बागान श्रम अधिनियम, 1951
(1951 का अधिनियम संख्यांक 69)
[2 नवम्बर, 1951]
बागान में श्रमिकों के कल्याण का उपबंध करने
और काम की परिस्थितियों का
विनियमन करने के लिए
अधिनियम
संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो -
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार, प्रारम्भ और लागू होना-(1) यह अधिनियम बागान श्रम अधिनियम, 1951 कहा जा सकेगा ।
(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे ।
[(4) यह निम्नलिखित बागान को लागू होता है, अर्थात्: -
(क) चाय, काफी, बड़ [सिनकोना या इलायची उगाने के लिए उपयोग में लाई जा रही या उपयोग में लाई जाने के लिए आशयित कोई भूमि जो माप में [5 हैक्टर] या अधिक है और जिसमें [पन्द्रह] या अधिक व्यक्ति नियोजित हैं या पूर्वगामी बारह मास में किसी भी दिन नियोजित थे;
(ख) कोई अन्य पौधा उगाने के लिए उपयोग में लाई जा रही या उपयोग में लाई जाने के लिए आशयित कोई भूमि जो माप में 5[5 हैक्टर] या अधिक है और जिसमें 6[पन्द्रह] या अधिक व्यक्ति नियोजित हैं या पूर्वगामी बारह मास में किसी भी दिन नियोजित थे: यदि केन्द्रीय सरकार का अनुमोदन अभिप्राप्त करने के पश्चात् राज्य सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ऐसा निदेश दे ।]
[स्पष्टीकरण-जहां इस उपधारा के खण्ड (क) या खण्ड (ख) में निर्दिष्ट किसी पौधे को उगाने के लिए उपयोग में लाई जा रही कोई भूमि माप में 5 हेक्टर से कम है और किसी अन्य भूमि से जिसका उपयोग इस प्रकार नहीं किया जा रहा है किन्तु जिसका उपयोग इस प्रकार किया जा सकता है, लगी हुई है और ऐसी दोनों भूमियां एक ही नियोजक के प्रबन्ध के अधीन हैं, वहां इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए प्रथम वर्णित भूमि बागान समझी जाएगी, यदि ऐसी दोनों भूमियों का कुल क्षेत्रफल माप में 5 हेक्टर या अधिक है ।]
(5) राज्य सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा घोषित कर सकेगी कि इस अधिनियम के सब उपबन्ध या उनमें से कोई उपधारा (4) के खंड (क) या खंड (ख) में निर्दिष्ट किसी पौधे को उगाने के लिए उपयोग में लाई जा रही या उपयोग में लाई जाने के लिए आशयित किसी भूमि को इस बात के होते हुए भी लागू होंगे कि-
(क) वह माप में 5[5 हैक्टर] से कम है; अथवा
(ख) उसमें नियोजित व्यक्तियों की संख्या 6[पन्द्रह] से कम है:
परन्तु ऐसी कोई भी घोषणा किसी ऐसी भूमि के बारे में नहीं की जाएगी जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के अव्यवहित पूर्व माप में 5[5 हेक्टर] से कम थी या जिसमें तब 6[पन्द्रह] से कम व्यक्ति नियोजित थे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) कुमार" से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसने अपना [चौदहवां] वर्ष पूरा कर लिया है किन्तु अपना अठारहवां वर्ष पूरा नहीं किया है;
(ख) वयस्थ" से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसने अपना अठारहवां वर्ष पूरा कर लिया है;
(ग) बालक" से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसने अपना [चौदहवां] वर्ष पूरा नहीं किया है;
(घ) दिन" से मध्यरात्रि को आरम्भ होने वाली चौबीस घंटों की कालावधि अभिप्रेत है;
(ङ) नियोजक" से, जब कि वह बागान के संबंध में प्रयुक्त किया गया है, वह व्यक्ति अभिप्रेत है जिसका उस बागान के कार्यकलाप पर अंतिम नियंत्रण है और जहां कि किसी बागान के कार्यकलाप किसी अन्य व्यक्ति को (चाहे वह प्रबन्ध-अभिकर्ता, प्रबन्धक, अधीक्षक या किसी भी अन्य नाम से पुकारा जाए) न्यस्त किए गए हों वहां ऐसा अन्य व्यक्ति उस बागान के संबंध में नियोजक समझा जाएगा ।
[स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, वह व्यक्ति अभिप्रेत है जिसका उस बागान के कार्यकलापों पर अंतिम नियंत्रण है" से निम्नलिखित अभिप्रेत है, -
(i) किसी कंपनी, फर्म या अन्य व्यष्टि संगम, चाहे निगमित हो अथवा नहीं, के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन किसी बागान की दशा में, प्रत्येक निदेशक, भागीदार या व्यष्टि;
(ii) केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन किसी बागान की दशा में, बागान के कार्यकलापों का प्रबंध करने के लिए नियुक्त व्यक्ति; और
(iii) किसी पट्टेदार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन किसी बागान की दशा में, पट्टेदार;]
[(ङङ) कुटुम्ब" से, जब कि वह कर्मकार के संबंध में प्रयुक्त किया गया है, अभिप्रेत है-
(i) उसकी पत्नी या उसका पति, तथा
(ii) उस कर्मकार पर आश्रित उसकी ऐसी धर्मज और दत्तक संतान, जिसने अपना अठारहवां वर्ष पूरा नहीं किया है,
[और इसके अंतर्गत उस पर आश्रित उसके माता-पिता और विधवा बहन भी हैं;]
[(ङङङ) निरीक्षक" से धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त बागान-निरीक्षक अभिप्रेत है और उसके अन्तर्गत उस धारा की उपधारा (1क) के अधीन नियुक्त अपर बागान-निरीक्षक भी है;]
[(च) बागान" से कोई ऐसा बागान अभिप्रेत है जिसे यह अधिनियम पूर्णतः या भागतः लागू होता है और इसके अंतर्गत ऐसे बागान से संसक्त किसी प्रयोजन के लिए उपयोग में लाए जाने वाले कार्यालय, अस्पताल, औषधालय, पाठशालाएं और कोई अन्य परिसर आते हैं, किन्तु उस परिसर में स्थित कोई ऐसा कारखाना इसके अंतर्गत नहीं आता जिसे कारखाना अधिनियम, 1948 (1948 का 63) के उपबंध लागू होते हैं;]
(छ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
[(ज) अर्हित चिकित्सा-व्यवसायी" से भारतीय चिकित्सा उपाधि अधिनियम, 1916 (1916 का 7) की धारा 3 के अधीन विनिर्दिष्ट या अधिसूचित अथवा भारतीय चिकित्सा परिषद् अधिनियम, 1956 (1956 का 102) की अनुसूचियों में विनिर्दिष्ट किसी प्राधिकारी द्वारा अनुदत्त किसी अर्हता को धारण करने वाला व्यक्ति अभिप्रेत है, और किसी प्रांतीय या राज्य चिकित्सा परिषद् अधिनियम के अधीन अनुदत्त प्रमाणपत्र रखने वाला व्यक्ति इसके अन्तर्गत आता है;]
(झ) मजदूरी" का वही अर्थ है जो न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 (1948 का 11) की धारा 2 के खंड (ज) में उसे समनुदिष्ट है;
(ञ) सप्ताह" से शनिवार की रात्रि को या ऐसी अन्य रात्रि को मध्य रात्रि के प्रारम्भ होने वाली सात दिन की वह कालावधि अभिप्रेत है जो राज्य सरकार द्वारा किसी क्षेत्र में के बागान के संबंध में, ऐसे परामर्श के पश्चात् नियत की जाए, जो उस क्षेत्र में के संपृक्त बागान के प्रति निर्देश से विहित किया जाए;
[(ट) कर्मकार" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो बागान में कोई भी कुशल, अकुशल, शारीरिक या लिपिकीय काम करने के लिए, चाहे सीधे या किसी अभिकरण के माध्यम से, भाड़े या इनाम पर नियोजित है, [और इसके अंतर्गत ऐसा व्यक्ति भी है जो एक वर्ष में साठ दिन से अधिक के लिए ठेके पर नियोजित हैट किन्तु निम्नलिखित इसके अंतर्गत नहीं आते-]
(i) बागान में नियोजित चिकित्सक आफ़िसर;
(ii) बागान में नियोजित कोई व्यक्ति (जिसके अंतर्गत चिकित्सीय कर्मचारिवृन्द का कोई सदस्य आता है), जिसकी मासिक मज़दूरी [दस हजार रुपए] से अधिक है;
(iii) बागान में मुख्यतः 3[प्रबन्धकीय या प्रशासनिक] हैसयित में नियोजित कोई व्यक्ति, भले ही उसकी मासिक मजदूरी 1[दस हजार रुपए] से अधिक न हो; अथवा
