औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947
(1947 का अधिनियम संख्यांक 14)1
[11 मार्च, 1947]
औद्योगिक विवादों के अन्वेषण और परिनिर्धारण के लिए और कतिपय
अन्य प्रयोजनों के लिए उपबन्ध
करने के लिए
अधिनियम
यह समीचीन है कि औद्योगिक विवादों के अन्वेषण और परिनिर्धारण के लिए और इसमें इसके पश्चात् वर्णित कतिपय अन्य प्रयोजनों के लिए उपबन्ध किया जाए;
अतः एत्दद्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता हैः-
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) यह अधिनियम औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 कहा जा सकेगा ।
2[(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है:
3। । । । ।]
(3) यह 1947 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रवृत्त होगा ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि विषय या संदर्भ में कोई बात विरुद्ध न हो, -
(क) “समुचित सरकार से-
(i) केन्द्रीय सरकार द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन 4॥। या किसी रेल कम्पनी द्वारा चलाए जाने वाले किसी उद्योग से सम्पृक्त 5[अथवा किसी ऐसे नियंत्रित उद्योग से सम्पृक्त, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किया जाए] 6॥। या किसी औद्योगिक विवाद के सम्बन्ध में 7॥। या 8[9 [10 [11 [डॉक कर्मकार (नियोजन का विनियमन) अधिनियम, 1948 (1948 का 9) की धारा 5क के अधीन स्थापित डॉक श्रम बोर्ड या 12[कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन बनाया गया और रजिस्ट्रीकृत भारतीय औद्योगिक वित्त निगम लिमिटेड] या कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 (1948 का 34) की धारा 3 के अधीन स्थापित कर्मचारी राज्य बीमा निगम, या कोयला खान भविष्य निधि और प्रकीर्ण
- इस अधिनियम का विस्तार, 1962 के विनियम सं० 12 द्वारा गोवा, दमण और दीव पर, 1963 के विनियम सं० 7 द्वारा (1-10-1963 से) पाण्डिचेरी पर और 1965 के विनियम सं० 8 की धारा 3 तथा अनुसूची द्वारा लक्कादीव, मिनिकोय और अमीनदीवी द्वीप पर किया गया है ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 2 द्वारा (29-8-1956 से) पूर्ववर्ती उपधारा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1970 के अधिनियम सं० 51 की धारा 2 तथा अनुसूची द्वारा (1-9-1971 से) परन्तुक का लोप किया गया ।
- विधि अनुकूलन आदेश, 1948 द्वारा फेडरल रेलवे अथारिटी द्वाराञ्ज् शब्दों का लोप किया गया ।
- 1951 के अधिनियम सं० 65 की धारा 32 द्वारा अंतःस्थापित ।
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा किसी फेडरल रेलवे का संचालनञ्ज् शब्दों का लोप किया गया ।
- 1963 के अधिनियम सं० 10 की धारा 47 और अनुसूची 2, भाग 2 द्वारा अंतःस्थापित कतिपय शब्दों का 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 2 द्वारा (19-12-1964 से) लोप किया गया ।
- 1961 के अधिनियम सं० 47 की धारा 51 और अनुसूची 2, भाग 3 द्वारा (1-1-1962 से) अंतःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 2 द्वारा (19-12-1964 से) स्थापित निक्षेप बीमा निगमञ्ज् शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1971 के अधिनियम सं० 45 की धारा 2 द्वारा (15-12-1971 से) प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 2 द्वारा (21-8-1984 से) प्रतिस्थापित ।
- 1996 के अधिनियम सं० 24 की धारा 2 द्वारा (11-10-1995 से) प्रतिस्थापित ।
उपबन्ध अधिनियम, 1948 (1948 का 46) की धारा 3क के अधीन गठित न्यासी बोर्ड या कर्मचारी भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबन्ध अधिनियम, 1952 (1952 का 19) की क्रमशः धारा 5क और धारा 5ख के अधीन गठित केन्द्रीय न्यासी बोर्ड और राज्य न्यासी बोर्ड, 1॥। या जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 (1956 का 31) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय जीवन बीमा निगम, या 12[कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन रजिस्ट्रीकृत तेल और प्रकृतिक गैस निगम लिमिटेड] या निक्षेप बीमा और प्रत्यय प्रत्याभूति निगम अधिनयम, 1961 (1961 का 47) की धारा 3 के अधीन स्थापित निक्षेप बीमा और प्रत्यय प्रत्याभूति निगम, या भाण्डागारण निगम अधिनियम, 1962 (1962 का 58) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय यूनिट ट्रस्ट, या खाद्य निगम अधिनियम, 1964 (1964 का 37) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय खाद्य निगम या दो अथवा दो से अधिक समीपस्थ राज्यों के लिए धारा 16 के अधीन स्थापित प्रबन्ध बोर्ड, या 2[भारतीय विमान पत्तन प्राधिकरण अधिनियम, 1994 (1994 का 55) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय विमान पत्तन प्राधिकरण] या प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 (1976 का 21) की धारा 3 के अधीन स्थापित प्रादेशिक ग्रामीण बैंक, या निर्यात, उधार और प्रत्याभूति निगम लिमिटेड या भारतीय औद्योगिक पुनर्निमाण बैंक 3[राष्ट्रीय आवास बैंक अधिनियम, 1987 (1987 का 53) की धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय आवास बैंकट या] 2[किसी वायु परिवहन सेवा अथवा बैंककारी या बीमा कम्पनीट खान, तेलक्षेत्र] 4[छावनी बोर्ड] या 5[महापत्तन, ऐसी किसी कंपनी, जिसमें समादत्त शेयर पूंजी के इक्यावन प्रतिशत से अन्यून केन्द्रीय सरकार द्वारा धारित है या संसद् द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या उसके अधीन स्थापित ऐसे किसी निगम, जो इस खंड में निर्दिष्ट निगम नहीं है या केन्द्रीय पब्लिक सेक्टर उपक्रम, प्रमुख उपक्रम द्वारा स्थापित समनुषंगी कंपनियों और केन्द्रीय सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन स्वशासी निकायों से सम्पृक्त औद्योगिक विवाद के संबंध में, केन्द्रीय सरकार, तथा]
4[(ii) किसी अन्य औद्योगिक विवाद के संबंध में, जिसके अंतर्गत राज्य पब्लिक सेक्टर उपक्रम, प्रमुख उपक्रम द्वारा स्थापित समनुषंगी कंपनियों और राज्य सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन स्वशासी निकायों से संबंधित विवाद भी है, राज्य सरकारः
परन्तु यह कि किसी ऐसे औद्योगिक स्थापन में, जहां ऐसा विवाद पहली बार हुआ था, किसी ठेकेदार और ठेकेदार के माध्यम से नियोजित ठेका श्रम के बीच किसी विवाद के मामले में, समुचित सरकार, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या ऐसी राज्य सरकार होगी, जिसका ऐसे औद्योगिक स्थापन पर नियंत्रण है;]
3[(कक) मध्यस्थ" के अन्तर्गत अधिनिर्णायक आता है;]
6[ 7[(ककक)] “औसत वेतन" से उस मजदूरी का औसत अभिप्रेत है, जो कर्मकार को-
(i) ऐसे कर्मकार की दशा में, जिसे मासिक संदाय किया जाता है, उन तीन पूरे कलेण्डर मासों में,
(ii) ऐसे कर्मकार की दशा में, जिसे साप्ताहिक संदाय किया जाता है, उन चार पूरे सप्ताहों में,
(iii)) ऐसे कर्मकार की दशा में, जिसे दैनिक संदाय किया जाता है, उन बारह पूरे कार्य दिवसों में,
संदेय थी, जो उस तारीख के पूर्ववर्ती हो, जिस तारीख को औसत वेतन संदेय हो जाता है, यदि उस कर्मकार ने, यथास्थिति, तीन पूरे कलेण्डर मास तक या चार पूरे सप्ताह तक या बारह पूरे कार्य-दिवस तक काम किया है, और जहां कि ऐसी गणना नहीं की जा सकती वहां औसत वेतन की गणना उस मजदूरी के औसत के रूप में की जाएगी जो कर्मकार को, उस कालावधि के दौरान संदेय थी, जिसमें उसने वास्तव में काम किया;]
- 1996 के अधिनियम सं० 24 की धारा 2 द्वारा (11-10-1995 से) लोप किया गया ।
- 1996 के अधिनियम सं० 24 की धारा 2 द्वारा (11-10-1995 से) प्रतिस्थापित ।
- 1987 के अधिनियम सं० 53 की धारा 56 और दूसरी अनुसूची द्वारा (9-7-1998 से) अंतःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 2 द्वारा (19-12-1964 से) अंतःस्थापित ।
- 2010 के अधिनियम सं० 24 की धारा 2 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1953 के अधिनियम सं० 43 की धारा 2 द्वारा (24-10-1953 से) अंतःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 2 द्वारा (19-12-1964 से) खण्ड (कक) को खण्ड (ककक) के रूप में पुनःसंख्यांकित किया गया ।
1[(ख) “अधिनिर्णय" से किसी औद्योगिक विवाद के या तत्सम्बन्धी किसी अन्य प्रश्न के सम्बन्ध में किसी श्रम न्यायालय, औद्योगिक अधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक अधिकरण द्वारा किया गया अन्तरिम या अन्तिम अवधारण अभिप्रेत है, और धारा 10क के अधीन किया गया माध्यस्थम् पंचाट इसके अन्तर्गत आता है;]
2[(खख) ”बैंककारी कम्पनी" से बैंककारी कम्पनी अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 में यथापरिभाषित ऐसी बैंककारी कम्पनी अभिप्रेत है, जिसकी शाखाएं या अन्य स्थापन एक से अधिक राज्यों में हों और 3[भारतीय निर्यात-आयात बैंक] 4[भारतीय औद्योगिक पुनर्निर्माण बैंक,] 5॥। 6[भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक अधिनियम, 1989 (1989 का 39) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक], भारतीय रिजर्व बैंक, भारतीय स्टेट बैंक, 7[बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 के अधीन गठित तत्स्थानी नया बैंक],
8[बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 के अधीन गठित तत्सथानी नया बैंक और भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) में यथा परिभाषित कोई भी समनुषंगी बैंकट [इसके अन्तर्गत आते हैं;]
(ग) “बोर्ड" से इस अधिनियम के अधीन गठित सुलह बोर्ड अभिप्रेत है;
9[(गग) “बंदी" से किसी नियोजन का स्थान या उसके किसी भाग का स्थायी रूप से बन्द किया जाना अभिप्रेत है;]
(घ) “सुलह अधिकारी" से इस अधिनियम के अधीन नियुक्त सुलह अधिकारी अभिप्रेत है;
(ङ) “सुलह कार्यवाही" से किसी सुलह अधिकारी या बोर्ड द्वारा इस अधिनियम के अधीन की गई कोई कार्यवाही अभिप्रेत है;
10[(ङङ) “नियंत्रित उद्योग" से कोई ऐसा उद्योग अभिप्रेत है जिसका संघ द्वारा नियंत्रण में लिया जाना किसी केन्द्रीय अधिनियम द्वारा लोक हित में समीचीन घोषित कर दिया गया है;]
11। । । ।
(च) “न्यायालय" से इस अधिनियम के अधीन गठित जांच न्यायालय अभिप्रेत है;
(छ) “नियोजक" से-
(i) 12[केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार] के किसी विभाग द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन चलाए गए उद्योग के सम्बन्ध में, इस निमित्त विहित प्राधिकारी, या जहां कि कोई प्राधिकारी विहित नहीं है, वहां विभागाध्यक्ष, अभिप्रेत है;
(ii) किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा या उसकी ओर से चलाए गए उद्योग के सम्बन्ध में, उस प्राधिकारी का मुख्य कार्यपालक अधिकारी अभिप्रेत है;
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 3 द्वारा (10-3-1957 से) खण्ड (ख) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1949 के अधिनियम सं० 54 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित खण्ड (खख) के स्थान पर 1959 के अधिनियम सं० 38 की धारा 64 तथा अनुसूची 3, भाग 2 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1981 के अधिनियम सं० 28 की धारा 40 और दूसरी अनुसूची द्वारा (1-1-1982 से) अंतःस्थापित ।
- 1984 के अधिनियम सं० 62 की धारा 71 और तीसरी अनुसूची द्वारा (20-3-1985 से) अंतःस्थापित ।
- 2003 के अधिनियम सं० 53 की धारा 12 और अनुसूची द्वारा लोप किया गया ।
- 1989 के अधिनियम सं० 39 की धारा 53 और अनुसूची 2 द्वारा (अधिसूचना की तारीख से) अंतःस्थापित ।
- 1970 के अधिनियम सं० 5 की धारा 20 द्वारा (19-7-1969 से) और कोई समनुषंगी बैंकञ्ज् के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1980 के अधिनियम सं० 40 की धारा 20 द्वारा (15-4-1980 से) प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 2 द्वारा (21-8-1980 से) अंतःस्थापित ।
- 1951 के अधिनियम सं० 65 की धारा 32 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1953 के अधिनियम सं० 43 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित खण्ड (ङङङ) का 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 2 द्वारा (19-12-1964 से) लोप किया गया ।
- विधि अनुकूलन आदेश, 1948 द्वारा ब्रिटिश भारत में किसी सरकार के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
1[(छछ) कार्यपालिका" से किसी व्यवसाय संघ के संबंध में, ऐसा निकाय, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, अभिप्रेत है जिसे व्यवसाय संघ के कार्यकलाप का प्रबंध सौंपा गया हो;]
2। । । ।
(झ) किसी बोर्ड, न्यायालय या अधिकरण के अध्यक्ष या अन्य सदस्य के रूप में अपनी नियुक्ति के प्रयोजन के लिए कोई व्यक्ति “स्वतन्त्र" समझा जाएगा यदि वह ऐसे बोर्ड, न्यायालय या अधिकरण को निर्देशित औद्योगिक विवाद से या ऐसे विवाद से प्रत्यक्षतः प्रभावित किसी उद्योग से संसक्त नहीं हैः
3[परन्तु किसी भी व्यक्ति का केवल इसी तथ्य के कारण स्वतन्त्र होना समाप्त नहीं हो जाएगा कि वह किसी ऐसी निगमित कम्पनी का शेयरधारक है जो ऐसे औद्योगिक विवाद से संसक्त है या जिसका उससे प्रभावित होना संभाव्य है, किन्तु ऐसी दशा में वह समुचित सरकार को यह प्रकट करेगा कि उस कम्पनी में उसके द्वारा धारित शेयर किस प्रकार के हैं और कितने के हैं;]
4[(ञ) उद्योग" से नियोजकों का कोई भी कारबार, व्यवसाय, उपक्रम, विनिर्माण या आजीविका अभिप्रेत है और कर्मकारों की कोई भी आजीविका, सेवा नियोजन, हस्तशिल्प या औद्योगिक उपजीविका या उपव्यवसाय इसके अन्तर्गत आता है;]
- 1971 के अधिनियम सं० 45 की धारा 2 द्वारा (15-12-1971 से) अंतःस्थापित ।
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा खण्ड (ज) का लोप किया गया ।
- 1952 के अधिनियम सं०18 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित ।
- औद्योगिक विवाद (संशोधन) अधिनियम, 1982 (1982 का 46) की धारा 2 के खण्ड (ग) के प्रवर्तित होने पर खण्ड (ञ) निम्नलिखित रूप में प्रतिस्थापित हो जाएगाःश्न्
‘(ञ) उद्योग” से ऐसा व्यवस्थित क्रियाकलाप अभिप्रेत है जो किसी नियोजक और उसके कर्मकारों (चाहे ऐसे कर्मकार को ऐसे नियोजन ने सीधे या किसी अभिकरण, जिसके अन्तर्गत ठेकेदार भी है, द्वारा या उसकी मार्फत, नियोजित किया हो) के बीच सहकारिता से किया जा रहा हो और जो मानवीय आवश्यकताओं या इच्छाओं की (जो केवल आध्यात्मिक या धार्मिक प्रकृति की आवश्यकताएं या इच्छाएं न हों) पूर्ति के लिए माल के उत्पादन, प्रदाय या वितरण या सेवाओं के लिए है, भले ही-
(i) ऐसे क्रियाकलाप के प्रयोजन के लिए किसी पूंजी का विनिधान किया गया हो या नहीं, या
(ii) ऐसा क्रियाकलाप कोई अभिलाभ या लाभ प्राप्त करने के हेतुक से किया जा रहा हो या नहीं,
और इसके अन्तर्गत निम्नलिखित हैं, -
(क) डॉक कर्मकार (नियोजन का विनियमन) अधिनियम, 1948 (1948 का 9) की धारा 5क के अधीन स्थापित डॉक श्रम बोर्ड का कोई क्रियाकलाप;
(ख) किसी स्थापन द्वारा किया जाने वाला विक्रय संवर्धन या कारबार, या दोनों से संबंधित कोई क्रियाकलाप,
किन्तु इसके अन्तर्गत निम्नलिखित नहीं हैं: -
(1) कोई कृषिक संक्रिया, ऐसी कृषिक संक्रिया के सिवाय जहां वह किसी अन्य क्रियाकलाप (ऐसा क्रियाकलाप जो इस खण्ड के पूर्वोक्त उपबन्धों में निर्दिष्ट है) के साथ समेकित रीति से की जा रही हो और ऐसा अन्य क्रियाकलाप प्रधान हो ।
स्पष्टीकरण-इस उपखण्ड के प्रयोजनों के लिए, कृषिक संक्रिया के अन्तर्गत बागान श्रम अधिनियम, 1951 (1951 का 69) की धारा 2 के खण्ड (च) में यथापरिभाषित बागान में किया जा रहा कोई क्रियाकलाप नहीं है; या
(2) अस्पताल या औषधालय; या
(3) शैक्षणिक, वैज्ञानिक, अनुसंधान या प्रशिक्षण संस्थाएं; या
(4) किसी पूर्त, सामाजिक या परोपकारी सेवा में पूर्ण या पर्याप्त रूप में लगे हुए संगठनों के स्वामित्व में या उनके प्रबन्ध के अधीन संस्थाएं; या
(5) खादी या ग्रामोद्योग; या
(6) सरकार के प्रभुत्व-सम्पन्न कृत्यों से संबंधित सरकार का कोई क्रियाकलाप, जिसके अन्तर्गत केन्द्रीय सरकार के उन विभागों के सभी क्रियाकलाप हैं जो रक्षा अनुसंधान, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष संबंधी कार्य कर रहे हैं; या
(7) कोई घरेलू सेवा; या
(8) कोई क्रियाकलाप, जो एक ऐसी वृत्ति हो जिसे कोई व्यष्टि या व्यष्टियों का निकाय करता है यदि ऐसी वृत्ति के संबंध में व्यष्टि या व्यष्टियों के निकाय द्वारा नियोजित व्यक्तियों की संख्या दस से कम है; या
(ट) “औद्योगिक विवाद" से नियोजकों और नियोजकों के बीच का, या नियोजकों और कर्मकारों के बीच का, या कर्मकारों और कर्मकारों के बीच का ऐसा विवाद या मतभेद अभिप्रेत है, जो किसी व्यक्ति के नियोजन या अनियोजन से या नियोजन के निबंधनों या श्रम-परिस्थितियों से संसक्त है;
1[(टक) “औद्योगिक स्थापन या उपक्रम" से ऐसा स्थापन या उपक्रम अभिप्रेत है जिसमें कोई उद्योग चलाया जाता हैः
परन्तु जहां किसी स्थापन या उपक्रम में अनेक क्रियाकलाप किए जाते हैं और ऐसे क्रियाकलापों में से केवल एक उद्योग है या कुछ क्रियाकलाप उद्योग हैं वहां, -
(क) यदि ऐसे क्रियाकलाप, जो एक उद्योग हैं, करने वाले स्थापन या उपक्रम की कोई यूनिट ऐसे स्थापन या उपक्रम की अन्य यूनिट या यूनिटों से पृथक्करणीय है, तो ऐसे यूनिट को एक पृथक औद्योगिक स्थापन या उपक्रम समझा जाएगा;
(ख) यदि ऐसे स्थापन या उपक्रम या उसके किसी यूनिट में किया जाने वाला प्रधान क्रियाकलाप या प्रधान क्रियाकलापों में से प्रत्येक क्रियाकलाप, एक उद्योग है और ऐसे स्थापन या उपक्रम या उसके किसी यूनिट में चलाया जा रहा अन्य क्रियाकलाप या अन्य क्रियाकलापों में से प्रत्येक क्रियाकलाप पृथक्करणीय नहीं हैं और ऐसे प्रधान क्रियाकलाप या क्रियाकलापों के चलाए जाने या चलाए जाने में सहायता करने के प्रयोजन के लिए, यथास्थिति, सम्पूर्ण स्थापन या उपक्रम या उसके यूनिट को एक औद्योगिक स्थापन या उपक्रम समझा जाएगा;]
2[(टट) “बीमा कम्पनी" से बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) की धारा 2 में यथापरिभाषित ऐसी बीमा कम्पनी अभिप्रेत है जिसकी शाखाएं या अन्य स्थापन एक से अधिक राज्यों में हो;]
1[(टटक) “खादी" का वही अर्थ है जो खादी और ग्रामोद्योग आयोग अधिनियम, 1956 (1956 का 6) की धारा 2 के खण्ड (घ) में है;]
3[ 4[(टटख)] “श्रम न्यायालय" से धारा 7 के अधीन गठित श्रम न्यायालय अभिप्रेत है;]
5[(टटट) कामबंदी" से (उसके व्याकरणिक रूपों और सजातीय पदों सहित) किसी नियोजक की किसी ऐसे कर्मकार को, जिसका नाम उसके औद्योगिक स्थापन के मस्टर रोल में दर्ज है और जिसकी छंटनी नहीं की गई है, कोयले, शक्ति या कच्ची सामग्री की कमी के या स्टाक के संचित हो जाने के या मशीनरी के ठप्प हो जाने के कारण 6[या प्राकृतिक विपत्ति या किसी अन्य संबंधित कारण से] काम देने में असफलता, इन्कार या असमर्थता अभिप्रेत है ।
स्पष्टीकरण-हर ऐसे कर्मकार के बारे में, जिसका नाम औद्योगिक स्थापन के मस्टर रोल में दर्ज है और जो किसी दिन प्रसामान्य काम घंटों के दौरान उस समय, जो तत्प्रयोजनार्थ नियत है, औद्योगिक स्थापन में काम करने के लिए स्वयं उपस्थित होता है और नियोजक द्वारा उसे काम उसके ऐसे उपस्थित होने के दो घंटे के अन्दर नहीं दिया जाता है, यह समझा जाएगा कि उसकी इस खंड के अर्थ के अन्दर उस दिन के लिए कामबंदी की गई हैः
परन्तु यदि कर्मकार को किसी दिन की किसी पारी के प्रारंभ में काम दिए जाने के बजाए उससे कहा जाता है कि वह उस दिन की पारी के दूसरे अर्ध भाग के दौरान उस प्रयोजन के लिए उपस्थित हो और तब उसे काम दिया जाता है तो उसके बारे में समझा जाएगा कि उसकी उस दिन के केवल आधे भाग के लिए कामबंदी की गई हैः
(9) कोई क्रियाकलाप, जो ऐसा क्रियाकलाप हो जो किसी सहकारी सोसाइटी या क्लब या उसी प्रकार के व्यष्टियों के निकाय द्वारा किया जा रहा है, यदि ऐसे क्रियाकलाप के संबंध में सहकारी सोसाइटी, क्लब या उसी प्रकार के व्यष्टियों के निकाय द्वारा नियोजित व्यक्तियों की संख्या दस से कम है; ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 2 द्वारा (21-8-1984 से) अंतःस्थापित ।
- 1949 के अधिनियम सं० 54 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 3 द्वारा (10-3-1957 से) अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 2 द्वारा (21-8-1984 से) खंड (टटक) को, खंड (टटख) के रूप में अक्षरांकित ।
- 1953 के अधिनियम सं० 43 की धारा 2 द्वारा (24-10-1953 से) अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 2 द्वारा (21-8-1984 से) या किसी अन्य कारण से शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
परन्तु यह और कि यदि उसे इस प्रकार उपस्थित होने पश्चात् भी ऐसा कोई काम नहीं दिया जाता है तो उसके बारे में यह न समझा जाएगा कि उसकी उस दिन की पारी के दूसरे अर्ध भाग के लिए कामबंदी की गई है और वह उस दिन के उस भाग के लिए पूरी आधारिक मजदूरी और पूरे मंहगाई भत्ते का हकदार होगा;]
(ठ) “तालाबन्दी" से 1[नियोजन-स्थान का अस्थायी रूप से बन्द कर दिया जाना,] या काम का निलम्बन, या नियोजक का अपने द्वारा नियोजित व्यक्तियों में से कितने ही व्यक्तियों को नियोजन में लगाए रखने से इन्कार करना अभिप्रेत है;
2[(ठक) “महापत्तन" से भारतीय पत्तन अधिनियम, 1908 (1908 का 15) की धारा 3 के खंड (8) में यथापरिभाषित महापत्तन अभिप्रेत है;
(ठख) “खान" से खान अधिनियम, 1952 (1952 का 35) की धारा 2 की उपधारा (1) के खण्ड (ञ) में यथापरिभाषित खान अभिप्रेत है;]
3[(ठठ) “राष्ट्रीय अधिकरण" से धारा 7ख के अधीन गठित राष्ट्रीय औद्योगिक अधिकरण अभिप्रेत है;]
4[(ठठठ) “पदाधिकारी" के अन्तर्गत किसी व्यवसाय संघ के संबंध में, उसका कोई भी सदस्य आता है, किन्तु इसके अन्तर्गत लेखापरीक्षक नहीं आता;]
(ड) “विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(ढ) “लोक उपयोगी सेवा" से अभिप्रेत है-
(i) कोई भी रेल सेवा 2[या वायु सेवा द्वारा यात्रियों या माल के वहन के लिए कोई भी परिवहन सेवा;]
4[(त्क) किसी महापत्तन या डॉक में या उसके कार्यकरण से संबंधित कोई सेवा;]
(ii) किसी औद्योगिक स्थापन का ऐसा अनुभाग, जिसके कार्यकरण पर उस स्थापन का या उसमें नियोजित कर्मकारों का क्षेम निर्भर करता है;
(iii)) कोई डाक, टेलीग्राफ या टेलीफोन सेवा;
(iv) कोई उद्योग जो जनता को शक्ति, रोशनी या जल का प्रदाय करता है;
