विक्रय संवर्द्धन कर्मचारी (सेवा शर्त) अधिनियम, 1976
(1976 का अधिनियम संख्यांक 11)
[25 जनवरी, 1976]
कतिपय स्थापनों में विक्रय संवर्द्धन कर्मचारियों की
सेवा की कतिपय शर्तों का विनियमन
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के छब्बीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार, प्रारम्भ और लागू होना-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम विक्रय संवर्द्धन कर्मचारी (सेवा शर्त) अधिनियम, 1976 है ।
(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे और विभिन्न राज्यों के लिए विभिन्न तारीखें नियत की जा सकती हैं ।
(4) यह प्रथमतः भैषजिक उद्योग में लगे हुए प्रत्येक स्थापन को लागू होगा ।
(5) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के उपबन्ध, किसी अधिसूचित उद्योग में लगे हुए किसी अन्य स्थापन को ऐसी तारीख से लागू कर सकती है जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) स्थापन" से ऐसा स्थापन अभिप्रेत है जो भैषजिक उद्योग में या किसी अधिसूचित उद्योग में लगा हुआ हो ;
(ख) अधिसूचित उद्योग" से ऐसा उद्योग अभिप्रेत है जो धारा 3 के अधीन उस रूप में घोषित किया गया हो ;
(ग) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
[(घ) विक्रय संवर्धन कर्मचारी" से किसी भी नाम से ज्ञात कोई ऐसा व्यक्ति (जिसके अन्तर्गत शिशु भी है) अभिप्रेत है जो विक्रय या कारबार, या दोनों, के संवर्धन से संबंधित किसी कार्य को करने के लिए, किसी स्थापन में भाड़े या पारिश्रमिक पर नियोजित है या लगा हुआ है, किन्तु इसके अन्तर्गत ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है :-
(i) जो पर्यवेक्षी हैसियत में नियोजित है या लगा हुआ है और जो एक हजार छह सौ रुपए प्रति मास से अधिक मजदूरी प्राप्त करता है ; या
(ii) जो मुख्य रूप से प्रबंधकीय या प्रशासनिक हैसियत में नियोजित है या लगा हुआ है ।
स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, किसी व्यक्ति की प्रतिमास मजदूरी वह रकम समझी जाएगीजो उस तारीख के, जिसके प्रति निर्देश से संगणना की जानी है, ठीक पूर्ववर्ती बारह मास की अवधि के भीतर आने वाली उसकी सेवा की निरन्तर अवधि की बाबत उसकी कुल मजदूरी को (चाहे उसमें कमीशन सम्मिलित हो या नहीं, या केवल कमीशन समाविष्ट हो) सेवा की इस अवधि में समाविष्ट दिनों की संख्या से विभाजित करने पर प्राप्त मजदूरी के तीस गुने के समतुल्य है ;]
(ङ) ऐसे सभी शब्दों और पदों के जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं किन्तु परिभाषित नहीं हैं और औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे जो उनके उस अधिनियम में हैं ।
3. कतिपय उद्योगों को अधिसूचित उद्योग घोषित करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-केन्द्रीय सरकार किसी ऐसे उद्योग की (जो भैषजिक उद्योग नहीं है) प्रकृति को, विक्रय या कारबार के या दोनों के संवर्द्धन से सम्बन्धित किसी कार्य के करने के लिए ऐसे उद्योग में नियोजित कर्मचारियों की संख्या को, ऐसे कर्मचारियों की सेवा की शर्तों को और ऐसी अन्य बातों को जो केन्द्रीय सरकार की राय में सुसंगत हों, ध्यान में रखते हुए, ऐसे उद्योग को इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अधिसूचित उद्योग घोषित कर सकती है ।
4. छुट्टी- [(1)] ऐसे अवकाश दिनों, आकस्मिक छुट्टी या अन्य प्रकार की छुट्टी, जो विहित की जाए, के अतिरिक्त । । । प्रत्येक विक्रय संवर्द्धन कर्मचारी को, यदि वह ऐसा निवेदन करे तो-
