के लिए आरक्षित कर ली गई है, उत्पादन के लिए धारा 10 के अधीन रजिस्ट्रीकृत है या जिसे ऐसे उत्पादन के लिए धारा 11 के अधीन अनुज्ञप्ति दे दी गई है या अनुज्ञा प्रदान कर दी गई है, यथास्थिति, ऐसा रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र, अनुज्ञप्ति या अनुज्ञा ऐसी अवधि के भीतर जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचित आदेश द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, पेश करेगा तथा केन्द्रीय सरकार उसमें वे सभी शर्तें जो उसके द्वारा उपधारा (2) के अधीन विनिर्दिष्ट की गई हैं, जिनके अन्तर्गत औद्योगिक उपक्रमों की उत्पादन क्षमता और अन्य विहित विशिष्टियां भी हैं, या उनमें से कोई शर्त, विनिर्दिष्ट कर सकेगी

(2) प्रत्येक ऐसे औद्योगिक उपक्रम का स्वामी (जो आनुषंगिक या लघु औद्योगिक उपक्रम नहीं है), जो कि उद्योग (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 1984 के प्रारंभ के या आरक्षण की तारीख के, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, ठीक पहले,-

() किसी ऐसी वस्तु या ऐसे वर्ग की वस्तुओं के, जो आनुषंगिक या लघु औद्योगिक उपक्रमों के लिए आरक्षित कर ली गई है, उत्पादन में लगा हुआ था; या

() यथास्थिति, ऐसे प्रारंभ के या ऐसे आरक्षण की तारीख के पहले जिसने ऐसी आरक्षित वस्तु या ऐसे वर्ग की आरक्षित वस्तुओं का उत्पादन प्रारंभ करने के लिए प्रभावी कदम उठा लिए थे,

धारा 10 के अधीन रजिस्ट्रीकृत हुए बिना, या जिसकी बाबत धारा 11 के अधीन कोई अनुज्ञप्ति या अनुज्ञा जारी कर दी गई है, ऐसे प्रारम्भ से या ऐसे आरक्षण की तारीख से, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, तीन मास के अवसान की तारीख से ही, ऐसी आरक्षित वस्तु या ऐसे वर्ग की आरक्षित वस्तुओं के उत्पादन से विरत रहेगा

(2) उपधारा (2) के अधीन किया गया प्रत्येक अधिसूचित आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस अधिसूचित आदेश में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह अधिसूचित आदेश नहीं किया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किन्तु उस अधिसूचित आदेश के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ]

(3) इस अधिनियम के उपबंध उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी औद्योगिक उपक्रम को अनुज्ञप्ति या अनुज्ञा के संबंध में जहां तक हो सके वैसे ही लागू होंगे जैसे वे किसी नए औद्योगिक उपक्रम को अनुज्ञप्ति या अनुज्ञा देने के सम्बन्ध में लागू होते हैं ]

29. अधिनियम के अधीन की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या आदेश के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के बारे में कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध होगी

(2) कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किसी ऐसी बात से, जो इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या आदेश के अनुसरण में सद्भापूर्वक की गई है या की जाने के लिए आशयित हो, हुए या संभाव्य किसी नुकसान के बारे में सरकार के विरुद्ध होगी

 [29. प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा उपगत ऋणों को पूर्विकता-धारा 18, धारा 18कक, या धारा 18चक के अधीन ग्रहण किए गए किसी औद्योगिक उपक्रम या उसके भाग के संबंध में प्रबन्ध चलाने या नियंत्रण के कृत्यों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा अभिप्राप्त किसी उधार से उद्भूत होने वाला प्रत्येक ऋण-

() उपक्रम का प्रबन्ध ग्रहण किए जाने के पूर्व उपगत सभी ऋणों के चाहे वे प्रतिभूत हों या अप्रतिभूत पूर्विकता पाएगा;

() कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 530 के अर्थ के भीतर अधिमानी ऋण होगा,

और ऐसे ऋण आपस में एक समान होंगे तथा औद्योगिक उपक्रम की चालू आस्तियों में से पूर्णतः संदत्त किए जाएंगे जब तक कि ऐसी चालू आस्तियां उनकी पूर्ति करने के लिए अपर्याप्त हों और ऐसी दशा में उनका समान अनुपातों में उपशमन हो जाएगा ]

