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फेक्टर विनियमन अधिनियम, 2011 ( Factoring Regulation Act, 2011 )


 

फेक्टर विनियमन अधिनियम, 2011

(2012 का अधिनियम संख्यांक 12)

[22 जनवरी, 2012]

प्राप्तव्यों के समनुदेशन के रजिस्ट्रीकरण और प्राप्तव्यों का समनुदेशन किए जाने संबंधी संविदा

के पक्षकारों के अधिकारों और बाध्यताओं के लिए उपबंध करके प्राप्तव्यों के

समनुदेशन तथा उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक

विषयों का उपबंध और विनियमन

करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के बासठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम फेक्टर विनियमन अधिनियम, 2011 है ।

(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है ।

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करेः

परंतु इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और ऐसे किसी उपबंध में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस उपबंध के प्रवृत्त होने के प्रति निर्देश है ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ में अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) समनुदेशन" से किसी फेक्टर के पक्ष में किसी देनदार से शोध्य किसी प्राप्तव्य में किसी समनुदेशक के अविभाजित हित का करार द्वारा अंतरण अभिप्रेत है और जहां या तो समनुदेशक या देनदार भारत के बाहर अवस्थित या स्थापित है, वहां इसके अंतर्गत समनुदेशन भी है ।

स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, किसी प्राप्तव्य में किसी समनुदेशक के अविभाजित हित के अन्तर्गत किसी बैंक या किसी वित्तीय संस्था द्वारा उधारों और अग्रिमों या अन्य बाध्यताओं के लिए प्रतिभूति के रूप में प्राप्तव्यों के अधिकारों का सृजन नहीं आएगा;

(ख) समनुदेशिती" से ऐसा फेक्टर अभिप्रेत है जिसके पक्ष में प्राप्तव्य अंतरित किया जाता है;

(ग) समनुदेशक" से ऐसा कोई व्यक्ति अभिप्रेत है, जो किसी प्राप्तव्य का स्वामी है;

(घ) बैंक" से निम्नलिखित अभिप्रेत है, -

(i) कोई बैंककारी कंपनी;

(ii) कोई तस्थानी नया बैंक;

(iii) भारतीय स्टेट बैंक;

(iv) कोई समनुषंगी बैंक;

(v) ऐसा अन्य बैंक, जिसे केंद्रीय सरकार, रिजर्व बैंक की सिफारिशों पर, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे; या

(vi) बहुराज्य सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 2002 (2002 का 39) के अधीन रजिस्ट्रीकृत और बैंककारी विनियम अधिनियम, 1949 (1949 का 10) के उपबंधों के अधीन रिजर्व बैंक द्वारा बैंककारी कारबार आरंभ करने के लिए अनुज्ञप्त कोई बहुराज्य सहकारी सोसाइटी ;

(ङ) बैंककारी कंपनी" का वही अर्थ है, जो बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खंड (ग) में है;

(च) कारबार उद्यम" से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006 (2006 का 27) की धारा 2 के क्रमशः खंड (ङ), खंड (छ), खंड (ज) और खंड (ड) में यथापरिभाषित ऐसा कोई उद्यम या मध्यम उद्यम, सूक्ष्म उद्यम या लघु उद्यम अभिप्रेत है, जो किसी कारबार क्रियाकलाप में लगा हुआ है;

(छ) तत्स्थानी नया बैंक" का वही अर्थ है, जो बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खंड (घक) में है;

(ज) देनदार" से ऐसा कोई व्यक्ति अभिप्रेत है, जो समनुदेशक को, चाहे किसी संविदा के अधीन या अन्यथा, किसी प्राप्तव्य का संदाय करने के लिए या प्राप्तव्य की बाबत किसी बाध्यता का, चाहे वह विद्यमान, प्रोद्भूत होने वाली, भावी, सशर्त या समाश्रित हो, निर्वहन करने के लिए दायी है;

(झ) फेक्टर" से भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 45झ के खंड (च) में यथापरिभाषित ऐसी कोई गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी, जिसे धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त किया गया है या संसद् या किसी राज्य विधान-मंडल के किसी अधिनियम के अधीन स्थापित कोई निगमित निकाय या कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन रजिस्ट्रीकृत कोई बैंक या कोई कंपनी अभिप्रेत है, जो फेक्टर के कारबार में लगी हुई है;

(ञ) फेक्टर कारबार" से समनुदेशक के प्राप्तव्यों का, ऐसे प्राप्तव्यों या वित्त-पोषण के समनुदेशन की स्वीकृति द्वारा, चाहे किन्हीं प्राप्तव्यों पर प्रतिभूति हित के प्रति उधार या अग्रिम देने के रूप में या अन्यथा, अर्जन का कारबार अभिप्रेत है, किन्तु इसके अंतर्गत निम्नलिखित नहीं हैं-

(i) किसी बैंक द्वारा कारबार के अपने साधारण अनुक्रम में प्राप्तव्यों की प्रतिभूति मद्दे उपलब्ध कराई गई प्रत्यय सुविधाएं;

(ii) कृषि उपज या किसी भी प्रकार के माल के विक्रय के लिए कमीशन अभिकर्ता के रूप में या अन्यथा कोई क्रियाकलाप या ऐसी उपज या माल के उत्पादन, भंडारण, प्रदाय, वितरण, अर्जन या नियंत्रण या किन्हीं सेवाओं के उपबंध से संबंधित कोई क्रियाकलाप ।

स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, -

(i)  कृषि उपज" पद का वही अर्थ होगा, जो कृषि उपज (श्रेणीकरण और चिह्नांकन) अधिनियम, 1937 (1937 का 1) की धारा 2 के खंड (क) के अधीन है; और

(ii) माल" और कमीशन अभिकर्ता" पदों के वही अर्थ होंगे, जो अग्रिम संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1952 (1952 का 74) की धारा 2 के खंड (घ) और खंड (झ) के स्पष्टीकरण (ii) के अधीन हैं;

