लागत और संकर्म लेखापाल अधिनियम, 1959
(1959 का अधिनियम संख्यांक 23)
[19 मई, 1959]
लागत और संकर्म लेखापालों की वृत्ति के
विनियमन के लिए उपबन्ध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के दसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम लागत और संकर्म लेखापाल अधिनियम,1959 है ।
(2) इसका विस्तार ॥। समस्त भारत पर है ।
(3) यह ऐसी तारीख को लागू होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं और निर्वचन-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) सहयुक्त" से संस्थान का सहयुक्त सदस्य अभिप्रेत है;
[(कक) प्राधिकरण" से धारा 22क में निर्दिष्ट अपील प्राधिकरण अभिप्रेत है;
(ककक) बोर्ड" से धारा 29क के अधीन गठित क्वालिटी पुनर्विलोकन बोर्ड अभिप्रेत है;]
(ख) लागत लेखापाल" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जो संस्थान का सदस्य है;
(ग) परिषद्" से संस्थान की परिषद् अभिप्रेत है;
(घ) विघटित कम्पनी" से कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन रजिस्ट्रीकृत लागत और संकर्म लेखापालों का संस्थान अभिप्रेत है;
(ङ) अध्येता" से संस्थान का अध्येता अभिप्रेत है;
[(ङक) फर्म" का वही अर्थ होगा जो भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (1932 का 9) की धारा 4 में है और उसके अंतर्गत संस्थान में रजिस्ट्रीकृत, -
(i) सीमित दायित्व भागीदारी अधिनियम, 2008 (2009 का 6) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ढ) में यथा परिभाषित सीमित दायित्व भागीदारी; या
(ii) एकमात्र स्वत्वधारी,
भी है;]
(च) संस्थान" से इस अधिनियम के अधीन गठित [भारतीय लागत लेखापाल संस्थान] अभिप्रेत है;
4[(चक) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;]
[(चख) भागीदार" का वही अर्थ होगा, जो, यथास्थिति, भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (1932 का 9) की धारा 4 या सीमित दायित्व भागीदारी अधिनियम, 2008 (2009 की धारा 6) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (थ) में है;
(चग) भागीदारी" से निम्नलिखित अभिप्रेत है-
(अ) भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (1932 का 9) की धारा 4 में यथा परिभाषित भागीदारी; या
(आ) ऐसी कोई सीमित दायित्व भागीदारी, जिसमें उसके भागीदार के रूप में कोई कंपनी नहीं है;]
(छ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बने विनियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(ज) अध्यक्ष" से परिषद् का अध्यक्ष अभिप्रेत है;
(झ) रजिस्टर" से इस अधिनियम के अधीन रखा गया सदस्यों का रजिस्टर अभिप्रेत है;
[(झक) विनिर्दिष्ट" से इस अधिनियम के अधीन केंद्रीय सरकार द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा विनिर्दिष्ट अभिप्रेत है;
1[(झकक) एकमात्र स्वत्वधारी" से ऐसा कोई व्यष्टि अभिप्रेत है जो अपने को लागत लेखाकर्म के व्यवसाय में लगाता है या जो उपधारा (2) के खंड (ii) से खंड (iv) में निर्दिष्ट सेवाओं को करने की प्रस्थापना करता है;]
(झख) अधिकरण" से धारा 10ख की उपधारा (1) के अधीन स्थापित अधिकरण अभिप्रेत है;]
(ञ) उपाध्यक्ष" से परिषद् का उपाध्यक्ष अभिप्रेत है;
(ट) वर्ष" से वह कालावधि अभिप्रेत है, जो किसी वर्ष की पहली अप्रैल को प्रारंभ होती है और उत्तरवर्ती वर्ष के 31 मार्च को समाप्त होती है ।
(2) इस अधिनियम में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, संस्थान के किसी सदस्य के बारे में जबकि वह व्यष्टितः या व्यवसाय करते हुए इस संस्थान के एक या अधिक सदस्यों के साथ भागीदारी में 1[या ऐसे अन्य मान्यताप्राप्त वृत्ति के, जो विहित किए जाएं, सदस्यों के साथ भागीदारी में] प्राप्त हुए या प्राप्त होने वाले पारिश्रमिक के प्रतिफलस्वरूप-
(i) अपने को [लागत लेखाकर्म] के व्यवसाय में लगाता है, या
(ii) ऐसी सेवाएं जिनमें माल या सेवाओं की लागत निर्धारण या मूल्यांकन या 3[लागत लेखाकर्म और संबंधित विवरणों की तैयारी, सत्यापन, संपरीक्षा या प्रमाणन अंतर्वलित है, करने का आफर करता है या वैसी सेवाएं करता है या अपने को लोकसाधारण में व्यवसायरत लागत लेखापाल के रूप में प्रकट करता है,] या
(iii) लागत लेखा प्रक्रिया या लागत लगाने वाले तथ्यों या आकड़ों के अभिलेखन, प्रस्तुतीकरण या प्रमाणन से संबंधित सिद्धांत या ब्यौरे की बातों पर या के बारे में वृत्तिक सेवाएं या सहायता करता है, या
(iv) ऐसी अन्य सेवाएं करता है, जिनकी बाबत परिषद् की राय है कि वे व्यवसाय करने वाले किसी लागत लेखापाल द्वारा की जाती है या की जा सकती है, यह समझा जाएगा कि वह व्यवसाय कर रहा है",
तथा व्यवसाय कर रहा है" शब्दों का उनके व्याकरणिक रूप-भेदों और सजातीय पदों सहित तदनुसार अर्थान्वयन किया जाएगा ।
स्पष्टीकरण-संस्थान के ऐसे सदस्य के बारे में, जो कि किसी व्यक्ति का पूर्णकालिक वेतन पाने वाला कर्मचारी है, यह नहीं समझा जाएगा कि वह इस उपधारा के अर्थ में व्यवसाय कर रहा है ।
अध्याय 2
लागत और संकर्म लेखापालों का संस्थान
3. संस्थान का निगमन-(1) उन सभी व्यक्तियों को, जिनके नाम इस अधिनियम के प्रारंभ में रजिस्टर में प्रविष्ट हैं, और उन सभी व्यक्तियों को, जो अपने नाम इसके पश्चात् इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रजिस्टर में प्रविष्ट करवा लें, एतद्द्वारा [भारतीय लागत लेखापाल संस्थान] के नाम से उस समय तक एक निगमित निकाय के रूप में गठित किया जाता है, जब तक वे अपना नाम उन रजिस्टरों में बने रहने देते हैं और ऐसे सभी व्यक्ति संस्थान के सदस्यों के रूप में जाने जाएंगे ।
(2) संस्थान का शाश्वत उत्तराधिकार और एक सामान्य मुद्रा होगी और उससे जंगम और स्थावर दोनों ही प्रकार की संपत्ति को अर्जित करने, धारण करने और व्ययन करने की शक्ति प्राप्त होगी, और वह अपने नाम से वाद चला सकेगा या उसके नाम से उसके विरुद्ध वाद चलाया जा सकेगा ।
4. रजिस्टर में नामों की प्रविष्टि-(1) निम्नलिखित व्यक्तियों में से कोई भी व्यक्ति रजिस्टर में अपना नाम दर्ज करवाने के लिए हकदार होगा, अर्थात्: -
(i) ऐसे किसी व्यक्ति के सिवाय जो भारत का स्थायी निवासी नहीं है और इस अधिनियम के प्रारंभ पर भारत में लागत लेखापाल के रूप में व्यवसाय नहीं कर रहा है, ऐसा कोई व्यक्ति, जो ऐसे प्रारंभ से ठीक पूर्व विघटित कंपनी का (उसके सम्मानिक सहयोगी या सम्मानिक अध्येता से भिन्न) सहयोगी या अध्येता था;
(ii) ऐसा कोई व्यक्ति, जिसने ऐसी परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है और ऐसा प्रशिक्षण पूर्ण कर लिया है, जैसा कि संस्थान के सदस्यों के लिए विहित किया जाए;
(iii) ऐसा कोई व्यक्ति, जो कि इस अधिनियम के प्रारंभ में, भारत में लागत लेखापाल के व्यवसाय में लगा है और जो किसी शर्तें पूरी करता है, जिन्हें इस निमित्त केन्द्रीय सरकार या परिषद् विनिर्दिष्ट करें;
(iv) ऐसा कोई व्यक्ति, जिसने भारत के बाहर ऐसी अन्य परीक्षा उत्तीर्ण की है और ऐसा अन्य प्रशिक्षण पूर्ण किया है जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा या परिषद् द्वारा संस्थान के सदस्यों के लिए विहित परीक्षा और प्रशिक्षण के समतुल्य के रूप में मान्यता दी गई है:
परन्तु ऐसे किसी व्यक्ति की दशा में, जो भारत में स्थायी रूप में निवास नहीं कर रहा है, केन्द्रीय सरकार या परिषद् ऐसी अतिरिक्त शर्तें अधिरोपित कर सकेगी, जैसी कि वह ठीक समझे;
(v) भारत में अधिवसित कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के प्रारंभ में किसी विदेशी परीक्षा के लिए अध्ययन कर रहा है, और साथ-साथ, चाहे भारत में या भारत के बाहर, प्रशिक्षण ले रहा है, या जो ऐसी परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् इस अधिनियम के प्रारंभ पर, चाहे भारत में या भारत के बाहर प्रशिक्षण ले रहा है:
परन्तु यह तब जबकि ऐसी विदेशी परीक्षा और प्रशिक्षण को केन्द्रीय सरकार या परिषद् द्वारा इस निमित्त मान्यता दी गई हो:
परन्तु यह और भी कि इस अधिनियम के प्रारंभ से पांच वर्ष के अन्दर, ऐसा व्यक्ति अपनी परीक्षा उत्तीर्ण कर लेता है और अपना प्रशिक्षण पूर्ण कर लेता है ।
(2) उपधारा (1) के खण्ड (i) में वर्णित वर्ग का प्रत्येक व्यक्ति, प्रवेश फीस दिए बिना रजिस्टर में अपना नाम दर्ज करवाएगा ।
[(3) उपधारा (1) के खंड (ii), (iii), (iv) और (v) में वर्णित वर्गों में से किसी वर्ग का प्रत्येक व्यक्ति विहित रीति से आवेदन किए जाने पर और उसके अनुज्ञात होने और ऐसी फीसों के संदाय पर जो परिषद् द्वारा, अधिसूचना द्वारा, अवधारित की जाए, जो तीन हजार रुपए से अधिक की नहीं होगी, रजिस्टर में अपना नाम प्रविष्ट करवाएगा:
परंतु परिषद्, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, तीन हजार रुपए से अधिक की फीस अवधारित कर सकेगी जो किसी भी दशा में छह हजार रुपए से अधिक नहीं होगी ।]
(4) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रारंभ पर, उपधारा (1) के खण्ड (i) में वर्णित वर्ग के सभी व्यक्तियों के नाम रजिस्टर में प्रविष्ट करवाने के लिए ऐसी कार्यवाही करेगा जैसी इस प्रयोजन के लिए आवश्यक हो ।
5. अध्येता और सहयुक्त-(1) संस्थान के सदस्यों को दो वर्गों में विभाजित किया जाएगा जिनको क्रमशः सहयोगी और अध्येता अभिहित किया गया है ।
(2) ऐसे व्यक्ति से, जिसको उपधारा (3) के उपबन्ध लागू होते हैं, भिन्न किसी व्यक्ति के बारे में, उसका नाम रजिस्टर में प्रविष्ट हो जाने पर यह समझा जाएगा कि वह संस्थान का सहयुक्त सदस्य हो गया है और जब तक उसका नाम इस प्रकार प्रविष्ट रहता है, तब तक वह अपने नाम के आगे [ए० सी० एम० ए०] अक्षरों को यह उपदर्शित करने के लिए प्रयोग करने का हकदार होगा कि वह 2[भारतीय लागत लेखापाल संस्थान] का सहयुक्त सदस्य है ।
(3) किसी व्यक्ति की, जो कि विघटित कम्पनी का अध्येता था और जो धारा 4 की उपधारा (1) के खण्ड (i) के अधीन रजिस्टर में अपना नाम प्रविष्ट करवाने का हकदार है, रजिस्टर में संस्थान के अध्येता के रूप में प्रविष्ट किया जाएगा ।