(क) ड्यूटी पर बिताई गई अवधि के एक बटा ग्यारह से अन्यून अवधि के लिए पूरी मजदूरी पर उपार्जित छुट्टी मंजूर की जाएगी ;
(ख) सेवा की अवधि के एक बटा अठारह से अन्यून अवधि के लिए आधी मजदूरी पर चिकित्सा-प्रमाणपत्र के आधार पर छुट्टी मंजूर की जाएगी ।
[(2) ऐसी अधिकतम सीमा जिस तक विक्रय संवर्धन कर्मचारी उपार्जित छुट्टी संचित कर सकेगा, वह होगी जो विहित की जाए ।
(3) ऐसी सीमा, जिस तक विक्रय संवर्धन कर्मचारी द्वारा किसी एक समय पर उपार्जित छुट्टी ली जा सकती है और जिन कारणों से ऐसी सीमा से अधिक छुट्टी ली जा सकती है वे होंगे जो विहित किए जाएं ।
(4) कोई विक्रय संवर्धन कर्मचारी,-
(क) जब वह अपना पद स्वेच्छया त्याग देता है या सेवा निवृत्त हो जाता है ; या
(ख) जब उसकी सेवा किसी भी कारण से समाप्त कर दी जाती है (जो दंड के रूप में समाप्ति न हो),
तब वह ऐसी उपार्जित छुट्टी की बाबत, जो उसने उपार्जित की है और जिसका उपभोग नहीं किया गया है, नकद प्रतिकर का हकदार ऐसी शर्तों और निर्बन्धनों के अधीन रहते हुए होगा, जो विहित किए जाएं (जिनके अंतर्गत ऐसी अधिकतम अवधि विनिर्दिष्ट करने वाली शर्तें भी हैं जिसके लिए नकद प्रतिकर संदेय होगा) ।
(5) जहां विक्रय संवर्धन कर्मचारी की मृत्यु सेवा में रहते हुए हो जाती है वहां ऐसी उपार्जित छुट्टी के लिए जो उसने उपार्जित की है और जिसका उपभोग नहीं किया गया है, उसके वारिस नकद प्रतिकर के हकदार होंगे ।
(6) वह नकद प्रतिकर जो विक्रय संवर्धन कर्मचारी या उसके वारिसों को, उपधारा (4) या उपधारा (5) के अधीन, उपार्जित छुट्टी की किसी ऐसी अवधि की बाबत संदेय होगा जिसके लिए ऐसा कर्मचारी या उसका वारिस नकद प्रतिकर का हकदार है या हैं, वह रकम होगी जो ऐसी अवधि के लिए ऐसे विक्रय संवर्धन कर्मचारी को शोध्य मजदूरी के बराबर हो ।]
5. नियुक्ति-पत्र का जारी किया जाना-किसी विक्रय संवर्द्धन कर्मचारी के संबंध में प्रत्येक नियोजक ऐसे कर्मचारी को नियुक्ति-पत्र, ऐसे प्ररूप में जो विहित किया जाए,-
(क) ऐसी दशा में जब वह इस अधिनियम के प्रारम्भ पर उस हैसियत में पद धारण करता हो, ऐसे प्रारम्भ के तीन मास के भीतर देगा ; और
(ख) किसी अन्य दशा में उस हैसियत में उसकी नियुक्ति पर देगा ।
6. विक्रय संवर्द्धन कर्मचारियों को कतिपय अधिनियमों का लागू होना-(1) तत्समय यथा प्रवृत्त कर्मकार प्रतिकर अधिनियम, 1923 (1923 का 8) के उपबन्ध विक्रय संवर्द्धन कर्मचारियों को या उनके सम्बन्ध में उसी प्रकार लागू होंगे जिस प्रकार वे उस अधिनियम के अर्थ में कर्मकारों को या उनके सम्बन्ध में लागू होते हैं ।
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(3) तत्समय यथा प्रवृत्त न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 (1948 का 11) के उपबन्ध विक्रय संवर्द्धन कर्मचारियों को या उनके सम्बन्ध में उसी प्रकार लागू होंगे जिस प्रकार वे उस अधिनियम के अर्थ में कर्मचारियों को या उनके सम्बन्ध में लागू होते हैं ।
(4) तत्समय यथा प्रवृत्त प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम, 1961 (1961 का 53) के उपबन्ध उन विक्रय संवर्द्धन कर्मचारियों को जो स्त्री हैं या उनके सम्बन्ध में उसी प्रकार लागू होंगे जिस प्रकार वे उस अधिनियम के अर्थ में किसी स्थापन में मजदूरी पर नियोजित स्त्रियों को या उनके सम्बन्ध में लागू होते हैं, चाहे वे सीधे नियोजित हों या किसी अभिकरण के माध्यम से ।
(5) तत्समय यथा प्रवृत्त बोनस संदाय अधिनियम, 1965 (1965 का 21) के उपबन्ध विक्रय संवर्द्धन कर्मचारियों को या उनके सम्बन्ध में उसी प्रकार लागू होंगे जिस प्रकार वे उस अधिनियम के अर्थ में कर्मचारियों को या उनके सम्बन्ध में लागू होते हैं ।