(iv) निर्माणों, सड़कों, पुलों, नालियों, या नहरों के सन्निर्माण, विकास या अनुरक्षण से संबंधित किसी काम में बागान में अस्थायी तौर पर नियोजित कोई व्यक्ति;]
(ठ) अल्पवय व्यक्ति" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो या तो बालक या कुमार है ।
3. दिन के समय के प्रति निर्देश-इस अधिनियम में वे निर्देश जो दिन के समय के प्रति हैं भारतीय मानक समय के प्रति निर्देश हैं, जो ग्रिनविच माध्य समय से साढ़े पांच घंटे आगे है:
परन्तु किसी ऐसे क्षेत्र के लिए जिसमें मामूली तौर पर भारतीय मानक समय का अनुपालन नहीं होता, राज्य सरकार-
(क) उस क्षेत्र को विनिर्दिष्ट करने वाले;
(ख) उस स्थानीय माध्य समय को, जो मामूली तौर पर उसमें अनुपालित होता है, परिभाषित करने वाले; तथा
(ग) उस क्षेत्र में स्थित सब बागान में या उनमें से किसी में ऐसे समय का अनुपालन अनुज्ञात करने वाले,
नियम बना सकेगी ।
[अध्याय 1क
बागानों का रजिस्ट्रीकरण
3क. रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारियों की नियुक्ति-राज्य सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, -
(क) ऐसे व्यक्तियों को, जो सरकार के राजपत्रित अधिकारी हैं, जिन्हें वह ठीक समझे, इस अध्याय में प्रयोजनों के लिए, रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी नियुक्त कर सकेगी; और
(ख) उन सीमाओं को परिनिश्चित कर सकेगी जिनके भीतर कोई रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी इस अध्याय के द्वारा या उसके अधीन उसको प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग और उस पर अधिरोपित कृत्यों का निर्वहन करेगा ।
3ख. बागानों का रजिस्ट्रीकरण-(1) बागान श्रम (संशोधन) अधिनियम, 1981 के प्रारम्भ पर विद्यमान बागान का प्रत्येक नियोजक, ऐसे प्रारम्भ के साठ दिन की अवधि के भीतर और ऐसे प्रारम्भ के पश्चात् अस्तित्व में आने वाले किसी अन्य बागान का प्रत्येक नियोजक, ऐसे बागान के अस्तित्व में आने से साठ दिन की अवधि के भीतर ऐसे बागान के रजिस्ट्रीकरण के लिए रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी को आवेदन करेगा:
परन्तु यदि रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि आवेदक पर्याप्त हेतुक से ऐसी अवधि के भीतर आवेदन नहीं कर सकता था तो वह पूर्वोक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् ऐसे आवेदन को ग्रहण कर सकेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन किया गया प्रत्येक आवेदन ऐसे प्ररूप में होगा और उसमें ऐसी विशिष्टियां होंगी तथा उसके साथ उतनी फीस दी जाएगी जो विहित की जाए ।
(3) उपधारा (1) के अधीन किसी आवेदन की प्राप्ति के पश्चात्, रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी बागान को रजिस्टर करेगा ।
(4) जहां इस धारा के अधीन कोई बागान रजिस्टर किया जाता है, वहां रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी उसके नियोजक को एक रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र ऐसे प्ररूप में जारी करेगा, जो विहित किया जाए ।
(5) जहां इस धारा के अधीन किसी बागान के रजिस्ट्रीकरण के पश्चात् ऐसे बागान के स्वामित्व या प्रबन्ध में या उसके क्षेत्रफल के विस्तार या उसकी बाबत अन्य विहित विशिष्टियों में कोई परिवर्तन होता है, वहां ऐसे परिवर्तन की बाबत विशिष्टियां नियोजक द्वारा रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी को ऐसे परिवर्तन के तीस दिन के भीतर ऐसे प्ररूप में, जो विहित किया जाए, सूचित की जाएंगी ।
(6) जहां उपधारा (5) के अधीन प्राप्त किसी सूचना के परिणामस्वरूप रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि बागान का अब इस धारा के अधीन रजिस्टर किया जाना अपेक्षित नहीं है वहां वह लिखित आदेश द्वारा उसके रजिस्ट्रीकरण को रद्द कर देगा और यथासाध्य शीघ्र ऐसे किसी आदेश को उस क्षेत्र की, जिसमें बागान अवस्थित है, भाषा में और उस क्षेत्र में परिचालित किसी एक समाचारपत्र में प्रकाशित कराएगा ।
3ग. रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी के आदेशों के विरुद्ध अपीलें-(1) धारा 3ख की उपधारा (6) के अधीन रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी के किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, ऐसे आदेश के उस उपधारा के अधीन समाचारपत्र में प्रकाशन के तीस दिन के भीतर ऐसे प्राधिकारी को अपील कर सकेगा जो विहित किया जाए:
परन्तु यदि अपील प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी पर्याप्त हेतुक से ऐसी अवधि के भीतर अपील नहीं कर सका था, तो वह पूर्वोक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् ऐसी अपील को ग्रहण कर सकेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन अपील की प्राप्ति के पश्चात्, अपील प्राधिकारी, अपीलार्थी को, धारा 3ख की उपधारा (5) में निर्दिष्ट नियोजक को और रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी को उस विषय में सुने जाने का अवसर देने के पश्चात् अपील का यथासंभव शीघ्र निपटारा कर सकेगा ।
3घ. नियम बनाने की शक्ति-(1) राज्य सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अध्याय के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा, अर्थात्: -
(क) किसी बागान के रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन का प्ररूप, वे विशिष्टियां जो ऐसे आवेदन में होंगी और वह फीस जो ऐसे आवेदन के साथ दी जाएगी;
(ख) रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का प्ररूप;
(ग) किसी ऐसे परिवर्तन की बाबत विशिष्टियां जिसके बारे में नियोजक द्वारा रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी को धारा 3ख की उपधारा (5) के अधीन सूचना दी जाएगी और वह प्ररूप जिसमें ऐसे परिवर्तन की सूचना दी जाएगी;
(घ) वह प्राधिकारी जिसको धारा 3ग के अधीन अपील की जा सकेगी और ऐसी अपील की बाबत संदेय फीस;
(ङ) रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी द्वारा रखे और बनाए रखे जाने वाले रजिस्टर ।]
अध्याय 2
निरीक्षक कर्मचारिवृन्द
4. मुख्य निरीक्षक और निरीक्षक-(1) राज्य सरकार सम्यक् रूप से अर्हित किसी व्यक्ति को उस राज्य के लिए बागान का मुख्य निरीक्षक और सम्यक् रूप से अर्हित उतने व्यक्तियों को, जितने वह ठीक समझे, मुख्य निरीक्षक के अधीन बागान के निरीक्षक, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियुक्त कर सकेगी ।
[(1क) राज्य सरकार भी, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के सभी या किन्हीं प्रयोजनों के लिए राज्य सरकार के या अपने नियंत्रणाधीन किसी स्थानीय प्राधिकारी के ऐसे अधिकारियों को, जिन्हें वह ठीक समझे, अपर बागान निरीक्षक नियुक्त कर सकेगी ।]
(2) उन नियमों के अध्यधीन रहते हुए जो इस निमित्त राज्य सरकार द्वारा बनाए जाएं, मुख्य निरीक्षक वह स्थानीय क्षेत्र जिसमें या वे स्थानीय क्षेत्र जिनमें, अथवा वे बागान जिनके विषय में निरीक्षक इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करेंगे, घोषित कर सकेगा और निरीक्षक की शक्तियों का प्रयोग ऐसी सीमाओं के भीतर, जो राज्य सरकार द्वारा उसे समनुदिष्ट की जाएं, स्वयं कर सकेगा ।
