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दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय अधिनियम, 2008 ( South Asian University Act, 2008 )


 

दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय अधिनियम, 2008

(2009 का अधिनियम संख्यांक 8)

[11 जनवरी, 2009]

दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए करार को प्रभावी

करने और उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक

विषयों का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए करार पर दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगम (सार्क) के सदस्य राज्यों की संबंधित सरकारों की ओर से 4 अप्रैल, 2007 को हस्ताक्षर किए गए थे;

और उक्त करार के अनुच्छेद 1 में यह उपबंध है कि विश्वविद्यालय का मुख्य कैंपस भारत में अवस्थित होगा । अतः उक्त करार को प्रभावी करने के लिए उपबंध करना समीचीन है;

भारत गणराज्य के उनसठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-

1. संक्षिप्त नाम, प्रारंभ और विस्तार-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय अधिनियम, 2008 है ।

(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर और सार्क क्षेत्र में भारत से बाहर स्थापित कैंपसों और केन्द्रों पर होगा ।

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

(क) विद्या परिषद्" से विश्वविद्यालय की विद्या परिषद् अभिप्रेत है;

(ख) शैक्षणिक कर्मचारिवृंद" से ऐसे प्रवर्गों के कर्मचारिवृंद अभिप्रेत हैं जो परिनियमों द्वारा शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के रूप में अभिहित किए जाएं;

(ग) करार" से दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए करार अभिप्रेत है;

(घ) उपविधियों" से विश्वविद्यालय की उपविधियां अभिप्रेत हैं;

(ङ) केन्द्र" से विश्वविद्यालय की या विश्वविद्यालय संस्थान की ऐसी कोई इकाई अभिप्रेत है जो शिक्षण, परामर्श और अनुसंधान सुविधाएं उपलब्ध करा रही है और इसके अंतर्गत प्रादेशिक केन्द्र भी है;

(च) कर्मचारी" से विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त कोई व्यक्ति अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत विश्वविद्यालय के शिक्षक और अन्य कर्मचारिवृंद भी हैं;

(छ) कार्य परिषद्" से विश्वविद्यालय की कार्य परिषद् अभिप्रेत है;

(ज) संकाय" से विश्वविद्यालय का संकाय अभिप्रेत है;

(झ) शासी बोर्ड" से धारा 6 के अधीन गठित विश्वविद्यालय का शासी बोर्ड अभिप्रेत है;

(ञ) छात्र-निवास" से विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए निवास की ऐसी इकाई चाहे वह जिस नाम से ज्ञात हो, अभिप्रेत है जो विश्वविद्यालय द्वारा उपलब्ध कराई गई या चलाई जा रही या मान्यताप्राप्त है;

(ट) आतिथेय देश" से भारत गणराज्य अभिप्रेत है;

(ठ) आतिथेय सरकार" से आतिथेय देश की सरकार अभिप्रेत है;

(ड) सदस्य राज्यों" से सार्क के सदस्य राज्य अभिप्रेत हैं;

(ढ) विहित" से परिनियमों, विनियमों या उपविधियों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

(ण) अध्यक्ष" से धारा 12 के अधीन नियुक्त विश्वविद्यालय का अध्यक्ष अभिप्रेत है;

(त) परियोजना कार्यालय" से विश्वविद्यालय का मुख्य कैंपस स्थापित करने के लिए आवश्यक कार्य करने के प्रयोजन के लिए स्थापित परियोजना कार्यालय अभिप्रेत है;

(थ) मान्यताप्राप्त संस्था" से विश्वविद्यालय द्वारा चलाई गई या मान्यताप्राप्त अथवा विश्वविद्यालय से सहबद्ध उच्चतर विद्या की संस्था अभिप्रेत है;

(द) प्रादेशिक केन्द्र" से सार्क क्षेत्र में, कैंपसों या केन्द्रों के कार्य का समन्वय करने और पर्यवेक्षण करने के प्रयोजन के लिए तथा ऐसे अन्य कृत्य करने के लिए जो शासी बोर्ड द्वारा ऐसे केन्द्र को प्रदान किए जाएं, किसी स्थान पर विश्वविद्यालय द्वारा स्थापित या चलाया जा रहा केन्द्र अभिप्रेत है;

(ध) विनियम" से विश्वविद्यालय के विनियम अभिप्रेत हैं;

(न) सार्क" से 8 दिसम्बर, 1985 को हस्ताक्षरित दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगम के चार्टर द्वारा स्थापित दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगम के नाम से ज्ञात संगठन अभिप्रेत है;

(प) सार्क क्षेत्र" से सदस्य राज्यों के राज्यक्षेत्रों को समाविष्ट करने वाला क्षेत्र अभिप्रेत है;

(फ) अनुसूची" से अधिनियम की अनुसूची अभिप्रेत है;

(ब) परिनियमों" से विश्वविद्यालय के परिनियम अभिप्रेत हैं;

(भ) शिक्षक" से विश्वविद्यालय का आचार्य, उपाचार्य, प्राध्यापक और ऐसा अनुसंधान कर्मचारिवृंद अभिप्रेत है, जो विश्वविद्यालय द्वारा विश्वविद्यालय में शिक्षण देने या छात्रों को विश्वविद्यालय के किसी अध्ययन पाठ्यक्रम में अध्ययन करने के लिए मार्गदर्शन देने हेतु नियुक्त किए गए हैं या मान्यताप्राप्त हैं; और

(म) विश्वविद्यालय" से धारा 4 के अधीन निगमित दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय अभिप्रेत है ।

3. करार के उपबंधों को विधि का बल होना-किसी अन्य विधि में प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी अनुसूची में वर्णित करार के उपबंधों को भारत में विधि का बल होगा ।

4. दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय का निगमन-(1) ऐसी तारीख से जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त नियत करे, करार के उपबंधों को प्रभावी करने के प्रयोजन के लिए दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय के नाम से एक विश्वविद्यालय की स्थापना की जाएगी ।

(2) विश्वविद्यालय एक निगमित निकाय होगा जिसका शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होगी तथा वह उक्त नाम से वाद लाएगा और उसके विरुद्ध वाद लाया जाएगा ।

(3) विश्वविद्यालय का मुख्यालय दिल्ली में होगा ।

(4) विश्वविद्यालय भारत के भीतर और सार्क क्षेत्र में भारत से बाहर ऐसे अन्य स्थानों पर, जो वह ठीक समझे, कैंपस और केन्द्रों की स्थापना कर सकेगा या उन्हें चला सकेगा ।

5. अधिकारिता-विश्वविद्यालय की अधिकारिता संपूर्ण भारत पर और सार्क क्षेत्र में भारत से बाहर स्थापित सभी कैंपसों और केन्द्रों पर होगीः

परंतु यदि विश्वविद्यालय सार्क क्षेत्र में भारत से बाहर किसी स्थान पर कोई कैंपस या केन्द्र स्थापित करता है और चलाता है तब विश्वविद्यालय की अधिकारिता, करार के उपबंध तथा ऐसे किसी सदस्य राज्य में, जिसके भीतर ऐसा कैंपस या केन्द्र अवस्थित है, प्रवृत्त विधियों के अधीन रहते हुए, ऐसे कैंपस या केन्द्र पर विस्तारित होगी ।

6. शासी बोर्ड-(1) विश्वविद्यालय का एक शासी बोर्ड होगा जो सार्क के सदस्य राज्यों में से प्रत्येक राज्य के दो सदस्यों और विश्वविद्यालय के अध्यक्ष से मिलकर बनेगा:

परंतु प्रथम शासी बोर्ड की विरचना होने तक सार्क की अंतर-सरकारी परिचालन समिति अंतरिम शासी बोर्ड के रूप में कार्य करेगी ।

(2) शासी बोर्ड का प्रधान ऐसा अध्यक्ष होगा जो शासी बोर्ड के सदस्यों में से निर्वाचित किया जाएगा ।

(3) शासी बोर्ड के सदस्यों का चयन ऐसी रीति में और ऐसी अवधि के लिए किया जाएगा जो अनुसूची के अनुच्छेद 5 में उपबंधित है ।

(4) विश्वविद्यालय का अध्यक्ष शासी बोर्ड का पदेन सदस्य होगा । 

(5) शासी बोर्ड विश्वविद्यालय की सभी नीतियों और निदेशों तथा उसके क्रियाकलापों के प्रबंध के लिए उत्तरदायी होगा ।

(6) बोर्ड का अध्यक्ष ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं ।

7. विश्वविद्यालय के उद्देश्य-विश्वविद्यालय के उद्देश्य निम्नलिखित होंगे, - 

(क) विद्या की ऐसी शाखाओं में जिन्हें वह ठीक समझे, शिक्षण और अनुसंधान की सुविधाएं प्रदान करके ज्ञान, प्रज्ञान और समझ का प्रसार और अभिवृद्धि करना;

(ख) अध्यापन-विद्या प्रक्रिया में नई पद्धति की अभिवृद्धि, अंतर-विद्या विषयक अध्ययनों और सामाजिक प्रसार तथा मानव कल्याण के लिए और क्षेत्रीय शांति तथा सुरक्षा के संवर्धन के लिए ज्ञान का उपयोजन करने के लिए समुचित उपाय करना;

(ग) विज्ञान, प्रौद्योगिकी और जीवन की गुणवत्ता को सुधारने के लिए महत्वपूर्ण उच्चतर विद्या के अन्य क्षेत्रों में दक्षिण एशियाई राष्ट्रों की क्षमता निर्माण मद्दे उदार और मानवीय शिक्षा प्रदान करना तथा छात्रों को वृत्ति चलाने के लिए और उनमें नेतृत्व की गुणवत्ता उत्पन्न करने के लिए आवश्यक विश्लेषणों संबंधी साधन उपलब्ध कराना;

(घ) छात्रों में ठोस नागरिक भावना मजबूत करना और उन्हें लोकतांत्रिक समाज के सफल नागरिक बनने हेतु प्रशिक्षित करना;

(ङ) विद्या का दक्षिण एशियाई समुदाय तैयार करना जहां दक्षिण एशियाई देशों से छात्र अपनी संपूर्ण बौद्धिक क्षमता का विकास करने में समर्थ हों और क्षेत्रीय चेतना को मजबूत करके दक्षिण एशियाई समुदाय का सृजन करना; और

(च) अध्यापन, अनुसंधान और पाठ्यक्रम में शैक्षणिक मानकों और प्रत्यायन के मानकों के साथ ऐसा सामंजस्य बिठाना जो सभी सदस्य राष्ट्रों को स्वीकार्य हो ।

8. विश्वविद्यालय की शक्तियां-विश्वविद्यालय की निम्नलिखित शक्तियां होंगी, अर्थात्ः-

(i) विद्या की ऐसी शाखाओं में, जो विश्वविद्यालय समय-समय पर अवधारित करे, शिक्षण की व्यवस्था करना तथा अनुसंधान के लिए और ज्ञान की अभिवृद्धि और प्रसार के लिए व्यवस्था करना;

(ii) ऐसे विशेष केन्द्र और विशेषित प्रयोगशालाएं तथा अनुसंधान और शिक्षण के लिए ऐसी अन्य इकाइयां स्थापित करना जो उसके उद्देश्यों को अग्रसर करने के लिए आवश्यक हों; 

