पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 2013
(2013 का अधिनियम संख्यांक 23)
[18 सितम्बर, 2013]
पेंशन निधियों की स्कीमों के अभिदाताओं के हितों का संरक्षण करने के लिए
पेंशन निधियों को स्थापित, विकसित और विनियमित करके वार्धक्य
आय प्रतिभूति का संवर्धन करने हेतु एक प्राधिकरण की
स्थापना के लिए तथा उससे संबंधित या उसके
आनुषंगिक विषयों का उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के चौंसठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 2013 है ।
(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे:
परंतु इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और किसी ऐसे उपबंध में ऐसे अधिनियम के प्रारंभ के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस उपबंध के प्रवृत्त होने के प्रति निर्देश है ।
2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) प्राधिकरण" से धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित पेंशन निधि विनियामक और विकास प्रधिकरण अभिप्रेत है;
(ख) केन्द्रीय अभिलेखपालन अभिकरण" से अभिलेखपालन, लेखा, प्रशासन और स्कीमों के अभिदाताओं के लिए ग्राहक सेवा के कृत्यों के पालन के लिए धारा 27 के अधीन रजिस्ट्रीकृत कोई अभिकरण अभिप्रेत है;
(ग) अध्यक्ष" से प्राधिकरण का अध्यक्ष अभिप्रेत है;
(घ) दस्तावेज" के अंतर्गत अक्षरों, अंकों या चिह्नों के माध्यम द्वारा या एक से अधिक उन माध्यमों द्वारा किसी पदार्थ पर मुद्रित या इलैक्ट्रानिक रूप में लिखित, अभिव्यक्त या वर्णित कोई विषय-वस्तु सम्मिलित है, जो उस विषय-वस्तु के अभिलेखन के प्रयोजन के लिए अंतरिम पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण, या राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली से संबद्ध प्राधिकरण या किसी मध्यवर्ती या किसी अन्य अस्तित्व द्वारा प्रयोग किए जाने के लिए आशयित है या प्रयुक्त की जा सकेगी;
(ङ) व्यष्टि पेंशन लेखा" से, राष्ट्रीय पेंशन स्कीम के अधीन निबन्धनों और शर्तों को उपवर्णित करते हुए किसी संविदा के द्वारा निष्पादित किसी अभिदाता का कोई लेखा अभिप्रेत है;
(च) अंतरिम पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण" से संकल्प संख्या एफ० सं० 5/7/2003-ईसीबी एंड पी आर, तारीख 10 अक्तूबर, 2003 और एफ० सं० 1(6) /2007-पी आर, तारीख 14 नवम्बर, 2008 के माध्यम से केन्द्रीय सरकार द्वारा गठित अंतरिम पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण अभिप्रेत है;
(छ) मध्यवर्ती" में पेंशन निधि, केन्द्रीय अभिलेखपालन अभिकरण, राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली न्यास, पेंशन निधि सलाहकार, सेवानिवृत्ति सलाहकार, उपस्थिति अस्तित्व और ऐसा अन्य व्यक्ति या अस्तित्व सम्मिलित हैं जो संग्रहण, प्रबन्धन, अभिलेखपालन और संचयों के वितरण से संबंधित हैं;
(ज) सदस्य" से प्राधिकरण का कोई सदस्य अभिप्रेत है और जिसमें उसका अध्यक्ष सम्मिलित है;
(झ) राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली" से धारा 20 में निर्दिष्ट अभिदायी पेंशन प्रणाली अभिप्रेत है जिसके द्वारा उपस्थिति अस्तित्व की प्रणाली, केन्द्रीय अभिलेखपालन अभिकरण और विनियमों द्वारा यथाविनिर्दिष्ट संदायों के लिए पेंशन निधियों द्वारा संचयों का उपयोग करते हुए अभिदाता से अभिदाय संगृहीत किए जाते हैं और किसी व्यष्टि पेंशन लेखा में संचित किए जाते हैं;
(ञ) राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली न्यास" से वह न्यासी बोर्ड अभिप्रेत है जो अभिदाताओं के फायदे के लिए उनकी आस्तियां धारित करता है;
(ट) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;
(ठ) पेंशन निधि" से कोई मध्यवर्ती अभिप्रेत है जिसे, ऐसी रीति में, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, अभिदाय प्राप्त करने, उनका संचयन करने और अभिदाता को संदाय करने के लिए प्राधिकरण द्वारा धारा 27 की उपधारा (3) के अधीन रजिस्ट्रीकरण का प्रमाणपत्र प्रदान किया गया है;
(ड) पेंशन विनियामक और विकास निधि" से धारा 40 की उपधारा (1) के अधीन गठित निधि अभिप्रेत है;
(ढ) उपस्थिति अस्तित्व" से कोई मध्यवर्ती अभिप्रेत है जो धारा धारा 27 की उपधारा (3) के अधीन उपस्थिति अस्तित्व के रूप में प्राधिकरण के पास रजिस्ट्रीकृत है और जो निधियों और अनुदेशों को प्राप्त करने और उनका पारेषण करने तथा निधियों में से उनका संदाय करने के प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय अभिलेखपालन अभिकरण के साथ इलैक्ट्रानिक संयोजकता रखने में समर्थ है;
(ण) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(त) विनियमित आस्तियों" से केन्द्रीय अभिलेखापालन अभिकरण के स्वामित्वाधीन, पट्टाधृत और उसके द्वारा विकसित आस्तियां और सम्पत्तियां, मूर्त और अमूर्त दोनों तथा उसके अन्य अधिकार अभिप्रेत हैं;
(थ) विनियम" से इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियम अभिप्रेत हैं;
(द) स्कीम" से इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण द्वारा अनुमोदित पेंशन निधि की कोई स्कीम अभिप्रेत है;
(ध) प्रतिभूति अपील अधिकरण" से भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) की धारा 15] की उपधारा (1) के अधीन स्थापित कोई प्रतिभूति अपील अधिकरण अभिप्रेत है;
(न) अभिदाता" के अंतर्गत ऐसा व्यक्ति भी है जो किसी पेंशन निधि की किसी स्कीम में अभिदाय करता है;
(प) अभिदाता शिक्षा और संरक्षण निधि" से धारा 41 की उपधारा (1) के अधीन गठित निधि अभिप्रेत है;
(फ) न्यासी बैंक" से बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) में यथापरिभाषित बैंककारी कंपनी अभिप्रेत है ।
(2) उन शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं, और परिभाषित नहीं हैं किन्तु जो-
(i) बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4);
(ii) कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1);
(iii) प्रतिभूति संविदा (विनिमयन) अधिनियम, 1956 (1956 का 42); और
(iv) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15),
में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे जो उनके अधिनियमों में हैं ।
अध्याय 2
पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण
3. प्राधिकरण की स्थापना और निगमन-(1) उस तारीख से, जो केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा नियत करे, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण नामक एक प्राधिकरण की स्थापना की जाएगी ।
(2) प्राधिकरण उपर्युक्त नाम से एक निगमित निकाय होगा, जिसका शाश्वत् उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होगी, जिसे इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए जंगम और स्थावर, दोनों ही प्रकार की सम्पत्ति का अर्जन, धारण और व्ययन करने तथा संविदा करने की शक्ति होगी तथा उक्त नाम से वह वाद लाएगा या उस पर वाद लाया जाएगा ।
(3) प्राधिकरण का मुख्यालय राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र योजना बोर्ड अधिनियम, 1985 (1985 का 2) की धारा 2 के खण्ड (च) में निर्दिष्ट राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में होगा ।
(4) प्राधिकरण भारत में अन्य स्थानों पर कार्यालय स्थापित कर सकेगा ।
4. प्राधिकरण की संरचना-प्राधिकरण निम्नलिखित सदस्यों, अर्थात्: -
(क) एक अध्यक्ष;
(ख) तीन पूर्णकालिक सदस्यों; और
(ग) तीन अंशकालिक सदस्यों,
से मिलकर बनेगा, जिन्हें केन्द्रीय सरकार द्वारा, योग्यता, सत्यनिष्ठा और प्रतिष्ठा वाले तथा अर्थशास्त्र या वित्त या विधि का अनुभव रखने वाले व्यक्तियों में से नियुक्त किया जाएगा, जिनमें प्रत्येक विद्या शाखा में से कम से कम एक व्यक्ति होगा ।
5. प्राधिकरण के अध्यक्ष और सदस्यों की पदावधि और सेवा की शर्तें-(1) अध्यक्ष और प्रत्येक पूर्णकालिक सदस्य, उस तारीख से, जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है, पांच वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेंगे और पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र होंगे:परंतु कोई व्यक्ति, उसके पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त करने के पश्चात् अध्यक्ष के रूप में पद धारण नहीं करेगा:परंतु यह और कि कोई व्यक्ति, उसके बासठ वर्ष की आयु प्राप्त करने के पश्चात् पूर्णकालिक सदस्य के रूप में पद धारण नहीं करेगा ।
(2) कोई अंशकालिक सदस्य उस तारीख से, जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है, पांच वर्ष से अनधिक की अवधि के लिए उस रूप में पद धारण करेगा ।
(3) अंशकालिक सदस्यों से भिन्न सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें वे होंगी, जो विहित की जाएं ।
(4) अंशकालिक सदस्य ऐसे भत्ते प्राप्त करेंगे, जो विहित किए जाएं ।
(5) किसी सदस्य के वेतन, भत्ते तथा सेवा की शर्तों में उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।
(6) उपधारा (1) या उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी कोई सदस्य-
(क) केन्द्रीय सरकार को तीस दिन से अन्यून की लिखित सूचना देकर अपना पद त्याग सकेगा; या
(ख) धारा 6 के उपबंधों के अनुसार उसके पद से हटाया जा सकेगा ।
6. सदस्यों का पद से हटाया जाना-(1) केन्द्रीय सरकार, अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को, -
(क) जो दिवालिया न्यायनिर्णीत किया जाता है या किसी समय किया गया है; या
(ख) सदस्य के रूप में कार्य करने में शारीरिक या मानसिक रूप से असमर्थ हो गया है; या
(ग) जो किसी ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है जिसमें केन्द्रीय सरकार की राय में नैतिक अधमता अन्तर्वलित है; या
(घ) जिसने ऐसा वित्तीय या अन्य हित अर्जित किया है जिससे सदस्य के रूप में उसके कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है; या
(ङ) जिसने केन्द्रीय सरकार की राय में अपने पद का ऐसा दुरुपयोग किया है जिसके कारण उसका पद पर बने रहना लोक हित में हानिकारक है,पद से हटा सकेगी ।
(2) किसी ऐसे अध्यक्ष या अन्य सदस्य को उपधारा (1) के खण्ड (घ) या खण्ड (ङ) के अधीन तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक उसे उस विषय में सुनवाई का उचित अवसर नहीं दे दिया जाता है ।
7. सदस्यों के भावी नियोजन पर निर्बंधन-(1) अध्यक्ष और पूर्णकालिक सदस्य उनके उस रूप में पद पर न रहने की तारीख से दो वर्ष की अवधि तक-
(क) या तो केन्द्रीय सरकार के अधीन या किसी राज्य सरकार के अधीन कोई नियोजन; या