                 [29. विधिमान्यकरण-किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, यथास्थिति, केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा प्रयोग की गई कोई शक्ति अथवा की गई या किए जाने के लिए तात्पर्यित किसी कार्रवाई या बात के बारे में यह समझा जाएगा सदैव से यह समझा जाएगा कि वह सभी प्रयोजनों के लिए उसी प्रकार विधिमान्य रूप से प्रयोग की गई है अथवा की गई है अथवा उसके किए जाने का लोप किया गया है मानो उद्योग (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2016 द्वारा पहली अनुसूची में किया गया संशोधन सभी तात्विक समयों पर प्रवृत्त था और इस प्रकार किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण में कोई वाद या दावा या अन्य कार्यवाहियां इस प्रकार संस्थित, कायम या जारी नहीं रखी जाएंगी ]

30. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, पूर्व प्रकाशन की शर्त के अधीन रहते हुए बना सकेगी

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित सभी विषयों या उनमें से किसी के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात्: -

() सलाहकार परिषद् और विकास परिषदों का गठन, सलाहकार परिषद् या विकास परिषद् के सदस्यों की पदावधि और सेवा की अन्य शर्तें, उनके द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया, और उनमें आकस्मिक रिक्तियों को भरने की रीति;

() विकास परिषद् द्वारा दिए जाने वाले लेखा विवरण का प्ररूप;

() वे अन्तराल जिनमें, वह समय जिसके अन्दर और वह रीति जिससे धारा 9 के अधीन उद्ग्रहणीय उपकर संदेय होगा और ऐसे उपकर के तुरन्त संदाय के लिए रिबेट;

() वे व्यय जिनकी पूर्ति विकास परिषद् धारा 9 के अधीन उद्गृहीत उपकर के आगमों में से, जो उसे दिए गए हों, कर सकेगी;

() विकास परिषद् के किन्हीं अधिकारियों की केन्द्रीय सरकार द्वारा या उसके अनुमोदन से नियुक्ति;

() तकनीकियों और श्रमिकों के प्रशिक्षण के लिए किसी औद्योगिक उपक्रम द्वारा व्यवस्थित की जाने वाली सुविधाएं;

() किसी अनुसूचित उद्योग के बारे में किसी जानकारी या आंकड़ों का संग्रहण;

() वह रीति जिससे औद्योगिक उपक्रम धारा 10 के अधीन रजिस्टर किए जा सकेंगे और उसके लिए फीस का उद्ग्रहण;

() [धारा 11, धारा 11, [धारा 13 या धारा 29ख]] के अधीन अनुज्ञप्तियों या अनुज्ञापत्रों के अनुदान या दिए जाने के लिए प्रक्रिया, वह समय जिसके अन्दर ऐसी अनुज्ञप्तियां या अनुज्ञापत्र अनुदत्त किए जाएंगे या दिए जाएंगे, जिसके अन्तर्गत विशिष्टतः आवेदनों की मांग करने वाली सूचनाओं का प्रकाशन और उसके सम्बन्ध में ऐसी सार्वजनिक जांच करना भी है जो परिस्थितियों में आवश्यक हों;

() इस अधिनियम के अधीन दी गई अनुज्ञप्तियों और अनुज्ञापत्रों के सम्बन्ध में उद्गृहीत की जाने वाली फीस;

() वे बातें जो अनुज्ञप्तियां और अनुज्ञापत्र अनुदत्त करने या देने में ध्यान में रखी जा सकेंगी, जिनके अन्तर्गत विशिष्टतः किन्हीं ऐसी अनुज्ञप्तियों या अनुज्ञापत्रों के अनुदान या देने के सम्बन्ध में केन्द्रीय सरकार द्वारा सलाहकार परिषद् या किसी विकास परिषद् अथवा दोनों से पूर्व परामर्श करना भी है;

() इस अधिनियम के अधीन कोई अन्वेषण करने में अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया;

() वे शर्तें जो किन्हीं अनुज्ञप्तियों और अनुज्ञापत्रों में सम्मिलित की जा सकेंगी;

() वे शर्तें जिन पर अनुज्ञप्तियों और अनुज्ञापत्रों में धारा 12 के अधीन परिवर्तन या संशोधन किया जा सकेगा;