(ट) वित्तीय संविदा" से ब्याज दरों, वस्तुओं, करेंसियों, शेयरों, बंधपत्रों, डिबेंचरों या किसी अन्य वित्तीय लिखत को अंतर्वलित करने वाला कोई हाजिर, अग्रिम, भावी, विकल्प या अदला-बदली संव्यवहार, प्रतिभूतियों के कोई पुनः क्रय या उधार देने का कोई संव्यवहार या वित्तीय बाजारों में किया गया कोई अन्य इसी प्रकार का संव्यवहार या ऐसे संव्यवहारों का समुच्चय अभिप्रेत है;

(ठ) नेटिंग करार" से सिस्टम सहभागियों के बीच, संदाय संबंधी बाध्यताओं या परिदान संबंधी बाध्यताओं के, जिनके अंतर्गत सिस्टम प्रदाता द्वारा किसी सिस्टम सहभागी के दिवालिएपन या विघटन या परिसमापन पर या ऐसी परिस्थितियों में, जो सिस्टम प्रदाता किसी भविष्यवर्ती तारीख को निपटारे के लिए स्वीकार किए गए संव्यवहारों के अपने नियमों या विनियमों या उपविधियों में (चाहे वे किसी नाम से ज्ञात हों) विनिर्दिष्ट करे, पर्यवसान से प्रोद्भूत दावे और बाध्यताएं भी हैं, मुजरा या समायोजन किए जाने के परिणामस्वरूप शोध्य या संदेय या परिदेय धन या प्रतिभूतियों की रकम का सिस्टम प्रदाता द्वारा अवधारण करने के प्रयोजन के लिए, कोई करार अभिप्रेत है, जिससे कि केवल किसी शुद्ध दावे की मांग की जाए या कोई शुद्ध बाध्यता अपने ऊपर ली जाए;

(ड) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;

(ढ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

(ण) संपत्ति" से निम्नलिखित अभिप्रेत है, -

(i) स्थावर संपत्ति;

(ii) जंगम संपत्ति;

(iii) कोई ऋण अथवा धन का संदाय प्राप्त करने संबंधी कोई अधिकार, चाहे प्रतिभूत या अप्रतिभूत हो;

(iv) प्राप्तव्य;

(v) अमूर्त आस्तियां, जो व्यवहार-ज्ञान, पेटेंट, प्रतिलिप्यधिकार, डिजाइन, व्यापार चिह्न, अनुज्ञप्ति, फ्रेंचाइज़ या समान प्रकृति का कोई अन्य कारोबारी या वाणिज्यिक अधिकार है;

(त) प्राप्तव्य" से किसी संविदा के, जिसके अंतर्गत वहां कोई अंतरराष्ट्रीय संविदा भी है, जहां या तो समनुदेशक या ऋणी या समुनेदेशिती भारत के बाहर किसी राज्य में अवस्थित है या स्थापित किया जाता है, किसी मुद्रा राशि के संदाय के प्रति किसी व्यक्ति के किसी अधिकार में सभी या उसके भागरूप या अविभाजित हित अभिप्रेत है, चाहे ऐसा अधिकार किसी अवसंरचना सुविधा या सेवाओं के उपयोग से उद्भूत विद्यमान, भावी, प्रोद्भावी, सशर्त या समाश्रित है और इसके अंतर्गत उसके लिए पथकर या किसी अन्य राशि, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, के संदाय की अपेक्षा करने वाला कोई ठहराव भी है;

(थ) रिजर्व बैंक" से भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय रिजर्व बैंक अभिप्रेत है;

(द) भारतीय स्टेट बैंक" से भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 (1955 का 23) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय स्टेट बैंक अभिप्रेत है;

(ध) समनुषंगी बैंक" का वही अर्थ होगा, जो भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) की धारा 2 के खंड (ट) में है;

(न) उन शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं, किंतु भारतीय रिजर्व बैंक अधनियम, 1934 (1934 का 2), बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10), कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1), वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्गठन तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम, 2002 (2002 का 54), प्रत्यय विषयक जानकारी कंपनी (विनियमन) अधिनियम, 2005 (2005 का 30) या सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास अधिनियम,  2006 (2006 का 27) में परिभाषित हैं, वहीं अर्थ होंगे जो उन अधिनियमों में हैं ।

अध्याय 2

फेक्टरों का रजिस्ट्रीकरण

3. फेक्टरों का रजिस्ट्रीकरण-(1) कोई भी फेक्टर, फेक्टर कारबार तब तक प्रारंभ नहीं करेगा अथवा नहीं चलाएगा, जब तक कि वह इस अधिनियम के अधीन फेक्टर कारबार को प्रारंभ करने या चलाने के लिए रिजर्व बैंक से कोई रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र प्राप्त नहीं कर लेता है ।

(2) प्रत्येक फेक्टर, रजिस्ट्रीकरण के लिए रिजर्व बैंक को ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति में, जो वह विनिर्दिष्ट करे, आवेदन करेगाः

परंतु गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी के रूप में रजिस्ट्रीकृत और इस अधिनियम के प्रारंभ पर विद्यमान तथा ऐसे प्रारंभ के पूर्व अपने प्रधान कारबार के रूप में फेक्टर कारबार में लगी कोई कंपनी, फेक्टर के रूप में रजिस्ट्रीकरण के लिए रिजर्व बैंक को आवेदन ऐसे प्रारंभ से छह मास की अवधि के अवसान के पूर्व करेगी और उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी जब तक उसको रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र जारी नहीं कर दिया जाता है या रजिस्ट्रीकरण संबंधी आवेदन को नामंजूर किए जाने की उसको संसूचना नहीं दे दी जाती है, तब तक फेक्टर कारबार को जारी रख सकेगी ।

स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए यह स्पष्ट किया जाता है कि फेक्टर कारबार में लगी किसी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी को अपने प्रधान कारबार" के रूप में फेक्टर कारबार में लगा हुआ माना जाएगा, यदि वह निम्नलिखित शर्तों को पूरा करती है, अर्थात्ः-