(ख) पेंशन सेक्टर में किसी विनियमित अस्तित्व में कोई नियुक्ति,केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के सिवाय स्वीकार नहीं करेंगे ।
(2) अंतरिम पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष और पूर्णकालिक सदस्य, जो इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व इस प्रकार पद धारण कर रहे थे, ऐसे प्रारंभ को और उसके पश्चात्, उस तारीख से, जिसको वे इस प्रकार पद पर नहीं रहते हैं, दो वर्ष की अवधि के लिए पेंशन सेक्टर में किसी विनियमित अस्तित्व में, केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुमति के सिवाय कोई नियुक्ति स्वीकार नहीं करेंगे ।
8. अध्यक्ष की प्रशासनिक शक्तियां-अध्यक्ष को, प्राधिकरण के सभी प्रशासनिक विषयों की बाबत साधारण अधीक्षण और निदेशन की शक्तियां होंगी ।
9. प्राधिकरण के अधिवेशन-(1) प्राधिकरण का अधिवेशन ऐसे समय और स्थानों पर होगा और वह अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के बारे में (जिनके अन्तर्गत ऐसे अधिवेशनों में गणपूर्ति है) प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगा जो विनियमों द्वारा उपबंधित किए जाएं ।
(2) अध्यक्ष या, यदि वह किसी कारण से, प्राधिकरण के अधिवेशन में उपस्थित होने में असमर्थ है तो उस अधिवेशन में उपस्थित सदस्यों द्वारा अपने में से निर्वाचित कोई अन्य सदस्य उस अधिवेशन की अध्यक्षता करेगा ।
(3) प्राधिकरण के किसी अधिवेशन में, उसके समक्ष आने वाले सभी प्रश्नों का विनिश्चय, उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के बहुमत द्वारा किया जाएगा और मत बराबर होने की दशा में अध्यक्ष या उसकी अनुपस्थिति में अध्यक्षता करने वाले व्यक्ति का द्वितीय या निर्णायक मत होगा ।
(4) यदि कोई सदस्य, जो किसी कम्पनी का निदेशक है, और उसके ऐसे निदेशक के रूप में, प्राधिकरण के किसी अधिवेशन में विचार के लिए आने वाले किसी विषय में कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष धनीय हित है तो वह सुसंगत परिस्थितियों के उसकी जानकारी में आने के पश्चात्, यथासंभव शीघ्र ऐसे अधिवेशन में अपने हित की प्रकृति को प्रकट करेगा और ऐसा प्रकटन प्राधिकरण की कार्यवाहियों में लेखबद्ध किया जाएगा तथा वह सदस्य, उस विषय की बाबत प्राधिकरण के किसी विचार-विमर्श या विनिश्चय में भाग नहीं लेगा ।
10. रिक्तियों, आदि से प्राधिकरण की कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना-प्राधिकरण का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि-
(क) प्राधिकरण में कोई रिक्ति है, या उसके गठन में कोई त्रुटि है; या
(ख) प्राधिकरण के सदस्य के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति की नियुक्ति में कोई त्रुटि है; या
(ग) प्राधिकरण की प्रक्रिया में कोई ऐसी अनियमितता है, जो मामले के गुणागुण पर प्रभाव नहीं डालती है ।
11. प्राधिकरण के अधिकारी और कर्मचारी-(1) प्राधिकरण, उतने अधिकारियों और कर्मचारियों को नियुक्त कर सकेगा, जो वह इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के दक्षतापूर्ण निर्वहन के लिए आवश्यक समझे ।
(2) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त किए गए प्राधिकरण के अधिकारी और अन्य कर्मचारियों की सेवा के निबन्ध और अन्य शर्तें वे होंगी, जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाएं ।
अध्याय 3
विस्तार और लागू होना
12. विस्तार और लागू होना-(1) यह अधिनियम, -
(क) राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली;
(ख) किसी अन्य पेंशन स्कीम, जो किसी अन्य अधिनियमिति द्वारा विनियमित नहीं की जाती है, को लागू होगा ।
(2) खण्ड (ख) में निर्दिष्ट प्रत्येक पेंशन स्कीम, ऐसे समय के भीतर जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए, प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों के अनुरूप होगी ।
(3) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के उपबंध निम्नलिखित को लागू नहीं होंगे-
(क) निम्नलिखित के अधीन स्कीमें या निधियां-
(i) कोयला खान भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1948 (1948 का 46);
(ii) कर्मचारी भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 (1952 का 19);
(iii) नाविक भविष्य निधि अधिनियम, 1966 (1966 का 4);
(iv) असम चाय बागान भविष्य निधि और पेंशन निधि स्कीम अधिनियम, 1955 (1955 का असम अधिनियम 10); और
(v) जम्मू-कश्मीर कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम, 1961 (1961 का जम्मू और कश्मीर अधिनियम 15);
(ख) बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) की धारा 2 की उपधारा (2) और उपधारा (11) में निर्दिष्ट संविदा;
(ग) कोई अन्य पेंशन स्कीम जिसे केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के लागू होने से छूट दे;
(घ) अखिल भारतीय सेवा अधिनियम, 1951 (1951 का 61) की धारा 2क के अधीन गठित संघ या अखिल भारतीय सेवाओं के क्रियाकलापों के संबंध में लोक सेवाओं में 1 जनवरी, 2004 से पूर्व नियुक्त व्यक्ति;
(ङ) किसी राज्य या ऐसे संघ राज्यक्षेत्र के, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं, क्रियाकलापों के संबंध में लोक सेवाओं में नियुक्त व्यक्ति ।
(4) उपधारा (3) में किसी बात के होते हुए भी, कोई राज्य सरकार या किसी संघ राज्यक्षेत्र का प्रशासक, अधिसूचना द्वारा राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली का अपने कर्मचारियों पर विस्तार कर सकेगी ।
(5) केंद्रीय सरकार, उपधारा (3) के खंड (ग) में किसी बात के होते हुए भी, किसी अन्य पेंशन स्कीम को [जिसके अंतर्गत उपधारा (3) के खंड (ग) के अधीन छूट प्राप्त और अधिसूचित कोई अन्य पेंशन स्कीम भी हैट अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के लागू होने का विस्तार कर सकेगी ।
(6) उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी स्कीम या निधियों के अधीन शासित कोई व्यक्ति अपने विकल्प पर राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली में सम्मिलित हो सकेगा ।
अध्याय 4
अंतरिम पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण की आस्तियों,
दायित्वों, आदि का अंतरण
13. अंतरिम पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण की आस्तियों, दायित्वों, आदि का अंतरण-अंतरिम पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण की स्थापना की तारीख से ही, -
(क) अंतरिम पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण की सभी आस्तियां और दायित्व, प्राधिकरण में अंतरित और निहित हो जाएंगे ।
स्पष्टीकरण-अंतरिम पेंशन निधि विनियामक और विकास प्रधिकरण की आस्तियों में सभी अधिकार और शक्तियां, सभी संपत्तियां, चाहे स्थावर हों या जंगम, जिसमें, विशेषकर नकदी बकाया, निक्षेप और सभी अन्य हित तथा ऐसी संपत्तियों में या उससे उद्भूत अधिकार, जो अंतरिम पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण के कब्जे में हों, तथा उससे संबंधित सभी लेखा बहियां और अन्य दस्तावेज सम्मिलित समझे जाएंगे; तथा दायित्वों में, सभी ऋण, दायित्व और अन्य बाध्यताएं, चाहे जिस प्रकार की हों, सम्मिलित समझी जाएगी;
(ख) खंड (क) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना उस तारीख से ठीक पूर्व, उक्त विनियामक प्राधिकरण के प्रयोजन के लिए या उसके संबंध में, उपगत सभी ऋण, बाध्यताएं और दायित्व, की गई सभी संविदाएं और अंतरिम पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण द्वारा, उसके साथ या उसके लिए किए जाने के लिए वचनबद्ध सभी विषय और बातें, प्राधिकरण द्वारा, उसके साथ या उसके लिए उपगत, की गई या की जाने के लिए वचनबद्ध समझी जाएंगी;
(ग) उस तारीख से ठीक पूर्व, अंतरिम पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण को देय सभी धनराशियां प्राधिकरण को देय समझी जाएंगी; और
(घ) उस तारीख से ठीक पूर्व अंतरिम पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण द्वारा या उसके विरुद्ध संस्थित की गई या जो संस्थित की जा सकती थी, सभी वाद और अन्य विधिक कार्यवाहियां प्राधिकरण द्वारा या उसके विरुद्ध जारी रह सकेंगी या संस्थित की जा सकेंगी ।
अध्याय 5
प्राधिकरण के कर्तव्य, शक्तियां और कृत्य
14. प्राधिकरण के कर्तव्य, शक्तियां और कृत्य-(1) इस अधिनियम और तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, प्राधिकरण का यह कर्तव्य होगा कि वह राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली और पेंशन स्कीमों को, जिनको यह अधिनियम लागू होता है, नियमित, संवर्धित करे और उनकी क्रमिक वृद्धि को सुनिश्चित करे तथा ऐसी प्रणाली या स्कीमों के अभिदाताओं के हितों का संरक्षण करे ।
(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट उपबन्धों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्राधिकरण की शक्तियों और कृत्यों में निम्नलिखित सम्मिलित होंगे-
(क) राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली और पेंशन स्कीमों का, जिनको यह अधिनियम लागू होता है, विनियमन;
(ख) स्कीमों, उनके निबन्धनों और शर्तों का अनुमोदन करना तथा पेंशन निधियों के समग्र प्रबन्धन के मानक अधिकथित करना, जिनके अन्तर्गत ऐसी स्कीमों के अधीन विनिधान के मार्गदर्शक सिद्धान्त भी हैं;
(ग) मध्यवर्तियों का रजिस्ट्रीकरण और विनियमन;
(घ) आवेदन पर किसी मध्यवर्ती को एक रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र जारी करना और ऐसे रजिस्ट्रीकरण का नवीकरण, उपांतरण, प्रत्याहरण, निलम्बन या रद्दकरण;
(ङ) अभिदाताओं के हितों का, -
(i) ऐसी पेंशन निधियों की, जिनको यह अधिनियम लागू होता है, विभिन्न स्कीमों के अभिदाताओं के अभिदाय की सुरक्षा सुनिश्चित करके;
(ii) यह सुनिश्चित करके कि राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली के अधीन मध्यवर्ती और अन्य प्रक्रिया संबंधी लागत मितव्ययी और युक्तियुक्त है, सरंक्षण करना;
(च) विनियमों द्वारा अवधारित किए जाने वाले अभिदाताओं की शिकायतों को दूर करने के लिए तंत्र स्थापित करना;
(छ) पेंशन प्रणाली से संबंधित वृत्तिक संगठनों को प्रोन्नत करना;
(ज) मध्यवर्तियों के बीच तथा मध्यवर्तियों और अभिदाताओं के बीच विवादों का न्यायनिर्णयन;
(झ) आंकडे़ संग्रहण करना और मध्यवर्तियों से ऐसे आंकडे़ संग्रहण करने की अपेक्षा करना तथा अध्ययन, अनुसंधान और परियोजनाओं का जिम्मा लेना और उन्हें चलाना;
