मुसलमान वक्फ अधिनियम, 1923
(1923 का अधिनियम संख्यांक 42)
[5 अगस्त, 1923]
वक्फ सम्पत्ति के अधिक अच्छे प्रबन्ध के लिए तथा ऐसी सम्पत्तियों के बारे में
उचित लेखाओं का रखा जाना और प्रकाशन सुनिश्चित
करने के लिए उपबंध करने के लिए
अधिनियम
यह समीचीन है कि वक्फ सम्पत्ति के अधिक अच्छे प्रबन्ध के लिए तथा ऐसी सम्पत्तियों के बारे में उचित लेखाओं का रखा जाना और प्रकाशन सुनिश्चित करने के लिए उपबंध किया जाए ; अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है :-
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम मुसलमान वक्फ अधिनियम, 1923 है ।
[(2) इसका विस्तार [उन राज्यक्षेत्रों के सिवाय जो 1 नवम्बर, 1956 के ठीक पहले भाग ख राज्यों में समाविष्ट थे,] सम्पूर्ण भारत पर है ।]
(3) यह धारा तुरन्त प्रवृत्त होगी ; तथा
(4) राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के शेष उपबंध या उनमें से कोई, जिन्हें वह विनिर्दिष्ट करे, राज्य में या उसके किसी विनिर्दिष्ट भाग में ऐसी तारीख को, जिसे वह इस निमित्त नियत करे, प्रवृत्त होंगे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि विषय या संदर्भ में कोई बात विरुद्ध न हो,-
(क) "फायदे" के अन्तर्गत कोई ऐसा फायदा नहीं आता है जिसका दावा करने के लिए कोई मुतवल्ली केवल ऐसा मुतवल्ली होने के ही कारण हकदार है ;
(ख) "न्यायालय" से जिला न्यायाधीश का न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय की मामूली आरंभिक सिविल अधिकारिता की सीमाओं के भीतर उच्च न्यायालय के अधीनस्थ ऐसा न्यायालय अभिप्रेत है जिसे राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त अभिहित करे ;
(ग) "मुतवल्ली" से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो या तो मौखिक रूप से या किसी ऐसे विलेख या लिखत के अधीन, जिसके द्वारा किसी वक्फ का सृजन किया गया है, अथवा सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय द्वारा, किसी वक्फ का मुतवल्ली नियुक्त किया गया है, तथा नायब मुतवल्ली या मुतवल्ली के कर्तव्यों का पालन करने के लिए मुतवल्ली द्वारा नियुक्त अन्य व्यक्ति इसके अन्तर्गत है तथा इस अधिनियम में अन्यथा उपबंधित के सिवाय वह व्यक्ति भी इसके अंतर्गत है जो तत्समय किसी वक्फ सम्पत्ति का प्रशासन कर रहा है ;
(घ) "विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ; तथा
(ङ) "वक्फ" से मुसलमान धर्म के अनुयायी किसी व्यक्ति द्वारा, किसी ऐसे प्रयोजन के लिए किसी संपत्ति का स्थायी समर्पण अभिप्रेत है ; जो मुसलमान विधि द्वारा धार्मिक, पवित्र या पूर्त माना गया है, किन्तु इसके अन्तर्गत कोई ऐसा वक्फ नहीं आता है जो मुसलमान वक्फ विधिमान्यकरण अधिनियम, 1913 (1913 का 6) की धारा 3 में वर्णित है और जिसके अधीन तत्समय किसी फायदे के लिए दावा, उस व्यक्ति द्वारा जिसके द्वारा वक्फ का सृजन किया गया था, या उसके कुटुम्ब या वंशजों में से किसी के द्वारा, अपने लिए किया जा सकता है ।
विशिष्टियों के विवरण
3. वक्फ से सम्बन्धित विशिष्टियां देने की बाध्यता-(1) इस अधिनियम के प्रारंभ से छह मास के अन्दर प्रत्येक मुतवल्ली उस न्यायालय को जिसकी स्थानीय सीमाओं के अन्दर उस वक्फ की सम्पत्ति स्थित है जिसका कि वह मुतवल्ली है, या ऐसे दो या अधिक न्यायालयों में से किसी एक को, एक विवरण देगा जिसमें निम्नलिखित विशिष्टियां होंगी, अर्थात् :-
(क) वक्फ सम्पत्ति का ऐसा वर्णन जो उसकी पहचान के लिए पर्याप्त है ;