[(4) कोई भी सदस्य जो सहयुक्त है और जो चाहे इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व या पश्चात् या भागतः इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व और भागतः इसके पश्चात्, भारत में कम-से-कम पांच वर्ष तक लगातार व्यवसाय कर रहा है तथा ऐसा कोई सदस्य, जो कम-से-कम पांच वर्ष की कालावधि तक लगातार सहयुक्त रहा है और जिसके पास ऐसी अर्हताएं हैं जिन्हें परिषद् यह सुनिश्चित करने की दृष्टि से विहित करे कि उसका अनुभव लागत लेखापाल के रूप में पांच वर्ष की कालावधि तक के लगातार व्यवसाय करने के परिणामस्वरूप प्रसामान्यतः हो जाने वाले अनुभव के समतुल्य है, ऐसी फीसों के संदाय पर जो परिषद् द्वारा अधिसूचना द्वारा अवधारित की जाएं जो पांच हजार रुपए से अधिक नहीं होंगी और विहित रीति से आवेदन किए जाने पर और उसके अनुज्ञात होने पर रजिस्टर में संस्थान के अध्येता के रूप में प्रविष्ट किया जाएगा :
परंतु परिषद्, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, पांच हजार रुपए से अधिक की फीस अवधारित कर सकेगी जो किसी भी दशा में दस हजार रुपए से अधिक नहीं होगी ।
स्पष्टीकरण 1-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, किसी व्यक्ति के बारे में, इस बात के होते हुए भी कि उस कालावधि में उसने वास्तविक रूप में व्यवसाय नहीं किया है, यह समझा जाएगा कि उसने ऐसी कालावधि तक भारत में वह व्यवसाय किया है जिसके लिए उसके पास धारा 6 के अधीन व्यवसाय का प्रमाणपत्र है ।
स्पष्टीकरण 2-उस लगातार कालावधि की, जिसके दौरान कोई व्यक्ति संस्थान का सहयुक्त रहा है, संगणना करने में ऐसी लगातार अवधि सम्मिलित की जाएगी जिसके दौरान वह व्यक्ति संस्थान का सहयुक्त होने से ठीक पूर्व विघटित कंपनी का सहयुक्त रहा है ।]
(5) कोई व्यक्ति जिसका नाम रजिस्टर में संस्थान के अध्येता के रूप में प्रविष्ट है, जब तक उसका नाम उसमें प्रविष्ट रहता है, तब तक वह अपने नाम के आने [ए० सी० एम० ए०] अक्षरों का यह उपदर्शित करने के लिए प्रयोग करने का हकदार होगा कि वह 1[भारतीय लागत लेखापाल संस्थान] का अध्येता है ।
6. व्यवसाय का प्रमाणपत्र-(1) संस्थान का कोई भी सदस्य, चाहे भारत में या अन्यत्र तब तक व्यवसाय करने का हकदार नहीं होगा, जब तक कि उसने परिषद् से व्यवसाय-प्रमाणपत्र अभिप्राप्त न कर लिया हो ।
[(2) प्रत्येक ऐसा सदस्य अपने प्रमाणपत्र के लिए ऐसे प्ररूप में आवेदन करेगा और ऐसी वार्षिक फीस का संदाय करेगा जो परिषद् द्वारा, अधिसूचना द्वारा, अवधारित की जाए और जो तीन हजार रुपए से अधिक नहीं होगी और ऐसी फीस प्रत्येक वर्ष में 1 अप्रैल को या उससे पूर्व देय होगी:
परंतु परिषद्, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, तीन हजार रुपए से अधिक की फीस अवधारित कर सकेगी जो किसी भी दशा में छह हजार रुपए से अधिक नहीं होगी:
परंतु यह और कि यदि संस्थान के किसी सदस्य ने जो इस अधिनियम के प्रारंभ से ठीक पूर्व व्यवसाय कर रहा था, ऐसे प्रारंभ से एक मास के अंदर व्यवसाय प्रमाणपत्र दिए जाने के लिए आवेदन दिया है तो उसके बारे में इस कारण कि उसने ऐसे प्रारंभ और आवेदन के निपटारे के बीच की अवधि के दौरान व्यवसाय किया है, यह नहीं समझा जाएगा कि उसने उपधारा (1) के उपबंधों का उल्लंघन किया है ।]
[(3) उपधारा (1) के अधीन अभिप्राप्त किया गया व्यवसाय-प्रमाणपत्र परिषद् द्वारा ऐसी परिस्थितियों में, जो विहित की जाएं, रद्द किया जा सकेगा ।]
7. सदस्यों का लागत लेखापाल के रूप में ज्ञात होना-संस्थान का हर सदस्य, जो व्यवसाय कर रहा है, लागत लेखापाल अभिधान प्रयुक्त करेगा और अन्य कोई सदस्य यह अभिधान प्रयुक्त कर सकेगा और ऐसे अभिधान का प्रयोग करने वाला कोई सदस्य किसी अन्य अभिवर्णन का प्रयोग नहीं करेगा भले ही वह उसके अतिरिक्त हो या उसके बदले में हो:
परन्तु इस धारा की किसी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह ऐसे किसी सदस्य को उस दशा में अपने नाम के साथ ऐसा कोई अन्य अभिवर्णन या अक्षर जबकि वह उसका हकदार है, जो ऐसे लेखाकर्म संस्थान की चाहे भारत में है या अन्यत्र सदस्यता उपदर्शित करता है और परिषद् द्वारा इस निमित्त मान्यता प्राप्त हो, या किसी अन्य अर्हता की जो उसके पास हो, जोड़ने से प्रतिषिद्ध करती है या किसी फर्म को, जिसके सभी भागीदार संस्थान के सदस्य हैं और व्यवसाय कर रहे हैं, लागत लेखापाल फर्म के नाम से ज्ञात होने से प्रतिषिद्ध करती है ।
8. निर्योग्यताएं-धारा 4 में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी कोई भी व्यक्ति रजिस्टर में अपना नाम प्रविष्ट कराने या बनाए रखने का हकदार उस दशा में नहीं होगा जिसमें कि-
(i) उसने रजिस्टर में अपने नाम को प्रविष्ट किए जाने के लिए दिए गए आवेदन के समय पर इक्कीस वर्ष की आयु पूरी नहीं कर ली है, या
(ii) वह विकृतचित्त है और किसी सक्षम न्यायालय द्वारा ऐसा न्यायनिर्णीत हो गया है, या
(iii) वह अनुन्मोचित दिवालिया है, या
(iv) उन्मोचित दिवालिया होने पर भी उसने न्यायालय से ऐसा कथन करने वाला प्रमाणपत्र अभिप्राप्त नहीं किया है कि उसका दिवाला दुर्भाग्य से और उसके किसी अवचार के बिना निकला था, या
(v) उसे, चाहे भारत में के या भारत के बाहर के किसी सक्षम न्यायालय द्वारा किसी ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है, जिसमें नैतिक अधमता अन्तर्वलित है और जो कारावास से दण्डनीय है, या ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है जो तकनीकी प्रकृति का नहीं है और जिसे उसने अपनी वृत्तिक हैसियत में किया है, तब के सिवाय, जबकि किए गए अपराध के बारे में या तो उसे क्षमा दे दी गई है या इस निमित्त उसके द्वारा दिए गए आवेदन पर केन्द्रीय सरकार ने लिखित आदेश द्वारा उस निर्योग्यता को दूर कर दिया है, या
(vi) जांच पर यह निष्कर्ष निकलने पर कि वह वृत्तिक या अन्य अवचार का दोषी है, उसे संस्थान की सदस्यता से हटा दिया गया है:
परन्तु ऐसा व्यक्ति, जिसे किसी विनिर्दिष्ट कालावधि के लिए सदस्यता से हटा दिया गया है, रजिस्टर में अपना नाम दर्ज कराने का हकदार तब नहीं होगा, जब तक कि ऐसी कालावधि का अवसान न हो गया हो ।
अध्याय 3
संस्थान की परिषद्
9. संस्थान की परिषद् का गठन-(1) संस्थान के कार्यकलाप के प्रबंध के लिए और इस अधिनियम द्वारा उसे समनुदेशित कृत्यों का निर्वहन करने के लिए संस्थान की एक परिषद् होगी ।
[(2) परिषद् का गठन, निम्नलिखित व्यक्तियों से मिलकर होगा, अर्थात्: -
(क) पंद्रह से अनधिक व्यक्तियों को जिन्हें संस्थान के सदस्यों द्वारा उसके ऐसे अध्येताओं में से निर्वाचित किया जाएगा, जिनको ऐसी रीति से और ऐसे क्षेत्रीय निर्वाचन-क्षेत्रों से चुना गया है जो विनिर्दिष्ट किए जाएं:
परंतु संस्थान का कोई अध्येता जिसे किसी वृत्तिक या अन्य अवचार का दोषी पाया गया है और उसका नाम रजिस्टर से हटा दिया जाता है या उस पर जुर्माने की शास्ति अधिरोपित की गई है, यथास्थिति, रजिस्टर से नाम हटाए जाने की अवधि के पूरा होने से या जुर्माने के संदाय से, -
(i) इस अधिनियम की पहली अनुसूची के अधीन आने वाले अवचार की दशा में, तीन वर्ष की अवधि तक;
(ii) इस अधिनियम की दूसरी अनुसूची के अधीन आने वाले अवचार की दशा में, छह वर्ष की अवधि तक,
निर्वाचन लड़ने का पात्र नहीं होगा;
(ख) केंद्रीय सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट रीति से नामनिर्देशित पांच से अनधिक व्यक्ति ।]
[(3) केंद्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन पद धारण करने वाला कोई व्यक्ति उपधारा (2) के खंड (क) के अधीन परिषद् के निर्वाचन के लिए पात्र नहीं होगा ।
(4) ऐसा कोई व्यक्ति जो संस्थान का लेखापरीक्षक रहा है, उपधारा (2) के खंड (क) के अधीन परिषद् के निर्वाचन के लिए उसके लेखापरीक्षक न रहने के पश्चात् तीन वर्ष की अवधि तक पात्र नहीं होगा ।]
[10. परिषद् के लिए पुनः निर्वाचन या पुनः नामनिर्देशन-धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन निर्वाचित या नामनिर्देशित परिषद् का कोई सदस्य, यथास्थिति, पुनः निर्वाचन या पुनः नामनिर्देशन के लिए पात्र होगा:
परंतु कोई भी सदस्य दो आनुक्रमिक अवधियों से अधिक अवधि के लिए पद धारण नहीं करेगा:
परंतु यह और कि परिषद् का ऐसा कोई सदस्य, जो धारा 12 की उपधारा (1) के अधीन अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित किया जाता है या किया गया है, परिषद् के सदस्य के रूप में निर्वाचन या नामनिर्देशन के लिए पात्र नहीं होगा ।]
[10क. निर्वाचन से संबंधित विवादों का निपटारा-धारा 9 की उपधारा (2) के खंड (क) के अधीन किसी निर्वाचन से संबंधित किसी विवाद की दशा में, व्यथित व्यक्ति संस्थान के सचिव को निर्वाचन के परिणाम की घोषणा की तारीख से तीस दिन के भीतर आवेदन कर सकेगा जो उस आवेदन को केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित करेगा ।
10ख. अधिकरण की स्थापना-(1) केंद्रीय सरकार, धारा 10क के अधीन किसी आवेदन की प्राप्ति पर, ऐसे विवाद का विनिश्चय करने के लिए अधिकरण की स्थापना अधिसूचना द्वारा, करेगी जिसका गठन एक पीठासीन अधिकारी और दो अन्य सदस्यों से मिलकर होगा और ऐसे अधिकरण का विनिश्चय अंतिम होगा ।
(2) कोई व्यक्ति, -
(क) अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह भारतीय विधिक सेवा का सदस्य रहा है और उसने उस सेवा की श्रेणी- 1 में पद कम-से-कम तीन वर्ष तक धारण किया है;
(ख) सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह परिषद् का कम-से-कम एक पूरी कालावधि के लिए सदस्य रहा है और जो परिषद् का आसीन सदस्य नहीं है या जो विवादाधीन निर्वाचन में अभ्यर्थी नहीं रहा है; या
(ग) सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह भारत सरकार के संयुक्त सचिव का पद या केंद्रीय सरकार के अधीन ऐसा कोई अन्य पद धारण कर रहा है जिसका वेतनमान भारत सरकार के संयुक्त सचिव के वेतनमान से कम नहीं है ।
(3) अधिकरण के पीठासीन अधिकारी और सदस्यों की पदावधि और सेवा की शर्तें, उनके अधिवेशनों के स्थान और भत्ते वे होंगे जो विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
(4) अधिकरण के व्यय परिषद् द्वारा वहन किए जाएंगे ।]
11. निर्वाचन न किए जाने पर नामनिर्देशन-यदि संस्थान के सदस्य धारा 9 की उपधारा (2) के खण्ड (क) के अधीन उन क्षेत्रीय निर्वाचन-क्षेत्रों में से किसी निर्वाचन-क्षेत्र से जो कि उस खण्ड के अधीन विनिर्दिष्ट किया जाए, किसी सदस्य का निर्वाचन करने में असफल रहते हैं, तो रिक्ति की पूर्ति के लिए केन्द्रीय सरकार ऐसे निर्वाचन-क्षेत्र से सम्यक् रूप से अर्हित किसी व्यक्ति को नामनिर्देशित कर सकेगी, और इस प्रकार नामनिर्देशित व्यक्ति के बारे में यह समझा जाएगा कि वह परिषद् का सम्यक् रूप से निर्वाचित सदस्य है ।
