सेना और वायु सेना (प्राइवेट सम्पत्ति का व्ययन)
अधिनियम, 1950
(1950 का अधिनियम संख्यांक 40)
[28 अप्रैल, 1950]
सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) या वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) के अध्यधीन
ऐसे व्यक्तियों की, जिनकी मृत्यु हो जाए या जो अधित्यजन कर जाएं या जो विकृतचित्त
के अभिनिश्चित हो जाएं या जो सक्रिय सेवा में होते हुए
सरकारी तौर पर लापता बताए जाएं, प्राइवेट
सम्पत्ति के व्ययन के लिए
अधिनियम
संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) यह अधिनियम सेना और वायु सेना (प्राइवेट सम्पत्ति का व्ययन) अधिनियम, 1950 कहा जा सकेगा ।
(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है और यह भारत के नागरिकों तथा उन व्यक्तियों पर जो सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) या वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) के अध्यधीन हैं लागू होता है चाहे वे कहीं भी हों ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो :-
(1) “समिति" से धारा 4 के अधीन गठित समायोजन समिति" अभिप्रेत है ;
(2) “विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(3) “रेजिमेंट के तथा केंप या क्वार्टरों में अन्य ऋण" के अन्तर्गत निम्नलिखित हैं-
(i) सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) के अध्यधीन किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में वे धन जो सैनिक ऋणों के रूप में देय हैं अर्थात् निम्नलिखित के बारे में अथवा निम्नलिखित की बाबत किसी अग्रिम-धन के बारे में देय राशियां-
(क) क्वार्टर ;
(ख) मेस, बैंन्ड और रेंजीमेंट के अन्य हिसाब ;
(ग) सैनिक वस्त्र, साज-सामान और उपस्कर जो मृतक के तीन मास के वेतन के बराबर राशि से अधिक न हों और उसकी मृत्यु की तारीख से पूर्व अठारह मास के भीतर देय हो गई हो ; तथा
(ii) वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) के अध्यधीन किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में वे धन जो वायु सेना ऋणों के रूप में देय हैं अर्थात् निम्नलिखित के बारे में अथवा निम्नलिखित की बाबत किसी अग्रिम-धन के बारे में देय राशियां-
(क) क्वार्टर ;
(ख) मेस, बैन्ड और अन्य सेवा सम्बन्धी हिसाब ;
(ग) वायु सेना वस्त्र, साज-सामान और उपस्कर जो मृतक के तीन मास के वेतन के बराबर राशि से अधिक न हों और उसकी मृत्यु की तारीख से पूर्व अठारह मास के भीतर देय हो गई हों :
(4) “प्रतिनिधित्व" के अन्तर्गत प्रोबेट, प्रशासन पत्र, चाहे विल उपाबद्ध हो या न हो, और उत्तराधिकार प्रमाणपत्र है जो किसी व्यक्ति को मृत व्यक्ति की सम्पदा का निष्पादक या प्रशासक बनाए, अथवा उसे मृत्य व्यक्ति की आस्तियों को प्राप्त या वसूल करने के लिए प्राधिकृत करे ;
(5) “प्रतिनिधि" से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसने प्रतिनिधित्व ले लिया है किन्तु महाप्रशासक इसके अन्तर्गत नहीं है ;
(6) जो शब्द और पद इसमें प्रयुक्त हैं और सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) या वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) में परिभाषित हैं और इस अधिनियम में परिभाषित नहीं हैं उन सबके क्रमशः वे ही अर्थ समझे जाएंगे जो उन्हें उन अधिनियमों में दिए गए हैं ।
