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पंजाब नगर निगम विधि (चंडीगढ़ पर विस्तारण) अधिनियम, 1994 ( Punjab Municipal Corporation Law (Extension to Chandigarh) Act, 1994 )


 

पंजाब नगर निगम विधि (चंडीगढ़ पर विस्तारण) अधिनियम, 1994

(1994 का अधिनियम संख्यांक 45)

[22 जुलाई, 1994]

पंजाब नगर निगम अधिनियम, 1976 के

चंडीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र पर

विस्तारण के लिए

अधिनियम

                भारत गणराज्य के पैंतालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम पंजाब नगर निगम विधि (चंडीगढ़ पर विस्तारण) अधिनियम, 1994 है ।

                (2) यह 24 मई, 1994 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।

2. 1976 के पंजाब अधिनियम संख्यांक 42 का विस्तारण और संधोधन-(1) पंजाब नगर निगम अधिनियम, 1976 का चंडीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र पर विस्तार किया जाता है और यह वहां प्रवृत्त होगा ।

                (2) इस अधिनियम के प्रारंभ से,- 

(क) पंजाब नगर निगम अधिनियम, 1976 में इस अधिनियम से उपाबद्ध अनुसूची के भाग 1 के स्तंभ 1 में वर्णित राज्य, प्राधिकारियों या नगर के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि मानो वे उस भाग के स्तम्भ 2 में उसके सामने वर्णित या निर्दिष्ट क्रमशः राज्य, प्राधिकारियों या नगर के प्रति निर्देश हैं;

(ख) पंजाब नगर निगम अधिनियम, 1976 को अनुसूची के भाग 2 में विनिर्दिष्ट रूप में संशोधित किया जाएगा ।

3. 1911 के पंजाब अधिनियम संख्यांक 3 का निरसन और व्यावृत्ति-(1) पंजाब नगरपालिक अधिनियम, 1911, जहां तक वह चंड़ीगढ संघ राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग को लागू होता है, इस अधिनियम के प्रवृत्त होने पर निरसित हो जाएगा :

                परन्तु यह कि इस निरसन से निम्नलिखित पर प्रभाव नहीं पड़ेगा-

(क) इस प्रकार निरसित पंजाब नगरपालिक अधिनियम, 1911 का पूर्व प्रवर्तन या उसके अधीन सम्यक् रूप से की गई या सहन की गई कोई बात; या

(ख) इस प्रकार निरसित उक्त अधिनियम के अधीन अर्जित, प्रोद्भूत या उपगत कोई अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता या दायित्व; या

(ग) यथापूर्वोक्त किसी ऐसे अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता, या दायित्व के बारे में कोई अन्वेषण, विधिक कार्यवाही या उपचार,

और कोई ऐसा अन्वेषण, विधिक कार्यवाही या उपचार इस प्रकार संस्थित किया जा सकेगा, चालू रखा जा सकेगा या प्रवर्तित किया जा सकेगा मानो यह अधिनियम पारित नहीं हुआ है :

                परन्तु यह और कि पूर्ववर्ती परन्तुक के अधीन रहते हुए ऐसे अधिनियम के अधीन की गई कोई बात या कोई कार्रवाई    (जिसके अन्तर्गत की गई कोई नियुक्ति या प्रत्यायोजन, जारी की गई अधिसूचना, अनुदेश या निदेश, बनाया गया कोई प्ररूप या उपविधि, अभिप्राप्त किया गया प्रमाणपत्र, मंजूर किया गया अनुज्ञापत्र या अनुज्ञप्ति या प्रभावी किया गया रजिस्ट्रीकरण है), उस संघ राज्यक्षेत्र पर, अब विस्तरित किए गए अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी और तद्नुसार तब तक प्रवृत्त बनी रहेगी जब तक कि उसे उक्त अधिनियम के अधीन की गई किसी बात या कार्रवाई द्वारा अधिक्रांत नहीं किया जाता है ।

(2) इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व पारित प्रत्येक विधि या जारी की गई अधिसूचना में जिसमें कोई निर्देश किया गया है या इसके द्वारा निरसित उक्त अधिनियम के किसी अध्याय या धारा या उपबंध के प्रति निर्देश किया गया है, ऐसे निर्देश, जहां तक व्यवहार्य हों, उक्त अधिनियम या उसके तत्स्थानी अध्याय या धारा के प्रति किए गए माने जाएंगे । 

4. संक्रमणकारी उपबंध-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार, यदि आवश्यक हो, विशेष अधिकारी कहे जाने वाले किसी व्यक्ति को, चंडीगढ़ के नगर निगम की शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन करने के लिए उस दिन तक जिसको इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् निगम का पहला अधिवेशन किया जाता है, नियुक्त कर सकेगी ।

5. 1994 के अध्यादेश संख्यांक 7 का निरसन और व्यावृत्ति-(1) पंजाब नगर निगम विधि (चंडीगढ पर विस्तारण) अध्यादेश, 1994 इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।

(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी इस प्रकार निरसित अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।

अनुसूची

(धारा 2 देखिए)

पंजाब म्युनिसिपल कारपोरेशन एक्ट, 1976, (1976 का पंजाब अधिनियम संख्यांक 42)

भाग 1

 

निर्देश

अर्थान्वियन

 

1

2

1.

पंजाब राज्य

 

2.

पंजाब का राज्य

 

3.

संपूर्ण पंजाब राज्य

चंडीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र

4.

संपूर्ण पंजाब का राज्य

 

5.

पंजाब जहां वह पंजाब के राज्य के प्रति निर्देश करता है

 

6.

पंजाब सरकार

 

7.

पंजाब की सरकार

 

8.

पंजाब के राज्य की सरकार

 

9.

राज्य सरकार

प्रशासक

10.

पंजाब की सरकार

 

11.

सरकार 

 

12.

प्रभागीय आयुक्त

विहित प्राधिकारी

13.

निदेशक

 

14.

सहयुक्त पार्षद

पार्षद

15.

नगर

चंडीगढ़

भाग 2

धारा 2-

                                (क) खंड (1) के स्थान पर निम्नलिखित रखें-

'(1) प्रशासक" से संविधान के अनुच्छेद 239 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया गया चंडीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र का प्रशासक अभिप्रेत है;

(1क) पिछड़े वर्ग" से पिछड़े वर्गों में से कोई ऐसा वर्ग अभिप्रेत है जो, प्रशासक द्वारा समय-समय पर विनिर्दिष्ट किया गया है और जिसका नाम राजपत्र में प्रकाशित किया जाता है;';

                                (ख) खंड (6) का लोप करें ।

                                (ग) खंड (7) के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें,-

                                                '(7क) निगम" से इस अधिनियम के अधीन गठित चंडीगढ़ नगर निगम अभिप्रेत है;'; 

                                (घ) खंड (8) के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें,-

'(8क) निगम के संबंध में पार्षद" से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो धारा 4 की उपधारा (3) के अधीन निर्वाचित या नामनिर्दिष्ट किया गया है;';  

                                (ङ) खंड (10) के स्थान पर, निम्नलिखित रखें,-

                                                '(10) जिला" से चंडीगढ़ का जिला अभिप्रेत है जिसमें चंडीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र का संपूर्ण क्षेत्र आता है;