(iii) उपाधियों, डिप्लोमाओं, प्रमाणपत्रों के लिए या किसी अन्य प्रयोजन के लिए अध्ययन के पाठ्यकमों की योजना बनाना और उन्हें विहित करना;

(iv) ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विश्वविद्यालय अवधारित करे, परीक्षाओं, मूल्यांकन या परीक्षण की किसी अन्य प्रणाली के आधार पर डिप्लोमा या प्रमाणपत्र देना और उन्हें उपाधियां या अन्य विद्या संबंधी विशेष उपाधियां प्रदान करना तथा उचित और पर्याप्त कारण होने पर ऐसे डिप्लोमाओं, प्रमाणपत्रों, उपाधियों या अन्य विद्या संबंधी विशेष उपाधियों को वापस लेना;

(v) परिनियमों द्वारा विहित रीति से सम्मानिक उपाधियां या अन्य विशिष्टताएं प्रदान करना;

(vi) मुक्त अध्ययन कार्यक्रमों, निवेशबाह्य अध्ययन, प्रशिक्षण और विस्तार सेवाओं का आयोजन करना और उन्हें प्रारंभ करना;

(vii) विश्वविद्यालय द्वारा अपेक्षित चेयर्स, प्राचार्य, आचार्य, उपाचार्य और प्राध्यापक तथा अन्य अध्यापन और शैक्षणिक पद संस्थित करना और ऐसे चेयर्स, प्राचार्य, आचार्य, उपाचार्य और प्राध्यापक तथा अन्य अध्यापन और शैक्षणिक पदों पर व्यक्तियों को नियुक्त करना;

(viii) अभ्यागत आचार्यों, प्रतिष्ठित आचार्यों, परामर्शदाताओं, विद्वानों तथा ऐसे अन्य व्यक्तियों को संविदा पर या अन्यथा नियुक्त करना जो विश्वविद्यालय के उद्देश्यों की अभिवृद्धि में योगदान दे सकें;

(ix) व्यक्तियों को आचार्यों, उपाचार्यों या प्राध्यापकों के रूप में या अन्यथा विश्वविद्यालय के शिक्षकों के रूप में मान्यता देना;

(x) प्रशासनिक और ऐसे अन्य पदों का सृजन करना जिन्हें विश्वविद्यालय समय-समय पर आवश्यक समझे और उन पर नियुक्तियां करना;

(xi) सभी प्रवर्गों के कर्मचारियों की सेवा की शर्तें, जिनके अंतर्गत उनकी आचार संहिता भी है, अधिकथित करना;

(xii) ऐसे कैंपसों, केन्द्रों और प्रादेशिक केन्द्रों की स्थापना करना और उन्हें चलाना जो समय-समय पर अवधारित किए जाएं;

(xiii) अपनी अधिकारिता के भीतर अवस्थित संस्थाओं को विश्वविद्यालय संस्थाओं के रूप में अपने विशेषाधिकार देना और उन सभी या किन्हीं विशेषाधिकारों को ऐसी शर्तों के अनुसार जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं, वापस लेना;

(xiv) किसी अन्य विश्वविद्यालय या प्राधिकारी या उच्चतर शिक्षा संस्था या किसी अन्य ऐसे लोक या प्राइवेट निकाय के साथ, जो विश्वविद्यालय के प्रयोजनों और उद्देश्यों के संवर्धन की दृष्टि से विश्वविद्यालय के प्रयोजनों और उद्देश्यों के समान हो, ऐसी रीति में जो विहित की जाए और ऐसे प्रयोजनों के लिए जो विश्वविद्यालय अवधारित करे, या उन पर सहमत हो, सहकार या सहयोग करना या सहयोजित होना;

(xv) विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय द्वारा चलाई जा रही या उसके विशेषाधिकारों में सम्मिलित संस्थाओं में प्रवेश के लिए मानक अवधारित करना जिनके अंतर्गत परीक्षा, मूल्यांकन या परीक्षण की कोई अन्य प्रणाली भी है;

(xvi) ऐसी फीसों और अन्य प्रभारों की, जो विहित किए जाएं, मांग करना और उन्हें प्राप्त करना;

(xvii) छात्र-निवासों की स्थापना करना, ऐसे छात्र-निवासों और छात्रों के लिए अन्य आवासों को मान्यता देना, उनका मार्गदर्शन करना, उनका पर्यवेक्षण करना और नियंत्रण करना, जो विश्वविद्यालय द्वारा नहीं चलाए जा रहे हैं तथा ऐसी किसी मान्यता को वापस लेना;

(xviii) विश्वविद्यालय के छात्रों और कर्मचारियों के स्वास्थ्य तथा सामान्य कल्याण के संवर्धन के लिए       व्यवस्था करना;

(xix) छात्रों और कर्मचारियों में अनुशासन का विनियमन करना और लागू करना तथा इस संबंध में ऐसे अनुशासन संबंधी उपाय करना जो विश्वविद्यालय द्वारा आवश्यक समझे जाएं;

(xx) अध्येतावृत्ति, छात्रवृत्ति, अध्ययनवृत्ति और पुरस्कार संस्थित करना और प्रदान करना;

(xxi) विश्वविद्यालयों के प्रयोजनों या उद्देश्यों के लिए सार्क के मानदंडों के अनुसार शासी बोर्ड द्वारा बनाए गए विनियमों के अनुसार उपकृति, संदान और दान प्राप्त करना और किसी स्थावर या जंगम संपत्ति को, जिसके अतंर्गत न्यास और विन्यास संपत्ति भी है, अर्जित करना, धारण करना, उसका प्रबंध और व्ययन करना तथा ऐसी रीति में जो वह ठीक समझे, निधियां विनिहित करना;

(xxii) शासी बोर्ड के अनुमोदन से विश्वविद्यालय की संपत्ति की प्रतिभूति पर विश्वविद्यालय के प्रयोजनों के लिए धन उधार लेना;