(ख) ऐसी सम्पत्ति से सकल वार्षिक आय ;
(ग) उस तारीख से जिसको विवरण दिया जाता है, पूर्ववर्ती पांच वर्षों के दौरान संगृहीत अथवा उस अवधि की, जो वक्फों का सृजन किए जाने के पश्चात् व्यतीत हुई है, इनमें से जो भी लघुतर अवधि हो, ऐसी आय की सकल रकम ;
(घ) सरकारी राजस्व और उपकरों की तथा सब भाटकों की रकम जो वक्फ सम्पत्ति के बारे में प्रतिवर्ष संदेय हो ;
(ङ) वक्फ सम्पत्ति की आय की वसूली में प्रतिवर्ष उपगत व्ययों का प्राक्कलन जो उस अवधि के अन्दर जिससे खण्ड (ग) के अधीन विशिष्टियां संबंधित हैं, उपगत ऐसे व्ययों के उपलभ्य ब्यौरों पर आधारित है ;
(च) वक्फ के अधीन निम्नलिखित के लिए अलग रखी गई रकम-
(त्) मुतवल्ली का वेतन और अन्य व्यक्तियों के भत्ते,
(त्त्) बिल्कुल धार्मिक प्रयोजन,
(त्त्त्) पूर्त प्रयोजन,
(त्ध्) कोई अन्य प्रयोजन ; तथा
(छ) कोई अन्य विशिष्टियां जो विहित की जाएं ।
(2) ऐसे प्रत्येक विवरण के साथ उस विलेख या लिखत की प्रति होगी जिसके द्वारा वक्फ का सृजन किया गया हो अथवा यदि ऐसा कोई विलेख या लिखत निष्पादित नहीं की गई है अथवा उसकी प्रति अभिप्राप्त नहीं की जा सकती है तो उसमें वक्फ के आरम्भ, स्वरूप तथा उद्देश्यों की पूर्ण विशिष्टियां होंगी जहां तक वे मुतवल्ली को ज्ञात हैं ।
(3) जहां-
(क) किसी वक्फ का इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् सृजन किया जाता है ; या
(ख) ऐसे वक्फ की दशा में, जैसा मुसलमान वक्फ विधिमान्यकरण अधिनियम, 1913 (1913 का 6) की धारा 3 में वर्णित है, वक्फ का सृजन करने वाला व्यक्ति या उसके कुटुम्ब का कोई सदस्य या उसके वंशजों में से कोई इस अधिनियम के प्रारम्भ पर जीवित है और उसके अधीन किसी फायदे का दावा करने का हकदार है,
वहां उपधारा (1) में निर्दिष्ट विवरण, खण्ड (क) में निर्दिष्ट दशा में उस तारीख से, जिसको वक्फ का सृजन किया जाता है, अथवा यदि उसका किसी लिखित दस्तावेज द्वारा सृजन किया गया है, तो उस तारीख से, जिसको ऐसा दस्तावेज निष्पादित किया जाता है, छह मास के अन्दर, अथवा खण्ड (ख) में निर्दिष्ट दशा में यथापूर्वोक्त फायदे के हकदार व्यक्ति की, या, यथास्थिति, किसी ऐसे व्यक्ति के अंतिम उत्तरजीवी की, मृत्यु की तारीख से छह मास के अन्दर दिया जाएगा ।
4. विशिष्टियों का प्रकाशन और अतिरिक्त विशिष्टियों की अध्यपेक्षा-(1) जब धारा 3 के अधीन कोई विवरण दिया गया है, तो न्यायालय उसके दिए जाने की सूचना न्यायालय-भवन में किसी सहजदृश्य स्थान पर लगवाएगा और ऐसी अन्य रीति से प्रकाशित कराएगा जो विहित की जाए तथा तत्पश्चात् कोई व्यक्ति लिखित अर्जी द्वारा, जिसके साथ विहित फीस होगी, न्यायालय को आवेदन कर सकेगा कि मुतवल्ली से अतिरिक्त विशिष्टियां या दस्तावेजें देने की अपेक्षा करने वाला आदेश जारी किया जाए ।
(2) ऐसा आवेदन किए जाने पर ऐसी जांच, यदि कोई हो, जैसी वह ठीक समझता है, करने के पश्चात् यदि न्यायालय की यह राय है कि कोई अतिरिक्त विशिष्टियां या दस्तावेजें इसलिए आवशयक हैं कि वक्फ के आरम्भ, स्वरूप या उद्देश्यों या वक्फ सम्पत्ति की दशा या प्रबंध के बारे में पूर्ण जानकारी प्राप्त हो सके तो वह मुतवल्ली पर एक आदेश की तामील कराएगा जिसमें उससे यह अपेक्षा की जाएगी कि वह ऐसी विशिष्टयां और दस्तावेजें उतने समय के अन्दर दे जो न्यायालय आदेश में निर्दिष्ट करे ।
लेखाओं का विवरण और लेखापरीक्षा