(v) सार्वजनिक मलवहन या सफाई का कोई तंत्र;
(vi) 5[प्रथम अनुसूची] में विनिर्दिष्ट कोई ऐसा उद्योग, जिसे समुचित सरकार, यदि उसका समाधान हो गया है कि लोक आपात या लोक हित में ऐसा करना अपेक्षित है, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उतनी कालावधि के लिए, जितनी उस अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, लोक उपयोगी सेवा घोषित करेः
परन्तु इस प्रकार विनिर्दिष्ट कालावधि प्रथमतः, छह महीने से अधिक की न होगी, किन्तु उसे वैसी ही अधिसूचना द्वारा एक समय में छह मास से अनधिक की किसी कालावधि के लिए समय-समय पर उस दशा में बढ़ाया जा सकेगा जिसमें लोक आपात या लोक हित में इस प्रकार बढ़ाया जाना समुचित सरकार की राय में अपेक्षित है;
(ण) “रेल कम्पनी" से भारतीय रेल अधिनियम, 1890 (1890 का 9) की धारा 3 में यथापरिभाषित रेल कम्पनी अभिप्रेत है;
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 2 द्वारा (21-8-1984 से) कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 2 द्वारा (19-12-1964 से) अंतःस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 3 द्वारा (10-3-1957 से) अंतःस्थापित ।
- 1971 के अधिनियम सं० 45 की धारा 2 द्वारा (15-12-1971 से) अंतःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 2 द्वारा (19-12-1964 से) अनुसूची के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
1[(णण) “छंटनी" से नियोजक द्वारा किसी कर्मकार की सेवा का ऐसा पर्यवसान अभिप्रेत है, जो अनुशासन संबंधी कार्यवाही के रूप में दिए गए दंड से भिन्न किसी भी कारण से किया गया हो, किन्तु इसके अन्तर्गत निम्नलिखित नहीं आते-
(क) कर्मकार की स्वेच्छया निवृत्ति; अथवा
(ख) अधिवार्षिकी आयु का हो जाने पर कर्मकार की उस दशा में निवृत्ति जिसमें नियोजक और संयुक्त कर्मकार के बीच हुई किसी नियोजन संविदा में उस निमित्त कोई अनुबन्ध अन्तर्विष्ट हो; अथवा
2[(खख) नियोजक और सम्पृक्त कर्मकार के बीच हुई नियोजन संविदा के समाप्त हो जाने पर उसका नवीकरण न किए जाने या नियोजन संविदा में उस निमित्त अन्तर्विष्ट किसी अनुबंध के अधीन ऐसी संविदा का पर्यवसान किए जाने के फलस्वरूप किसी कर्मकार की सेवा का पर्यवसान; या]
(ग) इस आधार पर कर्मकार की सेवा का पर्यवसान कि उसका स्वास्थ बराबर खराब रहा है;]
3[(त) “समझौता" से सुलह कार्यवाही के अनुक्रम में किया गया समझौता अभिप्रेत है, और इसके अन्तर्गत सुलह कार्यवाही के अनुक्रम में किए गए करार से अन्यथा नियोजक और कर्मकार के बीच हुआ कोई ऐसा लिखित करार आता है जिस पर उसके पक्षकारों ने ऐसी रीति से हस्ताक्षर किए हों जैसी विहित की जाए और जिसकी एक प्रति समुचित सरकार द्वारा 4[इस निमित्त प्राधिकृत अधिकारी] को और सुलह अधिकारी को भेज दी गई हो;]
(थ) “हड़ताल" से किसी उद्योग में नियोजित व्यक्तियों के निकाय द्वारा मिलकर काम बन्द कर दिया जाना या कितने ही ऐसे व्यक्तियों का जो इस प्रकार नियोजित हैं, या नियोजित रहें हैं काम करते रहने से या नियोजन प्रतिगृहीत करने से सम्मिलित रूप से इन्कार करना या सामान्य मति से इन्कार करना अभिप्रेत है;
5[(थथ) “व्यवसाय संघ" से व्यवसाय संघ अधिनियम, 1926 (1926 का 16) के अधीन रजिस्ट्रीकृत व्यवसाय संघ अभिप्रेत है;]
6[(द) “अधिकरण" से धारा 7क के अधीन गठित औद्योगिक अधिकरण अभिप्रेत है, और इसके अन्तर्गत इस अधिनियम के अधीन 10 मार्च, 1957 के पहले गठित औद्योगिक अधिकरण आता है;]
4[(दक) “अनुचित श्रम व्यवहार" से पंचम अनुसूची में विनिर्दिष्ट व्यवहारों में से कोई व्यवहार अभिप्रेत है]
(दख) “ग्रामोद्योग" का वही अर्थ है जो खादी और ग्रामोद्योग आयोग अधिनियन, 1956 (1956 का 61) की धारा 2 के खण्ड (ज) में है;]
7[(दद) “मजदूरी" से धन के रूप में अभिव्यक्त हो सकने वाला वह सब पारिश्रमिक अभिप्रेत है जो किसी कर्मकार को, यदि नियोजन के अभिव्यक्त या विवक्षित निबन्धनों की पूर्ति हो गई होती तो उसके नियोजन या ऐसे नियोजन में किए गए काम की बाबत उसे संदेय होता और इसके अन्तर्गत आते हैंः-
(i) (मंहगाई भत्ता सहित) ऐसे भत्ते जिनके लिए कर्मकार तत्समय हकदार है;
(ii) किसी गृहवास सुविधा का या रोशनी, जल, चिकित्सीय परिचर्या या अन्य सुख-सुविधा के प्रदाय का या किसी सेवा का या खाद्यान्नों या अन्य वस्तुओं के रियायती प्रदाय का मूल्य;
(iii)) कोई यात्री रियायत;
- 1953 के अधिनियम सं० 43 की धारा 2 द्वारा (24-10-1953 से) अंतःस्थापित ।
- 1984 के अधिनियम सं० 49 की धारा 2 द्वारा (18-8-1984 से) अंतःस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 3 द्वारा (7-10-1956 से) खण्ड (त) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1965 के अधिनियम सं० 35 की धारा 2 द्वारा (1-12-1965 से) अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 2 द्वारा (21-8-1984 से) अंतःस्थापित ।
- 1957 के अधिनियम सं० 18 की धारा 2 द्वारा (10-3-1957 से) खण्ड (द) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1953 के अधिनियम सं० 43 की धारा 2 द्वारा (24-10-1953 से) अंतःस्थापित ।
4[(iv) विक्रय या कारबार या दोनों के संवर्धन के लिए संदेय कोई कमीशन;]
किन्तु इसके अन्तर्गत निम्नलिखित नहीं आते हैंः-
(क) कोई बोनस;
(ख) किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन किसी पेंशन-निधि या भविष्य-निधि में या कर्मकार के फायदें के लिए नियोजक द्वारा संदत्त या संदेय कोई अभिदाय;
(ग) उसकी सेवा के पर्यवसान पर संदेय कोई उपदान;]
1[(ध) “कर्मकार" से कोई ऐसा व्यक्ति (जिसके अन्तर्गत शिक्षु भी आता है) अभिप्रेत है, जो किसी उद्योग में भाड़े या इनाम के लिए कोई शारीरिक, अकुशल, कुशल, तकनीकी, संक्रियात्मक, लिपिकीय या पर्यवेक्षणिक कार्य करने के लिए नियोजित है, चाहे नियोजन के निबंधन अभिव्यक्त हों या विवक्षित, और किसी औद्योगिक विवाद के संबंध में इस अधिनियम के अधीन की किसी कार्यवाही के प्रयोजनों के लिए इसके अन्तर्गत कोई ऐसा व्यक्ति आता है जो उस विवाद के संबंध में या उसके परिणामस्वरूप पदच्युत या उन्मोचित कर दिया गया है या जिसकी छंटनी कर दी गई है अथवा जिसकी पदच्युति, उन्मोचन या छंटनी किए जाने से वह विवाद पैदा हुआ हो, किन्तु इसके अन्तर्गत कोई ऐसा व्यक्ति नहीं आता है जो-
(i) वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) या सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) या नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) के अधीन हो; अथवा
(ii) पुलिस सेवा में या किसी कारागार के अधिकारी या अन्य कर्मचारी के रूप में नियोजित हो; अथवा
(iii)) मुख्यतः प्रबन्धकीय या प्रशासनिक हैसियत में नियोजित हो; अथवा
(iv) पर्यवेक्षणिक हैसियत में नियोजित होते हुए प्रतिमास 2[दस हजार रुपए] से अधिक मजदूरी लेता हो अथवा या तो पद से संलग्न कर्तव्यों की प्रकृति के या अपने में निहित शक्तियों के कारण ऐसे कृत्यों का प्रयोग करता है जो मुख्यतः प्रबन्धकीय प्रकृति के हैं ।]
3[2क. एक कर्मकार की पदच्युति आदि का भी औद्योगिक विवाद समझा जाना- 4[(1)] जहां कि कोई नियोजक किसी कर्मकार को उन्मोचित या पदच्युत कर देता है या उसकी छंटनी कर देता है, या उसकी सेवाएं अन्यथा पर्यवसित कर देता है, वहां ऐसे उन्मोचन, पदच्युति या छंटनी या पर्यवसान से संसक्त या उद्भूत कोई विवाद या मतभेद जो उस कर्मकार और उसके नियोजक के बीच हो, इस बात के होते हुए भी कि न तो अन्य कर्मकार और न कर्मकारों का कोई संघ उस विवाद में पक्षकार है, औद्योगिक विवाद समझा जाएगा ।]
5[(2) धारा 10 में किसी बात के होते हुए भी, ऐसा कोई कर्मकार, जो उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट है, उस तारीख से, जिसको उसने विवाद के सुलह के लिए समुचित सरकार के सुलह अधिकारी को आवेदन किया है, पैंतालीस दिन की समाप्ति के पश्चात् उसमें निर्दिष्ट विवाद के न्यायनिर्णयन के लिए श्रम न्यायालय या अधिकरण को सीधे आवेदन कर सकेगा और ऐसे आवेदन की प्राप्ति पर श्रम न्यायालय या अधिकरण को विवाद के संबंध में न्यायनिर्णयन करने की शक्तियां और अधिकारिता ऐसे होंगी, मानो वह समुचित सरकार द्वारा इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार उसे निर्देशित किया गया विवाद हो और इस अधिनियम के सभी उपबंध ऐसे न्यायनिर्णयन के संबंध में उसी प्रकार लागू होंगे जिस प्रकार वे समुचित सरकार द्वारा उसे निर्देशित किए गए किसी औद्योगिक विवाद के संबंध में लागू होते हैं ।
(3) उपधारा (2) में निर्दिष्ट आवेदन श्रम न्यायालय या अधिकरण को उपधारा (1) में यथाविनिर्दिष्ट पदभारमुक्ति, पदच्युति, छंटनी या अन्यथा सेवा की समाप्ति की तारीख से तीन वर्ष की समाप्ति से पूर्व किया जाएगा ।]
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 2 द्वारा (21-8-1984 से) खण्ड (ध) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2010 के अधिनियम सं० 24 की धारा 2 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1965 के अधिनियम सं० 35 की धारा 3 द्वारा (1-12-1965 से) अंतःस्थापित ।
- 2010 के अधिनियम सं० 24 की धारा 3 द्वारा संख्यांकित ।
- 2010 के अधिनियम सं० 24 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित ।
अध्याय 2
इस अधिनियम के अधीन प्राधिकारी
3. कर्म समिति-(1) ऐसे औद्योगिक स्थापन की दशा में, जिसमें एक सौ या उससे अधिक कर्मकार नियोजित हैं या पूर्ववर्ती बारह मासों में किसी भी दिन नियोजित रहे हैं, समुचित सरकार नियोजक से, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, यह अपेक्षा कर सकेगी कि वह नियोजकों के और उस स्थापन में लगे हुए कर्मकारों के प्रतिनिधियों की एक कर्म समिति विहित रीति से गठित करे, किन्तु ऐसे कि समिति में कर्मकारों के प्रतिनिधियों की संख्या नियोजक के प्रतिनिधियों की संख्या से कम न हो । कर्मकारों के प्रतिनिधि उस स्थापन में लगे हुए कर्मकारों में से विहित रीति से और व्यवसाय संघ अधिनियम, 1926 (1926 का 16) के अधीन रजिस्ट्रीकृत उनके व्यवसाय संघ से, यदि कोई हों, परामर्श करके चुने जाएंगे ।
(2) कर्म समिति का यह कर्तव्य होगा कि वह नियोजक और कर्मकारों के बीच सौहार्द्र और अच्छे सम्बन्ध सुनिश्चित करने और बनाए रखने के उपाय संप्रवृत्त करे और इस उद्देश्य से ऐसे मामलों पर, जिनमें उनका सामान्य हित है या जिनसे उनका सामान्य सरोकार है, टीका-] िप्पणी करे और ऐसे मामलों की बाबत किसी भी तात्त्विक मतभेद का प्रशमन करने का प्रयास करे ।
4. सुलह अधिकारी-(1) समुचित सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उतने व्यक्तियों को, जितने वह ठीक समझे, सुलह अधिकारी नियुक्त कर सकेगी, जो औद्योगिक विवादों में मध्यस्थता करने और उनमें समझौता कराने के कर्तव्य से भारित किए जाएंगे ।
(2) सुलह अधिकारी किसी विनिर्दिष्ट क्षेत्र के लिए, या किसी विनिर्दिष्ट क्षेत्र में विनिर्दिष्ट उद्योगों के लिए, या एक या अधिक विनिर्दिष्ट उद्योगों के लिए, और या तो स्थायी रूप से या सीमित कालावधि के लिए नियुक्त किया जा सकेगा ।
5. सुलह बोर्ड-(1) समुचित सरकार, जब भी ऐसा अवसर उद्भूत हो, औद्योगिक विवाद का समझौता संप्रवृत्त करने के लिए सुलह बोर्ड, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, गठित कर सकेगी ।
(2) बोर्ड, अध्यक्ष और दो या चार अन्य सदस्यों से, जैसा भी समुचित सरकार ठीक समझे, गठित होगा ।
(3) अध्यक्ष स्वतन्त्र व्यक्ति होगा और अन्य सदस्य विवाद के पक्षकारों का प्रतिनिधित्व करने के लिए बराबर-बराबर संख्या में नियुक्त व्यक्ति होंगे और किसी पक्षकार का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त व्यक्ति उसी पक्षकार की सिफारिश पर नियुक्त किया जाएगाः
परन्तु यदि कोई पक्षकार यथापूर्वोक्त सिफारिश विहित समय में करने में असफल रहे तो समुचित सरकार उस पक्षकार का प्रतिनिधित्व करने के लिए ऐसे व्यक्तियों को नियुक्त करेगी जिन्हें वह उचित समझे ।
(4) विहित गणपूर्ति होने पर ऐसा बोर्ड, अध्यक्ष या अपने किसी सदस्य की अनुपस्थिति या अपनी सदस्य-संख्या में कोई रिक्ति होने पर भी, कार्य कर सकेगाः
परन्तु यदि समुचित सरकार बोर्ड को यह अधिसूचित करे कि अध्यक्ष या उसके किसी अन्य सदस्य की सेवाएं उपलब्ध नहीं रह गई हैं तो बोर्ड तक तक कार्य नहीं करेगा जब तक, यथास्थिति, नया अध्यक्ष या सदस्य नियुक्त नहीं कर दिया जाता ।
6. जांच न्यायालय-(1) समुचित सरकार, जब भी ऐसा अवसर उद्भूत हो, किसी औद्योगिक विवाद से संसक्त या सुसंगत प्रतीत होने वाले किसी मामले की जांच के लिए जांच न्यायालय का गठन, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, कर सकेगा ।
(2) न्यायालय एक स्वतन्त्र व्यक्ति से या उतने स्वतन्त्र व्यक्तियों से, जितने समुचित सरकार ठीक समझे, गठित हो सकेगा और जहां कि कोई न्यायालय दो या अधिक सदस्यों से गठित हो वहां उनमें से एक अध्यक्ष नियुक्त किया जाएगा ।
(3) विहित गणपूर्ति होने पर ऐसा न्यायालय अध्यक्ष या अपने किसी सदस्य की अनुपस्थिति या अपनी सदस्य-संख्या में कोई रिक्ति होने पर भी कार्य कर सकेगाः
परन्तु यदि समुचित सरकार न्यायालय को यह अधिसूचित करे कि अध्यक्ष की सेवाएं उपलब्ध नहीं रह गई हैं तो न्यायालय तब तक कार्य नहीं करेगा जब तक नया अध्यक्ष नियुक्त नहीं कर दिया जाता ।
1[7. श्रम न्यायालय-(1) समुचित सरकार द्वितीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट किसी विषय सम्बन्धी औद्योगिक विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए और ऐसे अन्य कृत्यों के पालन के लिए जैसे इस अधिनियम के अधीन उन्हें सौंपे जाएं, एक या अधिक श्रम न्यायालयों का गठन, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, कर सकेगी ।
(2) श्रम न्यायायल केवल एक व्यक्ति से गठित होगा, जिसकी नियुक्ति समुचित सरकार द्वारा की जाएगी ।
(3) कोई भी व्यक्ति श्रम न्यायालय के पीठासीन अधिकारी के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए तब तक अर्हित नहीं होगा जब तक कि वह-
2[(क) उच्च न्यायालय का न्यायाधीश न हो, या न रह चुका हो, अथवा
(ख) कम से कम तीन वर्ष की कालावधि तक जिला न्यायाधीश या अपर जिला न्यायाधीश न रह चुका हो, अथवा
3। । । ।
4[(घ)] भारत में कोई न्यायिक पद कम से कम सात वर्ष तक धारण न कर चुका हो, अथवा
4[(ङ)] किसी प्रान्तीय अधिनियम या राज्य अधिनियम के अधीन गठित श्रम न्यायालय का कम से कम पांच वर्ष तक पीठासीन अधिकारी न रह चुका हो;
5[(च) ऐसा उप मुख्य श्रम आयुक्त (केन्द्रीय) या राज्य श्रम विभाग का संयुक्त आयुक्त न हो या न रह चुका हो, जिसके पास विधि में डिग्री और श्रम विभाग में कम-से-कम सात वर्ष का अनुभव हो, जिसके अंतर्गत सुलह अधिकारी के रूप में तीन वर्ष का अनुभव भी हैः
परन्तु ऐसा कोई उप मुख्य श्रम आयुक्त या संयुक्त श्रम आयुक्त तब तक नियुक्त नहीं किया जाएगा, जब तक कि वह, पीठासीन अधिकारी के रूप में नियुक्त किए जाने से पूर्व, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार की सेवा से त्यागपत्र नहीं दे देता है; या
(छ) भारतीय विधिक सेवा का श्रेणी 3 में अधिकारी न हो या न रह चुका हो और उसके पास उस श्रेणी में तीन वर्ष का अनुभव न हो ।]
7क. अधिकरण-(1) समुचित सरकार चाहे द्वितीय अनुसूची में चाहे तृतीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट किसी भी विषय सम्बन्धी औद्योगिक विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए 6[और ऐसे अन्य कृत्यों का पालन करने के लिए जो इस अधिनियम के अधीन उन्हें सौंपे जाएं] एक या अधिक औद्योगिक अधिकरण, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, गठित कर सकेगी ।
(2) अधिकरण केवल एक व्यक्ति से गठित होगा, जिसकी नियुक्ति समुचित सरकार द्वारा की जाएगी ।
(3) कोई भी व्यक्ति अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए तब तक अर्हित नहीं होगा जब तक कि वह-
(क) उच्च न्यायालय का न्यायाधीश न हो, या न रह चुका हो, अथवा
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 4 द्वारा (10-3-1957 से) धारा 7 के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 3 द्वारा (19-12-1964 से) अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 3 द्वारा (21-8-1984 से) खण्ड (ग) का लोप किया गया ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 3 द्वारा (19-12-1964 से) खण्ड (क) और खण्ड (ख) को क्रमशः खण्ड (घ) और खण्ड (ङ) के रूप में पुनःअक्षरांकित किया गया ।
- 2010 के अधिनियम सं० 24 की धारा 4 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 4 द्वारा (21-8-1984 से) अंतःस्थापित ।
1 [(कक) कम से कम तीन वर्ष की कालावधि तक जिला न्यायाधीश या अपर जिला न्यायाधीश न रह चुका हो; 2॥।
3[(ख) ऐसा उप मुख्य श्रम आयुक्त (केन्द्रीय) या राज्य श्रम विभाग का संयुक्त आयुक्त न हो या न रह चुका हो, जिसके पास विधि में डिग्री और श्रम विभाग में कम-से-कम सात वर्ष का अनुभव हो, जिसके अन्तर्गत सुलह अधिकारी के रूप में तीन वर्ष का अनुभव भी हैः
परन्तु ऐसा कोई उप मुख्य श्रम आयुक्त या संयुक्त श्रम आयुक्त तब तक नियुक्त नहीं किया जाएगा, जब तक कि वह, पीठसीन अधिकारी के रूप में नियुक्त किए जाने से पूर्व, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार की सेवा से त्यागपत्र नहीं दे देता है; या
(ग) भारतीय विधिक सेवा का श्रेणी 3 में अधिकारी न हो या न रह चुका हो और उसके पास उस श्रेणी में तीन वर्ष का अनुभव न हो ।]
(4) समुचित सरकार, यदि वह ऐसा करना ठीक समझे, अधिकरण को उसके समक्ष की कार्यवाही में सलाह देने के लिए, दो व्यक्तियों को असेसरों के रूप में नियुक्त कर सकेगी ।
7ख. राष्ट्रीय अधिकरण-(1) केन्द्रीय सरकार ऐसे औद्योगिक विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए, जिनमें केन्द्रीय सरकार की राय में राष्ट्रीय महत्व के प्रश्न अन्तर्ग्रस्त हैं या जो इस प्रकृति के हैं कि एक से अधिक राज्यों में स्थित औद्योगिक स्थापनों का ऐसे विवादों में हितबद्ध होना, या उनसे प्रभावित होना सम्भाव्य है, एक या अधिक राष्ट्रीय औद्योगिक अधिकरण, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, गठित कर सकेगी ।
(2) राष्ट्रीय अधिकरण केवल एक व्यक्ति से गठित होगा, जिसकी नियुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा की जाएगी ।
(3) कोई भी व्यक्ति राष्ट्रीय अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए तब तक अर्हित नहीं होगा 4[जब तक कि वह किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश न हो या न रह चुका हो ।]
(4) केन्द्रीय सरकार, यदि वह ऐसा करना ठीक समझे, राष्ट्रीय अधिकरण को उसके समक्ष की कार्यवाही में सलाह देने के लिए, दो व्यक्तियों को असेसरों के रूप में नियुक्त कर सकेगी ।
7ग. श्रम न्यायालयों, अधिकरणों और राष्ट्रीय अधिकरणों के पीठासीन अधिकारियों के लिए निरर्हताएं-कोई भी व्यक्ति श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण में पीठासीन अधिकारी के पद पर नियुक्त नहीं किया जाएगा, और न बना रहेगा, यदि-
(क) वह स्वतन्त्र व्यक्ति नहीं है, अथवा
(ख) उसने पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर ली है ।]
7घ. पीठासीन अधिकारी की अर्हता सेवा के अन्य निबंधन तथा शर्तें-इस अधिनियम में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी केन्द्रीय सरकार द्वारा धारा 7क की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त औद्योगिक अधिकरण के पीठासीन अधिकारी की अर्हता, नियुक्ति, पदावधि, वेतन और भत्ते, त्यागपत्र तथा पद से हटाना और सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें, वित्त अधिनियम, 2017 के अध्याय 6 के भाग 14 के प्रारंभ के पश्चात् उस अधिनियम की धारा 184 के उपबंधों द्वारा शासित होंगी:
परंतु वित्त अधिनियम, 2017 के अध्याय 6 के भाग 14 के प्रारंभ से पूर्व नियुक्त पीठासीन अधिकारी का इस अधिनियम और तद्धीन बनाए गए नियमों द्वारा शासित होना इस प्रकार जारी रहेगा मानों वित्त अधिनियम, 2017 की धारा 184 के उपबंध प्रवृत्त ही नहीं हुए थे ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 4 द्वारा (19-12-1964 से) अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 4 द्वारा (21-8-1984 से) या शब्द का और खण्ड (ख) का लोप किया गया ।
- 2010 के अधिनियम सं० 24 की धारा 5 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 5 द्वारा (21-8-1984 से) कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
1[8. रिक्तियों का भरा जाना-यदि श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के पद में या बोर्ड या न्यायालय के अध्यक्ष के या किसी अन्य सदस्य के पद में (अस्थायी अनुपस्थिति से भिन्न) कोई रिक्ति किसी भी कारण से हो जाती है तो राष्ट्रीय अधिकरण की दशा में केन्द्रीय सरकार, और किसी अन्य दशा में समुचित सरकार, किसी अन्य व्यक्ति को उस रिक्ति को भरने के लिए इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार नियुक्त करेगी, और कार्यवाही उस प्रक्रम से, जब रिक्ति भरी जाती है, यथास्थिति, श्रम न्यायालय, अधिकरण, राष्ट्रीय अधिकरण, बोर्ड या न्यायालय के समक्ष चालू रखी जा सकेगी ।
9. बोर्डों आदि को गठित करने वाले आदेशों की अंतिमता-(1) समुचित सरकार का या केन्द्रीय सरकार का कोई भी आदेश, जिससे किसी व्यक्ति की नियुक्ति, बोर्ड या न्यायालय के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य के रूप में या श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के रूप में की गई है, किसी भी रीति से प्रश्नगत नहीं किया जाएगा; और किसी बोर्ड या न्यायालय के समक्ष का कोई भी कार्य या कार्यवाही ऐसे बोर्ड या न्यायालय में किसी रिक्ति के या उसके गठन में किसी त्रुटि के अस्तित्व के आधार पर ही किसी भी रीति से प्रश्नगत नहीं की जाएगी ।
(2) सुलह कार्यवाही के अनुक्रम में किया गया कोई भी समझौता केवल इस तथ्य के कारण ही अविधिमान्य नहीं होगा कि ऐसा समझौता, यथास्थिति, धारा 12 की उपधारा (6) में या धारा 13 की उपधारा (5) में निर्दिष्ट कालावधि के अवसान के पश्चात् किया गया था ।