(xxiii) किसी ऐसे प्रयोजन के लिए पूर्ण रूप से या भागतः किसी संस्था या उसके सदस्यों या छात्रों को ऐसे निबंधनों और शर्तों पर मान्यता देना जो समय-समय पर विहित की जाएं और ऐसी मान्यता को वापस लेना;

(xxiv) किसी अन्य संस्था के विश्वविद्यालय में निगमन के लिए और उसके अधिकारों, संपत्तियों और दायित्वों को ग्रहण करने के लिए तथा ऐसे किसी अन्य प्रयोजन के लिए जो इस अधिनियम के प्रतिकूल न हो, कोई करार करना;

(xxv) अनुसंधान और सलाहकार सेवाओं के लिए व्यवस्था करना और उस प्रयोजन के लिए अन्य संस्थाओं या निकायों से ऐसे ठहराव करना जो वह आवश्यक समझे;

(xxvi) ऐसे अनुसंधान और अन्य कार्य के, जो विश्वविद्यालय द्वारा जारी किए जाएं, मुद्रण, पुनःउत्पादन और प्रकाशन का उपबंध करना;

(xxvii) ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करना जो उसे करार के अधीन प्रदान की जाएं; और

(xxviii) ऐसे अन्य सभी कार्य करना जो उसके सभी या किन्हीं उद्देश्यों के संवर्धन के लिए आवश्यक, आनुषंगिक या सहायक हों ।

9. विश्वविद्यालय का सभी व्यक्तियों के लिए खुला होना-विश्वविद्यालय सभी व्यक्तियों के लिए चाहे वे किसी भी लिंग जाति, पंथ, निःशक्तता, नृवंशता या सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के हों, खुला होगा और विश्वविद्यालय के लिए यह विधिपूर्ण नहीं होगा कि वह किसी व्यक्ति को शिक्षक के रूप में नियुक्त किए जाने या उसमें कोई अन्य पद धारण करने या विश्वविद्यालय में छात्र के रूप में प्रवेश पाने या उसमें उपाधि प्राप्त करने या उसके किसी विशेषाधिकार का उपयोग या प्रयोग करने का हकदार बनाने के लिए धार्मिक विश्वास या मान्यता संबंधी मानदंड अपनाए या उन पर अधिरोपित करे ।

10. कुलाध्यक्ष-(1) सार्क के तत्समय अध्यक्ष देश का विदेश मंत्री विश्वविद्यालय का कुलाध्यक्ष होगा ।

(2) कुलाध्यक्ष को ऐसी शक्तियां होगी जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं । 

11. विश्वविद्यालय के अधिकारी-(1) विश्वविद्यालय का एक अध्यक्ष होगा और ऐसे अन्य अधिकारी होंगे जो ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, नियुक्त किए जाएंगे, जो ऐसी शक्तियों का पालन और कृत्यों का निर्वहन करेंगे, जो विहित किए जाएं ।

(2) अध्यक्ष, विश्वविद्यालय का मुख्य कार्यपालक अधिकारी होगा ।      

12. अध्यक्ष और उसकी शक्तियां-(1) अध्यक्ष शासी बोर्ड द्वारा ऐसी रीति में, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाए, नियुक्त किया जाएगा:

परंतु अध्यक्ष की नियुक्ति किए जाने तक, परियोजना कार्यालय का मुख्य कार्यपालक अधिकारी अध्यक्ष की शक्तियों का प्रयोग करेगा और विश्वविद्यालय के मुख्य कार्यपालक अधिकारी के रूप में कार्य करेगा ।

(2) अध्यक्ष, मुख्य कार्यपालक अधिकारी के रूप में विश्वविद्यालय के कार्यकलापों पर साधारण अधीक्षण और नियंत्रण रखेगा और विश्वविद्यालय के उद्देश्यों को कार्यान्वित करने तथा शासी बोर्ड के नीति निदेशकों को पूरा करने के लिए उत्तरदायी होगा ।

(3) अध्यक्ष, यदि उसकी यह राय है कि किसी विषय पर तुरंत कार्रवाई करना आवश्यक है तो इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी को प्रदत्त शक्ति का प्रयोग कर सकेगा और अपनी आगामी बैठक में, उस विषय पर उसके द्वारा की गई कार्रवाई की रिपोर्ट उस अधिकारी को देगाः

परंतु शक्ति का ऐसा प्रयोग केवल आपात स्िथतियों में ही किया जाएगा और किसी भी दशा में, पदों के सृजन और उन्नयन तथा उन पर नियुक्तियों के संबंध में नहीं किया जाएगाः

परंतु यह और कि यदि संबंधित प्राधिकारी की यह राय है कि ऐसी कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए थी तो वह उस विषय को शासी निकाय को निर्दिष्ट कर सकेगा, जिसका उस पर विनिश्चय अंतिम होगा ।

(4) अध्यक्ष, यदि उसकी यह राय है कि विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी का विनिश्चय इस अधिनियम और परिनियमों के उपबंधों द्वारा प्रदत्त प्राधिकारी की शक्तियां से परे है या किया गया कोई विनिश्चय विश्वविद्यालय के हित में नहीं है तो उस विनिश्चय के साठ दिन के भीतर संबंधित प्राधिकारी को अपने विनिश्चय का पुनर्विलोकन करने के लिए कह सकेगा और यदि अधिकारी विनिश्चय का पूर्णतः या भागतः पुनर्विलोकन करने से इंकार करता है या साठ दिन की उक्त अवधि के भीतर उसके द्वारा कोई विनिश्चय नहीं किया जाता है तो उस विषय को शासी बोर्ड को निर्दिष्ट किया जाएगा, जिसका उस पर विनिश्चय अंतिम होगा ।