3. अफसरों से भिन्न मृत व्यक्तियों और अभित्याजकों की सम्पत्ति-(1) यथास्थिति सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) या वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) के अध्यधीन होने वाले किसी व्यक्ति की मृत्यु या अभित्यजन पर, जो अफसर नहीं हैं, उस कोर, विभाग, टुकड़ी या यूनिट का कमान अफसर जिसमें मृतक या अभित्यजक था, यथाशक्य शीघ्र और ऐसे नियमों के अध्यधीन जो इस निमित्त बनाए जाएं-
(क) मृतक या अभित्याजक की वह सब जंगम सम्पत्ति जो कैंप या क्वार्टरों में है, प्राप्त करेगा और उसकी एक तालिका बनवाएगा,
(ख) ऐसे व्यक्ति को प्राप्य सब वेतन और भत्ता प्राप्त करेगा,
(ग) ऐसे व्यक्तियों के, रेजिमेन्ट के तथा कैम्प या क्वार्टरों में अन्य ऋणों के, यदि कोई हों, संदाय के लिए सम्यक् व्यवस्था करेगा ।
(2) मृत व्यक्ति के मामले में कमान अफसर, किसी बैंककारी कम्पनी में (जिसके अन्तर्गत कोई डाकखाना बचत बैंक, सहकारी बैंक या सोसाइटी अथवा धन के रूप में निक्षेप ग्रहण करने वाली कोई अन्य संस्था भी है चाहे उसका कैसा ही नाम हो) मृतक द्वारा छोड़े गए समस्त धन को-
(क) ऐसी किसी दशा में जिसके लिए इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा अन्यथा उपबन्धित नहीं है, यदि उसे यह आवश्यक प्रतीत होता है कि रेजिमेन्ट के तथा कैम्प या क्वार्टरों में अन्य ऋणों के, मृतक की अन्त्येष्टि खर्च के और मृतक की सम्पदा की बाबत कमान अफसर द्वारा उपगत खर्चों के, यदि कोई हों, संदाय के लिए व्यवस्था की जाए तो, संगृहीत करेगा ; और
(ख) अन्य किसी दशा में, संगृहीत कर सकेगा :
तथा उस प्रयोजन के लिए ऐसी बैंककारी कम्पनी, सोसाइटी या अन्य संस्था के अभिकर्त्ता, प्रबन्धक या अन्य समुचित अधिकारी से अपेक्षा कर सकेगा कि वह उस बैंककारी कम्पनी, सोसाइटी या अन्य संस्था के नियमों में किसी बात के होते हुए भी उस समस्त धन को तुरन्त कमान अफसर को संदत्त करे और ऐसा अभिर्ता, प्रबंधक या अन्य अधिकारी उस अपेक्षा का अनुपालन करने के लिए आबद्ध होगा ।
(3) जहां किसी बैंककारी कम्पनी, सोसाइटी या अन्य संस्था द्वारा उपधारा (2) के अधीन की गई अपेक्षा के अनुपालन में कोई धन संदत्त किया गया है, वहां किसी भी व्यक्ति का ऐसी राशि की बाबत उस बैंककारी कम्पनी, सोसाइटी या अन्य संस्था के खिलाफ कोई दावा नहीं हो सकेगा ।
(4) जहां रेजिमेंट के तथा कैम्प या क्वार्टरों में अन्य ऋणों के, यदि कोई हो, और मृतक की अन्त्येष्टि खर्चों के, उन दशाओं में जिनमें ऐसे खर्चों के संदाय के लिए अन्यथा कोई व्यवस्था नहीं की गई है और मृतक की सम्पदा की बाबत कमान अफसर द्वारा उपगत खर्चों के, यदि कोई हों, संदाय के लिए मृतक के प्रतिनिधि ने कमान अफसर को संतोषप्रद रूप में प्रतिभूति दे दी है, वहां कमान अफसर उपधारा (1) और (2) के अधीन अपने द्वारा प्राप्त सम्पत्ति उस प्रतिनिधि को परिदत्त कर देगा और तब मृतक की सम्पदा के प्रशासन के लिए उसका उत्तरदायित्व समाप्त हो जाएगा ।
(5) किसी ऐसे मृतक की दशा में, जिसकी सम्पदा की बाबत उपधारा (4) के अधीन या धारा 10 के अधीन कार्यवाही नहीं की गई है और किसी अभित्याजक की दशा में, कमान अफसर यथास्थिति उस मृतक या अभित्याजक की जंगम संपत्ति का विक्रय या धन में संपरिवर्तन-
