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दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र विधि (विशेष उपबंध) अधिनियम, 2009 ( National Capital Territory Of Delhi Laws (Special Provisions) Act, 2009 )


 

दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र विधि (विशेष उपबंध) अधिनियम, 2009

(2009 का अधिनियम संख्यांक 24)

[16 मार्च, 2009]

दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र के लिए 31 दिसम्बर, 2009 तक की

और अवधि के लिए विशेष उपबंध करने और

उनसे संबंधित या उनके आनुषंगिक

विषयों के लिए

अधिनियम

प्रवास और अन्य कारणों से दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र की जनसंख्या में अपूर्व वृद्धि हुई है, जिसके परिणामस्वरूप भूमि और अवसंरचना पर अत्यधिक दबाव बढ़ा है, जिससे ऐसे अधिक्रमण या अप्राधिकृत विकास हुए हैं जो दिल्ली मास्टर प्लान, 2001 और सुसंगत अधिनियमों तथा उनके अधीन बनाई गई भवन निर्माण संबंधी उपविधियों में यथा उपबंधित योजनाबद्ध विकास की संकल्पना के अनुरूप नहीं हैं;

और वर्ष 2021 के लिए परिदृश्य सहित सामाजिक, वित्तीय और अन्य आधारिक वास्तविकताओं के मुकाबले में शहरी विकास में उभरते हुए नए आयामों को ध्यान में रखते हुए केन्द्रीय सरकार द्वारा दिल्ली मास्टर प्लान, 2001 में व्यापक रूप से उपांतरण किए गए हैं और उन्हें 7 फरवरी, 2007 को अधिसूचित किया गया है;

और वर्ष 2021 के लिए परिदृश्य सहित दिल्ली मास्टर प्लान में शहरी निर्धनों के लिए आवास नीतियों के साथ ही अनौपचारिक सेक्टर से निपटने के लिए विनिर्दिष्ट रूप से उपबंध किया गया है;

और दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र में स्थानीय प्राधिकारियों द्वारा शहरी पथ विक्रेताओं के लिए राष्ट्रीय नीति और दिल्ली मास्टर प्लान, 2021 के अनुसार शहरी पथ विक्रेताओं के विनियमन के लिए एक रणनीति और स्कीम तैयार की गई है ;

और अनधिकृत कालोनियों, गांव के आबादी क्षेत्र और इसके विस्तार के विनियमितीकरण के संबंध में केन्द्रीय सरकार द्वारा अंतिम रूप से तैयार की गई नीति पर आधारित मार्गदर्शक सिद्धांत और विनियम इस प्रयोजन के लिए जारी किए गए हैं;

और फेरीवालों तथा शहरी पथ विक्रेताओं से संबंधित स्कीम के व्यवस्थित क्रियान्वयन के लिए और अनधिकृत कॉलोनियों, गांव के आबादी क्षेत्र और उसके विस्तार के नियमितीकरण के लिए कुछ समय की आवश्यकता है;

और दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में गंदी बस्ती के निवासियों और झुग्गी-झोंपड़ी क्लस्टरों में रहने वाले लोगों के पुनःस्थापन और पुनर्वास के लिए पुनरीक्षित नीति और सुव्यवस्थित व्यवस्था सरकार के विचाराधीन हैं ;

और ऐसे विद्यमान फार्म हाऊसों के संबंध में जो भवन निर्माण की अनुज्ञेय सीमाओं के परे निमार्ण करने में लगे हुए हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि भूमि पर बने विद्यालयों, औषधालयों, धार्मिक संस्थाओं और सांस्कृतिक संस्थाओं, कृषि निवेशों या उपज  (जिसमें दुग्ध उद्योग और कुक्कट उद्योग सम्मिलित हैं) के लिए प्रयुक्त भंडारों, भांडागारों और गोदामों के संबंध में नीति केन्द्रीय सरकार के विचाराधीन है ;

और दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र के क्षेत्रों के लिए 31 दिसंबर, 2008 तक की अवधि के लिए विशेष उपबंध करने हेतु 5 दिसम्बर, 2007 को दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र विधि (विशेष उपबंध) अधिनियम, 2007 (2007 का 43) अधिनियमित किया गया था और वह 31 दिसम्बर, 2008 के पश्चात् प्रवर्तन में नहीं रहा है ;