(5) अध्यक्ष या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत विश्वविद्यालय के किसी अधिकारी को विश्वविद्यालय की ओर से करार करने, दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने तथा अभिलेखों को अधिप्रमाणित करने की शक्ति होगी ।

(6) अध्यक्ष ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करेगा, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं ।

13. अन्य अधिकारी-विश्वविद्यालय के अन्य अधिकारियों की नियुक्ति की रीति और शक्तियां तथा उनके कर्तव्य वे होंगे, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।

14. अध्यक्ष और शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के विशेषाधिकार तथा उन्मुक्ति-विश्वविद्यालय, अध्यक्ष और शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के सदस्य और जहां लागू हो, उनके आश्रित या कुटुंब के सदस्य ऐसे विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों का उपभोग करेंगे, जो केंद्रीय सरकार, संयुक्त राष्ट्र (विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां) अधिनियम, 1947 (1947 का 46) की धारा 3 के अधीन अधिसूचित करे ।

15. विश्वविद्यालय के प्राधिकारी-विश्वविद्यालय के निम्नलिखित प्राधिकारी होंगेः-

(क) कार्य परिषद्,

(ख) विद्या परिषद्, और

(ग) ऐसे अन्य प्राधिकारी, जो शासी बोर्ड द्वारा परिनियमों में विश्वविद्यालय के प्राधिकारी घोषित किए जाएं ।

16. कार्य परिषद्-(1) कार्य परिषद् विश्वविद्यालय का कार्यपालक निकाय होगा और अध्यक्ष तथा शासी निकाय के निदेशों या विनिश्चयों को प्रभावी करने के लिए शक्तियों का प्रयोग करेगा ।

(2) कार्य परिषद् का गठन, उसके सदस्यों की पदावधि और उनकी शक्तियां तथा कृत्य वे होंगे, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।

17. विद्या परिषद्-(1) विद्या परिषद् विश्वविद्यालय का प्रधान शैक्षणिक निकाय होगा इस अधिनियम, परिनियमों तथा विनियमों के अधीन रहते हुए, विश्वविद्यालय की शैक्षणिक नीतियों का समन्वय करेगा और उन पर साधारण पर्यवेक्षण रखेगा ।

(2) विद्या परिषद् का गठन, उसके सदस्यों की पदावधि और उनकी शक्तियां तथा कृत्य वे होंगे, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।

18. अन्य प्राधिकारियों का गठन-धारा 15 के खंड (ग) के अधीन प्राधिकारियों का गठन, ऐसे प्राधिकारियों के सदस्यों की पदावधि और उनकी शक्तियां तथा कृत्य वे होंगे, जो परिनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं ।

19. संकाय और विभाग-(1) विश्वविद्यालय के उतने संकाय होंगे, जितने परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।

(2) प्रत्येक संकाय में उतने विभाग या विद्यापीठ होंगे, जितने परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं और प्रत्येक विभाग या विद्यापीठ में ऐसे अध्ययन के विषय होंगे, जो विनियमों द्वारा उसे समनुदेशित किए जाएं ।

20. परिनियम-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, परिनियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्ः-

(क) कुलाध्यक्ष की शक्तियां;

(ख) शासी निकाय के अध्यक्ष की शक्तियां;

(ग) अध्यक्ष की नियुक्ति की रीति और उसकी शक्तियां;

(घ) कार्य परिषद्, विद्या परिषद् और विश्वविद्यालय के अन्य प्राधिकारियों तथा निकायों का गठन, उनकी शक्तियां और कृत्य; 

(ङ) शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के प्रवर्ग;

(च) विश्वविद्यालय के शिक्षकों, शैक्षणिक कर्मचारिवृंद और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति;

(छ) विश्वविद्यालय के संकायों की स्थापना;

(ज) वे शर्तें, जिनके अधीन संस्था को विश्वविद्यालय के विशेषाधिकार दिए जा सकेंगे और ऐसे विशेषाधिकारों को वापस लिया जाना;

(झ) सम्मानिक उपाधियां प्रदान करना;

(ञ) विश्वविद्यालय के प्राधिकारियों या अधिकारियों में निहित शक्तियों का प्रत्यायोजन;

(ट) कर्मचारियों या छात्रों और विश्वविद्यालय के बीच शिकायतों के निवारण के लिए तंत्र की स्थापना;

(ठ) ऐसे सभी अन्य विषय, जिनका इस अधिनियम के अनुसार परिनियमों द्वारा उपबंध किया जाना है या किया जाए ।

(2) प्रथम परिनियम वे होंगे, जो सार्क की अंतर-सरकारी परिचालन समिति द्वारा विश्वविद्यालय के प्रचालन के लिए बनाए जाएं ।

(3) शासी निकाय, समय-समय पर, नए या अतिरिक्त परिनियम बना सकेगा या उपधारा (2) में निर्दिष्ट परिनियमों को संशोधित या निरसित कर सकेगाः

परंतु शासी निकाय, विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी की प्रास्थिति, शक्तियों या गठन को प्रभावित करने वाले किसी परिनियम को तब तक नहीं बनाएगा, संशोधित या निरसित नहीं करेगा जब तक उस प्राधिकारी को प्रस्तावित परिवर्तनों के संबंध में लिखित में राय अभिव्यक्त करने का अवसर नहीं दिया गया है और इस प्रकार अभिव्यक्त की गई किसी राय पर शासी बोर्ड द्वारा विचार नहीं किया गया है ।

21. विनियम-(1) इस अधिनियम और परिनियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, विनियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्ः-

(क) विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय द्वारा चलाई जा रही और उसके प्राधिकार में सम्मिलित संस्थाओं में छात्रों का प्रवेश और उनका नाम दर्ज किया जाना;