(10क) जिला योजना समिति" से संविधान के अनुच्छेद 243यथ के अधीन गठित कोई समिति    अभिप्रेत है;';   

(च) खंड (12) का लोप करें;

(छ) खंड (14) के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें-

'(14क) निर्वाचन आयोग" से धारा 10 में निर्दिष्ट चंड़ीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र का निर्वाचन आयोग    अभिप्रेत है;';    

(ज) खंड (17) के पश्चात्, निम्नलिखित अंतःस्थापित करें-

                                '(17क) वित्त आयोग" से धारा 84क में निर्दिष्ट चंड़ीगढ संघ राज्यक्षेत्र का वित्त आयोग अभिप्रेत है;';    

(झ) खंड (23) के स्थान पर निम्नलिखित रखें-

'(23) अनुज्ञप्त वास्तुविद्", अनुज्ञप्त इंजीनियर" और अनुज्ञप्त नलसाज" से क्रमशः ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जो पंजाब राजधानी (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1952 (1952 का पंजाब अधिनियम संख्यांक 27) की धारा 16 के अधीन वास्तुविद्, इंजीनियर और नलसाज के रूप में रजिस्ट्रीकृत और अनुज्ञप्त है;';    

(ञ) खंड (26) के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें-

'(26क) नगरपालिका" से संविधान के अनुच्छेद 243थ के अधीन गठित स्वायत्त शासन की कोई संस्था अभिप्रेत है;

(26ख) नगरपालिका क्षेत्र" से अधिनियम की धारा 3 के अधीन प्रशासक द्वारा अधिसूचित नगरपालिका का प्रादेशिक क्षेत्र अभिप्रेत है;';     

(ट) खंड (36) के पश्चात्, निम्नलिखित अंतःस्थापित करें-

'(36क) जनसंख्या" से ऐसी अंतिम पूर्ववर्ती जनगणना में अभिनिश्चित की गई जनंसख्या अभिप्रेत है, जिसके सुसंगत आंकड़े प्रकाशित हो गए हैं;';

(ठ) खंड (37) के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें-

'(37क) विहित प्राधिकारी" से ऐसा प्राधिकारी या अधिकारी अभिप्रेत है, जिसे प्रशासक समय-समय पर, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, विहित करे :

परन्तु प्रशासक इस अधिनियम के विभिन्न उपबंधों के लिए विभिन्न प्राधिकारियों या अधिकारियों को विहित कर सकता है;';

(ड) खंड (43) के स्थान पर निम्नलिखित रखें-

'(43) सार्वजनिक पथ" से कोई ऐसा पथ या उसकी सतह के नीचे की मृदा अभिप्रेत है जो विनिर्दिष्ट रूप में इस निमित्त जारी किए गए प्रशासक के किसी आदेश द्वारा निगम में निहित की गई हैं;';

(ढ) खंड (51) के स्थान पर निम्नलिखित रखें-

'(51) ग्रामीण क्षेत्र" से चंडीगढ, संघ राज्यक्षेत्र के ऐसे क्षेत्र अभिप्रेत हैं, जो नगरीय क्षेत्र नहीं हैं;';

(ण) खंड (52) के स्थान पर निम्नलिखित रखें-

'(52) अनुसूचित जाति" से संविधान (अनुसूचित जाति) (संघ राज्यक्षेत्र) आदेश, 1951 की अनुसूची के भाग 2 में विनिर्दिष्ट अनुसूचित जातियों में से कोई जाति अभिप्रेत है;';

(त) खंड (60) के स्थान पर, निम्नलिखित रखें-

'(60) नगरीय क्षेत्र" से ऐसे क्षेत्र अभिप्रेत हैं जिन्हें प्रशासक, उस क्षेत्र की जनसंख्या, उसमें जनसंख्या की सघनता, स्थानीय प्रशासक के लिए उत्पन्न राजस्व, कृषि से भिन्न कार्यकलापों में नियोजन की प्रतिशतता, आर्थिक महत्व या ऐसी अन्य बातों को, जो वह ठीक समझे, ध्यान में रखते हुए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नगरीय क्षेत्र के रूप में विनिर्दिष्ट करें;' ।

धारा 2 के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें-

'2क. कैपिटल आफ पंजाब (डेवलमेंट एंड रेग्युलेशन) ऐक्ट, 1952 की कतिपय परिभाषाओं का लागू होना-ऐसे शब्दों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं, किन्तु कैपिटल आफ पंजाब (डेवलपमेंट एंड रेग्युलेशन) ऐक्ट, 1952 (1952 का पंजाब अधिनियम संख्यांक 27) में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे जो उनके क्रमशः उस अधिनियम     में हैं ।'

धारा 3 के स्थान पर निम्नलिखित रखें- 

3. नगरपालिका क्षेत्र होने वाले क्षेत्र की घोषणा-(1) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, प्रशासक, अधिसूचना द्वारा, चंडीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र के ऐसे प्रादेशिक क्षेत्र को चंडीगढ़ के नगर निगम का नगरपालिका क्षेत्र होने के लिए विनिर्दिष्ट करेगा ।

(2) प्रशासक, समय-समय पर, निगम से परामर्श करने के पश्चात्, अधिसूचना द्वारा, उपधारा (1) के अधीन विनिर्दिष्ट सीमा में परिवर्तन कर सकेगा जिससे कि ऐसे क्षेत्र को, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, उसमें सम्मिलित किया जा सके या उससे अपवर्जित किया जा सके । निगम अपने विचारों को उस तारीख से, जिसकी उससे प्रथम बार परामर्श किया जाता है, तीन मास की कालावधि के भीतर प्रशासक को भेजेगा ।

(3) उपधारा (2) के अधीन कोई अधिसूचना जारी करने की शक्ति पूर्व प्रकाशन की शर्त के अधीन रहते हुए होगी ।

(4) जब उपधारा (1) के अधीन विनिर्दिष्ट सीमाओं को इस प्रकार परिवर्तित किया जाता है जिससे कि उसमें किसी ऐसे क्षेत्र को सम्मिलित किया जा सके, तब यह अधिनियम और उसके सिवाय जैसा कि प्रशासक अन्यथा अधिसूचना द्वारा निदेशित करे, बनाए गए सभी नियम, जारी की गई अधिसूचनाएं, उपविधियां, आदेश, निदेश और प्रदत्त की गई शक्तियां तथा इस अधिनियम के अधीन अधिरोपित और उपधारा (1) के अधीन विनिर्दिष्ट क्षेत्र में सर्वत्र प्रवृत्त सभी कर और फीसें ऐसे सम्मिलित किए गए क्षेत्र को लागू होंगी ।" ।

धारा 4,-

(क) उपधारा (1) के स्थान पर निम्नलिखित रखें,-

(1) इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए चंडीगढ़ नगर निगम के नाम से एक निगम होगा, जिस पर नगरपालिक शासन का भार होगा ।" ।

(ख) उपधारा (2) में प्रत्येक" शब्द का लोप करें ।

(ग) उपधारा (3) के स्थान पर निम्नलिखित रखें-

                                (3) निगम निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगा, अर्थात् :-

                                                (i) सदस्य, जो प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित किए जाएंगे, जो वार्डों का प्रतिनिधित्व करेंगे;

