नियम
दहेज प्रतिषेध (वर-वधु भेंट सूची) नियम, 1985
सा. का. नि. 664(अं) - केन्द्रीय सरकार, दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 (1961 का 28) की धारा 9 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, निम्नलिखित नियम बनाती है: -
1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ - (1) इन नियमों का संक्षिप्त नाम दहेज प्रतिषेध (वर-वधु भेंट सूची) नियम, 1985 है ।
(2) ये 2 अक्तूबर, 1985 को प्रवृत्त होंगे या दहेज प्रतिषेध (संशोधन) अधिनियम, 1984 (1984 का 63) के प्रवृत्त होने के लिए नियत की गई तारीख है ।
2. नियम जिनके अनुसार भेंटों की सूचियां रखी जानी हैं - (1) विवाह के समय जो भेंटें वधू को दी जाती हैं उनकी एक सूची वधू रखेगी ।
(2) विवाह के समय जो भेंटें वर को दी जाती हैं उनकी एक सूची वर रखेगा ।
(3) उपनियम (1) या उपनियम (2) में निर्दिष्ट भेंटों की प्रत्येक सूची, -
(क) विवाह के समय या विवाह के पश्चात् यथासंभव शीघ्र तैयार की जाएगी;
(ख) लिखित में होगी;
(ग) उसमें होगा -
(i) प्रत्येक भेंट का संक्षिप्त विवरण;
(ii) भेंट का अनुमानित मूल्य;
(iii) उस व्यक्ति का नाम जिसने भेंट दी है; और
(iv) यदि वह व्यक्ति जिसने भेंट दी है वधू या वर का नातेदार है तो ऐसी नातेदारी का विवरण ;
(v) वर और वधू दोनों द्वारा हस्ताक्षरित होगी ।
स्पष्टीकरण 1 - जहां वधू हस्ताक्षर करने में असमर्थ है, वहां वह उसे सूची पढ़कर सुनाई जाने के पश्चात् और उस व्यक्ति के, जिसने सूची में दी गई विशिष्टियों को इस प्रकार पढ़कर सुनाया है, उस सूची पर हस्ताक्षर प्राप्त करने के पश्चात् अपने हस्ताक्षर करने के बदले अपने अंगूठे का निशान लगा सकेगी ।
स्पष्टीकरण 2 - जहां वर हस्ताक्षर करने में असमर्थ है, वहां वह उसे सूची पढ़कर सुनाई जाने के पश्चात् और उस व्यक्ति के, जिसने सूची में दी गई विशिष्टियों को इस प्रकार पढ़कर सुनाया है, उस सूची पर हस्ताक्षर प्राप्त करने के पश्चात् अपने हस्ताक्षर करने के बदले अपने अंगूठे का निशान लगा सकेगा ।
(4) वर या वधू, यदि ऐसा चाहे तो उपनियम (1) या उपनियम (2) में निर्दिष्ट सूचियों में से किसी एक पर या दोनों पर अपने किसी नातेदार या किन्हीं नातेदारों या विवाह के समय उपस्थित किसी अन्य व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों के हस्ताक्षर प्राप्त कर सकती है ।
ट्ठट्ठट्ठट्ठट्ठट्ठट्ठ
उपाबंध
भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) से उद्धरण
। । । । ।
अध्याय 20क
पति या पति के नातेदारों द्वारा क्रूरता के विषय में
498क. किसी स्त्री के पति या पति के नातेदार द्वारा उसके प्रति क्रूरता करना - जो कोई, किसी स्त्री का पति या पति का नातेदार होते हुए, ऐसी स्त्री के प्रति क्रूरता करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।
स्पष्टीकरण - इस धारा के प्रयोजनों के लिए, क्रूरता" से निम्नलिखित अभिप्रेत है :-
(क) जानबूझकर किया गया कोई आचरण जो ऐसी प्रकृति का है जिससे उस स्त्री को आत्महत्या करने के लिए प्रेरित करने को या उस स्त्री के जीवन, अंग या स्वास्थ्य को (जो चाहे मानसिक हो या शारीरिक) गंभीर क्षति या खतरा कारित करने की संभावना है ; या