(3) जहां कि बोर्ड के समक्ष की सुलह कार्यवाही के अनुक्रम में किए गए किसी समझौते की रिपोर्ट पर बोर्ड के अध्यक्ष और अन्य सभी सदस्य हस्ताक्षर कर देते हैं वहां ऐसा समझौता केवल इसी कारण अविधिमान्य नहीं होगा कि कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम के दौरान बोर्ड के सदस्यों में से (जिनके अन्तर्गत अध्यक्ष आता है) कोई आकस्मिक अथवा अपूर्वकल्पित रूप में अनुपस्थित था ।]
2[अध्याय 2क
तब्दीली की सूचना
9क. तब्दीली की सूचना-कोई भी नियोजक, जो किसी कर्मकार को लागू सेवा की शर्तों में किसी ऐसे विषय की बाबत, जो चतुर्थ अनुसूची में विनिर्दिष्ट है, कोई तब्दीली करने की प्रस्थापना करता है-
(क) ऐसे कर्मकार को, जिस पर ऐसी तब्दीली का प्रभाव पड़ना सम्भाव्य हो, प्रस्थापित तब्दीली की प्रकृति की विहित रीति से सूचना दिए बिना, अथवा
(ख) ऐसी सूचना देने के इक्कीस दिन के भीतर, ऐसी तब्दीली नहीं करेगाः
परन्तु ऐसी कोई तब्दीली करने के लिए उस दशा में किसी भी सूचना की अपेक्षा नहीं होगी जिसमें कि-
(क) तब्दीली 3[किसी समझौते या अधिनिर्णयट के अनुसरण में की गई है, अथवा
(ख) वे कर्मकार, जिन पर उस तब्दीली का प्रभाव पड़ना संभाव्य हो, ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें फंडामेंटल एण्ड सप्लीमेंटरी रूल्स अर्थात् मौलिक और अनुपूरक नियम, सिविल सर्विसेज (क्लासिफिकेशन, कन्ट्रोल एण्ड अपील) रूल्स अर्थात् सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, सिविल सर्विसेज (टेम्पोरेरी सर्विस) रूल्स अर्थात् सिविल सेवा (अस्थायी सेवा) नियम, रिवाइज्ड लीव रूल्स अर्थात् पुनरीक्षित छुट्टी नियम, सिविल सर्विस रेग्युलेशन्स अर्थात् सिविल सेवा विनियम, सिविलिन्स इन डिफेंस सर्विसेज (क्लासिफिकेशन, कन्ट्रोल एण्ड अपील) रूल्स अर्थात् रक्षा सेवाओं के सिविलियन (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, या भारतीय रेल स्थापन संहिता या कोई अन्य नियम या विनियम, जो समुचित सरकार द्वारा शासकीय राजपत्र में इस निमित्त अधिसूचित किए जाएं, लागू होते हैं ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 5 द्वारा (10-3-1957 से) धारा 8 और धारा 9 के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 6 द्वारा (10-3-1957 से) अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 6 द्वारा (21-8-1984 से) कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
9ख. छूट देने की सरकार की शक्ति-जहां कि समुचित सरकार की यह राय हो कि औद्योगिक स्थापनों के किसी वर्ग को या किसी औद्योगिक स्थापन में नियोजित कर्मकारों के किसी वर्ग को धारा 9क के उपबन्धों का लागू होना उससे सम्बद्ध नियोजकों पर ऐसा प्रतिकूल प्रभाव डालता है कि इस प्रकार लागू किए जाने से सम्पृक्त उद्योग पर गम्भीर प्रतिक्रिया होगी और यह कि लोकहित ऐसा अपेक्षित करता है, वहां समुचित सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगी कि उक्त धारा के उपबन्ध औद्योगिक स्थापनों के उस वर्ग को या किसी औद्योगिक स्थापन में नियोजित कर्मकारों के उस वर्ग को लागू नहीं होंगे या ऐसी शर्तों के अध्यधीन रहते हुए लागू होंगे जिन्हें अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए ।]
1[अध्याय 2ख
शिकायत प्रतितोषण तंत्र
9ग. शिकायत प्रतितोषण तंत्र की स्थापना-(1) ऐसे प्रत्येक औद्योगिक स्थापन में, जिसमें बीस या अधिक कर्मकार नियोजित हैं, व्यष्टिक शिकायतों से उद्भूत होने वाले विवादों के हल के लिए एक या अधिक शिकायत प्रतितोषण समिति होगी ।
(2) शिकायत प्रतितोषण समिति नियोजक और कर्मकारों से बराबर संख्या में सदस्यों से मिलकर बनेगी ।
(3) शिकायत प्रतितोषण समिति के अध्यक्ष का चयन नियोजक से और कर्मकारों में से आनुकल्पिक रूप में प्रत्येक वर्ष चक्रानुक्रम में किया जाएगा ।
(4) शिकायत प्रतितोषण समिति के सदस्यों की कुल संख्या छह से अधिक नहीं होगीः
परन्तु यदि शिकायत प्रतितोषण समिति में दो सदस्य हैं तो यथासाध्य एक महिला सदस्य होगी और यदि सदस्यों की संख्या दो से अधिक है तो महिला सदस्यों की संख्या में आनुपातिक रूप से वृद्धि की जा सकेगी ।
(5) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी, शिकायत प्रतितोषण समिति के गठन से उसी विषय के संबंध में इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन औद्योगिक विवाद उठाने के कर्मकार के अधिकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
(6) शिकायत प्रतितोषण समिति, व्यथित पक्षकार द्वारा या उसकी ओर से लिखित आवेदन की प्राप्ति पर तीस दिन के भीतर अपनी कार्यवाहियों को पूरा कर सकेगी ।
(7) ऐसा कर्मकार, जो शिकायत प्रतितोषण समिति के विनिश्चय से व्यथित है, शिकायत प्रतितोषण समिति के विनिश्चय के विरुद्ध नियोजक को अपील कर सकेगा और नियोजक, ऐसी अपील की प्राप्ति की तारीख से एक मास के भीतर, उसका निपटारा करेगा और अपने विनिश्चय की एक प्रति संबंधित कर्मकार को भेजेगा ।
(8) इस धारा की कोई बात ऐसे कर्मकार को लागू नहीं होगी, जिसके लिए संबंधित स्थापन में स्थापित एक शिकायत प्रतितोषण तंत्र है ।]
अध्याय 3
विवादों का बोर्डों, न्यायालयों या अधिकरणों को निर्देश
10. विवादों का बोर्डों, न्यायालयों या अधिकरणों को निर्देश-(1) 2[जहां कि समुचित सरकार की यह राय हो कि कोई औद्योगिक विवाद विद्यमान है या उसके होने की आशंका है वहां वह] लिखित आदेश द्वारा 1[किसी भी समय]-
(क) उस विवाद का समझौता कराने के लिए उसे बोर्ड को निर्देशित कर सकेगी, अथवा
(ख) विवाद से संसक्त या सुसंगत प्रतीत होने वाले किसी मामले को जांच के लिए न्यायालय को निर्देशित कर सकेगी, अथवा
- 2010 के अधिनियम सं० 24 की धारा 6 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1952 के अधिनियम सं० 18 की धारा 3 द्वारा यदि कोई औद्योगिक विवाद विद्यमान है या होने की आशंका है, तो समुचित सरकार के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
1[(ग) विवाद को, या विवाद से संसक्त या सुसंगत प्रतीत होने वाले किसी मामले को, यदि वह किसी ऐसे विषय के सम्बन्ध में हो जो द्वितीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट है, न्यायनिर्णयन के लिए किसी श्रम न्यायालय को निर्देशित कर सकेगी, अथवा
(घ) विवाद को, या विवाद से संसक्त या सुसंगत प्रतीत होने वाले किसी मामले को, चाहे वह द्वितीय अनुसूची में चाहे तृतीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट किसी विषय के सम्बन्ध में हो, न्यायनिर्णयन के लिए किसी अधिकरण को निर्देशित कर सकेगीः
परन्तु जहां कि विवाद तृतीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट किसी विषय के संबंध में हो और उससे एक सौ से अधिक कर्मकारों पर प्रभार पड़ना सम्भाव्य न हो वहां यदि समुचित सरकार ठीक समझे तो वह खण्ड (ग) के अधीन श्रम न्यायालय को निर्देश कर सकेगीः]
2[परन्तु यह और कि] जहां कि विवाद किसी लोक उपयोगी सेवा के सम्बन्ध में हो और धारा 22 के अधीन सूचना दे दी गई हो, वहां जब तक कि समुचित सरकार का यह विचार न हो कि सूचना तुच्छतया या तंग करने के लिए दी गई है, या ऐसा करना समीचीन न होगा, वह, इस बात के होते हुए भी कि विवाद की बाबत इस अधिनियम के अधीन कोई अन्य कार्यवाहियां प्रारम्भ हो चुकी हों, इस उपधारा के अधीन निदेश करेगीः
3[परन्तु यह और कि जहां विवाद ऐसा है जिसके संबंध में केन्द्रीय सरकार समुचित सरकार है, वहां वह सरकार, विवाद को राज्य सरकार द्वारा गठित, यथास्थिति, श्रम न्यायालय या औद्योगिक अधिकरण को, निर्देशित करने के लिए सक्षम होगी ।]
4[(1क) जहां कि केन्द्रीय सरकार की यह राय हो कि कोई औद्योगिक विवाद विद्यमान है या उसके होने की आशंका है और विवाद में राष्ट्रीय महत्व का कोई प्रश्न अन्तर्ग्रस्त है, या विवाद इस प्रकृति का है कि एक से अधिक राज्यों में स्थित औद्योगिक स्थापन का ऐसे विवाद में हितबद्ध होना या उससे प्रभावित होना सम्भाव्य है, और यह कि विवाद राष्ट्रीय अधिकरण द्वारा न्यायनिर्णीत होना चाहिए, वहां केन्द्रीय सरकार, चाहे वह उस विवाद के सम्बन्ध में समुचित सरकार हो या न हो, विवाद को या विवाद से संसक्त या सुसंगत प्रतीत होने वाले मामले को चाहे वह द्वितीय अनुसूची में चाहे तृतीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट किसी विषय के सम्बन्ध में हो, न्यायनिर्णयन के लिए, लिखित आदेश द्वारा, किसी भी समय राष्ट्रीय अधिकरण को निर्देशित कर सकेगी ।]
(2) जहां कि औद्योगिक विवाद के पक्षकार विवाद का निर्देश बोर्ड, न्यायालय, 5[श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण] को किए जाने के लिए विहित रीति से, चाहे संयुक्ततः चाहे पृथक्त;, आवेदन करते हैं, वहां यदि समुचित सरकार का समाधान हो जाता है कि आवेदन करने वाले व्यक्ति हर एक पक्षकार की बहुसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं तो वह तद्नुसार निर्देश करेगी ।
4[(2क) इस धारा के अधीन श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण को किसी औद्योगिक विवाद को निर्देशित करने वाले आदेश में वह कालावधि विनिर्दिष्ट की जाएगी जिसके भीतर, ऐसा श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण उस विवाद के सम्बन्ध में अपना अधिनिर्णय समुचित सरकार को, प्रस्तुत करेगाः
परन्तु जहां ऐसा औद्योगिक विवाद किसी व्यष्टिक कर्मकार से संबंधित है, वहां ऐसी कालावधि तीन मास से अधिक नहीं होगीः
परन्तु यह और कि जहां किसी औद्योगिक विवाद के पक्षकार विहित रीति से, चाहे संयुक्ततः या पृथक्तः ऐसी कालावधि के विस्तार के लिए या किसी अन्य कारण से, श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण को आवेदन करते हैं, और यदि ऐसे श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण का पीठासीन अधिकारी ऐसी कालावधि का विस्तार करना आवश्यक या समीचीन समझता है, तो वह ऐसे कारणों सहित, जो अभिलिखित किए जाएं, ऐसी कालावधि का विस्तार ऐसी अतिरिक्त कालावधि के लिए कर सकेगा, जो वह ठीक समझेः
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 7 द्वारा (10-3-1957 से) खण्ड (ग) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 7 द्वारा (10-3-1957 से) परन्तु के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 8 द्वारा (21-8-1984 से) अंतःस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 7 द्वारा (10-3-1957 से) अंतःस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 7 द्वारा (10-3-1957 से) अथवा अधिकरण के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
परन्तु यह और भी कि इस उपधारा में विनिर्दिष्ट किसी कालावधि की, यदि कोई हो, संगणना करने में वह कालावधि जिसके लिए श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण के समक्ष कार्यवाहियों को किसी सिविल न्यायालय के किसी व्यादेश या आदेश द्वारा रोक दिया गया था, अपवर्जित की जाएगीः
परन्तु यह और भी कि श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण के समक्ष की कार्यवाहियां केवल इस आधार पर व्यपगत नहीं हो जाएंगी कि इस उपधारा के अधीन विनिर्दिष्ट कालावधि ऐसी कार्यवाहियों के पूरा होने के पूर्व, समाप्त हो गई थी ।]
(3) जहां कि कोई औद्योगिक विवाद बोर्ड 1[श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण] को इस धारा के अधीन निर्देशित किया गया है वहां समुचित सरकार ऐसे विवाद के संसंग में की गई किसी ऐसी हड़ताल या तालाबन्दी को, जो निर्देश की तारीख को विद्यमान हों, चालू रखना आदेश द्वारा प्रतिषिद्ध कर सकेगी ।
2[(4) जहां कि किसी औद्योगिक विवाद को 3[श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण] को इस धारा के अधीन निर्देशित करने वाले किसी आदेश में या किसी पश्चात्वर्ती आदेश में समुचित सरकार ने न्यायनिर्णयन के लिए विवाद के प्रश्न विनिर्दिष्ट कर दिए हैं वहां, यथास्थिति, 3[श्रम न्यायालय या अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण] अपने न्यायनिर्णय को उन प्रश्नों और उनसे आनुषंगिक विषयों तक ही सिमित रखेगा ।
(5) जहां कि किसी स्थापन या किन्हीं स्थापनों से सम्पृक्त कोई विवाद 3[श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण] को इस धारा के अधीन निर्देशित किया गया है या किए जाने को है और समुचित सरकार की राय, या तो उसे इस निमित्त किए गए आवेदन पर या अन्यथा, यह हो कि विवाद इस प्रकृति का है कि उसी प्रकार के किसी अन्य स्थापन स्थापनों के समूह या वर्ग का ऐसे विवाद में हितबद्ध होना या उससे प्रभावित होना सम्भाव्य है, वहां समुचित सरकार निर्देश करते समय या उसके पश्चात् किसी भी समय, किन्तु अधिनिर्णय निवेदित किए जाने से पूर्व, उस निर्देश में ऐसे स्थापन, स्थापनों के समूह या वर्ग को सम्मिलित कर सकेगी, चाहे ऐसे सम्मिलित किए जाने के समय उस स्थापन, स्थापनों के समूह या वर्ग में कोई विवाद विद्यमान हो या न हो या उसके होने की आशंका हो या न हो ।]
4[(6) जहां कि कोई निर्देश उपधारा (1क) के अधीन राष्ट्रीय अधिकरण को किया गया है वहां, इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, किसी भी श्रम न्यायालय या अधिकरण को किसी ऐसे मामले पर, जो राष्ट्रीय अधिकरण के समक्ष न्यायनिर्णयन के अधीन हो, न्यायनिर्णयन की अधिकारिता नहीं होगी, और तद्नुसार,-
(क) यदि राष्ट्रीय अधिकरण के समक्ष न्यायनिर्णयन के अधीन का कोई मामला श्रम न्यायालय या अधिकरण के समक्ष की किसी कार्यवाही में लम्बित है तो, यथास्थिति, श्रम न्यायालय या अधिकरण के समक्ष की कार्यवाही, जहां तक कि वह ऐसे मामले से संबद्ध है, राष्ट्रीय अधिकरण को ऐसे निर्देश पर अभिखण्डित हो गई समझी जाएगी; तथा
(ख) समुचित सरकार के लिए यह विधिपूर्ण नहीं होगा कि वह राष्ट्रीय अधिकरण के समक्ष न्यायनिर्णयन के अधीन का कोई मामला, ऐसे मामले के सम्बन्ध में कार्यवाही के राष्ट्रीय अधिकरण के समक्ष लम्बित रहने के दौरान, न्यायनिर्णयन के लिए किसी श्रम न्यायालय या अधिकरण को निर्देशित करे ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 7 द्वारा (10-3-1957 से) अथवा अधिकरण के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1952 के अधिनियम सं० 18 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 7 द्वारा (10-3-1957 से) अधिकरण के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 7 द्वारा (10-3-1957 से) अंतःस्थापित ।
1[स्पष्टीकरण-इस उपधारा में श्रम न्यायालय" या अधिकरण" के अन्तर्गत कोई ऐसा न्यायालय या अधिकरण या अन्य प्राधिकारी आता है जो औद्योगिक विवादों के अन्वेषण और परिनिर्धारण के सम्बन्ध में किसी भी राज्य में प्रवृत्त किसी विधि के अधीन गठित हो ।]
(7) जहां कि कोई औद्योगिक विवाद, जिसके संबंध में केन्द्रीय सरकार समुचित सरकार नहीं है, राष्ट्रीय अधिकरण को निर्देशित किया जाता है वहां, इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे विवाद के सम्बन्ध में धारा 15, धारा 17, धारा
19, धारा 33क, धारा 33ख और धारा 36क में समुचित सरकार के प्रति किसी निर्देश का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वह केन्द्रीय सरकार के प्रति निर्देश है किंतु यथापूर्वोक्त के और इस अधिनियम में जैसा अन्यथा अभिव्यक्ततः उपबन्धित है उसके सिवाय, उस विवाद के सम्बन्ध में समुचित सरकार के प्रति इस अधिनियम के किसी अन्य उपबन्ध में किसी निर्देश से राज्य सरकार के प्रति निर्देश अभिप्रेत होगा ।]
2[(8) किसी औद्योगिक विवाद के संबंध में श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण के समक्ष लंबित कार्यवाहियां केवल इस आधार पर व्यपगत नहीं हो जाएंगी कि विवाद के पक्षकारों में से किसी एक पक्षकार की, जो कर्मकार है, मृत्यु हो गई है और ऐसा श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण ऐसी कार्यवाहियों को पूरा करेगा और अपना अधिनिर्णय समुचित सरकार को प्रस्तुत करेगा ।]
3[10क. विवादों का माध्यस्थम् के लिए स्वेच्छया निर्देश-(1) जहां कि कोई विवाद विद्यमान हो या होने की आशंका हो और नियोजक और कर्मकार विवाद, माध्यस्थम् के लिए निर्देशित किए जाने के लिए सहमत हों, वहां वे विवाद के धारा 10 के अधीन श्रम न्यायालय या अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण को निर्देशित किए जाने से पूर्व किसी भी समय विवाद को लिखित करार द्वारा, माध्यस्थम् के लिए निर्देशित कर सकेंगे और निर्देश ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को (जिनके अन्तर्गत श्रम न्यायालय या अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण का पीठासीन अधिकारी आता है) जिन्हें माध्यस्थम् करार में विनिर्दिष्ट किया जाए, मध्यस्थ या मध्यस्थों के रूप में होगा ।
4[(1क) जहां कि माध्यस्थम् करार यह उपबन्ध करता है कि विवाद समसंख्यक मध्यस्थों को निर्देशित किया जाए, वहां करार किसी अन्य व्यक्ति को अधिनिर्णायक के रूप में नियुक्त करने का उपबन्ध करेगा, जो निर्देश पर उस समय कार्यारंभ करेगा, जब मध्यस्थ राय में बराबर बंटे हों और अधिनिर्णायक का पंचाट अभिभावी होगा और वह इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए माध्यस्थम् पंचाट समझा जाएगा ।]
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट माध्यस्थम् करार ऐसे प्ररूप में होगा और उस पर उसके पक्षकार ऐसी रीति से हस्ताक्षर करेंगे जैसी विहित की जाए ।
(3) माध्यस्थम् करार की एक प्रति समुचित सरकार और सुलह अधिकारी को भेजी जाएगी और समुचित सरकार, ऐसी प्रति की प्राप्ति की तारीख से 5[एक मास] के भीतर, उसे शासकीय राजपत्र में प्रकाशित करेगी ।
2[(3क) जहां कि कोई औद्योगिक विवाद माध्यस्थम् के लिए निर्देशित किया गया हो और समुचित सरकार का यह समाधान हो गया हो कि निर्देश करने वाले व्यक्ति हर एक पक्षकार की बहुसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहां समुचित सरकार, उपधारा (3) में निर्दिष्ट समय के भीतर, ऐसी रीति से अधिसूचना निकाल सकेगी, जैसी विहित की जाए, और जब ऐसी कोई अधिसूचना निकाली गई हो, तब उन नियोजकों और कर्मकारों को, जो माध्यस्थम् करार के पक्षकार नहीं हैं किंतु विवाद से सम्पृक्त हैं, मध्यस्थ या मध्यस्थों के समक्ष अपना मामला उपस्थित करने का अवसर दिया जाएगा ।]
(4) मध्यस्थ विवाद का अन्वेषण करेगा, या करेंगे और, यथास्थिति, मध्यस्थ द्वारा या सभी मध्यस्थों द्वारा हस्ताक्षरित माध्यस्थम् पंचाट, समुचित सरकार को निवेदित करेगा या करेंगे ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 5 द्वारा (19-12-1964 से) अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 8 द्वारा (21-8-1984 से) अंतःस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 8 द्वारा (10-3-1957 से) अंतःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 6 द्वारा (19-12-1964 से) अंतःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 6 द्वारा (19-12-1964 से) चौदह दिन” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
2[(4क) जहां कि कोई औद्योगिक विवाद माध्यस्थम् के लिए निर्देशित किया गया है और उपधारा (3क) के अधीन अधिसूचना निकाली गई है, वहां समुचित सरकार ऐसे विवाद के संसंग में की गई किसी ऐसी हड़ताल या तालाबन्दी को, जो निर्देश की तारीख को विद्यमान हों, चालू रखना आदेश द्वारा प्रतिषिद्ध कर सकेगी ।]
(5) माध्यस्थम् अधिनियम, 1940 (1940 का 10) की कोई भी बात इस धारा के अधीन के माध्यस्थमों को लागू नहीं होगी ।
अध्याय 4
प्राधिकारियों की प्रक्रिया, शक्तियां और कर्तव्य
11. सुलह अधिकारियों, बोर्डों, न्यायालयों और अधिकरणों की प्रक्रिया और शक्तियां- 1[(1) उन नियमों के अध्यधीन रहते हुए जो इस निमित्त बनाए जाएं, मध्यस्थ, बोर्ड, न्यायालय, श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगा, जैसी मध्यस्थ या अन्य प्राधिकारी, जो सम्पृक्त हो, ठीक समझे ।]
(2) सुलह अधिकारी, या बोर्ड का सदस्य, 2[या न्यायालय या श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण का पीठासीन अधिकारी], किसी विद्यमान या आशंकित औद्योगिक विवाद की जांच के प्रयोजन के लिए, युक्तियुक्त सूचना देने के पश्चात्, किसी ऐसे परिसर में प्रवेश कर सकेगा जो किसी ऐसे स्थापन के अधिभोग में हो जिससे वह विवाद संबद्ध हो ।
(3) हर बोर्ड, न्यायालय, 3[श्रम न्यायालय, अधिकरण और राष्ट्रीय अधिकरण] को निम्नलिखित विषयों की बाबत, अर्थात्ः-
(क) किसी व्यक्ति को हाजिर कराने और शपथ पर उसकी परीक्षा करने के लिए,
(ख) दस्तावेज और भौतिक पदार्थ पेश करने को विवश करने के लिए,
(ग) साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालने के लिए,
(घ) ऐसे अन्य विषयों की बाबत, जैसे विहित किए जाएं,
वही शक्तियां होंगी जो वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन निहित होती हैं और बोर्ड, न्यायालय, 4[श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण] द्वारा की जाने वाली हर जांच या अन्वेषण को भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धाराओं 193 और 228 के अर्थ के अन्दर न्यायिक कार्यवाही समझा जाएगा ।
(4) सुलह अधिकारी 5[किसी व्यक्ति की परीक्षा करने के प्रयोजन के लिए ऐसे व्यक्ति की हाजिरी प्रवर्तित करा सकेगा या किसी ऐसी दस्तावेज को मंगा सकेगा] और उसका निरीक्षण कर सकेगा, जिसके बारे में उसके पास यह समझने का आधार हो कि वह औद्योगिक विवाद से सुसंगत है 6[या किसी अधिनिर्णय के कार्यान्वयन को सत्यापित करने या इस अधिनियम के अधीन उस पर अधिरोपित किसी अन्य कर्तव्य का पालन करने के लिए आवश्यक है और पूर्वोक्त प्रयोजनों के लिए 2[किसी व्यक्ति की हाजिरी प्रवर्तित कराने और उसकी परीक्षा करने या दस्तावेजों को पेश करने के लिए विवश करने की बाबत] सुलह अधिकारी को वे ही शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन सिविल न्यायालय में निहित होती हैं ।]
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 9 द्वारा (10-3-1957 से) उपधारा (1) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 9 द्वारा (10-3-1957 से) न्यायालय या अधिकरण के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 9 द्वारा (10-3-1957 से) और अधिकरण के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 9 द्वारा (10-3-1957 से) या अधिकरण के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 9 द्वारा (21-8-1984 से) कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 9 द्वारा (7-9-1956 से) अंतःस्थापित ।