(ii) नौ सदस्य, जिन्हें मत देने का अधिकार होगा, जो प्रशासक द्वारा ऐसे व्यक्तियों में से नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे जो सार्वजनिक कार्यों में प्रख्यात अथवा विशिष्ट व्यक्ति हैं या जिन्हें नगरपालिका प्रशासन के संबंध में विशेष ज्ञान या  [व्यावहारिक अनुभव है; और]

 [(iii) उस निर्वाचन-क्षेत्र का, जिसके अंतर्गत नगरपालिका क्षेत्र पूर्णतः या भागतः आता है, प्रतिनिधित्व करने वाला लोक सभा का सदस्य जिसे मत देने का अधिकार होगा ।]" ।  

धारा 5 की उपधारा (2) में,-

                                (i) पहले परन्तुक में चालीस से कम और पचास से अधिक" के स्थान पर बीस से कम" रखें,

                                (ii) दूसरे परन्तुक का लोप करें ।

धारा 6 के स्थान पर निम्नलिखित रखें,- 

6. महिलाओं, अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्गों के लिए स्थानों का आरक्षण-(1) अनुसूचित जातियों के लिए धारा 5 की उपधारा (4) के अधीन आरक्षित स्थानों में से अनुसूचित जातियों की महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित जाएंगे, ऐसे स्थानों की संख्या की अवधारण प्रशासक द्वारा राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा किया जाएगा, जो अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित स्थानों की कुल संख्या के एक-तिहाई से कम नहीं होंगे ।

(2) महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित किए जाएंगे, ऐसे स्थानों की संख्या का अवधारण प्रशासक द्वारा राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा किया जाएगा, जो प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या के एक-तिहाई से   (जिसके अंतर्गत अनुसूचित जातियों की महिलाओं के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या भी है) कम नहीं होंगे :

परन्तु अनुसूचित जातियों या महिलाओं के लिए (जिनके अंतर्गत अनुसूचित जातियों की महिलाएं भी हैं) आरक्षित स्थानों का आबंटन विभिन्न वार्डों के लिए चक्रानुक्रम द्वारा ऐसी रीति से किया जाए जो प्रशासक इस निमित्त राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा अवधारित करे ।

(3) धारा 5 की उपधारा (4) और इस धारा की उपधारा (1) के अधीन स्थानों का आरक्षण संविधान के       अनुच्छेद 334 में विनिर्दिष्ट कालावधि की समाप्ति पर प्रभाव नहीं रखेगा ।

(4) प्रशासक, यदि वह यह आवश्यक समझता है राजपत्र  में प्रकाशित आदेश द्वारा निदेशित कर सकेगा कि स्थानों की इतनी संख्या, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, नागरिकों के पिछड़े वर्गों के पक्ष में आरक्षित की जाएगी :

परन्तु जब किसी पिछड़े वर्ग को प्रशासक के आदेश द्वारा हटा दिया जाता है तो ऐसे वर्ग से निर्वाचित सदस्य केवल ऐसे हटाए जाने के परिणामस्वरूप पद धारण करना समाप्त नहीं करेगा और वह पद वैसे ही धारण करेगा जैसे उसने उस दशा में धारण किया होता जब उस वर्ग को हटाया नहीं गया होता ।" ।

धारा 7 के स्थान पर निम्नलिखित रखें,- 

7. निगम का कार्यकाल-(1) निगम, जब तक उसका धारा 407 के अधीन इससे पूर्व विघटन न कर दिया जाए, अपने प्रथम अधिवेशन के लिए नियत तारीख से पांच वर्ष तक बना रहेगा और इससे अधिक नहीं । 

(2) निगम का गठन करने के लिए निर्वाचन-

(क) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट उसकी अवधि की समाप्ति के पूर्व;

(ख) उसके विघटन की तारीख से छह मास की अवधि की समाप्ति के पूर्व,

पूरा किया जाएगा :

परन्तु जहां वह शेष अवधि जिसके लिए, विघटित निगम बना रहता छह मास से कम है, वहां ऐसी अवधि के लिए निगम का गठन करने के लिए इस उपधारा के अधीन कोई निर्वाचन कराना आवश्यक नहीं होगा ।

(3) निगम के कार्यकाल के अवसान से पूर्व उसके विघटन पर गठित निगम, केवल उस शेष अवधि के लिए ही बना  रहेगा जिसके लिए विघटित निगम, उपधारा (1) के अधीन बना रहता यदि उसका विघटन नहीं हुआ होता ।" ।

धारा 8 की उपधारा (2) के स्थान पर निम्नलिखित रखें-

(2) प्रशासक राजपत्र में आदेश द्वारा-

(क) बोर्ड की संख्या; और

                                                (ख) प्रत्येक वार्ड का विस्तार,

अवधारित करेगा ।

(3) निर्वाचन आयोग, राजपत्र में आदेश द्वारा उन वार्डों का अवधारण करेगा जिनमें अनुसूचित जातियों के लिए, महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित किए जाएंगे और वह रीति जिसमें धारा 6 की उपधारा (2) के परन्तुक के अधीन स्थान चक्रानुक्रमित किए जाएंगे ।" ।

धारा 10 के स्थान पर निम्नलिखित रखें-

10. निगम के लिए निर्वाचन-(1) निगम के सभी निर्वाचनों के लिए निर्वाचन नामावलियां तैयार करने के तथा उन सभी निर्वाचनों के संचालन का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 (1957 का 66) की धारा 7 के अधीन नियुक्त निर्वाचन आयोग में निहित होगा और उक्त उपधारा के अधीन इस प्रकार नियुक्त किया गया निर्वाचन आयोग इस उपधारा के अधीन निर्वाचन आयोग को प्रदत्त कृत्यों के लिए उत्तरदायी होगा ।

(2) जब निर्वाचन आयोग ऐसा अनुरोध करे तब प्रशासक, उक्त आयोग को उतने कर्मचारिवृन्द उपलब्ध कराएगा जितने उपधारा (1) द्वारा निर्वाचन आयोग को सौंपे गए कृत्यों के निर्वहन के लिए प्रशासक आवश्यक समझे ।" ।

धारा 12 के खण्ड (क) में, पच्चीस वर्ष" के स्थान पर इक्कीस वर्ष" रखें ।

धारा 13 में,-

(i) उपधारा (1) में, खंड (ठ) के पश्चात् निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें-

(ड) यदि वह लोक सभा के निर्वाचनों के प्रयोजनों के लिए तत्समय-प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या उसके अधीन इस प्रकार निरर्हित कर दिया जाता है :

परन्तु कोई व्यक्ति इस आधार पर निरर्हित नहीं होगा कि उसकी आयु पच्चीस वर्ष से कम है यदि उसने इक्कीस वर्ष की आयु प्राप्त कर ली है; 

(ढ) यदि वह संसद् द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या उसके अधीन इस प्रकार निरर्हित कर दिया जाता है ।" ।

(ii) उपधारा (2) में खंड (ग) के पश्चात् निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें-