(ख) किसी स्त्री को इस दृष्टि से तंग करना कि उसको या उसके किसी नातेदार को किसी संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति की कोई मांग पूरी करने के लिए प्रपीड़ित किया जाए या किसी स्त्री को इस कारण तंग करना कि उसका कोई नातेदार ऐसी मांग पूरी करने में असफल रहा है ।
। । । । ।
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का अधिनियम संख्यांक 2) से उद्धरण
। । । । । ।
174. आत्महत्या आदि पर पुलिस का जांच करना और रिपोर्ट देना - (1) जब पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी, या राज्य सरकार द्वारा उस निमित्त विशेषतया सशक्त किए गए किसी अन्य पुलिस अधिकारी को यह इत्तिला मिलती है कि किसी व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली है, अथवा कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति द्वारा या जीवजंतु द्वारा या किसी यंत्र द्वारा या दुर्घटना द्वारा मारा गया है, अथवा कोई व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों में मरा है जिनसे उचित रूप से यह संदेह होता है कि किसी अन्य व्यक्ति ने कोई अपराध किया है तो वह मृत्यु समीक्षाएं करने में सशक्त निकटतम कार्यपालक मजिस्ट्रेट को तुरन्त उसकी सूचना देगा और जब तक राज्य सरकार द्वारा विहित किसी नियम द्वारा या जिला या उपखंड मजिस्ट्रेट के किसी साधारण या विशेष आदेश द्वारा अन्यथा निर्दिष्ट न हो वह उस स्थान को जाएगा जहां ऐसे मृत व्यक्ति का शरीर है और वहां पड़ोस के दो या अधिक प्रतिष्ठित निवासियों की उपस्थिति में, अन्वेषण करेगा और मृत्यु के दृश्यमान कारण की रिपोर्ट तैयार करेगा जिसमें ऐसे घावों, अस्थिभंगों, नीलों और क्षति के अन्य चिन्हों का, जो शरीर पर पाए जाएं, वर्णन होगा और यह कथन होगा कि ऐसे चिन्ह किस प्रकार से और किस आयुध या उपकरण द्वारा (यदि कोई हो) किए गए प्रतीत होते हैं ।
(2) उस रिपोर्ट पर ऐसे पुलिस अधिकारी और अन्य व्यक्तियों द्वारा, या उनमें से इतनों द्वारा जो उससे सहमत हैं, हस्ताक्षर किए जाएंगे और वह जिला मजिस्ट्रेट या उपखंड मजिस्ट्रेट को तत्काल भेज दी जाएंगी ।
(3) जब -
(i) मामला किसी स्त्री द्वारा उसके विवाह की तारीख के सात वर्ष के भीतर आत्महत्या अंतर्वलित है ; या
(ii) मामला किसी स्त्री की उसके विवाह के सात वर्ष के भीतर ऐसी परिस्थितियों में मृत्यु से संबंधित है, जो यह युक्तियुक्त संदेह उत्पन्न करती है कि किसी अन्य व्यक्ति ने ऐसी स्त्री के संबंध में कोई अपराध किया है ; या
(iii) मामला किसी स्त्री की उसके विवाह के सात वर्ष के भीतर मृत्यु से संबंधित है और उस स्त्री के किसी नातेदार ने उस निमित्त निवेदन किया है ; या
(iv) मृत्यु के कारण की बाबत कोई संदेह है ; या
(v) किसी अन्य कारण पुलिस अधिकारी ऐसा करना समीचीन समझता है, तब ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त विहित किए जाएं, वह अधिकारी यदि मौसम ऐसा है और दूरी इतनी है कि रास्ते में शरीर के ऐसे सड़ने की जोखिम के बिना, जिससे उसकी परीक्षा व्यर्थ हो जाए, उसे भिजवाया जा सकता है तो शरीर को उसकी परीक्षा की दृष्टि से, निकटतम सिविल सर्जन के पास या राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त नियुक्त अन्य अर्हित चिकित्सक के पास भेजेगा ।