5. लेखाओं का विवरण-धारा 3 में निर्दिष्ट विवरण जिस तारीख को दिया गया है, उसके ठीक बाद के मार्च के इकतीसवें दिन के पश्चात् तीन मास के अन्दर तथा तत्पश्चात् प्रत्येक वर्ष मार्च के इकतीसवें दिन से तीन मास के अन्दर, प्रत्येक मुतवल्ली उस वक्फ के निमित्त, जिसका वह मुतवल्ली है, यथास्थिति, मार्च के ऐसे इकतीसवें दिन समाप्त होने वाली बारह मास की अवधि के दौरान या उक्त अवधि के उस भाग के दौरान जिसमें इस अधिनियम के उपबन्ध उस वक्फ को लागू रहे हैं, उसके द्वारा प्राप्त या व्यय की गई सब धनराशियों के लेखाओं का पूरा और सही विवरण ऐसे प्ररूप में और ऐसी विशिष्टियों सहित तैयार करेगा जो विहित की जाएं, और उस न्यायालय को देगा जिसको ऐसा विवरण दिया गया था :
परन्तु न्यायालय इस धारा के अधीन लेखाओं का कोई विवरण देने के लिए अनुज्ञात समय को उस दशा में बढ़ा सकेगा जब उसका समाधान हो जाता है कि ऐसा करने के लिए पर्याप्त कारण है ।
6. लेखाओं की संपरीक्षा-धारा 5 के अधीन न्यायालय को दिए जाने के पहले लेखाओं के प्रत्येक विवरण की संपरीक्षा-
(क) ऐसे वक्फ की दशा में, जिसकी सकल आय संबंधित वर्ष के दौरान, सरकार को संदेय भू-राजस्व और उपकरों की, यदि कोई हों, कटौती के पश्चात्, दो हजार रुपए से अधिक है ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाएगी जो भारतीय कम्पनी अधिनियम, 1913 (1913 का 7) की धारा 144 के अधीन [केन्द्रीय सरकार] द्वारा दिए गए प्रमाणपत्र का धारक है या किसी ऐसी संस्था या संगम का सदय है जिसके सदस्य उन समस्त [राज्यक्षेत्रों में जिनको यह अधिनियम लागू होता है,] उस धारा के अधीन कम्पनियों के संपरीक्षकों के रूप में कार्य करने के हकदार घोषित किए गए हैं ;
(ख) किसी अन्य वक्फ की दशा में, किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाएगी जो उक्त न्यायालय के साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत है ।
साधारण उपबंध
7. मुतवल्ली को संपरीक्षा आदि के खर्चे का वक्फ निधियों में से संदाय करने का हक होना-किसी वक्फ का सृजन करने वाले विलेख या लिखत में किसी बात के होते हुए भी, प्रत्येक मुतवल्ली, धारा 3 या धारा 4 के अधीन कोई विशिष्टियां, दस्तावेजें या प्रतियां देने में उसको समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए, या इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए वार्षिक लेखाओं की तैयारी या संपरीक्षा के सम्बन्ध में, उसके द्वारा उचित रूप से उपगत किन्हीं व्ययों का संदाय उस वक्फ सम्पत्ति की आय में से कर सकेगा ।
8. सत्यापन-धारा 3 या धारा 4 के अधीन दी गई विशिष्टियों का प्रत्येक विवरण, और धारा 5 के अधीन दिया गया लेखाओं का प्रत्येक विवरण उस न्यायालय की भाषा में लिखा होगा जिसको वह दिया जाता है तथा अभिवचनों के हस्ताक्षरित और सत्यापित किए जाने के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में विहित रीति से सत्यापित किया जाएगा ।
9. निरीक्षण और प्रतियां-कोई भी व्यक्ति, न्यायालय की अनुज्ञा से तथा विहित फीस संदत्त करने पर, किसी ऐसे समय जब न्यायालय खुला हो, धारा 3 या धारा 4 के अधीन न्यायालय को दिए गए विशिष्टियों के किसी विवरण या किसी दस्तावेज अथवा धारा 5 के अधीन उसे दिए गए लेखाओं के किसी विवरण अथवा धारा 6 के अधीन संपरीक्षा के बारे में की गई किसी संपरीक्षा रिपोर्ट का विहित रीति से निरीक्षण करने या उसकी प्रति अभिप्राप्त करने का हकदार होगा ।
शास्ति