(ख) विश्वविद्यालय की सभी उपाधियों, डिप्लोमाओं और प्रमाणपत्रों के लिए अधिकथित किए जाने वाले अध्ययन पाठ्यक्रम;

(ग) शिक्षा और परीक्षा का माध्यम;

(घ) उपाधि, डिप्लोमा, प्रमाणपत्र और अन्य विद्या संबंधी विशेष उपाधियां प्रदान करना, उनके लिए अर्हताएं और उन्हें प्रदान करने और प्राप्त करने के संबंध में किए जाने वाले उपाय;

(ङ) विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रमों और विश्वविद्यालय की परीक्षाओं, उपाधियों और डिप्लोमाओं में प्रवेश के लिए प्रभारित की जाने वाली फीस;

(च) अध्येतावृत्ति, छात्रवृत्ति, अध्ययनवृत्ति और पुरस्कारों का संस्थित किया जाना तथा उन्हें प्रदान किए जाने के लिए शर्तें;

(छ) परीक्षाओं का संलाचन, जिसके अंतर्गत परीक्षा निकायों, परीक्षकों और अनुसीमकों की पदावधि और नियुक्ति की रीति तथा उनके कर्तव्य भी हैं;

(ज) विश्वविद्यालय के छात्रों के निवास की शर्तें;

(झ) छात्राओं के निवास, अनुशासन और शिक्षण के लिए किए जाने वाले विशेष प्रबंध, यदि कोई हों, और उनके लिए विशेष पाठ्यक्रम विहित करना;

(ञ) केंन्द्रों, विश्वविद्यालय संस्थाओं, विभागों, विद्यापीठों, विद्या बोर्डों, विशेषित प्रयोगशालाओं और समितियों की स्थापना;

(ट) किसी ऐसे अन्य निकाय का, जो विश्वविद्यालय के शैक्षणिक जीवन का सुधार करने के लिए आवश्यक समझा जाए, सृजन, उसकी संरचना और उसके कृत्य;

(ठ) अन्य विश्वविद्यालयों, संस्थाओं और अन्य निकायों या संगमों के साथ सहकार और सहयोग करने की रीति;

(ड) ऐसे सभी अन्य विषय, जिनका इस अधिनियम या परिनियमों के अनुसार विनियमों द्वारा उपबंध किया जाना है या किया जाए ।

(2) प्रथम विनियम परियोजना कार्यालय के मुख्य कार्यपालक अधिकारी द्वारा अंतर-सरकारी परिचालन समिति के पूर्व अनुमोदन से बनाए जाएंगे और इस प्रकार बनाए गए विनियमों को शासी बोर्ड द्वारा किसी भी समय परिनियमों द्वारा विहित रीति में संशोधित, निरसित या परिवर्धित किया जा सकेगा ।

22. उपविधियां-विश्वविद्यालय के प्राधिकारी अपने कारबार के संचालन के लिए ऐसी रीति में, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाए, इस अधिनियम, परिनियमों और विनियमों से संगत ऐसी उपविधियां बना सकेंगे, जिनके लिए इस अधिनियम, परिनियमों या विनियमों द्वारा उपबंध नहीं किया गया है ।

23. परिनियमों और विनियमों को भूतलक्षी प्रभाव देने की शक्ति-परिनियम या विनियम बनाने की शक्ति में, परिनियमों या विनियमों या उनमें से किसी को ऐसी तारीख से, भूतलक्षी प्रभाव देने की शक्ति भी सम्मिलित है, जो इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से पूर्ववर्ती न हो, किंतु किसी परिनियम या विनियम को इस प्रकार भूतलक्षी प्रभाव नहीं दिया जाएगा जिससे किसी ऐसे व्यक्ति के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े, जिसको ऐसे परिनियम या विनियम लागू होते हैं ।

24. वार्षिक रिपोर्ट-(1) विश्वविद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट शासी बोर्ड के निदेश के अधीन तैयार की जाएगी और उस पर विश्वविद्यालय द्वारा अपनी वार्षिक बैठक में विचार किया जाएगा । विश्वविद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट सार्क की मंत्रि-परिषद् के सत्र में भी प्रस्तुत की जाएगी ।

(2) विश्वविद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट सार्क सचिवालय के माध्यम से सभी सार्क सदस्य राज्यों को परिचालित की जाएगी ।

25. लेखाओं की संपरीक्षा-(1) विश्वविद्यालय के लेखाओं की प्रत्येक वर्ष में कम से कम एक बार और पन्द्रह मास से अनधिक के अंतरालों पर शासी निकाय द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति या फर्म द्वारा संपरीक्षा की जाएगी ।

(2) विश्वविद्यालय के लेखाओं की सार्क द्वारा यथा अधिकथित विद्यमान मानकों के अनुसार संपरीक्षा की जाएगी ।

(3) लेखाओं को संपरीक्षित किए जाने के पश्चात् प्रकाशित किया जाएगा और संपरीक्षित रिपोर्ट के साथ लेखाओं की एक प्रति सार्क के महासचिव को प्रस्तुत की जाएगी ।

26. कर्मचारियों की सेवा की शर्तें-(1) विश्वविद्यालय का प्रत्येक कर्मचारी लिखित संविदा के अधीन नियुक्त किया जाएगा, जो विश्वविद्यालय के पास रखी जाएगी और उसकी एक प्रति संबंधित कर्मचारी को दी जाएगी ।

(2) विश्वविद्यालय और किसी कर्मचारी के बीच संविदा से उत्पन्न होने वाला कोई विवाद उस प्रयोजन के लिए गठित माध्यस्थम् अधिकरण को निर्दिष्ट किया जाएगा ।

(3) अधिकरण का विनिश्चय अंतिम होगा और अधिकरण द्वारा विनिश्िचत मामलों के संबंध में किसी न्यायालय में कोई वाद नहीं होगा ।