1[(5) यदि न्यायालय, श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण ऐसा करना ठीक समझे तो वह विचाराधीन विषय का विशिष्ट ज्ञान रखने वाले एक या अधिक व्यक्तियों को अपने समक्ष की कार्यवाहियों में सलाह देने के लिए असेसर या असेसरों के रूप में नियुक्त कर सकेगा ।
(6) सभी सुलह अधिकारी, बोर्ड या न्यायालय के सदस्य और श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण के पीठासीन अधिकारी भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ के अन्दर लोक सेवक समझे जाएंगे ।
(7) श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण के समक्ष की किसी कार्यवाही के और उससे आनुषंगिक खर्चों को दिलाना इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों के अध्यधीन रहते हुए उस श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण के विवेकाधिकार में होगा और, यथास्थिति, उस श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण को यह अवधारित करने की, कि ऐसे खर्च जिसके द्वारा और जिसको और कितने तक तथा किन शर्तों के, यदि कोई हों, अध्यधीन रहते हुए दिए जाने हैं, और पूर्वोक्त प्रयोजनों के लिए सभी आवश्यक निदेश देने की पूरी शक्ति होगी और ऐसे खर्च, हकदार व्यक्ति द्वारा समुचित सरकार को आवेदन किए जाने पर, उस सरकार द्वारा उस रीति से वसूल किए जा सकेंगे जैसे भू-राजस्व की बकाया वसूल की जाती है ।]
2[(8) हर 3[श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण] 4[दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345, 346 और 348] के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।]
5[(9) श्रम न्यायालय या अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण द्वारा दिए गए प्रत्येक पंचाट, जारी किए गए आदेश या उसके समक्ष किए गए समझौते का निष्पादन सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के आदेश 21 के अधीन सिविल न्यायालय के आदेशों और डिक्री के निष्पादन के लिए अधिकथित प्रक्रिया के अनुसार किया जाएगा ।
(10) यथास्थिति, श्रम न्यायालय या अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण किसी पंचाट, आदेश या समझौते को, अधिकारिता रखने वाले किसी सिविल न्यायालय को पारेषित करेगा और ऐसा सिविल न्यायालय उस पंचाट, आदेश या समझौते का निष्पादन ऐसे करेगा मानो वह उसके द्वारा पारित की गई कोई डिक्री हो ।]
6[11क. कर्मकारों को सेवोन्मुक्त या पदच्युत करने की दशा में समुचित अनुतोष देने की श्रम न्यायालयों, अधिकरणों और राष्ट्रीय अधिकरणों की शक्ति-जहां किसी कर्मकार की सेवोन्मुक्ति या पदच्युति के संबंध में कोई औद्योगिक विवाद किसी श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण को न्यायनिर्णयन के लिए निर्देशित किया गया हो तथा, न्यायनिर्णयन की कार्यवाहियों के अनुक्रम में, यथास्थिति, श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण का समाधान हो जाए कि सेवोन्मुक्ति या पदच्युति का आदेश न्यायोचित नहीं है, वहां वह अपने अधिनिर्णय द्वारा सेवोन्मुक्ति या पदच्युति के आदेश को अपास्त कर सकेगा तथा कर्मकार के, ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर, यदि कोई हों, जिन्हें वह ठीक समझे, पुनःस्थापन का निदेश दे सकेगा या कर्मकार को ऐसा अन्य अनुतोष जिसके अन्तर्गत सेवोन्मुक्ति या पदच्युति के बदले न्यूनतर दण्ड का अधिनिर्णय भी है, दे सकेगा जैसा कि मामले की परिस्थितियों में अपेक्षित होः
परन्तु इस धारा के अधीन किसी कार्यवाही में, यथास्थिति, श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण केवल उसी सामग्री पर निर्भर करेगा जो अभिलेख पर हो और उस विषय के संबंध में कोई नया साक्ष्य नहीं लेगा ।]
12. सुलह अधिकारियों के कर्तव्य-(1) जहां कि कोई औद्योगिक विवाद विद्यमान है या उसके होने की आशंका है, वहां सुलह अधिकारी विहित रीति से सुलह कार्यवाहियां कर सकेगा या जहां कि विवाद किसी लोक उपयोगी सेवा के सम्बन्ध में हैं और धारा 22 के अधीन सूचना दे दी गई है, वहां वह ऐसी कार्यवाहियां विहित रीति से करेगा ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 9 द्वारा (10-3-1957 से) उपधारा (5) से उपधारा (7) के स्थान पर प्रतिस्थापित । उपधारा (7) 1950 के अधिनियम सं० 48 की धारा 34 तथा अनुसूची द्वारा अंतःस्थापित की गई थी ।
- 1950 के अधिनियम सं० 48 की धारा 34 तथा अनुसूची द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 9 द्वारा (10-3-1957 से) अधिकरण के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 10 द्वारा (21-8-1984 से) कतिपय शब्दों और अक्षरों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2010 के अधिनियम सं० 24 की धारा 7 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1971 के अधिनियम सं० 45 की धारा 3 द्वारा (15-12-1971 से) अंतःस्थापित ।
(2) सुलह अधिकारी विवाद का समझौता कराने के प्रयोजन के लिए विवाद का तथा उसके गुणावगुण और उसके ठीक समझौता होने पर प्रभाव डालने वाले सभी मामलों का अन्वेषण अविलम्ब करेगा और विवाद का ऋजु तथा सौहार्दपूर्ण समझौता करने के लिए पक्षकारों को उत्प्रेरित करने के प्रयोजनार्थ वे सभी बातें कर सकेगा जिन्हें वह ठीक समझे ।
(3) यदि विवाद का या विवादग्रस्त मामलों में से किसी का भी समझौता सुलह कार्यवाहियों के अनुक्रम में हो जाता है, तो सुलह अधिकारी समुचित सरकार का 1[या समुचित सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारीट को उसकी रिपोर्ट, विवाद के पक्षकारों द्वारा हस्ताक्षरित समझौता-ज्ञापन सहित भेजेगा ।
(4) यदि ऐसा कोई समझौता नहीं हो पाता है तो सुलह अधिकारी अन्वेषण समाप्त होने के पश्चात् यथासाध्य शीघ्रता से समुचित सरकार को पूरी रिपोर्ट भेजेगा, जिसमें विवाद से सम्बद्ध तथ्यों और परिस्थितियों का अभिनिश्चय करने और विवाद का समझौता कराने के लिए उसके द्वारा उठाए गए कदम, और साथ ही उन तथ्यों और परिस्थितियों का पूरा-पूरा विवरण और वे कारण भी, जिनसे उसकी राय में समझौता नहीं हो सका, उपवर्णित होंगे ।
(5) यदि उपधारा (4) में निर्दिष्ट रिपोर्ट पर विचार करने पर समुचित सरकार का समाधान हो जाए कि बोर्ड, 2[श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण] को निर्देश करने के लिए मामला बनता है तो वह ऐसा निर्देश कर सकेगी । जहां कि समुचित सरकार ऐसा निर्देश नहीं करती वहां वह उसके लिए अपने कारण अभिलिखित करेगी और सम्पृक्त पक्षकारों को संसूचित करेगी ।
(6) इस धारा के अधीन रिपोर्ट, सुलह कार्यवाहियां प्रारम्भ होने के चौदह दिन के भीतर, या ऐसी अल्पतर कालावधि के भीतर, जैसी समुचित सरकार द्वारा नियत की जाए, निवेदित की जाएगीः
3[परन्तु 4[सुलह अधिकारी के अनुमोदन के अध्यधीन रहते हुएट रिपोर्ट निवेदित करने का समय इतनी कालावधि के लिए बढ़ाया जा सकेगा जितनी के बारे में विवाद के सभी पक्षकारों में लिखित रूप में सहमति हो जाए ।]
13. बोर्ड के कर्तव्य-(1) जहां कि कोई विवाद इस अधिनियम के अधीन बोर्ड को निर्देशित किया गया है, वहां बोर्ड का यह कर्तव्य होगा कि वह उसका समझौता कराने का प्रयास करे और बोर्ड इस प्रयोजन के लिए विवाद का तथा उसके गुणागुण और उसका ठीक समझौता होने पर प्रभाव डालने वाले सभी मामलों का अन्वेषण अविलम्ब और ऐसी रीति से, जैसी वह उचित समझे, करेगा और विवाद का ऋजु तथा सौहार्दपूर्ण समझौता करने के लिए पक्षकारों को उत्प्रेरित करने के प्रयोजनार्थ वे सभी बातें कर सकेगा, जिन्हें वह ठीक समझे ।
(2) यदि विवाद का या विवादग्रस्त मामलों में से किसी का भी समझौता सुलह कार्यवाहियों के अनुक्रम में हो जाता है तो बोर्ड समुचित सरकार को उसकी रिपोर्ट, विवाद के पक्षकारों द्वारा हस्ताक्षरित समझौता-ज्ञापन सहित, भेजेगा ।
(3) यदि ऐसा कोई समझौता नहीं हो पाता है तो बोर्ड अन्वेषण समाप्त होने के पश्चात् यथासाध्य शीघ्रता से समुचित सरकार को पूरी रिपोर्ट भेजेगा, जिसमें विवाद से संबद्ध तथ्यों और परिस्थितियों का अभिनिश्चय करने और विवाद का समझौता कराने के लिए बोर्ड द्वारा की गई कार्यवाहियों और उठाए गए कदम, और साथ ही उन तथ्यों और परिस्थितियों का पूरा-पूरा विवरण, उन पर उसके निष्कर्ष और वे कारण जिनसे उसकी राय में समझौता नहीं हो सका तथा विवाद का अवधारण कराने के लिए उसकी सिफारिशें उपवर्णित होंगी ।
(4) यदि लोक उपयोगी सेवा से सम्बद्ध विवाद की बाबत उपधारा (3) के अधीन रिपोर्ट की प्राप्ति पर, समुचित सरकार धारा 10 के अधीन 5[श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण] को निर्देश नहीं करती तो वह उसके लिए अपने कारण अभिलिखित करेगी और सम्पृक्त पक्षकारों को संसूचित करेगी ।
- 1965 के अधिनियम सं० 35 की धारा 4 द्वारा (1-12-1965 से) अंतःस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 10 द्वारा (10-3-1957 से) या अधिकरण के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 10 द्वारा (17-9-1956 से) अंतःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 8 द्वारा (19-12-1964 से) अंतःस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 11 द्वारा (10-3-1957 से) अधिकरण के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(5) बोर्ड इस धारा के अधीन अपनी रिपोर्ट, उस तारीख से, 1[जिसको उसे विवाद निर्दिष्ट किया गया थाट दो मास के भीतर या ऐसी अल्पतर कालावधि के भीतर, जैसी समुचित सरकार द्वारा नियत की जाए, निवेदित करेगाः
परन्तु समुचित सरकार रिपोर्ट निवेदित करने का समय ऐसी अतिरिक्त कालावधियों के लिए, जो कुल मिलाकर दो मास से अधिक की न होंगी, समय-समय पर बढ़ा सकेगीः
परन्तु यह और कि रिपोर्ट निवेदित करने का समय इतनी कालावधि के लिए बढ़ाया जा सकेगा, जितनी के बारे में विवाद के सभी पक्षकारों में लिखित रूप में सहमति हो जाए ।
14. न्यायालयों के कर्तव्य-न्यायालय अपने को निर्देशित मामलों की जांच करेगा और उन पर अपनी रिपोर्ट समुचित सरकार को, जांच के प्रारम्भ से मामूली तौर पर छह महीनों की कालावधि के भीतर देगा ।
2[15. श्रम न्यायालयों, अधिकरणों और राष्ट्रीय अधिकरणों के कर्तव्य-जहां कि कोई औद्योगिक विवाद श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण को न्यायनिर्णयन के लिए निर्देशित किया गया है वहां वह अपनी कार्यवाही शीघ्रतापूर्वक करेगा और 3[ऐसे औद्योगिक विवाद को निर्दिष्ट करने वाले आदेश में विनिर्दिष्ट कालावधि के भीतर या धारा 10 की उपधारा (2क) के द्वितीय परन्तुक के अधीन विस्तारित अतिरिक्त कालावधि के भीतरट अपना अधिनिर्णय समुचित सरकार को निवेदित करेगा ।
16. रिपोर्ट या अधिनिर्णय का प्ररूप-(1) बोर्ड या न्यायालय की रिपोर्ट लिखित रूप में होगी और उस पर, यथास्थिति, बोर्ड या न्यायालय के सभी सदस्य हस्ताक्षर करेंगेः
परन्तु इस धारा की किसी भी बात से यह न समझा जाएगा कि वह बोर्ड या न्यायालय के किसी सदस्य को रिपोर्ट से, या उसमें की गई किसी सिफारिश से विसम्मति का टिप्पण अभिलिखित करने से निवारित करती है ।
(2) श्रम न्यायालय या अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण का अधिनिर्णय लिखित रूप में होगा, और उस पर उसका पीठासीन अधिकारी हस्ताक्षर करेगा ।
17. रिपोर्टों और अधिनिर्णयों का प्रकाशन-(1) बोर्ड या न्यायालय की हर रिपोर्ट, उसके साथ अभिलिखित किसी विसम्मति के टिप्पण सहित, हर माध्यस्थम् पंचाट और श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण का हर अधिनिर्णय, समुचित सरकार द्वारा उसकी प्राप्ति की तारीख से तीस दिन की कालावधि के भीतर, ऐसी रीति से, जैसी समुचित सरकार ठीक समझे, प्रकाशित किया जाएगा ।
(2) धारा 17क के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए यह है कि उपधारा (1) के अधीन प्रकाशित पंचाट या अधिनिर्णय अन्तिम होगा और किसी भी न्यायालय द्वारा किसी भी रीति से प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।
17क. अधिनिर्णय का प्रारंभ-(1) अधिनिर्णय (जिसके अन्तर्गत माध्यस्थम् पंचाट आता है) धारा 17 के अधीन प्रकाशन की तारीख से तीस दिन के अवसान पर प्रवर्तनीय हो जाएगाः
परन्तु-
(क) यदि किसी ऐसे मामले में, जिसमें किसी ऐसे औद्योगिक विवाद के सम्बन्ध में, जिसमें समुचित सरकार पक्षकार है, कोई अधिनिर्णय श्रम न्यायालय या अधिकरण ने दिया है, समुचित सरकार की यह राय हो, अथवा
(ख) यदि किसी ऐसे मामले में, जिसमें अधिनिर्णय राष्ट्रीय अधिकरण ने दिया, केन्द्रीय सरकार की यह राय हो,
कि राष्ट्रीय अर्थ-व्यवस्था या सामाजिक न्याय पर प्रभाव डालने वाले लोक आधारों पर पूरे अधिनिर्णय या उसके किसी भाग को प्रभावशील करना असमीचीन होगा तो, यथास्थिति, समुचित सरकार या केन्द्रीय सरकार, शासकीय राजपत्र में अभिसूचना द्वारा, यह घोषित कर सकेगी कि अधिनिर्णय तीस दिन की उक्त कालावधि के अवसान पर प्रवर्तनीय न होगा ।
- 1951 के अधिनियम सं० 40 की धारा 6 द्वारा जिसको धारा 22 के अधीन सूचना दी गई थी, शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 12 द्वारा (10-3-1957 से) धारा 15, धारा 16, धारा 17 और धारा 17क के स्थान पर प्रतिस्थापित । धारा 17क 1950 के अधिनियम सं० 48 की धारा 34 तथा अनुसूची द्वारा अंतःस्थापित की गई थी ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 10 द्वारा (21-8-1984 से) कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(2) जहां कि किसी अधिनिर्णय के सम्बन्ध में कोई घोषणा उपधारा (1) के परन्तुक के अधीन की गई है, वहां समुचित सरकार या केन्द्रीय सरकार अधिनिर्णय की धारा 17 के अधीन प्रकाशन की तारीख से नब्बे दिन के भीतर अधिनिर्णय को प्रतिक्षेपित या उपान्तरित करने का आदेश कर सकेगी और अधिनिर्णय को, आदेश की प्रतिलिपि सहित, यदि आदेश राज्य सरकार द्वारा किया गया हो तो राज्य के विधान-मंडल के समक्ष, या यदि आदेश केन्द्रीय सरकार द्वारा किया गया हो तो संसद् के समक्ष प्रथम उपलभ्य अवसर पर रखेगी ।
(3) जहां कि उपधारा (2) के अधीन किए गए किसी आदेश के द्वारा यथा प्रतिक्षेपित या यथा उपान्तरित कोई अधिनिर्णय राज्य के विधान-मंडल के समक्ष या संसद् के समक्ष रखा गया है, वहां ऐसा अधिनिर्णय इस प्रकार रखे जाने की तारीख से पन्द्रह दिन के अवसान पर प्रवर्तनीय हो जाएगा, और जहां कि उपधारा (2) के अधीन का कोई आदेश उपधारा (1) के परन्तुक के अधीन की घोषणा के अनुसरण में नहीं किया गया है, वहां अधिनिर्णय उपधारा (2) में निर्दिष्ट नब्बे दिन की कालावधि के अवसान पर प्रवर्तनीय हो जाएगा ।
(4) अधिनिर्णयता की प्रवर्तनीयता के संबंध में उपधारा (1) और उपधारा (2) के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, अधिनिर्णय उस तारीख को और से प्रवर्तन में आएगा जो उसमें विनिर्दिष्ट की जाए, किंतु जहां कोई तारीख ऐसे विनिर्दिष्ट नहीं की गई है वहां वह उस तारीख को प्रवर्तन में आएगा जिसको अधिनिर्णय, यथास्थिति, उपधारा (1) या उपधारा (3) के अधीन प्रवर्तनीय हो जाता है ।]
1[17ख. उच्चतर न्यायालयों में कार्यवाहियों के लंबित रहने के दौरान कर्मकार को पूर्ण मजदूरी का संदाय-जहां श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण किसी मामले में अपने अधिनिर्णय में किसी कर्मकार का बहाल करने के लिए निदेश देता है और नियोजक ऐसे अधिनिर्णय के विरुद्ध उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में कार्यवाही करता है, वहां नियोजक ऐसे कर्मकार को, उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में, ऐसी कार्यवाहियों के लंबित रहने की कालावधि के दौरान, उसके द्वारा अंतिम बार प्राप्त पूर्ण मजदूरी का संदाय करने के लिए दायी होगा, जिसके अन्तर्गत किसी नियम के अधीन उसे अनुज्ञेय कोई निर्वाह-भत्ता भी है, यदि कर्मकार को ऐसी कालावधि के दौरान किसी स्थापना में नियोजित न किया गया हो और ऐसे कर्मकार द्वारा इस प्रभाव का शपथ-पत्र ऐसे न्यायालय में फाइल कर दिया गया होः
परन्तु जहां उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के समाधानप्रद रूप में यह साबित कर दिया जाता है कि ऐसा कर्मकार ऐसी कालावधि या उसके भाग के दौरान नियोजित था और पर्याप्त पारिश्रमिक प्राप्त कर रहा था, वहां न्यायालय यह आदेश देगा कि, यथास्थिति, ऐसी कालावधि या उसके भाग के लिए, इस धारा के अधीन कोई मजदूरी संदेय नहीं होगी ।]
18. वे व्यक्ति जिन पर समझौते और अधिनिर्णय आबद्धकर होंगे- 2[(1) नियोजक और कर्मकार के बीच हुए करार द्वारा किया गया ऐसा समझौता, जो सुलह कार्यवाही के अनुक्रम में न होकर अन्यथा हुआ है, करार के पक्षकारों पर आबद्धकर होगा ।
(2) 3[उपधारा (3) के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए यह है कि माध्यस्थम् पंचाट,] जो प्रवर्तनीय हो गया है, करार के उन पक्षकारों पर आबद्धकर होगा जिन्होंने विवाद को माध्यस्थम् के लिए निर्देशित किया था ।]
4[(3)] इस अधिनियम के अधीन सुलह कार्यवाहियों के अनुक्रम में किया गया समझौता, 5[या ऐसे मामले में जिसमें धारा 10क की उपधारा (3क) के अधीन अधिसूचना निकाली गई है,] कोई 1[माध्यस्थम् पंचाट या 2[श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण का कोई अधिनिर्णय,] जो प्रवर्तनीय हो गया है, -]
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 11 द्वारा (21-8-1984 से) अंतःस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 13 द्वारा (7-10-1956 से) अंतःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 9 द्वारा (19-12-1964 से) माध्यस्थम् पंचाट के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 13 द्वारा (7-10-1956 से) धारा 18 को उस धारा की उपधारा (3) के रूप में पुनःसंख्यांकित किया गया ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 9 द्वारा (19-12-1964 से) अंतःस्थापित ।
(क) औद्योगिक विवाद के सभी पक्षकारों पर,
(ख) कार्यवाहियों में हाजिर होने के लिए विवाद के पक्षकारों के रूप में, समनित अन्य सभी पक्षकारों पर, जब तक कि, यथास्थिति, बोर्ड, 3[मध्यस्थ,] 4[श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण] यह राय अभिलिखित न कर दे कि वे उचित हेतुक के बिना इस प्रकार समनित किए गए थे,
(ग) जहां कि खण्ड (क) या खण्ड (ख) में निर्दिष्ट पक्षकार नियोजक है वहां विवाद से संबद्ध स्थापन की बाबत उसके वारिसों, उत्तराधिकारियों या समनुदेशितियों पर,
(घ) जहां कि खण्ड (क) या खण्ड (ख) में निर्दिष्ट कोई पक्षकार कर्मकारों से ही मिलकर बना है वहां उन सभी व्यक्तियों पर, जो, यथास्थिति, उस स्थापन या स्थापन के भाग में, जिससे विवाद का संबंध है, विवाद की तारीख को नियोजित थे और ऐसे सभी व्यक्तियों पर, जो उस स्थापन या भाग में तत्पश्चात् नियोजित हो जाते हैं,
आबद्धकर होगा ।
19. समझौतों और अधिनिर्णयों के प्रवर्तन की कालावधि-(1) 5॥। समझौता उस तारीख को, जिसके बारे में विवाद के पक्षकारों में सहमति हो जाए और यदि किसी तारीख के बारे में सहमति न हो तो उस तारीख को, जिसको, समझौता-ज्ञापन पर विवाद के पक्षकारों ने हस्ताक्षर किए हों, प्रवर्तन में आएगा ।
(2) ऐसा समझौता उतनी कालावधि के लिए, जितनी के बारे में पक्षकारों में सहमति हो जाए, और यदि ऐसी किसी कालावधि के बारे में सहमति न हो तो [उस तारीख से, जिसको समझौता-ज्ञापन पर विवाद के पक्षकारों ने हस्ताक्षर किए हों,] छह मास की कालावधि के लिए आबद्धकर होगा और पूर्वोक्त कालावधि के अवसान के पश्चात् पक्षकारों पर तब तक आबद्धकर रहेगा जब तक उस तारीख से दो मास का अवसान न हो जाए जिसको समझौते के पक्षकारों में से कोई एक पक्षकार दूसरे पक्षकार या पक्षकारों को समझौते का पर्यवसान करने के आशय की लिखित सूचना देता है ।
7[(3) इस धारा के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए अधिनिर्णय, 8[उस तारीख से, जिसको अधिनिर्णय धारा 17क के अधीन प्रवर्तनीय होता है,] एक वर्ष की कालावधि के लिए प्रवर्तन में रहेगाः]
परन्तु समुचित सरकार उक्त कालावधि को घटा सकेगी और ऐसी कालावधि नियत कर सकेगी जैसी वह ठीक समझेः
परन्तु यह और कि समुचित सरकार प्रवर्तन की कालावधि के अवसान से पूर्व एक समय में एक वर्ष से अनधिक उतनी कालावधि जितनी वह ठीक समझे उक्त कालावधि में और बढ़ा सकेगी, किंतु ऐसे कि किसी अधिनिर्णय के प्रवर्तन की कुल कालावधि उसके प्रवर्तन में आने की तारीख से तीन वर्ष से अधिक न हो जाए ।
(4) जहां कि समुचित सरकार का, चाहे स्वप्रेरणा से या अधिनिर्णय से आबद्ध किसी पक्षकार के आवेदन पर, यह विचार हो कि जब से अधिनिर्णय दिया गया तब से उन परिस्थितियों में जिन पर वह आधारित है, तात्त्विक तब्दीली हो गई है, वहां समुचित सरकार, 9[यदि अधिनिर्णय श्रम न्यायालय का था तो श्रम न्यायालय को, या यदि अधिनिर्णय किसी अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण का था तो अधिकरण को,] उस अधिनिर्णय या उसके भाग को यह विनिश्चच करने के लिए निर्देशित कर
- 1950 के अधिनियम सं० 48 की धारा 34 तथा अनुसूची द्वारा समुचित सरकार द्वारा जो पंचाट घोषित किया गया है वह धारा 15 की उपधारा (2) के अधीन आबद्धकर होगा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 13 द्वारा (10-3-1957 से) अंतःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 9 द्वारा (19-12-1964 से) अंतःस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 13 द्वारा (10-3-1957 से) या अधिकरण के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 14 द्वारा (7-10-1956 से) इस अधिनियम के अधीन सुलह कार्यवाही के दौरान किया गया शब्दों का लोप किया गया ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 14 द्वारा (7-10-1956 से) अंतःस्थापित ।
- 1950 के अधिनियम सं० 48 की धारा 34 तथा अनुसूची द्वारा उपधारा (3) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 14 द्वारा (17-9-1956 से) अंतःस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 14 द्वारा (10-3-1957 से) अधिकरण को के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
सकेगी कि क्या ऐसी तब्दीली के कारण प्रवर्तन की कालावधि कम न कर दी जानी चाहिए, और ऐसे निर्देश पर, 1[यथास्थिति, श्रम न्यायालय या अधिकरण] का विनिश्चय 2॥। अन्तिम होगा ।
(5) उपधारा (3) में अन्तर्विष्ट कोई भी बात किसी ऐसे अधिनिर्णय को लागू नहीं होगी जो प्रभावी किए जाने के पश्चात् उन पक्षकारों पर, जो अधिनिर्णय से आबद्ध हैं, कोई चालू रहने वाली बाध्यता अपनी प्रकृति, निबन्धनों या अन्य परिस्थितियों के कारण अधिरोपित नहीं करता ।