() किसी औद्योगिक उपक्रम से सम्बद्ध बहियों, लेखाओं और अभिलेखाओं को बनाए रखना;

() किसी औद्योगिक उपक्रम के बारे में उन व्यक्तियों द्वारा जो ऐसे उपक्रम का नियन्त्रण रखते हैं या उसके सम्बन्ध में नियोजित हैं विशेष या नियतकालिक विवरणियों का दिया जाना और वे प्ररूप जिनमें और वे प्राधिकारी जिनको ऐसी विवरणियां और रिपोर्ट, दी जाएंगी;

 [(तत) कोई विषय जो अध्याय 3कक या अध्याय 3कग के उपबन्धों को प्रभावी बनाने के लिए विहित किया जाना है या विहित किया जा सकता है;]

() कोई अन्य विषय जो इस अधिनियम के अधीन विहित किया जाना है या विहित किया जा सकता है

                (3) इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किसी नियम में यह उपबन्ध हो सकेगा कि उसका उल्लंघन धारा 24 के अधीन दण्डनीय होगा

                 [(4) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किंतु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ]

31. अन्य विधियों के लागू होने का वर्जित होना-इस अधिनियम के उपबन्ध, जैसा इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबन्धित है उसके सिवाय, अनुसूचित उद्योगों में से किसी के बारे में तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य केन्द्रीय अधिनियम के अतिरिक्त होंगे कि उसके अल्पीकरण में

32. [1947 के अधिनियम सं० 14 की धारा 2 का संशोधन]-निरसन और संशोधन अधिनियम, 1957 (1957 का 36) की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा निरसित

[पहली अनुसूची

[धारा 2 और धारा 3(1) देखिए]

                कोई उद्योग जो निम्नलिखित शीर्षकों या उपशीर्षकों में से प्रत्येक के अधीन वर्णित वस्तुओं में से किसी के विनिर्माण या उत्पादन में लगा है, अर्थात्: -

1. धातुकर्म उद्योग: -

                () लौह: -

(1) लोहा और इस्पात (धातु);

(2) लौह मिश्र धातुएं;

(3) ढालकर और पीटकर बनाई गई लोहे तथा इस्पात की वस्तुएं;

(4) लोहे और इस्पात की संरचनाएं;

(5) लोहे और इस्पात के पाइप;

(6) विशेष इस्पात;

(7) लोहे और इस्पात के अन्य उत्पाद;

                                () अलौह: -

 [(1) मूल्यवान धातुएं जिनके अन्तर्गत सोना और चांदी और उनकी मिश्र धातुएं हैं;

(1) अन्य अलौह धातुएं और उनकी मिश्र धातुएं;]

(2) अर्ध-विनिर्माण और विनिर्माण

                2. ईंधन: -

                                (1) कोयला, लिग्नाइट, कोक और उनकी व्युत्पत्तियां;

(2) खनिज तेल (कच्चा तेल), मोटर और विमान-स्पिरिट, डीजल तेल, मिट्टी का तेल, ईंधन तेल, विविध हाइड्रोकार्बन तेल और उनके सम्मिश्र जिनके अन्तर्गत संश्लिष्ट ईंधन, स्नेहक तेल और वैसे ही अन्य हैं

(3) ईंधन गैसें-(कोयला गैस, प्राकृतिक गैस और वैसी ही अन्य गैसें)

                3. बायलर और वाष्प उत्पादन संयंत्र: -

                                बायलर और वाष्प उत्पादन संयंत्र

4. मूल गति उत्पादक (वैद्युत उत्पादकों से भिन्न): -

                (1) वाष्प इंजिन और टरबाइन;

(2) अन्तर्दहन इंजिन

5. विद्युत उपस्कर: -

                (1) विद्युत के उत्पादन, पारेषण और वितरण के लिए उपस्कर जिनके अन्तर्गत ट्रान्सफार्मर भी हैं;

(2) विद्युत मोटरें;

(3) विद्युत पंखें;

(4) विद्युत लैम्प;

(5) विद्युत भट्टियां;

(6) विद्युत केबल और तार;

(7) एक्सरे उपस्कर;

(8) इलेक्ट्रानिक उपस्कर;

