तस्कर और विदेशी मुद्रा छलसाधक (सम्पत्ति समपहरण) अधिनियम, 1976
(1976 का अधिनियम संख्यांक 13)
[25 जनवरी, 1976]
तस्करों और विदेशी मुद्रा छलसाधकों की अवैध रूप से अर्जित
सम्पत्ति के समपहरण का और उससे संबंधित या
उसके आनुषंगिक विषयों का उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
यह आवश्यक है कि राष्ट्र की अर्थ-व्यवस्था पर हानिकर प्रभाव डालने वाले तस्करी कार्यों और विदेशी मुद्रा छलसाधन का प्रभावी तौर से निवारण करने के लिए ऐसे कार्यों और छलसाधनों में लगे हुए व्यक्तियों को उनके अनुचित साधनों से प्राप्त अभिलाभों से वंचित किया जाए ;
और ऐसे व्यक्ति धन-कर, आय-कर या अन्य विधियों का अतिक्रमण करके या अन्य साधनों से ऐसे अभिलाभों का संवर्धन कर रहें हैं और इसके द्वारा चोरी-छिपे कार्य करने के लिए अपने संसाधनों में वृद्धि कर रहे हैं ;
और ऐसे व्यक्ति बहुत से मामलों में ऐसे अभिलाभों से अपने द्वारा अर्जित सम्पत्ति को अपने नातेदारों, सहयुक्तों और विश्वासपात्रों के नामों में धारण किए हुए हैं ;
अतः भारत गणराज्य के छब्बीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम तस्कर और विदेशी मुद्रा छलसाधक (सम्पत्ति समपहरण) अधिनियम, 1976 है ।
(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय संपूर्ण भारत पर है ।
(3) यह 5 नवम्बर, 1975 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।
2. लागू होना-(1) इस अधिनियम के उपबंध उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट व्यक्तियों को ही लागू होंगे ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट व्यक्ति निम्नलिखित हैं, अर्थात् :-
(क) प्रत्येक व्यक्ति-
(i) जो सागर सीमाशुल्क अधिनियम, 1878 (1878 का 8) या सीमाशुल्क अधिनियम, 1962(1962 का 52) के अधीन किसी ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया है जिसका सम्बन्ध एक लाख रुपए से अधिक मूल्य के माल से है ; या
(ii) जो विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1947 (1947 का 7) या विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46) के अधीन किसी ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया है जो एक लाख रुपए से अधिक की रकम या मूल्य के सम्बन्ध में है ; या
(iii) जो सागर सीमाशुल्क अधिनियम, 1878 (1878 का 8) या सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) के अधीन दोषसिद्ध किया गया है और तत्पश्चात् उन दोनों अधिनियमों में से किसी अधिनियम के अधीन दोषसिद्ध किया गया है ; या
(iv) जो विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1947 (1947 का 7) या विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46) के अधीन दोषसिद्ध किया गया है और तत्पश्चात् उन दोनों अधिनियमों में से किसी अधिनियम के अधीन दोषसिद्ध किया गया है ;
(ख) प्रत्येक व्यक्ति जिसकी बाबत विदेशी मुद्रा संरक्षण और तस्करी निवारण अधिनियम, 1974 (1974 का 52) के अधीन निरोध-आदेश किया गया है :
परन्तु यह तब जब कि-
(i) वह निरोध-आदेश ऐसा आदेश है जिसको उक्त अधिनियम की धारा 9 या धारा 12क के उपबंध लागू नहीं होते हैं और जो उक्त अधिनियम की धारा 8 के अधीन सलाहकार बोर्ड की रिपोर्ट पर या सलाहकार बोर्ड की रिपोर्ट की प्राप्ति के पूर्व या सलाहकार बोर्ड को निर्देश करने के पूर्व प्रतिसंहृत नहीं किया गया है ; या
(ii) वह निरोध-आदेश ऐसा आदेश है जिसको उक्त अधिनियम की धारा 9 के उपबंध लागू होते हैं और जो उक्त अधिनियम की धारा 9 की उपधारा (3) के अधीन पुनर्विलोकन के लिए समय की समाप्ति के पूर्व या उसके आधार पर, अथवा धारा 9 की उपधारा (2) के साथ पठित धारा 8 के अधीन सलाहकार बोर्ड की रिपोर्ट पर प्रतिसंहृत नहीं किया गया है ; या