12. अध्यक्ष और उपाध्यक्ष-(1) परिषद् अपने पहले अधिवेशन में अपने सदस्यों में से दो सदस्यों को क्रमशः अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के रूप में निर्वाचित करेगी, और जब-जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष का पद रिक्त हो, तब-तब परिषद् किसी व्यक्ति को, यथास्थिति, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के रूप में चुनेगी:
परन्तु परिषद् के प्रथम गठन के समय केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त नामनिर्देशित परिषद् का कोई सदस्य, अध्यक्ष के कृत्यों का निर्वहन तब तक करेगा, जब तक कि इस उपधारा के उपबन्धों के अधीन किसी अध्यक्ष का निर्वाचन नहीं हो जाता ।
(2) अध्यक्ष परिषद् का [प्रधान] होगा ।
(3) अध्यक्ष या उपाध्यक्ष उस तारीख से, जिसको उसे चुना जाता है, एक वर्ष की कालावधि के लिए पद धारण करेगा, किन्तु यह कालावधि परिषद् के सदस्य के रूप में उसकी पदावधि से आगे विस्तारित नहीं होगी, और इस शर्त पर कि सुसंगत समय पर वह परिषद् का सदस्य हो 1[वह उपधारा (1) के अधीन पुनः निर्वाचन का पात्र होगा:]
परन्तु परिषद् का 1[अध्यक्ष और उपाध्यक्ष] परिषद् की कालावधि के अवसान के समय से तब तक पद धारण करता रहेगा, जब तक उस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसरण में नई परिषद् का गठन नहीं हो जाता ।
13. सदस्यता से त्यागपत्र और आकस्मिक रिक्तियां-(1) परिषद् का कोई सदस्य अध्यक्ष को संबोधित हस्ताक्षरित पत्र के जरिए अपनी सदस्यता से त्यागपत्र दे सकेगा और ऐसे सदस्य का स्थान तब रिक्त हो जाएगा जब ऐसा त्यागपत्र राजपत्र में अधिसूचित किया गया हो ।
(2) परिषद् के सदस्य के बारे में यह बात कि उसने अपना स्थान रिक्त कर दिया है उस दशा में समझी जाएगी जिसमें कि परिषद् ने उसकी बाबत यह घोषणा कर ली हो कि पर्याप्त प्रतिहेतु के बिना वह परिषद् के तीन क्रमवर्ती [अधिवेशनों से अनुपस्थित रहा है या वह किसी वृत्तिक या अन्य अवचार का दोषी पाया गया है और उस पर जुर्माने की शास्ति अधिरोपित की गई है] अथवा धारा 20 के उपबन्धों के अधीन रजिस्टर से उसका नाम किसी हेतुक से हटा दिया गया है ।
(3) परिषद् में हुई कोई आकस्मिक रिक्ति, यथास्थिति, संबद्ध निर्वाचन-क्षेत्र से नए निर्वाचन के द्वारा या केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशन करके भरी जाएगी, और रिक्ति भरने के लिए निर्वाचित या नामनिर्देशित व्यक्ति परिषद् का विघटन होने तक अपना पद धारण करेगा:
परन्तु परिषद् के कार्यकाल के अवसान की तारीख से पूर्व पूर्वगामी 2[एक वर्ष] के अन्दर होने वाली किसी आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए कोई निर्वाचन नहीं किया जाएगा, किन्तु ऐसी रिक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा परिषद् के अध्यक्ष से परामर्श करने के पश्चात् नामनिर्देशन द्वारा भरी जा सकेगी ।
(4) परिषद् द्वारा किया गया कोई कार्य परिषद् में कोई रिक्ति विद्यमान होने या उसके गठन में कोई त्रुटि होने के आधारमात्र पर प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।
14. परिषद् का कार्यकाल और उसका विघटन-(1) इस अधिनियम के अधीन गठित किसी परिषद् का कार्यकाल उसके पहले अधिवेशन की तारीख से [चार वर्ष] का होगा ।
(2) किसी परिषद् के (जिसे इसमें इसके पश्चात् पूर्ववर्ती परिषद् कहा गया है) कार्यकाल के अवसान के हो जाने पर भी पूर्ववर्ती परिषद् तब तक इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का पालन करती रहेगी, जब तक कि इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार नई परिषद् गठित नहीं हो जाती है तथा ऐसे गठन पर पूर्ववर्ती परिषद् विघटित हो जाएगी ।
[15. परिषद् के कृत्य-(1) संस्थान परिषद् के संपूर्ण नियंत्रण, मार्गदर्शन और पर्यवेक्षण के अधीन कृत्य करेगा और इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने का कर्तव्य परिषद् में निहित होगा ।
(2) विशिष्टतः और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, परिषद् के कर्तव्यों में निम्नलिखित सम्मिलित होगा-
(क) शैक्षणिक पाठ्यक्रमों और उनकी अंतर्वस्तुओं का अनुमोदन करना;
(ख) नामावली में नाम प्रविष्ट करने के लिए अभ्यर्थियों की परीक्षा के लिए फीस विहित करना;
(ग) रजिस्टर में प्रविष्टि के लिए अर्हताएं विहित करना;
(घ) नामावली में नाम प्रविष्ट किए जाने के प्रयोजन के लिए विदेशी अर्हताओं और प्रशिक्षण को मान्यता देना;
(ङ) इस अधिनियम के अधीन व्यवसाय-प्रमाणपत्र देने या देने से इंकार करने के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत विहित करना;
(च) सदस्यों, परीक्षार्थियों और अन्य व्यक्तियों से फीस उद्गृहीत करना;
(छ) संस्थान के सदस्यों की वृत्तिक अर्हताओं की प्रतिष्ठा और स्तर को विनियमित करना और बनाए रखना;
(ज) परिषद् के सदस्यों से भिन्न व्यक्तियों को वित्तीय सहायता देकर या किसी अन्य रीति से लेखाकर्म में अनुसंधान करना;
(झ) निदेशक (अनुशासन), इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन गठित अनुशासन बोर्ड, अनुशासन समिति और अपील प्राधिकरण के कार्यकरण को समर्थ बनाना;
(ञ) क्वालिटी पुनर्विलोकन बोर्ड के कार्यकरण को समर्थ बनाना;
(ट) धारा 29ख के खंड (क) के अधीन की गई क्वालिटी पुनर्विलोकन बोर्ड की सिफारिशों पर विचार करना और उन पर केन्द्रीय सरकार को रिपोर्ट के साथ तीन मास के भीतर कार्रवाई करना तथा उनको वार्षिक रिपोर्ट में सम्मिलित करना; और
(ठ) इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार और समय-समय पर संस्थान को सौंपे गए अन्य कानूनी कर्तव्यों के अनुपाल में संस्थान के कार्यकरण को सुनिश्चित करना ।]
[15क. संस्थान के कृत्य-संस्थान के कृत्यों में निम्नलिखित सम्मिलित होंगे-
(क) नामावली में नाम प्रविष्ट करने के लिए अभ्यर्थियों की परीक्षा;
(ख) छात्रों के प्रशिक्षण का विनियमन;
(ग) लागत लेखापालों के रूप में व्यवसाय करने के लिए अर्हित व्यक्तियों का रजिस्टर रखना और उसका प्रकाशन;
(घ) सदस्यों, परीक्षार्थियों और अन्य व्यक्तियों से फीस का संग्रहण;
(ङ) इस अधिनियम के अधीन समुचित प्राधिकारियों के आदेशों के अधीन रहते हुए, रजिस्टर से नामों का हटाया जाना और रजिस्टर में ऐसे नामों का प्रत्यावर्तन जिनको हटा दिया गया है;
(च) पुस्तकालय का अनुरक्षण और लेखाकर्म और सहबद्ध विषयों से संबंधित पुस्तकों और पत्रिकाओं का प्रकाशन;
(छ) संस्थान की परिषद् का निर्वाचन कराना; और
(ज) परिषद् द्वारा जारी मार्गदर्शक सिद्धांतों के अनुसार व्यवसाय प्रमाणपत्र देना या देने से इंकार करना ।
15ख. विश्वविद्यालयों और अन्य निकायों द्वारा शिक्षा प्रदान किया जाना-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, विधि द्वारा स्थापित कोई विश्वविद्यालय या संस्थान से सहबद्ध कोई निकाय संस्थान के शैक्षणिक पाठ्यक्रमों के अंतर्गत आने वाले विषयों पर शिक्षा प्रदान कर सकेगा ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट विश्वविद्यालय या निकाय, डिग्री, डिप्लोमा या प्रमाणपत्र प्रदान करते समय या कोई पदनाम देते समय, यह सुनिश्चित करेंगे कि उक्त प्रमाणपत्र या पदनाम संस्थान द्वारा दिए गए प्रमाणपत्र या पदनाम के सदृश्य न हों या उसके समरूप न हों ।
(3) इस धारा की कोई बात किसी विश्वविद्यालय या निकाय को ऐसा नाम या नामपद्धति अंगीकार करने के लिए समर्थ नहीं बनाएगी जो संस्थान के नाम या नामपद्धति के किसी रूप में समरूप है ।]
[16. अधिकारी और कर्मचारी, वेतन, भत्ते आदि-(1) परिषद्, अपने कर्तव्यों के दक्षतापूर्ण पालन के लिए-
(क) परिषद् के सचिव की, ऐसे कर्तव्यों का पालन करने के लिए, नियुक्ति करेगी जो विहित किए जाएं;
(ख) एक निदेशक (अनुशासन) की, ऐसे कर्तव्यों का पालन करने के लिए नियुक्ति करेगी जो उसे इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों और विनियमों के अधीन समनुदेशित किए जाएं;
(ग) परिषद् के या संस्थान के एक अधिकारी को संस्थान के प्रशासनिक कृत्यों को करने के लिए उसके मुख्य कार्यपालक के रूप में पदाभिहित करेगी ।
(2) परिषद्-
(क) परिषद् और संस्थान में ऐसे अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों को भी नियुक्त कर सकेगी जिन्हें वह आवश्यक समझे;
(ख) परिषद् और संस्थान के सचिव से या किसी अन्य अधिकारी या कर्मचारी से अपने कर्तव्यों के सम्यक् पालन के लिए ऐसी प्रतिभूति की भी अपेक्षा कर सकेगी और ले सकेगी जिसे परिषद् आवश्यक समझे;
(ग) परिषद् और संस्थान के अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन, फीस, भत्ते और उनकी सेवा के निबंधन और शर्तें भी विहित कर सकेगी;
(घ) केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से, परिषद् के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्यों और उसकी समितियों के सदस्यों के भत्ते भी तय कर सकेगी ।
(3) परिषद् का सचिव परिषद् के अधिवेशनों में भाग लेने का हकदार होगा किन्तु उनमें मत देने का हकदार नहीं होगा ।]
17. परिषद् की समितियां-(1) परिषद् अपने सदस्यों में से निम्नलिखित स्थायी समितियां गठित करेगी, अर्थात्: -
(i) कार्यपालक समिति,
[(ii) वित्त समिति; और]
(iii) परीक्षा समिति ।
(2) परिषद् अपने सदस्यों में से ऐसी प्रशिक्षण और शैक्षिक सुविधा समिति और ऐसी अन्य समितियां बना सकेगी जैसी वह इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक समझती है ।
2[(3) प्रत्येक स्थायी समिति, अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पदेन और परिषद् द्वारा अपने सदस्यों में से निर्वाचित किए जाने वाले कम-से-कम तीन और अधिक से अधिक पांच सदस्यों से, मिलकर बनेगी ।]
। । । । ।
(6) इस धारा में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (2) के अधीन बनी कोई समिति परिषद् की मंजूरी से, संस्थान के ऐसे अन्य सदस्यों को, जिन्हें समिति ठीक समझे और जिनकी संख्या 2[समिति की कुल सदस्यता के एक तिहाई] से अधिक नहीं होगी, सहयोजित कर सकेगी, और इस प्रकार सहयोजित कोई सदस्य, समिति के सदस्य के सब अधिकारों का प्रयोग करने का, हकदार होगा ।
(7) अध्यक्ष ऐसी प्रत्येक समिति का सभापति होगा जिसका वह सदस्य है और उसकी अनुपस्थिति में, यदि उपाध्यक्ष समिति का सदस्य है, तो वह सभापति होगा ।
(8) इस धारा के अधीन बनाई गई स्थायी और अन्य समितियां ऐसे कृत्यों का पालन करेंगी और उनके पालन में ऐसी शर्तों के अधीन रहेंगी जो विहित किए जाएं ।
18. परिषद् के वित्त-(1) परिषद् के प्रबंध और नियंत्रण के अधीन एक निधि स्थापित की जाएगी जिसमें वे सब धनराशियां जो परिषद् को प्राप्त हुई हैं, जमा की जाएंगी, जिनमें से वे सब व्यय और दायित्व चुकाए जाएंगे जो परिषद् ने उचित रूप से उपगत किए हों ।