(9) घरेलू साधित्र जैसे विद्युत इस्त्री, हीटर और वैस ही अन्य;

(10) संचायक बैटरियां;

(11) शुष्क सेल

6. दूर-संचार: -

                (1) टेलीफोन;

(2) तार उपस्कर;

(3) बेतार संचार यंत्र;

(4) रेडियो रिसीवर जिनके अन्तर्गत प्रवर्धन और ध्वनि प्रवर्धक यंत्र भी हैं;

(5) टेलीविजन सेट;

(6) टेलीप्रिन्टर

7. परिवहन: -

(1) वायुयान;

(2) पोत और शक्ति द्वारा चालित अन्य जलयान;

(3) रेल-इंजन;

(4) रेल चल-स्टाक;

(5) आटोमोबाइल (मोटरकार, बस, ट्रक, मोटर साइकिल, स्कूटर और वैसे ही अन्य);

(6) बाइसिकल;

(7) अन्य, जैसे फोर्क लिफ्ट ट्रक और वैसे ही अन्य

                8. औद्योगिक मशीनरी: -

                                (.) विनिर्दिष्ट उद्योगों में प्रयुक्त विशिष्ट उपस्कर की प्रमुख मदें: -

(1) कपड़ा मशीनरी (जैसे कताई फ्रेम, कार्डिंग मशीन पावरलूम और वैसे ही अन्य) जिनके अन्तर्गत कपड़ा-मशीनरी के उपांग भी हैं;

(2) जूट मशीनरी;

(3) रेयन मशीनरी;

(4) चीनी मशीनरी;

(5) चाय मशीनरी;

(6) खनन मशीनरी;

(7) धातुकर्म मशीनरी;

(8) सीमेंट मशीनरी;

(9) रासायनिक मशीनरी;

(10) भेषज मशीनरी;

(11) कागज मशीनरी

(.) विभिन्न उद्योगों में प्रयुक्त मशीनरी की साधारण मदें, जैसे विभिन्न यूनिट प्रक्रियाओं" के लिए अपेक्षित उपस्कर: -

(1) आकार घटाने का उपस्कर-दलित्र, बाल-मित्र और वैसे ही अन्य;

(2) प्रवहन-उपस्कर-डोल उत्थापक, स्किप उत्तोलक, क्रेन डेरिक और वैसे ही अन्य;

(3) आकार पृथक्करण यूनिट-छन्ने, संभाजक और वैसे ही अन्य;

(4)  मिक्सर और रिएक्टर-गूंथने की मिल, टर्बो-मिक्सर और वैसे ही अन्य;

(5) निस्पादन-उपस्कर-दाव-निस्पंदक, रोटेरी निस्पंदक और वैसे ही अन्य;

(6) अपेन्द्री यंत्र;

(7) वाष्पित्र;

(8) आसवन उपस्कर;

(9) क्रिस्टलाइजर;

(10) शुष्कक;

(11) शक्ति चालित पम्प-प्रत्यागामी, अपकेन्द्री और वैसे ही अन्य;

(12) वायु और गैस संपीडक और निर्वात पाइप (वैद्युत भट्टियों से भिन्न);

(13) औद्योगिक प्रयोग के लिए प्रशीतन संयंत्र;

(14) अग्नि-शामक उपस्कर और साधित्र जिनमें अग्नि-शामक इंजिन भी है

                                (.) औद्योगिक मशीनरी की अन्य मदें: -

                                                (1) बाल, रोलर और टेपरित बेयरिंग;

(2) रफ्तार घटाने वाले यूनिट;

(3) पेषण चक्र और अपघर्षक

                9. मशीनी औजार: -

                                मशीनी औजार

10. कृषि-मशीनरी: -

(1) ट्रेक्टर, हार्वेस्टर और वैसे ही अन्य

(2) कृषि उपकरण

11. मिट्टी हटाने वाली मशीनरी: -

                बुलडोजर, डम्पर, स्क्रेपर, लोडर, शावल, कर्षण, लाइनें, बाल्टीचक्र खनित्र, सड़क रोलर और वैसे ही अन्य

12. विविध यांत्रिक और इंजीनियरी उद्योग: -

(1) प्लास्टिक की ढली वस्तुएं;

(2) हाथ के औजार, छोटे औजार और वैसे ही अन्य;