(6) उपधारा (3) के अधीन प्रवर्तन की कालावधि का अवसान हो जाने पर भी अधिनिर्णय पक्षकारों पर तब तक आबद्धकर रहेगा जब तक कि उस तारीख से दो मास न बीत गए हों जिसको अधिनिर्णय से आबद्ध किसी पक्षकार ने दूसरे पक्षकार या पक्षकारों को अधिनिर्णय का पर्यवसान करने का अपना आशय प्रज्ञापित करने की सूचना दी हो ।
3[(7) उपधारा (2) या उपधारा (6) के अधीन दी गई कोई भी सूचना तब तक प्रभावशील नहीं होगी जब तक कि वह, यथास्थिति, समझौते या अधिनिर्णय से आबद्ध व्यक्तियों की बहुसंख्या का प्रतिनिधित्व करने वाले पक्षकार द्वारा न दी गई हो ।]]
20. कार्यवाहियों का प्रारम्भ और उनकी समाप्ति-(1) सुलह कार्यवाही के बारे में यह समझा जाएगा कि वह धारा 22 के अधीन हड़ताल या तालाबन्दी की सूचना सुलह अधिकारी को प्राप्त होने की तारीख को, या बोर्ड को विवाद निर्देशित किए जाने के आदेश की तारीख को, जैसी भी स्थिति हो प्रारम्भ हुई है ।
(2) सुलह कार्यवाही-
(क) जहां कि समझौता हो जाता है वहां तब जब विवाद के पक्षकार समझौता-ज्ञापन पर हस्ताक्षर कर देते हैं;
(ख) जहां कि समझौता नहीं हो पाता है वहां, यथास्थिति, तब जब सुलह अधिकारी की रिपोर्ट समुचित सरकार को प्राप्त हो जाती है या जब बोर्ड की रिपोर्ट धारा 17 के अधीन प्रकाशित कर दी जाती है; अथवा
(ग) तब जब सुलह कार्यवाहियों के लम्बित रहने के दौरान धारा 10 के अधीन कोई निर्देश न्यायालय, 4[श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण] को किया जाता है,
समाप्त हुई समझी जाएगी ।
(3) 5[मध्यस्थ के समक्ष धारा 10क के अधीन की या श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण के समक्ष] की कार्यवाहियों के बारे में यह समझा जाएगा कि वे विवाद के, 6[यथास्थिति, माध्यस्थम् या न्यायनिर्णयन के लिए निर्देशित किए जाने] की तारीख को प्रारम्भ हुई है, और ऐसी कार्यवाहियों के बारे में यह समझा जाएगा कि वे 7[उस तारीख को] समाप्त हुई है 8[जिसको अधिनिर्णय धारा 17क के अधीन प्रवर्तनीय हो जाता है ।]
21. कतिपय मामलों का गोपनीय रखा जाना-किसी अन्वेषण या जांच के अनुक्रम में व्यवसाय संघ के बारे में या किसी व्यष्टिक कारबार के बारे में (चाहे उसे कोई व्यक्ति, फर्म या कम्पनी चलाती हो) सुलह अधिकारी, बोर्ड, न्यायालय, 8[श्रम न्यायालय, अधिकरण, राष्ट्रीय अधिकरण या मध्यस्थट द्वारा अभिप्राप्त किसी ऐसी जानकारी को, जो ऐसे अधिकारी, बोर्ड, न्यायालय, 9[श्रम न्यायालय, अधिकरण, राष्ट्रीय अधिकरण या मध्यस्थ] के समक्ष दिए गए साक्ष्य के माध्यम से उपलभ्य होने के सिवाय अन्यथा उपलभ्य नहीं है, इस अधिनियम के अधीन की किसी रिपोर्ट या अधिनिर्णय में उस दशा में
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 14 द्वारा (10-3-1957 से) अधिकरण के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 14 द्वारा (10-3-1957 से) अपील के उपबन्ध के अधीन रहते हुए शब्दों का लोप किया गया ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 10 द्वारा (19-12-1964 से) अंतःस्थापित । पूर्ववर्ती उपधारा (7) का 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 14 द्वारा (17-9-1956 से) लोप किया गया ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 15 द्वारा (10-3-1957 से) या अधिकरण के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 15 द्वारा (10-3-1957 से) अधिकरण के समक्ष के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 15 द्वारा (10-3-1957 से) विवाद के न्यायनिर्णयन के लिए निर्देशित के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1952 के अधिनियम सं० 18 की धारा 4 द्वारा कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 16 द्वारा (10-3-1957 से) या अधिकरण के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
सम्मिलित नहीं किया जाएगा जिसमें कि संबद्ध व्यवसाय संघ, व्यक्ति, फर्म या कम्पनी ने, यथास्थिति, सुलह अधिकारी, बोर्ड, न्यायालय, 9[श्रम न्यायालय, अधिकरण, राष्ट्रीय अधिकरण या मध्यस्थट से यह लिखित प्रार्थना की हो कि ऐसी जानकारी गोपनीय मानी जाए; और न ऐसा सुलह अधिकारी या बोर्ड का कोई एक सदस्य, 1[या न्यायालय या श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण का पीठासीन अधिकारी या मध्यस्थम या कार्यवाहियों में उपस्थित या उनसे सम्पृक्त कोई भी व्यक्ति ऐसी जानकारी को, यथास्थिति, उस व्यवसाय संघ के सचिव की या संबद्ध व्यक्ति, फर्म या कंपनी की, लिखित सम्मति के बिना प्रकट करेगाः
परन्तु इस धारा की कोई भी बात ऐसी किसी जानकारी के भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 के अधीन अभियोजन के प्रयोजनों के लिए प्रकट करने को लागू होगी ।
अध्याय 5
हड़ताल और तालाबंदी
22. हड़तालों और तालाबन्दियों का प्रतिषेध-(1) लोक उपयोगी सेवा में नियोजित कोई भी व्यक्ति-
(क) हड़ताल करने से पूर्व के छह सप्ताह के भीतर हड़ताल की सूचना नियोजक को इसमें इसके पश्चात् उपबन्धित रूप में दिए गए बिना, अथवा
(ख) ऐसी सूचना देने के चौदह दिन के भीतर, अथवा
(ग) किसी यथापूर्वोक्त सूचना में विनिर्दिष्ट हड़ताल की तारीख के अवसान से पू्र्व, अथवा
(घ) सुलह अधिकारी के समक्ष की किन्हीं सुलह कार्यवाहियों के लम्बित रहने के और ऐसी कार्यवाहियों की समाप्ति के पश्चात् सात दिन के दौरान,
संविदा-भंगकारी हड़ताल न करेगा ।
(2) किसी लोक उपयोगी सेवा को चलाने वाला कोई भी नियोजक-
(क) तालाबन्दी करने से पूर्व के छह सप्ताह के भीतर तालाबन्दी की सूचना सम्बद्ध कर्मकार को इसमें इसके पश्चात् उपबन्धित रूप में दिए बिना, अथवा
(ख) ऐसी सूचना देने के चौदह के दिन के भीतर, अथवा
(ग) किसी यथापूर्वोक्त सूचना में विनिर्दिष्ट तालाबन्दी की तारीख के अवसान से पूर्व, अथवा
(घ) सुलह अधिकारी के समक्ष की किन्हीं सुलह कार्यवाहियों के लम्बित रहने के और ऐसी कार्यवाहियों की समाप्ति के पश्चात् सात दिन के दौरान,
अपने किन्हीं भी कर्मकारों के प्रति तालाबन्दी नहीं करेगा ।
(3) तालाबन्दी या हड़ताल की इस धारा के अधीन सूचना वहां आवश्यक नहीं होगी जहां कि लोक उपयोगी सेवा में, यथास्थिति, हड़ताल या तालाबन्दी पहले से ही विद्यमान है, किंतु नियोजक ऐसी तालाबन्दी या हड़ताल की प्रज्ञापना उस दिन, जिस दिन वह घोषित की गई हो, ऐसे प्राधिकारी को भेजेगा जिसे समुचित सरकार द्वारा या तो साधारणतया या विशिष्ट क्षेत्र के लिए लोक उपयोगी सेवाओं के किसी विशिष्ट वर्ग के लिए विनिर्दिष्ट किया जाए ।
(4) उपधारा (1) में निर्दिष्ट हड़ताल की सूचना उतने व्यक्तियों द्वारा, ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को, और ऐसी रीति से दी जाएगी, जो विहित किए जाएं या की जाए ।
(5) उपधारा (2) में निर्दिष्ट तालाबन्दी की सूचना ऐसी रीति से दी जाएगी जैसी विहित की जाए ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 16 द्वारा (10-3-1957 से) न्यायालय या अधिकरण” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(6) यदि किसी दिन नियोजक अपने द्वारा नियोजित किन्हीं व्यक्तियों से कोई ऐसी सूचनाएं, जैसी उपधारा (1) में निर्दिष्ट हैं, प्राप्त करता है या अपने द्वारा नियोजित किन्हीं व्यक्तियों को कोई ऐसी सूचनाएं, जैसी उपधारा (2) में निर्दिष्ट हैं, देता है तो वह उसके पांच दिन के भीतर समुचित सरकार को या ऐसे प्राधिकारी को, जिसे वह सरकार विहित करे उस दिन प्राप्त की गई या दी गई ऐसी सूचनाओं की संख्या की रिपोर्ट देगा ।
23. हड़तालों और तालाबन्दियों का साधारण प्रतिषेध-(क) बोर्ड के समक्ष की सुलह कार्यवाहियों के लम्बित रहने के और ऐसी कार्यवाहियों की समाप्ति के पश्चात् सात दिन के दौरान,
(ख) 1[श्रम न्यायालय, अधिकरण, राष्ट्रीय अधिकरण] के समक्ष की कार्यवाहियों के लम्बित रहने के और ऐसी कार्यवाहियों की समाप्ति के पश्चात् दो मास के दौरान, 2॥।
3[(खख) जहां कि धारा 10क की उपधारा (3क) के अधीन अधिसूचना निकाली गई है वहां मध्यस्थ के समक्ष की माध्यस्थम् कार्यवाहियों के लम्बित रहने के और ऐसी कार्यवाहियों की समाप्ति के पश्चात् दो मास के दौरान, अथवा]
(ग) किन्हीं ऐसे मामलों की बाबत जो किसी समझौता या अधिनिर्णय के अन्तर्गत आते हैं, किसी ऐसी कालावधि के दौरान जिसमें वह समझौता या अधिनिर्णय प्रवर्तन में है,
कोई भी कर्मकार जो किसी औद्योगिक स्थापन में नियोजित है संविदा-भंगकारी हड़ताल न करेगा, और न ऐसे किसी कर्मकार का कोई भी नियोजक तालाबन्दी घोषित करेगा ।
24. अवैध हड़तालें और तालाबन्दियां-(1) यदि हड़ताल या तालाबन्दी-
(i) धारा 22 या धारा 23 के उल्लंघन में प्रारम्भ या घोषित की जाती है, अथवा
(ii) धारा 10 की उपधारा (3) के अधीन 4[या धारा 10क की उपधारा (4क)] के अधीन किए गए आदेश के उल्लंघन में चालू रखी जाती है,
तो वह अवैध होगी ।
(2) जहां कि कोई हड़ताल या तालाबन्दी किसी औद्योगिक विवाद के अनुसरण में पहले से ही प्रारम्भ हो चुकी है और बोर्ड 2[मध्यस्थ], 5[श्रम न्यायालय, अधिकरण, राष्ट्रीय अधिकरण] को विवाद निर्देशित करने के समय विद्यमान है, वहां ऐसी हड़ताल या तालाबन्दी का चालू रखा जाना अवैध नहीं समझा जाएगा, परन्तु यह तब जब कि ऐसी हड़ताल या तालाबन्दी अपने प्रारम्भ के समय इस अधिनियम के उपबन्धों के उल्लंघन में न रही हो और उसका चालू रखा जाना धारा 10 की उपधारा (3) के अधीन 2[या धारा 10क की उपधारा (4क)] के अधीन प्रतिषिद्ध न किया गया हो ।
(3) अवैध हड़ताल के परिणामस्वरूप घोषित तालाबन्दी या अवैध तालाबन्दी के परिणामस्वरूप घोषित हड़ताल अवैध नहीं समझी जाएगी ।
25. अवैध हड़तालों और तालाबन्दियों के लिए वित्तीय सहायता का प्रतिषेध-कोई भी व्यक्ति किसी अवैध हड़ताल या तालाबन्दी को प्रत्यक्षतः अग्रसर करने या उसका समर्थन करने में किसी धन या व्यय या उपयोजन जानते हुए नहीं करेगा ।
6[अध्याय 5क
कामबन्दी और छंटनी
25क. धारा 25ग से लेकर धारा 25ङ तक का लागू होना-(1) धारा 25ग से लेकर धारा 25ङ तक, जिनके अन्तर्गत ये दोनों धाराएं आती हैं, 1[उन औद्योगिक स्थापनों को, जिन्हें अध्याय 5ख लागू होता है, अथवा-]
- ऐसे औद्योगिक स्थापनों को, जिनमें पूर्ववर्ती कैलेंडर मास में प्रति कार्य दिवस को औसतन पचास से कम, कर्मकार नियोजित रहे हैं, अथवा
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 17 द्वारा (10-3-1957 से) अधिकरण के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 11 द्वारा (19-12-1964 से) अथवा शब्द का लोप किया गया ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 11 द्वारा (19-12-1964 से) अंतःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 12 द्वारा (19-12-1964 से) अंतःस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 18 द्वारा (10-3-1957 से) या अधिकरण के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1953 के अधिनियम सं० 43 की धारा 3 द्वारा (24-10-1953 से) अंतःस्थापित ।
(ख) ऐसे औद्योगिक स्थापनों को, जो मौसमी प्रकार के हैं या जिनमें काम केवल आन्तरिक रूप से होता है,
लागू नहीं होगी ।
(2) यदि यह प्रश्न उठे कि कोई औद्योगिक स्थापन मौसमी प्रकार का है या नहीं अथवा उसमें काम केवल आन्तरिक रूप से होता है या नहीं तो उस पर समुचित सरकार का विनिश्चय अन्तिम होगा ।
2[स्पष्टीकरण-इस धारा में और धारा 25ग, धारा 25घ और धारा 25ङ में औद्योगिक स्थापन" से अभिप्रेत है-
(i) काराखाना अधिनियम, 1948 (1948 का 63) की धारा 2 के खंड (ङ) में यथापरिभाषित कारखाना, अथवा
(ii) खान अधिनियम, 1952 (1952 का 35) की धारा 2 के खंड (ञ) में यथापरिभाषित खान, अथवा
(iii)) बागान श्रम अधिनियम, 1951 (1951 का 69) की धारा 2 के खंड (च) में यथापरिभाषित बागान ।]
3[25ख. निरन्तर सेवा की परिभाषा-इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए-
(1) यह बात कि कर्मकार किसी कालावधि में निरन्तर सेवा में रह चुका है उस दशा में कही जाएगी जिसमें कि वह उस कालावधि में अविच्छिन्न सेवा में रहे, जिसके अन्तर्गत वह सेवा आती है जो रुग्णता या प्राधिकृत छुट्टी या दुर्घटना या ऐसी हड़ताल के कारण जो अवैध न हो या तालाबन्दी या काम के ऐसे बन्द हो जाने के कारण, जो कर्मकार के किसी कसूर की वजह से न हो, विच्छिन्न हो गई है ।
(2) जहां कि कर्मकार एक वर्ष या छह मास की कालावधि के लिए खण्ड (1) के अर्थ के अन्दर निरन्तर सेवा में नहीं रहा है, वहां-
(क) यदि उसने, उस तारीख से, जिसके प्रति निर्देश से गणना की जानी है, पूर्व के बारह कलैंडर मास की कालावधि के दौरान-
(i) ऐसे कर्मकार की दशा में जो खान में भूमि के नीचे नियोजित है एक सौ नब्बे से, तथा
(ii) किसी अन्य दशा में, दो सौ चालीस से,
अन्यून दिन, किसी नियोजक के अधीन वास्तव में काम किया है तो यह समझा जाएगा कि वह एक वर्ष की कालावधि के लिए, उस नियोजक के अधीन निरन्तर सेवा में रह चुका है ।
(ख) यदि उसने उस तारीख से, जिसके प्रति निर्देश से गणना की जानी है, पूर्व के छह कलैंडर मास की कालावधि के दौरान-
(i) ऐसे कर्मकार की दशा में जो खान में भूमि के नीचे नियोजित है, पच्चानवे से, तथा
(ii) किसी अन्य दशा में, एक सौ बीस से,
अन्यून दिन, किसी नियोजक के अधीन वास्तव में काम किया है तो यह समझा जाएगा कि वह छह मास की कालावधि के लिए, उस नियोजक के अधीन निरन्तर सेवा में रह चुका है;
स्पष्टीकरण-खंड (2) के प्रयोजनों के लिए, उन दिनों की, जिनको कर्मकार ने नियोजक के अधीन वास्तव में काम किया है, संख्या में वे दिन भी सम्मिलित होंगे, जिनको-
(i) उसकी किसी करार के अधीन या औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 (1946 का 20) के अधीन बनाए गए स्थायी आदेशों द्वारा या इस अधिनियम के अधीन या उस औद्योगिक स्थापन को लागू किसी अन्य विधि के अधीन यथा-अनुज्ञात कामबन्दी की गई है;
(ii) वह पूर्व वर्षों में उपार्जित पूरी मजदूरी वाली छुट्टी पर रहा है;
(iii)) वह अपने नियोजन से और उसके अनुक्रम में, उद्भूत दुर्घटना द्वारा कारित अस्थायी निःशक्तता के कारण अनुपस्थित रहा है; तथा
(iv) नारी की दशा में, वह प्रसूति छुट्टी पर रही है, किन्तु ये दिन ऐसे सम्मिलित होंगे कि ऐसी प्रसूति छुट्टी की कुल कालावधि बारह सप्ताह से अधिक न हो ।]
- 1976 के अधिनियम सं० 32 की धारा 2 द्वारा (5-3-1976 से) लागू नहीं होगी के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1954 के अधिनियम सं० 48 की धारा 2 द्वारा (1-4-1954 से) पूर्ववर्ती स्पष्टीकरण के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 13 द्वारा (19-12-1964 से) धारा 25ख के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
1[25ग. जिन कर्मकारों की कामबंदी की गई है उनका प्रतिकर के लिए अधिकार-जब कभी (बदली कर्मकार या आकस्मिक कर्मकार से भिन्न) किसी ऐसे कर्मकार की, जिसका नाम औद्योगिक स्थापन के मस्टर रोल में दर्ज है और जिसने किसी नियोजक के अधीन कम से कम एक वर्ष की निरन्तर सेवा पूरी कर ली है, चाहे निरन्तर चाहे आन्तरायिक रूप से कामबन्दी की जाती है तब नियोजक, ऐसे साप्ताहिक अवकाश दिनों के सिवाय जो बीच में पड़ जाएं, उन सभी दिनों के लिए, जिनके दौरान उसकी इस प्रकार कामबन्दी की जाए, ऐसा प्रतिकर देगा जो उसकी उस आधारिक मजदूरी और मंहगाई भत्ते के योग के, जो उसकी इस प्रकार कामबन्दी न किए जाने पर संदेय होता, पचास प्रतिशत के बराबर होगाः
परन्तु यदि बाहर मास की किसी कालावधि के दौरान कर्मकार की पैंतालीस दिन से अधिक की इस प्रकार कामबन्दी की जाए तो उस कामबन्दी के प्रथम पैंतालीस दिन के अवसान के पश्चात् की किसी भी कालावधि की बाबत ऐसा कोई प्रतिकर उस दशा में संदेय नहीं होगा जिसमें कर्मकार और नियोजक के बीच उस भाव का कोई करार होः
परन्तु यह और कि पूर्वगामी परन्तुक के अन्तर्गत आने वाले किसी मामले में नियोजक के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह उस कर्मकार की छंटनी धारा 25च में अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अनुसार उस कामबन्दी के प्रथम पैंतालीस दिन के अवसान के पश्चात् किसी भी समय कर दे, और जब ऐसा वह करता है तब पूर्ववर्ती बारह मास के दौरान कामबन्दी की जाने के लिए कर्मकार को दिया गया कोई भी प्रतिकर उस प्रतिकर में से मुजरा किया जा सकेगा जो छंटनी के लिए संदेय हो ।
स्पष्टीकरण-बदली कर्मकार" से वह कर्मकार अभिप्रेत है, जो किसी औद्योगिक स्थापन में किसी अन्य कर्मकार के स्थान पर नियुक्त है, जिसका नाम स्थापन के मस्टर रोल में दर्ज है, किन्तु यदि उसने स्थापन में एक वर्ष की निरन्तर सेवा पूरी कर ली है तो इस धारा के प्रयोजन के लिए उसे ऐसा नहीं माना जाएगा ।]
25घ. कर्मकारों के मस्टर रोल रखने का नियोजक का कर्तव्य-इस बात के होते हुए भी कि किसी औद्योगिक स्थापन के कर्मकारों की कामबन्दी की गई है, हर नियोजक का यह कर्तव्य होगा कि वह इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए मस्टर रोल रखे और उसमें ऐसे कर्मकारों द्वारा प्रविष्टियां किए जाने का उपबन्ध करे, तो नियत समय पर प्रसामान्य काम-घंटों के दौरान स्थापन में काम करने के लिए स्वयं उपस्थित हों ।
25ङ. कुछ दशाओं में कर्मकारों का प्रतिकर के लिए हकदार न होना-उस कर्मकार को, जिसकी कामबन्दी की गई है, उस दशा में कोई भी प्रतिकर नहीं दिया जाएगा जिसमें कि-
(i) वह उसी स्थापन में, जिसमें उसकी कामबन्दी की गई है या उसी नियोजक के किसी दूसरे स्थापन में, जो उसी नगर या गांव में, या जिस स्थापन का वह है, उससे पांच मील की परिधि के अन्दर, स्थित है, कोई अनुकल्पी नियोजन प्रतिगृहीत करने से इंकार करता है, यदि नियोजक की राय में ऐसे अनुकल्पी नियोजन के लिए किसी विशेष कौशल या पूर्व अनुभव की अपेक्षा न हो और वह उस कर्मकार द्वारा किया जा सकता हो, परन्तु यह तब जबकि कर्मकार को, उस मजदूरी की, जो उसे प्रसामान्यतया दी गई होती, प्रस्थापना उस अनुकल्पी नियोजन के लिए भी की गई हो,
(ii) वह नियत समय पर स्थापन में काम के लिए प्रसामान्य काम-घंटों के दौरान दिन में कम से कम एक बार स्वयं उपस्थित नहीं होता,
(iii)) ऐसी कामबन्दी उस स्थापन के किसी दूसरे भाग में कर्मकारों द्वारा हड़ताल किए जाने या उत्पादन-गति मन्द किए जाने के कारण की गई हो ।
- 1965 के अधिनियम सं० 35 की धारा 5 द्वारा (1-12-1965 से) पूर्ववर्ती धारा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
25च. कर्मकारों की छंटनी के लिए पुरोभाव्य शर्तें-किसी उद्योग में नियोजित किसी भी कर्मकार की, जो नियोजक के अधीन कम से कम एक वर्ष के लिए निरन्तर सेवा में रह चुका है, छंटनी उस नियोजक द्वारा तब के सिवाय नहीं की जाएगी, जबकि-
(क) कर्मकार को एक महीने की ऐसी लिखित सूचना दे दी गई हो जिसमें छंटनी के कारण उपदर्शित किए गए हों और सूचना की कालावधि का अवसान हो गया हो, या ऐसी सूचना के बदले में कर्मकार को सूचना की कालावधि के लिए मजदूरी दे दी गई हो:
1। । । ।
(ख) कर्मकार को छंटनी के समय ऐसा प्रतिकर दे दिया गया हो जो 2[निरन्तर सेवा के हर संपूरित वर्ष के लिएट या छह मास से अधिक के उसके किसी भाग के लिए पन्द्रह दिन के औसत वेतन के बराबर हो, तथा
(ग) सूचना की तामील समुचित सरकार पर 3[या ऐसे प्राधिकारी पर, जो शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा समुचित सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए,] विहित रीति से कर दी गई हो ।
4[25चच. उपक्रमों के अन्तरण की दशा में कर्मकारों को प्रतिकर-जहां कि किसी उपक्रम के स्वामित्व या प्रबन्ध उस उपक्रम से सम्बद्ध नियोजक से किसी नए नियोजक को करार द्वारा या विधि की क्रिया द्वारा अन्तरित किया जाता है वहां हर कर्मकार, जो ऐसे अन्तरण से ठीक पहले उस उपक्रम में कम से कम एक वर्ष के लिए निरन्तर सेवा में रह चुका है धारा 25च के उपबन्धों के अनुसार सूचना तथा प्रतिकर का वैसे ही हकदार होगा मानो उस कर्मकार की छंटनी की गई होः
परन्तु इस धारा की कोई भी बात, उस दशा में जिसमें कि अन्तरण के कारण नियोजक बदल गए हों, तब लागू नहीं होगी जबकि-
(क) ऐसे अन्तरण से कर्मकार की सेवा में विच्छेद न हुआ हो,
(ख) ऐसे अन्तरण के पश्चात् कर्मकार को लागू सेवा के निबन्धन और शर्तें कर्मकार के लिए किसी भी प्रकार उन निबन्धनों और शर्तों से कम अनुकूल न हों जो अन्तरण से ठीक पहले उसे लागू थीं, तथा
(ग) नया नियोजक कर्मकार को, उसकी छंटनी की दशा में, इस आधार पर कि उसकी सेवा निरन्तर चलती रही है और अन्तरण द्वारा वह विच्छिन्न नहीं हुई है, ऐसे अन्तरण के निबन्धनों के अधीन अथवा अन्यथा, प्रतिकर देने के लिए वैध रूप से दायी हो ।
5[25चचक. किसी उपक्रम को बन्द करने के आशय की साठ दिन की सूचना का दिया जाना-(1) कोई नियोजक जो किसी उपक्रम को, बन्द करना चाहता है, उस तारीख के, जिसको कि आशयिक बन्दी प्रभावी होनी है, कम से कम साठ दिन पूर्व, समुचित सरकार को उपक्रम के बन्द किए जाने के आशय के कारण स्पष्ट करते हुए, विहित रीति से, एक सूचना देगाः
परन्तु इस धारा की कोई बात-
(क) ऐसे उपक्रम को लागू नहीं होगी जिसमें-
(i) पचास से कम कर्मकार नियोजित हैं,
(ii) पूर्वर्ती बारह मासों में प्रतिदिन औसत पचास कर्मकारों से कम नियोजित रहे हों,
- ऐसे उपक्रम को लागू न होगी जो भवनों, पुलों, सड़कों, नहरों, बांधों के निर्माण के लिए अथवा अन्य निर्माण कार्य या परियोजना के लिए स्थापित किया गया हो ।
- 1984 के अधिनियम सं० 49 की धारा 3 द्वारा (18-8-1984 से) परन्तुक का लोप किया गया ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 14 द्वारा (19-12-1964 से) सेवा के हर संपूरित वर्ष के लिए के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 14 द्वारा (19-12-1964 से) अंतःस्थापित ।
- 1957 के अधिनियम सं० 18 की धारा 3 द्वारा (28-11-1956 से) पूर्ववर्ती धारा के स्थान पर प्रतिस्थापित । धारा 25चच 1956 के अधिनियम सं० 41 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित की गई थी ।
- 1972 के अधिनियम सं० 32 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी यह है कि यदि समुचित सरकार का यह समाधान हो जाए कि किन्हीं ऐसी असाधारण परिस्थितियों के कारण, जैसे कि उपक्रम में कोई दुर्घटना अथवा नियोजक की मृत्यु अथवा ऐसे ही किसी अन्य कारण से, ऐसा करना आवश्यक है तो वह, आदेश द्वारा, निदेश दे सकेगी कि उपधारा (1) के उपबन्ध ऐसे उपक्रम के संबंध में, ऐसी अवधि के लिए, जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, लागू नहीं होंगी ।]