(6) तत्समय यथा प्रवृत्त उपदान संदाय अधिनियम, 1972 (1972 का 39) के उपबन्ध विक्रय संवर्द्धन कर्मचारियों को या उनके सम्बन्ध में उसी प्रकार लागू होंगे जिस प्रकार वे उस अधिनियम के अर्थ में कर्मचारियों को या उनके सम्बन्ध में लागू होते हैं ।
[(7) पूर्वगामी उपधाराओं में किसी बात के होते हुए भी,-
(क) उक्त उपधाराओं में से किसी में निर्दिष्ट किसी अधिनियम को विक्रय संवर्द्धन कर्मचारियों को लागू करने में, ऐसे अधिनियम के प्रयोजनों के लिए विक्रय संवर्द्धन कर्मचारी की मजदूरी, इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार संगणित उसकी मजदूरी समझी जाएगी ;
(ख) जहां उक्त उपधाराओं में से किसी में निर्दिष्ट कोई अधिनियम मजदूरी के बारे में अधिकतम सीमा के लिए ऐसा उपबंध करता है जिससे कि ऐसे व्यक्तियों को, जिनकी मजदूरी ऐसी अधिकतम सीमा से अधिक है, ऐसे अधिनियम के लागू होने की परिधि से अपवर्जित किया जा सकता है, तो वहां ऐसा अधिनियम ऐसे विक्रय संवर्धन कर्मचारी को लागू नहीं होगा जिसको इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार संगणित मजदूरी ऐसी अधिकतम सीमा से अधिक है ।]
7. रजिस्टरों का बनाए रखना-किसी स्थापन के संबंध में प्रत्येक नियोजक ऐसे रजिस्टर और अन्य दस्तावेजें जो विहित की जाएं, ऐसी रीति से रखेगा और बनाए रखेगा जो विहित की जाए ।
8. निरीक्षक-(1) राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे व्यक्तियों को जिन्हें वह ठीक समझे, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए निरीक्षक नियुक्त कर सकती है और ऐसी स्थानीय सीमाओं को परिनिश्चित कर सकती है जिनके भीतर वे अपने कृत्यों का प्रयोग करेंगे ।
(2) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त किया गया निरीक्षक, यह अभिनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए कि इस अधिनियम के किन्हीं उपबन्धों का किसी स्थापन की बाबत अनुपालन किया गया है या नहीं,-
(क) किसी नियोजक से ऐसी जानकारी जो वह आवश्यक समझे, देने के लिए अपेक्षा कर सकता है ;
(ख) किसी युक्तियुक्त समय पर स्थापन या उससे सम्बद्ध किसी परिसर में प्रवेश कर सकता है और किसी ऐसे व्यक्ति से जो उसका भारसाधक हो, विक्रय संवर्द्धन कर्मचारियों के नियोजन से सम्बन्धित रजिस्टर या अन्य दस्तावेजें परीक्षा के लिए अपने समक्ष प्रस्तुत किए जाने के लिए अपेक्षा कर सकता है ;
(ग) पूर्वोक्त किन्हीं प्रयोजनों से सुसंगत किसी बात की बाबत नियोजक, उसके अभिकर्ता या सेवक या किसी अन्य व्यक्ति की जो उस स्थापन या उससे सम्बद्ध किसी परिसर का भारसाधक हो या किसी ऐसे व्यक्ति की परीक्षा कर सकता है जिसके बारे में निरीक्षक के पास यह विश्वास करने का युक्तियुक्त हेतुक हो कि वह स्थापन में कोई विक्रय संवर्द्धन कर्मचारी है या रहा है ;
(घ) इस अधिनियम के अधीन उस स्थापन के सम्बन्ध में बनाए रखे गए किसी रजिस्टर या अन्य दस्तावेज की नकल कर सकता है या उससे उद्घरण ले सकता है ;
(ङ) ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग कर सकता है जो विहित की जाएं ।
(3) प्रत्येक निरीक्षक भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझा जाएगा ।
(4) उपधारा (2) के अधीन किसी निरीक्षक द्वारा कोई रजिस्टर या अन्य दस्तावेज पेश करने के लिए या जानकारी देने के लिए अपेक्षित कोई व्यक्ति ऐसा करने के लिए वैध रूप से आबद्ध होगा ।
9. शास्ति-यदि कोई नियोजक धारा 4 या धारा 5 या धारा 7 के, या इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों के, उपबन्धों का उल्लंघन करेगा तो वह जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।