(3) उस्तरे के ब्लेड;

 [(4) प्रेशर कुकर;

(5) कटलरी;

(6) इस्पात फनीर्चर ]

13. वाणिज्यिक, कार्यालय और घरेलू उपस्कर: -

(1) टाइपराइटर;

(2) परिकलन यंत्र;

(3) वातानुकूलक और रेफ्रीजरेटर;

(4) निर्वात क्लीनर;

(5) सिलाई और बुनाई मशीनें;

(6) हरिकेन लालटेन

14. चिकित्सा और शल्य साधित्र: -

                शल्य उपकरण-रोगाणुहर, इन्क्यूवेटर और वैसे ही अन्य

15. औद्योगिक उपकरण: -

(1) पानी के मीटर, वाष्प-मीटर, विद्युत मीटर और वैसे ही अन्य;

(2) दबाव, तापमान प्रवाह की गति, वजन, तल और वैसी ही अन्य बातों के लिए संकेतन, अभिलेखन और विनियमन युक्तियां;

(3) तोलने के यंत्र

16. वैज्ञानिक उपकरण: -

                वैज्ञानिक उपकरण

17. गणितीय, सर्वेक्षण और आरेखन उपकरण: -

                गणितीय, सर्वेक्षण और आरेखन उपकरण

18. उर्वरक: -

(1) अकार्बनिक उर्वरक;

(2) कार्बनिक उर्वरक;

(3) मिश्रित उर्वरक

19. रसायन (उर्वरकों से भिन्न): -

(1) अकार्बनिक भारी रसायन;

(2) कार्बनिक भारी रसायन;

(3) सुक्ष्म रसायन जिनके अन्तर्गत फोटोग्राफिक रसायन भी है;

(4) संश्लिष्ट रेजिन और प्लास्टिक;

(5) रंग, रोगन और एनैमल;

(6) संश्लिष्ट रबर;

(7)  कृत्रिम फाइबर जिसके अन्तर्गत पुनर्योजित सैलुलोसरेयन, नाइलोन और वैसे ही अन्य हैं;

(8) कोक भट्टी के उपोत्पाद

(9) नैप्थेलीन, ऐथ्रेसीन, और वैसे ही कोलतार आसवन के उत्पाद;

(10) विस्फोटक, जिनके अन्तर्गत बारूद और सुरक्षा फ्यूज भी है;

(11) कीटनाशी, कवकनाशी, अपतृणनाशी और वैसे ही अन्य;

(12) कपड़ों से संबंधित वस्तुएं;

(13) चिक्कणन पदार्थ जिनके अन्तर्गत स्टार्च भी हैं;

(14) विविध रसायन

                20. फोटोग्राफी की कच्ची फिल्म और कागज: -

(1) सिनेमा फिल्म;

(2) फोटोग्राफी की अव्यवसायिक फिल्म;

(3) फोटो मुद्रण कागज

21. रंजक द्रव्य: -

                रंजक द्रव्य

22. ओषधि और भेषज: -

                ओषधि और भेषज

23. कपड़ा (जिसके अन्तर्गत रंजित, मुद्रित या अन्यथा प्रसंस्कृत कपड़ा भी है्): -

(1) पूर्णतः या भागतः सूत से बना, जिसके अन्तर्गत सूती धागा, हौजरी और रस्सी भी है;

(2) पूर्णतः या भागतः जूट से बना, जिसके अन्तर्गत जूट की डोरी और रस्सी भी है;

(3) पूर्णतः या भागतः ऊन से बना, जिसके अन्तर्गत ऊन की लच्छियां, ऊनी धागा, हौजरी, गलीचे और ड्रगेट भी हैं;

(4) पूर्णतः या भागतः रेशम से बना, जिसके अन्तर्गत रेशमी धागा और हौजरी भी है;

(5) पूर्णतः या भागतः संश्लिष्ट, कृत्रिम (मानव-निर्मित) फाइबर जिसके अन्तर्गत ऐसे फाइबर का धागा और हौजरी भी है

24. कागज और लुगदी जिसके अन्तर्गत कागज के उत्पाद हैं: -

(1) कागज-लिखने, मुद्रण करने और लपेटने वाला;

(2) अखबारी कागज;