(क) यदि फेक्टर कारबार में उसकी वित्तीय आस्तियां उसकी कुल आस्तियों के पचास प्रतिशत या ऐसे प्रतिशत से, जो रिजर्व बैंक द्वारा नियत किया जाए, अधिक हैं; और

(ख) यदि फेक्टर कारबार से उसकी आय सकल आय के पचास प्रतिशत या ऐसे प्रतिशत से जो रिजर्व बैंक द्वारा नियत किया जाए, अधिक हैं ।

(3) किसी फेक्टर के रूप में रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त करने के लिए प्रत्येक आवेदक, रजिस्ट्रीकरण के प्रयोजन के लिए भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) के अधीन गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी के रूप में रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त किए जाने के संबंध में किसी आवेदक द्वारा पालन की जाने वाली सभी अपेक्षाओं का अनुपालन करेगा और उस अधिनियम के सभी उपबंध, जहां तक उनका संबंध गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनियों के रजिस्ट्रीकरण से है (उनके सिवाय, जो इस अधिनियम के अधीन उपबंधित हैं), यथा आवश्यक परिवर्तनों के साथ लागू होंगे ।

(4) विद्यमान गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी की दशा में, रिजर्व बैंक किसी फेक्टर के रूप में रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र नए सिरे से जारी कर सकेगा, यदि गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी का मूल कारबार फेक्टर कारबार का है ।

(5) इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबंधित है, उसके सिवाय, प्रत्येक फेक्टर, जिसके अंतर्गत ऐसे फेक्टर भी हैं, जो धारा 5 के अधीन रजिस्ट्रीकरण की अपेक्षा के अध्यधीन नहीं हैं, भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2), उसके अधीन बनाए गए नियमों और विनियमों तथा समय-समय पर रिजर्व बैंक द्वारा जारी किए गए निदेशों या मार्गदर्शक सिद्धांतों द्वारा शासित होगा ।

4. गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनियों के उपबंधों का फेक्टर को लागू होना-भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) के अध्याय 3ख के ऐसी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनियों से, जिनको भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45झक की उपधारा (5) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त किया गया है, संबंधित सभी उपबंध (उनके सिवाय, जो इस अधिनियम के अधीन विनिर्दिष्ट रूप से उपंबधित हैं) यथा आवश्यक परिवर्तनों के साथ ऐसे फेक्टर को लागू होंगे, जिसे धारा 3 के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त किया गया है ।

5. किसी फेक्टर के रूप में रजिस्ट्रीकरण की अपेक्षा का बैंक या कानूनी निगम या सरकारी कंपनी को लागू होना-धारा 3 की कोई बात संसद् या राज्य विधान-मंडल के किसी अधिनियम के अधीन स्थापित किसी बैंक या निगम को या कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 के अधीन यथा परिभाषित किसी सरकारी कंपनी को लागू नहीं होगी ।

6. रिजर्व बैंक की फेक्टरों को निदेश देने और सूचना संगृहीत करने की शक्तियां-(1) रिजर्व बैंक, किसी भी समय साधारण या विशेष आदेश द्वारा, यह निदेश दे सकेगा कि प्रत्येक फेक्टर, ऐसे प्ररूप में, ऐसे अंतरालों पर और ऐसे समय के भीतर, फेक्टर द्वारा किए गए फेक्टर कारबार से संबंधित ऐसे विवरण, सूचना या विशिष्टियां उसे देगा, जो रिजर्व बैंक द्वारा समय-समय पर विनिर्दिष्ट की जाएं ।

(2) रिजर्व बैंक, यदि वह फेक्टर सेवाओं का उपयोग करने वाले कारबार उद्यमों के हित में या फेक्टरों के हित में या अन्य पणधारकों के हित में आवश्यक समझता है, ऐसे फेक्टरों द्वारा किए जा रहे फेक्टर कारबार से संबंधित या उनसे संसक्त किसी विषय के संबंध में फेक्टरों को साधारणतया या किसी फेक्टर को विशिष्टतया या फेक्टरों के समूह को निदेश दे सकेगा ।

(3) यदि कोई फेक्टर रिजर्व बैंक द्वारा उपधारा (2) के अधीन दिए गए किसी निदेश का अनुपालन करने में असफल रहता है तो रिजर्व बैंक ऐसे फेक्टर को फेक्टर कारबार करने से प्रतिषिद्ध कर सकेगा:

परंतु यह कि किसी फेक्टर को फेक्टर कारबार करने से प्रतिषिद्ध करने से पूर्व उस फेक्टर को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दिया जाएगा ।

अध्याय 3

प्राप्तव्यों का समनुदेशन

7. प्राप्तव्यों का समनुदेशन-(1) कोई समनुदेशक, लिखित में करार द्वारा, किसी देनदार द्वारा उसको शोध्य और संदेय किसी प्राप्तव्य को ऐसे किसी फेक्टर को, जो समनुदेशिती है, किसी ऐसे प्रतिफल के लिए, जो समनुदेशक और समनुदेशिती के बीच करार पाया जाए, समनुदेशित कर सकेगा और समनुदेशक ऐसे समनुदेशन के समय समनुदेशिती को किन्हीं ऐसे बचावों और मुजरा संबंधी अधिकार का प्रकटन करेगा, जो देनदार को उपलब्ध हो :

परंतु यदि प्राप्तव्य का संदाय करने का दायी देनदार अथवा फेक्टर का कारबार भारत के बाहर अवस्थित या स्थापित है, तो प्राप्तव्य का कोई समनुदेशन, विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 (1999 का 42) के अध्यधीन होगा ।

(2) प्राप्तव्यों के समनुदेशन के लिए लिखित में करार के निष्पादन पर, प्राप्तव्य के शोध्य संदाय को अनन्य रूप से प्रतिभूत करने के लिए किसी संपत्ति पर सृजित सभी अधिकार, उपचार और कोई प्रतिभूति हित समनुदेशिती में निहित होगा और समनुदेशिती को ऐसे प्राप्तव्य को वसूल करने और समनुदेशक के सभी अधिकारों और उपचारों का, नुकसानी के रूप में या अन्यथा अथवा धारा 8 में यथा उपबंधित समनुदेशन की सूचना दी गई हो या नहीं, प्रयोग करने का आत्यंतिक अधिकार होगा ।