(i) उस किसी दशा में कराएगा जिसमें मृतक या अभित्याजक के रेजिमेंट के तथा कैम्प या क्वार्टरों में अन्य ऋणों के, मृतक की अन्त्येष्टि खर्च के, यदि कोई हों, और मृतक या अभित्याजक की सम्पदा की बाबत कमान अफसर द्वारा उपगत खर्चों के, यदि कोई हों, संदाय प्राप्त करने के प्रयोजन के लिए उसकी राय में वैसा करना आवश्यक है, और
(ii) अन्य किसी दशा में करा सकेगा ।
(6) कमान अफसर, उपधारा (1), (2) और (5) के अधीन प्राप्त, संगृहीत या वसूल किए गए धन में से, यथास्थिति मृतक या अभित्याजक के रेजिमेंट के तथा कैम्प या क्वार्टरों में अन्य ऋण, यदि कोई हों, मृतक या अभित्याजक की सम्पदा की बाबत कमान अफसर द्वारा उपगत खर्च, यदि कोई हों, और मृतक की दशा में उसके अन्त्येष्टि खर्च, उन दशाओं में जिनमें ऐसे खर्चों के संदाय के लिए अन्यथा कोई व्यवस्था नहीं की गई है, संदत्त करेगा ।
(7) उपधारा (6) में विनिर्दिष्ट ऋणों और खर्चों के संदाय के पश्चात् अधिशेष यदि कोई हों,-
(क) मृतक के मामले में, उसके प्रतिनिधि को, यदि कोई हो, या मृत्यु के पश्चात् बारह मास के अन्दर ऐसे अधिशेष के लिए कोई दावा स्थापित न होने की दशा में, विहित व्यक्ति को संदत्त किया जाएगा ; और
(ख) अभित्याजक के मामले में, विहित व्यक्ति को तुरन्त संदत्त कर दिया जाएगा और अभित्यजन की तारीख से तीन वर्ष की समाप्ति पर, केन्द्रीय सरकार के पक्ष में समपहृत हो जाएगा जब तक कि उस बीच अभित्याजक ने अभ्यर्पण न कर दिया हो या वह पकड़ा न गया हो :
परन्तु विहित व्यक्ति उस दशा में जिसमें अभित्याजक ने उस बीच अभ्यर्पण नहीं किया या वह पकड़ा नहीं गया है, खंड (ख) के अधीन अपने द्वारा प्राप्त सम्पूर्ण अधिशेष या उसके किसी भाग को तीन वर्ष की उक्त कालावधि के अन्दर किसी समय अभित्याजक का पत्नी या बच्चों को या किसी अन्य आश्रित को संदत्त कर सकेगा ।
स्पष्टीकरण-वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) अध्यधीन व्यक्तियों के प्रति निर्देश से इस धारा में और धारा 4 में “अफसर" शब्द के अन्तर्गत ऐसा वारण्ट अफसर भी है जो मर गया हो या अभित्यजन कर गया हो ।
4. ऐसे अफसरों की सम्पत्ति जो मर जाएं या अभित्यजन कर जाएं-धारा 3 के उपबन्ध सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) या वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45), के अध्यधीन होने वाले ऐसे किसी अफसर की सम्पत्ति के व्ययन पर भी लागू होंगे जो मर जाएं या अभित्यजन कर जाएं किन्तु निम्नलिखित उपान्तरणों के साथ लागू होंगे, अर्थात् :-
(i) धारा 3 के अधीन कमान अफसर के कृत्यों का पालन विहित रीति से इस निमित्त गठित समायोजन समिति द्वारा किया जाएगा ;
(ii) धारा 3 की उपधारा (6) में विनिर्दिष्ट ऋणों और खर्चों के संदाय के पश्चात् अधिशेष, यदि कोई हो, मृत अफसर के मामले में, विहित व्यक्ति को संदत्त किया जाएगा ।
5. रेजिमेंट के तथा कैम्प या क्वार्टरों में अन्य ऋणों के बारे में प्रश्नों का विनिश्च-यदि किसी मामले में इस बाबत कि मृतक या अभित्याजक के रेजिमेंट के तथा कैम्प या क्वार्टरों में अन्य ऋण क्या हैं अथवा उनके संबंध में संदेय रकम की बाबत संदेह या विवाद पैदा हो जाए तो विहित व्यक्ति का विनिश्चय अन्तिम होगा और सब प्रयोजनों के लिए सभी व्यक्तियों को आबद्धकर होगा ।