(2) परिषद् ऐसी कोई धनराशि जो तत्समय निधि खाते में जमा है, किसी सरकारी प्रतिभूति में या किसी अन्य प्रतिभूति में, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित है, विनिहित कर सकेगी ।
[(3) परिषद् पूंजी को राजस्व से सुभिन्न करते हुए निधि के उचित लेखा विहित रीति में रखेगी ।
(4) परिषद्, वित्तीय वर्ष के प्रारंभ होने से पूर्व, एक वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) विहित रीति में तैयार करेगी और उसका अनुमोदन करेगी जिसमें आगामी वर्ष के लिए उसके प्रत्याशित सभी राजस्वों तथा सभी प्रस्तावित व्ययों को उपदर्शित किया जाएगा ।
(5) परिषद् के वार्षिक लेखे ऐसी रीति में तैयार किए जाएंगे जो विहित की जाए और वे परिषद् द्वारा हर वर्ष नियुक्त किए जाने वाले व्यवसायरत चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा संपरीक्षित किए जाएंगे:
परंतु परिषद् का कोई सदस्य या ऐसा कोई व्यक्ति जो पिछले चार वर्ष के दौरान परिषद् का सदस्य रहा है या ऐसा व्यक्ति जो ऐसे सदस्य के साथ भागीदारी में है, इस उपधारा के अधीन लेखापरीक्षक के रूप में नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होगा:
परंतु यह और कि यदि परिषद् की जानकारी में यह बात लाई जाती है कि परिषद् के लेखे, परिषद् की वित्तीय स्थिति का सही और उचित चित्र प्रस्तुत नहीं करते हैं, तो परिषद् स्वयं विशेष संपरीक्षा करा सकेगी:
परन्तु यह भी कि यदि ऐसी सूचना कि परिषद् के लेखे उसकी वित्तीय स्थिति का सही और उचित चित्र प्रस्तुत नहीं करते, केन्द्रीय सरकार द्वारा परिषद् को भेजी जाती है तो परिषद्, जहां भी उपयुक्त हो उसकी विशेष संपरीक्षा करा सकेगी और ऐसे अन्य कार्य कर सकेगी जिन्हें वह आवश्यक समझे और केन्द्रीय सरकार को उस पर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट देगी ।
(5क) प्रत्येक वर्ष की समाप्ति पर यथाशक्यशीघ्र परिषद् अपने सदस्यों को कम-से-कम पंद्रह दिन पहले संपरीक्षित लेखाओं को परिचालित करेगी और इस प्रयोजन के लिए बुलाए गए विशेष अधिवेशन में इन लेखाओं पर विचार करेगी और उनका अनुमोदन करेगी ।
(5ख) परिषद् आगामी वर्ष के सितम्बर की 30 तारीख के अपश्चात् भारत के राजपत्र में संपरीक्षित लेखाओं और परिषद् द्वारा सम्यक् रूप से अनुमोदित उस वर्ष की परिषद् की रिपोर्ट की प्रति प्रकाशित कराएगी और उक्त लेखाओं और रिपोर्ट की प्रतियां केन्द्रीय सरकार और संस्थान के सभी सदस्यों को भेजी जाएंगी ।]
(6) परिषद्-
(क) पूंजी खाते वाले अपने दायित्वों को चुकाने के वास्ते आवश्यक कोई धनराशि निधि की प्रतिभूति पर अथवा ऐसी किन्हीं अन्य आस्तियों की, जो तत्समय उसकी हैं, प्रतिभूति पर, या
(ख) आय की प्राप्ति होने तक चालू दायित्वों को चुकाने के प्रयोजन के लिए अस्थायी उधार या ओवर ड्राफ्ट के तौर पर कोई धनराशि,
भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) में यथापरिभाषित किसी अनुसूचित बैंक से या केन्द्रीय सरकार से उधार ले सकेगी ।
अध्याय 4
सदस्यों का रजिस्टर
19. रजिस्टर-(1) परिषद् संस्थान के सदस्यों का रजिस्टर विहित रीति में रखेगी ।
(2) रजिस्टर में संस्थान के प्रत्येक सदस्य के बारे में निम्नलिखित विशिष्टियां सम्मिलित की जाएंगी, अर्थात्: -
(क) उसका पूरा नाम, जन्म की तारीख, अधिवास, निवास-स्थान संबंधी और वृत्तिक पते,
(ख) वह तारीख जिसको उसका नाम रजिस्टर में प्रविष्ट किया गया है,
(ग) उसकी अर्हताएं,
(घ) क्या उसके पास व्यवसाय का प्रमाणपत्र है, और
(ङ) अन्य विशिष्टियां, जो विहित की जाएं ।
(3) परिषद् उन सदस्यों की सूची जो हर वर्ष की पहली अप्रैल को संस्थान के हैं, ऐसी रीति में प्रकाशित करवाएगी, जैसी विहित की जाए, और यदि ऐसे किसी सदस्य द्वारा उससे इस बात का अनुरोध किया जाता है तो वह [ऐसी सूची की प्रति उसको ऐसी रकम के संदाय पर, जो विहित की जाए, भेजेगी ।]
[(4) संस्थान का प्रत्येक सदस्य, रजिस्टर में अपना नाम प्रविष्ट किए जाने के पश्चात् ऐसी वार्षिक सदस्यता फीस का संदाय करेगा जो परिषद् द्वारा, अधिसूचना द्वारा अवधारित की जाए और जो पांच हजार रुपए से अधिक नहीं होगी:
परंतु परिषद्, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, पांच हजार रुपए से अधिक की फीस अवधारित कर सकेगी जो किसी भी दशा में दस हजार रुपए से अधिक नहीं होगी ।]
20. रजिस्टर से नाम का निकाल दिया जाना-(1) परिषद् रजिस्टर से संस्थान के ऐसे सदस्य का नाम निकाल सकेगी, -
(क) जो मर गया हो, या
(ख) जिससे इस आशय का अनुरोध प्राप्त हुआ है, या
(ग) जिसने ऐसी विहित फीस नहीं दी हो जिसकी बाबत अपेक्षित है कि वह उस द्वारा दी जाए, या
(घ) जो उस समय, जब उसका नाम रजिस्टर में प्रविष्ट किया गया था, या जो उसके पश्चात् किसी भी समय, उन निर्योग्यताओं में से, जो धारा 8 में वर्णित है, किसी से ग्रस्त हो गया है, या जो किसी अन्य कारण से इस बात का हकदार नहीं रह गया है कि उसका नाम रजिस्टर में बना रहे ।
(2) परिषद् किसी ऐसे सदस्य का नाम रजिस्टर से निकाल सकेगी जिसकी बाबत इस अधिनियम के अधीन यह आदेश पारित किया गया है कि उसे संस्थान की सदस्यता से हटा दिया गया है ।
[(3) यदि किसी सदस्य का नाम उपधारा (1) के खंड (ग) के अधीन रजिस्टर से हटा दिया गया है तो आवेदन की प्राप्ति पर, उसका नाम, वार्षिक फीस और प्रवेश फीस के बकाया तथा ऐसी अतिरिक्त फीस के संदाय पर, जो परिषद् द्वारा, अधिसूचना द्वारा अवधारित की जाए और जो दो हजार रुपए से अधिक नहीं होगी, रजिस्टर में पुनः प्रविष्ट किया जा सकेगा:
परन्तु परिषद्, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, दो हजार रुपए से अधिक की फीस अवधारित कर सकेगी जो किसी भी दशा में चार हजार रुपए से अधिक नहीं होगी ।]
अध्याय 5
अवचार
[21. अनुशासन निदेशालय-(1) परिषद्, एक अनुशासन निदेशालय की स्थापना अधिसूचना द्वारा करेगी जिसका प्रमुख निदेशक (अनुशासन) के रूप में अभिहित संस्थान का कोई अधिकारी होगा और उसे प्राप्त किसी इत्तिला या परिवाद के संबंध में अन्वेषण करने के लिए ऐसे अन्य कर्मचारी होंगे ।
(2) विहित फीस के साथ कोई इत्तिला या परिवाद प्राप्त होने पर निदेशक (अनुशासन) अभिकथित अवचार के घटित होने के बारे में किसी प्रथमदृष्ट्या राय पर पहुंचेगा ।
(3) जहां निदेशक (अनुशासन) की यह राह है कि कोई सदस्य पहली अनुसूची में वर्णित किसी वृत्तिक या अन्य अवचार का दोषी है वहां वह अनुशासन बोर्ड के समक्ष मामले को रखेगा और जहां निदेशक (अनुशासन) की यह राय है कि कोई सदस्य दूसरी अनुसूची या दोनों अनुसूचियों में वर्णित किसी वृत्तिक या अन्य अवचार का दोषी है वहां वह अनुशासन समिति के समक्ष मामले को रखेगा ।
(4) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन अन्वेषण करने के लिए अनुशासनिक निदेशालय ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगा जो विनिर्दिष्ट की जाए ।
(5) जहां परिवादी परिवाद को वापस लेता है वहां निदेशक (अनुशासन), ऐसी वापसी को, यथास्थिति, अनुशासन बोर्ड या अनुशासनिक समिति के समक्ष रखेगा और उक्त बोर्ड या समिति यदि उसकी यह राय है कि परिस्थितियों में ऐसा वांछनीय है तो किसी प्रक्रम पर वापस लेने को अनुज्ञात कर सकेगी ।]
[21क. अनुशासन बोर्ड-(1) परिषद् अनुशासन बोर्ड का गठन करेगी जिसमें निम्नलिखित व्यक्ति होंगे, -
(क) विधि में अनुभव रखने वाला ऐसा व्यक्ति जिसके पास अनुशासनिक विषयों और वृत्ति का ज्ञान हो, जो उसका पीठासीन अधिकारी होगा;
(ख) दो ऐसे सदस्य जिनमें से एक परिषद् द्वारा निर्वाचित परिषद् का सदस्य होगा और दूसरा सदस्य धारा 16 की उपधारा (1) के खंड (ग) के अधीन नामनिर्दिष्ट व्यक्ति होगा;
(ग) निदेशक (अनुशासन) बोर्ड के सचिव के रूप में कार्य करेगा ।
(2) अनुशासन बोर्ड अपने समक्ष सभी मामलों पर विचार करते समय संक्षिप्त निपटान प्रक्रिया का अनुसरण करेगा ।
(3) जहां अनुशासन बोर्ड की यह राय है कि कोई सदस्य पहली अनुसूची में वर्णित वृत्तिक या अन्य अवचार का दोषी है वहां वह उसके विरुद्ध कोई आदेश करने से पूर्व उस सदस्य को सुनवाई का अवसर देगा और उसके पश्चात् निम्नलिखित कोई एक या अधिक कार्रवाई करेगा, अर्थात्: -
(क) सदस्य को धिग्दण्ड करना;
(ख) सदस्य के नाम को रजिस्टर से तीन मास की अवधि तक के लिए हटाना;
(ग) ऐसा जुर्माना अधिरोपित करना जिसे वह ठीक समझे और जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा ।
(4) निदेशक (अनुशासन), जहां उसकी यह राय है कि कोई प्रथमदृष्ट्या मामला नहीं है वहां अनुशासन बोर्ड के समक्ष सभी इत्तिला और परिवाद रखेगा और यदि अनुशासन बोर्ड निदेशक (अनुशासन) की राय से सहमत हो तो मामले को बंद कर सकेगा या असहमति की दशा में निदेशक (अनुशासन) को मामले में और अन्वेषण करने की सलाह दे सकेगा ।
21ख. अनुशासन समिति-(1) परिषद् एक अनुशासन समिति का गठन करेगी जो पीठासीन अधिकारी के रूप में परिषद् के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष और परिषद् के सदस्यों में से निर्वाचित किए जाने वाले दो सदस्यों और केन्द्रीय सरकार द्वारा विधि, अर्थशास्त्र, कारबार, वित्त या लेखाकर्म के क्षेत्र में अनुभव रखने वाले विख्यात व्यक्तियों में से नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले दो सदस्यों से मिलकर बनेगी:
परन्तु परिषद्, जब भी वह आवश्यक समझे, अधिक अनुशासन समितियों का गठन कर सकेगी ।
(2) अनुशासन समिति, उसके समक्ष रखे गए मामलों पर विचार करते समय, ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगी जो विहित की जाए ।
(3) जहां अनुशासन समिति की यह राय है कि कोई सदस्य दूसरी अनुसूची या पहली अनुसूची और दूसरी अनुसूची, दोनों में वर्णित वृत्तिक या अन्य अवचार का दोषी है वहां वह उसके विरुद्ध कोई आदेश करने से पूर्व उस सदस्य को सुनवाई का अवसर देगा और उसके पश्चात् निम्नलिखित कोई एक या अधिक कार्रवाई करेगा, अर्थात्: -
(क) सदस्य को धिग्दण्ड देना;
(ख) सदस्य के नाम को रजिस्टर से स्थायी रूप से या ऐसी अवधि तक के लिए जिसे वह ठीक समझे, हटाना;
(ग) ऐसा जुर्माना अधिरोपित करना जिसे वह ठीक समझे और जो पांच लाख रुपए तक का हो सकेगा ।
(4) केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट सदस्यों को संदेय भत्ते वे होंगे जो विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