10. शास्तियां-यदि कोई व्यक्ति, जो किसी वक्फ से संबंधित विशिष्टियों का विवरण या कोई दस्तावेज देने के लिए धारा 3 या धारा 4 के द्वारा या अधीन अपेक्षित है, अथवा जो लेखाओं का विवरण देने के लिए धारा 5 द्वारा अपेक्षित है, युक्तियुक्त कारण के बिना, जिसे साबित करने का भार उसी पर होगा, यथास्थिति, ऐसा विवरण या दस्तावेज सम्यक् समय पर देने में असफल रहेगा या ऐसा विवरण देगा जिसकी किसी सारवान् विशिष्टि का मिथ्या, भुलावा देने वाली या असत्य होना वह जानता है या ऐसा विश्वास करने का उसके पास कारण है, अथवा लेखाओं के विवरण की दशा में, ऐसा विवरण देगा, जिसकी धारा 6 द्वारा अपेक्षित रीति से संपरीक्षा नहीं की गई है तो वह जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा अथवा द्वितीय या पश्चात्वर्ती अपराध की दशा में, जुर्माने से, जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा दण्डनीय होगा ।
नियम
11. नियम बनाने की शक्ति-(1) राज्य सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा पूर्व प्रकाशन के पश्चात् बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया, और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी विषयों या उनमें से किसी के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात् :-
(क) धारा 3 की उपधारा (1) के खण्ड (ग) के अधीन मुतवल्लियों द्वारा दी जाने वाली अतिरिक्त विशिष्टियां ;
(ख) धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन न्यायालय को किए गए आवेदनों पर प्रभारित की जाने वाली फीसें ;
(ग) वह प्ररूप जिसमें धारा 5 में निर्दिष्ट लेखाओं का विवरण दिया जाएगा, और वे विशिष्टियां जो उसमें होंगी ;
(घ) वे शक्तियां जो धारा 6 में निर्दिष्ट किसी संपरीक्षा के प्रयोजन के लिए संपरीक्षकों द्वारा प्रयुक्त की जा सकेंगी तथा ऐसे संपरीक्षकों की रिपोर्टों में होने वाली विशिष्टियां ;
(ङ) धारा 9 के अधीन निरीक्षण अनुज्ञात करने और प्रतियों का प्रदाय करने के लिए प्रभार्य फीसें ;
(च) इस अधिनियम के अधीन न्यायालयों को दिए गए विवरणों की, संपरीक्षा रिपोर्टों की और विलेखों या लिखतों की प्रतियों की सुरक्षित अभिरक्षा ; और
(छ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या किया जाए ।
[(3) इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखा जाएगा ।]
12. व्यावृत्तियां-इस अधिनियम की कोई बात-
(क) [उन राज्यक्षेत्रों में जिन पर यह अधिनियम लागू होता है] तत्समय प्रवृत्त किसी ऐसी अन्य अधिनियमिति को प्रभावित नहीं करेगी जो धार्मिक या पूर्त विन्यासों के नियंत्रण या पर्यवेक्षण के लिए उपबंध करती है ; अथवा
(ख) किसी ऐसे वक्फ के मामले में लागू नहीं होगी जिसकी सम्पत्ति-
(त्) पूर्त विन्यासों के कोषपाल, महाप्रशासक, या शासकीय न्यासी द्वारा प्रशासित की जा रही है, या
(त्त्) या तो सक्षम अधिकारिता वाले किसी न्यायालय द्वारा नियुक्त किसी रिसीवर द्वारा अथवा उस वक्फ के प्रशासन के लिए ऐसी स्कीम के अधीन प्रशासित की जा रही है जो सक्षम अधिकारिता वाले किसी न्यायालय द्वारा अथवा किसी अधिनियमिति के उपबंधों के अधीन कार्य करने वाले किसी अन्य प्राधिकरण द्वारा तय या अनुमोदित की गई है ।
13. छूट-राज्य सरकार मुसलमानों के किसी विनिर्दिष्ट वर्ग के फायदे के लिए सृष्ट या प्रशासित किसी वक्फ या वक्फों को इस अधिनियम के या इसके किसी विनिर्दिष्ट उपबंध के प्रवर्तन से राजपत्र में अधिसूचना द्वारा छूट दे सकेगी ।
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