राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने एक अहम और रिपोर्टेबल फैसले में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, जोधपुर को बड़ी राहत दी है। जस्टिस आनंद शर्मा की एकल पीठ ने इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल एंड लेबर कोर्ट, जोधपुर के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एम्स को अपने पक्ष के लिए वकील नियुक्त करने से रोक दिया गया था।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब एक पक्षकार यूनियन पदाधिकारी की आड़ में वकील से पैरवी करवा रहा हो, तो दूसरे पक्ष को कानूनी प्रतिनिधित्व से वंचित करना समानता के अधिकार और प्राकृतिक न्याय का खुला उल्लंघन है।
कर्मचारी की बर्खास्तगी और ट्रिब्यूनल की रोक
मामले के अनुसार- एम्स में नर्सिंग ऑफिसर के पद पर कार्यरत बीकानेर निवासी हंसराज शर्मा को अनुशासनात्मक कार्यवाही पूरी होने के बाद 23 मार्च 2023 को सेवा से हटा दिया गया था। इसके खिलाफ कर्मचारी ने 'औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947' के तहत लेबर कोर्ट में वाद दायर किया था।
सुनवाई के दौरान कर्मचारी ने धारा 36 का हवाला देते हुए एम्स के वकील के.एस. यादव की पैरवी पर आपत्ति जताई। लेबर कोर्ट ने 16 मई 2024 को इस आपत्ति को स्वीकार करते हुए एम्स को कानूनी व्यवसायी के माध्यम से पैरवी करने से रोक दिया, जिसे एम्स ने याचिका के जरिए हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
वकीलों के तर्क: अधिनियम की धारा 36 पर बहस
याचिकाकर्ता एम्स की ओर से वकील निधि सिंघवी ने तर्क दिया कि अधिनियम की धारा 36 कानूनी प्रतिनिधित्व पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाती है। वकील ने कोर्ट को बताया कि खुद कर्मचारी की पैरवी भागीरथ चंदोरा कर रहे हैं, जो एक नामांकित वकील हैं, लेकिन वे एक यूनियन के पदाधिकारी की आड़ में पेश हो रहे हैं। ऐसे में कर्मचारी विरोधाभासी स्टैंड नहीं ले सकता।
एम्स एक वैधानिक निकाय है और उसे कानूनी प्रतिनिधित्व से रोकना अनुचित है। इसके समर्थन में उड़ीसा हाईकोर्ट के 'महानदी कोलफील्ड्स' और बॉम्बे हाईकोर्ट के 'टी.के. वर्गीज' मामलों के फैसलों का हवाला दिया गया।
प्रतिवादी कर्मचारी की ओर से अधिवक्ता सुनील पुरोहित ने तर्क दिया कि धारा 36(4) के तहत वकील से पैरवी के लिए दूसरे पक्ष की सहमति और ट्रिब्यूनल की अनुमति आवश्यक है। उन्होंने कहा कि उनके प्रतिनिधि पेशेवर क्षमता में नहीं, बल्कि यूनियन पदाधिकारी के रूप में पेश हो रहे हैं, जो कि धारा 36(1) के तहत जायज है।
प्रतिवादी के वकील ने अपने तर्कों के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के 'थायसेन क्रुप इंडस्ट्रीज' और 'पारादीप पोर्ट ट्रस्ट' व राजस्थान हाईकोर्ट की समन्वय पीठ के 'अंबुजा सीमेंट्स' मामले की नज़ीरें पेश करते हुए याचिका खारिज करने का आग्रह किया।
कोर्ट: समानता का अधिकार सर्वोपरि
दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद कोर्ट ने माना कि धारा 36(4) प्रतिनिधित्व पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाती, बल्कि यह ट्रिब्यूनल को विशेषाधिकार देती है, जिसका उपयोग न्यायिक विवेक से होना चाहिए।
कोर्ट ने पाया कि कर्मचारी के प्रतिनिधि एक सक्रिय कानूनी व्यवसायी हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक पक्ष को कानूनी सहायता लेने देना और दूसरे को उसी अधिकार से रोकना अनुचित है और इससे पक्षपातपूर्ण स्थिति पैदा होती है।
कोर्ट ने प्रतिवादी की ओर से पेश की गई नज़ीरों को इस मामले से भिन्न माना, क्योंकि उन मामलों में ऐसा नहीं था कि एक पक्ष पहले से वकील की ओर से पैरवी करवा रहा हो और फिर भी दूसरे को रोका गया हो।
अदालत ने अपने विश्लेषण में उड़ीसा और बॉम्बे हाईकोर्ट के साथ-साथ मद्रास हाईकोर्ट के 'रजिस्ट्रार, अन्ना यूनिवर्सिटी' मामले का विशेष हवाला देते हुए ट्रिब्यूनल के आदेश को अवैध और विकृत माना।
अंतिम निर्देश: एम्स को मिली वकील रखने की अनुमति
इन आधारों पर कोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए लेबर कोर्ट के 16 मई 2024 के आदेश को निरस्त कर दिया है। अंतिम आदेश पारित करते हुए कोर्ट ने एम्स को वकील के.एस. यादव या अपनी पसंद के किसी अन्य वकील के माध्यम से ट्रिब्यूनल में पैरवी करने की अनुमति प्रदान की है। कोर्ट ने ट्रिब्यूनल को कानून के अनुसार जल्द कार्यवाही पूरी करने के निर्देश दिए हैं।
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