21ग. प्राधिकरण, अनुशासन समिति, अनुशासन बोर्ड और निदेशक (अनुशासन) को सिविल न्यायालय की शक्तियों का होना-इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन जांच करने के प्रयोजनों के लिए, प्राधिकरण, अनुशासन समिति, अनुशासन बोर्ड और निदेशक (अनुशासन) को निम्नलिखित विषयों की बाबत वे ही शक्तियां प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन सिविल न्यायालय में निहित हैं, अर्थात्: -
(क) किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना;
(ख) किसी दस्तावेज की खोज और उसका प्रस्तुतीकरण; और
(ग) शपथपत्र पर साक्ष्य प्राप्त करना ।
स्पष्टीकरण-धारा 21, धारा 21क, धारा 21ख, धारा 22ग और धारा 22 के प्रयोजनों के लिए, संस्थान के सदस्य" के अंतर्गत ऐसा व्यक्ति भी है जो अभिकथित अवचार की तारीख को संस्थान का सदस्य था भले ही वह जांच के समय संस्थान का सदस्य न रहा हो ।
21घ. संक्रमणकालीन उपबंध-लागत और संकर्म लेखापाल (संशोधन) अधिनियम, 2006 के प्रारंभ से पूर्व परिषद् के समक्ष लम्बित सभी परिवाद या अनुशासन समिति द्वारा प्रारंभ की गई कोई जांच या उच्च न्यायालय को किया गया कोई निर्देश या अपील इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा ऐसे शासित होती रहेगी मानो लागत और संकर्म लेखापाल (संशोधन) अधिनियम, 2006 द्वारा इस अधिनियम का संशोधन किया ही न गया हो ।]
[22. वृत्तिक या अन्य अवचार की परिभाषा-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, वृत्तिक या अन्य अवचार" पद के बारे में यह समझा जाएगा कि उसके अन्तर्गत ऐसा कार्य या लोप आता है जो अनुसूचियों में से किसी अनुसूची में उपबंधित है किन्तु इस धारा की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह किसी रूप में किन्हीं अन्य परिस्थितियों में संस्थान के किसी सदस्य के आचरण की जांच करने के लिए धारा 21 की उपधारा (1) के अधीन निदेशक (अनुशासन) को प्रदत्त शक्ति या उसको अधिरोपित कर्तव्य को सीमित या कम करती है ।]
[22क. अपील प्राधिकरण का गठन-चार्टर्ड अकाउंटेंट अधिनियम, 1949 (1949 का 38) की धारा 22क की उपधारा (1) के अधीन गठित अपील प्राधिकरण इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, इस उपांतरण के अधीन रहते हुए, अपील प्राधिकरण समझा जाएगा कि उक्त उपधारा (1) के खंड (ख) के स्थान पर, निम्नलिखित खंड रखा गया है, अर्थात्: -
(ख) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा ऐसे व्यक्तियों में से, जो [भारतीय लागत लेखापाल संस्थान] परिषद् के कम-से-कम एक पूरी कालावधि के लिए सदस्य रहे हैं और जो परिषद् के आसीन सदस्य नहीं हैं, दो अंशकालिक सदस्यों को नियुक्त करेगी;" ।
22ख. प्राधिकरण के सदस्यों की कालावधि-सदस्यों के रूप में नियुक्त व्यक्ति, पद, उस तारीख से जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है, तीन वर्ष की अवधि तक या उसके बासठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, धारण करेगा ।
22ग. प्राधिकरण की प्रक्रिया आदि-चार्टर्ड अकाउंटेंट अधिनियम, 1949 (1949 का 38) की धारा 22ग, धारा 22घ और धारा 22च के उपबंध प्राधिकरण को उसके अध्यक्ष और सदस्यों के भत्तों और सेवा के निबंधनों तथा शर्तों के संबंध में और इस अधिनियम के अधीन उसके कृत्यों के निर्वहन में उसी प्रकार लागू होंगे जैसे वे चार्टर्ड अकाउंटेंट अधिनियम, 1949 के अधीन उसके कृत्यों के निर्वहन में उसे लागू होते हैं ।
22घ. प्राधिकरण के अधिकारी और अन्य कर्मचारिवृन्द-(1) परिषद्, प्राधिकरण को उतने अधिकारी और अन्य कर्मचारिवृंद उपलब्ध कराएगी जो प्राधिकरण के कृत्यों के दक्ष निर्वहन के लिए आवश्यक हों ।
(2) प्राधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारिवृंद के वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की शर्तें वे होंगी, जो विहित की जाएं ।
22ङ. प्राधिकरण को अपील-(1) धारा 21क की उपधारा (3) और धारा 21ख की उपधारा (3) में निर्दिष्ट कोई शास्ति उस पर अधिरोपित करने वाले अनुशासन बोर्ड या अनुशासन समिति के किसी आदेश से व्यथित संस्थान का कोई सदस्य उस तारीख से नब्बे दिन के भीतर, जिसको उसे आदेश संसूचित किया जाता है, प्राधिकरण को अपील कर सकेगा:
परन्तु निदेशक (अनुशासन), यदि परिषद् द्वारा इस प्रकार प्राधिकृत किया गया हो, प्राधिकरण को अनुशासन बोर्ड या अनुशासन समिति के विनिश्चय के विरुद्ध नब्बे दिन के भीतर अपील कर सकेगा:
परन्तु यह और कि प्राधिकरण, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि समय के भीतर अपील फाइल न करने के लिए पर्याप्त कारण था, नब्बे दिन की उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् भी ऐसी कोई अपील ग्रहण कर सकेगा ।
(2) प्राधिकरण, किसी मामले के अभिलेख को मंगाने के पश्चात्, धारा 21क की उपधारा (3) और धारा 21ख की उपधारा (3) के अधीन अनुशासन बोर्ड या अनुशासन समिति द्वारा किए गए किसी आदेश को पुनरीक्षित कर सकेगा, और-
(क) आदेश की पुष्टि कर सकेगा, उसे उपांतरित या अपास्त कर सकेगा;
(ख) कोई शास्ति अधिरोपित कर सकेगा या आदेश द्वारा अधिरोपित शास्ति को अपास्त कर सकेगा, उसे कम कर सकेगा या उसमें वृद्धि कर सकेगा;
(ग) मामले को अनुशासन बोर्ड या अनुशासन समिति को ऐसी और जांच किए जाने के लिए विप्रेषित कर सकेगा जिसे प्राधिकरण मामले की परिस्थितियों में उचित समझे; या
(घ) ऐसा अन्य आदेश पारित कर सकेगा जिसे प्राधिकरण ठीक समझे:
परन्तु प्राधिकरण कोई आदेश पारित करने से पूर्व संबद्ध पक्षकारों को सुने जाने का अवसर देगा ।]
अध्याय 6
क्षेत्रीय परिषद्
23. क्षेत्रीय परिषदों का गठन और उनके कृत्य-(1) अपने कृत्यों से संबंधित बातों के बारे में सलाह देने और सहायता करने के प्रयोजन के लिए परिषद् उन क्षेत्रीय निर्वाचन-क्षेत्रों में से, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा धारा 9 की उपधारा (2) के खण्ड (क) के अधीन विनिर्दिष्ट किए जाएं, एक या अधिक के लिए ऐसी क्षेत्रीय परिषदें तब-तब गठित कर सकेगी जब-जब वह ऐसा करना ठीक समझती है ।
(2) क्षेत्रीय परिषदें ऐसी रीति से गठित की जाएंगी और ऐसे कृत्यों का पालन करेंगी जैसे विहित किए जाएं ।
अध्याय 7
शास्तियां
24. सदस्य, इत्यादि होने का झूठा दावा करने के लिए शास्ति-जो कोई व्यक्ति, -
(i) संस्थान का सदस्य न होते हुए-
(क) यह व्यपदेशन करेगा कि मैं संस्थान का सदस्य हूं, या
(ख) लागत लेखापाल अभिधान का प्रयोग करेगा, या
(ii) संस्थान का सदस्य होते हुए किन्तु व्यवसाय का प्रमाणपत्र नहीं रखते हुए ऐसा व्यपदेशन करेगा कि मैं लागत लेखापाल के रूप में व्यवसाय में लगा हूं, या उस रूप में व्यवसाय कर रहा हूं,
वह प्रथम दोषसिद्धि पर जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, और किसी पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि पर कारावास से, जो छह मास तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
25. परिषद् के नाम का प्रयोग करने; लागत लेखाकर्म में डिग्रियां देने इत्यादि के लिए शास्ति-(1) इस अधिनियम में अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, कोई भी व्यक्ति-
(i) ऐसे नाम या सामान्य मुद्रा का प्रयोग नहीं करेगा, जो संस्थान के नाम या सामान्य मुद्रा के समान है, या उसके इतने निकट से मिलती-जुलती है कि लोकसाधारण धोखे में पड़ जाएंगे, या उनका धोखे में पड़ जाना संभाव्य है;
(ii) ऐसी कोई उपाधि, डिप्लोमा या प्रमाणपत्र नहीं देगा या ऐसा पदाभिधान प्रदान नहीं करेगा, जिससे यह उपदर्शित होता है या उपदर्शित होना तात्पर्यित है कि लागत लेखाकर्म में ऐसी अर्हता या प्रवीणता उसके पास है या उसने प्राप्त कर ली है, जो संस्थान के सदस्य की अर्हता या प्रवीणता के सदृश्य है;
(iii) किसी भी रीति से [लागत लेखापालों] की वृत्ति को विनियमित करने का प्रयास नहीं करेगा ।
(2) ऐसा कोई व्यक्ति, जिसने उपधारा (1) के उपबन्धों का उल्लंघन किया है, किन्हीं अन्य कार्यवाहियों पर, जो उसके विरुद्ध की जा सकती हों, प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना जुर्माने से, जो प्रथम दोषसिद्धि पर एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, और पश्चात्वर्ती किसी दोषसिद्धि पर कारावास से, जो छह मास तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
। । । । ।
(4) यदि केन्द्रीय सरकार का समाधान हो जाता है कि संस्थान से भिन्न किसी व्यक्ति द्वारा अनुदत्त या प्रदत्त कोई डिप्लोमा या प्रमाणपत्र या पदाभिधान, जिसका तात्पर्य लागत लेखाकर्म में कोई अर्हता होना है, किन्तु जो केन्द्रीय सरकार की राय में लागत लेखापालों के लिए विहित अर्हताओं के स्तर से निम्नतर है और जो वास्तव में लागत लेखाकर्म में किसी अर्हता या प्रवीणता की प्राप्ति या उपलब्धि उपदर्शित नहीं करता है या ऐसा करना तात्पर्यित नहीं करता है, जो संस्थान के सदस्य की अर्हता या प्रवीणता के सदृश्य है, तो वह राजपत्र में अधिसूचना द्वारा और ऐसी शर्तों के अधीन, जैसी कि वह अधिरोपित करना ठीक समझे, यह घोषित कर सकेगी कि वह धारा ऐसे डिप्लोमा या प्रमाणपत्र या पदाभिधान को लागू नहीं होगी ।
26. कम्पनियों का लागत लेखाकर्म में न लगना-(1) कोई भी कंपनी, चाहे वह भारत में या अन्यत्र निगमित हो, लागत लेखापाल के रूप में व्यवसाय नहीं करेगी ।
(2) उपधारा (1) के उपबन्धों का कोई उल्लंघन प्रथम दोषसिद्धि पर जुर्माने से, जो कि एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, और किसी पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि पर पांच हजार रुपए तक के जुर्माने से दण्डनीय होगा ।
[स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि कंपनी" के अंतर्गत कोई ऐसी सीमित दायित्व भागीदारी भी होगी, जो इस धारा के प्रयोजनों के लिए उसके भागीदार के रूप में कंपनी है ।]
27. अनर्हित व्यक्तियों द्वारा दस्तावेजों पर हस्ताक्षर न किया जाना-(1) संस्थान के सदस्य से भिन्न कोई व्यक्ति व्यवसाय करने वाले किसी लागत लेखापाल की ओर से या ऐसे लागत लेखापालों की किसी फर्म की ओर से अपनी या फर्म की वृत्तिक हैसियत में किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर नहीं करेगा ।
[(2) ऐसा कोई व्यक्ति, जिसने उपधारा (1) के उपबंधों का उल्लंघन किया है, किन्हीं अन्य कार्रवाइयों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जो उसके विरुद्ध की जा सकती हों, पहली दोषसिद्धि पर ऐसे जुर्माने से जो पांच हजार रुपए से कम नहीं होगा किन्तु जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा और दूसरी या पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि पर कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से जो दस हजार रुपए से कम नहीं होगा किन्तु जो दो लाख रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से, दंडनीय होगा ।]