(घ) किसी व्यक्ति को निगम के सदस्य के रूप में नामनिर्देशित किए जाने के लिए इस आधार पर निरर्हित नहीं किया जाएगा कि वह तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन लोक सभा के निर्वाचन के प्रयोजनों के लिए लाभ का पद धारण किए हुए है ।" ।

धारा 13 के पश्चात् निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें-

13क. सदस्यों के निरर्हित होने से संबंधित प्रश्नों पर विनिश्चय-(1) यदि यह प्रश्न उठता है कि कोई सदस्य  धारा 13 में वर्णित किसी निरर्हता से ग्रस्त हो गया है या नहीं तो वह प्रश्न प्रशासक को विनिश्चय के लिए निर्देशित किया जाएगा और उसका विनिश्चय अंतिम होगा ।" । 

धारा 15,-

(i) उपधारा (2) का लोप करें;

(ii) उपधारा (3) में निदेशक" के स्थान पर प्रशासक" रखें ।

धारा 16,-

(i) उपधारा (1) में निदेशक" के स्थान पर प्रशासक" रखें;

(ii) उपधारा (1) में परन्तुक में  चार" के स्थान पर छह" रखें;

(iii) उपधारा (2) में,-

(क) आरंभिक भाग में, अनुसूचित जातियों" के स्थान पर यथास्थिति, अनुसूचित जातियों, पिछड़े वर्गों या महिलाओं के लिए" रखें;

(ख) अंत में आए अनुसूचित जाति का होगा ।" शब्दों के स्थान पर किसी अनुसूचित जाति या पिछड़ा वर्ग का होगा या कोई महिला होगी ।" शब्द रखे जाएंगे ।

धारा 17,-

(क) या सहयोजित" और या सहयोजन" का लोप करें;

(ख) निदेशक" के स्थान पर निर्वाचन आयोग" रखें ।

धारा 35 की उपधारा (1) में किसी सहयुक्त पार्षद् से भिन्न" शब्दों का लोप करें ।

धारा 35 के पश्चात् निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें- 

35क. बहुसदस्यता की दशा में स्थानों का रिक्त होना-(1) कोई पार्षद् निगम और संसद् दोनों का सदस्य नहीं होगा और यदि कोई व्यक्ति इस प्रकार चुन लिया जाता है तो, यथास्थिति, भारत के राजपत्र या राजपत्र में उसके ऐसे चुने जाने के प्रकाशन की तारीख से, जो भी पश्चात्वर्ती हो, चौदह दिन की समाप्ति पर उस व्यक्ति का संसद् में स्थान रिक्त हो जाएगा जब तक कि उसने निगम में अपने स्थान को पहले ही त्याग नहीं दिया है ।" ।

धारा 36, उपधारा (1) के स्थान पर निम्नलिखित रखें-

(1) यदि कोई पार्षद् धारा 13 में वर्णित निरर्हताओं में से किसी से ग्रस्त हो जाता है तो ऐसा होने पर उसका स्थान रिक्त हो जाएगा ।

(1क) यदि कोई पार्षद् निगम की अनुज्ञा के बिना क्रमवर्ती तीन मास के दौरान निगम के सभी अधिवेशनों से अनुपस्थित रहता है तो निगम उसके स्थान को रिक्त घोषित कर सकता है ।" ।

धारा 38,-

                                (क) उपधारा (1) , उपधारा (2) और उपधारा (2क) के स्थान पर निम्नलिखित रखें-

(1) निगम, प्रत्येक वर्ष अपने प्रथम अधिवेशन में अपने निर्वाचित सदस्यों में से किसी एक को अध्यक्ष, जो निगम का महापौर कहलाएगा और अन्य दो ऐसे सदस्यों को, जो निगम के वरिष्ठ उपमहपौर तथा उपमहपौर होंगे, निर्वाचित करेगा : 

परन्तु निगम के कार्यकाल के दौरान निगम के प्रथम और चतुर्थ वर्ष के लिए ऐसे सदस्य के पक्ष में जो कि महिला है और निर्गम के तीसरे वर्ष के लिए ऐसे सदस्य के पक्ष में जो अनुसूचित जाति का है, महापौर का पद आरक्षित किया जाएगा ।" ; 

                                (ख) उपधारा (3) के पश्चात् निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें,-

(3क) यदि महापौर के पद में कोई आकस्मिक रिक्ति होती है और वह महिला या अनुसूचित जाति के किसी सदस्य के लिए आरक्षित है तो उस रिक्ति को, यथास्थिति, महिला या अनुसूचित जाति के सदस्यों में से किसी एक पार्षद् को निर्वाचित करके भरा जाएगा ।" ;

                                (ग) उपधारा (6) के स्थान पर निम्नलिखित रखें,-

(6) महापौर, आयुक्त से चडीगढ़ नगरपालिक सरकार से संसक्त किसी विषय पर रिपोर्ट प्राप्त कर सकता है ।" ।

धारा 41 के पश्चात् निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें,-

41क. वार्ड समितियां-(1) निगम के प्रादेशिक क्षेत्र के भीतर एक या अधिक वार्डों को मिलाकर उतनी संख्या में वार्ड समितियों का गठन किया जाएगा जितनी प्रशासक समय-समय पर राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा अवधारित करे । आदेश में वार्ड समिति का नाम और ऐसी समिति की अधिकरिता के भीतर सम्मिलित क्षेत्र का विस्तार भी उपदर्शित किया जाएगा ।

(2) प्रत्येक वार्ड समिति में निम्नलिखित होंगे,-

(क) समिति की प्रादेशिक अधिकारिता में वार्डों से निर्वाचित सभी पार्षद्; 

(ख) धारा 4 की उपधारा (3) के खंड (ii) के अधीन प्रशासक द्वारा नामनिर्दिष्ट किया गया व्यक्ति, यदि कोई है, यदि कोई हैं, यदि उसका नाम समिति की प्रादेशिक सीमा के भीतर निर्वाचक के रूप में रजिस्ट्रीकृत है;

(ग) ऐसी संख्या में व्यक्ति, जो विहित की जाए, प्रशासक द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे ।

41ख. वार्ड समिति का अभ्यक्ष-(1) वार्ड समिति, प्रत्येक वर्ष अपने प्रथम अधिवेशन में अपने एक सदस्य को जो कि पार्षद् होगा, अध्यक्ष निर्वाचित करेगी :

परन्तु जहां वार्ड समिति में केवल एक वार्ड है वहां निगम में उक्त वार्ड का प्रतिनिधित्व करने वाला पार्षद् उक्त समिति का अध्यक्ष होगा ।

(2) वार्ड समिति का अध्यक्ष अपने निर्वाचन की तारीख से उसके उत्तराधिकारी का पद पर निर्वाचन होने तक, पद धारण करेगा जब तक कि इसी बीच में अध्यक्ष के रूप में उसने अपने पद का त्याग न कर दिया हो ।

(3) अध्यक्ष के पद पर कोई आकस्मिक रिक्ति होने पर वार्ड समिति, ऐसी रिक्ति होने के एक मास के भीतर, अपने सदस्यों में से किसी एक सदस्य को जो पार्षद् होगा, अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित करेगी :