(3) मुख्य निरीक्षक और सभी निरीक्षक भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) के अर्थ के अन्दर लोक सेवक समझे जाएंगे ।
5. निरीक्षकों की शक्तियां और कृत्य-राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए गए नियमों के अध्यधीन रहते हुए, निरीक्षक उन स्थानीय सीमाओं के भीतर जिनके लिए वह नियुक्त किया गया है: -
(क) ऐसी परीक्षा और जांच, जैसी वह ठीक समझे, यह अभिनिश्चित करने के लिए कर सकेगा कि क्या इस अधिनियम के और तद्धीन बनाए गए नियमों के उपबन्धों का अनुपालन किसी बागान के बारे में किया जा रहा है;
(ख) ऐसे सहायकों के साथ, यदि कोई हों, जिन्हें वह ठीक समझे, किसी भी युक्तियुक्त समय पर किसी भी बागान या उसके भाग में प्रवेश, उसका निरीक्षण और उसकी परीक्षा इस अधिनियम के उद्देश्यों को कार्यान्वित करने के लिए कर सकेगा;
(ग) उन फसलों की, जो किसी बागान में उगी हुई हों, या किसी भी कर्मकार की, जो उसमें नियोजित हो, परीक्षा कर सकेगा अथवा इस अधिनियम के अनुसरण में रखे गए किसी रजिस्टर या अन्य दस्तावेज के पेश किए जाने की अपेक्षा कर सकेगा और उसी स्थल पर या अन्यथा किसी व्यक्ति के ऐसे कथन ले सकेगा जिन्हें वह इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक समझे;
(घ) ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा जो विहित की जाएं:
परन्तु कोई भी व्यक्ति, किसी ऐसे प्रश्न का उत्तर देने या कोई ऐसा कथन करने के लिए इस धारा के अधीन विवश नहीं किया जाएगा जिसकी प्रवृत्ति उसे अपराध में फंसाने की हो ।
6. सुविधाएं जो निरीक्षकों को दी जानी हैं-हर नियोजक निरीक्षक को इस अधिनियम के अधीन प्रवेश, निरीक्षण या जांच करने के लिए सब युक्तियुक्त सुविधाएं देगा ।
7. प्रमाणकर्ता सर्जन-(1) राज्य सरकार अर्हित चिकित्सा-व्यवसायियों को ऐसी स्थानीय सीमाओं के भीतर या ऐसे बागान या बागान के वर्ग के लिए, जिन्हें वह उन्हें क्रमशः समनुदिष्ट करे, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए प्रमाणकर्ता सर्जन नियुक्त कर सकेगी ।
(2) प्रमाणकर्ता सर्जन उन कर्तव्यों का पालन करेगा जो निम्नलिखित के सम्बन्ध में विहित किए जाएं-
(क) कर्मकारों की परीक्षा और प्रमाणन;
(ख) जहां कि किसी बागान में किसी ऐसे काम में कुमार [नियोजित हैं] जिससे उनके स्वास्थ्य को क्षति कारित होना सम्भाव्य है, वहां ऐसा चिकित्सीय पर्यवेक्षण करना जैसा विहित किया जाए ।
अध्याय 3
स्वास्थ्य के विषय में उपबन्ध
8. पीने का पानी-हर बागान में सब कर्मकारों के लिए सुविधाजनक स्थानों पर स्वास्थ्यप्रद पीने के पानी के पर्याप्त प्रदाय का उपबन्ध करने और बनाए रखने के लिए प्रभावी इन्तजाम नियोजक द्वारा किए जाएंगे ।
9. सफाई-(1) हर बागान में विहित प्रकार के शौचालयों और मूत्रालयों का उपबन्ध पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग पर्याप्त संख्या में किया जाएगा, जो ऐसे स्थित होंगे कि वे उनमें नियोजित कर्मकारों के लिए सुविधाजनक और उनकी पहुंच के अन्दर हों ।
(2) उपधारा (1) के अधीन उपबन्धित सब शौचालय और मूत्रालय साफ और स्वच्छता की अवस्था में रखे जाएंगे ।
10. चिकित्सा-सम्बन्धी सुविधाएं-(1) हर बागान में कर्मकारों [और उनके कुटुम्बों] के लिए ऐसी चिकित्सा सम्बन्धी सुविधाओं का, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाएं, इस प्रकार उपबन्ध किया जाएगा और उन्हें इस प्रकार बनाए रखा जाएगा कि वे आसानी से उपलभ्य हो सकें ।
(2) यदि किसी बागान में उपधारा (1) द्वारा यथा अपेक्षित चिकित्सा-सम्बन्धी सुविधाएं उपबन्धित की गई और बनाई रखी गई न हो तो [मुख्य निरीक्षक द्वारा किए गए अनुरोध पर राज्य सरकार] उसमें ऐसी चिकित्सा-सम्बन्धी सुविधाओं का उपबन्ध और बनाए रखा जाना कारित कर सकेगी और उसका खर्च व्यतिक्रमी नियोजक से वसूल कर सकेगी ।
(3) ऐसी वसूली के प्रयोजन के लिए मुख्य निरीक्षक उन खर्चों का, जो वसूल किए जाने हैं, प्रमाणपत्र कलक्टर को भेज सकेगा, जो उस रकम को भू-राजस्व की बकाया के तौर पर वसूल कर सकेगा ।
अध्याय 4
कल्याण
11. कैन्टीनें-(1) राज्य सरकार यह अपेक्षा करने वाले नियम बना सकेगी कि हर बागान में, जिसमें मामूली तौर पर एक सौ पचास कर्मकार नियोजित रहते हैं, कर्मकारों के उपयोग के लिए एक या अधिक कैन्टीनें नियोजक द्वारा उपबंधित की जाएंगी और बनाए रखी जाएंगी ।
(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित के लिए उपबन्ध कर सकेंगे-
(क) वह तारीख जिस तक कैन्टीन का उपबन्ध कर दिया जाएगा;
(ख) उन कैन्टीनों की संख्या जो उपबंधित की जाएंगी, और कैन्टीनों के सन्निर्माण तथा उनमें की जगह, फर्नीचर और अन्य उपस्कर के स्तरमान;
(ग) वे खाद्य पदार्थ जो वहां परोसे जा सकेंगे और वे प्रभार जो उनके लिए, लिए जा सकेंगे;
(घ) कैन्टीन के लिए एक प्रबन्ध समिति का गठन और कैन्टीन के प्रबन्ध में कर्मकारों का प्रतिनिधित्व;
(ङ) खंड (ग) के अधीन नियम बनाने की शक्ति का मुख्य निरीक्षक को, ऐसी शर्तों के अध्यधीन, जो विहित की जाएं, प्रत्यायोजन ।
12. शिशु कक्ष- [(1) ऐसे प्रत्येक बागान में, जिसमें पचास या उससे अधिक स्त्री कर्मकार (जिनके अन्तर्गत किसी ठेकेदार द्वारा नियोजित स्त्री कर्मकार भी हैं) नियोजजित हैं या पूर्ववर्ती बारह मास में किसी भी दिन नियोजित थीं या जहां स्त्री कर्मकारों के (जिनके अन्तर्गत किसी ठेकेदार द्वारा नियोजित स्त्री कर्मकार भी हैं) बालकों की संख्या बीस या उससे अधिक है वहां ऐसे स्त्री कर्मकारों के बालकों के उपयोग के लिए नियोजक द्वारा उपयुक्त कमरों की व्यवस्था की जाएगी और उन्हें बनाए रखा जाएगा ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा और उपधारा (1क) के प्रयोजनों के लिए बालक" से वे व्यक्ति अभिप्रेत हैं जो छह वर्ष से कम आयु के हैं ।]
[(1क) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी यदि किसी ऐसे बागान की बाबत जिसमें पचास से कम स्त्री कर्मकार (जिनके अन्तर्गत किसी ठेकेदार द्वारा नियोजित स्त्री कर्मकार भी हैं) नियोजित हैं या पूर्ववर्ती बारह मास में किसी भी दिन नियोजित थीं या जहां ऐसे स्त्री कर्मकारों के बालकों की संख्या बीस से कम हैं, वहां राज्य सरकार ऐसे स्त्री कर्मकारों के बालकों की संख्या को ध्यान में रखते हुए यह आवश्यक समझती है कि ऐसे बालकों के उपयोग के लिए नियोजक द्वारा उपयुक्त कमरों की व्यवस्था की जानी चाहिए और उन्हें बनाए रखा जाना चाहिए तो वह आदेश द्वारा नियोजक को निदेश दे सकेगी कि वह ऐसे कमरों की व्यवस्था करे और उन्हें बनाए रखे और तब नियोजक ऐसे निदेश का अनुपालन करने के लिए आबद्ध होगा ।]
(2) [उपधारा (1) या उपधारा (1क) में निर्दिष्ट कमरे]-
(क) यथायोग्य वास-सुविधा का उपबन्ध करेंगे;
(ख) यथायोग्य रूप से प्रकाशित और संवातित होंगे;
(ग) साफ और स्वच्छता की अवस्था में बनाए रखे जाएंगे; तथा
(घ) बालकों और शिशुओं की देखरेख का प्रशिक्षण पाई हुई स्त्री के भारसाधन में होंगे ।]
(3) राज्य सरकार 3[उपधारा (1) या उपधारा (1क) में निर्दिष्ट कमरोंट की अवस्थति और उनके सन्निर्माण, और उसमें उपबंधित की जाने वाली जगह, उपस्कर और सुख-सुविधा के स्तरमान विहित करने वाले नियम बना सकेगी ।