28. कम्पनियों द्वारा अपराध-(1) यदि इस अधिनियम के अधीन अपराध करने वाली कोई कम्पनी है, तो कम्पनी और अपराध किए जाने के समय कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उसका भारसाधन करने वाला और उसके प्रति उत्तरदायी प्रत्येक व्यक्ति, अपराध का दोषी समझा जाएगा और उसके विरुद्ध कार्यवाही की जाएगी और उसे तदनुकूल दण्डित किया जाएगा:
परन्तु इस उपधारा की कोई बात ऐसे किसी व्यक्ति को, जो यह सिद्ध कर देता है कि अपराध मेरी जानकारी के बिना किया गया है, या ऐसे अपराध के किए जाने को रोकने के लिए मैंने सभी सम्यक् तत्परता बरती है, दण्ड का भागी नहीं बनाएगी ।
(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी जहां कि किसी कम्पनी द्वारा इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किया गया है और यह सिद्ध किया जाता है कि अपराध कम्पनी के निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सम्मति या मौनानुकूलता से किया गया है, या अपराध उसकी उपेक्षा के फलस्वरूप किया गया माना जा सकता है, तो ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और उसके विरुद्ध कार्यवाही की जा सकेगी और उसे तद्नुकूल दण्डित किया जा सकेगा ।
स्पष्टीकरण- इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -
(क) धारा 24, धारा 25 या धारा 27 के सम्बन्ध में कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसमें फर्म या व्यष्टियों का कोई संघ भी सम्मिलित है, और धारा 26 से सम्बन्धित अपराध के बारे में इससे कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है;
(ख) फर्म के सम्बन्ध में निदेशक" से फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
29. अभियोजन के लिए मंजूरी-इस अधिनियम के अधीन कोई व्यक्ति, परिषद् या केन्द्रीय सरकार द्वारा किए गए परिवाद पर या आदेश के अधीन अभियोजित किए जाने के सिवाय, अभियोजित नहीं किया जाएगा ।
[अध्याय 7क
क्वालिटी पुनर्विलोकन बोर्ड
29क. क्वालिटी पुनर्विलोकन बोर्ड की स्थापना-(1) केंद्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, क्वालिटी पुनर्विलोकन बोर्ड का गठन करेगी जिसमें एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्य होंगे ।
(2) बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति ऐसे विख्यात व्यक्तियों में से की जाएगी जो विधि, अर्थशास्त्र, कारबार, वित्त या लेखाकर्म के क्षेत्र में अनुभव रखते हों ।
(3) बोर्ड के दो सदस्य परिषद् द्वारा नामनिर्देशित किए जाएंगे और अन्य दो सदस्य केंद्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशित किए जाएंगे ।
29ख. बोर्ड के कृत्य-बोर्ड, निम्नलिखित कृत्य करेगा, अर्थात्: -
(क) संस्थान के सदस्यों द्वारा प्रदान की गई सेवाओं की क्वालिटी के संबंध में परिषद् को सिफारिशें करना;
(ख) संस्थान के सदस्यों द्वारा प्रदान क गई सेवाओं की, जिनके अंतर्गत लागत संपरीक्षा सेवाएं भी हैं, क्वालिटी का पुनर्विलोकन करना; और
(ग) सेवाओं की क्वालिटी में सुधार करनेऔर विभिन्न कानूनी और अन्य विनियामक अपेक्षाओं का पालन करने के लिए संस्थान के सदस्यों का मार्गदर्शन करना ।
29ग. बोर्ड की प्रक्रिया-बोर्ड ऐसे समय और स्थान पर अधिवेशन करेगा और अपने अधिवेशनों में ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगा जो विनिर्दिष्ट की जाए ।
29घ. बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों की सेवा के निबंधन और शर्तें और उसका व्यय-(1) बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों की सेवा के निबंधन और शर्तें और उनके भत्ते वे होंगे जो विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
(2) बोर्ड का व्यय परिषद् द्वारा वहन किया जाएगा ।]
अध्याय 8
कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन रजिस्ट्रीकृत लागत
और संकर्म लेखापाल संस्थान का विघटन
30. कम्पनी अधिनियम, 1956 के अधीन रजिस्ट्रीकृत लागत और संकर्म लेखापाल संस्थान का विघटन-इस अधिनियम के प्रारम्भ पर, -
(क) कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन रजिस्ट्रीकृत लागत और संकर्म लेखापाल संस्थान के नाम से ज्ञात कम्पनी विघटित हो जाएगी और तत्पश्चात् विघटित कम्पनी के विरुद्ध या उसके किसी अधिकारी के विरुद्ध उसकी ऐसे अधिकारी की हैसियत में, वहां तक के सिवाय, जहां तक इस अधिनियम के उपबंधों को प्रवर्तित करने के लिए आवश्यक हो, कोई व्यक्ति दावे, मांगें या कार्यवाहियां नहीं करेगा;
(ख) विघटित कम्पनी में या उसके बारे में हर सदस्य का अधिकार निर्वापित हो जाएगा, और तत्पश्चात् उस कम्पनी का कोई सदस्य, इस अधिनियम में उपबन्धित के सिवाय, उस कम्पनी के बारे में कोई दावे या मांगे या कार्यवाहियां नहीं करेगा ।
31. विघटित कम्पनी की आस्तियों और दायित्वों का संस्थान को अन्तरण-(1) इस अधिनियम के प्रारम्भ पर, विघटित कम्पनी की समस्त आस्तियां और दायित्व संस्थान को अन्तरित या उसमें निहित हो जाएंगे ।
(2) विघटित कम्पनी की आस्तियों के बारे में यह समझा जाएगा कि उनके अन्तर्गत समस्त अधिकार और शक्तियां और कम्पनी की समस्त सम्पत्ति, चाहे वह जंगम हो या स्थावर हो, जिसमें विशिष्टतः रोकड़ अतिशेष, आरक्षित निधियां, विनिधान, निक्षेप और ऐसी सम्पत्ति में, जो कि विघटित कम्पनी के कब्जे में हो ; या उससे उद्भूत होने वाले सभी अन्य हित और अधिकार और विघटित कम्पनी की समस्त लेखा बहियां या दस्तावेजें आती हैं, और इन दायित्वों के बारे में यह समझा जाएगा कि उनके अन्तर्गत इस कम्पनी के उस समय विद्यमान सभी प्रकार के ऋण, दायित्व और बाध्यताएं आती हैं ।
(3) इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व, अस्तित्व में बने रहने वाले या प्रभावशील होने वाले किसी भी प्रकृति की सभी संविधाएं, ऋण, बन्धपत्र, करार और अन्य लिखतें, जिसमें कम्पनी एक पक्षकार है, यथास्थिति, संस्थान के विरुद्ध या पक्ष में पूर्ण बल और प्रभाव के होंगे और उन्हें पूर्णतया और प्रभावशाली ढंग से ऐसे प्रवृत्त किया जा सकेगा, मानो कि विघटित कम्पनी के स्थान पर, संस्थान उसमें पक्षकार रहा हो ।
(4) यदि इस अधिनियम के प्रारम्भ पर, विघटित कम्पनी द्वारा किया गया या उसके विरुद्ध किया गया किसी भी प्रकार का कोई वाद, अपील या किसी भी प्रकृति की अन्य विधिक कार्यवाही लम्बित है, तो विघटित कम्पनी की आस्तियों और दायित्वों का संस्थान को अन्तरण होने के या इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के कारण, उसका उपशमन नहीं होगा, उसे बन्द नहीं किया जाएगा, या किसी भी प्रकार से उस पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा, किन्तु संस्थान द्वारा किए गए या उसके विरुद्ध किए गए किसी वाद, अपील या अन्य कार्यवाही को, उसी रीति से और उसी विस्तार तक चालू रखा जा सकेगा, चलाया जा सकेगा और प्रवृत्त किया जा सकेगा जैसे कि यदि यह अधिनियम पारित नहीं हुआ होता, उसे विघटित कम्पनी द्वारा या उसके विरुद्ध चालू रखा जा सकता, चलाया जा सकता और प्रवृत्त किया जा सकता था, किया जा सकेगा ।
32. विघटित कम्पनी के कर्मचारियों के बारे में उपबन्ध-(1) सितम्बर, 1958 के प्रथम दिन से पूर्व विघटित कम्पनी में नियोजित और इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व भी उसके नियोजन में रहने वाला हर व्यक्ति, ऐसे प्रारम्भ से संस्थान का कर्मचारी हो जाएगा, उसमें अपना पद या सेवा, उसी अवधि तक और उन्हीं निबन्धनों और शर्तों पर और पेंशन और उपदान के उन्हीं अधिकारों और विशेषाधिकारों सहित, जैसे कि वह उन्हें विघटित कम्पनी के अधीन उस दशा में धारण करता, जबकि यह अधिनियम पारित नहीं हुआ होता, धारण करेगा, और तब तक वह ऐसा करता रहेगा, जब तक कि संस्थान में उसका नियोजन समाप्त नहीं कर दिया जाता है, या जब तक कि संस्थान द्वारा उसके नियोजन के पारिश्रमिक, निबन्धन, शर्तें सम्यक्तः परिवर्तित नहीं की जाती हैं ।
(2) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) में या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, विघटित कम्पनी के किसी कर्मचारी की सेवाओं का संस्थान को अन्तरण, किसी ऐसे कर्मचारी को उस अधिनियम या अन्य अवधि के अधीन किसी प्रतिकर के लिए हकदार नहीं बनाएगा, और किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा ऐसा कोई दावा ग्रहण नहीं किया जाएगा ।
अध्याय 9
प्रकीर्ण
। । । । ।
34. रजिस्टर में परिवर्तन और प्रमाणपत्र का रद्द किया जाना-(1) जहां कि इस अधिनियम के अधीन किसी सदस्य को धिग्दण्ड देने का आदेश किया जाता है, वहां रजिस्टर में उसके नाम के सामने दण्ड के बारे में अभिलिखित किया जाएगा ।
(2) जहां कि किसी सदस्य का नाम हटा दिया जाता है, वहां उससे इस अधिनियम के अधीन अनुदत्त व्यवसाय प्रमाणपत्र वापिस ले लिया जाएगा और रद्द किया जाएगा ।
35. केन्द्रीय सरकार के निदेश-(1) केन्द्रीय सरकार, परिषद् को समय-समय पर ऐसे निदेश दे सकेगी, जो कि केन्द्रीय सरकार की राय में इस अधिनियम के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए साधक हैं और परिषद् अपने कृत्यों के निर्वहन में ऐसे किन्हीं निदेशों को कार्यान्वित करने के लिए बाध्य होगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन दिए गए निदेशों में परिषद् को दिए गए वे निदेश सम्मिलित हो सकेंगे, जो किन्हीं विनियमों को बनाने या पहले से बने किन्हीं विनियमों को संशोधित करने या प्रतिसंहृत करने के लिए हैं ।
(3) यदि केन्द्रीय सरकार की राय में, इस धारा के अधीन दिए गए निदेशों को क्रियान्वित करने में परिषद् ने निरन्तर व्यतिक्रम किया है, तो केन्द्रीय सरकार, परिषद् को अपना पक्ष कथन प्रस्तुत करने का अवसर देने के पश्चात् आदेश द्वारा परिषद् को विघटित कर सकेगी, जिसके पश्चात् इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसरण में ऐसी तारीख से, जो कि केन्द्रीय सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, एक नई परिषद् का गठन किया जाएगा ।