परन्तु जहां समिति में एकमात्र पार्षद् के त्यागपत्र या मृत्यु से कोई रिक्ति हुई है वहां प्रशासक वार्ड समिति के अध्यक्ष के रूप में किसी अन्य पार्षद् को तब तक नियुक्त कर सकेगा जब तक सम्यक् अनु्क्रम में रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन नहीं कराया जाता है  ।

41ग. वार्ड समिति के अध्यक्ष और सदस्यों का पद त्याग-(1) वार्ड समिति का कोई सदस्य, आयुक्त को परिदत्त और अध्यक्ष को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा और अध्यक्ष, आयुक्त को परिदत्त और महापौर को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन पद त्याग उक्त उपधारा में विनिर्दिष्ट लेख में इस प्रयोजन के लिए विनिर्दिष्ट तारीख से या यदि ऐसी कोई तारीख विनिर्दिष्ट नहीं की गई है तो अध्यक्ष या आयुक्त द्वारा उसकी प्राप्ति की तारीख से, जो भी पश्चात्वर्ती हो, प्रभावी होगा ।

41घ. वार्ड समिति के कृत्य-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, वार्ड समिति, ऐसी शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन करेगी जो निगम संकल्प द्वारा समय-समय पर अवधारित करे ।

(2) जब कोई ऐसा प्रश्न उठता है कि कोई विषय वोर्ड समिति या निगम के कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत आता है या नहीं तो वह विनिश्चय के लिए निगम को निर्दिष्ट किया जाएगा और उसका उस पर विनिश्चय अंतिम होगा ।

41ङ. विशेष समितियां-(1) प्रशासक, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा किसी ऐसी शक्ति का प्रयोग करने के लिए या किसी ऐसे कृत्य का निर्वहन करने के लिए जो निगम संकल्प द्वारा ऐसी समिति को प्रत्यायोजित करे अथवा किसी ऐसे विषय को जो निगम ऐसी समितियों को निर्दिष्ट करे, जांच करने, उस पर रिपोर्ट देने या सलाह देने के लिए वार्ड समितियों और धारा 42 में निर्दिष्ट समितियों के अतिरिक्त एक या अधिक विशेष समितियां जो वह ठीक समझे गठित कर सकता है ।

(2) ऐसी किसी समिति में एक या अधिक पार्षद् और उतने अन्य व्यक्ति होंगे जो प्रशासक द्वारा नामनिर्देशित किए जाएं, जो वह ठीक समझे, जिनके पास विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव हो और जो विभिन्न हितों का प्रतिनिधित्व करते हों जैसे उद्योग, वाणिज्य, श्रम, साहित्य, विज्ञान, कला और सामाजिक सेवाएं ।

41च. जिला योजना समिति का गठन-(1) जिले में एक जिला योजना समिति, निगम और जिले में पंचायतों द्वारा तैयार की गई योजनाओं का समेकन करने और संपूर्ण जिले के लिए एक निकास योजना प्रारूप तैयार करने के लिए गठित    की जाएगी ।

(2) वह रीति जिससे उपधारा (1) के अधीन गठित जिला योजना समिति में स्थान भरे जाएंगे, वे कृत्य जो ऐसी समिति को समनुदेशित किए जाएं और वह रीति जिसमें ऐसी समिति का अध्यक्ष चुना जाएगा वह होगी जो सरकार द्वारा विहित की जाए, तथापि यह संविधान के अनुच्छेद 243यघ के उपबन्धों के अधीन रहते हुए होगी ।

(3) जिला योजना समिति जिले की विकास योजना प्रारूप तैयार करने में निम्नलिखित का ध्यान रखेगी,-

(i) जिले में पंचायतों और नगरपालिकाओं के सामान्य हित के विषय जिनके अंतर्गत स्थानिक योजना, जल तथा अन्य भौतिक और प्राकृतिक संसाधनों में हिस्सा बंटाना, अवसंरचना का एकीकृत विकास और पर्यावरण संरक्षण है; और 

(ii) उपलब्ध वित्तीय या अन्य संस्थानों की मात्रा और प्रकार ।

(4) जिले की विकास योजना प्रारूप तैयार करते समय जिला योजना समिति, उन संस्थाओं और संगठनों से परामर्श करेगी जिन्हें सरकार आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे ।

(5) जिला योजना समिति का अध्यक्ष वह विकास योजना प्रारूप जिसकी ऐसी समिति द्वारा सिफारिश की जाती है सरकार को भेजेगा ।

(6) इस धारा या धारा 41क के अधीन गठित किसी समिति से संबंधित कोई विषय जिसका इस अधिनियम में विवक्षित रूप से उपबंध नहीं किया गया है, उसका इस निमित्त बनाए गए नियमों में उपबंध किया जा सकता है ।" ।

धारा 42,-

(क) उपधारा (1), उपधारा (2), उपधारा (4) और उपधारा (5) के परन्तुक का लोप करें;

(ख) उपधारा (3) में, भवन और" का लोप करें ।

धारा 44 में,-

(क) खंड (थ) में, अंत में सिवाय ऐसे महत्वपूर्ण पार्क और स्टेडियम के जो प्रशासक द्वारा इस निमित्त जारी किए गए आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं", शब्द जोड़े जाएंगे;

(ख) खंड (न) के पश्चात् अंतःस्थापित करें-

                                                (नन) आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजना तैयार करना;" ।

धारा 45-आरंभिक भाग में, निगम" के स्थान पर निम्नलिखित रखें-

समय-समय पर, प्रशासक के किसी साधारण या विशेष आदेश के अधीन रहते हुए, निगम" ।

धारा 47 में,-

(i) उपधारा (1) के स्थान पर निम्नलिखित रखें-

(1) प्रशासक, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निगम के आयुक्त के रूप में एक उपयुक्त अधिकारी की नियुक्ति करेगा ।

(1क) आयुक्त के कार्य और आचरण पर रिपोर्ट प्राधिकारी प्रशासक का सलाहकार होगा और पुनर्विलोकन और स्वीकृति प्राधिकारी प्रशासक होगा ।" ; 

(ii) उपधारा (2) के दूसरे परन्तुक के पश्चात् निम्नलिखित जोड़ें-

परन्तु यह भी कि जहां आयुक्त किसी सरकार के अधीन किसी सेवा पर धारणाधिकार रखता है वहां प्रशासक, किसी भी समय उसकी सेवाओं को उक्त सरकार के नियंत्रणाधीन रख सकेगा ।" ;

(iii) उपधारा (3) में,-

(क) खंड (क) का लोप करें;

(ख) निगम को कम से कम एक मास की सूचना देकर" शब्दों का लोप करें ।

धारा 50-दो मास से अनधिक की अवधि के लिए" शब्दों का लोप करें ।

धारा 65 और धारा 66-तदर्थ" शब्द का, जहां वह आता है, लोप करें ।

धारा 71 के स्थान पर निम्नलिखित रखें-

71. कतिपय अधिकारियों की नियुक्ति-(1) प्रशासक क्रमशः नगरपालिक इंजीनियर, नगरपालिक स्वास्थ्य अधिकारी, नगरपालिक मुख्य लेखापाल, नगरपालिक सचिव और नगरपालिक मुख्य लेखापरीक्षक के रूप में उपयुक्त व्यक्तियों को नियुक्त करेगा तथा ऐसे मासिक वेतन और ऐसे भत्तों पर, यदि कोई हों, जो उसके द्वारा नियत किए जाएं, एक या अधिक सहायक आयुक्त और इस उपधारा में ऊपर विनिर्दिष्ट अधिकारियों के समतुल्य या उनमें से किसी अधिकारी से उच्चतर पद के एक या अधिक ऐसे अन्य अधिकारी नियुक्त कर सकेगा जो प्रशासक ठीक समझे ।