(ञ) पेंशन, सेवानिवृत्ति, बचतों और संबंधित विवाद्यकों तथा मध्यवर्तियों के प्रशिक्षण से संबंधित विवाद्यकों पर अभिदाताओं और साधारण जनता को शिक्षित करने के लिए कदम उठाना;
(ट) पेंशन निधियों के पालन से संबंधित सूचना के प्रसारण का मानकीकरण तथा न्यूनतम मानकों का पालन;
(ठ) विनियमित आस्तियों का विनियमन;
(ड) इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए फीस या अन्य प्रभार उद्गृहीत करना;
(ढ) उस रूप और रीति को, जिसमें मध्यवर्तियों द्वारा लेखा बहियां बनाए रखी जाएंगी और लेखाओं का विवरण दिया जाएगा, विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट करना;
(ण) पेंशन निधियों से संबंधित मध्यवर्तियों और अन्य अस्तित्वों या संगठनों से सूचना मंगाना, उनका निरीक्षण करना, उनके संबंध में जांच या अन्वेषण, जिसके अन्तर्गत लेखापरीक्षा भी है, का संचालन करना;
(त) ऐसी अन्य शक्तियों और कृत्यों का प्रयोग करना, जो विहित किए जाएं ।
(3) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (2) के खण्ड (ण) के अधीन शक्तियों का प्रयोग करते समय, प्राधिकरण को वही शक्तियां होंगी जो निम्नलिखित विषयों के संबंध में किसी वाद का विचारण करते समय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी सिविल न्यायालय में निहित हैं, अर्थात्ः-
(i) ऐसे स्थान पर और ऐसे समय पर जो प्राधिकरण द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए, लेखा बहियों और अन्य दस्तावेजों का प्रकटीकरण और उन्हें प्रस्तुत करना;
(ii) व्यक्तियों को समन करना और उन्हें हाजिर कराना तथा शपथ पर उनकी परीक्षा करना;
(iii) किसी स्थान पर धारा 26 में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति या मध्यवर्ती की किसी पुस्तक, रजिस्टर और अन्य दस्तावेजों का निरीक्षण करना;
(iv) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना;
(v) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए ।
(4) उपधारा (1), उपधारा (2) और उपधारा (3) तथा धारा 16 में अन्तर्विष्ट उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्राधिकरण, आदेश द्वारा अभिदाताओं के हितों में लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से, अन्वेषण या जांच के लम्बित रहने के दौरान निम्नलिखित कोई उपाय कर सकेगी, अर्थात्ः-
(i) व्यक्तियों को किसी स्कीम में भाग लेने से अवरुद्ध करना;
(ii) किसी मध्यवर्ती के किसी पदधारी को उस रूप में कार्य करने से अवरुद्ध करना;
(iii) किसी क्रियाकलाप की बाबत, जो अन्वेषणाधीन है, स्कीम के अधीन आगमों को परिबद्ध करना और प्रतिधारित करना;
(iv) अनुमोदन के लिए किए गए आवेदन पर, अधिकारिता रखने वाले प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा आदेश पारित किए जाने के पश्चात्, इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के किसी उपबंध का किसी भी रीति में अतिक्रमण करने वाले किसी मध्यवर्ती या अन्य व्यक्ति के एक या अधिक बैंक खाते या खातों को एक मास से अनधिक की अवधि के लिए कुर्क करना:
परन्तु केवल बैंक खाते या खातों या उनमें किए गए किसी संव्यवहार को ही, जो इस अधिनियम के किसी उपबंध या उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के अतिक्रमण में वास्तव में अन्तर्वलित आगमों से संबंधित है, कुर्क करने के लिए अनुज्ञात किया जाएगा;
(v) किसी भी रीति में स्कीम से सहयोजित किसी मध्यवर्ती या किसी व्यक्ति को, किसी क्रियाकलाप के भागरूप किसी आस्ति का, जो अन्वेषणाधीन है, व्ययन या अन्यसंक्रामण न करने का निदेश देना:
परन्तु प्राधिकरण, इस धारा के अधीन ऐसे आदेश पारित करने के या तो पूर्व या उसके पश्चात्, ऐसे मध्यवर्तियों या संबंधित व्यक्तियों को सुनवाई का अवसर देगा ।
15. निदेश जारी करने की शक्ति-धारा 14 में अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, यदि कोई जांच करने या कराने के पश्चात् प्राधिकरण का यह समाधान हो जाता है कि-
(i) अभिदाताओं या राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली या किसी पेंशन स्कीम के, जिसको यह अधिनियम लागू होता है, व्यवस्थित विकास के हितों के लिए; या
(ii) धारा 27 में निर्दिष्ट किसी मध्यवर्ती या अन्य व्यक्तियों या अस्तित्वों के क्रियाकलापों का ऐसी रीति में संचालित किए जाने से, जो अभिदाताओं के हितों के लिए हानिकर है, निवारण करने के लिए; या
(iii) किसी ऐसे मध्यवर्ती या व्यक्ति या अस्तित्व के उचित प्रबन्ध को सुनिश्चित करने के लिए,
यह आवश्यक है तो वह धारा 27 में निर्दिष्ट या पेंशन निधि से सहयोजित ऐसे मध्यवर्तियों या किसी ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के वर्ग को ऐसे निदेश दे सकेगा जो वह उपयुक्त समझे:
परन्तु प्राधिकरण, ऐसा आदेश पारित करने के या तो पूर्व या उसके पश्चात् ऐसे मध्यवर्तियों, अस्तित्वों या संबंधित व्यक्तियों को सुनवाई का अवसर देगा ।
16. अन्वेषण की शक्ति-(1) जहां प्राधिकरण के पास यह विश्वास करने का युक्तियुक्त आधार है कि-
(क) पेंशन निधि के क्रियाकलाप अभिदाता के हितों के लिए हानिकर किसी रीति में संचालित किए जा रहे हैं; या
(ख) पेंशन निधि स्कीमों से सहयोजित किसी मध्यवर्ती या किसी व्यक्ति ने इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के किन्हीं उपबन्धों या प्राधिकरण द्वारा जारी किए गए निदेशों का अतिक्रमण किया है,
तो वह किसी भी समय, लिखित आदेश द्वारा किसी व्यक्ति को (जिसे इस धारा में अन्वेषक प्राधिकारी कहा गया है), पेंशन निधि से सहयोजित ऐसे मध्यवर्ती या व्यक्तियों के क्रियाकलापों का अन्वेषण करने और प्राधिकरण को उस पर रिपोर्ट देने के लिए आदेश में विनिर्दिष्ट निदेश दे सकेगा ।
(2) कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 235 से धारा 241 में अन्तर्विष्ट उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, कम्पनी की दशा में कम्पनी के प्रत्येक प्रबन्धक, प्रबन्ध निदेशक, अधिकारी और अन्य कर्मचारी का और धारा 27 में निर्दिष्ट प्रत्येक मध्यवर्ती या व्यक्ति या अस्तित्व या पेंशन निधि से सहयोजित प्रत्येक व्यक्ति का, यथास्थिति, कम्पनी के या कम्पनी से संबंधित या ऐसे मध्यवर्ती या व्यक्ति से संबंधित, जो उसकी अभिरक्षा या शक्ति के अधीन हैं, सभी पुस्तकों, रजिस्टरों, अन्य दस्तावेजों और अभिलेख को, संरक्षित रखने और अन्वेषक प्राधिकारी या इस निमित्त उसके द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति को प्रस्तुत करने का कर्तव्य होगा ।
(3) अन्वेषक प्राधिकारी, पेंशन निधि से किसी भी रीति में सहयोजित किसी मध्यवर्ती या किसी व्यक्ति या अस्तित्व से ऐसी जानकारी देने या उसके समक्ष या इस निमित्त उसके द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष, ऐसी पुस्तकों या अन्य दस्तावेजों या अभिलेख को प्रस्तुत करने की अपेक्षा कर सकेगा, जो वह आवश्यक समझे, यदि ऐसी जानकारी देना या ऐसी पुस्तकों या रजिस्टर या अन्य दस्तावेजों या अभिलेख का प्रस्तुत करना उसके अन्वेषण के प्रयोजनों के लिए सुसंगत या आवश्यक है ।
(4) अन्वेषक प्राधिकारी, उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन प्रस्तुत की गई किसी पुस्तक, रजिस्टर या अन्य दस्तावेज या अभिलेख को छह मास के लिए अपनी अभिरक्षा में रख सकेगा और तत्पश्चात् पेंशन निधि से सहयोजित ऐसे मध्यवर्ती या किसी व्यक्ति या अस्तित्व को, जिसके द्वारा या जिसकी ओर से पुस्तकें, रजिस्टर, अन्य दस्तावेज और अभिलेख प्रस्तुत किए गए थे, लौटा देगा:
परन्तु अन्वेषक प्राधिकारी, कोई भी पुस्तक, रजिस्टर, अन्य दस्तावेज और अभिलेख, यदि उनकी पुनः अपेक्षा हो तो, मंगा सकेगा:
परन्तु यह और कि ऐसा व्यक्ति जिसकी ओर से अन्वेषक प्राधिकारी के समक्ष पुस्तकों, रजिस्टरों, अन्य दस्तावेजों या अभिलेख को प्रस्तुत किया जाता है, अन्वेषक प्राधिकारी के समक्ष पुस्तकों, रजिस्टरों, अन्य दस्तावेजों या अभिलेख की प्रमाणित प्रतियों की अपेक्षा करता है तो वह, यथास्थिति, ऐसी पुस्तकों, रजिस्टरों, अन्य दस्तावेजों या अभिलेख की प्रमाणित प्रतियां ऐसे व्यक्ति को या उसको, जिसकी ओर से पुस्तक, रजिस्टर, अन्य दस्तावेज या अभिलेख प्रस्तुत किए गए थे, देगा ।
(5) कोई व्यक्ति, जिसे उपधारा (1) के अधीन अन्वेषण करने के लिए निदेश दिया गया हो, पेंशन निधि से किसी भी रीति में सहयोजित किसी मध्यवर्ती या किसी व्यक्ति की, उसके कारबार के क्रियाकलापों के संबंध में शपथ पर परीक्षा कर सकेगा और तदनुसार शपथ दिला सकेगा और उस प्रयोजन के लिए उनमें से किसी भी व्यक्ति से उसके समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की अपेक्षा कर सकेगा ।
(6) उपधारा (5) के अधीन किसी परीक्षण के टिप्पण लिखित में लिए जाएंगे और परीक्षित व्यक्ति को पढ़कर सुनाए जाएंगे या उसके द्वारा पढ़े जाएंगे और उसके द्वारा हस्ताक्षरित किए जाएंगे और तत्पश्चात् उसके विरुद्ध साक्ष्य में उनका प्रयोग किया जा सकेगा ।
(7) यदि कोई व्यक्ति, -
(क) किसी अन्वेषक प्राधिकारी या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति को कोई पुस्तक, रजिस्टर, अन्य दस्तावेज या अभिलेख, जिसे उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन प्रस्तुत करने का उसका कर्तव्य है, प्रस्तुत करने में; या
(ख) किसी जानकारी, जिसको देने का उपधारा (3) के अधीन उसका कर्तव्य है, देने में; या
(ग) अन्वेषक प्राधिकारी के समक्ष, जब उपधारा (5) के अधीन ऐसा करना अपेक्षित हो या किसी ऐसे प्रश्न का उत्तर देने के लिए जो उससे उस उपधारा के अनुसरण में अन्वेषक प्राधिकारी द्वारा पूछा जाता है, व्यक्तिगत रूप से, उपस्थित होने में; या
(घ) उपधारा (6) में निर्दिष्ट किसी परीक्षा के टिप्पणों पर हस्ताक्षर करने में, किसी युक्तियुक्त कारण के बिना असफल रहता है या ऐसा करने से इंकार करता है तो वह कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से जो पच्चीस करोड़ रुपए तक का हो सकेगा या दोनों से, और किसी और जुर्माने से भी जो पहले दिन के पश्चात् प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान असफलता या इंकार जारी रहता है, दस लाख रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।
17. तलाशी और अभिग्रहण-(1) जहां प्राधिकरण के पास, उसके कब्जाधीन जानकारी के परिणामस्वरूप यह विश्वास करने का कारण है कि-
(क) किसी व्यक्ति ने जिससे धारा 16 की उपधारा (3) के अधीन किन्हीं पुस्तकों, लेखाओं या अन्य दस्तावेजों को जो, उसकी अभिरक्षा और शक्ति के अधीन हैं, प्रस्तुत करने या करवाने की अपेक्षा की गई है, ऐसी पुस्तकों, लेखाओं या अन्य दस्तावेजों को प्रस्तुत करने या करवाने में लोप किया है या वह उसमें असफल रहा है; या