6. कमान अफसर या समिति की प्रतिनिधिक शक्तियां-धारा 3 या धारा 4 के अधीन अपने कर्तव्यों के पालन के प्रयोजनार्थ यथास्थिति, कमान अफसर या समिति को अन्य सभी व्यक्तियों और प्राधिकारियों का अपवर्जन करके वैसे ही अधिकार और शक्तियां प्राप्त होंगी मानो उसने मृतक की सम्पदा का प्रतिनिधित्व ले लिया हो और यथास्थिति कमान अफसर या समिति द्वारा दी गई कोई रसीद तद्नुकूल प्रभावी होगी ।
7. मृत व्यक्ति की सम्पदा को महाप्रशासक को सुपुर्द करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) [महाप्रशासक अधिनियम, 1963 (1963 का 45)] में किसी बात के होते हुए भी महाप्रशासक मृतक की किसी सम्पदा की बाबत जिसके संबंध में धारा 3 या धारा 4 के उपबन्धों के अधीन कार्यवाही की गई है, किसी रीति से अन्तःक्षेप वहां तक के सिवाय नहीं करेगा जहां तक कि वह इस अधिनियम के उपबन्धों के द्वारा या अधीन वैसा करने के लिए स्पष्टतः अपेक्षित या अनुज्ञात है ।
(2) केन्द्रीय सरकार किसी भी समय और ऐसी परिस्थितियों में जैसी वह ठीक समझे निदेश दे सकेगी कि किसी मृतक की सम्पदा, प्रशासन के लिए, यथास्थिति, कमान अफसर या समिति द्वारा किसी राज्य के महाप्रशासक के सुपुर्द कर दी जाएगी और तब, यथास्थिति, वह कमान अफसर या समिति उस सम्पदा को ऐसे महाप्रशासक के हवाले कर देगी ।
(3) जहां इस धारा के अधीन कोई सम्पदा महाप्रशासक के सुपुर्द की जाती है वहां महाप्रशासक ऐसी सम्पदा का प्रशासन 1[महाप्रशासक अधिनियम, 1963 (1963 का 45)] के या, यदि वह अधिनियम किसी राज्य में प्रवृत्त नहीं है, तो उस राज्य में प्रवृत्त तत्समान विधि के उपबन्धों के अनुसार करेगा :
परन्तु मृतक के रेजिमेन्ट के तथा कैम्प या क्वार्टरों में अन्य ऋणों का, यदि कोई हों, महाप्रशासक द्वारा संदाय, मृतक द्वारा देय किन्हीं अन्य ऋणों से पूर्विकतः किया जाएगा ।
(4) महाप्रशासक, सब ऋणों और प्रभारों को चुकाने के पश्चात् अपने पास बच रहे अधिशेष को, यदि कोई हो, मृतक के वारिसों को संदत्त कर देगा और, यदि किसी भी वारिस का पता न चले, तो उस अधिशेष को विहित व्यक्ति के हवाले विहित रीति से कर देगा ।
(5) इस धारा के अधीन अपने कर्तव्यों के संबंध में महाप्रशासक रेजिमेंट के तथा कैम्प या क्वार्टरों में अन्य ऋणों के संदाय के पश्चात् अपने पास आने वाली या बच रही सकल रकम के तीन प्रतिशत से अधिक फीस नहीं लेगा ।
8. विहित व्यक्तियों द्वारा अधिशेष का व्ययन-धारा 3 की उपधारा (7) या धारा 4 के खण्ड (त्त्) या धारा 7 की उपधारा (4) में निर्दिष्ट अधिशेष प्राप्त होने पर, विहित व्यक्ति,-
(क) यदि वह मृतक के किसी प्रतिनिधि को जानता है, तो अदिशेष उस प्रतिनिधि को संदत्त करेगा ;
(ख) यदि वह ऐसे किसी प्रतिनिधि को नहीं जानता है, और अधिशेष का धारा 10, के अधीन व्ययन नहीं किया गया है तो, लगातार छह वर्ष तक हर वर्ष विहित प्ररूप में और रीति से एक सूचना प्रकाशित करेगा और यदि ऐसी सूचनाओं में से अंतिम के प्रकाशन के पश्चात् भी छह मास के भीतर मृतक के किसी प्रतिनिधि द्वारा अधिशेष के लिए कोई दावा नहीं किया जाता है तो विहित व्यक्ति उस अधिशेष को उससे प्रोद्भूत किसी आय या आय की संकलित राशि के सहित केन्द्रीय सरकार के नाम निक्षिप्त कर देगा :