(2) नगरपालिक मुख्य लेखापरीक्षक अपने पद पर न रहने पर निगम के अधीन अन्य किसी पद के लिए पात्र नहीं होगा ।

71क. स्थायी पदों की अनुसूची और अस्थायी पदों का सृजन-(1) आयुक्त समय-समय पर धारा 71 में विनिर्दिष्ट से भिन्न पदों की दो अनुसूचियां तैयार करेगा और निगम के समक्ष रखेगा, जिनमें नगरपालिक अधिकारियों और ऐसे अन्य नगरपालिक कर्मचारियों के पदनाम और श्रेणियां दी गई होंगी जिन्हें निगम की सेवा में स्थायी रूप से रखा जाएगा तथा उनमें ऐसे अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को दिए जाने के लिए प्रस्तावित फीस और भत्ते उपदर्शित होंगे ।

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट दो अनुसूचियों में से पहली अनुसूची प्रवर्ग क पदों से संबंधित होगी और दूसरी अनुसूची अन्य पदों से ।

(3) निगम उपांतरों के बिना या ऐसे उपांतरों सहित, जो वह उचित समझे, दोनों अनुसूचियों की मंजूरी दे सकेगा और उसके पश्चात् उनके, यदि वह आवश्यक समझता है, संशोधन कर सकेगा । ऐसी मंजूरी या संशोधन प्रशासक के अनुमोदन के अधीन होगा ।

(4) आयुक्त छह मास से अनधिक अवधि के लिए समूह ख", ग" और घ" पदों का सृजन कर सकेगा ।

71ख.नियुक्तियां करने की शक्ति-(1) धारा 71 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, नगरपालिक अधिकारियों और अन्य नगरपालिक कर्मचारियों को अस्थायी या स्थायी रूप से नियुक्त करने की शक्ति आयुक्त में निहित होगी ।

(2) नगरपालिक अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति करते समय प्रशासन की दक्षता को बनाए रखने की संगति के अनुसार अनुसूचित जातियों और नागरिकों के पिछड़े वर्ग के सदस्यों के दावों पर ध्यान रखा जाएगा ।

71ग. भर्ती-धारा 71ख में किसी बात के होते हुए भी, प्रशासक द्वारा विभिन्न पदों पर सीधी भर्ती ऐसे अभिकरणों के माध्यम से की जाएगी जो उसके द्वारा विहित किए जाएं ।" ।

धारा 75 के खंड (ख) में, धारा 71 की उपधारा (7)" शब्दों के स्थान पर धारा 71क में निर्दिष्ट अनुसूची" शब्द रखे जाएंगे ।

धारा 84 के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें-

84क. वित्त आयोग-(1) दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 (1957 का 66) की धारा 107क के अधीन गठित वित्त आयोग इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए निगम की वित्तीय स्थिति का पुनर्विलोकन करने के लिए और प्रशासक को निम्नलिखित के बारे में सिफारिश करने के लिए भी जिम्मेदार होगा :-

                                                (क) वे सिद्धांत जो निम्नलिखित को शासित करेंगे :- 

(i) ऐसे कर, शुल्क, पथकर और फीसों के अवधारण को जो निगम को समनुदिष्ट की जा सकेंगी उनके द्वारा विनियोजित की जा सकेंगी;

(ii) भारत की संचित निधि से निगम के लिए सहायता अनुदान को; 

                                                (ख) निगम की वित्तीय स्थिति को सुधारने के लिए आवश्यक अध्युपायों के बारे में;

(ग) निगम के सृदृढ़ कार्यकरण के हित में प्रशासक द्वारा वित्त आयोग को निर्दिष्ट किसी अन्य विषय के बारे में ।

(2) आयोग अपनी प्रक्रिया का अवधारण करेगा और अपने कृत्यों के पालन के लिए उसे ऐसी शक्तियां प्राप्त होंगी जो विहित की जाएं ।

(3) प्रशासक इस धारा के अधीन आयोग द्वारा की गई प्रत्येक सिफारिश को उस पर की गई कार्यवाही के स्पष्टीकरण ज्ञापन सहित संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगा ।

धारा 87 की,- 

(क) उपधारा (3) के खंड (ख) के परन्तुक में पांच सौ रुपए" शब्दों के स्थान पर दस हजार रुपए" शब्द रखें;

(ख) उपधारा (4) में पांच हजार रुपए" शब्दों के स्थान पर एक लाख रुपए" शब्द रखें ।

धारा 90 की,-

(क) उपधारा (1) में खंड (ख) और खंड (ग) का लोप करें;

(ख) उपधारा (6) में, पंजाब मोटर व्हीकल्स टैक्सैशन ऐक्ट, 1924, पंजाब एन्टरटैन्मेंट ड्यूटी ऐक्ट, 1955 और पंजाब ऐन्टरटैन्मेंट टैक्स (सिनेमाटोग्राफी शो) ऐक्ट, 1954" के पश्चात् जैसे कि चंडीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र को लागू हैं"        शब्द जोड़ें ।

धारा 113 से 117 (दोनों सहित) का लोप करें ।

धारा 126 के पश्चात् निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें :-

126क. मुख्य प्रशासक का पूर्व अनुमोदन-धारा 122 से धारा 125 तक में किसी बात के होते हुए भी आयुक्त द्वारा दी गई प्रत्येक अनुज्ञा पंजाब राजधानी (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1952 (1952 का पंजाब अधिनियम संख्यांक 27) की धारा 2 के खंड (ङ) के अधीन नियुक्त मुख्य प्रशासक के पूर्व अनुमोदन के अधीन होगी और ऐसी शर्त के अधीन होगी, जो मुख्य प्रशासक इस निमित्त अधिरोपित करे ।" ।

                धारा 127 का लोप किया जाएगा ।

                धारा 152 की उपधारा (1) के पन्तुक में एक हजार रुपए" शब्दों के स्थान पर दस हजार रुपए" शब्द रखें ।

                धारा 174-खंड (ग) का लोप करें ।

                धारा 225-उपधारा (2) का लोप करें ।

                धारा 226 से धारा 275 तक (दोनों सहित) का लोप करें ।

                धारा 286 से धारा 312 तक (दोनों सहित) का लोप करें ।

                धारा 343 से धारा 346 (दोनों सहित) का लोप करें ।

                धारा 397-उपधारा (2) के स्थान पर निम्नलिखित रखें-

(2) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, विनियम या उपविधि बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब तक सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा/रखी जाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम, विनियम या उपविधि में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं, तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में प्रभावी होगा/होगी । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम, विनियम या उपविधि नहीं बनाई जानी चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभावी हो जाएगा/या जाएगी; किन्तु नियम, विनियम या उपविधि के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।" ।