(3) कागज का गत्ता और स्ट्रा गत्ता;

(4) पैकेज का कागज (लहरदार कागज, क्राफ्ट कागज, कागज के थैले, कागज आधान और वैसे ही अन्य);

(5) लुगदी-लकड़ी की लुगदी, यांत्रिक, रासायनिक लुगदी जिसके अन्तर्गत द्रावक लुगदी भी है

25. चीनी: -

                चीनी

 [26. किण्वन उद्योग (पेय एल्कोहल से भिन्न)]: -

(1) एल्कोहल;

(2) किण्वन उद्योगों के अन्य उत्पाद

                27. खाद्य पदार्थ प्रसंस्करण उद्योग: -

(1) डिब्बा बन्द फल और फल उद्योग उत्पाद;

(2) दुग्ध-खाद्य;

(3) माल्टित खाद्य;

(4) आटा;

(5) अन्य प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ

28. वनस्पति तेल और वनस्पति: -

(1) वनस्पति तेल, जिनके अन्तर्गत विलायक निष्कर्षित तेल भी है;

(2) वनस्पति

29. साबुन, प्रसाधन सामग्री और प्रसाधन निर्मितियां: -

(1) साबुन;

(2) ग्लिसरीन;

(3) प्रसाधन सामग्री;

(4) सुगंधित सामग्री;

(5) प्रसाधन निर्मितियां

30. रबर की वस्तुएं: -

(1) टायर और ट्यूब;

(2) शल्य और औषधीय उत्पाद जिनके अन्तर्गत रोग-निरोधक भी है;

(3) जूते;

(4) रबर की अन्य वस्तुएं

31. चमड़ा, चमड़े की वस्तुएं और पिकर: -

                चमड़ा, चमड़े की वस्तुएं और पिकर

32. सरेस और जिलेटिन: -

                सरेस और जिलेटिन

33. कांच: -

(1) खोखले पात्र;

(2) शीट और प्लेट कांच;

(3) प्रकाशीय कांच;

(4) कांच तंतु;

(5) प्रयोगशाला पात्र;

(6) विविध पात्र

34. मृतिका शिल्प: -

(1) अग्निसह ईंट;

(2) रिफ्रैक्टरी;

(3) भट्टी अस्तर ईंटें-आम्लीय, मूल और निष्प्रभावी;

(4) चीनी मिट्टी के बर्तन और मिट्टी के बर्तन;

(5) सैनिटरी पात्र;

(6) रोधी;

(7) खपरेल;

 [(8) ग्रेफाइट मूषा ]

                35. सीमेंट और जिप्सम उत्पाद: -

(1) पोर्टलैंड सीमेंट;

(2) एस्बेस्टास सीमेंट;

(3) रोधक बोर्ड;

(4) जिप्सम बोर्ड, दीवार बोर्ड, और वैसे ही अन्य

36. काष्ठ उत्पाद: -

(1) प्लाइवुड;

(2) हार्ड बोर्ड जिसके अन्तर्गत फाईबर बोर्ड, चिपबोर्ड और वैसे ही अन्य हैं;

(3) दियासलाई;

(4) विविध (फर्नीचर घटक, बाबिन, शटल और वैसे ही अन्य)

37. रक्षा उद्योग: -

                आयुध और गोला बारूद

38. विविध उद्योग: -

 [(1)] सिगरेट;

 [(2) लिनोलियम चाहे उसका आधार नमदे का हो या जूट का;]

 [(3) जिप कसनी (धात्त्विक और अधात्त्विक);

(4) तेल स्टोव;

(5) मुद्रण जिसके अन्तर्गत लिथो मुद्रण उद्योग भी है ]

                स्पष्टीकरण 1-शीर्ष सं० 3, 4, 5, 6, 7, 8, 10, 11 और 13 में से प्रत्येक के अधीन विनिर्दिष्ट वस्तुओं के अन्तर्गत उनके घटक और सहायक अंग भी होंगे

                स्पष्टीकरण 2-शीर्ष सं० 18, 19, 21 और 22 में से प्रत्येक के अधीन विनिर्दिष्ट वस्तुओं के अन्तर्गत उनके विनिर्माण के लिए अपेक्षित मध्यक भी हैं

दूसरी अनुसूची

[धारा 6(4) देखिए]