(3) प्राप्तव्यों का कोई समनुदेशन, जो किसी बैंक या अन्य लेनदार द्वारा दिए गए किसी ऋण के प्रतिसंदाय के लिए प्रतिभूति के रूप में है और यदि समनुदेशक ने समनुदेशिती को ऐसे विल्लंगम् की सूचना दे दी है, तब ऐसे प्राप्तव्य के समनुदेशन को स्वीकार करने पर समनुदेशिती ऐसे समनुदेशन के लिए, यथास्थिति, बैंक या लेनदार को प्रतिफल का संदाय करेगा ।

8. देनदार को सूचना और ऐसे देनदार की बाध्यता का उन्मोचन-किसी प्राप्तव्य का कोई समनुदेशिती ऐसे प्राप्तव्यों की बाबत प्राप्तव्य के संदाय की देनदार से मांग करने का तब तक हकदार नहीं होगा, जब तक समनुदेशक या समनुदेशिती द्वारा, ऐसे समनुदेशन की सूचना, समनुदेशक द्वारा उसके पक्ष में अनुदत्त, अभिव्यक्त प्राधिकार सहित, देनदार को नहीं दे दी जाती है ।

9. समनुदेशिती को संदाय कर दिए जाने पर देनदार के दायित्व का उन्मोचन-जहां धारा 8 के अधीन, यथास्थिति, समनुदेशक या समनुदेशिती द्वारा प्राप्तव्य के समनुदेशन की कोई सूचना दी जाती है, वहां ऐसी सूचना की प्राप्ति पर देनदार समनुदेशिती को संदाय करेगा और सूचना में विनिर्दिष्ट प्राप्तव्यों के संबंध में किसी बाध्यता के उन्मोचन में ऐसे समनुदेशिती को किए गए संदाय से संदाय करने वाला देनदार ऐसे संदाय के संबंध में तत्समान दायित्व से पूर्ण रूप से उन्मोचित हो जाएगा ।

10. देनदार द्वारा समनुदेशक को किए गए संदाय कतिपय मामलों में समनुदेशिती के फायदे के लिए न्यास के रूप में धारित किया जाना-जहां समनुदेशक द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन समनुदेशिती द्वारा प्राप्तव्यों के समनुदेशन की कोई सूचना नहीं दी जाती है, वहां समनुदेशक को ऐसे प्राप्तव्यों के संबंध में देनदार द्वारा किया गया ऐसा कोई संदाय समनुदेशिती के फायदे के लिए न्यास के रूप में धारित किया जाएगा, जो, यथास्थिति, समनुदेशिती या इस निमित्त सम्यक् रूप से प्राधिकृत उसके अभिकर्ता को तुरंत संदत्त किया जाएगा ।

अध्याय 4

प्राप्तव्यों के समनुदेशन के लिए संविदा के पक्षकारों के अधिकार और बाध्यताएं

11. प्राप्तव्यों के समनुदेशन के लिए संविदा के पक्षकारों के अधिकार और बाध्यताएं-तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, देनदार को समनुदेशिती द्वारा उससे कोई मांग किए जाने से पूर्व धारा 8 के अधीन समनुदेशन की सूचना का अधिकार होगा और देनदार को सूचना की तामील किए जाने तक देनदार समनुदेशित प्राप्तव्यों की बाबत मूल संविदा के अनुसार समनुदेशक को संदाय करने के लिए हकदार होगा और ऐसे संदाय से देनदार मूल संविदा के अधीन तत्समान दायित्व से पूर्णतः उन्मोचित हो जाएगा ।

स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए यह स्पष्ट किया जाता है कि इस धारा की कोई बात धारा 9 के अधीन समनुदेशिती को संदाय करने के देनदार के अधिकारों पर प्रभाव नहीं डालेगी ।

12. देनदार का दायित्व-जहां धारा 8 में यथानिर्दिष्ट समनुदेशन की सूचना की तामील की जाती है वहां देनदार, -

(क) समनुदेशन की सूचना की प्राप्ति से पूर्व समनुदेशक को उस लेखे किए गए निक्षेप या अग्रिम या संदाय के ब्यौरों की संसूचना समनुदेशिती को देगा और जब कभी समनुदेशिती द्वारा प्राप्तव्य के संबंध में कोई अन्य सूचना उपलब्ध कराने के लिए कहा जाए तो वह उसे समनुदेशिती को उपलब्ध कराएगा;

(ख) समनुदेशित प्राप्तव्यों के संबंध में अपने दायित्व को विधिमान्य उन्मोचन का तब तक हकदार नहीं होगा, जब तक वह किन्हीं समनुदेशित प्राप्तव्यों पर शोध्य संदाय समनुदेशिती को नहीं कर देता है ।

13. समनुदेशक का समनुदेशिती का न्यासी होना-तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, जहां कोई देनदार किसी समनुदेशक को ऐसा कोई संदाय करता है जो किसी समनुदेशिती प्राप्तव्य पर शोध्य संदाय स्वरूप का है, वहां ऐसा संदाय समनुदेशिती के फायदे के लिए समझा जाएगा और समनुदेशक के बारे में यह समझा जाएगा कि उसने समनुदेशिती के किसी न्यासी के रूप में ऐसे संदाय की रकम को प्राप्त किया है और समनुदेशक समनुदेशिती को ऐसी रकम का संदाय करेगा ।

14. ऐसे समनुदेशक की दशा में, जो सूक्ष्म या लघु उद्यम है, देनदार का दायित्व-(1) यदि प्राप्तव्यों का समनुदेशक कोई सूक्ष्म या लघु उद्यम है तो समनुदेशित प्राप्तव्यों पर शोध्य संदाय करने के लिए देनदार का दायित्व, प्राप्तव्यों के विलंबित संदायों की बाबत सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006 (2006 का 27) की धारा 15 से धारा 17 में अंतर्विष्ट उपबंधों के अध्यधीन होगा ।