(ख) कोई व्यक्ति जिससे यथापूर्वोक्त किन्हीं पुस्तकों, लेखाओं या अन्य दस्तावेजों को प्रस्तुत करने की अध्यपेक्षा जारी की गई है या की जा सकती थी, किन्हीं पुस्तकों, लेखाओं या अन्य दस्तावेजों को प्रस्तुत नहीं करेगा या नहीं कराएगा जो धारा 16 की उपधारा (1) के अधीन किसी अन्वेषण के लिए उपयोगी या उससे सुसंगत है; या
(ग) इस अधिनियम के किसी उपबंध का किसी मध्यवर्ती द्वारा कोई उल्लंघन किया गया है या किए जाने की संभावना है; या
(घ) कोई दावा जो मध्यवर्ती द्वारा परिनिर्धारित किया जाना है, नामंजूर या किसी युक्तियुक्त राशि से अधिक राशि पर परिनिर्धारित कर दिया गया है या किए जाने की संभावना है; या
(ङ) कोई दावा जो किसी मध्यवर्ती द्वारा परिनिर्धारित किया जाना है, नामंजूर या किसी युक्तियुक्त राशि से कम राशि पर परिनिर्धारित कर दिया गया है या किए जाने की संभावना है; या
(च) किसी मध्यवर्ती द्वारा किसी अविधिमान्य फीस और प्रभारों का संव्यवहार किया गया है या किए जाने की संभावना है; या
(छ) किसी मध्यवर्ती की किन्हीं पुस्तकों, लेखाओं, कागजपत्रों, प्राप्तियों, वाउचरों, सर्वेक्षणों, रिपोर्टों या अन्य दस्तावेजों को बिगाड़ने या मिथ्याकृत विनिर्मित करने की संभावना है,
तो वह प्राधिकरण के किसी अधिकारी को जो सरकार के किसी राजपत्रित अधिकारी (जिसे इसमें इसके पश्चात् प्राधिकृत अधिकारी कहा गया है) के समतुल्य पंक्ति से अन्यून पंक्ति का न हो-
(i) किसी भवन या स्थान में, जहां उसके पास यह संदेह करने का कारण है कि किसी दावे, रिबेट या कमीशन या प्राप्तियों, वाउचरों, रिपोर्टों या अन्य दस्तावेजों से संबंधित ऐसी पुस्तकें, लेखा या अन्य दस्तावेज या कोई पुस्तक या कागजपत्र रखे गए हैं, प्रवेश करने और तलाशी लेने;
(ii) खण्ड (i) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने के लिए, जहां उसकी चाबियां उपलब्ध नहीं हैं, किसी बक्से, लॉकर, सेफ, अलमारी या अन्य पात्र के ताले को तोड़कर खोलने;
(iii) ऐसी तलाशी के परिणामस्वरूप पाई गई सभी ऐसी पुस्तकों, लेखाओं या अन्य दस्तावेजों का या उनमें से किसी का अभिग्रहण करने; या
(iv) ऐसी पुस्तकों, लेखाओं या अन्य दस्तावेजों पर पहचान चिह्न लगाने या उनके उद्धरण या प्रतियां प्राप्त करने या कराने, के लिए प्राधिकृत कर सकेगा ।
(2) प्राधिकृत अधिकारी, किसी पुलिस अधिकारी या केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी की या दोनों की सेवाओं की, उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट सभी या किन्हीं प्रयोजनों के लिए, उसकी सहायता करने के लिए, अध्यपेक्षा कर सकेगा और ऐसे प्रत्येक पुलिस अधिकारी का यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसी अध्यपेक्षा का अनुपालन करे ।
(3) प्राधिकृत अधिकारी, जहां उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट किसी ऐसी पुस्तक, लेखा या अन्य दस्तावेज का अभिग्रहण करना व्यवहार्य नहीं है, वहां ऐसे व्यक्ति पर, जिसके वह तुरंत कब्जे या नियंत्रण में है आदेश की तामील करेगा कि वह ऐसे अधिकारी की पूर्व अनुज्ञा के सिवाय उसे नहीं हटाएगा, अलग नहीं करेगा या अन्यथा उसका संव्यवहार नहीं करेगा और ऐसा अधिकारी ऐसे कदम उठा सकेगा जो इस उपधारा के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हों ।
(4) प्राधिकृत अधिकारी, तलाशी या अभिग्रहण के अनुक्रम के दौरान ऐसे किसी व्यक्ति की शपथ पर परीक्षा कर सकेगा जिसके कब्जे या नियंत्रण में कोई पुस्तक, लेखा या अन्य दस्तावेज पाया जाता है तथा ऐसी परीक्षा के दौरान ऐसे व्यक्ति के द्वारा किए गए किसी कथन का तत्पश्चात् इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही में साक्ष्य में प्रयोग किया जा सकेगा ।
(5) उपधारा (1) के अधीन अभिगृहीत पुस्तकों, लेखाओं, कागजपत्रों, प्राप्तियों, वाउचरों, रिपोर्टों या अन्य दस्तावेजों को अभिग्रहण की तारीख से एक सौ अस्सी दिन से अधिक की अवधि के लिए प्राधिकृत अधिकारी द्वारा तब तक प्रतिधारित नहीं किया जाएगा जब तक उनके प्रतिधारण के कारण उसके द्वारा लेखबद्ध नहीं किए जाते हैं और ऐसे प्रतिधारण के लिए प्राधिकरण का अनुमोदन अभिप्राप्त नहीं किया जाता है:
परन्तु प्राधिकरण, पुस्तकों, लेखाओं, कागजपत्रों, प्राप्तियों, वाउचरों, रिपोर्टों या अन्य दस्तावेजों के प्रतिधारण को, इस अधिनियम के अधीन सभी कार्यवाहियों के, जिनसे ऐसी पुस्तकें, लेखा, कागजपत्र, रसीदें, वाउचर, रिपोर्टें या अन्य दस्तावेज सुसंगत हैं, पूरा हो जाने के पश्चात् तीस दिन की अवधि के लिए प्रतिधारित करने के लिए प्राधिकृत नहीं करेगा ।
(6) ऐसा व्यक्ति, जिसकी अभिरक्षा से उपधारा (1) के अधीन पुस्तकें, लेखा, कागजपत्र, प्राप्तियां, वाउचर, रिपोर्टें या अन्य दस्तावेज अभिगृहीत किए जाते हैं, प्राधिकृत अधिकारी या इस निमित्त उसके द्वारा सशक्त किसी अन्य व्यक्ति की उपस्थिति में ऐसे स्थान और समय पर, जिसे प्राधिकृत अधिकारी इस निमित्त नियत करे, उनकी प्रतियां ले सकेगा या उनके उद्धरण ले सकेगा ।
(7) यदि कोई व्यक्ति, जो उपधारा (1) के अधीन अभिगृहीत पुस्तकों, लेखाओं, कागजपत्रों, प्राप्तियों, वाउचरों, रिपोर्टों या अन्य दस्तावेजों का विधिक रूप से हकदार है, उपधारा (5) के अधीन प्राधिकरण द्वारा दिए गए अनुमोदन पर किसी कारण से आक्षेप करता है तो वह केन्द्रीय सरकार को, उसमें ऐसे आक्षेप के लिए कारण कथित करते हुए और उन पुस्तकों, लेखाओं, कागजपत्रों, प्राप्तियों, वाउचरों, रिपोर्टों या अन्य दस्तावेजों को लौटाने के लिए अनुरोध करते हुए आवेदन कर सकेगा ।
(8) उपधारा (7) के अधीन आवेदन की प्राप्ति पर, केन्द्रीय सरकार, आवेदक को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, ऐसा आदेश पारित कर सकेगी जो वह ठीक समझे ।
(9) तलाशी और अभिग्रहण से संबंधित दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबन्ध, उपधारा (1) के अधीन की गई प्रत्येक तलाशी और अभिग्रहण को यथासाध्य लागू होंगे ।
(10) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा इस धारा के अधीन किसी तलाशी या अभिग्रहण से संबंधित नियम बना सकेगी और विशिष्टयता और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में प्राधिकृत अधिकारी द्वारा, -
(i) तलाशी लिए जाने के लिए, ऐसे भवन या स्थान में जहां मुक्त प्रवेश उपलब्ध नहीं है, प्रवेश अभिप्राप्त करने के लिए;
(ii) इस धारा के अधीन अभिगृहीत किन्हीं पुस्तकों, लेखाओं, कागजपत्रों, प्राप्तियों, वाउचरों, रिपोर्टों या अन्य दस्तावेजों की सुरक्षित अभिरक्षा सुनिश्चित करने के लिए,पालन की जाने वाली प्रक्रिया का उपबंध हो सकेगा ।
18. प्राधिकरण की अनुपालन सुनिश्चित करने की शक्ति-यदि प्राधिकरण, जांच कराए जाने के पश्चात्, यह पाता है कि किसी व्यक्ति ने इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या विनियम के किसी उपबंध का उल्लंघन किया है या उल्लंघन करने की संभावना है तो प्राधिकरण, ऐसे व्यक्ति से ऐसा उल्लंघन न करने या न कराने और उल्लंघन करने या कराए जाने से प्रविरत रहने की अपेक्षा करने वाला आदेश पारित कर सकेगा ।
19. प्रशासक द्वारा प्रबंध-(1) यदि किसी समय प्राधिकरण के पास यह विश्वास करने का कारण है कि केन्द्रीय अभिलेखपालन अभिकरण या पेंशन निधि ऐसी रीति में कार्य कर रहे हैं जिससे अभिदाताओं के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है तो वह, यथास्थिति, केन्द्रीय अभिलेखपालन अभिकरण या पेंशन निधि को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् उस पर केन्द्रीय सरकार को एक रिपोर्ट देगा ।
(2) यदि केन्द्रीय सरकार की, उपधारा (1) के अधीन की गई रिपोर्ट पर विचार करने के पश्चात् यह राय है कि ऐसा करना आवश्यक या उचित है तो वह प्राधिकरण के निदेशन और नियंत्रण के अधीन ऐसी रीति में जो अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, यथास्थिति, केन्द्रीय अभिलेखपालन अभिकरण या पेंशन निधि के क्रियाकलापों का प्रबन्ध करने के लिए कोई प्रशासक नियुक्त कर सकेगी ।
अध्याय 6
राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली
20. राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली-(1) भारत सरकार के वित्त मंत्रालय की अधिसूचना की संख्या फा0 सं0 5/7/2003-ईसीबी एंड पीआर, तारीख 22 दिसंबर, 2003 द्वारा अधिसूचित अभिदायी पेंशन प्रणाली 1 जनवरी, 2004 से राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली समझी जाएगी और ऐसी राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली को विनियमों द्वारा समय-समय पर संशोधित किया जा सकेगा ।
(2) उक्त अधिसूचना में किसी बात के होते हुए भी, राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली में इस अधिनियम के प्रारम्भ पर निम्नलिखित मुख्य विशेषताएं होंगी, अर्थात्: -
(क) प्रत्येक अभिदाता का राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली के अधीन एक व्यष्टि पेंशन लेखा होगा;
(ख) व्यष्टि पेंशन लेखा से प्रत्याहरण को, जो अभिदाता द्वारा किए गए अभिदाय के पच्चीस प्रतिशत से अधिक का नहीं होगा, ऐसी शर्तों के अध्यधीन, जैसे कि प्रयोजन, अंतराल और परिसीमाएं, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं, अनुज्ञात किया जा सकेगा;
(ग) अभिदाता द्वारा अभिलेखपालन, लेखाकर्म और विकल्प बदलने के कृत्यों को केन्द्रीय अभिलेखपालन अभिकरण द्वारा प्रभावी किया जाएगा;
(घ) बहुविध पेंशन निधियों और बहुविध स्कीमों का विकल्प होगा:परंतु-
(क) अभिदाता के पास सरकारी प्रतिभूतियों में अपनी निधियों का शत-प्रतिशत तक विनिधान करने का विकल्प होगा; और
(ख) न्यूनतम सुनिश्चित लाभ चाहने वाले अभिदाता को, न्यूनतम सुनिश्चित लाभ प्रदान करने वाली ऐसी स्कीमों में, जो प्राधिकरण द्वारा अधिसूचित की जाएं, अपनी निधियों का विनिधान करने का विकल्प होगा;
(ङ) नियोजन में परिवर्तन की दशा में व्यष्टि पेंशन लेखाओं की सुवाह्यता होगी;
(च) केन्द्रीय अभिलेखपालन अभिकरण को अभिदायों और अनुदेशों का संग्रहण और पारेषण उपस्थिति अस्तित्वों की मार्फ्त होगा;
(छ) अभिदाता द्वारा क्रय किए जाने वाले बाजार आधारित प्रत्याभूत तंत्र के सिवाय फायदों का कोई अस्पष्ट या सुस्पष्ट आश्वासन नहीं होगा;
(ज) कोई अभिदाता विनियमों के माध्यम से प्राधिकरण द्वारा यथाविनिर्दिष्ट के सिवाय राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली से बाहर नहीं होगा; और
(झ) बाहर होने पर, अभिदाता विनियमों के अनुसार किसी जीवन बीमा कंपनी से किसी वार्षिकी का क्रय करेगा ।