13. आमोद-प्रमोद सम्बन्धी सुविधाएं-राज्य सरकार हर नियोजक से यह अपेक्षा करने वाले नियम बना सकेगी, कि वह अपने बागान में, उसमें नियोजित कर्मकारों और बालकों के लिए, ऐसी आमोद-प्रमोद सम्बन्धी सुविधाओं का, जो विहित की जाएं, उपबन्ध करे ।
14. शिक्षा सम्बन्धी सुविधाएं-जहां कि किसी बागान में नियोजित कर्मकारों के छह और बारह वर्ष के बीच की आयु के बालकों की संख्या पच्चीस से अधिक हो, वहां राज्य सरकार हर नियोजक से यह अपेक्षा करने वाले नियम बना सकेगी कि वह उन बालकों के लिए ऐसी रीति से और ऐसे स्तरमान की, जो विहित किया जाए, शिक्षा संबंधी सुविधाओं का उपबन्ध करे ।
[15. आवास सुविधाएं-हर नियोजक का यह कर्तव्य होगा कि वह-
(क) बागान में निवास करने वाले हर कर्मकार (जिसके अन्तर्गत उसका कुटुम्ब है) के लिए जिसने ऐसे बागान में छह मास की निरन्तर सेवा की है, और जिसने बागान में निवास करने की लिखित रूप में इच्छा व्यक्त की है, आवश्यक निवास-स्थान के लिए उपबंध करे और उसे बनाए रखे;
परन्तु इस खण्ड के अधीन छह मास की निरन्तर सेवा की अपेक्षा किसी ऐसे कर्मकार को लागू नहीं होगी जो किसी ऐसे मृत कर्मकार के कुटुम्ब का सदस्य है जो अपनी मृत्यु के ठीक पूर्व बागान में निवास कर रहा था ।]
16. आवासन के सम्बन्ध में नियम बनाने की शक्ति-राज्य सरकार धारा 15 के उपबन्धों को प्रभावी करने के प्रयोजनार्थ और विशिष्टतः निम्नलिखित का उपबन्घ करने वाले नियम बना सकेगी-
(क) उस वास-सुविधा का स्तरमान और विनिर्दिष्टियां जो उपबन्धित की जानी हैं;
(ख) गृहों के सन्निर्माण के लिए स्थलों का चयन और तैयारी और ऐसे प्लाट का आकार;
(ग) आवासन से संबंधित मामलों के बारे में परामर्श के लिए राज्य सरकार, नियोजक और कर्मकारों के प्रतिनिधियों से मिलकर बनने वाले सलाहकार बोर्डों का गठन और उनके द्वारा उस बात के बारे में ऐसी शक्तियों, कृत्यों और कर्तव्यों का, जो विनिर्दिष्ट किए जाएं, प्रयोग और निर्वहन;
(घ) कर्मकारों के लिए उपबन्धित आवास के लिए भाटक, यदि कोई हो, नियत करना;
(ङ) कर्मकारों और उनके कुटुम्बों का आवास का और शाक-वाटिकाएं रखने के प्रयोजनार्थ ॥। ऐसे आवास से लगी हुई उपयुक्त खाली जमीन के टुकड़ों का आबंटन तथा कर्मकारों और उनके कुटुम्बों का ऐसे आवासों से बेदखल किया जाना;
(च) बागान के उन भागों में, जहां कर्मकार आवासित हैं, जनसाधारण की पहुंच ।
[16क. नियोजक द्वारा उपबंधित गृह के ढह जाने के परिणामस्वरूप होने वाली दुर्घटनाओं की बाबत नियोजक का दायित्व-(1) यदि धारा 15 के अधीन उपबंधित किसी गृह के ढह जाने के परिणामस्वरूप किसी कर्मकार या उसके कुटुम्ब के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है या उसे क्षति पहुंचती है और गृह का ढह जाना गृह के किसी अधिभोगी की ओर से हुई किसी त्रुटि या किसी प्राकृतिक विपत्ति के कारण मात्र से और प्रत्यक्षतः उससे हुआ नहीं माना जा सकता है तो नियोजक प्रतिकर का संदाय करने का दायी होगा ।
(2) कर्मकार प्रतिकर अधिनियम, 1923 (1923 का 8) के अधीन किसी कर्मकार को संदेय प्रतिकर की रकम की बाबत तत्समय यथाप्रवृत्त उस अधिनियम की धारा 4 के उपबंध और अनुसूची 4, जहां तक हो सके, उपधारा (1) के अधीन संदेय प्रतिकर की रकम के अवधारण को लागू होगी ।
16ख. आयुक्तों की नियुक्ति-राज्य सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, धारा16क के अधीन संदेय प्रतिकर की रकम अवधारित करने के लिए विहित अर्हताएं रखने वाले उतने व्यक्तियों को, जितने वह ठीक समझे, आयुक्त नियुक्त कर सकेगी और उन सीमाओं को परिभाषित कर सकेगी जिनके भीतर ऐसा प्रत्येक आयुक्त इस अधिनियम के द्वारा या अधीन उसको प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग और उस पर अधिरोपित कृत्यों का निर्वहन करेगा ।
16ग. प्रतिकर के लिए आवेदन-(1) धारा 16क के अधीन प्रतिकर के संदाय के लिए आयुक्त को आवेदन निम्नलिखित द्वारा किया जा सकेगा-
(क) उस व्यक्ति द्वारा जिसे क्षति हुई है; या
(ख) उस व्यक्ति द्वारा जिसे क्षति हुई है, सम्यक्तः प्राधिकृत किसी अभिकर्ता द्वारा; या
(ग) जहांवह व्यक्ति जिसे क्षति हुई है, अवयस्क है, वहां उसके संरक्षक द्वारा; या
(घ) जहां गृह के ढह जाने के परिणामस्वरूप मृत्यु हुई है वहां मृतक के किसी आश्रित द्वारा या ऐसे आश्रित द्वारा सम्यक्तः प्राधिकृत किसी अभिकर्ता द्वारा या यदि ऐसा आश्रित अवयस्क है तो उसके संरक्षक द्वारा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक आवेदन ऐसे प्ररूप में होगा और उसमें ऐसी विशिष्टियां होंगी जो विहित की जाएं ।
(3) इस धारा के अधीन प्रतिकर के लिए कोई आवेदन तब तक ग्रहण नहीं किया जाएगा जब तक वह गृह के ढह जाने के छह मास के भीतर न कियागया हो:
परन्तु यदि आयुक्त का यह समाधान हो जाता है कि आवेदक पर्याप्त हेतुक से छह मास की पूर्वोक्त अवधि के भीतर आवेदन नहीं कर सका था, तो वह छह मास की अतिरिक्त अवधि के भीतर ऐसे आवेदन को ग्रहण कर सकेगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा में आश्रित" पद का वही अर्थ है जो उसका कर्मकार प्रतिकर अधिनियम, 1923 (1923 का 8) की धारा 2 के खंड (घ) में है ।
16घ. प्रक्रिया और आयुक्त की शक्तियां-(1) धारा 16ग के अधीन आवेदन की प्राप्ति पर आयुक्त आवेदन के अन्तर्गत आने वाले विषय की जांच कर सकेगा ।
(2) धारा 16क के अधीन संदेय प्रतिकर की रकम अवधारित करने में आयुक्त ऐसे किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए जो इस निमित्त बनाए जाएं ऐसी संक्षिप्त प्रक्रिया का अनुसरण करेगा जो वह ठीक समझे ।
(3) आयुक्त को निम्नलिखित बातों के बारे में वे सभी शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय को होती हैं, अर्थात्: -
(क) किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना;
(ख) किसी दस्तावेज के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;
(ग) शपथ पत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;
(घ) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख की या उसकी प्रतिलिपि की अध्यपेक्षा करना;
(ङ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा करने के लिए कमीशन निकालना;
(च) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए ।
(4) ऐसे किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए, जो इस निमित्त बनाए जाएं, आयुक्त किसी दावे या प्रतिकर का अवधारण करने के प्रयोजन के लिए एक या अधिक ऐसे व्यक्तियों को, जो पांच से सुसंगत किसी विषय का विशेष ज्ञान रखते हों, जांच करने में उसकी सहायता करने के लिए चुन सकेगा ।
16ङ. प्रतिकर आदि के संदाय के दायित्व का आयुक्त द्वारा विनिश्चय किया जाना-(1) धारा 16क के अधीन प्रतिकर का संदाय करने के किसी नियोजक के दायित्व या उसकी रकम के बारे में या उस व्यक्ति के बारे में जिसे ऐसा प्रतिकर संदेय है किसी प्रश्न का विनिश्चय आयुक्त द्वारा किया जाएगा ।
(2) ऐसा कोई व्यक्ति जो प्रतिकर देने से इंकार करने वाले या उसे दिए गए प्रतिकर की रकम या उसके प्रभाजन के बारे में आयुक्त के किसी विनिश्चय से व्यथित है, उस स्थान पर जहां गृह ढह गया है, अधिकारिता रखने वाले उच्च न्यायालय को ऐसे व्यक्ति को आयुक्त का आदेश संसूचित किए जाने के नब्बे दिन के भीतर अपील कर सकेगा:
परन्तु यदि उच्च न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी पर्याप्त हेतुक से ऐसी अवधि के भीतर अपील नहीं कर सका था, तो वह पूर्वोक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् ऐसी अपील को ग्रहण कर सकेगा :
परन्तु यह और कि इस उपधारा की किसी भी बात से यह नहीं समझा जाएगा कि वह उच्च न्यायालय को धारा 16क के अधीन संदेय प्रतिकर की रकम से अधिक प्रतिकर देने के लिए प्राधिकृत करती है ।
(3) उन मामलों में जिनमें उपधारा (2) के अधीन अपील की गई है, उच्च न्यायालय के विनिश्चय के अधीन रहते हुए उपधारा (1) के अधीन आयुक्त का विनिश्चय अंतिम होगा और उसे किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।
16च. कतिपय अधिकारों के बारे में व्यावृत्ति-किसी व्यक्ति का धारा 16क के अधीन प्रतिकर का दावा करने का अधिकार, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन संदेय प्रतिकर को वसूल करने के ऐसे व्यक्ति के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना होगा; किन्तु कोई भी व्यक्ति ऐसे ढह गए गृह की बाबत एक से अधिक बार प्रतिकर का दावा करने का हकदार नहीं होगा जिसके लिए वह एक बार दावा कर चुका है ।
16छ. नियम बनाने की शक्ति-(1) राज्य सरकार, धारा 16क से धारा 16च तक (जिनके अन्तर्गत ये दोनों धाराएं भी हैं) के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए नियम शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियमों में निम्नलिखित के लिए उपबध किया जा सकेगा: -
(i) आयुक्तों की अर्हताएं और सेवा की शर्तें;
(ii) वह रीति जिसमें आयुक्त प्रतिकर के दावों की जांच और उनका अवधारण कर सकेगा;
(iii) वे विषय जिनके बारे में धारा 16घ के अधीन आयुक्त की सहायता करने के लिए किसी व्यक्ति को चुना जा सकेगा और वे कृत्य जिनका ऐसे व्यक्ति द्वारा पालन किया जा सकेगा;
(iv) आयुक्त को प्रदत्त किन्हीं शक्तियों का साधारणतः कारगर प्रयोग ।]
17. अन्य सुविधाएं-राज्य सरकार यह अपेक्षा करने वाले नियम बना सकेगी कि हर बागान में नियोजक वर्षा या ठण्ड से कर्मकारों की संरक्षा के लिए इतनी संख्या में और ऐसे प्रकार के छातों, कम्बलों, बरसातियों या ऐसी ही अन्य सुख-सुविधाओं का, जैसी विहित की जाएं, उपबन्ध करे ।
18. कल्याण आफिसर-(1) हर बागान में, जिसमें मामूली तौर पर तीन सौ या अधिक कर्मकार नियोजित रहते हों, नियोजक उतनी संख्या में कल्याण आफिसर नियोजित करेगा जो विहित की जाएं ।
(2) राज्य सरकार उपधारा (1) के अधीन नियोजित आफिसरों के कर्तव्य, अर्हताएं और सेवा की शर्तें विहित कर सकेगी ।
[अध्याय 4क
सुरक्षा के बारे में उपबंध
18क. सुरक्षा-(1) प्रत्येक बागान में नियोजक द्वारा कीटनाशियों, रसायनों और विषैले पदार्थों के उपयोग, उनकी उठाई-धराई, भंडारण और परिवहन के संबंध में कर्मकारों की सुरक्षा का उपबंध करने के लिए प्रभावी इंतजाम किए जाएंगे ।
(2) राज्य सरकार परिसंकटमय रसायनों का उपयोग करने या उनकी उठाई-धराई में स्त्रियों या कुमारों के नियोजन को प्रतिषिद्ध या निर्बंधित करने के लिए नियम बना सकेगी ।
(3) नियोजक अपने बागान में कीटनाशियों, रसायनों और विषैले पदार्थों के उपयोग, उनकी उठाई-धराई, भंडारण और परिवहन का पर्यवेक्षण करने के लिए विहित अर्हताएं रखने वाले व्यक्तियों को नियुक्त करेगा ।
(4) प्रत्येक नियोजक यह सुनिश्चित करेगा कि कीटनाशियों, रसायनों और विषैले पदार्थों की उठाई-धराई, मिश्रण, सम्मिश्रण और उपयोजन के लिए बागान में नियोजित प्रत्येक कर्मकार ऐसी विभिन्न संक्रियाओं, जिनमें उसे लगाया गया है, में अन्तर्वलित परिसंकटों, ऐसे कीटनाशियों, रसायनों और विषैले पदार्थों के बिखरने से उत्पन्न होने वाली आपात स्थितियों में अपनाए जाने वाले विभिन्न सुरक्षा उपायों तथा सुरक्षित कार्य पद्धतियों और ऐसे अन्य विषयों, जो राज्य सरकार द्वारा विहित किए जाएं, के बारे में प्रशिक्षित है ।
(5) ऐसे प्रत्येक कर्मकार की, जो कीटनाशियों, रसायनों और विषैले पदार्थों के सम्पर्क में रहता है, कालिक रूप से ऐसी रीति में, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए, चिकित्सीय जांच कराई जाएगी ।
(6) प्रत्येक नियोजक, ऐसे प्रत्येक कर्मकार के स्वास्थ्य का अभिलेख रखेगा, जो ऐसे कीटनाशियों, रसायनों और विषैले पदार्थों के सम्पर्क में रहता है, जिनका बागान में उपयोग किया जाता है, उठाई-धराई की जाती है, जिनका भंडारण या परिवहन किया जाता है और ऐसे प्रत्येक कर्मकार की ऐसे अभिलेख तक पहुंच होगी ।
(7) प्रत्येक नियोजक कीटनाशियों, रसायनों या विषैले पदार्थों की उठाई-धराई में नियोजित प्रत्येक कर्मकार को-
(क) धोने, नहाने और क्लॉक रूमप की सुविधाएं; और
(ख) संरचनात्मक वस्त्र और उपस्कर,
ऐसी रीति में प्रदान करेगा, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए ।
(8) प्रत्येक नियोजक बागान में ऐसे कीटनाशियों, रसायनों और विषैले पदार्थों की उठाई-धराई और उपयोजन में लगे कर्मकारों के श्वास लेने के क्षेत्र में कीटनाशियों, रसायनों और विषैले पदार्थों के अनुज्ञेय सांद्रणों की सूची संप्रदर्शित करेगा ।
(9) प्रत्येक नियोजक ऐसी पूर्वावधानी संबंधी सूचनाएं प्रदर्शित करेगा जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाएं, जिनमें कीटनाशियों, रसायनों और विषैले पदार्थों के परिसंकटों को उपदर्शित किया जाएगा ।
18ख. राज्य सरकार की नियम बनाने की शक्ति-(1) राज्य सरकार, इस अध्याय के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -
(क) धारा 18क की उपधारा (2) के अधीन परिसंकटमय रसायनों की उठाई-धराई के लिए स्त्रियों और कुमारों के नियोजन पर निर्बंधन;
(ख) धारा 18क की उपधारा (3) के अधीन नियुक्त पर्यवेक्षक की अर्हताएं;
(ग) धारा 18क की उपधारा (4) के अधीन कर्मकारों के प्रशिक्षण के लिए विषय;
(घ) धारा 18क की उपधारा (5) के अधीन कर्मकारों की चिकित्सीय जांच;
(ङ) धारा 18क की उपधारा (7) के अधीन कीटनाशियों, रसायनों और विषैले पदार्थों की उठाई-धराई में लगे हुए कर्मकारों को दी जाने वाली सुविधाएं और उपस्कर;
(च) धारा 18क की उपधारा (9) के अधीन संप्रदर्शित की जाने वाली पूर्वावधानी संबंधी सूचनाएं ।]
अध्याय 5
नियोजन के घंटे और उस पर निर्बन्धन
19. साप्ताहिक घंटे- [(1)] उसके सिवाय जैसा कि इस अधिनियम में अन्यथा उपबंधित है, किसी बागान में किसी वयस्थ कर्मकार से एक सप्ताह में [अड़तालीस घंटे] से अधिक काम और किसी भी कुमार ॥। से एक सप्ताह में [सत्ताइस घंटे] से अधिक काम न तो अपेक्षित किया जाएगा न उसे करने दिया जाएगा ।
[(2) जहां कोई वयस्थ कर्मकार किसी बागान में किसी दिन उतने घण्टों से अधिक काम करता है जिनसे मिलकर एक प्रसामान्य कार्य दिवस बनता है या किसी सप्ताह में अड़तालीस घण्टों से अधिक काम करता है वहां वह ऐसे अतिकालिक काम की बाबत सामान्य मजदूरी की दर से दुगुने का हकदार होगा:
परन्तु ऐसे किसी कर्मकार को किसी भी दिन नौ घण्टे से अधिक और किसी भी सप्ताह में चौवन घण्टे से अधिक काम करने के लिए अनुज्ञा नहीं दी जाएगी ।
(3) बागान में किसी बन्द आवकाश-दिन या किसी विश्राम-दिन को किए गए काम के लिए कोई कर्मकार सामान्य मजदूरी की दर से दुगुने का हकदार होगा जैसा कि अतिकालिक काम के लिए होता है ।]
20. साप्ताहिक अवकाश दिन-(1) राज्य सरकार इस निमित्त बनाए गए नियमों द्वारा-