परन्तु ऐसा निक्षेप ऐसे अधिशेष या उसके किसी भाग के लिए किसी व्यक्ति के दावे को, यदि वह उसके लिए अन्यथा हकदार है, वर्जित नहीं करेगा ।
9. चीजवस्त का न कि धन का व्ययन-जहां किसी मृत व्यक्ति की सम्पदा का कोई भाग चीजवस्त, प्रतिभूतियां या अन्य सम्पत्ति है जो धन में सम्परिवर्तित नहीं कि गई है वहां धारा 3 की उपधारा (7), धारा 4 के खण्ड (त्त्) और धारा 8 के उपबन्ध, अधिशेष के संदाय के संबंध में, उसके सिवाय जैसा विहित किया जाए, ऐसी चीजवस्त, प्रतिभूतियों या सम्पत्ति के परिदान, संक्रमण या अन्तरण को लागू होंगे और विहित व्यक्ति को उनको धन में संपरिवर्तित करने की वैसी ही शक्ति प्राप्त होगी जैसी मृतक के प्रतिनिधि को ।
10. प्रोबेट आदि पेश किए बिना कतिपय सम्पत्ति का व्ययन-किसी मृतक के प्रतिनिधि को धारा 3 धारा 4 या धारा 8 के अधीन परिदत्त की जाने योग्य सम्पत्ति और संदत्त किया जाने योग्य धन उस दशा में जिसमें उसकी कुल रकम या मूल्य [दो लाख रुपए] से अधिक नहीं है, और यदि विहित व्यक्ति ठीक समझता है तो किसी ऐसे व्यक्ति को, जो उसे प्राप्त करने या मृतक की सम्पदा का प्रशासन करने का हकदार उसे प्रतीत होता हो ऐसे व्यक्ति से कोई प्रोबेट, प्रशासन-पत्र, उत्तराधिकार प्रमाणपत्र या हक का अन्य ऐसा ही निश्चायक साक्ष्य पेश करने की अपेक्षा किए बिना, परिदत्त या संदत्त किया जा सकेगा ।
11. कमान अफसर, समिति, विहित व्यक्ति और केन्द्रीय सरकार का उन्मोचन-धारा 3, धारा 4, धारा 8, धारा 9 या धारा 10 के अनुसरण में कमान अफसर, समिति या विहित व्यक्ति द्वारा सद्भावपूर्वक किया गया या किया गया तात्पर्यित कोई धन का संदाय या उपयोजन अथवा किसी सम्पत्ति का उपयोजन, परिदान, विक्रय या अन्य व्ययन विधिमान्य होगा तथा, यथास्थिति, कमान अफसर, समिति या विहित व्यक्ति का अथवा केन्द्रीय सरकार का उस धन या सम्पत्ति के संबंध में सभी अतिरिक्त दायित्व से पूर्ण उन्मोचन होगा ; किन्तु इसकी कोई बात मृतक के किसी निष्पादक या प्रशासक या अन्य प्रतिनिधि के अथवा किसी लेनदार के किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध अधिकार को प्रभावित नहीं करेगी जिसे ऐसे संदाय या ऐसा परिदान किया गया है ।
12. कमान अफसर, समति या विहित व्यक्ति के पास सम्पत्ति का वहां पर की आस्तियां न होना जहां कमान अफसर, समिति या विहित व्यक्ति आस्थित हो-धारा 3, धारा 4 या धारा 7 की उपधारा (4) के अधीन कमान अफसर या समिति या विहित व्यक्ति के पास आने वाली कोई सम्पत्ति उस कारण, उस स्थान पर की आस्ति या चीजवस्त नहीं समझी जाएगी जहां वह कमान अफसर या समिति या विहित व्यक्ति आस्थित है और उस कारण यह आवश्यक नहीं होगा कि उस सम्पत्ति के सम्बन्ध में उस स्थान के लिए प्रतिनिधित्व लिया जाए ।
13. प्रतिनिधि के अधिकारों की व्यावृत्ति-कमान अफसर या समिति द्वारा विहित व्यक्ति को किसी मृतक की सम्पत्ति के अधिशेष का संदाय धारा 3 की उपधारा (7) या धारा 4 के खण्ड (त्त्) के अधीन कर दिए जाने के पश्चात् मृतक के किसी प्रतिनिधि के या किसी महाप्रशासक के, मृतक की किसी ऐसी सम्पत्ति के बारे में, जो यथास्थिति, कमान अफसर या समिति द्वारा संगृहीत नही की गई और पूर्वोक्त अधिशेष का भाग नहीं है, वैसे ही अधिकार और कर्तव्य होंगे मानो धारा 3 और 4 अधिनियम न की गई हों ।