(4) जहां कि केन्द्रीय सरकार, परिषद् को विघटित करने का आदेश उपधारा (3) के अधीन करती है, वहां वह, इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसरण में नए परिषद् के गठन के लम्बित होने तक किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय को संस्थान के कार्यकलाप का प्रबन्ध ग्रहण करने और ऐसे कृत्यों का पालन करने के लिए, जैसे कि केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किए जाएं, प्राधिकृत कर सकेगी ।
[36. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम, विनियम, किसी अधिसूचना, निदेश या आदेश के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही, केंद्रीय सरकार या परिषद् या प्राधिकरण या अनुशासन समिति या अधिकरण या बोर्ड या अनुशासन बोर्ड या अनुशासन निदेशालय या उस सरकार, परिषद्, प्राधिकरण, अनुशासन समिति, अधिकरण, बोर्ड, अनुशासन बोर्ड या अनुशासन निदेशालय के किसी अधिकारी के विरुद्ध, नहीं होगी ।]
[36क. सदस्यों आदि का लोक सेवक होना-प्राधिकरण, अनुशासन समिति, अधिकरण, बोर्ड, अनुशासन बोर्ड या अनुशासन निदेशालय के अध्यक्ष, पीठासीन अधिकारी, सदस्यों और अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के बारे में यह समझा जाएगा कि वे भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थान्तर्गत लोक सेवक हैं ।]
37. शाखा कार्यालयों का रखा जाना-(1) जहां कि व्यवसाय करने वाले किसी लागत लेखापाल के या ऐसे लागत लेखापालों की फर्म के एक से अधिक कार्यालय भारत में हैं, वहां ऐसे कार्यालयों में से प्रत्येक कार्यालय संस्थान के किसी सदस्य के पृथक् भारसाधन में होगा:
परन्तु उचित मामलों में परिषद् व्यवसाय करने वाले किसी लागत लेखापाल को या ऐसे लागत लेखापालों की फर्म को इस उपधारा के प्रवर्तन से छूट दे सकेगी ।
(2) व्यवसाय करने वाले प्रत्येक लागत लेखापालों या ऐसे लागत लेखापालों की फर्म, जिसके एक से अधिक कार्यालय हैं, परिषद् को कार्यालयों और उनके भारसाधन करने वाले व्यक्तियों की एक सूची भेजेगी और उनके सम्बन्ध में होने वाले किन्हीं परिवर्तनों से परिषद् को अवगत रखेगी ।
38. व्यतिकर-(1) जहां कि केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट कोई देश, भारत में अधिवास करने वाले व्यक्तियों को इस अधिनियम के अधीन स्थापित किसी संस्थान के समान किसी संस्थान के सदस्य बनने या लागत लेखाकर्म की वृत्ति का व्यवसाय करने से निवारित करता है या उस देश में उनके प्रति अनुचित भेदभाव करता है, वहां ऐसे किसी देश का नागरिक भारत में संस्थान का सदस्य होने या लागत लेखाकर्म की वृत्ति का व्यवसाय करने के लिए हकदार नहीं होगा ।
(2) उपधारा (1) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, परिषद् वे शर्तें, यदि कोई हों, विहित कर सकेगी, जिन पर लागत लेखाकर्म सम्बन्धी विदेशी अर्हताओं को रजिस्टर में प्रविष्ट किए जाने के प्रयोजनों के लिए मान्यता दी जाएगी ।
[38क. केन्द्रीय सरकार की नियम बनाने की शक्ति-(1) केंद्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -
(क) धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन परिषद् के सदस्यों के निर्वाचन और नामनिर्देशन की रीति;
(ख) धारा 10ख की उपधारा (3) के अधीन अधिकरण के पीठासीन अधिकारी और सदस्यों की सेवा के निबंधन और शर्तें, अधिवेशनों का स्थान तथा उन्हें संदत्त किए जाने वाले भत्ते;
(ग) धारा 21 की उपधारा (4) के अधीन अन्वेषण की प्रक्रिया;
(घ) धारा 21ख की उपधारा (2) के अधीन अनुशासन समिति द्वारा मामलों पर विचार किए जाने की प्रक्रिया और उपधारा (4) के अधीन नामनिर्दिष्ट सदस्यों के भत्तों का नियतन;
(ङ) धारा 29ग के अधीन बोर्ड द्वारा अपने अधिवेशनों में अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया; और
(च) धारा 29घ की उपधारा (1) के अधीन बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों की सेवा के निबंधन और शर्तें ।]
39. विनियम बनाने की शक्ति-(1) परिषद् इस अधिनियम के उद्देश्यों को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए विनियम भारत के राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ॥। ।
(2) विशिष्टतया और पूर्ववर्ती शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियम निम्नलिखित सभी बातों या उनमें से किसी के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात्: -
(क) इस अधिनियम के अधीन परीक्षाओं का स्तर और संचालन,
(ख) संस्थान के सदस्य के रूप में रजिस्टर में किसी व्यक्ति का नाम प्रविष्ट करने के लिए अर्हताएं,
(ग) वे अर्हताएं, जो धारा 5 की उपधारा (4) के प्रयोजनों के लिए अपेक्षित हैं,
(घ) वे शर्तें, जिन पर किसी परीक्षा या प्रशिक्षण को संस्थान के सदस्यों के लिए विहित परीक्षा या प्रशिक्षण के समतुल्य समझा जाएगा,
(ङ) वे शर्तें, जिन पर किसी विदेशी अर्हता को मान्यता दी जा सकेगी,
(च) वह रीति, जिससे और वे शर्तें, जिन पर रजिस्टर में प्रविष्ट किए जाने के लिए आवेदन किए जा सकेंगे,
(छ) संस्थान की सदस्यता के लिए देय फीस और अपने प्रमाणपत्र के बारे में संस्थान के सहयुक्तों और अध्येताओं द्वारा देय वार्षिक फीस,
(ज) वह रीति, जिससे 2॥। प्रादेशिक परिषदों के लिए निर्वाचन किए जाने हैं,
(झ) रजिस्टर में दर्ज की जाने वाली विशिष्टियां,
(ञ) प्रादेशिक परिषदों के कृत्य,
(ट) संस्थान के सदस्यों की वृत्तिक अर्हताओं की प्रतिष्ठा और स्तर का विनियमन और बनाए रखा जाना,
(ठ) लेखाकर्म में अनुसंधान,
(ड) लागत लेखाकर्म और सहबद्ध विषयों से सम्बन्धित पुस्तकालयों का रखा जाना और पुस्तकों और नियतकालिक पत्रिकाओं का प्रकाशन,
(ढ) परिषद् की सम्पत्ति का प्रबन्ध और उसके लेखाओं का रखा जाना और उनकी लेखापरीक्षा,
(ण) परिषद् और उसकी समितियों के अधिवेशनों का बुलया जाना और उनका आयोजन किया जाना, ऐसे अधिवेशनों के समय और स्थान, उनमें अपनाई जाने वाली प्रक्रिया और गणपूर्ति के लिए आवश्यक सदस्यों की संख्या,
(त) वह रीति, जिससे संस्थान के सदस्यों की वार्षिक सूची प्रकाशित होगी,
(थ) परिषद् के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की शक्तियां, कर्तव्य और कृत्य,
(द) स्थायी और अन्य समितियों के कृत्य और वे शर्तें, जिनके अधीन ऐसे कृत्यों का निर्वहन किया जाएगा,
(ध) परिषद् के सचिव और अन्य कर्मचारियों की पदावधियां और शक्तियां, कर्तव्य और कृत्य,
। । । । । ।
(प) उन व्यक्तियों की, जो उस अधिनियम की धारा 32 के अधीन संस्थान के कर्मचारी हो गए हैं, सेवा के निबन्धन और शर्तें,
(फ) छात्रों का रजिस्ट्रीकरण और प्रशिक्षण और उसके लिए प्रभार्य फीस,
(ब) अन्य कोई बात, जिसका इस अधिनियम के अधीन विहित किया जाना अपेक्षित है या जो विहित की जाए ।
(3) इस अधिनियम के अधीन परिषद् द्वारा बनाए गए सभी विनियम पूर्व प्रकाशन और केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन की शर्त के अधीन होंगे ।
(4) उपधाराओं (1) और (2) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी उन प्रयोजनों के लिए, जो इस धारा में वर्णित हैं, केंद्रीय सरकार सर्वप्रथम विनियम बना सकेगी, और ऐसे विनियमों को परिषद् द्वारा बनाया गया समझा जाएगा, और वे तब तक प्रवृत्त रहेंगे, जब तक परिषद् द्वारा उन्हें संशोधित, परिवर्तित या प्रतिसंहृत नहीं किया जाता ।
1। । । । ।
[40. नियमों, विनियमों और अधिसूचनाओं का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और प्रत्येक विनियम और जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना बनाए जाने या जारी किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा/रखी जाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम, विनियम या अधिसूचना में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा/होगी । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम, विनियम या अधिसूचना नहीं बनाया जाना चाहिए या जारी नहीं की जानी चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा/जाएगी । किन्तु नियम, विनियम या अधिसूचना के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडे़गा ।]
[पहली अनुसूची
[धारा 21 (3), धारा 21क (3) और धारा 22 देखिए]
भाग 1
व्यवसाय करने वाले लागत लेखापालों के संबंध में वृत्तिक अवचार
व्यवसाय करने वाला कोई लागत लेखापाल वृत्तिक अवचार का दोषी उस दशा में समझा जाएगा, जिसमें कि वह-
(1) किसी व्यक्ति को अपने नाम से लागत लेखापाल के रूप में व्यवसाय करने के लिए तब अनुज्ञात करता है, जबकि ऐसा व्यक्ति भी व्यवसाय करने वाला लागत लेखापाल नहीं है और उसके साथ भागीदारी में या उसके नियोजन में नहीं है;
(2) संस्थान के सदस्य या भागीदार या भागीदारी से अलग हो गए किसी भागीदार से या किसी मृतक भागीदार के विधिक प्रतिनिधि से या किसी अन्य वृत्तिक निकाय के सदस्य से भिन्न किसी व्यक्ति को या ऐसी अर्हताएं, जो समय-समय पर भारत में या भारत से बाहर ऐसी वृत्तिक सेवाएं देने के प्रयोजन के लिए विहित की जाएं, रखने वाले किसी अन्य व्यक्ति को अपने वृत्तिक कारबार की फीस या लाभ में कोई अंश, कमीशन या दलाली प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः संदाय करता है या संदाय करने के लिए अनुज्ञात करता है या सहमत होता है या संदान करने या अनुज्ञात करने के लिए सहमत होता है ।
स्पष्टीकरण-इस मद में भागीदार" के अन्तर्गत ऐसा व्यक्ति भी है जो भारत के बाहर निवासी है और जिसके साथ व्यवसाय करने वाला कोई लागत लेखापाल ऐसी भागीदारी में शामिल हो गया है जो इस भाग की मद (4) का उल्लंघन नहीं करती है;
(3) किसी ऐसे व्यक्ति के, जो संस्थान का सदस्य नहीं है, वृत्तिक कार्य के लाभ का कोई भाग प्रतिगृहीत करता है या प्रतिगृहीत करने के लिए सहमत होता है:
परन्तु इसमें अंतर्विष्ट किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह किसी सदस्य को, ऐसे वृत्तिक निकाय के सदस्य या अन्य व्यक्ति के साथ जिसके पास इस भाग की मद (2) में निर्दिष्ट अर्हताएं हैं, लाभ में हिस्सा बंटाने या उसी प्रकार की अन्य व्यवस्था में जिसके अन्तर्गत फीसों में अंश, कमीशन या दलाली प्राप्त करना भी है, शामिल होने से प्रतिषिद्ध करने वाली है;
(4) व्यवसाय करने वाले किसी लागत लेखापाल से भिन्न किसी व्यक्ति के साथ या ऐसे अन्य व्यक्ति के साथ, जो किसी अन्य वृत्तिक निकाय का सदस्य है और जिसके पास ऐसी अर्हताएं हैं जो विहित की जाएं, जिसके अन्तर्गत ऐसा निवासी भी है जो विदेश में अपने निवास के कारण धारा 4 की उपधारा (1) के खण्ड (iv) के अधीन संस्थान के सदस्य के रूप में रजिस्ट्रीकृत होने के लिए हकदार होता या जिसकी अर्हताओं को ऐसी भागीदारियों को अनुज्ञात करने के प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार या परिषद् द्वारा मान्यता दी गई है, भारत में या भारत से बाहर भागीदारी में शामिल होता है ;