(3) उपधारा (2) के खंड (क) में उल्लिखित व्यष्टि पेंशन लेखा के अतिरिक्त अभिदाता अपने विकल्प पर राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली के अधीन उपधारा (2) के खंड (ग) से खंड (छ) में उल्लिखित विशेषताओं वाला और ऐसी अतिरिक्त विशेषताओं वाला अतिरिक्त लेखा रख सकेगा, जिससे अभिदाता अतिरिक्त लेखा से किसी समय अपने धन को भागतः या संपूर्णतः निकालने के लिए स्वतंत्र होगा ।
21. केन्द्रीय अभिलेखापालन अभिकरण-(1) प्राधिकरण धारा 27 की उपधारा (3) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त करके एक केंद्रीय अभिलेखपालन अभिकरण नियुक्त करेगा:
परन्तु प्राधिकरण लोक हित में एक से अधिक केन्द्रीय अभिलेखपालन अभिकरण नियुक्त कर सकेगा ।
(2) केन्द्रीय अभिलेखपालन अभिकरण, उपस्थिति अस्तित्वों की मार्फ्त अभिदाताओं से, अनुदेश प्राप्त करने, ऐसे अनुदेशों को पेंशन निधियों में पारेषित करने, अभिदाताओं से प्राप्त अनुदेशों को प्रभावी करने और ऐसे अन्य कर्तव्यों और कृत्यों का निर्वहन करने के लिए, जो उसे रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के अधीन सौंपे जाएं या विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं, उत्तरदायी होगा ।
(3) केन्द्रीय अभिलेखपालन अभिकरण के स्वामित्वाधीन, पट्टाधीन या उसके द्वारा विकसित की गई सभी आस्तियों और सम्पत्तियों से विनियमित आस्तियों का गठन होगा और रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के अवसान पर या उसके पूर्व प्रतिसंहरण पर, प्राधिकरण या तो स्वयं या प्रशासक या उसके द्वारा इस निमित्त नामनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति के माध्यम से विनियमित आस्तियों का विनियोग करने और उनको ग्रहण करने का हकदार होगा:
परन्तु केन्द्रीय अभिलेखपालन अभिकरण ऐसी विनियमित आस्तियों का प्राधिकरण द्वारा अभिनिश्चित ऐसे ऋजु मूल्य के प्रतिकर का हकदार होगा जो विनियमों द्वारा अवधारित किया जाए:
परन्तु यह और कि जहां रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का पूर्वतम प्रतिसंहरण रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र की शर्तों या इस अधिनियम के उपबंधों या विनियमों के अतिक्रमण पर आधारित है, वहां जब तक प्राधिकरण द्वारा अन्यथा अवधारित न किया जाए केन्द्रीय अभिलेखपालन अभिकरण ऐसी विनियमित आस्तियों की बाबत किसी प्रतिकर का दावा करने का हकदार नहीं होगा ।
22. उपस्थिति अस्तित्व-(1) प्राधिकरण, धारा 27 की उपधारा (3) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त करके एक या अधिक व्यक्तियों को, अभिदाय प्राप्त करने और अनुदेशों को, यथास्थिति, न्यासी बैंक या केन्द्रीय अभिलेखपालन अभिकरण को पारेषित करने तथा प्राधिकरण द्वारा इस बाबत समय-समय पर बनाए गए विनियमों के अनुसार अभिदाताओं को फायदों का संदाय करने के प्रयोजनों के लिए उपस्थिति अस्तित्वों के रूप में कार्य करने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा ।
(2) उपस्थिति अस्तित्व अपने रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के निबंधनों और इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अनुसार कार्य करेगा ।
23. पेंशन निधि-(1) प्राधिकरण, धारा 27 की उपधारा (3) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त करके एक या अधिक व्यक्तियों को ऐसी रीति में, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, अभिदायों को प्राप्त करने, उन्हें संचित करने और अभिदाताओं को संदाय करने के प्रयोजन के लिए पेंशन निधि के रूप में कार्य करने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा ।
(2) पेंशन निधियों की संख्या विनियमों द्वारा अवधारित की जाएगी और प्राधिकरण, लोक हित में पेंशन निधियों की संख्या में परिवर्तन कर सकेगा:
परंतु पेंशन निधियों में से कम से कम एक सरकारी कंपनी होगी ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए सरकारी कंपनी का वही अर्थ है, जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में है ।
(3) पेंशन निधि रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के निबंधनों और इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अनुसार कार्य करेगी ।
(4) पेंशन निधि विनियमों के अनुसार स्कीमों का प्रबंध करेगी ।
24. विदेशी कंपनियों या व्यष्टियों या व्यक्तियों के संगम पर कतिपय निर्बंधन-किसी विदेशी कंपनी द्वारा, या तो स्वयं या अपनी समनुषंगी कंपनियों या अपने नामनिर्देशितियों के माध्यम से या किसी व्यष्टि या व्यक्तियों के संगम द्वारा (चाहे भारत के बाहर किसी देश की किसी विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत हो या नहीं), पेंशन निधि में कुल साधारण शेयरधारण ऐसी निधि की समादत्त पूंजी के छब्बीस प्रतिशत या ऐसे प्रतिशत से, जो बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) के अधीन किसी भारतीय बीमा कंपनी के लिए अनुमोदित किया जाए, इनमें से जो भी अधिक हो, अधिक नहीं होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, विदेशी कंपनी" पद का वही अर्थ होगा, जो आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की धारा 2 के खंड (23क) में उसका है ।
25. भारत से बाहर अभिदाताओं की निधियों के विनिधान का प्रतिषेध-कोई पेंशन निधि, अभिदाताओं की निधियों का भारत से बाहर प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः विनिधान नहीं करेगी ।
26. केन्द्रीय अभिलेखपालन अभिकरण आदि की पात्रता मानक-केन्द्रीय अभिलेखपालन अभिकरण, उपस्थिति अस्तित्व और पेंशन निधि का, विनियमों के अधीन प्राधिकरण द्वारा विनिर्दिष्ट पात्रता कसौटियों का समाधान करेगा, जिसके अंतर्गत न्यूनतम पूंजी आवश्यकता, पूर्व ट्रेक-रिकार्ड भी है, जिसमें प्रत्याभूत विवरणियां, लागत और फीस, भौगोलिक पहुंच, ग्राहक आधार, सूचना प्रौद्योगिकी क्षमता, मानव संसाधन उपलब्ध कराने की योग्यता और ऐसे अन्य विषय सम्मिलित हैं ।
अध्याय 7
मध्यवर्तियों का रजिस्ट्रीकरण
27. केन्द्रीय अभिलेखपालन अभिकरण, पेंशन निधि, उपस्थिति अस्तित्व आदि का रजिस्ट्रीकरण-(1) कोई भी मध्यवर्ती जिसके अंतर्गत कोई पेंशन निधि या कोई उपस्थिति अस्तित्व भी हैं, इस अधिनियम के अधीन विनियमित होने के विस्तार तक, इस अधिनियम के उपबंधों और विनियमों के अनुसार प्राधिकरण द्वारा अनुदत्त रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र की शर्तों के अधीन या उनके अनुसार पेंशन निधि संबंधी कोई क्रियाकलाप प्रारंभ करेगा अन्यथा नहीं:
परन्तु किसी उपस्थिति अस्तित्व सहित कोई भी ऐसा मध्यवर्ती, जो इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण की स्थापना के ठीक पूर्व पेंशन निधि से सहयोजित था और अंतरिम पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण द्वारा इस प्रकार कार्य करने के लिए नियुक्त था, जिसके लिए ऐसी स्थापना के पूर्व कोई रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र आवश्वयक नहीं था, ऐसी स्थापना से छह मास की अवधि तक या यदि उसने छह मास की उक्त अवधि के भीतर ऐसे रजिस्ट्रीकरण के लिए कोई आवेदन किया है तो ऐसे आवेदन का निपटारा होने तक, ऐसा करना जारी रख सकेगा ।
(2) इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त करने के लिए प्रत्येक आवेदन ऐसे प्ररूप और रीति में होगा तथा उसके साथ ऐसी फीस होगी, जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाए ।
(3) प्राधिकरण, आवेदन पर विचार करने के पश्चात् और ऐसे निबंधनों और शर्तों के अधीन, जो वह विनिर्दिष्ट करे, यथास्थिति, केन्द्रीय अभिलेखपालन अभिकरण, उपस्थिति अस्तित्व, पेंशन निधि या ऐसे अन्य मध्यवर्ती के रूप में रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त कर सकेगा ।
(4) प्राधिकरण, आदेश द्वारा उपधारा (3) के अधीन अनुदत्त रजिस्ट्रकरण प्रमाणपत्र को ऐसी रीति में, जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाए, निलंबित या रद्द कर सकेगा:
परन्तु इस उपधारा के अधीन कोई आदेश संबंधित व्यक्ति को सुने जाने की उचित अवसर दिए जाने के पश्चात् ही किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।
अध्याय 8
शास्तियां और न्यायनिर्णयन
28. मध्यवर्ती या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा अधिनियम के उपबंधों सहित, नियमों, विनियमों और निदेशों का अनुपालन करने में असफलता के लिए शास्ति-(1) कोई व्यक्ति, जिससे इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों अथवा विनियमों के अधीन यह अपेक्षा की गई है कि वह-
(क) इस अधिनियम के अधीन कोई क्रियाकलाप करने के लिए प्राधिकरण से रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अभिप्राप्त करे, ऐसा रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अभिप्राप्त किए बिना ऐसे क्रियाकलाप करता है, तो वह उस प्रत्येक दिन के लिए, एक लाख रुपए जिसके दौरान असफलता जारी रहती है, या एक करोड़ रुपए, इनमें से जो भी कम हो, की शास्ति के लिए दायी होगा;
(ख) रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के निबंधनों और शर्तों का पालन करे, ऐसा करने में असफल रहता है, तो वह उस प्रत्येक दिन के लिए, एक लाख रुपए जिसके दौरान असफलता जारी रहती है, या एक करोड़ रुपए, इनमें से जो भी कम हो, की शास्ति के लिए दायी होगा;
(ग) प्राधिकरण को कोई सूचना, दस्तावेज, बहियां, विवरणियां या रिपोर्ट प्रस्तुत करे, उन्हें प्राधिकरण द्वारा विनिर्दिष्ट समय के भीतर पेश करने में असफल रहता है, तो वह ऐसी शास्ति के लिए दायी होगा, जो एक करोड़ रुपए या हुए लाभों अथवा परिवर्जित हानियों की रकम, के पांच गुना, इनमें से जो भी अधिक हो, तक हो सकेगी;
(घ) लेखा बहियों या अभिलेखों को रखे, उन्हें रखने में असफल रहता है, तो वह उस प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान असफलता जारी रहती है, एक लाख रुपए या हुए लाभों अथवा परिवर्जित हानियों की रकम के पांच गुने तक, इनमें से जो भी अधिक हो, शास्ति के लिए दायी होगा ।
(2) यदि कोई व्यक्ति, जिससे इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों अथवा विनियमों के अधीन यह अपेक्षा की गई है कि वह अपने कक्षीकार से करार करे, ऐसा करार करने में असफल रहता है तो वह उस प्रत्येक दिन के लिए जिसके दौरान असफलता जारी रहती है, एक लाख रुपए या हुए लाभों अथवा परिवर्जित हानियों की रकम के पांच गुने तक, इनमें से जो भी अधिक हो, शास्ति के लिए दायी होगा ।