                कृत्य जो विकास परिषदों को सौंप जा सकेंगे: -

(1) उत्पादन के लक्ष्यों की सिफारिश करना, उत्पादन कार्यक्रमों का समन्वय करना और समय-समय पर प्रगति का पुनर्विलोकन करना

(2) अपव्यय को समाप्त करने, अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने, क्वालिटी में सुधार करने और लागत कम करने की दृष्टि से दक्षता के मानकों के बारे में सुझाव देना

(3) प्रतिष्ठापित क्षमता का अधिक उपयोग सुनिश्चित करने के लिए और उद्योग के कार्यकरण में सुधार करने के उपायों की सिफारिश करना विशेष रूप से कम दक्षता वाले यूनिटों के

(4) विपणन के प्रबन्ध की अभिवृद्धि करना और उद्योग के उत्पाद के वितरण और विक्रय की ऐसी पद्धति निकालने में सहायता करना जो उपभोक्ता के लिए समाधानप्रद हो

(5) उत्पादों के मानकीकरण को बढ़ाना

(6) नियंत्रित सामग्री के वितरण में सहायता करना और उद्योग के लिए सामग्री अभिप्राप्त करने के प्रबन्ध की अभिवृद्धि करना

(7) सामग्री और उपस्कर के बारे में तथा उत्पादन, प्रबन्ध और श्रम उपयोग के तरीकों के बारे में जांच करना या जांच संप्रवर्तित करना जिसके अन्तर्गत नई सामग्री, उपस्कर और तरीकों की और इनमें से जो पहले से ही प्रयोग में हों उनमें सुधारों की खोज और विकास, विभिन्न अनुकल्पों से फायदों का निर्धारण और प्रयोगात्मक स्थापनों का तथा वाणिज्यिक स्तर पर परीक्षणों का संचालन भी है

(8) उद्योग में लगे हुए या लगने के इच्छुक व्यक्तियों के प्रशिक्षण और उससे संगत तकनीकी या कलात्मक विषयों में उनके शिक्षण को बढ़ावा देना

(9) उद्योग में लगे हुए या उद्योग से छंटनी किए हुए कर्मिकों के आनुकल्पिक उपजीविकाओं में पुनर्प्रशिक्षण को बढ़ावा देना

(10) वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान, औद्योगिक, मनोविज्ञान को प्रभावित करने वाले मामले में अनुसंधान और उत्पादन से तथा उद्योग द्वारा प्रदत्त माल या सेवाओं के उपभोग या उपयोग से सम्बद्ध मामलों में अनुसंधान करना या संप्रवर्तित करना

(11) लेखा और लागत के तरीकों और प्रणाली के सुधार और मानकीकरण को बढ़ावा देना

(12) आंकड़ों के संग्रहण और प्रस्तुतीकरण के कार्य को करना या संप्रवर्तित करना

(13) सहबद्ध लघु और कुटीर उद्योगों की वृद्धि को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से, उत्पादन के प्रक्रमों और प्रक्रियाओं के विकेन्द्रीकरण की संभावनाओं का अन्वेषण करना

(14) श्रम की उत्पादकता में वृद्धि के उपायों को बढ़ावा देना; जिसके अन्तर्गत काम की अधिक निरापद और अच्छी दशाएं सुनिश्चित करने के उपाय और कर्मकारों के लिए सुख-सुविधाओं और प्रोत्साहनों में सुधार की व्यवस्था भी है

(15) उद्योग से संबंधित किसी भी ऐसे मामले पर (जो पारिश्रमिक और नियोजन की दशाओं से भिन्न है) सलाह देना जिस पर केन्द्रीय सरकार विकास परिषद् से सलाह देने का निवेदन करे और इस प्रकार सलाह देने के लिए विकास परिषद् को समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए जांच करना; और

(16) अभिप्राप्त जानकारी उद्योग को उपलब्ध कराने के लिए और उन मामलों पर, जिनसे विकास परिषदें अपने कृत्यों में से किसी के प्रयोग से संबंधित हैं, सलाह देने के लिए व्यवस्था करना

[तीसरी अनुसूची

(धारा 18चख देखिए)

1. औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 (1946 का 20)

2. औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14)

3. न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 (1948 का 1) ]

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