25चचच. उपक्रमों के बंद कर दिए जाने की दशा में कर्मकारों को प्रतिकर-(1) जहां कि कोई उपक्रम किसी भी कारणवश बन्द कर दिया जाता है वहां हर कर्मकार, जो ऐसी बन्दी से ठीक पहले उस उपक्रम में कम से कम एक वर्ष के लिए निरन्तर सेवा में रह चुका है, उपधारा (2) के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए धारा 25च के उपबन्धों के अनुसार सूचना तथा प्रतिकर का वैसे ही हकदार होगा मानो उस कर्मकार की छंटनी की गई होः
परन्तु जहां कि उपक्रम नियोजक के नियंत्रण के परे की अपरिवर्जनीय परिस्थितियों के कारण बन्द किया गया है, वहां धारा 25च के खंड (ख) के अधीन कर्मकार को देय प्रतिकर तीन मास के उसके औसत वेतन से अधिक नहीं होगा ।
1[स्पष्टीकरण-उस उपक्रम के बारे में, जो केवल-
(i) वित्तीय कठिनाइयों के (जिनके अन्तर्गत वित्तीय हानियां आती हैं) कारण; या
(ii) अव्ययनित स्टाक के संचय के कारण; या
(iii)) उसे अनुदत्त पट्टे या अनुज्ञप्ति की अवधि के अवसान के कारण; या
(iv) उस दशा में जब कि उपक्रम खनन संक्रिया में लगा हो, उस क्षेत्र में खनिजों के निःशेषण के कारण, जिसमें ऐसी संक्रिया की गई हो,
बन्द किया गया है, यह नहीं समझा जाएगा कि वह इस उपधारा के परन्तुक के अर्थ के अन्दर नियोजक के नियंत्रण से परे की अपरिवर्जनीय परिस्थितियों के कारण बन्द किया गया है ।]
2[(1क) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां खनन संक्रियाओं में लगा हुआ कोई उपक्रम उस क्षेत्र में जिसमें ऐसी संक्रियाएं की जा रही हों, केवल खनिजों के निःशेषण के कारण बन्द किया गया है, वहां उस उपधारा में निर्दिष्ट कोई कर्मकार धारा 25च के उपबन्धों के अनुसार किसी सूचना या प्रतिकर का हकदार नहीं होगा, यदि-
(क) बन्द होने की तारीख से ही नियोजक कर्मकार के लिए उसी पारिश्रमिक पर जिसे प्राप्त करने का वह हकदार था, और सेवा के उन्हीं निबन्धनों और शर्तों पर, जो बन्द होने के ठीक पूर्व उसे लागू थीं, अनुकल्पी नियोजन की व्यवस्था कर देता है;
(ख) कर्मकार की सेवा ऐसे अनुकल्पी नियोजन से भंग न हुई हो; तथा
(ग) नियोजक कर्मकार को, उसकी छंटनी की दशा में, इस आधार पर कि उसकी सेवा निरन्तर चलती रही है और ऐसे अनुकल्पी नियोजन द्वारा भंग नहीं हुई है, ऐसे अनुकल्पी नियोजन के निबन्धनों के अधीन या अन्यथा प्रतिकर के संदाय का वैध रूप से दायी हो ।
(1ख) उपधारा (1) और (1क) के प्रयोजनार्थ “खनिजों" और “खनन संक्रियाओं" पदों के वे ही अर्थ होंगे जो खान तथा खनिज (विनियमन और विकास) अधिनियम, 1957 (1957 का 67) की धारा 3 के खण्ड (क) तथा (घ) में क्रमशः उनके हैं ।]
(2) जहां कि भवनों, पुलों, सड़कों, नहरों या बांधों के सन्निर्माण के लिए या अन्य सन्निर्माण कामों के लिए स्थापित कोई उपक्रम काम के पूरे होने के कारण उस तारीख से, जिसको वह उपक्रम स्थापित किया गया था, दो वर्ष के भीतर बन्द कर दिया जाता है वहां, उसमें नियोजित कोई भी कर्मकार, धारा 25च के खंड (ख) के अधीन किसी प्रतिकर का हकदार नहीं होगा, किन्तु यदि वह सन्निर्माण काम इस प्रकार दो वर्ष के भीतर पूरा नहीं हो जाता हो तो वह कर्मकार 1[निरन्तर सेवा के हर संपूरित वर्ष] के लिए या छह मास से अधिक के उसके किसी भाग के लिए उस धारा के अधीन सूचना और प्रतिकर का हकदार होगा ।
- 1971 के अधिनियम सं० 45 की धारा 4 द्वारा (15-12-1971 से) मूल स्पष्टीकरण के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1971 के अधिनियम सं० 45 की धारा 4 द्वारा (15-12-1971 से) अंतःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 15 द्वारा (19-12-1964 से) सेवा के संपूरित वर्ष के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
25छ. छंटनी के लिए प्रक्रिया-जहां कि किसी औद्योगिक स्थापन के किसी ऐसे कर्मकार की, जो भारत का नागरिक है, छंटनी की जानी हो और वह उस स्थापन के कर्मकारों के किसी विशिष्ट प्रवर्ग का हो, वहां, तब के सिवाय जबकि नियोजक ऐसे कारणों से, जिन्हें अभिलिखित किया जाएगा, किसी अन्य कर्मकार की छंटनी करता है, नियोजक और कर्मकार के बीच इस निमित्त हुए किसी करार के अभाव में नियोजक, मामूली तौर से और उस कर्मकार की छंटनी करेगा, जो उस प्रवर्ग में नियोजित किया जाने वाला अन्तिम व्यक्ति हो ।
25ज. छंटनी किए गए कर्मकारों का पुनःनियोजन-जहां कि किन्हीं कर्मकारों की छंटनी की जाती है और नियोजक किन्हीं व्यक्तियों को अपने नियोजन में रखने की प्रस्थापना करता है, वहां वह 2[उन छंटनी किए गए कर्मकारों को, जो भारत के नागरिक हैं,] ऐसे रीति से, जैसी विहित की जाए, यह अवसर देगा कि 1[पुनः नियोजन के लिए अपने को प्रस्थापित करें और छंटनी किए गए उन कर्मकारों कोट जो पुनः नियोजन के लिए अपने को प्रस्थापित करें अन्य व्यक्तियों पर अधिमान मिलेगा ।
25झ. [इस अध्याय के अधीन नियोजक से शोध्य धन की वसूली ।]-औद्योगिक विवाद (संशोधन तथा प्रकीर्ण उपबन्ध) अधिनियम, 1956 (1956 का 36) की धारा 19 द्वारा (10-3-1957 से) निरसित ।
25ञ. इस अध्याय से असंगत विधियों का प्रभाव-(1) इस अध्याय के उपबन्ध किसी अन्य विधि में, जिसके अन्तर्गत औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 (1946 का 20) के अधीन बनाए गए स्थायी आदेश आते हैं, इनसे असंगत कोई बात होते हुए भी, प्रभावी होंगेः
3[परन्तु जहां कि किसी अन्य अधिनियम के या उसके अधीन निकाले गए नियमों, आदेशों या अधिसूचनाओं के उपबन्धों के अधीन या किन्हीं स्थायी आदेशों के अधीन या किसी अधिनिर्णय या सेवा-संविदा के अधीन या अन्यथा, कोई कर्मकार किसी बात की बाबत ऐसे फायदों का हकदार है जो उसके लिए उन फायदों से, जिनका वह इस अधिनियम के अधीन हकदार होगा, अधिक अनुकूल है वहां, कर्मकार, इस बात के होते हुए भी कि वह अन्य बातों की बाबत इस अधिनियम के अधीन फायदा प्राप्त करता है, उस बात की बाबत अधिक अनुकूल फायदों का हकदार बना रहेगा ।]
(2) शंकाओं का निराकरण करने के लिए एतद्द्वारा यह घोषित किया जाता है कि इस अध्याय की किसी भी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह किसी राज्य में किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि के उपबन्धों पर, वहां तक जहां तक कि वह विधि औद्योगिक विवादों के समझौते का उपबन्ध करती है, प्रभाव डालती है, किन्तु नियोजकों और कर्मकारों के अधिकार और दायित्व, वहां तक जहां तक कि उनका संबंध कामबन्दी और छंटनी से है, इस अध्याय के उपबन्धों के अनुसार अवधारित किए जाएंगे ।]
4[अध्याय 5ख
कतिपय स्थापनों में कामबंदी, छंटनी और उनके बन्द किए जाने के संबंध में विशेष उपबंध
25ट. अध्याय 5ख का लागू होना-(1) इस अध्याय के उपबन्ध ऐसे औद्योगिक स्थापन को, (जो मौसमी प्रकार का नहीं है या ऐसा स्थापन नहीं है, जिसमें काम केवल आन्तरायिक रूप से होता है) लागू होंगे जिसमें पूर्ववर्ती बारह मास में प्रति कार्य-दिवस को औसतन कम से कम 5[एक सौ] कर्मकार नियोजित थे ।
(2) यदि यह प्रश्न उठे कि कोई औद्योगिक स्थापन मौसमी प्रकार का है या नहीं अथवा उसमें काम केवल आन्तरिक रूप से होता है या नहीं तो उस पर समुचित सकार का विनिश्चय अन्तिम होगा ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 16 द्वारा (19-12-1964 से) कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 17 द्वारा (19-12-1964 से) परन्तुक के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1976 के अधिनियम सं० 32 की धारा 3 द्वारा (5-3-1976 से) अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 12 द्वारा (21-8-1984 से) तीन सौ” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
25ठ. परिभाषाएं-इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए-
(क) “औद्योगिक स्थापन" से अभिप्रेत है-
(i) कारखाना अधिनियम, 1948 (1948 का 63) की धारा 2 के खंड (ड) में यथापरिभाषिक कारखाना;
(ii) खान अधिनियम, 1952 (1952 का 35) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ञ) में यथापरिभाषित खान; अथवा
(iii)) बागान श्रम अधिनियम, 1951 (1951 का 69) की धारा 2 के खंड (च) में यथापरिभाषित बागान;
(ख) धारा 2 के खंड (क) के उपखंड (ii) में किसी बात के होते हुए भी, -
(i) किसी ऐसी कम्पनी के सम्बन्ध में, जिसकी समादत्त शेयर पूंजी का कम से कम इक्यावन प्रतिशत केन्द्रीय सरकार द्वारा धृत है, अथवा
(ii) किसी ऐसे निगम के संबंध में [जो धारा 2 के खंड (क) के उपखंड (i) में निर्दिष्ट निगम नहीं हैट जो संसद् द्वारा बनाई गई किसी संधि के द्वारा या अधीन स्थापित किया गया है,
केन्द्रीय सरकार समुचित सरकार होगी ।
25ड. कामबन्दी का प्रतिषेध-(1) (बदली कर्मकार या आकस्मिक कर्मकार से भिन्न) किसी कर्मकार की, जिसका नाम ऐसे औद्योगिक स्थापन के मस्टर रोल में दर्ज है, जिसे यह अध्याय लागू होता है, 1[उसके नियोजक द्वारा कामबन्दी समुचित सरकार या ऐसे प्राधिकारी की, जिसे इस निमित्त उस सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् विनिर्दिष्ट प्राधिकारी कहा गया है), पूर्व अनुज्ञा के बिना जो इस निमित्त किए गए आवेदन पर प्राप्त की गई हो तभी की जाएगी, जब कि ऐसी कामबन्दी शक्ति की कमी या प्राकृतिक दुर्घटना, और किसी खान की दशा में, ऐसी कामबन्दी अग्नि, बाढ़, ज्वलनशील गैस की अधिकता या विस्फोटक के कारण भी की गई हो ।]
2[(2) उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञा के लिए कोई आवेदन नियोजक द्वारा विहित रीति से, आशयित कामबन्दी के लिए कारण स्पष्ट रूप से बताते हुए किया जाएगा और ऐसे आवेदन की एक प्रति की भी विहित रीति से संबंधित कर्मकारों पर साथ-साथ तामील की जाएगी ।
(3) जहां किसी ऐसे औद्योगिक स्थापन के, जो खान है, (बदली कर्मकार या आकस्मिक कर्मकार से भिन्न) कर्मकारों की उपधारा (1) के अधीन अग्नि, बाढ़ या ज्वलनशील गैस की अधिकता या विस्फोटक के कारण कामबन्दी कर दी गई है, वहां ऐसे स्थापन के संबंध में नियोजक, ऐसी कामबन्दी के प्रारम्भ की तारीख से तीस दिन की कालावधि के भीतर विहित रीति से समुचित सरकार या विनिर्दिष्ट प्राधिकारी को कामबन्दी जारी रखने की अनुज्ञा, के लिए आवेदन करेगा ।
(4) जहां उपधारा (1) या उपधारा (3) के अधीन अनुज्ञा के लिए आवेदन किया गया है, वहां समुचित सरकार या विनिर्दिष्ट प्राधिकारी, ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे और नियोजक, संबंधित कर्मकार और ऐसी कामबन्दी में हितबद्ध व्यक्तियों को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् ऐसी कामबन्दी के कारणों की असलीयत और पर्याप्तता को, कर्मकारों के हितों और सभी अन्य सुसंगत बातों को ध्यान में रखते हुए, आदेश द्वारा और उन कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, ऐसी अनुज्ञा दे सकेगी या देने से इन्कार कर सकेगी और ऐसे आदेश की एक प्रति नियोजक और कर्मकारों को दी जाएगी ।
(5) जहां उपधारा (1) या उपधारा (3) के अधीन अनुज्ञा के लिए कोई आवेदन किया गया है और समुचित सरकार या विनिर्दिष्ट प्राधिकारी, ऐसी तारीख से जिसको ऐसा आवेदन किया गया है, साठ दिन की कालावधि के भीतर नियोजक को अनुज्ञा देने या देने से इन्कार करने वाले आदेश को संसूचित नहीं करता है, वहां, वह अनुज्ञा जिसके लिए आवेदन किया गया है, उक्त साठ दिन की कालावधि के अवसान पर दी गई समझी जाएगी ।
(6) समुचित सरकार या विनिर्दिष्ट प्राधिकारी का अनुज्ञा देने या अनुज्ञा देने से इन्कार करने वाला आदेश, उपधारा (7) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए अंतिम और संबंधित सभी पक्षकारों पर आबद्धकर होगा और ऐसे आदेश की तारीख से एक वर्ष के लिए प्रवृत्त रहेगा ।
- 1984 के अधिनियम सं० 49 की धारा 4 द्वारा (18-8-1984 से) कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1984 के अधिनियम सं० 49 की धारा 4 द्वारा (18-8-1984 से) उपधारा (2) को उपधारा (5) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(7) समुचित सरकार या विनिर्दिष्ट प्राधिकारी, स्वप्ररेणा से या नियोजक अथवा किसी कर्मकार द्वारा किए गए आवेदन पर, उपधारा (4) के अधीन अनुज्ञा देने या देने से इन्कार करने वाले अपने आदेश का पुनर्विलोकन कर सकेगा या इस विषय को न्यायनिर्णयन के लिए किसी अधिकरण को, यथास्थिति, निर्दिष्ट कर सकेगा या करा सकेगाः
परन्तु जहां इस उपधारा के अधीन कोई निर्देश किसी अधिकरण को किया गया है, वहां वह ऐसे निर्देश की तारीख से तीस दिन की कालावधि के भीतर अधिनिर्णय करेगा ।
(8) जहां उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञा के लिए कोई आवेदन नहीं किया गया है या जहां उपधारा (3) के अधीन अनुज्ञा के लिए कोई आवेदन उसमें विनिर्दिष्ट कालावधि के भीतर नहीं किया गया है या जहां किसी कामबन्दी के लिए अनुज्ञा देने से इन्कार कर दिया गया है, वहां ऐसी कामबन्दी को, उस तारीख से जिसको कर्मकारों की कामबन्दी की गई थी, अवैध समझा जाएगा और कर्मकार तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन सभी फायदों के ऐसे हकदार होंगे मानो उनकी कामबन्दी नहीं की गई थी ।
(9) इस धारा के पूर्वगामी उपबन्धों में किसी बात के होते हुए भी समुचित सरकार, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसी असाधारण परिस्थितियों जैसे स्थापन में दुर्घटना या नियोजक की मृत्यु या वैसी ही अन्य परिस्थितियों के कारण, ऐसा करना आवश्यक है तो वह आदेश द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि, यथास्थिति, उपधारा (1) या उपधारा (3) के उपबन्ध ऐसे स्थापन के संबंध में ऐसी कालावधि के लिए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए लागू नहीं होंगे ।]
1[(10)] धारा 25ग के उपबन्ध (उसके द्वितीय परन्तुक को छोड़कर) इस धारा में निर्दिष्ट कामबन्दी के मामलों को लागू होंगे ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, नियोजक द्वारा कर्मकार की कामबन्दी उस दशा में की गई नहीं समझी जाएगी जिसमें ऐसा नियोजक उस कर्मकार को कोई वैकल्पिक नियोजन (जिसके लिए नियोजक की राय में कोई विशेष कौशल या पूर्व अनुभव अपेक्षित नहीं है और जो कर्मकार द्वारा किया जा सकता है) उसी स्थापन में, जिसमें उसकी कामबन्दी की गई थी या उसी नियोजक के किसी ऐसे अन्य स्थापन में, जो उसी नगर या ग्राम में स्थित है या जो उस स्थापन से, जिसमें वह कर्मकार है, इतनी दूरी पर स्थित है कि उस कर्मकार के मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उसके स्थानान्तरण से उसे असम्यक् कष्ट नहीं होगा, देता है परन्तु यह तब जब कि कर्मकार को प्रसामान्य रूप से जितनी मजदूरी संदत्त की जाती उतनी ही मजदूरी उसे वैकल्पिक नियुक्ति के लिए भी दी जाए ।
2[25ढ. कर्मकारों की छंटनी के लिए पुरोभाव्य शर्तें-(1) किसी ऐसे औद्योगिक स्थापन में, जिसे यह अध्याय लागू होता है, नियोजित किसी कर्मकार की जो किसी नियोजक के अधीन कम से कम एक वर्ष की निरन्तर सेवा में रह चुका है, उस नियोजक द्वारा छंटनी तभी की जाएगी जब कि, -
(क) कर्मकार को तीन मास की लिखित ऐसी सूचना दे दी गई हो जिसमें छंटनी के कारण उपदर्शित किए गए हों और सूचना की कालावधि का अवसान हो गया हो या ऐसी सूचना के बदले में कर्मकार को सूचना की कालावधि के लिए मजदूरी का संदाय कर दिया गया हो; और
(ख) समुचित सरकार या ऐसे प्राधिकारी की, जो उस सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् विनिर्दिष्ट प्राधिकारी कहा गया है), पूर्व अनुज्ञा इस निमित्त किए गए आवेदन पर प्राप्त कर ली गई हो ।
(2) उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञा के लिए आवेदन नियोजक द्वारा विहित रीति से आशयित छंटनी के लिए कारण स्पष्ट रूप से बताते हुए किया जाएगा, और ऐसे आवेदन की एक प्रति की भी विहित रीति से संबंधित कर्मकारों पर साथ-साथ तामील की जाएगी ।
- 1984 के अधिनियम सं० 49 की धारा 4 द्वारा (18-8-1984 से) उपधारा (6) से उपधारा (10) के रूप में पुनःसंख्यांकित किया गया ।
- 1984 के अधिनियम सं० 49 की धारा 5 द्वारा (18-8-1984 से) धारा 25ढ के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(3) जहां उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञा के लिए कोई आवेदन किया गया है, वहां समुचित सरकार या विनिर्दिष्ट प्राधिकारी, ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे और नियोजक को अवसर देने के पश्चात्, संबंधित कर्मकार और ऐसी छंटनी में हितबद्ध व्यक्तियों को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् नियोजक द्वारा कथित कारणों की सत्यता और पर्याप्तता को, कर्मकारों के हितों और सभी अन्य सुसंगत बातों को ध्यान में रखते हुए, आदेश द्वारा और उन कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, ऐसी अनुज्ञा दे सकेगा या देने से इंकार कर सकेगा और ऐसे आदेश की एक प्रतिलिपि नियोजक और कर्मकारों को भेजी जाएगी ।
(4) जहां उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञा के लिए कोई आवेदन किया गया है और समुचित सरकार या विनिर्दिष्ट प्राधिकारी, नियोजक को ऐसी तारीख से जिसको ऐसा आवेदन किया गया है साठ दिन की कालावधि के भीतर अनुज्ञा देने वाले या अनुज्ञा देने से इन्कार करने वाले आदेश को संसूचित नहीं करता है, वहां वह अनुज्ञा जिसके लिए आवेदन किया गया है, उक्त साठ दिन की कालावधि के अवसान पर दी गई समझी जाएगी ।
(5) समुचित सरकार या विनिर्दिष्ट प्राधिकारी का अनुज्ञा देने वाला या अनुज्ञा देने से इन्कार करने वाला आदेश, उपधारा (6) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए अंतिम होगा और संबंधित सभी पक्षकारों पर आबद्धकर होगा और ऐसे आदेश की तारीख से एक वर्ष के लिए प्रवृत्त रहेगा ।
(6) समुचित सरकार या विनिर्दिष्ट प्राधिकारी, स्वप्रेरणा से या नियोजक या किसी कर्मकार द्वारा किए गए आवेदन पर, उपधारा (3) के अधीन अनुज्ञा देने वाले या अनुज्ञा देने से इन्कार करने वाले अपने आदेश का पुनर्विलोकन कर सकेगा या इस विषय को न्यायनिर्णयन के लिए किसी अधिकरण को, यथास्थिति, निर्दिष्ट कर सकेगा या करा सकेगाः
परन्तु जहां इस उपधारा के अधीन कोई निर्देश किसी अधिकरण को किया गया है, वहां ऐसे निर्देश की तारीख से तीस दिन की कालावधि के भीतर अधिनिर्णय करेगा ।
(7) जहां उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञा के लिए आवेदन नहीं किया गया है या जहां किसी छंटनी के लिए अनुज्ञा देने से इन्कार कर दिया गया है, वहां ऐसी छंटनी को, ऐसी तारीख से जिसको कर्मकारों को छंटनी की सूचना दी गई थी, अवैध समझा जाएगा और कर्मकार उस समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन सभी फायदों का ऐसे हकदार होगा मानो उसे कोई सूचना नहीं दी गई थी ।
(8) इस धारा के पूर्वगामी उपबन्धों में किसी बात के होते हुए भी समुचित सरकार, यदि उसका समाधान हो जाता है कि ऐसी असाधारण परिस्थितियों जैसे उपक्रम में दुर्घटना या नियोजक की मृत्यु या उसी प्रकार की अन्य परिस्थितियों के कारण, ऐसा करना आवश्यक है तो वह आदेश द्वारा यह निदेश दे सकेगा कि उपधारा (1) के उपबन्ध ऐसे उपक्रम के संबंध में ऐसी कालावधि के लिए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, लागू नहीं होंगे ।
(9) जहां उपधारा (3) के अधीन, छंटनी के लिए अनुज्ञा दी गई है या छंटनी की अनुज्ञा उपधारा (4) के अधीन छंटनी के लिए अनुज्ञा दी गई समझी जाती है, वहां ऐसा प्रत्येक कर्मकार जो इस धारा के अधीन अनुज्ञा के लिए किए गए, आवेदन की तारीख से ठीक पूर्व किसी स्थापन में नियोजित प्रत्येक कर्मकार, छंटनी के समय ऐसा प्रतिकर पाने का हकदार होगा जो निरंतर सेवा के सम्पूरित वर्ष या उसके ऐसे भाग के जो छह मास से अधिक हो, पन्द्रह दिन के औसत वेतन के बराबर होगा ।]
1[25ण. उपक्रम बन्द किए जाने की प्रक्रिया-(1) कोई नियोजक, जो किसी ऐसे औद्योगिक स्थापन के, जिसे यह अध्याय लागू होता है, उपक्रम को बन्द करने का आशय रखता है, उपक्रम की आशयित बन्दी के कारणों का स्पष्टतया कथन करते हुए विहित रीति से, समुचित सरकार को उस तारीख से, जिसको आशयित बन्दी प्रभावी होनी है, कम से कम नब्बे दिन पूर्व, पूर्व अनुज्ञा के लिए आवेदन करेगा और साथ ही आवेदन की एक प्रति विहित रीति से कर्मकारों के प्रतिनिधि को भी तामील की जाएगीः
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे उपक्रम को लागू नहीं होगी जो भवनों, पुलों, सड़कों, नहरों, बांधों या अन्य सन्निर्माण काम के लिए स्थापित किया गया है ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 14 द्वारा (21-8-1984 से) धारा 25ण के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(2) जहां उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञा के लिए आवेदन किया गया है, वहां समुचित सरकार, ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे, और नियोजक, कर्मकार और ऐसे बन्द किए जाने में हितबद्ध व्यक्तियों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, नियोजक द्वारा कथित कारणों की सच्चाई और पर्याप्तता, जनसाधारण के हितों और अन्य सभी सुसंगत बातों को ध्यान में रखते हुए, आदेश द्वारा और ऐसे कारणों सहित जो अभिलिखित किए जाएं, ऐसी अनुज्ञा दे सकेगी या अनुज्ञा देने से इंकार कर सकेगी और ऐसे आदेश की एक प्रतिलिपि नियोजक और कर्मकार को भेजी जाएगी ।
(3) जहां उपधारा (1) के अधीन आवेदन किया गया है और समुचित सरकार उस तारीख से, जिसको ऐसा आवेदन किया गया है, साठ दिन की कालावधि के भीतर नियोजक को अनुज्ञा या अनुज्ञा देने से इन्कार करने की सूचना नहीं देती है, वहां ऐसी अनुज्ञा, जिसके लिए आवेदन किया गया है, उक्त साठ दिन की कालावधि के अवसान पर दी गई समझी जाएगी ।
(4) अनुज्ञा देने या देने से इन्कार करने वाला समुचित सरकार का कोई आदेश, उपधारा (5) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, अंतिम होगा और वह सभी पक्षकारों पर आबद्धकर होगा और ऐसे आदेश की तारीख से एक वर्ष तक प्रवृत्त रहेगा ।
(5) समुचित सरकार चाहे स्वप्रेरणा पर या नियोजक या किसी कर्मकार द्वारा आवेदन किए जाने पर, उपधारा (2) के अधीन अनुज्ञा देने या अनुज्ञा देने से इन्कार करने वाले आदेश का पुनर्विलोकन कर सकेगी या मामले को न्यायनिर्णयन के लिए अधिकरण को निर्दिष्ट कर सकेगीः
परन्तु जहां इस उपधारा के अधीन अधिकरण को निर्देश किया गया है, वहां वह ऐसे निर्देश की तारीख से तीस दिन की कालावधि के भीतर, अधिनिर्णय पारित करेगा ।