(3) यदि प्राधिकरण में रजिस्ट्रीकृत कोई मध्यवर्ती अभिदाता की शिकायतों को दूर करने के लिए लिखित में प्राधिकरण द्वारा मांग किए जाने के पश्चात् प्राधिकरण द्वारा अनुबद्ध समय के भीतर ऐसी शिकायतें दूर करने में असफल रहता है तो वह एक करोड़ रुपए से अनधिक या हुए लाभ अथवा परिवर्जित हानियों की रकम के पांच गुना, इनमें से जो भी अधिक हो, शास्ति के लिए दायी होगा ।
(4) यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन मध्यवर्ती के रूप में रजिस्ट्रीकृत है, कक्षीकार या कक्षीकारों के धन को पृथक् करने में असफल रहता है या किसी कक्षीकार या कक्षीकारों के धन को अपने लिए या किसी अन्य कक्षीकर के लिए उपयोग करता है तो वह एक करोड़ रुपए से अनधिक या हुए लाभों अथवा परिवर्जित हानियों की रकम के पांच गुना, इनमें से जो भी अधिक हो, शास्ति के लिए दायी होगा ।
(5) जो कोई इस अधिनियम के किसी उपबंध का, इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन बनाए गए नियमों अथवा विनियमों या प्राधिकरण द्वारा जारी किए गए निदेशों का अनुपालन करने में असफल रहेगा, जिनके लिए कोई पृथक् शास्ति का उपबंध नहीं किया गया है, तो वह ऐसी शास्ति के लिए दायी होगा, जो एक करोड़ रुपए या हुए लाभों अथवा परिवर्जित हानियों की रकम के पांच गुना, इनमें से जो भी अधिक हो, तक की हो सकेगी ।
29. शास्ति के रूप में वसूल की गई राशियों का अभिदाता शिक्षा और संरक्षण निधि में जमा किया जाना-इस अधिनियम के अधीन शास्तियों के रूप में वसूल की गई सभी राशियां धारा 41 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित अभिदाता शिक्षा और संरक्षण निधि में जमा की जाएंगी ।
30. न्यायनिर्णयन की शक्ति-(1) धारा 28 के अधीन न्यायनिर्णयन के प्रयोजनों के लिए, प्राधिकरण, विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट पंक्ति से अनिम्न किसी अधिकारी को, कोई भी शास्ति अधिरोपित करने के प्रयोजन के लिए, संबंधित व्यक्ति को सुने जाने का उचित अवसर दिए जाने के पश्चात् ऐसी जांच करने के लिए, जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाए, न्यायनिर्णायक अधिकारी नियुक्त करेगा ।
(2) जांच करते समय, न्यायनिर्णायक अधिकारी को मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से परिचित किसी व्यक्ति को, ऐसा साक्ष्य देने या कोई दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए, जो न्यायनिर्णायक अधिकारी की राय में जांच की विषय-वस्तु के लिए उपयोगी या सुसंगत हों, समन करने और हाजिर कराने की शक्ति होगी तथा यदि ऐसी जांच करने पर उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसा व्यक्ति धारा 28 में निर्दिष्ट विषयों का अनुपालन करने में असफल रहा है तो वह अन्वेषण और निगरानी के भारसाधक सदस्य को ऐसी शास्ति की सिफारिश कर सकेगा, जो वह उस धारा के उपबंधों के अनुसार उपयुक्त समझे ।
(3) शास्ति अन्वेषण और निगरानी के भारसाधक सदस्य से भिन्न किसी सदस्य द्वारा अधिरोपित की जाएगी:
परन्तु धारा 28 के अधीन शास्ति की मात्रा का न्यायनिर्णयन करते समय सदस्य निम्नलिखित बातों का सम्यक् रूप से ध्यान रखेगा, अर्थात्: -
(क) व्यतिक्रम के परिणामस्वरूप प्राप्त हुए अननुपातिक लाभ या अऋजु फायदे की रकम, जहां कहीं निर्धारणीय हो;
(ख) किसी अभिदाता या अभिदाताओं के समूह को हुई हानि की रकम; और
(ग) व्यतिक्रम की पुनरावृत्तीय प्रकृति ।
31. मध्यवर्ती की आस्तियों की कुर्की और प्रबंध का अधिक्रमण-(1) कोई व्यथित व्यक्ति निम्नलिखित मामलों में से किसी मामले के संबंध में संरक्षण के अंतरिम उपाय के लिए प्राधिकरण को आवेदन कर सकेगा, अर्थात्: -
(क) किसी ऐसी आस्ति या सम्पत्ति का, जो इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा विनियमित होती है, निरोध, परिरक्षण, अन्तरिम अभिरक्षा या विक्रय;
(ख) पेंशन निधि के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन कोई पेंशन निधि, धन और अन्य आस्तियां तथा सम्पत्तियां प्रतिभूत करना;
(ग) अंतरिम व्यादेश या किसी प्रशासक की नियुक्ति; और
(घ) ऐसे अन्य अन्तरिम उपाय, जो प्राधिकरण को उचित और आवश्यक प्रतीत हों,
और प्राधिकरण को ऐसे आदेश जिसमें पेंशन निधि की आस्तियों की कुर्की के लिए आदेश भी सम्मिलित हैं, करने की शक्ति होगी, जो इस संबंध में वह ठीक समझे ।
(2) जहां प्राधिकरण द्वारा प्राप्त किसी शिकायत पर या स्वप्रेरणा से, प्राधिकरण कोई जांच करने के पश्चात् इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि शासी बोर्ड या निदेशक बोर्ड, चाहे जिस नाम से ज्ञात हो, इस अधिनियम के अधीन विनियमित होने की सीमा तक किसी मध्यवर्ती पर नियन्त्रण रखने वाला व्यक्ति किसी ऐसे क्रियाकलाप में लिप्त है जो इस अधिनियम या विनियमों के उपबंधों के उल्लंघन में है तो वह विनियमों के उपबंधों के अनुसार शासी बोर्ड या निदेशक बोर्ड या मध्यवर्ती के प्रबंध तंत्र को अधिक्रांत कर सकेगा ।
(3) शासी बोर्ड या निदेशक बोर्ड या किसी मध्यवर्ती प्रबंधन का उपधारा (2) के अधीन अधिक्रमण किए जाने की दशा में प्राधिकरण विनियमों के उपबंधों के अनुसार मध्यवर्ती के क्रियाकलापों की व्यवस्था करने के लिए एक प्रशासक नियुक्त कर सकेगा ।
32. अपराध-(1) इस अधिनियम के अधीन सदस्य द्वारा किसी शास्ति के अधिनिर्णय पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना यदि कोई व्यक्ति इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए किन्हीं नियमों या विनियमों के उपबंधों का उल्लंघन करेगा या उल्लंघन करने का प्रयत्न करेगा या उल्लंघन का दुष्प्रेरण करेगा, तो वह कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो पच्चीस करोड़ रुपए तक का हो सकेगा या दोनों से, दंडनीय होगा ।
(2) यदि कोई व्यक्ति सदस्य द्वारा अधिरोपित शास्ति का संदाय करने में असफल रहता है या सदस्य द्वारा दिए गए किसी निदेश या आदेश का पालन करने में असफल रहता है तो वह कारावास से, जिसकी अवधि एक मास से कम नहीं होगी किन्तु जो दस वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो पच्चीस करोड़ रुपए तक का हो सकेगा या दोनों से, दंडनीय होगा ।
33. उन्मुक्ति प्रदान करने की शक्ति-(1) यदि केन्द्रीय सरकार का, प्राधिकरण द्वारा सिफारिश किए जाने पर, यह समाधान हो जाता है कि किसी व्यक्ति ने, जिसके बारे में यह अभिकथन किया गया है कि उसने इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों या विनियमों के किन्हीं उपबंधों का अतिक्रमण किया है, अभिकथित अतिक्रमण की बाबत पूर्ण और सही प्रकटन किया है तो वह ऐसे व्यक्ति को ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो वह अधिरोपित करना उचित समझे, इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों या विनियमों के अधीन किसी अपराध के लिए अभियोजन से या अभिकथित अतिक्रमण की बाबत इस अधिनियम के अधीन किसी शास्ति के अधिरोपण से भी उन्मुक्ति प्रदान कर सकेगी :
परन्तु ऐसी कोई उन्मुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा उन मामलों में प्रदान नहीं की जाएगी जहां कि ऐसे किसी अपराध के लिए अभियोजन संबंधी कार्यवाहियां ऐसी उन्मुक्ति प्रदान किए जाने के लिए आवेदन की प्राप्ति की तारीख से पूर्व संस्थित कर दी गई हों:
परन्तु यह और कि इस उपधारा के अधीन प्राधिकरण की सिफारिश केन्द्रीय सरकार पर आबद्धकर नहीं होगी ।
(2) यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि ऐसे व्यक्ति ने कार्यवाहियों के अनुक्रम में ऐसी शर्त का, जिस पर उन्मुक्ति प्रदत्त की गई थी, अनुपालन नहीं किया था या उसने मिथ्या साक्ष्य दिया था, तो उपधारा (1) के अधीन किसी व्यक्ति को प्रदत्त की गई उन्मुक्ति किसी भी समय वापस ली जा सकेगी और तदुपरि ऐसे व्यक्ति का, ऐसे अपराध के लिए जिसकी बाबत उन्मुक्ति प्रदत्त की गई थी या ऐसे किसी अन्य अपराध के लिए, जिसके बारे में यह प्रतीत होता है कि वह उसके उल्लंघन के संबंध में दोषी है, विचारण किया जा सकेगा और वह इस अधिनियम के अधीन ऐसी किसी शास्ति के अधिरोपण के लिए भी दायी हो जाएगा, जिसके लिए वह तब दायी होता यदि ऐसी कोई उन्मुक्ति प्रदान न की गई होती ।
34. धन, आय, लाभों और अभिलाभों पर कर से छूट-(i) धन-कर अधिनियम, 1957 (1957 का 27);
(ii) आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43), या
(iii) धन, आय, लाभ या अभिलाभों पर कर से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति में किसी बात के होते हुए भी,
प्राधिकरण अपने व्युत्पन्न धन, आय, लाभ या अभिलाभ की बाबत धन-कर, आय-कर या किसी अन्य कर का संदाय करने का दायी नहीं होगा ।
35. न्यायालय द्वारा अपराधों का संज्ञान-(1) कोई भी न्यायालय इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों या विनियमों के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का संज्ञान, प्राधिकरण द्वारा किए गए परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं ।
(2) सेशन न्यायालय से अवर कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।
36. प्रतिभूति अपील अधिकरण को अपील-(1) इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण द्वारा या किसी न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा किए गए किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति उस प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष, जिसकी उस मामले में अधिकारिता होगी, अपील कर सकेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक अपील उस तारीख से, जिसको वह आदेश, जिसके विरुद्ध अपील की जानी है, प्राप्त होता है, पैंतालीस दिन की अवधि के भीतर फाइल की जाएगी और वह ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति में होगी और उसके साथ ऐसी फीस होगी, जो विहित की जाए:
परन्तु प्रतिभूति अपील अधिकरण उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् भी किसी अपील को ग्रहण कर सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उस अवधि के भीतर अपील न किए जाने के लिए पर्याप्त कारण थे ।
(3) प्रतिभूति अपील अधिकरण, उपधारा (1) के अधीन किसी अपील के प्राप्त होने पर, अपील के पक्षकारों को सुने जाने का अवसर दिए जाने के पश्चात् उस आदेश की, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, पुष्टि करते हुए, उसको उपांतरित या अपास्त करते हुए उस पर ऐसा आदेश पारित कर सकेगा, जो वह ठीक समझे ।
(4) प्रतिभूति अपील अधिकरण, उसके द्वारा किए गए प्रत्येक आदेश की प्रति प्राधिकरण, अपील के पक्षकारों और संबंधित न्यायनिर्णायक अधिकारियों को भेजेगा ।