(क) सात दिन की हर कालावधि में एक विश्राम-दिन का उपबन्ध कर सकेगी, जो सब कर्मकारों को दिया जाएगा;
[(ख) उन दशाओं का, जिनके अधीन रहते हुए और उन परिस्थितियों का जिनमें किसी वयस्थ कर्मकार से अतिकालिक काम करने की अपेक्षा की जा सकेगी या जिनमें उसे ऐसा करने के लिए अनुज्ञात किया जा सकेगा, उपबन्ध कर सकेगी ।]
(2) उपधारा (1) के खंड (क) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां कि कोई कर्मकार किसी ऐसे विश्राम-दिन को, जो उस बागान में बंद अवकाश-दिन न हो, काम करने के लिए रजामंद हो, वहां इस धारा में अंतर्विष्ट कोई भी बात उसे ऐसा करने से निवारित न करेगी:
परन्तु यह तब जब कि ऐसा करने में कर्मकार बीच में किसी सम्पूर्ण दिन के अवकाश के बिना दस दिन से अधिक लगातार काम न करे ।
स्पष्टीकरण 1-जहां कि कोई कर्मकार तूफ़ान, आग, वर्षा या अन्य प्राकृतिक कारणों से किसी बागान में काम करने से किसी दिन निवारित रहा हो, वहां वह दिन, यदि वह ऐसी वांछा करे तो सात दिन की सुसंगत कालावधि के लिए उपधारा (1) के अर्थों में उसका विश्राम-दिन माना जा सकेगा ।
स्पष्टीकरण 2-इस धारा में अंतर्विष्ट कोई भी बात किसी ऐसे कर्मकार को लागू नहीं होगी जिसके नियोजन की कुल कालावधि, छुट्टी पर बिताए गए दिन को सम्मिलित करते हुए, छह दिन से कम हो ।
21. दैनिक विश्राम-अंतराल-हर एक दिन काम की कालावधि ऐसे नियत की जाएगी कि कोई भी कालावधि पांच घंटे से अधिक की न हो और कोई कर्मकार कम से कम आधे घंटे का विश्राम-अंतराल ले चुकने के पूर्व पांच घंटे से अधिक काम न करे ।
22. विस्तृति-बागान में वयस्थ कर्मकार के काम की कालावधियां ऐसे व्यवस्थित की जाएंगी कि धारा [21] के अधीन के उसके विश्राम-अंतराल सहित, वे काम की प्रतीक्षा में व्यय किए गए समय को सम्मिलित करते हुए, किसी भी दिन बारह घंटे से अधिक विस्तृत न हों ।
23. काम की कालावधि की सूचना-(1) हर बागान में ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, काम की कालावधियों की ऐसी सूचना सम्प्रदर्शित की जाएगी और सही रखी जाएगी, जिसमें हर दिन के लिए वे कालावधियां स्पष्ट तौर पर दर्शित की गई हों जिनके दौरान कर्मकारों से काम करने की अपेक्षा की जा सकती है ।
(2) इस अधिनियम में अंतर्विष्ट अन्य उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए यह है कि बागान में सम्प्रदर्शित काम की कालावधियों की सूचना के अनुसार से अन्यथा उस बागान में काम न किसी भी कर्मकार से अपेक्षित किया जाएगा, न उसे करने दिया जाएगा ।
(3) नियोजक किसी दिन कर्मकार को नियोजन करने से इंकार कर सकेगा, यदि उस दिन के काम के प्रारम्भ के लिए नियत समय के पश्चात् आधे घंटे से अधिक देर से आए ।
[24. बालकों के नियोजन का प्रतिषेध-किसी बालक को किसी बागान में काम करने के लिए नियोजित नहीं किया जाएगा ।]
25. स्त्रियों ॥। द्वारा रात्रि में काम-राज्य सरकार की अनुज्ञा से ऐसा किए जाने के सिवाय, कोई भी स्त्री 2॥। कर्मकार बागान में छह बजे पूर्वाह्न और सात बजे अपराह्न के बीच नियोजित किए जाने के सिवाय नियोजित नहीं किया जाएगा:
परन्तु इस धारा की कोई भी बात उन दाइयों और परिचारिकाओं को, जो किसी बागान में इस रूप में नियोजित हों, लागू नहीं समझी जाएगी ।
26. अवयस्थ कर्मकारों का टोकन पास रखना- ॥। किसी भी कुमार से किसी बागान में काम न तो अपेक्षित कियाजाएगा न उसे करने दिया जाएगा, जब तक कि-
(क) उसके बारे में धारा 27 के अधीन अनुदत्त योग्यता-प्रमाणपत्र नियोजक की अभिरक्षा में न हो;
(ख) 4॥। कुमार के पास, उस समय जब वह काम में लगा हो, ऐसे प्रमाणपत्र के प्रति निर्देश करने वाला टोकन न हो ।
27. योग्यता-प्रमाणपत्र-(1) प्रमाणकर्ता सर्जन किसी अल्पवय व्यक्ति या उसके माता-पिता या संरक्षक के ऐसे आवेदन पर, जिसके साथ में नियोजक द्वारा या उसकी ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित इस बात की दस्तावेज हो कि यदि ऐसा व्यक्ति काम के लिए योग्य प्रमाणित हुआ तो वह बागान में नियोजित किया जाएगा अथवा काम करने का आशय रखने वाले अल्पवय व्यक्ति के प्रति निर्देश से नियोजक के या उसकी ओर से किसी अन्य व्यक्ति के आवेदन पर उस अल्पवय व्यक्ति की परीक्षा करेगा और उसकी ॥। कुमार के रूप में काम करने की योग्यता अभिनिश्चित करेगा ।
(2) इस धारा के अधीन अनुदत्त योग्यता-प्रमाणपत्र अपनी तारीख से बारह मास की कालावधि के लिए विधिमान्य होगा किन्तु नवीकृत किया जा सकेगा ।
(3) इस धारा के अधीन के प्रमाणपत्र के लिए संदेय कोई फीस नियोजक द्वारा संदत्त की जाएगी और अल्पवय व्यक्ति या उसके माता-पिता या संरक्षक से वसूलीय नहीं होगी ।
28. चिकित्सीय परीक्षा की अपेक्षा करने की शक्ति-निरीक्षक, यदि वह ऐसा करना आवश्यक समझे, तो बागान में नियोजित किसी अल्पवय व्यक्ति की प्रमाणकर्ता सर्जन द्वारा परीक्षा करा सकेगा ।
अध्याय 6
मज़दूरी सहित छुट्टी
29. अध्याय का लागू होना-इस अध्याय के उपबन्ध ऐसे प्रवर्तित नहीं होंगे कि उनसे किन्हीं ऐसे अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े जिनका कि कोई कर्मकार किसी अन्य विधि के अधीन या किसी अधिनिर्णय, करार, या सेवा-संविदा के निबंधनों के अधीन हकदार हो:
परन्तु जब कि ऐसा अधिनिर्णय, करार या सेवा-संविदा इस अध्याय में उपबंधित से दीर्घतर मज़दूरी सहित छुट्टी उपबंधित करती हो, तब ऐसा कर्मकार केवल ऐसी दीर्घतर छुट्टी का हक़दार होगा ।
स्पष्टीकरण-धारा 30 में यथा उपबंधित के सिवाय, साप्ताहिक अवकाश-दिन अथवा उत्सवों या अन्य ऐसे ही अवसरों के लिए अवकाश-दिन इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए छुट्टी के अंतर्गत नहीं आएंगे ।
30. मज़दूरी सहित वार्षिक छुट्टी-(1) हर कर्मकार को निम्नलिखित दर से संगणित संख्या के दिनों की मज़दूरी सहित छुट्टी अनुज्ञात की जाएगी-
(क) यदि वह वयस्थ हो तो उसके द्वारा किए गए काम के हर बीस दिन पर एक दिन; तथा
(ख) यदि वह अल्पवय व्यक्ति हो तो उसके द्वारा किए गए काम के हर पंद्रह दिन पर एक दिन;
। । । । ।
[ [स्पष्टीकरण (1)]-इस उपधारा के अधीन छुट्टी की संगणना के प्रयोजनार्थ-
(क) कोई ऐसा दिन नहीं गिना जाएगा जिस दिन कोई काम न किया गया हो या आधे से कम दिन का काम किया गया हो; तथा
(ख) कोई ऐसा दिन, जिस दिन आधे दिन का या उससे अधिक का काम किया गया हो,
एक दिन गिना जाएगा ।]
[स्पष्टीकरण 2-इस उपधारा के अधीन अनुज्ञेय छुट्टी में वे सभी अवकाश दिन सम्मिलित नहीं होंगे जो छुट्टी की कालावधि के दौरान अथवा उसके आरम्भ या अन्त में पड़े ।]
(2) यदि कर्मकार किसी भी बारह मास की कालावधि में अपने को उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञात सम्पूर्ण छुट्टी न ले तो उसके द्वारा न ली गई छुट्टी उस छुट्टी में जोड़ दी जाएगी जो उसे उस उपधारा के अधीन पश्चात्वर्ती बारह मास की कालावधि के लिए अनुज्ञात हो ।
(3) जब किसी कर्मकार को देय उपार्जित छुट्टी तीस दिन की हो जाए तब उसका इस धारा के अधीन छुट्टी अर्जित करना बंद हो जाएगा ।
2[(4) यदि नियोजक किसी ऐसे कर्मकार का नियोजन, जो इस धारा के अधीन छुट्टी का हक़दार हो, उसके द्वारा वह कुल छुट्टी जिसका वह हक़दार हो ले ली जाने के पूर्व पर्यवसित कर दे तो नियोजक न ली गई छुट्टी के बारे में उसे धारा 31 के अधीन संदेय रक़म उसे संदत्त करेगा और ऐसा संदाय ऐसे पर्यवसान के पश्चात् के दूसरे कार्य-दिवस के अवसान के पूर्व कर दिया जाएगा ।]