(4) उपधारा (2) के अधीन अधिकरण के कार्य को विनियमित करने की प्रक्रिया परिनियमों द्वारा विहित की जाएगी ।

27. छात्रों के विरुद्ध अनुशासनिक मामलों में माध्यस्थम् की प्रक्रिया-विश्वविद्यालय द्वारा किसी छात्र के विरुद्ध की गई किसी अनुशासनिक कार्रवाई से उत्पन्न होने वाला कोई विवाद उस छात्र के अनुरोध पर माध्यस्थम् अधिकरण को निर्दिष्ट किया जाएगा और धारा 26 की उपधारा (2), उपधारा (3) और उपधारा (4) के उपबंध इस धारा के अधीन किए गए निर्देश को यथाशक्य लागू होंगे ।

28. विश्वविद्यालय प्राधिकारियों या निकायों की कार्यवाहियां का रिक्तियों के कारण अविधिमान्य होना-विश्वविद्यालय या उसके किसी प्राधिकारी या अन्य निकाय का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि उसके सदस्यों में कोई रिक्ति या रिक्तियां विद्यमान हैं ।

29. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम के किसी उपबंध के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही विश्वविद्यालय, उसके किसी अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध नहीं होगी ।

30. सार्क माध्यस्थम् परिषद् को निर्देश-करार के निर्वचन या लागू होने के बारे में उत्पन्न होने वाले सभी मतभेद तभी सार्क माध्यस्थम् परिषद् को निर्दिष्ट किए जाएंगे जब पक्षकार किसी मामले में समाधान के किसी अन्य ढंग का आश्रय लेने के लिए सहमत हो जाएं ।

31. परिनियमों और विनियमों तथा उपविधियों का राजपत्र में प्रकाशित किया जाना और संसद् के समक्ष रखा जाना-(1) इस अधिनियम के अधीन बनाए गए परिनियमों, विनियमों या उपविधियों को राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा ।

(2) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक परिनियम, विनियम या बनाई गई उपविधि, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ।

32. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित ऐसे आदेश द्वारा, जो इस अधिनियम के उपबंधों से संगत हो और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो, उस कठिनाई को दूर कर सकेगीः

परन्तु इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ से तीन वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा

(2) उपधारा (1) के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

अनुसूची

(धारा 3 देखिए)

करार के उपबंधों को विधि का बल होना

अनुच्छेद 1

दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय की स्थापना

1. दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय (जिसे इसमें इसके पश्चात् विश्वविद्यालय" कहा गया है) नामक एक विश्वविद्यालय की स्थापना की जाती है, जो इस करार में उपवर्णित प्रयोजनों के लिए क्षेत्रीय आधार वाला एक अराज्यीय, अलाभकारी स्वशासी अंतर्राष्ट्रीय शिक्षण संस्था होगी और उसे अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए पूर्ण शैक्षिक स्वंतत्रता होगी ।

2. विश्वविद्यालय का मुख्य कैम्पस भारत में अवस्थित होगा ।

3. विश्वविद्यालय का पूर्ण विधिक व्यक्तित्व होगा ।

4. विश्वविद्यालय की विधिक क्षमता में, अन्य बातों के साथ, निम्नलिखित सम्मिलित होंगेः-

(क) उपाधियां, डिप्लोमे और प्रमाणपत्र प्रदान करने की शक्ति;

(ख) संविदा करने की क्षमता;

(ग) अपने नाम में वाद लाना और उसके विरुद्ध वाद लाया जाना;

(घ) संपत्तियां अर्जित करना, धारण करना और उनका व्ययन करना;

(ङ) क्षेत्र में कैंपस और केन्द्रों की स्थापना करना; और

(च) विश्वविद्यालय के प्रचालन के लिए नियम, विनियम और उपविधियां बनाना ।

अनुच्छेद 2

दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय के उद्देश्य और कृत्य

                विश्वविद्यालय के उद्देश्यों और कृत्यों में, अन्य बातों के साथ निम्नलिखित सम्मिलित होंगेः-

1. विश्व स्तर की ऐसी संस्था का सृजन करना, जो सभी दक्षिण एशियाई देशों के होनहार और अत्यन्त समर्पित छात्रों को, लिंग, जाति, पंथ, निःशक्तता, नृवंशता या सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि पर ध्यान दिए बिना, उन्हें उदारवादी और मानवीय शिक्षा देने और उन्हें कोई वृत्ति चलाने के लिए आवश्यक विश्लेषणात्मक साधन प्रदान करने तथा उनमें नेतृत्व के गुण पैदा करने के लिए एक साथ लाएगा;

2. ऐसे दक्षिण एशियाई शिक्षा समुदाय का निर्माण करना, जहां प्रत्येक छात्र अपनी पूर्णतम बौद्धिक क्षमता का विकास करने में समर्थ होगा और क्षेत्रीय चेतना को सुदृढ़ करके एक दक्षिण एशियाई समुदाय का सृजन करना;

3. मुख्यतः विज्ञान, प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में और उच्चतर शिक्षा के अन्य क्षेत्रों में दक्षिण एशियाई राष्ट्रों की क्षमता निर्माण के संबंध में शिक्षा प्रदान करना, जो उनके जीवन के स्तर को सुधारने के लिए आवश्यक है;

4. दक्षिण एशिया के भावी नेताओं को एक साथ लाते हुए और एक-दूसरे के परिप्रेक्ष्य की उनकी समझ में वृद्धि करके क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा का संवर्धन करने में योगदान देना;

5. छात्रों में उत्तम नागरिक चेतना का विकास करना और लोकतांत्रिक समाज के सफल नागरिक बनने के लिए उन्हें प्रशिक्षित करना ।