(5) प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष उपधारा (1) के अधीन फाइल की गई अपील पर उसके द्वारा यथासंभव शीघ्रता से कार्रवाई की जाएगी और उसके द्वारा उस तारीख से जिसको अपील उसके समक्ष प्रस्तुत की गई है, छह मास के भीतर अपील का अंतिम रूप से निपटारा किए जाने का प्रयास किया जाएगा ।
(6) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) की धारा 15न और धारा 15प के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्रतिभूति अपील अधिकरण इस धारा के अधीन अपील पर ऐसी प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई करेगा, जो विहित की जाए ।
37. सिविल न्यायालय की अधिकारिता का न होना-किसी सिविल न्यायालय को, किसी ऐसे मामले के बारे में कोई वाद या कार्यवाही ग्रहण करने की अधिकारिता नहीं होगी, जिसका अवधारण करने के लिए इस अधिनियम के अधीन नियुक्त न्यायनिर्णायक अधिकारी या इस अधिनियम के द्वारा या उसके अधीन प्रतिभूति अपील अधिकरण को सशक्त किया गया है और इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त शक्ति के अनुसरण में की गई या की जाने वाली किसी कार्रवाई की बाबत कोई न्यायालय या अन्य प्राधिकारी कोई व्यादेश नहीं देगा ।
38. उच्चतम न्यायालय को अपील-इस अधिनियम के अधीन प्रतिभूति अपील अधिकरण के किसी विनिश्चय या आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, प्रतिभूति अपील अधिकरण या विनिश्चय या आदेश उसको संसूचित किए जाने की तारीख से साठ दिन के भीतर ऐसे आदेश से उद्भूत विधि के किसी प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय को अपील फाइल कर सकेगा:
परन्तु यदि उच्चतम न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी को उक्त अवधि के भीतर अपील फाइल करने से पर्याप्त कारण से निवारित किया गया था तो वह उसे साठ दिन से अनधिक की और अवधि के भीतर अपील फाइल करने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा ।
अध्याय 9
वित्त, लेखा और संपरीक्षा
39. केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुदान-केन्द्रीय सरकार, संसद् द्वारा, इस निमित्त विधि द्वारा किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात्, प्राधिकरण को ऐसी धनराशियों का अनुदान दे सकेगी, जिसे वह सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उपयोग किए जाने हेतु ठीक समझे ।
40. पेंशन विनियामक और विकास निधि का गठन-(1) पेंशन विनियामक और विकास निधि के नाम से एक निधि का गठन किया जाएगा और उसमें निम्नलिखित जमा किया जाएगा, -
(क) प्राधिकरण द्वारा प्राप्त सभी सरकारी अनुदान, फीस और प्रभार;
(ख) प्राधिकरण द्वारा ऐसे अन्य स्रोतों से, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विनिश्चित किए जाएं, प्राप्त सभी राशियां ।
(2) निधि का उपयोजन निम्नलिखित की पूर्ति के लिए किया जाएगा-
(क) प्राधिकरण के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों तथा अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और अन्य पारिश्रमिक;
(ख) प्राधिकरण के कृत्यों के निर्वहन से संबंधित और इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उसके अन्य व्यय ।
41. अभिदाता शिक्षा और संरक्षण निधि का गठन-(1) प्राधिकरण अभिदाता शिक्षा और संरक्षण निधि के नाम से एक निधि का गठन करेगा ।
(2) अभिदाता शिक्षा और संरक्षण निधि में निम्नलिखित रकमें जमा की जाएंगी, अर्थात्: -
(क) अभिदाता शिक्षा और संरक्षण निधि के प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकारों, कम्पनियों या किन्हीं अन्य संस्थाओं द्वारा अभिदाता शिक्षा और संरक्षण निधि के लिए दिया गया अनुदान और संदान;
(ख) अभिदाता शिक्षा और संरक्षण निधि से किए गए विनिधानों से प्राप्त ब्याज और अन्य आय;
(ग) धारा 28 के अधीन प्राधिकरण द्वारा शास्ति के रूप में वसूल की गई राशियां ।
(3) अभिदाता शिक्षा और संरक्षण निधि का प्राधिकरण द्वारा प्रशासन और उपयोग उक्त प्रयोजन के लिए बनाए गए विनियमों के अनुसार अभिदाताओं के हितों के संरक्षण के लिए किया जाएगा ।
42. लेखा और संपरीक्षा-(1) प्राधिकरण, उचित लेखे और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा और लेखाओं का वार्षिक विवरण ऐसे प्ररूप में तैयार करेगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करके, विहित किया जाए ।
(2) प्राधिकरण के लेखाओं की संपरीक्षा, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा ऐसे अंतरालों पर, जो उसके द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं, की जाएगी और ऐसी संपरीक्षा के संबंध में उपगत कोई व्यय प्राधिकरण द्वारा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संदेय होगा ।
(3) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के और प्राधिकरण के लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति के, उस संपरीक्षा के संबंध में वही अधिकार, विशेषाधिकार और प्राधिकार होंगे जो साधारणतया, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के सरकारी लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में है और उसे विशिष्टतया, बहियां, लेखे संबंधित वाउचर तथा अन्य दस्तावेज और कागजपत्र पेश किए जाने की मांग करने और प्राधिकरण के किसी भी कार्यालय का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।
(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रमाणित प्राधिकरण के लेखे, उसकी संपरीक्षा रिपोर्ट के साथ प्रतिवर्ष केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित किए जाएंगे और सरकार उन्हें संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।
अध्याय 10
प्रकीर्ण
43. केन्द्रीय सरकार की निदेश देने की शक्ति-(1) इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना प्राधिकरण, इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों के प्रयोग या अपने कृत्यों के पालन में, तकनीकी और प्रशासनिक विषयों से संबंधित प्रश्नों से भिन्न नीति के प्रश्नों पर ऐसे निदेशों से आबद्ध होगा, जो केन्द्रीय सरकार उसे समय-समय पर लिखित रूप में देः
परन्तु इस उपधारा के अधीन, कोई निदेश दिए जाने के पूर्व, प्राधिकरण को अपने विचार व्यक्त करने का यावत्साध्य अवसर दिया जाएगा ।
(2) कोई प्रश्न नीति का है या नहीं, इस बारे में केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा ।
44. प्राधिकरण को अतिष्ठित करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) यदि किसी समय केन्द्रीय सरकार की यह राय हो कि-
(क) ऐसी परिस्थितियों के कारण, जो प्राधिकरण के नियंत्रण से बाहर हैं, वह इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन उस पर अधिरोपित कृत्यों का निर्वहन या कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है; या
(ख) प्राधिकरण ने केन्द्रीय सरकार द्वारा जारी किसी ऐसे निदेश के, जिसे केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के अधीन जारी करने की हकदार है, अनुपालन में या इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उसके अधीन उस पर अधिरोपित कृत्यों के निर्वहन या कर्तव्यों के पालन में लगातार व्यतिक्रम किया है और ऐसे व्यतिक्रम के फलस्वरूप प्राधिकरण की वित्तीय स्थिति या प्राधिकरण के प्रशासन को नुकसान हुआ है; या
(ग) ऐसी परिस्थितियां विद्यमान हैं, जिनके कारण लोक हित में ऐसा करना आवश्यक हो गया है,
तो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा और उन कारणों से, जो उसमें विनिर्दिष्ट किए जाएं, छह मास से अनधिक की इतनी अवधि के लिए, जितनी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, प्राधिकरण को अतिष्ठित कर सकेगीः
परन्तु ऐसी कोई अधिसूचना जारी करने से पूर्व केन्द्रीय सरकार, प्राधिकरण को प्रस्तावित अधिक्रमण के विरुद्ध अभ्यावेदन करने का उचित अवसर देगी और प्राधिकरण के अभ्यावेदनों पर, यदि कोई हो, विचार करेगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण को अतिष्ठित करने वाली अधिसूचना के प्रकाशन पर-
(क) अध्यक्ष और अन्य सदस्य, अधिक्रमण की तारीख से ही उस रूप में अपने पद को रिक्त कर देंगे;
(ख) ऐसी सभी शक्तियों, कृत्यों और कर्तव्यों का, जिनका इस अधिनियम द्वारा या उनके अधीन प्राधिकरण द्वारा या उसकी ओर से प्रयोग या निर्वहन किया जा सकता है, उपधारा (3) के अधीन प्राधिकरण का पुनर्गठन किए जाने तक केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रयोग और निर्वहन किया जाएगा; और
(ग) प्राधिकरण के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन सभी सम्पत्तियां, उपधारा (3) के अधीन प्राधिकरण का पुनर्गठन किए जाने तक, केन्द्रीय सरकार में निहित होंगी ।
(3) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अतिष्ठित काल की समाप्ति पर या उसके पूर्व प्राधिकरण का पुनर्गठन करेगी ।
(4) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना की एक प्रति और उसके द्वारा की गई किसी कार्रवाई की पूरी रिपोर्ट यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।
45. पेंशन सलाहकार समिति की स्थापना-(1) प्राधिकरण, अधिसूचना द्वारा ऐसी तारीख से, जो वह अधिसूचना में विनिर्दिष्ट करे, पेंशन सलाहकार समिति के नाम से ज्ञात एक समिति की स्थापना कर सकेगा ।
(2) पेंशन सलाहकार समिति, कर्मचारी संगमों, अभिदाताओं, वाणिज्य और उद्योग, मध्यवर्तियों और पेंशन अनुसंधान में लगे संगठनों के हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए पच्चीस से अनधिक सदस्यों से मिलकर बनेगी, जिनमें पदेन सदस्य सम्मिलित नहीं हैं ।
(3) प्राधिकरण का अध्यक्ष और सदस्य, पेंशन सलाहकार समिति के पदेन अध्यक्ष और पदेन सदस्य होंगे ।
(4) पेंशन सलाहकार समिति का उद्देश्य, धारा 52 के अधीन विनियम बनाने से संबंधित विषयों पर प्राधिकरण को सलाह देना होगा ।
(5) उपधारा (4) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, पेंशन सलाहकार समिति, प्राधिकरण को ऐसे विषयों पर सलाह दे सकेगी, जो प्राधिकरण द्वारा उसे निर्दिष्ट किए जाएं और ऐसे विषयों पर भी सलाह दे सकेगी जो समिति ठीक समझे ।
46. केन्द्रीय सरकार को विवरणियों, आदि का दिया जाना-(1) प्राधिकरण, केन्द्रीय सरकार को, पेंशन उद्योग के संवर्धन और विकास संबंधी किसी प्रस्थापित या विद्यमान कार्यक्रम के संबंध में ऐसी विवरणियां, कथन और अन्य विशिष्टियां ऐसे समय पर और ऐसे प्ररूप तथा रीति में जिनकी केन्द्रीय सरकार समय-समय पर अपेक्षा करे, देगा जो विहित की जाए या जैसा केन्द्रीय सरकार देने का निदेश दे ।
