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पुस्तक और समाचारपत्र परिदान (सार्वजनिक पुस्तकालय) अधिनियम, 1954 ( Delivery of Books and Newspapers (Public Libraries) Act, 1954 )


 

पुस्तक और समाचारपत्र परिदान (सार्वजनिक पुस्तकालय) अधिनियम, 1954

(1954 का अधिनियम संख्यांक 27)

[20 मई, 1954]

राष्ट्रीय पुस्तकालय और अन्य सार्वजनिक पुस्तकालयों

को पुस्तक  [और समाचारपत्रोंट के परिदान

का उपबन्ध करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के पांचवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

1. संक्षिप्त नाम और विस्तार-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम पुस्तक  [और समाचारपत्र] परिदान (सार्वजनिक पुस्ताकलय) अधिनियम, 1954 है ।

(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर है ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) “पुस्तक” के अन्तर्गत किसी भी भाषा में पृथक् रूप से मुद्रित या शिलामुद्रित की हुई प्रत्येक जिल्द, जिल्द का भाग या खण्ड और पुस्तिका और स्वरलिपि पत्र, मानचित्र, चार्ट या रेखांकन है किन्तु इसके अन्तर्गत प्रैस और पुस्तक रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1867 (1867 का 25) की धारा 5 के उपबन्धों के अनुरूप प्रकाशित समाचारपत्र नहीं है;

 [(कक) “समाचारपत्र” से प्रैस और पुस्तक रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1867 (1867 का 25) की धारा 5 के उपबन्धों के अनुरूप प्रकाशित ऐसी मुद्रित कालिक कृति अभिप्रेत है जिसमें सार्वजनिक समाचार या सार्वजनिक समाचारों की समीक्षा अंतर्विष्ट है;]

(ख) “सार्वजनिक पुस्तकालय” से कलकत्ता स्थित राष्ट्रीय पुस्तकालय और कोई अन्य तीन पुस्तकालय अभिप्रेत हैं जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं ।

3. सार्वजनिक पुस्तकालयों को पुस्तकों का परिदान-(1) इस अधिनियम के अधीन बनाए जाने वाले नियमों के अधीन रहते हुए, प्रैस और पुस्तक रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1867 (1867 का 25) की धारा 9 के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उन राज्यक्षेत्रों में, जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है, इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् प्रकाशित प्रत्येक पुस्तक का प्रकाशक, प्रतिकूल करार के होते हुए भी, अपने खर्चे पर पुस्तक की एक प्रति कलकत्ता स्थित राष्ट्रीय पुस्तकालय को और तीन अन्य सार्वजनिक पुस्तकालयों में से प्रत्येक को ऐसी एक प्रति प्रकाशन की तारीख से तीस दिन के अन्दर परिदान करेगा ।

(2) राष्ट्रीय पुस्तकालय को परिदत्त उसके सभी मानचित्रों और चित्रकारी सहित सम्पूर्ण पुस्तक की एक प्रति होगी, जो उसी रीति में परिसाधित और रंजित होगी और जिल्दबन्द की जाएगी, सिली जाएगी या बांधी जाएगी, जैसी उसकी सर्वोत्तम कृतियां हैं और ऐसे सर्वोत्तम कागज पर होगी जिस पर उस पुस्तक की एक भी प्रति मुद्रित की गई है ।  

(3) किसी अन्य सार्वजनिक पुस्तकालय को परिदान की जाने वाली प्रति उस कागज पर होगी जिस पर विक्रय के लिए पुस्तक की सर्वाधिक संख्या में प्रतियां मुद्रित की गई हैं, और उसी दशा में होगी जैसी विक्रय के लिए तैयार की गई पुस्तकें हैं ।

(4) उपधारा (1) की कोई बात पुस्तक के ऐसे द्वितीय या पश्चात्वर्ती संस्करण को लागू नहीं होगी जिस संस्करण में न तो लेटर प्रैस में और न मानचित्रों में पुस्तक मुद्र (बुक प्रिंट) में या पुस्तक के अन्य उत्कीर्णों में कोई परिवर्धन या परिवर्तन किए गए हैं, और उस पुस्तक के प्रथम या अन्य पूर्ववर्ती संस्करण की प्रति इस अधिनियम के अधीन परिदत्त कर दी गई है ।

 [3क. सार्वजनिक पुस्तकालयों को समाचारपत्रों का परिदान-इस अधिनियम के अधीन बनाए जाने वाले नियमों के अधीन रहते हुए, किन्तु प्रैस और पुस्तक रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1867 (1867 का 25) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उन राज्यक्षेत्रों में, जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है, प्रकाशित प्रत्येक समाचारपत्र का प्रकाशक, अपने खर्चे पर समाचारपत्र के प्रत्येक अंक की एक प्रति उसके प्रकाशित होते हुए भी ऐसे प्रत्येक सार्वजनिक पुस्तकालय को जो केन्द्रीय सरकार इस निमित्त राजपत्र में अधिसूचित करे, परिदान करेगा ।] 

4. परिदत्त पुस्तकों की रसीद-सार्वजनिक पुस्तकालय का भारसाधक व्यक्ति (चाहे वह पुस्तकालयाध्यक्ष या किसी अन्य नाम से संबोधित किया जाए) या इस निमित्त उसके द्वारा प्राधिकृत कोई अन्य व्यक्ति जिसको धारा 3 के अधीन पुस्तक की प्रति परिदत्त की जाती है प्रकाशक को उसके लिए लिखित रूप में रसीद देगा ।

5. शास्ति-कोई प्रकाशक जो इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए किसी नियम के किसी उपबन्ध का उल्लंघन करेगा वह जुर्माने से जो पचास रुपए तक का हो सकेगा दण्डनीय होगा  [और यदि उल्लंघन पुस्तक की बाबत है तो पुस्तक के मूल्य के बराबर जुर्माने से भी दण्डनीय होगा] और अपराध का विचारण करने वाला न्यायालय यह निदेश दे सकता है कि उससे आपन किया गया सम्पूर्ण जुर्माना या उसका कोई भाग प्रतिकर के रूप में उस सार्वजनिक पुस्तकालय को दिया जाएगा; जिसको  [यथास्थिति, वह पुस्तक या समाचारपत्र] परिदत्त किया जाना था ।

6. अपराधों का संज्ञान-(1) केन्द्रीय सरकार द्वारा साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस निमित्त सशक्त किसी अधिकारी द्वारा किए गए परिवाद के सिवाय कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का संज्ञान नहीं करेगा ।

(2) प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट से निम्न कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।

 [7. सरकार द्वारा प्रकाशित पुस्तकों और समाचारपत्रों को अधिनियम का लागू होना-यह अधिनियम सरकार द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन प्रकाशित पुस्तकों को भी लागू होगा किन्तु शासकीय उपयोग के लिए प्रकाशित पुस्तकों को लागू                  नहीं होगा ।]

8. नियम बनाने की शक्ति- [(1)] केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों को क्रियान्वित करने के लिए नियम बना सकती है ।

 [(2) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह ऐसी कुल तीस दिन की अवधि के लिए सत्र में हो, जो एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकती है, रखा जाएगा और यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्र के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं, या दोनों सदन इस बात से सहमत हो जाएं  कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो ऐसा नियम, यथास्थिति, तत्पश्चात् केवल ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा या उसका कोई प्रभाव नहीं होगा, तथापि, उस नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से पहले उसके अधीन की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।] 

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