(2) देनदार की ओर से किसी सूक्ष्म या लघु उद्यम के प्राप्तव्य का संदाय करने में विलंब होने की दशा में समनुदेशिती विलंबित अवधि के लिए ब्याज प्राप्त करने का हकदार होगा और वह ब्याज की वसूली के प्रयोजन के लिए सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006 (2006 का 27) के उपबंधों के अधीन कार्रवाई करेगा और सूक्ष्म या लघु उद्यम को ऐसे ब्याज का संदाय करेगा ।

15. देनदार संरक्षण का सिद्धांत-(1) इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबंधित है, उसके सिवाय, प्राप्तव्य का कोई समनुदेशन, लिखित में देनदार की अभिव्यक्त सहमति के बिना, देनदार के अधिकारों और बाध्यताओं को (जिसके अंतर्गत संविदा के निबंधन और शर्तें भी हैं) प्रभावित नहीं करेगा ।

(2) प्राप्तव्यों के समनुदेशन के परिणामस्वरूप, समनुदेशक और देनदार के बीच हुई संविदा के अधीन संदाय अनुदेश द्वारा व्यक्ति के नाम, पते या उस खाते, जिसमें देनदार से ऐसे संदाय की अपेक्षा की जाती है, में उपांतरण किया जा सकेगा, किन्तु ऐसे अनुदेश द्वारा निम्नलिखित के संबंध में उपांतरण नहीं किया जाएगा, -

(क) मूल संविदा में विनिर्दिष्ट ऋण की रकम; या

(ख) मूल संविदा में विनिर्दिष्ट वह स्थान, जहां संदाय किया जाना है या यदि संविदा में ऐसा कोई स्थान वर्णित नहीं है, तो संदाय के स्थान से जहां देनदार स्थित है भिन्न कोई स्थान; या

(ग) वह तारीख जिसको संदाय किया जाना है या संदाय से संबंधित मूल संविदा के अन्य निबंधन ।

16. बचाव और देनदार का मुजरा संबंधी अधिकार-समनुदेशित प्राप्तव्य के संदाय के लिए देनदार के विरुद्ध समनुदेशिती द्वारा किसी दावे में, देनदार समनुदेशिती के विरुद्ध निम्नलिखित बातें उठा सकेगा, -

(क) समनुदेशक और देनदार के बीच हुई मूल संविदा या किसी अन्य संविदा से जो उसी संव्यवहार का भाग था, उद्भूत सभी बचाव और मुजरा का अधिकार जिसका देनदार स्वयं फायदा उसी प्रकार उठा सकता है मानो समनुदेशन किया ही नहीं गया है और ऐसा दावा समनुदेशिती के बजाय समनुदेशक द्वारा किया गया हैः

परंतु समनुदेशिती, जब तक कि पक्षकारों के बीच अन्यथा करार न पाया जाए, समनुदेशक से, किन्हीं ऐसे बचावों या देनदार द्वारा प्रयोग किए गए मुजरे के अधिकार के परिणामस्वरूप उसके द्वारा उठाई गई किसी हानि की वसूली करने के लिए हकदार होगा;

(ख) मुजरा का कोई अन्य अधिकार, यदि वह धारा 8 के अधीन समनुदेशन की सूचना के देनदार को प्राप्त होने के समय देनदार को उपलब्ध था ।

17. मूल संविदा का उपांतरण-(1) धारा 8 के अधीन किसी प्राप्तव्य के समनुदेशन की सूचना की तामील के पूर्व समनुदेशक और देनदार के बीच किया गया कोई करार, जिससे उस प्राप्तव्य की बाबत समनुदेशिती के अधिकारों पर प्रभाव पड़ता है, समनुदेशिती के विरुद्ध समान रूप से प्रभावी होगा और समनुदेशिती ऐसे करार द्वारा यथा उपांतरित समनुदेशित प्राप्तव्यों में के अधिकार अर्जित   कर लेगा ।

(2) समनुदेशक और देनदार के बीच समनुदेशन की सूचना के पश्चात् किया गया ऐसा कोई करार, जिससे समनुदेशिती के अधिकारों पर प्रभाव पड़ता है, समनुदेशिती के विरुद्ध तब तक अप्रभावी होगा, जब तक, - 

(क) समनुदेशिती उसकी सहमति नहीं दे देता है; या

(ख) प्राप्तव्य कार्यपालन द्वारा पूर्णतया उपार्जित नहीं किया जाता है और मूल संविदा में उपांतरण के लिए उपबंध नहीं किया जाता है या मूल संविदा के संदर्भ में युक्तिमान समनुदेशिती उपांतरण के लिए सहमति नहीं दे देता है ।

(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) में अंतर्विष्ट कोई बात समनुदेशक या समनुदेशिती के बीच किसी करार के भंग से उद्भूत होने वाले उनके किसी अधिकार पर प्रभाव नहीं डालेगी ।

18. संविदा का भंग-यदि समनुदेशक देनदार के साथ हुई मूल संविदा का कोई भंग करता है तो ऐसा भंग देनदार को समनुदेशिती से देनदार द्वारा फेक्टर संव्यवहारों के अनुसरण में समनुदेशक या समनुदेशिती को संदत्त किसी राशि की वसूली के लिए हकदार नहीं बनाएगा:

परंतु इस धारा में अंतर्विष्ट कोई बात मूल संविदा के भंग के कारण देनदार को हुई किसी हानि या नुकसानी का समनुदेशक से दावा करने के उसके अधिकारों को प्रभावित नहीं करेगी ।