(2) उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्राधिकरण, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के समाप्त होने के पश्चात् नौ मास के भीतर, पूर्व वित्तीय वर्ष के दौरान इस अधिनियम के अधीन विनियमित पेंशन निधि की स्कीमों के संवर्धन और विकास संबंधी क्रियाकलापों सहित अपने क्रियाकलापों का सही और पूर्ण विवरण देते हुए एक रिपोर्ट केन्द्रीय सरकार को प्रस्तुत करेगा ।
(3) उपधारा (2) के अधीन प्राप्त रिपोर्टों की प्रतियां उनके प्राप्त होने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएंगी ।
47. प्राधिकरण के सदस्यों, अधिकारियों और कर्मचारियों का लोक सेवक होना-प्राधिकरण के अध्यक्ष और अन्य सदस्य तथा अधिकारी और अन्य कर्मचारी, जब वे इस अधिनियम के किसी उपबंध के अनुसरण में कार्य कर रहे हों या जब उनका ऐसा कार्य करना तात्पर्यित हो, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझे जाएंगे ।
48. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों या विनियमों के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही, केन्द्रीय सरकार या प्राधिकरण अथवा केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी या प्राधिकरण के किसी सदस्य, अधिकारी या अन्य कर्मचारी के विरुद्ध न होगी ।
49. शक्तियों का प्रत्यायोजन-(1) प्राधिकरण, साधारण या विशेष लिखित आदेश द्वारा प्राधिकरण के किसी सदस्य, अधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति को, ऐसी शर्तों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, इस अधिनियम के अधीन अपनी ऐसी शक्तियां और कृत्य (धारा 52 के अधीन शक्तियों को छोड़कर), जो वह आवश्यक समझे, प्रत्यायोजित कर सकेगा ।
(2) प्राधिकरण, साधारण या विशेष लिखित आदेश द्वारा सदस्यों की समिति का भी गठन कर सकेगा और उन्हें प्राधिकरण की ऐसी शक्तियां और कृत्य प्रत्यायोजित कर सकेगा, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
50. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध के लिए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कम्पनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगेः
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को इस अधिनियम में उपबंधित किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी, यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध, किसी कम्पनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(क) कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है, और
(ख) फर्म के संबंध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
51. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्िवत करने के लिए, अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -
(क) धारा 5 की उपधारा (3) के अधीन अध्यक्ष और पूर्णकालिक सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की अन्य शर्तें;
(ख) धारा 5 की उपधारा (4) के अधीन अंशकालिक सदस्यों को संदेय भत्ते;
(ग) ऐसे अतिरिक्त कृत्य, जो धारा 14 की उपधारा (2) के खंड (त) के अधीन प्राधिकरण द्वारा किए जा सकेंगे;
(घ) कोई अन्य विषय, जिसकी बाबत प्राधिकरण धारा 14 की उपधारा (3) के खंड (v) के अधीन सिविल न्यायालयों की शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा;
(ङ) धारा 17 की उपधारा (10) के अधीन प्राधिकृत अधिकारी द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया;
(च) वह प्ररूप और रीति, जिसमें धारा 36 की उपधारा (2) के अधीन प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष अपील फाइल की जा सकेगी और ऐसी फीस, जो ऐसी अपील के साथ होगी;
(छ) धारा 36 की उपधारा (6) के अधीन अपील पर कार्रवाई करते समय प्रतिभूति अपील अधिकरण द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया;
(ज) वह प्ररूप, जिसमें प्राधिकरण द्वारा धारा 42 की उपधारा (1) के अधीन लेखाओं का वार्षिक विवरण रखा जाएगा;
(झ) वह समय, जिसके भीतर और वह प्ररूप और रीति, जिसमें प्राधिकरण द्वारा धारा 46 की उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार को विवरणियां और रिपोर्टें दी जानी हैं;
(ञ) कोई अन्य विषय, जिसे विहित किया जाना है या जो विहित किया जाए अथवा जिसकी बाबत नियमों द्वारा उपबंध किया जाना है ।
52. विनियम बनाने की शक्ति-(1) प्राधिकरण, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए ऐसे विनियम बना सकेगा जो इस अधिनियम और तद्धीन बनाए गए नियमों से संगत हों ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्ः-
(क) धारा 9 की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण के अधिवेशनों का समय और स्थान तथा ऐसे अधिवेशनों में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया (जिसके अंतर्गत ऐसे अधिवेशनों में गणपूर्ति भी है);
(ख) धारा 11 की उपधारा (2) के अधीन प्राधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की सेवा के निबंधन और अन्य शर्तें;
(ग) धारा 12 की उपधारा (1) के खण्ड (ख) में निर्दिष्ट पेंशन स्कीमों की बाबत प्राधिकरण द्वारा बनाए जाने वाले विनियम और वह समय, जिसके भीतर उस धारा की उपधारा (2) के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा ऐसी स्कीमों की पुष्टि की जानी चाहिए;
(घ) धारा 14 की उपधारा (2) के खण्ड (च) के अधीन अभिदाताओं की शिकायतों को दूर करने के लिए तंत्र की स्थापना;
(ङ) वह प्ररूप और रीति, जिसमें धारा 14 की उपधारा (2) के खण्ड (ढ) के अधीन मध्यवर्तियों द्वारा लेखाबहियां रखी जाएंगी और लेखाओं का विवरण दिया जाएगा;
(च) धारा 20 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट पेंशन प्रणाली का संशोधन;
(छ) धारा 20 की उपधारा (2) के खण्ड (ख) में निर्दिष्ट व्यष्टि पेंशन लेखा से प्रत्याहरण के लिए प्रयोजन, अंतराल, परिसीमाएं जैसी शर्तें;
(ज) वे शर्तें, जिनके अधीन रहते हुए अभिदाता धारा 20 की उपधारा (2) के खण्ड (ज) में निर्दिष्ट राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली से बाहर होगा;
(झ) वे शर्तें, जिनके अधीन रहते हुए अभिदाता धारा 20 की उपधारा (2) के खण्ड (झ) में निर्दिष्ट किसी वार्षिकी का क्रय करेगा;
(ञ) धारा 21 की उपधारा (2) के अधीन केन्द्रीय अभिलेखपालन अभिकरण के कर्तव्य और कार्य;
(ट) धारा 21 की उपधारा (3) के परन्तुक के अधीन केन्द्रीय अभिलेखपालन अभिकरण को संदेय विनियमित आस्तियों के उचित मूल्य के प्रतिकर का अवधारण;
(ठ) धारा 22 की उपधारा (1) के अधीन अभिदाय और अनुदेश प्राप्त करने तथा उन्हें, यथास्थिति, न्यासी बैंक या केन्द्रीय अभिलेखपालन अभिकरण को पारेषित करने और अभिदाताओं को फायदों का संदाय करने की रीति और धारा 22 की उपधारा (2) के अधीन उपस्थिति अस्तित्वों के कार्यकरण को शासित करने वाले विनियम;
(ड) वह रीति, जिसमें धारा 23 की उपधारा (1) के अधीन कोई पेंशन निधि अभिदाय प्राप्त कर सकेगी, उनका संचयन कर सकेगी और अभिदाताओं को उनका संदाय कर सकेगी, उपधारा (2) के अधीन पेंशन निधि की संख्या, उपधारा (3) के अधीन पेंशन निधि का कार्यकरण और उपधारा (4) के अधीन पेंशन निधि द्वारा स्कीमों के प्रबंध की रीति;
(ढ) वह प्ररूप और रीति, जिसमें धारा 27 की उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त करने के लिए कोई आवेदन किया जाएगा और वह फीस, जिसका ऐसे आवेदन के साथ संदाय किया जाएगा;
(ण) वे शर्तें, जिनके अधीन धारा 27 की उपधारा (3) के अधीन किसी मध्यवर्ती को रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त किया जा सकेगा;
(त) धारा 27 की उपधारा (4) के अधीन मध्यवर्तियों के रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के निलम्बन या रद्दकरण की प्रक्रिया और रीति;
(थ) धारा 30 की उपधारा (1) के अधीन किसी न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा जांच करने की प्रक्रिया;
(द) धारा 31 की उपधारा (2) के अधीन मध्यवर्ती के शासी बोर्ड या निदेशक बोर्ड का अधिक्रमण;
(ध) धारा 31 की उपधारा (3) के अधीन प्रशासक द्वारा मध्यवर्ती के कार्यों का प्रबंध;
(न) धारा 41 की उपधारा (3) के अधीन अभिदाता शिक्षा और संरक्षण निधि के प्रशासन और उपयोग की रीति;
(प) धारा 49 की उपधारा (2) के अधीन प्राधिकरण की शक्तियों और कृत्यों का समितियों को प्रत्यायोजन;
(फ) राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली न्यास की स्थापना, उसके कर्तव्य और कृत्य;
(ब) ऐसा कोई अन्य विषय, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाना है या जो विनिर्दिष्ट किया जाए अथवा जिसकी बाबत विनियमों द्वारा उपबंध किया जाना है या उपबंध किया जाए ।
53. नियमों और विनियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, ऐसी कुल तीस दिन की अवधि के लिए जो एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी, रखा जाएगा और यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्र के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं या दोनों सदन इस बात से सहमत हो जाएं कि वह नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो ऐसा नियम या विनियम, यथास्थिति, तत्पश्चात् केवल ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा या उसका कोई प्रभाव नहीं होगा, तथापि, उस नियम या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से पहले उसके अधीन की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडे़गा ।
54. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक प्रतीत हों:
परन्तु इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ से पांच वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
55. अन्य विधियों के लागू होने का वर्जित न होना-इस अधिनियम के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबंधों के अतिरिक्त होंगे न कि उनके अल्पीकरण में ।
56. व्यावृत्ति-अंतरिम पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण और केन्द्रीय सरकार द्वारा भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के संकल्प संख्यांक फा० सं० 5/7/2003-ईसीबी और पीआर, तारीख 10 अक्तूबर, 2003 और फा० सं० 1(6)2007-पीआर, तारीख 14 नवम्बर, 2008 के और अधिसूचना संख्यांक फा० सं० 5/7/2003-ईसीबी और पीआर, तारीख 22 दिसम्बर, 2003 के अधीन की गई कोई बात या कोई कार्रवाई इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।
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