और यह समीचीन है कि उक्त अधिनियम को 31 दिसंबर, 2009 तक की अवधि के लिए जारी रखते हुए ऊपर निर्दिष्ट नीतियों के अंतर्गत आने वाले व्यक्तियों की बाबत सम्बद्ध अभिकरण द्वारा किसी कार्रवाई के विरुद्ध दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र की जनता को अस्थायी राहत देने और अपरिहार्य कठिनाइयों तथा अपूरणीय हानि को कम करने के लिए उपबंध करने हेतु दिल्ली मास्टर प्लान, 2021 के निबंधनों के अनुरूप कोई विधि हो ; 

भारत गणराज्य के साठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार, प्रारंभ और अवधि-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र विधि (विशेष उपबंध) अधिनियम, 2009 है ।

(2) इसका विस्तार दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र पर होगा ।

(3) यह 1 जनवरी, 2009 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।

(4) यह 31 दिसंबर, 2009 को उन बातों के सिवाय प्रवर्तन में नहीं रहेगा, जो ऐसे प्रवर्तन में न रहने के पूर्व की गई हों या जिनका किए जाने से लोप किया गया हो, और ऐसे प्रवर्तन में न रहने पर साधारण खंड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 6 ऐसे लागू होगी मानो यह अधिनियम, केन्द्रीय अधिनियम द्वारा निरसित कर दिया गया हो ।

2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) भवन निर्माण संबंधी उपविधियों" से भवनों से संबंधित दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957(1957 का 66) की धारा 481 के अधीन बनाई गई उपविधियां या नई दिल्ली में यथाप्रवृत्त, पंजाब नगरपालिका अधिनियम, 1911 (1911 का पंजाब अधिनियम 3) की धारा 188, धारा 189 की उपधारा (3) और धारा 190 की उपधारा (1) के अधीन बनाई गई उपविधियां या दिल्ली विकास अधिनियम, 1957 (1957 का 61) की धारा 57 की उपधारा (1) के अधीन बनाए गए विनियम अभिप्रेत हैं;

(ख) दिल्ली" से दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 (1957 का 66) की धारा 2 के खंड (11) में यथापरिभाषित, दिल्ली छावनी को छोड़कर दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र का संपूर्ण क्षेत्र अभिप्रेत है;

(ग) अधिक्रमण" से आवासिक उपयोग या वाणिज्यिक उपयोग या किसी अन्य उपयोग के लिए अस्थायी, अर्धस्थायी या स्थायी निर्माण के रूप में सरकारी भूमि या सार्वजनिक भूमि का अप्राधिकृत अधिभोग अभिप्रेत है;

(घ) स्थानीय प्राधिकारी" से दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 (1957 का 66) के अधीन स्थापित दिल्ली नगर निगम या नई दिल्ली नगरपालिका परिषद् अधिनियम, 1994 (1994 का 44) के अधीन स्थापित नई दिल्ली नगरपालिका परिषद् या दिल्ली विकास अधिनियम, 1957 (1957 का 61) के अधीन स्थापित दिल्ली विकास प्राधिकरण अभिप्रेत है, जो अपनी-अपनी अधिकारिता के अधीन क्षेत्रों के संबंध में नियंत्रण का प्रयोग करने के लिए विधिक रूप से हकदार हैं;

(ङ) मास्टर प्लान" से दिल्ली विकास अधिनियम, 1957 (1957 का 61) के अधीन अधिसूचना सं का आ 141(अ), तारीख 7 फरवरी, 2007 द्वारा अधिसूचित वर्ष 2021 के लिए परिदृश्य के साथ दिल्ली मास्टर प्लान अभिप्रेत है;

(च) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;

(छ) दंडात्मक कार्रवाई" से अप्राधिकृत विकास के विरुद्ध किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा सुसंगत विधि के अधीन की गई कार्रवाई अभिप्रेत है और इसमें परिसरों को ढा देना, सील करना और व्यक्तियों या उनके कारबारी स्थापन को, चाहे न्यायालय के आदेशों के अनुसरण में या अन्यथा, विद्यमान स्थान से विस्थापित करना भी सम्मिलित होगा;