अध्याय 5

समनुदेशनों का रजिस्ट्रीकरण

19. प्राप्तव्य संव्यवहारों के कतिपय समनुदेशनों का रजिस्ट्रीकरण-(1) प्रत्येक फेक्टर रजिस्ट्रीकरण के प्रयोजनों के लिए उसके पक्ष में प्राप्तव्यों के समनुदेशन के प्रत्येक संव्यवहार की विशिष्टियां, वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्गठन तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम 2002 (2002 का 54) की धारा 20 के अधीन गठित की जाने वाली केंद्रीय रजिस्ट्री के पास, यथास्थिति, ऐसे समनुदेशन की तारीख से या ऐसी रजिस्ट्री की स्थापना की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर, ऐसी रीति में और ऐसी फीस का संदाय करने के अधीन रहते हुए, जो इस निमित्त विहित की जाए, फाइल करेगा ।

स्पष्टीकरण-प्राप्तव्यों के समनुदेशन के प्रत्येक संव्यवहार की विशिष्टियों को केंद्रीय रजिस्ट्री के पास फाइल करने के प्रयोजन के लिए प्राप्तव्यों को विनिर्दिष्ट रूप से या साधारण रूप से देनदार या उस अवधि के, जिससे वे संबंधित है, संदर्भ में या किसी अन्य ऐसे सामान्य प्रकार से, जिससे ऐसे प्राप्तव्यों की पहचान की जा सकती है, वर्णित किया जा सकेगा ।

(2) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, किसी फेक्टर के पक्ष में प्राप्तव्यों के समनुदेशन से संबंधित संव्यवहारों की विशिष्टियां प्रविष्ट करने के लिए केंद्रीय रजिस्ट्री के मुख्य कार्यालय में केंद्रीय रजिस्टर नामक एक अभिलेख रखा जाएगा ।

(3) समनुदेशित प्राप्तव्यों की वसूली पर या देनदार के विरुद्ध दावे के निपटारे पर फेक्टर अपने पक्ष में प्राप्तव्यों के समनुदेशन का समाधान ऐसी रीति में और ऐसी फीस का संदाय करने के अधीन रहते हुए, जो इस निमित्त विहित की जाए, फाइल करेगा ।

(4) वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्गठन तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम, 2002 (2002 का 54) और उसके अधीन बनाए गए नियमों में संव्यवहारों के रजिस्ट्रीकरण संबंधी उपबंध केंद्रीय रजिस्ट्री में रखे गए केंद्रीय रजिस्टर में किसी फेक्टर के पक्ष में प्राप्तव्यों के समनुदेशन के अभिलेख को यथा आवश्यक परिवर्तनों सहित लागू होंगे ।

20. लोक निरीक्षण-(1) धारा 19 के अधीन प्राप्तव्यों के समनुदेशन के संव्यवहारों की ऐसे संव्यवहारों के केंद्रीय रजिस्टर में प्रविष्ट विशिष्टियां, ऐसी फीस के संदाय पर, जो विहित की जाए, किसी व्यक्ति द्वारा कामकाज के समय के दौरान निरीक्षण के लिए खुली रहेंगी ।

(2) धारा 19 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट केंद्रीय रजिस्टर, जो इलैक्ट्रानिक रूप में रखा गया हो, ऐसी फीस के संदाय पर, जो विहित की जाए, इलैक्ट्रानिक मीडिया के माध्यम से कामकाज के समय या ऐसे विस्तारित समय के दौरान, जो केन्द्रीय रजिस्ट्री द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए, किसी व्यक्ति द्वारा निरीक्षण के लिए भी खुला रहेगा ।

(3) वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्गठन तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम, 2002 (2002 का 54) और उसके अधीन बनाए गए नियमों में केंद्रीय रजिस्टर के रखे जाने और उसके लोक निरीक्षण संबंधी उपबंध यथा आवश्यक परिवर्तनों सहित लागू होंगे ।

 

अध्याय 6

अपराध और शास्तियां

21. शास्तियां-यदि धारा 19 के अधीन किसी फेक्टर द्वारा प्राप्तव्यों के समनुदेशन और प्राप्तव्यों की वसूली के किसी संव्यवहार की विशिष्टियां फाइल करने में कोई व्यतिक्रम किया जाता है तो ऐसी कंपनी और कंपनी का प्रत्येक अधिकारी, जो व्यतिक्रमी है, ऐसे जुर्माने से, जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान व्यतिक्रम जारी रहता है, पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।

22. रिजर्व बैंक के निदेश का अनुपालन करने के लिए शास्ति-(1) यदि कोई फेक्टर, धारा 6 के अधीन रिजर्व बैंक द्वारा जारी किसी निदेश का अनुपालन करने से असफल रहता है, तो रिजर्व बैंक ऐसी शास्ति, जो पांच लाख रुपए तक की हो सकेगी और अपराध के जारी रहने की दशा में ऐसा अतिरिक्त जुर्माना, जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान व्यतिक्रम जारी रहता है, दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, अधिरोपित कर सकेगा ।

(2) रिजर्व बैंक, उपधारा (1) के अधीन शास्ति अधिनिर्णीत करने के प्रयोजन के लिए, फेक्टर को उससे यह हेतुक दर्शित करने की अपेक्षा करने वाली सूचना की तामील करेगा कि सूचना में विनिर्दिष्ट रकम अधिरोपित क्यों नहीं की जानी चाहिए और ऐसे फेक्टर को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर भी दिया जाएगा ।

(3) इस धारा के अधीन रिजर्व बैंक द्वारा अधिरोपित कोई शास्ति, उस तारीख से, जिसको रिजर्व बैंक द्वारा राशि के संदाय की मांग करने संबंधी सूचना की फेक्टर पर तामील की जाती है, चौदह दिन की अवधि के भीतर, संदेय होगी और फेक्टर द्वारा उस अवधि के भीतर राशि का संदाय करने में असफल रहने की दशा में, उस क्षेत्र में, जहां फेक्टर का रजिस्ट्रीकृत कार्यालय स्थित है, अथवा किसी फेक्टर के भारत के बाहर निगमित होने की दशा में, जहां भारत में उसके कारबार का मुख्य स्थान स्थित है, अधिकारिता रखने वाले प्रधान सिविल न्यायालय द्वारा दिए गए किसी निदेश पर उद्गृहीत की जा सकेगी :