(6) जहां उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञा के लिए आवेदन उसमें विनिर्दिष्ट कालावधि के भीतर नहीं किया गया है या जहां उपक्रम बंद करने के लिए अनुज्ञा देने से इंकार कर दिया गया है, वहां उपक्रम बंद करने की तारीख से उसका बन्द किया जाना अवैध समझा जाएगा और कर्मकार तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन सभी फायदों का हकदार होगा मानो उपक्रम बन्द ही नहीं किया गया था ।
(7) इस धारा के पूर्वगामी उपबन्धों में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी यदि समुचित सरकार का यह समाधान हो जाता है कि असाधारण परिस्थितियों के कारण जैसे कि उपक्रम में दुर्घटना या नियोजक की मृत्यु या इसी प्रकार की परिस्थितियों के कारण ऐसा करना आवश्यक है, तो वह आदेश द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि उपधारा (1) के उपबन्ध ऐसे उपक्रम के संबंध में ऐसी कालावधि के लिए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, लागू नहीं होंगे ।
(8) जहां उपधारा (2) के अधीन किसी उपक्रम के बंद कर दिए जाने के लिए अनुज्ञा दी जाती है या जहां उपधारा (3) के अधीन बन्द कर दिए जाने के लिए अनुज्ञा दी गई समझी जाती है, वहां इस धारा के अधीन अनुज्ञा के लिए आवेदन की तारीख के ठीक पूर्व उस उपक्रम में नियोजित प्रत्येक कर्मकार प्रतिकर पाने का हकदार होगा जो निरन्तर सेवा के हर संपूरित वर्ष या छह मास से अधिक के उसके किसी भाग के लिए पन्द्रह दिन के औसत वेतन के बराबर है ।]
25त. औद्योगिक विवाद (संशोधन) अधिनियम, 1976 के प्रारम्भ के पूर्व बन्द किए गए उपक्रमों को पुनः चालू करने के बारे में विशेष उपबन्ध-यदि किसी औद्योगिक स्थापन के, जिसे यह अध्याय लागू होता है, किसी उपक्रम के बारे में, जो औद्योगिक विवाद (संशोधन) अधिनियम, 1976 के प्रारम्भ के पूर्व बन्द किया गया है, समुचित सरकार की राय है कि-
(क) ऐसा उपक्रम नियोजक के नियंत्रण के परे की अपवर्जनीय परिस्थितियों के कारण से अन्यथा बन्द किया गया है;
(ख) उपक्रम के पुनः चालू किए जाने की संभावनाएं हैं;
(ग) ऐसे उपक्रम के बन्द किए जाने के पूर्व उसमें नियोजित कर्मकारों के पुनर्वास के लिए या जनसमुदाय के जीवन के लिए आवश्यक प्रदाय तथा सेवाएं बनाए रखने के लिए या दोनों के लिए उपक्रम को पुनः करना रहना आवश्यक है; और
(घ) उपक्रम के पुनः चालू करने के परिणामस्वरूप नियोजक को उस उपक्रम के सम्बन्ध में कष्ट नहीं होगा,
तो वह ऐसे नियोजक और कर्मकारों को अवसर देने के पश्चात्, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि उपक्रम ऐसे समय के भीतर (जो आदेश की तारीख से एक मास से कम न हो जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, पुनः चालू होगा ।
25थ. पूर्व अनुज्ञा के बिना कामबन्दी या छंटनी के लिए शास्ति-जो नियोजक, धारा 25ड के या 1॥। धारा 25ढ के उपबंधों का उल्लंघन करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि एक मास तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
25द. बन्द करने पर शास्ति-(1) जो नियोजक किसी उपक्रम को उपधारा 25ण की उपधारा (1) के अनुबन्धों का अनुपालन किए बिना बन्द करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
(2) जो नियोजक 2[धारा 25ण की उपधारा (2) के अधीन किसी उपक्रम को बन्द करने की अनुज्ञा देने से इंकार करने वाले किसी आदेश या धारा 25त के अधीन दिए गए किसी निदेशट का उल्लंघन करेगा वह कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, और जहां उल्लंघन जारी रहता है वहां अतिरिक्त जुर्माने से, जो दोषसिद्धि के पश्चात् से ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान उल्लंघन जारी रहता है, दो हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
3। । । । ।
25ध. ऐसे औद्योगिक स्थापन को, जिसे यह अध्याय लागू होता है, अध्याय 5क के कतिपय उपबन्धों का लागू होना-अध्याय 5क की धाराएं 25ख, 25घ, 25चच, 25छ, 25ज और 25ञ के उपबन्ध ऐसे औद्योगिक स्थापन के सम्बन्ध में भी, जिसे इस अध्याय के उपबन्ध लागू होते हैं, यथाशक्य लागू होंगे ।]
4[अध्याय 5ग
अनुचित श्रम व्यवहार
25न. अनुचित श्रम व्यवहार पर प्रतिषेध-कोई नियोजक या कर्मकार या व्यवसाय संघ, चाहे व्यवसाय संघ अधिनियम, 1926 (1926 का 16) के अधीन रजिस्ट्रीकृत है अथवा नहीं, कोई अनुचित श्रम व्यवहार नहीं करेगा ।
25प. अनुचित श्रम व्यवहार के लिए शास्ति-कोई व्यक्ति, जो अनुचित श्रम व्यवहार करेगा, कारावास से, जो छह मास तक का हो सकेगा या जुर्माने से जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।]
अध्याय 6
शास्तियां
26. अवैध हड़तालों और तालाबंदियों के लिए शास्ति-(1) जो कर्मकार, ऐसी हड़ताल, जो इस अधिनियम के अधीन अवैध है, प्रारम्भ करेगा, चालू रखेगा या उसे अग्रसर करने में अन्यथा कोई कार्य करेगा वह कारावास से, जिसकी अवधि एक मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो पचास रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
(2) जो नियोजक ऐसी तालाबन्दी, जो इस अधिनियम के अधीन अवैध है, प्रारम्भ करेगा, चालू रखेगा या उसे अग्रसर करने में अन्यथा कोई कार्य करेगा वह कारावास से, जिसकी अवधि एक मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
27. उकसाने आदि के लिए शास्ति-जो व्यक्ति, ऐसी हड़ताल या तालाबन्दी में, जो इस अधिनियम के अधीन अवैध है, भाग लेने के लिए दूसरों को उकसाएगा या उद्दीप्त करेगा, या उसे अग्रसर करने में अन्यथा कोई कार्य करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
- 1984 के अधिनियम सं० 49 की धारा 6 द्वारा (18-8-1984 से) कतिपय शब्दों का लोप किया गया ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 15 द्वारा (21-8-1984 से) कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 15 द्वारा (21-8-1984 से) उपधारा (3) का लोप किया गया ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 16 द्वारा (21-8-1984 से) अंतःस्थापित ।
28. अवैध हड़तालों और तालाबंदियों के लिए वित्तीय सहायता देने के लिए शास्ति-जो व्यक्ति किसी अवैध हड़ताल या तालाबन्दी को प्रत्यक्षतः अग्रसर करने में या उसके समर्थन में जानते हुए धन का व्यय या उपयोजन करेगा वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
1[29. समझौते या अधिनिर्णय के भंग के लिए शास्ति-जो व्यक्ति, किसी ऐसे समझौते या अधिनिर्णय के, जो इस अधिनियम के अधीन उस पर आबद्धकर हो, किसी निबंधन का भंग करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, 2[और जहां कि भंग चालू रहने वाला भंग हो वहां अतिरिक्त जुर्माने से, जो प्रथम भंग के लिए दोषसिद्धि के पश्चात् के हर दिन के लिए, जिसके दैरान भंग चालू रहता है, दो सौ रुपए तक हो सकेगा,] दण्डनीय होगा और यदि अपराध का विचारण करने वाला न्यायालय अपराधी पर जुर्माना करे तो वह यह निदेश दे सकेगा कि उससे प्राप्त कुल जुर्माना या उसका कोई भाग ऐसे व्यक्ति को, जिसे उसकी राय में ऐसे भंग से क्षति हुई है, प्रतिकर के रूप में दिया जाएगा ।]
30. गोपनीय जानकारी प्रकट करने के लिए शास्ति-जो व्यक्ति धारा 21 में निर्दिष्ट किसी जानकारी को उस धारा के उपबन्धों के उल्लंघन में जानबूझकर प्रकट करेगा, वह उस व्यवसाय संघ या व्यष्टिक कारबार द्वारा या उसकी ओर से, जिस पर प्रभाव पड़ा हो, किए गए परिवाद पर कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
3[30क. बिना सूचना दिए बन्दी के लिए शास्ति-कोई नियोजक जो धारा 25चचक के उपबन्धों का अनुपालन किए बिना, किसी उपक्रम को बन्द करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।]
31. अन्य अपराधों के लिए शास्ति-(1) जो नियोजक धारा 33 के उपबन्धों का उल्लंघन करेगा वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
(2) जो कोई इस अधिनियम के या तद्धीन बनाए गए किसी नियम के उपबन्धों में से किसी का उल्लंघन करेगा वह, यदि ऐसे उल्लंघन के लिए इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन कोई अन्य शास्ति अन्यत्र उपबन्धित नहीं की गई है, जुर्माने से, जो एक सौ रुपए तक हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।
अध्याय 7
प्रकीर्ण
32. कम्पनियों आदि द्वारा अपराध-जहां कि इस अधिनियम के अधीन अपराध करने वाला व्यक्ति कम्पनी, या अन्य निगमित निकाय या व्यक्तियों का संगम हो (चाहे वह निगमित हो या न हो) वहां हर निदेशक, प्रबन्धक, सचिव, अभिकर्ता या अन्य अधिकारी या व्यक्ति, जो उसके प्रबन्ध से संपृक्त हो, जब तक कि वह यह साबित नहीं कर देता कि वह अपराध उसके ज्ञान या सम्मति के बिना किया गया था, ऐसे अपराध का दोषी समझा जाएगा ।
4[33. कार्यवाहियों के लम्बित रहने के दौरान सेवा की शर्तों आदि का कतिपय परिस्थितियों में न बदला जाना-(1) किसी औद्योगिक विवाद की बाबत किसी सुलह अधिकारी या बोर्ड के समक्ष की किसी सुलह कार्यवाही के या 5[किसी मध्यस्थ या] श्रम न्यायालय या अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण के समक्ष की किसी कार्यवाही के लम्बित रहने के दौरान कोई भी नियोजक, ऐसे प्राधिकारी की, जिसके समक्ष कार्यवाही लम्बित है, लिखित अभिव्यक्त अनुज्ञा के बिना-
- न तो उस विवाद से संसक्त किसी विषय के बारे में उन सेवा की शर्तों को, जो ऐसी कार्यवाही के प्रारम्भ से ठीक पहले ऐसे विवाद से संपृक्त कर्मकारों को लागू होती हैं, इस प्रकार परिवर्तित करेगा कि उन कर्मकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े; और
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 20 द्वारा (17-9-1956 से) धारा 29 के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1965 के अधिनियम सं० 35 की धारा 6 द्वारा (1-12-1965 से) अंतःस्थापित ।
- 1972 के अधिनियम सं० 32 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 21 द्वारा (10-3-1957 से) धारा 33 के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 18 द्वारा (19-12-1964 से) अंतःस्थापित ।
(ख) न ऐसे विवाद से संपृक्त किसी कर्मकार को, विवाद से संसक्त किसी अवचार के लिए, चाहे पदच्युति द्वारा या अन्यथा, उन्मोचित या दंडित करेगा ।
(2) किसी औद्योगिक विवाद की बाबत ऐसी किसी कार्यवाही के लम्बित रहने के दौरान, नियोजक, ऐसे विवाद से संपृक्त कर्मकार को लागू स्थायी आदेशों के अनुसार 3[या जहां कि ऐसे कोई स्थायी आदेश नहीं हैं वहां अपने और कर्मकार के बीच हुई किसी संविदा के अभिव्यक्त या विवक्षित निबन्धनों के अनुसार-]
(क) उन सेवा की शर्तों को, जो ऐसी कार्यवाही के प्रारम्भ से ठीक पहले उस कर्मकार को लागू होती है, विवाद से असंसक्त किसी विषय के बारे में परिवर्तित, अथवा
(ख) उस कर्मकार को विवाद से असंसक्त किसी अवचार के लिए, चाहे पदच्युति द्वारा या अन्यथा, उन्मोचित दंडित,
कर सकेगाः
परन्तु ऐसा कोई भी कर्मकार तब उन्मोचित या पदच्युत नहीं किया जाएगा जब तक कि उसे एक मास की मजदूरी दे दी गई हो और नियोजक ने उस प्राधिकारी से, जिसके समक्ष कार्यवाही लंबित है, अपने द्वारा की गई कार्यवाही के अनुमोदन के लिए आवेदन न कर दिया हो ।
(3) उपधारा (2) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, नियोजक किसी औद्योगिक विवाद की बाबत ऐसी किसी कार्यवाही के लम्बित रहने के दौरान, उस प्राधिकारी की लिखित अभिव्यक्त अनुज्ञा के बिना, जिसके, समक्ष कार्यवाही लम्बित है, ऐसे विवाद से सम्पृक्त किसी संरक्षित कर्मकार के विरुद्ध कोई ऐसी कार्रवाही नहीं करेगा जो-
(क) उन सेवा की शर्तों को, जो ऐसी कार्यवाही के प्रारम्भ से ठीक पहले उसे लागू थीं ऐसे परिवर्तित कर दे कि परिवर्तन का ऐसे संरक्षित कर्मकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े, अथवा
(ख) ऐसे संरक्षित कर्मकार को पदच्युति द्वारा या अन्यथा उन्मोचित या दंडित करे ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए किसी स्थापन के सम्बन्ध में संरक्षित कर्मकार" से वह कर्मकार अभिप्रेत है जिसे उस स्थापन से संसक्त रजिस्ट्रीकृत व्यवसाय संघ 1[की कार्यपालिका का कोई सदस्य या अन्य पदाधिकारी] होते हुए, इस निमित्त बनाए गए नियमों के अनुसार इस रूप में मान्यताप्राप्त है ।
(4) हर स्थापन में, ऐसे कर्मकारों की संख्या, जिन्हें उपधारा (3) के प्रयोजनों के लिए संरक्षित कर्मकारों के रूप में मान्यताप्राप्त होगी, उसमें नियोजित कर्मकारों की कुल संख्या का एक प्रतिशत होगी, किन्तु संरक्षित कर्मकारों की संख्या कम से कम पांच और अधिक से अधिक एक सौ होगी, और पूर्वोक्त प्रयोजन के लिए समुचित सरकार स्थापन से संसक्त विभिन्न व्यवसाय संघों के, यदि कोई हों, बीच ऐसे संरक्षित कर्मकारों के वितरण के लिए और ऐसी रीति के लिए, जिससे कर्मकार संरक्षित कर्मकारों के रूप में चुने जा सकेंगे और उन्हें मान्यता दी जा सकेगी, उपबन्ध करने वाले नियम बना सकेगी ।
(5) जहां कि कोई नियोजक अपने द्वारा की गई कार्रवाई के अनुमोदन के लिए उपधारा (2) के परन्तुक के अधीन सुलह अधिकारी, बोर्ड, 2[मध्यस्थ,] श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण से आवेदन करता है, वहां सम्पृक्त प्राधिकारी अविलम्ब ऐसे आवेदन की सुनवाई करेगा और उसके सम्बन्ध में 1[ऐसे आवेदन की प्राप्ति की तारीख से तीन मास की कालावधि के भीतर] ऐसा आदेश देगा जैसा वह ठीक समझेः]
2[परन्तु जहां ऐसा कोई प्राधिकरण ऐसा करना आवश्यक या समीचीन समझता है, वहां वह ऐसे कारणों सहित जो अभिलिखित किए जाएं, ऐसी कालावधि को ऐसी अतिरिक्त कालावधि के लिए जो वह उचित समझे, विस्तारित कर सकेगाः
परन्तु यह और कि ऐसे किसी प्राधिकरण के समक्ष कोई कार्यवाही केवल इस आधार पर व्यपगत नहीं होगी कि इस उपधारा में विनिर्दिष्ट कालावधि, ऐसी कार्यवाहियों के पूरा होने के बिना ही, समाप्त हो गई थी ।]
- 1971 के अधिनियम सं० 45 की धारा 5 द्वारा (15-12-1971 से) का कोई अधिकारी के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 18 द्वारा (19-12-1964 से) अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 17 द्वारा (21-8-1984 से) यथा संभव शीघ्रता के साथ के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 17 द्वारा (21-8-1984 से) अंतःस्थापित ।
3[33क. यह न्यायनिर्णीत करने के लिए विशेष उपबन्ध कि कार्यवाहियों के लम्बित रहने के दौरान सेवा की शर्तें आदि बदली हैं या नहीं-जहां कि कोई नियोजक कार्यवाहियों के 4[सुलह अधिकारी, बोर्ड, मध्यस्थ, श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण के समक्ष] लम्बित रहने के दौरान धारा 33 के उपबन्धों का उल्लंघन करता है वहां ऐसे उल्लंघन से व्यथित कर्मचारी लिखित परिवाद, 6[विहित रीति से, -
(क) ऐसे सुलह अधिकारी या बोर्ड को कर सकेगा और सुलह अधिकारी या बोर्ड ऐसे परिवाद का सुलह कराने और ऐसे औद्योगिक विवाद का समझौता कराने के लिए, ध्यान देगा, और
(ख) ऐसे मध्यस्थ, श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण को कर सकेगा और ऐसे परिवाद की प्राप्ति पर, यथास्थिति, मध्यस्थ, श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण, परिवाद का न्यायनिर्णयन करेगा मानो वह परिवाद इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार उसे निर्देशित या उसके समक्ष लंबित विवाद हो और अपना अधिनिर्णय समुचित सरकार को प्रस्तुत करेगा, और इस अधिनियम के उपबंध तद्नुसार लागू होंगे ।]
5[33ख. कतिपय कार्यवाहियों को अन्तरित करने की शक्ति-(1) समुचित सरकार इस अधिनियम के अधीन किसी श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण के समक्ष लम्बित किसी कार्यवाही को लिखित आदेश द्वारा और ऐसे कारणों से जिन्हें उसमें लिखा जाएगा, प्रत्याहृत कर सकेगी और कार्यवाही को निपटाने के लिए, उसे, यथास्थिति, किसी अन्य श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण को अन्तरित कर सकेगी, और वह श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण, जिसे कार्यवाही ऐसे अन्तरित की गई है, अन्तरण आदेश में के विशेष निदेशों के अध्यधीन रहते हुए, या तो नए सिरे से या उस प्रक्रम से अग्रसर हो सकेगा जिस पर वह ऐसे अन्तरित की गई थी :
परन्तु जहां कि धारा 33 या धारा 33क के अधीन कोई कार्यवाही किसी अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण के समक्ष लम्बित है वहां ऐसी कार्यवाही किसी श्रम न्यायालय को भी अन्तरित की जा सेकेगी ।
(2) यदि कोई अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण समुचित सरकार द्वारा इस प्रकार प्राधिकृत किया गया हो, तो वह अपने समक्ष लम्बित धारा 33 या धारा 33क के अधीन की किसी कार्यवाही को, उपधारा (1) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उन श्रम न्यायालयों में से किसी एक को अन्तरित कर सकेगा, जिन्हें ऐसी कार्यवाहियां निपटाने के लिए शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा समुचित सरकार ने विनिर्दिष्ट किया हो और वह श्रम न्यायालय, जिसे कार्यवाही इस प्रकार अन्तरित की गई है, उसे निपटाएगा ।
6[33ग. नियोजक से शोध्य धन की वसूली-(1) जहां कि किसी समझौते या अधिनिर्णय के अधीन या 7[अध्याय 5क या अध्याय 5ख] के उपबन्धों के अधीन किसी कर्मकार को नियोजक से कोई धन शोध्य हो, वहां स्वयं वह कर्मकार या उसके द्वारा इस निमित्त लिखित रूप में प्राधिकृत कोई अन्य व्यक्ति, या कर्मकार की मृत्यु हो जाने की दशा में उसका समनुदेशिती या उसके वारिस, उसे शोध्य धन की वसूली के लिए समुचित सरकार से आवेदन, वसूली के किसी अन्य ढंग पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, कर सकेंगे, और यदि समुचित सरकार का समाधान हो जाता है कि कोई धन इस प्रकार शोध्य है, तो वह उस रकम के लिए कलक्टर को एक प्रमाणपत्र भेजेगी जो उसकी वसूली के लिए उसी रीति से अग्रसर होगा जैसे भू-राजस्व की बकाया वसूल की जाती हैः
परन्तु ऐसा हर आवेदन, उस तारीख से, जिसको कर्मकार को नियोजक से धन शोध्य हुआ था, एक वर्ष के भीतर किया जाएगाः
परन्तु यह और कि ऐसा कोई आवेदन एक वर्ष की उक्त कालावधि के अवसान के पश्चात् भी ग्रहण किया जा सकेगा यदि समुचित सरकार का यह समाधान हो जाता है कि उक्त कालावधि के भीतर आवेदन न करने के लिए आवेदक के पास पर्याप्त कारण था ।
- 1950 के अधिनियम सं० 48 की धारा 34 तथा अनुसूची द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 18 द्वारा (21-8-1984 से) कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 23 द्वारा (10-3-1957 से) अंतःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 19 द्वारा (19-12-1964 से) पूर्ववर्ती धारा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1976 के अधिनियम सं० 32 की धारा 4 द्वारा (5-3-1976 से) अध्याय 5क” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(2) जहां कि कर्मकार नियोजक से कोई धन या ऐसी प्रसुविधा, जो धन के रूप में संगणित की जा सकती है, प्राप्त करने का हकदार है और शोध्य धन की रकम के बारे में या उस रकम के बारे में, जितनी ऐसी प्रसुविधा के लेखे संगणित की जानी चाहिए, कोई प्रश्न पैदा होता है, तो वह प्रश्न, उन नियमों के अध्यधीन रहते हुए जो इस अधिनियम के अधीन बनाए जाएं, उस श्रम न्यायालय द्वारा जिसे समुचित सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे विनिश्चित किया जा सकेगा 1[तीन मास से अनधिक कालावधि के भीतर :]
1[परन्तु जहां श्रम न्यायालय का पीठासीन अधिकारी ऐसा करना आवश्यक या समीचीन समझता है, वहां वह ऐसे कारणों सहित जो अभिलिखित किए जाएं, ऐसी कालावधि को ऐसी अतिरिक्त कालावधि के लिए, जो वह उचित समझे, विस्तारित कर सकेगा ।]
(3) किसी प्रसुविधा का धन-मूल्य संगणित करने के प्रयोजनों के लिए, श्रम न्यायालय, यदि वह ऐसा करना ठीक समझे, एक आयुक्त की नियुक्ति कर सकेगा जो ऐसा साक्ष्य लेने के पश्चात् जो आवश्यक हो, श्रम न्यायालय को रिपोर्ट निवेदित करेगा और श्रम न्यायालय आयुक्त की रिपोर्ट और मामले की अन्य परिस्थितियों पर विचार करने के पश्चात् रकम अवधारित करेगा ।
(4) श्रम न्यायालय का विनिश्चय उसके द्वारा समुचित सरकार को अग्रेषित किया जाएगा और श्रम न्यायालय द्वारा शोध्य पाई गई रकम उपधारा (1) में उपबन्धित रीति से वसूल की जा सकेगी ।
(5) जहां कि एक ही नियोजक के अधीन नियोजित कर्मकार उससे कोई धन या कोई ऐसी प्रसुविधा, जो धन के रूप में संगणित की जा सकती है, प्राप्त करने के हकदार हों, वहां उन नियमों के अध्यधीन रहते हुए जो इस निमित्त बनाए जाएं, ऐसे कितने ही कर्मकारों की ओर से या उनकी बाबत एक ही आवेदन शोध्य रकम की वसूली के लिए किया जा सकेगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा में “श्रम न्यायालय" के अन्तर्गत ऐसा न्यायालय आता है जो किसी भी राज्य में प्रवृत्त किसी ऐसी विधि के अधीन गठित किया गया हो जो औद्योगिक विवादों के अन्वेषण और समझौते से संबंधित है ।]]
34. अपराधों का संज्ञान-(1) कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का या ऐसे किसी अपराध के दुष्प्रेरण का संज्ञान, समुचित सरकार द्वारा या उसके अधिकार के अधीन किए गए परिवाद पर करने के सिवाय, नहीं करेगा ।
(2) 2[महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट] के न्यायालय के अवर कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।
35. व्यक्तियों का संरक्षण-(1) किसी ऐसा हड़ताल या तालाबन्दी में, जो इस अधिनियम के अनुसार अवैध है, भाग लेने से या भाग लेते रहने से इंकार करने वाला कोई भी व्यक्ति, ऐसे इंकार के कारण या इस धारा के अधीन उसके द्वारा की गई किसी कार्रवाई के कारण, व्यवसाय संघ या सोसाइटी के नियमों में किसी तत्प्रतिकूल बात के होते हुए भी, किसी व्यवसाय संघ या सोसाइटी से, निष्कासित किए गए जाने का, या किसी जुर्माने या शास्ति का, या किसी ऐसे अधिकार या प्रसुविधा से, जिसके लिए वह या उसके विधिक प्रतिनिधि अन्यथा हकदार हों, वंचित किए जाने का भागी नहीं होगा और न उस संघ या सोसाइटी के अन्य सदस्यों की तुलना में, प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः, किसी भी विषय में किसी निर्योग्यता के अधीन या किसी अहितकर स्थिति में रखे जाने का भागी होगा ।