31. छुट्टी की कालावधि के दौरान मज़दूरी- [(1) उस छुट्टी के लिए जो कर्मकार को धारा 30 के अधीन अनुज्ञात है निम्नलिखित संदाय किया जाएगा-
(क) यदि वह पूर्णतः कालानुपाती दर के आधार पर नियोजित हो तो उस दर से जो उस दैनिक मज़दूरी के बराबर हो जो किसी विधि के अधीन अथवा किसी अधिनिर्णय, करार या सेवा-संविदा के निर्बन्धनों के अधीन उसे ऐसी छुट्टी के प्रारम्भ के अव्यवहितपूर्व संदेय हो, तथा
(ख) अन्य दशाओं में, जिनके अंतर्गत वे दशाएं भी आती हैं जिनमें उसे पूर्वगामी बारह कलेण्डर मास के दौरान भागतः कालानुपाती दर और भागतः मात्रानुपाती दर के आधार पर संदाय किया गया हो, उस औसत दैनिक मज़दूरी की दर से जो पूर्वगामी बारह कलेण्डर मास पर संगणित की गई हो ।
स्पष्टीकरण-उपधारा (1) के खण्ड (ख) के प्रयोजनार्थ औसत दैनिक मज़दूरी की संगणना पूर्वगामी बारह कलेण्डर मास के दौरान के कुल पूर्णकालिक उपार्जनों के आधार पर, उनमें से अतिकालिक उपार्जन या बोनस, यदि कोई हो, निकालते हुए किन्तु महंगाई भत्ते को सम्मिलित करते हुए की जाएगी ।
(1क) छुट्टी की कालावधि के लिए उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट दरों से मज़दूरी के अतिरिक्त कर्मकार को उन भोजन तथा अन्य रियायतों का (यदि कोई हों) जो उसे नियोजक द्वारा उसकी दैनिक मज़दूरी के अतिरिक्त अनुज्ञात की गई हों, नकद मूल्य भी तब के सिवाय संदत्त किया जाएगा जब कि ये रियायतें छुट्टी की कालावधि के दौरान चालू रखी जाएं ।]
(2) उस कर्मकार को, जिसे वयस्थ की दशा में चार दिन से और अल्पवय व्यक्ति की दशा में पांच दिन से [अन्यून कालावधि] की छुट्टी धारा 30 के अधीन अनुज्ञात की गई हो, उसकी छुट्टी आरम्भ होने के पूर्व अनुज्ञात छुट्टी की कालावधि की मज़दूरी संदत्त कर दी जाएगी ।
32. रुग्णता और प्रसूति प्रसुविधाएं-(1) ऐसे किन्हीं नियमों के अध्यधीन रहते हुए जो इस निमित्त बनाए जाएं, हर कर्मकार-
(क) अर्हित चिकित्सा-व्यवसायी द्वारा प्रमाणित रुग्णता की दशा में रुग्णता भत्ता, तथा
(ख) यदि वह स्त्री हो, प्रसव या प्रत्याशित प्रसव की दशा में प्रसूति भत्ता,
ऐसी दर से, ऐसी कालावधि के लिए और ऐसे अंतरालों पर, जो विहित किए जाएं, अपने नियोजक से अभिप्राप्त करने का हक़दार होगा ।
(2) राज्य सरकार रुग्णता या प्रसूति भत्ता के संदाय का विनियमन करने वाले नियम बना सकेगी और ऐसे नियम उन परिस्थितियों को विनिर्दिष्ट कर सकेंगे जिनमें ऐसा भत्ता संदेय नहीं होगा या संदेय नहीं रह जाएगा, और इस धारा के अधीन कोई नियम विरचित करने में राज्य सरकार उन चिकित्सीय सुविधाओं का सम्यक् ध्यान रखेगी जो नियोजक द्वारा किसी बागान में उपबंधित हों ।
[अध्याय 6क
दुर्घटनाएं
32क. दुर्घटना की सूचना-जहां किसी बागान में ऐसी दुर्घटना होती है जिससे किसी कर्मकार की मृत्यु हो जाती है या जिससे उसे ऐसी शारीरिक क्षति होती है जिसके कारण क्षतिग्रस्त कर्मकार दुर्घटना होने के ठीक पश्चात् अड़तालीस घंटे या उससे अधिक की कालावधि के लिए काम नहीं कर सकता है या जो ऐसी प्रकृति की है जो इस निमित्त विहित की जाए, वहां उसका नियोजक उसकी सूचना ऐसे प्राधिकारियों को ऐसे प्ररूप में तथा ऐसे समय के भीतर भेजेगा जो विहित किया जाए ।
32ख. दुघर्टनाओं का रजिस्टर-नियोजक उन सभी दुर्घटनाओं का, जो बागान में घटित हों, एक रजिस्टर ऐसे प्ररूप में और ऐसे रीति में बनाए रखेगा जो विहित की जाए ।]
[32ग. प्रतिकर-नियोजक बागान में किसी कर्मकार को दुर्घटना की दशा में प्रतिकर देगा और ऐसे प्रतिकर से संबंधित ज्ञापन को नियोजक द्वारा कर्मकार प्रतिकर अधिनियम, 1923 (1923 का 8) के उपबंधों के अनुसार आयुक्त के पास रजिस्ट्रीकृत करवाया जाएगा ।]
अध्याय 7
शास्तियां और प्रक्रिया
33. बाधा डालना-(1) जो कोई किसी निरीक्षक के इस अधिनियम के अधीन के कर्तव्यों के निर्वहन में बाधा डालेगा अथवा किसी बागान के सम्बन्ध में इस अधिनियम के द्वारा या अधीन प्राधिकृत कोई निरीक्षण, परीक्षा या जांच करने में निरीक्षक को युक्तियुक्त सुविधा देने से इंकार करेगा या देने में जानबूझकर उपेक्षा करेगा, वह [कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दस हजार रुपए तक को हो सकेगा, या दोनों से दंडनीय होगा] ।
(2) जो कोई इस अधिनियम के अनुसरण में रखे गए किसी रजिस्टर या अन्य दस्तावेज को निरीक्षक द्वारा मांगे जाने पर पेश करने से जानबूझकर इंकार करेगा या किसी ऐसे निरीक्षक के, जो इस अधिनियम के अधीन अपने कर्तव्यों के निर्वहन में कार्य कर रहा है, समक्ष उपस्थित होने या उसके द्वारा परीक्षा की जाने से किसी व्यक्ति को निवारित करेगा या निवारित करने का प्रयत्न करेगा या कोई ऐसी बात करेगा जिसके बारे में उसके पास यह विश्वास करने का कारण हो कि उससे उसका इस प्रकार निवारित होना सम्भाव्य है, वह 3[कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा] ।
34. योग्यता के मिथ्या प्रमाणपत्र का उपयोग करना-जो कोई धारा 27 के अधीन किसी अन्य व्यक्ति को दिए गए प्रमाणपत्र का अपने को उस धारा के अधीन अनुदत्त योग्यता-प्रमाणपत्र के रूप में जानते हुए उपयोग करेगा या उपयोग करने का प्रयत्न करेगा, अथवा योग्यता-प्रमाणपत्र अपने को अनुदत्त किए जाने पर अन्य व्यक्ति द्वारा उसका उपयोग किया जाने देगा या करने का प्रयत्न किया जाने देगा, वह [कारावास से, जो दो मास तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा] ।
35. श्रमिकों के नियोजन विषयक उपबन्धों का उल्लंघन-जो कोई, उसके सिवाय जैसा कि इस अधिनियम के द्वारा या अधीन अन्यथा अनुज्ञात है, इस अधिनियम के या तद्धीन बनाए गए किन्हीं नियमों के किसी ऐसे उपबन्ध का उल्लंघन करेगा, जो बागान में व्यक्तियों के नियोजन को प्रतिषिद्ध, निर्बन्धित या विनियमित करता हो, वह 3[कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा] ।
36. अन्य अपराध-जो कोई इस अधिनियम के या तद्धीन बनाए गए किन्हीं नियमों के उपबंधों में से किसी का, जिसके लिए इस अधिनियम द्वारा या के अधीन अन्यत्र कोई शास्ति उपबंधित न हो, उल्लंघन करेगा, वह 3[कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा] ।
37. पूर्व दोषसिद्धि के पश्चात् वर्धित शास्ति-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का दोषसिद्ध कियाजा चुका हो, पुनः उसी उपबंध का उल्लंघन अंतर्वलित करने वाले किसी अपराध का दोषी होगा, तो वह पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि पर [कारावास से, जो एक वर्ष तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, जो दस हजार रुपए से कम का नहीं होगा किन्तु जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से दण्डनीय होगा]:
परन्तु जिस अपराध के लिए दण्ड दिया जा रहा हो, उसके दिए जाने से दो वर्ष से अधिक पूर्व की गई किसी दोषसिद्धि का इस धारा के प्रयोजनार्थ संज्ञान नहीं किया जाएगा ।