परंतु ऐसा कोई निदेश रिजर्व बैंक या इस निमित्त रिजर्व बैंक द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा न्यायालय को किए गए आवेदन पर ही दिया जाएगा, अन्यथा नहीं ।

(4) वह न्यायालय, जो उपधारा (3) के अधीन कोई निदेश देता है, फेक्टर द्वारा संदेय राशि विनिर्दिष्ट करते हुए एक प्रमाणपत्र जारी करेगा और ऐसा प्रत्येक प्रमाणपत्र उसी रीति में प्रवर्तनीय होगा, मानो वह किसी सिविल वाद में न्यायालय द्वारा की गई कोई डिक्री हो ।

23. अपराध-यदि कोई व्यक्ति इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के ऐसे उपबंधों का उल्लंघन करता है या उल्लंघन करने का प्रयास करता है या उल्लंघन करने का दुष्प्रेरण करता है, जिनके संबंध में किसी विनिर्दिष्ट शास्ति का उपबंध नहीं किया गया है, तो वह ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडनीय होगा ।

24. अपराधों का संज्ञान-(1) कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान रिजर्व बैंक के किसी ऐसे अधिकारी द्वारा, जिसे रिजर्व बैंक द्वारा इस निमित्त लिखित में साधारण रूप से या विशेष रूप से प्राधिकृत किया गया हो, लिखित में किए गए किसी परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं ।

(2) महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय या उनसे उच्चतर किसी न्यायालय से भिन्न कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दंडनीय ऐसे किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।

25. फेक्टरों द्वारा अपराध-(1) जहां किसी फेक्टर द्वारा इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किया गया है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो अपराध के किए जाने के समय फेक्टर का भारसाधक था और फेक्टर के कारबार के संचालन के लिए फेक्टर के प्रति उत्तरदायी था और साथ ही फेक्टर भी अपराध का दोषी माना जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के लिए दायी होगाः

परंतु इस उपधारा में अंतर्विष्ट कोई बात ऐसे किसी व्यक्ति को इस अधिनियम में उपबंधित किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने के निवारण के लिए सभी सम्यक् तत्परता बरती थी ।

(2) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी फेक्टर द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध फेक्टर के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या उसकी मौनानुकलूता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रंबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजन के लिए किसी फेक्टर के संबंध में निदेशक" से ऐसा कोई अधिकारी अभिप्रेत है, जिसे फेक्टर का संपूर्ण या सारवान् प्रबंध कार्य सौंपा गया है ।

 

अध्याय 7

प्रकीर्ण

26. इस अधिनियम के उपबंधों का अन्य विधियों पर अध्यारोही प्रभाव होना-इस अधिनियम के उपबंध, तत्समय प्रवृत्त अन्य किसी विधि या ऐसी किसी विधि के आधार पर प्रभावी किसी लिखत में अंतर्विष्ट इससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।

27. अन्य विधियों के लागू होने का वर्जित होना-इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंध परक्राम्य लिखित अधिनियम, 1881 (1881 का 26), संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 (1882 का 4), भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2), बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10), कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1), वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्गठन तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम, 2002 (2002 का 54), सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006 (2006 का 27) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अतिरिक्त होंगे न कि उनके अल्पीकरण में ।

28. परिसीमा-किसी प्राप्तव्य का कोई भी समनुदेशिती किसी न्यायालय या अधिकरण के माध्यम से किसी समनुदेशित प्राप्तव्य की वसूली के लिए किन्हीं उपायों को करने का तब तक हकदार नहीं होगा, जब तक कि प्राप्तव्य के संबंध में उसका दावा परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का 36) के अधीन विनिर्दिष्ट परिसीमा काल के भीतर न किया गया हो ।

 29. सूचना की गोपनीयता-इस अधिनियम में अन्यथा उपबंधित के सिवाय या जब तक कि तत्समय प्रवृत्त विधि के किसी उपबंध के अधीन किसी न्यायालय या अभिकरण या किसी अन्य कानूनी प्राधिकारी द्वारा पारित किसी आदेश द्वारा ऐसा किया जाना अपेक्षित न हो या प्राप्तव्य की वसूली के प्रयोजन के लिए कोई फेक्टर गोपनीयता बनाए रखेगा और उसके द्वारा किसी समनुदेशक, उसके वर्तमान और भावी ग्राहकों, उसके वाणिज्यिक और कारबार संबंधी क्रियाकलापों, समनुदेशक तथा किसी अन्य देनदार के बीच विक्रय के निबंधनों से अभिप्राप्त सूचना और समनुदेशक के बारे में अन्य ब्यौरा किसी व्यक्ति को प्रकट नहीं करेगा ।

30. छूट देने की शक्ति-(1) केंद्रीय सरकार, लोक हित में अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के कोई भी उपबंध, -

(क) बैंकों के ऐसे वर्ग या वर्गों या किसी कंपनी या फेक्टर को लागू नहीं होंगे; या

(ख) बैंकों के ऐसे वर्ग या वर्गों या किसी कंपनी या फेक्टर को ऐसे अपवादों, उपांतरणों और अनुकूलनों के साथ लागू होगा, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं ।

(2) उपधारा (1) के अधीन जारी प्रत्येक अधिसूचना की प्रति यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखी जाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस अधिसूचना में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगी । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह अधिसूचना जारी नहीं की जाएगी तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभावी हो जाएगी । किंतु अधिसूचना के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई  किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

31. कतिपय मामलों में इस अधिनियम के उपबंधों का लागू या प्रभावी होना-(1) इस अधिनियम के उपबंध निम्नलिखित संव्यवहारों के अधीन या उनसे उद्भूत होने वाले प्राप्तव्यों के किसी समनुदेशन को लागू नहीं होंगे, अर्थात्ः-

(क) कारबार संबंधी क्रियाकलापों के किसी विलयन, अर्जन या समामेलन अथवा स्वामित्व अथवा कारबार की विधिक प्रास्थिति का विक्रय या परिवर्तन;