10. कम्पनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है वहां प्रत्येक व्यक्ति जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कम्पनी भी ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने के भागी होंगे :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को इस धारा में उपबन्धित किसी दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है तथा यह साबित होता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने का भागी होगा ।
(3) इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-
(क) कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है ; तथा
(ख) फर्म के सम्बन्ध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
11. अपराधों का संज्ञान-(1) महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट के न्यायालय से अवर कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।
(2) कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का संज्ञान तभी करेगा जब कि उसका परिवाद उस तारीख से जिसको अपराध का किया जाना अभिकथित है, छह मास के भीतर किया गया हो ।
[11क. इस अधिनियम से असंगत विधियों और करारों का प्रभाव-(1) इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम के उपबंध, किसी अन्य विधि में या इस अधिनियम के प्रवर्तन के पूर्व या पश्चात् किए गए किसी अधिनिर्णय, करार, समझौते या सेवा-संविदा के निबंधनों में अंतर्विष्ट उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे :
परन्तु जहां कोई विक्रय संवर्द्धन कर्मचारी ऐसी किसी विधि, अधिनिर्णय, करार, समझौते या सेवा-संविदा के अधीन किसी विषय के संबंध में ऐसे फायदों का हकदार है जो उसके लिए उन फायदों से अधिक अनुकूल हैं जिनका वह इस अधिनियम के अधीन हकदार है तो वह उस विषय के संबंध में उन अधिक अनुकूल फायदों का इस बात के होते हुए भी हकदार बना रहेगा कि वह अन्य विषयों के संबंध में इस अधिनियम के अधीन फायदे प्राप्त करने का हकदार है ।
(2) इस अधिनियम की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह किसी विक्रय संवर्द्धन कर्मचारी को किसी विषय के संबंध में ऐसे अधिकार या विशेषाधिकार, जो उसके लिए उन फायदों से अधिक अनुकूल हैं जिनका वह इस अधिनियम के अधीन हकदार है, अनुदत्त किए जाने के लिए अपने नियोजक के साथ कोई करार करने से रोकती है ।]
12. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकती है ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित के लिए उपबंध कर सकते हैं, अर्थात् :-
(क) छुट्टी के प्रकार जो धारा 4 के अधीन किसी विक्रय संवर्द्धन कर्मचारी को मंजूरी की जा सकती है, [वह सीमा जिस तक वह उपार्जित छुट्टी संचित कर सकता है, वह सीमा जिस तक वह किसी एक समय पर उपार्जित छुट्टी ले सकता है और वे कारण जिन कारणों से ऐसी सीमा से अधिक छुट्टी, ली जा सकती है, ऐसी शर्तें और निर्बन्धन जिनके अधीन वह नकद प्रतिकर का हकदार हो सकता है ;ट
(ख) धारा 5 के अधीन दिए जाने वाले नियुक्ति-पत्र का प्ररूप ;
(ग) धारा 7 के अधीन रखे जाने वाले और बनाए रखे जाने वाले रजिस्टर और अन्य दस्तावेजें और वह रीति जिससे ऐसे रजिस्टर और अन्य दस्तावेजें रखी और बनाई रखी जा सकेंगी ;
(घ) कोई अन्य बात जो विहित की जानी है या की जा सकती है ।
(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
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