                धारा 399-उपधारा (1) में भाग ख, ग और घ का लोप करें ।

                धारा 407 के स्थान पर निम्नलिखित धारा रखें :-

407. निगम का विघटन-(1) यदि सरकार की यह राय कि निगम अपने कृत्यों का पालन करने में सक्षम नहीं है या इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा या उसके अधीन उस पर अधिरोपित कृत्यों के पालन में बार-बार व्यतिक्रम करता है या अपनी शक्तियों से अधिक कार्य करता है या उनका दुरुपयोग करता है तो सरकार राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा जिसके साथ ऐसा करने के कारण भी दिए जाएंगे, ऐसे निगम का विघटन कर सकेगी :

परन्तु निगम को ऐसे विघटन से पूर्व सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दिया जाएगा ।

(2) जहां नगर निगम को उपधारा (1) के अधीन विघटित किया जाता है, वहां-

                (i) निगम के सभी पार्षद् अपने पद तुरन्त रिक्त कर देंगे;

(ii) विघटन के दौरान निगम की सभी शक्तियों और कर्तव्यों का प्रयोग या पालन ऐसे व्यक्तियों या प्राधिकारी द्वारा किया जाएगा जिसे या जिन्हें सरकार अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त नियुक्त करे; और 

(iii) निगम के कब्जे में की सभी संपत्ति सरकार द्वारा धारण की जाएंगी ।

(3) उपधारा (1) के अधीन किसी निगम के विघटन पर सरकार धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन यथाविनिर्दिष्ट निगम का पुनर्गठन करेगी और ऐसे निगम के पुनर्गठन के लिए निर्वाचन विघटन की तारीख से छह मास की अवधि समाप्त होने से पूर्व पूरा किया जाएगा :

परंतु जहां वह शेष अवधि, जिसके दौरान विघटित निगम बना रहता, छह मास से कम है वहां ऐसी अवधि के लिए निगम के पुनर्गठन के लिए इस उपधारा के अधीन कोई निर्वाचन कराना आवश्यक नहीं होगा ।

(4) विद्यमान निगम की कालावधि समाप्त होने के पूर्व उसके विघटन पर पुनर्गठित निगम केवल उस शेष अवधि तक बना रहेगा जिसके दौरान निगम धारा 7 के अधीन बना रहता, यदि उसका इस प्रकार विघटन न किया गया होता ।" ।

                धारा 407 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित करें :-

407क. कतिपय मामलों में निगम का कार्य करने के लिए किसी व्यक्ति की नियुक्ति-(1) निगम की सभी शक्तियों और कर्तव्यों का, जब तक यह विघटित रहता है और पुनर्गठित किया जाता है, ऐसे व्यक्तियों या प्राधिकारी द्वारा, प्रयोग या पालन किया जाएगा या जिसे सरकार इस निमित्त नियुक्त करे । 

(2) निगम में निहित सभी संपत्तियां जब तक कि निगम विघटित रहता है और उसका पुनर्गठन नहीं होता है सरकार में निहित और उसको न्यागत होंगी ।" ।

                धारा 424 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी :-

424क. कैपिटल ऑफ पंजाब (डेवलपमेंट एंड रेग्यूलेशन) ऐक्ट, 1952 तथा पंजाब न्यू कैपिटल (पैरी फेरी) कंट्रोल ऐक्ट, 1952 का लागू होना-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, कैपिटल ऑफ पंजाब (डेवलपमेंट एंड रेग्यूलेशन) ऐक्ट, 1952 (1952 का पंजाब अधिनियम संख्यांक 2) तथा पंजाब न्यू कैपिटल (पैरी फेरी) कंट्रोल ऐक्ट, 1952 (1952 का पंजाब अधिनियम संख्यांक 1) और उनके अधीन बनाए गए नियम, विनियम, उपविधि तथा जारी अधिसूचनाएं, किए गए आदेश, बनाई गई स्कीम, बनाया गया प्ररूप या जारी की गई सूचना चंडीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र के विकास और विनियमन के संबंध में उसी प्रकार लागू रहेगी जिस प्रकार पंजाब नगर निगम विधि (चंडीगढ़ पर विस्तारण) अधिनियम, 1994 के प्रारम्भ के ठीक पूर्व लागू थी ।" । 

                धारा 428 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित करें :-

'428क. अंतरित कृत्यों की बाबत विशेष उपबंध-(1) इस धारा में अंतरित कृत्य" से प्रशासन के ऐसे कृत्य अभिप्रेत हैं जो पंजाब नगर निगम विधि (चंडीगढ़ पर विस्तारण) अधिनियम, 1994 के प्रारंभ पर निगम के कृत्य हो जाएंगे ।

(2) पंजाब नगर निगम विधि (चंडीगढ़ पर विस्तारण) अधिनियम, 1994 के प्रारंभ से ही,-

(क) विनिर्दिष्ट तारीख से ठीक पूर्व प्रशासन का सभी स्टोर, सामान, वस्तुएं और अन्य जंगम संपत्तियां और जो अन्तरित कृत्यों के लिए या उनके संबंध में उपयोग में लाए गए हैं, निगम को संक्रांत हो जाएंगे और उसमें निहित हो जाएंगे;

(ख) अन्तरित कृत्यों के संबंध में ऐसी विनिर्दिष्ट तारीख से ठीक पूर्व प्रशासन द्वारा की गई सभी नियुक्तियां, जारी की गई अधिसूचनाएं, किए गए आदेश, बनाई गई स्कीमें, बनाए गए नियम, प्ररूप, जारी की गई सूचनाएं या बनाई गई उपविधियां या दी गई अनुज्ञप्ति या अनुज्ञा तब तक प्रवृत्त रहेंगी और उन्हें निगम द्वारा बनाया गया, जारी किया गया या दिया गया समझा जाएगा जब तक कि उन्हें निगम द्वारा की गई किसी नियुक्ति, जारी की गई अधिसूचना, किए गए आदेश, बनाई गई स्कीम, बनाए गए नियम, प्ररूप, जारी की गई सूचना या बनाई गई उपविधि या दी गई अनुज्ञप्ति या अनुज्ञा द्वारा अधिक्रान्त न कर दिया गया हो ;

(ग) अन्तरित कृत्यों के लिए या उनके संबंध में ऐसी विनिर्दिष्ट तारीख से ठीक पूर्व उपगत सभी ऋण, बाध्यताएं और दायित्व, प्रशासन द्वारा या उसके साथ या उसके लिए की गई और की जाने वाली सभी संविदाएं, और सभी विषय तथा बातें निगम द्वारा, उसके साथ या उसके लिए उपगत, की गई या उसके द्वारा की जाने वाली समझी जाएंगी;

(घ) प्रशासन द्वारा प्रारम्भ से ठीक पूर्व या अंतरित कृत्यों के संबंध में किए गए सभी निर्धारण, मूल्यांकन, माप या विभाजन तब तक प्रवृत्त रहेंगे और निगम द्वारा किए गए समझे जाएंगे जब तक कि उन्हें निगम द्वारा किए गए किसी निर्धारण, मूल्यांकन, माप या विभाजन द्वारा अधिक्रांत नहीं कर दिया जाता;