(ज) सुसंगत विधि" से निम्नलिखित अभिप्रेत है,-

(i) दिल्ली विकास प्राधिकरण की दशा में, दिल्ली विकास अधिनियम, 1957 (1957 का 61)  ;

(ii) दिल्ली नगर निगम की दशा में, दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 (1957 का 66) ; और

(iii) नई दिल्ली नगरपालिका परिषद् की दशा में, नई दिल्ली नगरपालिका परिषद् अधिनियम,     1994 (1994 का 44);

(झ) अप्राधिकृत विकास" से मंजूर की गई योजनाओं के उल्लंघन में या योजनाओं की मंजूरी अभिप्राप्त किए बिना या, यथास्थिति, मास्टर प्लान या क्षेत्रीय प्लान या अभिन्यास प्लान के अधीन यथा अनुज्ञात भूमि उपयोग के उल्लंघन में किया गया भूमि का उपयोग या भवन का उपयोग या भवन का निर्माण या कॉलोनियों का विकास अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत कोई अधिक्रमण भी है ।

(2) उन शब्दों और पदों के, जो इसमें प्रयुक्त है, किन्तु परिभाषित नहीं हैं, वही अर्थ होंगे जो दिल्ली विकास अधिनियम, 1957 (1957 का 61), दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 (1957 का 66) और नई दिल्ली नगरपालिका परिषद् अधिनियम, 1994 (1994 का 44) में हैं ।

3. प्रवर्तन का प्रास्थगित रखा जाना-(1) किसी सुसंगत विधि या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों, विनियमों या उपविधियों में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के अवसान से पहले, गंदी बस्ती के निवासियों और झुग्गी झोंपड़ी कलस्टरों के निवासियों, फेरी वालों और शहरी पथ विक्रेताओं, अप्राधिकृत कॉलोनियों, गांव के आबादी क्षेत्र (जिनके अंतर्गत शहरी गांव भी हैं) और उसके विस्तार, विद्यमान फार्म हाउसों, जो भवन निर्माण की अनुज्ञेय सीमाओं से परे निर्माण में लगे हुए हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि भूमि पर बने विद्यालयों, औषधालयों, धार्मिक संस्थाओं, सांस्कृतिक संस्थाओं, कृषि निवेशों या उपज       (जिसमें दुग्ध उद्योग और कुक्कुट उद्योग भी सम्मिलित हैं) के लिए प्रयुक्त भंडारों, भांडागारों और गोदामों द्वारा अधिक्रमण के रूप में अधिक्रमण या अप्राधिकृत विकास की समस्या से निपटने के लिए सन्िनयमों, नीतिगत मार्गदर्शक सिद्धांतों और साध्य रणनीतियों को, जो नीचे वर्णित हैं, अंतिम रूप देने और सुव्यवस्थित इंतजाम करने के लिए सभी संभव उपाय करेगीः-

(क) पोषणीय, योजनाबद्ध और मानवोचित रीति में दिल्ली का विकास सुनिश्चित करने के लिए दिल्ली मास्टर प्लान, 2021 के उपबंधों के अनुसार गंदी बस्तियों के निवासियों और झुग्गी झोंपड़ी क्लस्टरों के निवासियों के पुनःस्थापन और पुनर्वास के लिए नीति;

(ख) दिल्ली मास्टर प्लान, 2021 में यथा उपबंधित शहरी पथ विक्रेताओं और फेरी वालों के लिए राष्ट्रीय नीति के अनुकूल शहरी पथ विक्रेताओं के विनियमन के लिए स्कीम और सुव्यवस्थित इंतजाम;

(ग) 31 मार्च, 2002 को यथाविद्यमान अप्राधिकृत कॉलोनियों, गांव के आबादी क्षेत्रों (जिनके अंतर्गत शहरी गांव भी हैं) और उनके विस्तार और जहां उस तारीख से परे और 8 फरवरी, 2007 तक भी निर्माण किया गया है, के नियमितीकरण के लिए मार्गदर्शक सिद्धांतों और विनियमों के अनुसरण में सुव्यवस्थित इंतजाम;

(घ) ऐसे विद्यमान फार्म हाउसों से संबंधित नीति, जो भवन निर्माण की अनुज्ञेय सीमाओं के परे निर्माण में लगे हुए हैं; और   