[37क. आदेश करने की न्यायालय की शक्ति-(1) जहां कोई नियोजक धारा 36 के अधीन दण्डनीयकिसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जाता है, वहां न्यायालय कोई दण्ड अधिनिर्णित करने के अतिरिक्त, लिखित आदेश द्वारा उससे अपेक्षा कर सकेगा कि वह ऐसी कालावधि के भीतर, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए (जिसे यदि न्यायालय ठीक समझे तो और नियोजक द्वारा इस निमित आवेदन किए जाने पर समय-समय पर बढ़ा सकेगा) उन बातों के उपचार के लिए, जिनकी बाबत अपराध किया गया है, ऐसे उपाय करे, जो इस प्रकार विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
(2) जहां उपधारा (1) के अधीन कोई आदेश किया जाता है, वहां नियोजक, न्यायालय द्वारा विनिर्दिष्ट, यथास्थिति, कालावधि या बढ़ाई गई कालावधि के दौरान अपराध के चालू रहने की बाबत इस अधिनियम के अधीन दायित्वाधीन नहीं होगा, किन्तु यदि ऐसी कालावधि या बढ़ाई गई कालावधि की समाप्ति पर, न्यायालय के आदेश का पूरी तरह से अनुपालन नहीं किया गया है, तो नियोजक की बाबत यह समझा जाएगा कि उसने उसके अतिरिक्त अपराध किया है और वह दोषसिद्धि पर कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, और जुर्माने से, जो ऐसी समाप्ति के पश्चात् प्रत्येक दिन के लिए तीन सौ रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।]
38. कुछ दशाओं में नियोजक को दायित्व से छूट-जहां कि कोई नियोजक, जिस पर इस अधिनियम के अधीन अपराध का आरोप लगाया गया हो, यह अभिकथित करे कि वास्तविक अपराधी कोई अन्य व्यक्ति है, वहां वह इस निमित्त किए गए अपने परिवाद पर तथा ऐसा करने के अपने आशय की तीन पूर्ण दिन की लिखित सूचना इस निमित्त अभियोजक को देकर इस बात का हक़दार होगा कि वह अन्य व्यक्ति उस दिन जो मामले की सुनवाई के लिए नियत हो, न्यायालय के समक्ष लाया जाए और यदि अपराध किया जाना साबित हो जाने के पश्चात् नियोजक न्यायालय को समाधान प्रदान करने वाले रूप में यह साबित कर दे कि-
(क) उसने इस अधिनियम के सुसंगत उपबन्धों का निष्पादन कराने के लिए सम्यक् तत्परता बरती है; तथा
(ख) उस अन्य व्यक्ति ने प्रश्नगत अपराध उसके ज्ञान, सम्मति या मौनानुकूलता के बिना किया है, तो उक्त अन्य व्यक्ति उस अपराध का दोषसिद्ध किया जाएगा और उसी प्रकार के दण्ड से ऐसे दण्डनीय होगा जैसे वह नियोजक हो और नियोजक दोषमुक्त कर दिया जाएगा:
परन्तु-
(क) नियोजक की शपथ पर परीक्षा की जा सकेगी तथा उसके और किसी अन्य साक्षी के, जिसे वह अपने समर्थन में बुलाए, साक्ष्य की उस व्यक्ति की ओर से, जिस पर वह वास्तविक अपराधी होने का अरोप लगाए और अभियोजक द्वारा प्रतिपरीक्षा की जा सकेगी; तथा
(ख) यदि वह व्यक्ति, जिसका वास्तविक अपराधी होना अभिकथित हो, उस दिन, जो मामले की सुनवाई के लिए नियत हो, न्यायालय के समक्ष सम्यक् तत्परता बरती जाने पर भी न लाया जा सके, तो न्यायालयउसकी सुनवाई समय-समय पर स्थगित कर सकेगा, किन्तु इस प्रकार कि ऐसे स्थगन की कुल कालावधि तीन मास से अधिक न हो और यदि उक्त कालावधि के अन्त तक भी वह व्यक्ति, जिसका वास्तविक अपराधी होना अभिकथित हो, न्यायालय के समक्ष न लाया जा सके, तो न्यायालय नियोजक के विरुद्ध मामले की सुनवाई के लिए अग्रसर होगा ।
[39. अपराधों का संज्ञान-कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का संज्ञान, किसी कर्मकार या ऐसे व्यवसाय संघ के जिसका ऐसा कर्मकार सदस्य है, किसी पदधारी या किसी निरीक्षक द्वारा किए गए परिवाद पर करने के सिवाय न करेगा और महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय से निम्नतर कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।
39क. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद या अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही किसी व्यक्ति के विरुद्ध न होगी ।]
40. अभियोजन की परिसीमा-कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन के किसी अपराध का संज्ञान तब के सिवाय न करेगा जब कि उसका परिवाद उस दिन से जब अभिकथि अपराध का किया जाना निरीक्षक के ज्ञान में आया, तीन मास के अन्दर किया गया हो या किया जाए:
परन्तु जहां कि अपराध निरीक्षक द्वारा किए गए लिखित आदेश की अवज्ञा करना हो, वहां उसका परिवाद उस तारीख से जब कि अपराध का किया जाना अभिकित हो, छह मास के अन्दर किया जा सकेगा ।
अध्याय 8
प्रकीर्ण
41. निदेश देने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, किसी भी राज्य की सरकार को, उस राज्य में इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट उपबन्धों का निष्पादन करने के सम्बन्ध में निदेश दे सकेगी ।
42. छूट देने की शक्ति-राज्य सरकार, किसी नियोजक को या नियोजकों के वर्ग को इस अधिनियम के सब उपबन्धों से या उनमें से किसी से, ऐसी शर्तों और निबन्धनों के अध्यधीन, जिन्हें अधिरोपित करना वह ठीक समझे, छूट लिखित आदेश द्वारा दे सकेगी:
परन्तु [धारा 19 से छूट से भिन्न] कोई भी ऐसी छूट केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन से दी जाने के सिवाय नहीं दी जाएगी ।
43. नियम बनाने की साधारण शक्ति-(1) राज्य सरकार, पूर्व प्रकाशन की शर्त के अध्यधीन रहते हुए, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी:
परन्तु साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 23 के खण्ड (3) के अधीन विनिर्दिष्ट की जाने वाली तारीख, उस तारीख से, जिसको कि प्रस्थापित नियमों का प्ररूप प्रकाशित किया गया था, छह सप्ताह से कम की न होगी ।
(2) विशिष्टतः और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे कोई नियम निम्नलिखित के लिए उपबन्ध कर सकेंगे-
(क) वे अर्हताएं, जो मुख्य निरीक्षक और निरीक्षक के बारे में अपेक्षित होंगी;
(ख) वे शक्तियां, जो निरीक्षकों द्वारा प्रयुक्त की जा सकेंगी और वे क्षेत्र, जिनमें और वह रीति, जिससे ऐसी शक्तियां प्रयुक्त की जा सकेंगी;
(ग) चिकित्सीय पर्यवेक्षक, जो प्रमाणकर्ता सर्जनों द्वारा किया जा सकेगा;
(घ) बागान में पीने के पानी के प्रदाय और वितरण की निरीक्षकों या अन्य व्यक्तियों द्वारा परीक्षा;
(ङ) मुख्य निरीक्षक या निरीक्षक के किसी आदेश से अपीलें, और वह प्ररूप जिसमें, वह समय, जिसके भीतर और वे प्राधिकारी, जिनको ऐसी अपीलें की जा सकेंगी;
(च) वह समय, जिसके भीतर आवास सम्बन्धी, आमोद-प्रमोद सम्बन्धी, शिक्षा सम्बन्धी और अन्य सुविधाएं, जो उपबन्धित की जाने तथा कायम रखी जाने के लिए इस अधिनियम द्वारा अपेक्षित हैं, ऐसे उपबन्धित की जा सकेंगी;
(छ) उन शौचालयों और मूत्रालयों के प्रकार, जो बागान में बनाए रखे जाने चाहिएं;
(ज) चिकित्सा सम्बन्धी, आमोद-प्रमोद सम्बन्धी और शिक्षा सम्बन्धी सुविधाएं, जो उपबन्धित की जानी चाहिएं;
(झ) वह प्ररूप और रीति, जिसमें काम की कालावधियों की सूचनाएं सम्प्रदर्शित की जाएंगी और रखी जाएंगी;
(ञ) वे रजिस्टर, जो नियोजकों द्वारा रखे जाने चाहिएं और वे विवरणियां, चाहे वे कभी-कभी दी जाने वाली हों, चाहे कालिक हों, जो राज्य सरकार की राय में इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ अपेक्षित हों; ॥।
(ट) मजदूरी और अतिकाल के प्रयोजनार्थ प्रसामान्य कार्य-दिवस के लिए काम के घंटे;
[(ठ) कोई अन्य विषय, जिसका विहित किया जाना अपेक्षित है या जो विहित किया जा सकेगा ।]
[(3) इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखा जाएगा ।]
[(4) इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखा जाएगा ।]
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