(ख) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) के अधीन गठित भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड या अग्रिम संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1952 (1952 का 74) के अधीन गठित अग्रिम बाजार आयोग द्वारा क्रमशः विनियमित किसी स्टॉक एक्सचेंज या वस्तु विनिमय के संव्यवहार;

(ग) सभी बकाया संव्यवहारों की समाप्ति पर ऋणबद्ध किसी प्राप्तव्य के सिवाय नेटिंग करारों द्वारा शासित वित्तीय संविदाएं;

(घ) किसी विदेशी करेंसी के प्राप्तव्यों के सिवाय विदेशी मुद्रा संव्यवहार;

(ङ) प्रतिभूतियों या अन्य वित्तीय आस्तियों या लिखतों से संबंधित अंतः बैंक संदाय प्रणालियां, अंतः बैंक संदाय करार या समाशोधन और समाधान प्रणालियां;

(च) बैंक निक्षेप;

(छ) प्रत्यय पत्र या स्वतंत्र प्रत्याभूति;

(ज) परक्राम्य लिखतों, भाण्डागारण (विकास और अधिनियमन) अधिनियम, 2007 (2007 का 37) के अधीन परक्राम्य भांडागारण प्राप्तियों को या ऐसी लिखतों, जो किसी विधि या रूढ़ि द्वारा तत्समय परक्राम्य हैं या माल के हक के किसी वाणिज्यिक दस्तावेज को शासित करने वाली विधि के अधीन किसी व्यक्ति के अधिकार और बाध्यताएं;

(झ) किसी वैयक्तिक, कौटुम्बिक या घरेलू उपयोग के लिए माल या सेवाओं का विक्रय;

(ञ) किसी बैंक या गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी द्वारा किसी अन्य बैंक या गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी को ऋण प्राप्तव्यों का कोई समनुदेशन;

(ट) प्रतिभूतिकरण संव्यवहार (जिनके अंतर्गत ऐसे विशेष प्रयोजन माध्यमों या न्यासों को प्राप्तव्यों का समनुदेशन भी है, जो किसी एकल देनदार या देनदारों के एकल समूह से क्रय किए गए ऐसे प्राप्तव्यों के संबंध में प्रतिभूतियां जारी करता है) ।

(2) इस अधिनियम की कोई बात उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 (1986 का 68) के उपबंधों के अधीन किसी उपभोक्ता, विनिर्माता, व्यापारी या सेवा प्रदाता के अधिकारों और बाध्यताओं पर प्रभाव नहीं डालेगी ।

32. नियम बनाने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, रिजर्व बैंक के परामर्श से, अधिसूचना द्वारा और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (2000 का 21) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ध) में यथापरिभाषित इलैक्ट्रानिक राजपत्र में इस अधिनियम के उपबंधों को लागू करने के लिए नियम बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्ः-

(क) वह प्ररूप और रीति, जिसमें धारा 19 की उपधारा (1) के अधीन प्राप्तव्यों के समनुदेशन के संव्यवहारों को किसी फेक्टर के पक्ष में फाइल किया जाएगा और ऐसे संव्यवहार को फाइल करने के लिए फीस;

(ख) वह प्ररूप और रीति, जिसमें धारा 19 की उपधारा (3) के अधीन प्राप्तव्यों के समनुदेशनों का समाधान या दावे के निपटारे को रजिस्टर किया जाएगा और ऐसे संव्यवहारों को फाइल करने के लिए फीस;

(ग) धारा 20 के अधीन केन्द्रीय रजिस्टर का निरीक्षण करने के लिए फीस; और

(घ) ऐसा कोई अन्य विषय, जिसे विहित करना अपेक्षित है या जिसे विहित किया जाए, जिसके संबंध में उपबंध नियम द्वारा किया जाना होगा या किया जा सकेगा ।

33. नियमों का रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह नियम निष्प्रभावी हो जाएगा । किंतु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

34. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो कन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्वयक प्रतीत हों:

परंतु इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश उसके किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

35. कतिपय अधिनियमितियों का संशोधन-अनुसूची में विनिर्दिष्ट अधिनियमितियों को उसमें विनिर्दिष्ट रीति में संशोधित किया जाएगा ।

अनुसूची

(धारा 35 देखिए)

वर्ष

अधिनियम सं0

संक्षिप्त नाम

संशोधन

1899

2

भारतीय स्टांप अधिनियम, 1899

धारा 8ग के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्ः-

‘8घ. प्राप्तव्यों के समनुदेशन के संबंध में स्टांप शुल्क के लिए गैर-दायी करार या दस्तावेज-इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, फेक्टर विनियमन अधिनियम, 2011 की धारा 2 के खंड (त) में यथा परिभाषित प्राप्तव्यों" का उक्त अधिनियम की धारा 2 के खंड (झ) में यथा परिभाषित किसी फेक्टर" के पक्ष में समनुदेशन करने के संबंध में कोई करार या अन्य दस्तावेज इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन शुल्क के लिए दायी नहीं होगा ।

1908

5

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908

आदेश 37 के नियम 1 के उपनियम (2) के खंड (ख) में उपखंड (iii) के पश्चात् निम्नलिखित उपखंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-

(iv) प्राप्तव्य के किसी समनुदेशिती द्वारा प्राप्तव्यों की वसूली के लिए संस्थित कोई वाद ।" ।

1934

2

भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934

धारा 8 की उपधारा (1) के खंड (घ) में, एक" शब्द के स्थान पर दो" शब्द रखा जाएगा ।

2005

30

प्रत्यय विषयक जानकारी कंपनी (विनियमन) अधिनियम, 2005

धारा 2 के खंड (च) में उपखंड (ii) के पश्चात् निम्नलिखित उपखंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-

(iiक) फेक्टर विनियमन अधिनियम, 2011 की धारा 2 के खंड (झ) के अधीन यथा परिभाषित कोई फेक्टर;" ।

 

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