(ङ) ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि भूमि पर बने विद्यालयों, औषधालयों, धार्मिक संस्थाओं और सांस्कृतिक संस्थाओं, कृषि निवेशों या उपज (जिसमें दुग्ध उद्योग और कुक्कुट उद्योग सम्मिलित हैं) के लिए प्रयुक्त भंडारों, भांडागारों और गोदामों से संबंधित नीति ।

(2) उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन रहते हुए और किसी न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश के होते हुए भी,-

(i) अधिक्रमण या अप्राधिकृत विकास की बाबत 1 जनवरी, 2006 को जो स्थिति थी; और

(ii) उपधारा (1) में वर्णित ऐसी अप्राधिकृत कॉलोनियों, गांव के आबादी क्षेत्रों (जिनके अंतर्गत शहरी गांव भी हैं) और उनके विस्तार जो 31 मार्च, 2002 को विद्यमान थे, और जहां उस तारीख से परे और 8 फरवरी, 2007 तक भी निर्माण किया गया है, की बाबत जो स्थिति थी,

उसे यथापूर्व बनाए रखा जाएगा ।

(3) उपधारा (1) में निर्दिष्ट अधिक्रमण या अप्राधिकृत विकास के विरुद्ध कार्रवाई आरंभ करने के लिए किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा जारी की गई सभी सूचनाएं निलंबित की गई समझी जाएंगी और 31 दिसंबर, 2009 तक कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी ।

(4) इस अधिनियम में किसी अन्य उपबंध के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार, 31 दिसंबर, 2009 के पूर्व किसी भी समय, यथास्थिति, उपधारा (2) या उपधारा (3) में वर्णित अधिक्रमण या अप्राधिकृत विकास की बाबत छूट को, अधिसूचना द्वारा, वापस   ले सकेगी ।

4. इस अधिनियम के उपबंधों का कतिपय मामलों में लागू होना-इस अधिनियम के प्रवर्तन की अवधि के दौरान, धारा 3 के उपबंधों के अधीन निम्नलिखित अधिक्रमण या अप्राधिकृत विकास के संबंध में कोई अनुतोष उपलब्ध नहीं होगा, अर्थात् :-

(क) उन मामलों को छोड़कर जो धारा 3 की उपधारा (1) के खंड (क), खंड (ख) और खंड (ग) के अंतर्गत आते हैं, सार्वजनिक भूमि पर अधिक्रमण;

(ख) विनिर्दिष्ट सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए अपेक्षित भूमि को खाली कराने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित सुसंगत नीतियों के अनुसार गंदी बस्तियों और झुग्गी झोंपड़ी निवासियों, फेरी वालों और शहरी पथ विक्रेताओं, अप्राधिकृत कॉलोनियों या उनके भाग, गांव के आबादी क्षेत्र (जिनके अंतर्गत शहरी गांव भी हैं) और उनके विस्तार का हटाया जाना ।

5. केन्द्रीय सरकार की निदेश देने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, समय-समय पर, स्थानीय प्राधिकारियों को ऐसे निदेश जारी कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने के लिए वह ठीक समझे और स्थानीय प्राधिकारियों का यह कर्तव्य होगा कि वे ऐसे निदेशों का अनुपालन करें ।

6. 1 जनवरी, 2009 से इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख के दौरान किए गए या किए जाने से लोप किए गए कार्यों आदि का विधिमान्यकरण-किसी न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश के होते हुए भी, 1 जनवरी, 2009 को या उसके पश्चात् आरंभ होने वाली और इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से ठीक पूर्व समाप्त होने वाली अवधि के दौरान की गई या किए जाने से लोप की गई सभी बातें और की गई या नहीं की गई सभी कार्रवाइयां, जहां तक वे इस अधिनियम के उपबंधों के अनुरूप हैं, इन उपबंधों के अधीन इस प्रकार की गई या किए जाने से लोप की गई या की गई या न की गई समझी जाएंगी मानो पूर्वोक्त अवधि के दौरान ऐसे उपबंध प्रवृतन में थे जब ऐसी बातें की गई थीं या उनके किए जाने से लोप किया गया था या ऐसी कार्रवाइयां की गई थीं या नहीं की गई थीं ।  

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