अनुच्छेद 3

वित्तपोषण

विश्वविद्यालय ऐसी अलाभकारी पब्लिक प्राइवेट भागीदारी होगी, जो सदस्य राज्यों की प्रत्येक राष्ट्रीय सरकार और अन्य स्रोतों से समर्थन लेगी, किंतु स्वशासी होगी और अपने न्यासी/शासी बोर्ड के प्रति उत्तरदायी होगी ।

 

अनुच्छेद 4

राजवित्तीय प्रास्थिति

1. विश्वविद्यालय और उसके कैम्पस तथा केंद्रों को, उस राज्य में, जहां वह अवस्थित है, विश्वविद्यालय की स्थापना और प्रचालन के लिए सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप के करों और शुल्कों का संदाय करने और संग्रहण करने से छूट होगी ।

2. विश्वविद्यालय पूर्विकताओं, उपयोगिताओं के लिए दरों और प्रभारों के संबंध में ऐसे व्यवहार का उपभोग करेगा, जो उससे कम अनुकूल नहीं है, जो राज्य के स्वामित्वाधीन उद्यमों और विश्वविद्यालयों को प्रदान किया जाता है ।

3. विश्वविद्यालय को, विश्वविद्यालय के उद्देश्यों के लिए नकद या वस्तु रूप में जीवनकालिक और वसीयती दान, अभिदाय और संदान प्राप्त करने का अधिकार है । किसी विधिक या भौतिक व्यक्ति से सभी ऐसे दान और संदान संबंधित संस्थापक राज्यों में ऐसे दाताओं या अभिदाताओं की आय के संबंध में किसी सीमा के बिना पूर्णतया कटौती योग्य हैं ।

4. विश्वविद्यालय द्वारा नियोजित संस्थापक राज्यों के नागरिकों के कराधान और सामाजिक संरक्षण संबंधित राज्यों के अपने-अपने राष्ट्रीय विधान के अनुसार विनियमित होंगे । आतिथेय देश से भिन्न राज्यों से विश्वविद्यालयों के कर्मचारी अपने देशों की आय-कर विधियों द्वारा शासित होंगे और आतिथेय देश की विधियों के अनुसार कराधेय नहीं होंगे ।

अनुच्छेद 5

शासन संरचना

1. विश्वविद्यालय प्रत्येक सदस्य राज्य के दो सदस्यों से मिलकर बने शासी बोर्ड द्वारा शासित होगा और उसका एक अध्यक्ष होगा । अध्यक्ष, शासी बोर्ड के सदस्यों में से निर्वाचित किया जाएगा ।

2. शासी बोर्ड का प्रत्येक सदस्य तीन वर्ष की निश्चित अवधि के लिए पद पर सेवा करेगा और लगातार दो अवधियों से अधिक के लिए पद धारण नहीं करेगा । सदस्यों का चयन, क्षेत्र के विशिष्ट व्यक्तियों में से किया जाएगा और वे विश्वविद्यालय की संपूर्ण नीतियों और निदेशों के लिए उत्तरदायी होंगे । शासी बोर्ड के अध्यक्ष की शक्ितयों और कृत्य तथा बोर्ड की भूमिका का विनिश्चय विश्वविद्यालय के नियमों और विनियमों के अनुसार किया जाएगा ।

3. विश्वविद्यालय का प्रधान शासी बोर्ड द्वारा नियुक्त अध्यक्ष होगा । उसकी नियुक्ति, पदावधि, शक्तियां और कृत्य विश्वविद्यालय के नियमों और विनियमों के अनुसार विनिश्चित किए जाएंगे ।

4. अध्यक्ष, मुख्य कार्यपालक अधिकारी तथा शासी बोर्ड का पदेन सदस्य भी होगा । अध्यक्ष, मुख्य कार्यपालक अधिकारी के रूप में बोर्ड को रिपोर्ट करेगा और बोर्ड के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेगा । वह विश्वविद्यालय के दृष्टिकोण और आधारभूत कथन को कार्यान्वित करने, विश्वविद्यालय के प्रयोजन और उद्देश्यों को सुनिश्चित करने, एक समान रूप से उच्च शैक्षिक मानदंडों को बनाए रखने और विश्वविद्यालय के बोर्ड के नीति निदेशों को पूरा करने के लिए उत्तरदायी होगा ।

5. विश्वविद्यालय के मुख्य कार्यपालक अधिकारी के रूप में अध्यक्ष शासी बोर्ड के निदेश के अधीन कार्य करेगा । अध्यक्ष की सहायता एक कार्यकारी परिषद् द्वारा की जाएगी । अध्यक्ष, उपविधियों के अनुसार, शिक्षा परिषद्, विभिन्न समितियां गठित करेगा और विश्वविद्यालय के प्रधान अधिकारियों की नियुक्ति करेगा ।

अनुच्छेद 6

वीजा और निवासी परमिट

सदस्य राज्य, छात्रों, संकाय और कर्मचारिवृंद को सभी सार्क सदस्य राज्यों में यात्रा के लिए समुचित वीजा प्रदान करेंगे और छात्रों, संकाय और प्रशासनिक कर्मचारिवृंद के लिए विश्वविद्यालय और उसके विभिन्न कैंपसों, केंद्रों और सहयोजित शिक्षा संस्थाओं में कार्य करने के लिए आवश्यक निवासी परमिट देंगे ।

अनुच्छेद 7

डिग्रियों की मान्यता

यह करार सभी सार्क सदस्य राज्यों में विश्वविद्यालय द्वारा प्रदान की गई डिग्रियों और प्रमाणपत्रों की संबंधित राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों/संस्थाओं द्वारा जारी की गई डिग्रियों और प्रमाणपत्रों के समरूप पारस्परिक मान्यता को सुकर बनाएगा ।

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