14. विकृत चित्त के व्यक्तियों को या सक्रिय सेवा में होते हुए लापता बताए गए व्यक्तियों को धारा 3 से 13 तक का लागू होना-यथास्थिति, सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) या वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) के अध्यधीन होने वाला ऐसा व्यक्ति जो [मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 (1987 का 14)] में किसी बात के होते हुए भी विकृत चित्त का विहित रीति से अभिनिश्चित है अथवा सक्रिय सेवा में होते हुए सरकारी तौर पर लापता बताया गया है उसकी दशा में भी धारा 3 और 13 तक के उपबन्ध, जहां तक वे लागू किया जा सकते हैं, ऐसे लागू होंगे मानो वह यथास्थिति, उस दिन जिस दिन उसकी चित्तविकृति वैसे अभिनिश्चित हुईं या उस दिन जिस दिन वह सरकारी तौर पर लापता बताया गया, मर गया था :
परन्तु ऐसे लापता बताए गए व्यक्ति की दशा में धारा 3 की उपधारा (2) से (6) तक या धारा 4 या धारा 7 के अधीन कोई कार्रवाई उस समय तक नहीं की जाएगी जब तक सरकारी तौर पर यह उपधारित नहीं कर लिया जाता कि वह मर गया है ।
15. कुछ दशाओं में समायोजन स्थायी समिति की नियुक्ति-जब कोई अफसर मर जाता है या अभित्यजन करता है या विहित रीति से विकृत चित्त का अभिनिश्चित कर दिया जाता है या सक्रिय सेवा में होते हुए सरकारी तौर पर लापता बता दिया जाता है तब इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबन्धों में समिति के प्रति निर्देशों का ऐसे अर्थ किया जाएगा मानो वे विहित रीति में इस निमित्त गठित, यदि कोई हो, समायोजन स्थायी समिति के प्रति निर्देश हैं और इस अधिनियम के अधीन समिति के सब कृत्यों का पालन करने की हकदार ऐसी स्थायी समिति ही होगी ।
16. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम , शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम-
(क) वह रीति विहित कर सकेंगे जिसमें किसी मृतक या अभित्याजक की कोई सम्पत्ति प्राप्त या संगृहीत की जा सकेगी और उसके रेजिमेंट के तथा कैम्प या क्वार्टरों में अन्य ऋण संदत्त किए जा सकेंगे ;
(ख) किसी मृतक के अन्त्येष्टि खर्च के संदाय के लिए उपबन्ध कर सकेंगे ;
(ग) इस अधिनियम के अधीन समायोजन समिति या किसी समायोजन स्थायी समिति के गठन के लिए, उपबन्ध कर सकेंगे ;
(घ) ऐसा व्यक्ति विनिर्दिष्ट कर सकेंगे जो इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए विहित व्यक्ति समझा जाएगा ;
(ङ) वे परिस्थितियां विहित कर सकेंगे जिनमें किसी मृतक की सम्पदा महाप्रशासक के सुपुर्द की जाएगी ;
(च) वह प्ररूप और रीति विहित कर सकेंगे जिसमें धारा 8 के अधीन सूचना प्रकाशित की जाएगी ;
(छ) वह प्रक्रिया विहित कर सकेंगे जिससे किसी व्यक्ति को विकृत चित्त का अभिनिश्चित किया जा सकेगा ।
[(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
17. [निरसन ।] निरसन और संशोधन अधिनियम, 1957 (1957 का 36) की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा निरसित ।
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