(ङ) ऐसे प्रारम्भ से ठीक पूर्व अंतरित कृत्यों के संबंध में प्रशासन को देय सभी रेट, कर, फीस, भाटक और अन्य धनराशियां निगम को देय समझी जाएंगी;

(च) अन्तरित कृत्यों में या उनके संबंध में सभी उद्ग्रहणीय रेट, फीस, भाटक और अन्य प्रभार जब तक कि उन्हें निगम  द्वारा वहन नहीं कर लिया जाता है उसी दर से उद्गृहीत किए जाते रहेंगे जिस दर से वे ऐसे प्रारंभ के ठीक पूर्व प्रशासन द्वारा उद्गृहीत किए जाते रहे हैं;

(छ) अंतरित कृत्यों के संबंध में किसी विषय की बाबत ऐसे प्रारम्भ से ठीक पूर्व प्रशासन द्वारा या उसके विरुद्ध संस्थित या संस्थित किए जा सकने वाले सभी वाद और संव्यवहार और अन्य विधिक कार्यवाहियां निगम द्वारा या उसके विरुद्ध जारी रखी जा सकेंगी या संस्थित की जा सकेंगी;

(ज) अंतरित कृत्यों के संबंध में ऐसे प्रारंभ से ठीक पूर्व प्रशासक के अधीन कार्यरत प्रत्येक अधिकारी और अन्य कर्मचारी निगम को ऐसे पदनामों सहित, जो वह अवधारित करे, अंतरित हो जाएंगे और वे निगम के अधिकारी या अन्य कर्मचारी हो जाएंगे और उसी अवधि तक और उसी पारिश्रमिक पर और उन्हीं सेवा के निबंधनों और शर्तों पर पद धारण करेंगे जो वे उस समय धारण करते जब निगम स्थापित नहीं हुआ होता और तब तक ऐसा करते रहेंगे जब तक कि ऐसी अवधि, पारिश्रमिक और सेवा के निबंधनों और शर्तों को निगम द्वारा सम्यक् रूप से परिवर्तित नहीं कर दिया जाता :

परन्तु ऐसे किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी की सेवा की अवधि, पारिश्रमिक और निबंधनों तथा शर्तों को प्रशासक की पूर्व मंजूरी के बिना उसके अहित के लिए परिवर्तित नहीं किए जाएगा :

परन्तु यह और कि निगम ऐसे कृत्यों के निर्वहन के लिए किसी ऐसे अधिकारी या कर्मचारी को नियोजित कर सकेगा जिसे वह उचित समझे और प्रत्येक ऐसा अधिकारी या अन्य कर्मचारी तद्नुसार उन कृत्यों का निर्वहन करेगा ।

(3) पंजाब नगर निगम विधि (चंडीगढ़ पर विस्तारण) अधिनियम, 1994 के प्रारंभ के पश्चात् यथाशीघ्र प्रशासक निम्नलिखित के बारे में विनिश्चय करेगा,- 

(क) उपधारा (2) के खंड (क) में निर्दिष्ट किसी स्टोर, सामग्री, वस्तुओं और अन्य जंगम संपत्तियों का अंतरित कृत्यों के लिए या उनके संबंध में प्रशासक द्वारा उपयोग किया गया है; 

(ख) उक्त उपधारा के खंड (ग) में निर्दिष्ट कौन से ऋण, बाध्यताएं, दायित्व, संविदाएं, विषय और बातें प्रशासन के साथ या उसके लिए या अंतरित कृत्यों के संबंध में उपगत हुई है, की गई है या की जानी है;

(ग) उक्त उपधारा के खंड (छ) में निर्दिष्ट किन अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों ने अंतरित कृत्यों के संबंध में प्रशासक के अधीन कार्य किया है ।" ।

                धारा 431 का लोप करें ।

                अनुसूची 1 का लोप करें ।

                तीसरी अनुसूची में धारा 258, धारा 259 (1), धारा 260 (1), धारा 263 (4), धारा 265, धारा 266 (1) और (2), धारा 268, धारा 269, धारा 270, धारा 271, धारा 272(1) और (2), धारा 273 (1), (2) और (3) और, धारा 274 (1)  और उनके सामने दूसरे, तीसरे और चौथे स्तंभ में की प्रविष्टियों का लोप करें ।

कैपिटल आफ पंजाब (डेवलपमेंट एण्ड रेग्यूलेशन) ऐक्ट, 1952 का संशोधन

(1952 का पंजाब अधिनियम संख्यांक 27)

                धारा 7क के स्थान पर निम्नलिखित धारा रखें-

7क. 1976 के पंजाब अधिनियम सं० 42 के कतिपय उपबंधों को चंडीगढ़ पर लागू करने की शक्ति-(1) मुख्य प्रशासक समय-समय पर राजपत्र में अधिसूचना द्वारा और चंडीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक के पूर्व अनुमोदन से पंजाब म्यूनिसिपल कारपोरेशन ऐक्ट, 1976 के सभी या किन्हीं उपबंधों को, जहां तक वे चंडीगढ़ को लागू है, ऐसे अनुकूलनों और उपांतरों सहित जो ऐसी विषयवस्तु को प्रभावित न करते हों जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाएं, चंडीगढ़ या उसके किसी भाग को लागू कर सकेगा । 

(2) चंडीगढ़ को उपधारा (1) के अधीन अधिसूचना द्वारा लागू पंजाब म्यूनिसिपल कारपोरेशन ऐक्ट, 1976 (1976 का पंजाब अधिनियम संख्यांक 2) के उपबंधों के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करते समय या अपने कृत्यों का पालन करते समय मुख्य प्रशासक, प्रशासक के नियंत्रणाधीन होगा, न कि आयुक्त या उपायुक्त के । 

(3) कैपिटल आफ पंजाब (डेवलेपमेंट एंड रेग्यूलेशन) ऐक्ट, 1952 की धारा 7क (जिसे इसमें इसके पश्चात् प्रतिस्थापित धारा कहा गया है) के प्रतिस्थापन के होते हुए भी, प्रतिस्थापित धारा :- 

(क) प्रतिस्थापित धारा के पूर्व प्रवर्तन या उसके अधीन सम्यक् रूप से की गई या होने दी गई किसी बात को प्रभावित नहीं करेगी; या

(ख) प्रतिस्थापित धारा के अधीन अर्जित, प्रोद्भूत या किसी उपगत अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता या दायित्व को प्रभावित नहीं करेगी; या

(ग) प्रतिस्थापित धारा के विरुद्ध किए गए किसी अपराध के संबंध में उपगत किसी शास्ति, समपहरण या दंड को प्रभावित नहीं करेगी, किसी पूर्वोक्त अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता, दायित्व, शास्ति, समपहरण या दंड के संबंध में किसी अन्वेषण, विधिक कार्यवाहियों या उपचार को प्रभावित नहीं करेगी और ऐसा कोई अन्वेषण, विधिक कार्यवाही, या उपचार संस्थित किया जा सकेगा, जारी रखा जा सकेगा या प्रवर्तित किया जा सकेगा और ऐसा कोई विशेषाधिकार, समपहरण या दंड ऐसे अधिरोपित किया जा सकेगा मानो यह प्रतिस्थापन किया ही नहीं गया है ।" ।

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