(2) किसी व्यवसाय संघ या सोसाइटी के नियमों में की कोई भी बात, जो विवादों का किसी भी रीति से समझौता करने की अपेक्षा करती है, इस धारा द्वारा सुनिश्चित किए गए अधिकार या छूट को प्रवर्तित कराने के लिए की गई कार्यवाही को लागू नहीं होगी और ऐसी किसी कार्यवाही में सिविल न्यायालय किसी ऐसे व्यक्ति के लिए, जिसे किसी व्यवसाय संघ या सोसाइटी की सदस्यता से निष्कासित कर दिया गया है, यह आदेश देने के बदले कि उसे फिर से सदस्य बना लिया जाए यह आदेश दे सकेगा कि उस व्यवसाय संघ या सोसाइटी की निधियों में से प्रतिकर या नुकसानी के तौर पर ऐसी राशि दी जाए जिसे वह न्यायालय न्यायसंगत समझे ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 19 द्वारा (21-8-1984 से) अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 20 द्वारा (21-8-1984 से) कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
1[36. पक्षकारों का प्रतिनिधित्व-(1) वह कर्मकार जो विवाद में पक्षकार है इस बात का हकदार होगा कि इस अधिनियम के अधीन किसी भी कार्यवाही में उसका प्रतिनिधित्व-
(क) उस रजिस्ट्रीकृत व्यवसाय संघ की, जिसका वह सदस्य है, 2[कार्यपालिका के किसी सदस्य या अन्य पदाधिकारी] द्वारा,
(ख) व्यवसाय संघों के उस परिसंघ की, जिससे खंड (क) में निर्दिष्ट व्यवसाय संघ संबद्ध है, 1[कार्यपालिका के किसी सदस्य या अन्य पदाधिकारी] द्वारा,
(ग) जहां कि कर्मकार किसी व्यवसाय संघ का सदस्य नहीं है वहां, उस उद्योग से, जिसमें कर्मकार नियोजित है, संसक्त किसी व्यवसाय संघ की 1[कार्यपालिका के किसी सदस्य या अन्य पदाधिकारी] द्वारा या उस उद्योग में नियोजित ऐसे अन्य कर्मकार द्वारा जो ऐसी रीति से प्राधिकृत है, जैसी विहित की जाए,
किया जाए ।
(2) वह नियोजक जो विवाद में पक्षकार है इस बात का हकदार होगा कि इस अधिनियम के अधीन की किसी भी कार्यवाही में उसका प्रतिनिधित्व-
(क) उस नियोजक-संगम के, जिसका वह सदस्य है, किसी अधिकारी द्वारा;
(ख) नियोजक-संगमों के, उस परिसंघ के, जिससे खंड (क) में निर्दिष्ट संगम संबद्ध है, किसी अधिकारी द्वारा;
(ग) जहां कि नियोजक किसी नियोजक-संगम का सदस्य नहीं है, वहां, उस उद्योग से, जिसमें वह नियोजक लगा हुआ है संसक्त नियोजक-संगम के ऐसे अधिकारी द्वारा या उसमें लगे हुए ऐसे अन्य नियोजक द्वारा जो ऐसी रीति से प्राधिकृत है, जैसी विहति की जाए,
किया जाए ।
(3) विवाद का कोई भी पक्षकार इस बात का हकदार न होगा कि इस अधिनियम के अधीन की सुलह कार्यवाहियों में या न्यायालय के समक्ष की कार्यवाहियों में उसका प्रतिनिधित्व किसी विधि-व्यवसायी द्वारा किया जाए ।
(4) विवाद के किसी भी पक्षकार का प्रतिनिधित्व 3[श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण के समक्षट किसी कार्यवाही में, कार्यवाही के अन्य पक्षकारों की सम्मति से और, 4[यथास्थिति, श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण की इजाजत से] विधि-व्यवसाय द्वारा किया जा सकेगा ।]
1[36क. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि समुचित सरकार की राय में किसी अधिनिर्णय या समझौते के किसी उपबन्ध के निर्वचन के बारे में कोई कठिनाई या शंका उद्भूत होती है, तो वह उस प्रश्न को उस श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण को निर्देशित कर सकेगी जिसे वह ठीक समझे ।
(2) श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण, जिसे ऐसा प्रश्न निर्देशित किया जाता है, पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, ऐसे प्रश्न का विनिश्चय करेगा और उसका विनिश्चय अन्तिम तथा ऐसे सभी पक्षकारों पर आबद्धकर होगा ।]
2[36ख. छूट देने की शक्ति-जहां, समुचित सरकार का किसी औद्योगिक स्थापन या उपक्रम या उस सरकार के किसी विभाग द्वारा चलाए गए औद्योगिक स्थापनों या उपक्रमों के किसी वर्ग के बारे में यह समाधान हो जाता है कि ऐसे स्थापन या उपक्रम या स्थापनों या उपक्रमों के वर्ग में नियोजित कर्मकारों की बाबत औद्योगिक विवादों के अन्वेषण और निपटारे के लिए पर्याप्त उपबन्ध विद्यमान हैं, वहां वह राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के सभी या किन्हीं उपबंधों से ऐसे स्थापन या उपक्रम या स्थापनों या उपक्रमों के वर्ग को शर्त सहित या शर्त के बिना छूट दे सकेगी ।]
- 1950 के अधिनियम सं० 48 की धारा 34 तथा अनुसूची द्वारा मूल धारा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1971 के अधिनियम सं० 45 की धारा 6 द्वारा (15-12-1971 से) अधिकारी के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 24 द्वारा (10-3-1957 से) अधिकारी के समक्ष के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 24 द्वारा (10-3-1957 से) अधिकरण के इजाजत की के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 25 द्वारा (10-3-1957 से) अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 21 द्वारा (21-8-1984 से) अंतःस्थापित ।
37. इस अधिनियम के अधीन की गई कार्रवाई के लिए परित्राण-कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या किए जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए किसी व्यक्ति के विरुद्ध न होगी ।
38. नियम बनाने की शक्ति-(1) समुचित सरकार, पूर्व प्रकाशन की शर्त के अध्यधीन रहते हुए, इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने के प्रयोजन के लिए नियम बिना सकेगी ।
(2) विशिष्टतः और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी विषयों के लिए या उनमें से किसी के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात्ः-
(क) सुलह अधिकारियों, बोर्डों, न्यायालयों, 3[श्रम न्यायालयों, अधिकरणों और राष्ट्रीय अधिकरण] की शक्तियां और प्रक्रिया, जिनके अन्तर्गत साक्षियों को समन करने, जांच या अन्वेषण की विषय-वस्तु से सुसंगत दस्तावेजों को पेश करने, गणपूर्ति के लिए आवश्यक सदस्य-संख्या और रिपोर्टों तथा अधिनिर्णयों को निवेदित करने की रीति विषयक नियम आते हैं;
4[(कक) माध्यस्थम् करार का प्ररूप, वह रीति जिससे पक्षकार उस पर हस्ताक्षर कर सकेंगे, 5[वह रीति जिससे धारा 10क की उपधारा (3क) के अधीन अधिसूचना निकाली जा सकेगी,] माध्यस्थम् करार में नामित मध्यस्थ की शक्तियां और वह प्रक्रिया जिसका उसके द्वारा अनुसरण किया जाना है;
(ककक) इस अधिनियम के अधीन की कार्यवाहियों में असेसरों की नियुक्ति;]
6। । । ।.0 ।
(ख) कर्म समितियों का गठन उसके कृत्य और उनमें की रिक्तियों का भरा जाना और वह प्रक्रिया जिसका अनुसरण ऐसी समितियों द्वारा अपने कर्तव्यों के निर्वहन में किया जाना है;
7[(ग) श्रम न्यायालय, अधिकरण और राष्ट्रीय अधिकरण के पीठासीन अधिकारियों के वेतन और भत्ते तथा उनकी नियुक्ति के लिए निर्बंधन और शर्तें, जिनके अंतर्गत न्यायालयों, बोर्डों के सदस्यों और असेसरों तथा साक्षियों को अनुज्ञेय भत्ते भी हैं;]
(घ) वह अनुसचिवीय स्थापन जो न्यायालय, बोर्ड, 1[श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण] को आबंटित किया जा सकेगा और ऐसे स्थापनों के सदस्य को संदेय संबलम् और भत्ते;
(ङ) वह रीति जिससे और वे व्यक्ति जिनके द्वारा और जिन्हें हड़ताल या तालाबन्दी की सूचना दी जा सकेगी औऱ वह रीति जिससे ऐसी सूचनाएं संसूचित की जाएंगी;
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 26 द्वारा (10-3-1957 से) और अधिकरण के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 26 द्वारा (10-3-1957 से) अंतःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 20 द्वारा (19-12-1964 से) अंतःस्थापित ।
- 2010 के अधिनियम सं० 24 की धारा 8 द्वारा लोप किया गया ।
- 2010 के अधिनियम सं० 24 की धारा 8 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 26 द्वारा (10-3-1957 से) या अधिकरण के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(च) वे शर्तें जिनके अध्यधीन रहते हुए पक्षकारों का प्रतिनिधित्व विधि-व्यवसायियों द्वारा किसी न्यायालय, 5[श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण] के समक्ष इस अधिनियम के अधीन की कार्यवाहियों में किया जा सकेगा;
(छ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या किया जाए ।
(3) इस धारा के अधीन बनाए गए नियम यह उपबन्ध कर सकेंगे कि उनका उल्लंघन पचास रुपए से अनधिक के जुर्माने से दण्डनीय होगा ।
2[(4) इस धारा के अधीन बनाए गए सभी नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथासंभव शीघ्र, राज्य विधान-मंडल के समक्ष, या जहां कि समुचित सरकार केन्द्रीय सरकार है वहां संसद् के दोनों सदनों के समक्ष, रखे जाएंगे ।]
3[(5) इस धारा के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा 4[दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्वट दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
5[39. शक्तियों का प्रत्यायोजन-समुचित सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों के अधीन उसके द्वारा प्रयोक्तव्य कोई शक्ति ऐसे विषयों के संबंध में और ऐसी शर्तों के, यदि कोई हों, अध्यधीन जिन्हें निदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, यथानिम्नलिखित भी प्रयोक्तव्य होगी-
(क) जहां कि समुचित सरकार केन्द्रीय सरकार हो वहां केन्द्रीय सरकार के अधीनस्थ ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा या राज्य सरकार द्वारा, या राज्य सरकार के अधीनस्थ ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा, जैसा अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए; तथा
(ख) जहां कि समुचित सरकार राज्य सरकार हो, वहां राज्य सरकार के अधीनस्थ ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा, जैसा अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए ।]
6[40. अनुसूचियों को संशोधित करने की शक्ति-(1) यदि समुचित सरकार की यह राय हो कि ऐसा करना लोकहित में समीचीन या आवश्यक है, तो वह पहली अनुसूची में कोई उद्योग, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा जोड़ सकेगी, ऐसी किसी अधिसूचना के निकाले जाने पर, पहली अनुसूची तद्नुसार संशोधित समझी जाएगी ।
(2) केन्द्रीय सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा दूसरी अनुसूची या तीसरी अनुसूची में परिवर्धन कर सकेगी; परिवर्तन कर सकेगी या संशोधन कर सकेगी और ऐसी किसी अधिसूचना के निकाले जाने पर, यथास्थिति, दूसरी अनुसूची या तीसरी अनुसूची तद्नुसार संशोधित समझी जाएगी ।
(3) हर ऐसी अधिसूचना, निकाले जाने के पश्चात् यथासंभव शीघ्र, यदि अधिसूचना राज्य सरकार द्वारा निकाली गई है तो राज्य के विधान-मंडल के समक्ष या यदि अधिसूचना केन्द्रीय सरकार द्वारा निकाली गई है तो संसद् के समक्ष रखी जाएगी ।]
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 26 द्वारा (10-3-1957 से) अंतःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 20 द्वारा (19-12-1964 से) अंतःस्थापित ।
- 1976 के अधिनियम सं० 32 की धारा 5 द्वारा (5-3-1976 से) कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 27 द्वारा (7-9-1956 से) धारा 39 के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 21 द्वारा (19-12-1964 से) धारा 40 के स्थान पर प्रतिस्थापित जो 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 28 द्वारा अन्तःस्थापित की गई थी । मूल धारा 40, 1950 के अधिनियम सं० 35 की धारा 2 तथा अनुसूची 1 द्वारा निरसित कर दी गई थी ।-------------------------
1[पहली अनुसूची
धारा 2(ढ)(ध्त्) देखिए]
वे उद्योग जो धारा 2 के खण्ड (ढ) के उपखण्ड (ध्त्) के अधीन लोक उपयोगी सेवाएं घोषित किए जा सकेंगे
1. यात्रियों या माल के 2[भूमि या जल मार्ग द्वारा] वहन के लिए (रेल से भिन्न) परिवहन ।
2. बैंकाकारी ।
3. सीमेन्ट ।
4. कोयला ।
5. सूती वस्त्र ।
6. खाद्य पदार्थ ।
7. लोहा और इस्पात ।
8. रक्षा स्थापन ।
9. अस्पतालों और औषधालयों में सेवा ।
10. अग्निशामक सेवा ।
3[11. भारत सरकार की टकसालें ।]
12. भारत प्रतिभूति मुद्रणालय ।
13. ताम्र खनन ।
14. मीसा खनन ।
15. जस्ता खनन ।
16. लोह अयस्क खनन ।
17. किसी तेल क्षेत्र में सेवा ।
4॥।
19. यूरेनियम उद्योग में सेवा ।
20. पाइराइटीज खनन ।
21. सीक्योरिटी पेपर मिल्स, होशंगाबाद ।]
22. बैंक नोट प्रेस देवास में सेवा ।
23. फॉस्फराईट खनन ।
24. मॅग्नेसाईट खनन ।]
- 1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 29 द्वारा (10-3-1957 से) मूल अनुसूची के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 22 द्वारा (19-12-1964 से) भूमि, जल या वायु मार्ग द्वारा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- इस अधिनियम की धारा 40 के अधीन समय-समय पर जारी की गई अधिसूचना द्वारा ये प्रविष्टियां अनुसूची में जोड़ी गई थीं ।
- 1971 के अधिनियम सं० 45 की धारा 7 द्वारा (15-12-1971 से) प्रविष्टि 18 का लोप किया गया ।
दूसरी अनुसूची
(धारा 7 देखिए)
श्रम न्यायालयों की अधिकारिता के अन्दर के विषय
1. स्थायी आदेशों के अधीन किसी नियोजक द्वारा पारित आदेश का औचित्य या वैधता;
2. स्थायी आदेशों को लागू करना और उनका निर्वचन;
3. कर्मकारों का उन्मोचन या पदच्युति, जिसके अन्तर्गत दोषतः पदच्युत कर्मकारों का पुनःस्थापन या उन्हें अनुतोष का अनुदान आता है;
4. किसी रूढ़िजन्य रियायत या विशेषाधिकार का प्रत्याहरण;
5. किसी हड़ताल या तालाबंदी का अवैध होना या न होना; तथा
6. तीसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट विषयों से भिन्न सभी विषय ।
------------
तीसरी अनुसूची
(धारा 7क देखिए)
औद्योगिक अधिकरणों की अधिकारिता के अन्दर के विषय
1. मजदूरी, जिसके अन्तर्गत संदाय की कालावधि और ढंग आता है;
2. प्रतिकरात्मक और अन्य भत्ते;
3. काम के घंटे और विश्राम-अन्तराल;
4. मजदूरी सहित छुट्टी और अवकाश दिन;
5. बोनस, लाभों का अंश बांटना, भविष्य-निधि और उपदान;
6. स्थायी आदेशों के अनुसार किए जाने से अन्यथा पारी में काम किया जाना;
7. श्रेणियों में वर्गीकरण;
8. अनुशासन के नियम;
9. सुव्यवस्थीकरण;
10. कर्मकारों की छंटनी और स्थापन का बन्द होना; तथा
11. कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए ।
--------------
चौथी अनुसूची
(धारा 9क देखिए)
सेवा की वे शर्तें जिन्हें बदलने के लिए सूचना दी जानी है
1. मजदूरी, जिसके अन्तर्गत संदाय की कालावधि और ढंग आता है;
2. किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन किसी भविष्य-निधि या पेंशन-निधि में या कर्मकारों के फायदे के लिए नियोजक द्वारा संदत्त या संदेय अभिदाय;
3. प्रतिकरात्मक और अन्य भत्ते;
4. काम के घंटे और विश्राम-अन्तराल;
5. मजदूरी सहित छुट्टी और अवकाश दिन;
6. स्थायी आदेशों के अनुसार किए जाने से अन्यथा पारी में काम आरम्भ किया जाना, उसमें परिवर्तन या उसका बन्द किया जाना;
7. श्रेणियों में वर्गीकरण;
8. किसी रूढ़िक रियायत या विशेषाधिकार का प्रत्याहरण या प्रथा में तब्दीली;
9. वहां तक के सिवाय जहां तक कि वे स्थायी आदेशों में उपबन्धित किए गए हैं, अनुशासन के नए नियम प्रवृत्त करना या विद्यमान नियमों में परिवर्तन करना;
10. संयंत्र या तकनीक का ऐसा सुव्यवस्थीकरण, मानकीकरण या सुधारक जिससे कर्मकारों की छंटनी संभाव्य हो;
11. किसी उपजीविका या प्रक्रिया या विभाग या पारी में नियोजित किए गए या किए जाने वाले व्यक्तियों की संख्या में (आकस्मिक से भिन्न) कोई ऐसी वृद्धि या कमी करना, जो 1[ऐसी परिस्थितियों के कारण न हुई हों, जिन पर नियोजक का कोई नियंत्रण नहीं है ।]
2[पांचवीं अनुसूची
[धारा 2(दक) देखिए]
अनुचित श्रम व्यवहार
I. नियोजकों और नियोजकों के व्यवसाय संघों की ओर से
1. कोई व्यवसाय संघ संगठित करने, बनाने, उसमें सम्मिलित होने या उसकी सहायता करने अथवा सामूहिक रूप से सौदा करने या अन्य पारस्परिक सहायता या सुरक्षा के प्रयोजनों के लिए मिलकर क्रियाकलाप करने के कर्मकारों के अधिकारों का उनके द्वारा प्रयोग किए जाने में हस्तक्षेप करना, उन्हें अवरुद्ध करना या उन पर दबाव डालना, अर्थात्ः-
(क) यदि कर्मकार किसी व्यवसाय संघ में सम्मिलित होंगे तो उन्हें सेवोन्मुक्त या पदच्युत करने की धमकी देना;
(ख) यदि व्यवसाय संघ संगठित किया जाएगा तो तालाबन्दी या कामबन्दी की धमकी देना;
(ग) व्यवसाय संघ के संगठनात्मक प्रयासों को निष्फल करने की दृष्टि से व्यवसाय संघ संगठन के संकटमय समयों पर मजदूरी वृद्धि मंजूर करना ।
2. किसी व्यवसाय संघ पर प्रभुत्व जमाना, ऐसे किसी व्यवसाय संघ में हस्तक्षेप करना या उसे वित्तीय या अन्यथा, सहायता देना, अर्थात्ः-
(क) नियोजक द्वारा अपने कर्मकारों का व्यवसाय संघ संगठित करने में सक्रिय दिलचस्पी लेना, और
(ख) जहां कोई व्यवसाय संघ मान्यताप्राप्त व्यवसाय संघ नहीं है वहां अपने कर्मकारों या उनके सदस्यों के संगठित करने का प्रयास करने वाले अनेक व्यवसाय संघों में से किसी एक के प्रति नियोजक द्वारा पक्षपात दर्शित करना या उनका पक्ष लेना ।
3. कर्मकारों के ऐसे व्यवसाय संघों को स्थापित करना जो नियोजक द्वारा प्रायोजित हों ।
4. कर्मकारों के किसी व्यवसाय संघ की सदस्यता को किसी कर्मकार के प्रति भेदभाव करके प्रोत्साहित या हतोत्साहित करना, अर्थात्ः-
(क) किसी कर्मकार को इस कारण सेवोन्मुक्त या दण्डित करना कि उसने अन्य कर्मकारों को किसी व्यवसाय संघ में सम्मिलित होने या उसे संगठित करने के लिए प्रेरित किया था;
(ख) किसी कर्मकार को, किसी हड़ताल (ऐसी हड़ताल न हो जो इस अधिनियम के अधीन अवैध हड़ताल समझी जाती है) में शामिल होने के कारण सेवोन्मुक्त या पदच्युत करना;
(ग) किसी कर्मकार की ज्येष्ठता को उसके व्यवसाय संघ से संबंधित क्रियाकलापों के कारण परिवर्तित करना;
(घ) किसी कर्मकार की उसके व्यवसाय संघ संबंधी क्रियाकलापों के कारण उच्च पद पर प्रोन्नत करने से इंकार करना;
(ङ) कुछ कर्मकारों को योग्यता के बिना इस दृष्टि से प्रोन्नति देना कि अन्य कर्मकारों के बीच वैमनस्य पैदा हो या उनके व्यवसाय संघ की ताकत घटे;
(च) व्यवसाय संघों के पदाधिकारियों या सक्रिय सदस्यों को उनके व्यवसाय संघ संबंधी क्रियाकलापों के कारण सेवोन्मुक्त करना ।
- 1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 23 द्वारा (19-12-1964 से) बलपूर्वक की गई बातों के कारण न हुई हो के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 23 द्वारा (21-8-1984 से) अंतःस्थापित ।
5. कर्मकारों को-
(क) दण्डित किए जाने की दृष्टि से;
(ख) सद्भाव के बिना, किन्तु नियोजक के अधिकारों का आभासी प्रयोग करके;
(ग) किसी कर्मकार को किसी आपराधिक मामले में मिथ्या साक्ष्य पर या गढ़े हुए साक्ष्य पर मिथ्या आलिप्त करके;
(घ) स्पष्टतया मिथ्या कारणों से;
(ङ) इजाजत के बिना अनुपस्थिति के लिए असत्य या गढ़े हुए अभिकथनों पर;
(च) आंतरिक जांच के संचालन में नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों की पूर्णतः अवेहलना करके या असम्यक् जल्दबाजी करके;
(छ) मामूली या तकनीकी प्रकृति के अवचार के कारण और उस विशेष अवचार की प्रकृति पर ध्यान दिए बिना या कर्मकार के पिछले अभिलेख या सेवा पर ध्यान दिए बिना जिससे कि अवचार के मुकाबले दण्ड अधिक हो जाए,
सेवोन्मुक्त या पदच्युत करना ।
6. कर्मकारों द्वारा किए जा रहे नियमित प्रकृति के कार्य को समाप्त करने के लिए और ऐसे कार्य को ठेकेदारों को देने के लिए जो हड़ताल तोड़ने के लिए हो ।
7. किसी कर्मकार को एक स्थान से दूसरे स्थान पर सद्भाव के बिना, प्रबन्ध की नीति अनुसरण करने के बहाने से, स्थानान्तरण करना ।
8. ऐसे कर्मकारों पर, जौ वैध हड़ताल कर रहे हैं, पुनःकाम करने की अनुज्ञा देने के पूर्व शर्त के रूप में अच्छे आचरण के बंधपत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए जोर डालना ।
9. योग्यता का ध्यान रखे बिना कर्मकार को किसी एक समूह के लिए पक्ष लेना या उनके लिए पक्षपात करना ।
10. स्थायी कर्मकारों की हैसियत और विशेषाधिकारों से वंचित करने के उद्देश्य से कर्मकारों को बदली", आकस्मिक या अस्थायी रूप में नियोजित करना और उन्हें उस रूप में वर्षों तक चलते रहने देना ।
11. किसी औद्योगिक विवाद से संबंधित किसी जांच या कार्यवाही में नियोजक के विरुद्ध आरोप फाइल करने या साक्ष्य देने के लिए किसी कर्मकार को सेवोन्मुक्त या उसके विरुद्ध भेदभाव करना ।
12. ऐसी हड़ताल के दौरान, जो अवैध हड़ताल नहीं है, कर्मकारों को भर्ती करना ।
13. अधिनिर्णय, समझौता या करार को कार्यान्वित करने में असफलता ।
14. बल प्रयोग या हिंसा के कार्यों में शामिल होना ।
15. मान्यताप्राप्त व्यवसाय संघों के साथ सद्भावपूर्वक सामूहिक रूप से सौदा करने से इन्कार करना ।
16. ऐसी तालाबन्दी के लिए प्रस्ताव करना या उसे चालू रहने देना जो इस अधिनियम के अधीन अवैध समझा जाएगी ।
II. कर्मकारों और कर्मकारों के व्यवसाय संघों की ओर से
1. इस अधिनियम के अधीन अवैध समझी जाने वाली हड़ताल के लिए सलाह देना या सक्रिय रूप से इसके लिए समर्थन करना या दुष्प्रेरित करना ।
2. कर्मकारों के स्वयं-संगठन के अधिकार के प्रयोग पर दबाव डालना या व्यवसाय संघ में सम्मिलित होना या किसी व्यवसाय संघ में सम्मिलित होने से प्रविरत रहना, अर्थात्ः-
(क) किसी व्यवसाय संघ या उसके सदस्यों द्वारा ऐसी रीति से धरना देना जिसके फलस्वरूप हड़ताल न करने वाले कर्मकार अपने कार्य स्थानों में प्रवेश करने से शारीरिक रूप से वंचित रहे;
(ख) हड़ताल न करने वाले कर्मकारों या प्रबन्धकीय कर्मचारिवृन्द के विरुद्ध बल प्रयोग या हिंसा कार्यों में शामिल होना या हड़ताल के संबंध में अभित्रास की धमकियां देना ।
3. मान्यताप्राप्त संघ द्वारा नियोजक के साथ सद्भावपूर्वक सामूहिक रूप से सौदा करने से इन्कार करना ।
4. सौदा प्रतिनिधि प्रमाणन के विरुद्ध दबाव डालने वाले क्रियाकलापों में शामिल होना ।
5. दबाव डालने वाले ऐसे कार्य, जैसे कि जानबूझकर धीमी गति" काम के घंटों के पश्चात् काम के परिसर पर लेट जाना या प्रबंधकीय सदस्यों में से किसी एक का या अन्य कर्मचारिवृन्द का घेराव" करना, प्रदर्शित, प्रोत्साहित या दुष्प्रेरित करना ।
6. नियोजकों या प्रबंधकीय कर्मचारिवृन्द के सदस्यों के निवास-स्थानों पर प्रदर्शन करना ।
7. उद्योग से संबंधित नियोजक की सम्पत्ति को नष्ट करने के लिए उद्दीप्त करना या जानबूझकर शामिल होना ।
8. किसी कर्मकार के विरुद्ध उसे काम पर जाने से प्रविरत करने की दृष्टि से बल या हिंसा के कार्यों में शामिल होना या अभित्रास की धमकियां देना ।]
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