(4) निम्नलिखित मजिस्ट्रेट मृत्यु-समीक्षा करने के लिए सशक्त है, अर्थात् कोई जिला मजिस्ट्रेट या उपखंड मजिस्ट्रेट और राज्य सरकार द्वारा या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा इस निमित्त विशेषतया सशक्त किया गया कोई अन्य कार्यपालक मजिस्ट्रेट ।
। । । । ।
176. मृत्यु के कारण की मजिस्ट्रेट द्वारा जांच - (1) जब कोई व्यक्ति पुलिस की अभिरक्षा में रहते हुए मर जाता है या जब मामला धारा 174 की उपधारा (3) के खंड (i) या खंड (ii) में निर्दिष्ट प्रकृति का है तब मृत्यु के कारण की जांच, पुलिस अधिकारी द्वारा किए जाने वाले अन्वेषण के बजाय या उसके अतिरिक्त वह निकटतम मजिस्ट्रेट करेगा जो मृत्यु-समीक्षा करने के लिए सशक्त है और धारा 174 की उपधारा (1) में वर्णित किसी अन्य दशा में इस प्रकार सशक्त किया गया कोई भी मजिस्ट्रेट कर सकेगा, और यदि वह ऐसा करता है तो उसे ऐसी जांच करने में वे सब शक्तियां होंगी जो उसे किसी अपराध की जांच करने में होती ।
(2) ऐसी जांच करने वाला मजिस्ट्रेट उसके संबंध में लिए गए साक्ष्य को इसमें इसके पश्चात् विहित किसी प्रकार से, मामले की परिस्थितियों के अनुसार अभिलिखित करेगा ।
(3) जब कभी ऐसे मजिस्ट्रेट के विचार में यह समीचीन है कि किसी व्यक्ति के, जो पहले ही गाड़ दिया गया है, मृत शरीर की इसलिए परीक्षा की जाए कि उसकी मृत्यु के कारण का पता चले तब मजिस्ट्रेट उस शरीर को निकलवा सकता है और उसकी परीक्षा करा सकता है ।
(4) जहां कोई जांच इस धारा के अधीन की जानी है वहां मजिस्ट्रेट, जहां कहीं साध्य है, मृतक के उन नातेदारों को, जिनके नाम और पते ज्ञात हैं, इत्तिला देगा और उन्हें जांच के समय उपस्थित रहने की अनुज्ञा देगा ।
स्पष्टीकरण - इस धारा में नातेदार" पद से माता-पिता, संतान, भाई-बहिन और पति या पत्नी अभिप्रेत हैं ।
। । । । ।
198क. भारतीय दंड संहिता की धारा 498क के अधीन अपराधों का अभियोजन - कोई न्यायालय भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 498क के अधीन दंडनीय अपराध का संज्ञान ऐसे अपराध को गठित करने वाले तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट पर अथवा अपराध से व्यथित व्यक्ति द्वारा या उसके पिता, माता, भाई, बहिन या उसके पिता अथवा माता के भाई या बहिन द्वारा किए गए परिवाद पर या रक्त, विवाह या दत्तक ग्रहण द्वारा उससे संबंधित किसी अन्य व्यक्ति द्वारा न्यायालय की इजाजत से किए गए परिवाद पर ही करेगा अन्यथा नहीं ।
। । । । ।
पहली अनुसूची
। । । । ।
|
1. भारतीय दंड संहिता के अधीन अपराध |
|||||
|
धारा |
अपराध दंड |
संज्ञेय या असंज्ञेय |
जमानतीय या अजमानतीय |
किस न्यायालय द्वारा विचारणीय है |
|
|
(1) |
(2) |
(3) |
(4) |
(5) |
(6) |
|
498क |
किसी विवाहित स्त्री के प्रति क्रूरता करने के लिए दंड तीन वर्ष के लिए कारावास और जुर्माना |
अध्याय 20क - पति या पति के नातेदारों द्वारा क्रूरता के विषय में
|
संज्ञेय यदि अपराध किए जाने से संबंधित इत्तिला पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को अपराध से व्यथित व्यक्ति अजमानतीय |
प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट |
|
------------