(5) ऐसे किसी व्यक्ति की, जो ऐसे लागत लेखापाल का कर्मचारी नहीं है या जो उसका भागीदार नहीं है, सेवाओं के माध्यम से या ऐसे साधनों द्वारा जिन्हें उपयोग करना किसी लागत लेखापाल के लिए अनुज्ञेय नहीं है, कोई वृत्तिक कारबार प्राप्त करता है:
परन्तु इसमें की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह इस भाग की मद (2), मद (3) और मद (4) के निबंधनों के अनुसार किसी व्यवस्था को प्रतिषिद्ध करने वाला है;
(6) परिपत्र, विज्ञापन, वैयक्तिक पत्र-व्यवहार या साक्षात्कार या किसी अन्य साधन द्वारा मुवक्किल या वृत्तिक कार्य पाने के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से याचना करता है:
परन्तु इसमें अन्तर्विष्ट किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह: -
(i) किसी लागत लेखापाल को, व्यवसाय करने वाले किसी अन्य लागत लेखापाल से वृत्तिक कार्य के लिए आवेदन करने, अनुरोध करने या उसे आमंत्रित करने या प्राप्त करने से; या
(ii) किसी सदस्य को समय-समय पर वृत्तिक सेवाओं के विभिन्न उपयोगकर्ताओं या संगठनों द्वारा जारी की गई निविदाओं या परिप्रश्नों का प्रत्युत्तर देने और परिणामतः वृत्तिक कार्य प्राप्त करने से,
निवारित या प्रतिषिद्ध करने वाली है;
(7) अपनी वृत्तिक उपलब्धियों या सेवाओं का विज्ञापन या वृत्तिक दस्तावेजों, परिचय कार्डों, पत्र शीर्षकों या नाम-पट्टों पर लागत लेखापाल से भिन्न अभिधान या पदों का प्रयोग तब करता है जबकि वह भारत में विधि द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय की या केन्द्रीय सरकार द्वारा मान्यताप्राप्त उपाधि नहीं है या [भारतीय लागत लेखापाल संस्थान] की या किसी अन्य संस्था की सदस्यता उपदर्शित करने वाली ऐसी उपाधि नहीं है जिसे केन्द्रीय सरकार ने मान्यता दे रखी है या जिसे परिषद् ने मान्यता दी हो:
परन्तु व्यवसाय करने वाला कोई सदस्य उसके या उसकी फर्म द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली सेवाओं और उसकी फर्म की विशिष्टियों का ऐसे मार्गदर्शक सिद्धांतों के अधीन रहते हुए जो परिषद् द्वारा जारी किए जाएं, उपवर्णित करते हुए किसी लेख के माध्यम से विज्ञापन कर सकेगा;
(8) लागत लेखापाल के रूप में ऐसा कोई पद, जो तत्पूर्व व्यवसाय करने वाले किसी अन्य लागत लेखापाल द्वारा धारित था, पहले उससे लिखित पत्र-व्यवहार किए बिना प्रतिगृहीत करता है;
(9) इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किन्हीं विनियमों के अधीन जिन दशाओं में ऐसा करना अनुज्ञात है, उनसे भिन्न दशाओं में, किसी वृत्तिक नियोजन के संबंध में ऐसी फीस को, जो लाभों के किसी प्रतिशत पर आधारित है या जो ऐसे नियोजन के निष्कर्षों या परिणाम पर समाश्रित है, प्रभारित करता है या प्रभारित करने की प्रस्थापना करता है या प्रतिगृहीत करता है या प्रतिगृहीत करने की प्रस्थापना करता है;
(10) लागत लेखापाल की वृत्ति से भिन्न किसी कारबार या उपजीविका में उस दशा में लगता है जबकि परिषद् द्वारा ऐसा करने के लिए उसे अनुज्ञा नहीं दी गई है:
परन्तु इसमें की कोई बात, किसी लागत लेखापाल को किसी कंपनी का निदेशक होने से (जो प्रबंध-निदेशक या पूर्णकालिक निदेशक नहीं है) तब के सिवाय हक से वंचित नहीं करेगी जबकि वह या उसके भागीदार में से कोई भी भागीदार लेखापाल के रूप में ऐसी कंपनी में हितबद्ध नहीं है;
(11) ऐसे व्यक्ति को, जो संस्थान का व्यवसाय करने वाला सदस्य नहीं है या ऐसे सदस्य को, जो उसका भागीदार नहीं है, अपनी ओर से या अपनी फर्म की ओर से किन्हीं लागत या मूल्यांकन विवरणों या उनसे संबद्ध किन्हीं और विवरणों को हस्ताक्षरित करने के लिए अनुज्ञात करता है ।
भाग 2
संस्थान के सेवारत सदस्यों से संबंधित वृत्तिक अवचार
यदि संस्थान का कोई सदस्य (व्यवसाय करने वाले सदस्य से भिन्न) किसी कंपनी, फर्म या व्यक्ति का कर्मचारी होते हुए-
(1) उसके द्वारा ग्रहण किए गए नियोजन की उपलब्धियों का कोई अंश, प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः किसी व्यक्ति को संदाय करता है या संदाय किए जाने को अनुज्ञात करता है, या संदाय किए जाने के लिए सहमत होता है,
(2) ऐसी कम्पनी, फर्म या व्यक्ति या ऐसी कम्पनी, फर्म या व्यक्ति के अभिकर्ता या मुवक्किल द्वारा नियुक्त विधि व्यवसायी, लागत लेखापाल या दलाल से, फीसों, लाभोंया अभिलाभों का कोई भाग कमीशन या परितोषण के रूप में प्रतिगृहीत करता है, या प्रतिगृहीत करने के लिए सहमत हो ता है,
तो वह वृत्तिक अवचार का दोषी समझा जाएगा ।
भाग 3
संस्थान के सदस्यों के संबंध में साधारणतः वृत्तिक अवचार
यदि संस्थान का कोई सदस्य, चाहे वह व्यवसाय कर रहा हो या नहीं, -
(1) संस्थान का अध्येता न होते हुए संस्थान के अध्येता के रूप में कार्य करता है;
(2) संस्थान, परिषद् या उसकी किसी समिति, निदेशक (अनुशासन), अनुशासन बोर्ड, अनुशासन समिति, क्वालिटी पुनर्विलोकन बोर्ड या अपील अधिकरण द्वारा मांगी गई जानकारी नहीं देता या उन अपेक्षाओं का अनुपालन नहीं करता है, जिनके बारे में मांग की गई है;
(3) किसी अन्य लागत लेखापाल से वृत्तिक कार्य आमंत्रित करते समय या निविदाओं या परिप्रश्नों का उत्तर देते समय या किसी लेख के माध्यम से विज्ञापन देते समय या इस सूची के भाग 1 की मद (6) और मद (7) के लिए यथा उपबंधित कोई बात करते समय, ऐसी सूचना देता है जिसके बारे में वह जानता है कि वह मिथ्या है,
तो वह वृत्तिक अवचार का दोषी समझा जाएगा ।
भाग 4
संस्थान के सदस्यों के संबंध में साधारणतः अन्य अवचार
यदि संस्थान का कोई सदस्य, चाहे वह व्यवसाय कर रहा हो या नहीं, -
(1) किसी सिविल या दण्ड न्यायालय द्वारा ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जाता है, जो छह मास से अनधिक अवधि के कारावास से दण्डनीय है;
(2) परिषद् की राय में, उसने अपने कार्यों से चाहे वे उसके वृत्तिक कार्य से संबंधित हों या नहीं, वृत्ति या संस्थान की प्रतिष्ठा गिराता है,
तो वह अन्य अवचार का दोषी समझा जाएगा ।
दूसरी अनुसूची
[धारा 21(3), धारा 21ख (3) और धारा 22 देखिए]
भाग 1
व्यवसाय करने वाले लागत लेखापालों से संबंधित वृत्तिक अवचार
यदि व्यवसाय करने वाला लागत लेखापाल-
(1) अपने मुवक्किल की सम्मति के बिना या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा यथा अपेक्षित से अन्यथा, अपने वृत्तिक कार्य के दौरान मिली जानकारी अपने मुवक्किल से जिसने उसे नियुक्त किया है, भिन्न किसी व्यक्ति को प्रकट करता है;
(2) लागत लेखा और सम्बद्ध विवरणों की परीक्षा की रिपोर्ट अपने नाम से या अपनी फर्म के नाम से तब प्रमाणीकृत करता है या देता है; जबकि ऐसे विवरणों की परीक्षा, उसके द्वारा या उसकी फर्म के किसी भागीदार या कर्मचारी द्वारा या व्यवसाय करने वाले किसी अन्य लागत लेखापाल द्वारा नहीं की गई है;
(3) ऐसी रीति से जिससे यह विश्वास हो जाए कि वह पूर्वानुमान का ठीक होना प्रमाणित करता है, अपने नाम को या अपनी फर्म के नाम को, लागत या उन उपार्जनों के प्राक्कलन के संबंध में जो कि भविष्यवर्ती संव्यवहारों पर समाश्रित है, प्रयुक्त करने की अनुज्ञा देता है;
(4) किसी कारबार या उद्यम के लागत या मूल्यांकन विवरणों पर, जिसमें उसका, उसकी फर्म या उसकी फर्म के किसी भागीदार का सारवान् रूप से हित है, अपनी राय प्रकट करता है;
(5) किसी लागत या मूल्यांकन विवरण में उसे ज्ञात ऐसे तात्त्विक तथ्य को, जिसे किसी लागत या मूल्यांकन विवरण में प्रकट नहीं किया गया है, किन्तु जिसका प्रकट किया जाना ऐसा कथन करने में आवश्यक है जहां ऐसे कथन से उसका संबंध वृत्तिक हैसियत में है, प्रकट करने में असफल रहता है;
(6) ऐसे किसी लागत या मूल्यांकन विवरण में, जिससे उसका वृत्तिक हैसयित में संबंध है, ऐसे किसी तात्त्विक अशुद्ध कथन की रिपोर्ट में जो उसे ज्ञात है, प्रकट करने में असफल रहता है;
(7) अपने वृत्तिक कर्तव्यों के निर्वहन में सम्यक् तत्परता नहीं बरतता है या घोर उपेक्षा करता है;
(8) ऐसी पर्याप्त जानकारी अभिप्राप्त करने में असफल रहता है, जो किसी राय की अभिव्यक्ति के लिए आवश्यक है या जिसके अपवाद राय की अभिव्यक्ति को नकारने के लिए पर्याप्त रूप से सारवान् हैं;
(9) परिस्थितियों में साधारणतः जो लागत और मूल्यांकन प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए, उससे किसी तात्त्विक विच्युति के प्रति ध्यान आकृष्ट नहीं करता है;
(10) फीस या परिलब्धि या खर्च किए जाने के लिए रखे गए रुपए-पैसे से भिन्न अपने मुवक्किल के रुपए-पैसे पृथक् बैंक खाते में नहीं रखता है या ऐसे रुपए-पैसे को युक्तियुक्त समय के भीतर उन प्रयोजनों के लिए प्रयोग नहीं करता है जिनके लिए उसका प्रयुक्त किया जाना आशयित है,
तो वह वृत्तिक अवचार का दोषी समझा जाएगा ।
भाग 2
संस्थान के सदस्यों के संबंध में साधाणतः वृत्तिक अवचार
यदि संस्थान का कोई सदस्य, चाहे वह व्यवसाय में हो, या नहीं-
(1) इस अधिनियम के उपबंधों या तद्धीन बनाए गए विनियमों या परिषद् द्वारा जारी किए गए किन्हीं मार्गदर्शक सिद्धांतों को उल्लंघन करता है;
(2) किसी कंपनी, फर्म या किसी व्यक्ति का कर्मचारी होते हुए तब के सिवाय अपने नियोजन के अनुक्रम में अर्जित गोपनीय सूचना को प्रकट करता है, जब तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा ऐसी अपेक्षा की जाती है या नियोजक द्वारा अनुज्ञात किया जाता है;
(3) संस्थान, परिषद् या उसकी किसी समिति या निदेशक (अनुशासन) अनुशासन बोर्ड, अनुशासन समिति, क्वालिटी पुनर्विलोकन बोर्ड या अपील प्राधिकरण को पेश की जाने वाली किसी सूचना, कथन, विवरणी या प्ररूप में ऐसी विशिष्टियां सम्मिलित करता है जिनके बारे में वह यह जानता है कि वे मिथ्या हैं;
(4) अपनी वृत्तिक हैसियत में प्राप्त धनराशि को हड़पता है या उसका गबन करता है,
तो वह वृत्तिक अवचार का दोषी समझा जाएगा ।
भाग 3
संस्थान के सदस्यों के संबंध में साधारणतः अन्य अवचार
संस्थान का कोई सदस्य, चाहे वह व्यवसाय में हो या नहीं तब अन्य अवचार का दोषी समझा जाएगा जब उसे किसी सिविल या दण्ड न्यायालय द्वारा किसी ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध ठहराया जाता है, जो छह मास से अधिक अवधि के कारवास से दण्डनीय है ।]
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