(iii) वह निरोध-आदेश ऐसा आदेश है जिसको उक्त अधिनियम की धारा 12क के उपबंध लागू होते हैं और जो उस अधिनियम की उस धारा की उपधारा (3) के अधीन प्रथम पुनर्विलोकन के लिए समय की समाप्ति के पूर्व या उसके आधार पर, अथवा धारा 12क की उपधारा (6) के साथ पठित धारा 8 के अधीन सलाहकार बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर प्रतिसंहृत नहीं किया गया है ; या
(iv) वह निरोध-आदेश सक्षम अधिकारिता वाले किसी न्यायालय द्वारा अपास्त नहीं किया गया है ;
(ग) प्रत्येक व्यक्ति जो खंड (क) या खंड (ख) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति का नातेदार है ;
(घ) खंड (क) या खंड (ख) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति का प्रत्येक सहयुक्त ;
(ङ) किसी ऐसी संपत्ति का, जो खंड (क) या खंड (ख) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति द्वारा किसी पूर्व समय पर धारित थी, कोई धारक (जिसे इसके पश्चात् इस खंड में वर्तमान धारक कहा गया है) उस दशा के सिवाय जब कि, यथास्थिति, वर्तमान धारक या कोई भी व्यक्ति, जो ऐसे व्यक्ति के पश्चात् और वर्तमान धारक के पूर्व ऐसी सम्पत्ति धारण किए हुए था, सद्भावपूर्ण पर्याप्त सप्रतिफल अन्तरिती है या था ।
स्पष्टीकरण 1-खंड (क) के उपखंड (i) के प्रयोजनों के लिए, किसी ऐसे माल का, जिसके सम्बन्ध में कोई व्यक्ति किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया है, मूल्य उस अपराध के किए जाने की तारीख को भारत में व्यापार के मामूली अनुक्रम में उस माल की थोक कीमत होगी ।
स्पष्टीकरण 2-खंड (ग) के प्रयोजनों के लिए, किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में नातेदार" से अभिप्रेत है-
(i) उस व्यक्ति का पति या पत्नी ;
(ii) उस व्यक्ति का भाई या बहिन ;
(iii) उस व्यक्ति के पति या पत्नी का भाई या बहिन ;
(iv) उस व्यक्ति का कोई पारम्परिक पूर्वपुरुष या वंशज ;
(v) उस व्यक्ति के पति या पत्नी का कोई पारम्परिक पूर्वपुरुष या वंशज ;
(vi) खंड (ii), खंड (iii), खंड (iv) या खंड (v) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति का पति या पत्नी ;
(vii) खंड (ii) या खंड (iii) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति का कोई पारम्परिक वंशज ।
स्पष्टीकरण 3-खंड (घ) के प्रयोजनों के लिए, किसी व्यक्ति के संबंध में सहयुक्त" से अभिप्रेत है-
(i) कोई व्यष्टि जो ऐसे व्यक्ति के निवास-परिसर में (जिसमें उपगृह भी सम्मिलित हैं) निवास कर रहा था या कर रहा है ;
(ii) कोई व्यष्टि जो ऐसे व्यक्ति के कामकाज का प्रबन्ध कर रहा था या कर रहा है अथवा उसके लेखे रख रहा था या रख रहा है
(iii) कोई व्यक्ति-संगम, व्यष्टि-निकाय, भागीदारी फर्म, या कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अर्थ में कोई प्राइवेट कम्पनी, जिसका ऐसा व्यक्ति सदस्य, भागीदार या निदेशक रहा था या है ;
(iv) कोई व्यष्टि, जो खंड (iii) में निर्दिष्ट व्यक्ति-संगम, व्यष्टि-निकाय, भागीदारी फर्म या प्राइवेट कम्पनी का किसी ऐसे समय पर सदस्य, भागीदार या निदेशक रहा था या है, जब ऐसा व्यक्ति ऐसे संगम, निकाय, भागीदारी फर्म या प्राइवेट कम्पनी का सदस्य, भागीदार या निदेशक रहा था या है ;
(v) कोई व्यक्ति, जो खंड (iii) में निर्दिष्ट व्यक्ति-संगम, व्यष्टि-निकाय, भागीदारी फर्म या प्राइवेट कम्पनी के कामकाज का प्रबन्ध कर रहा था या कर रहा है अथवा उसके लेखे रख रहा था या रख रहा है ;
(vi) किसी न्यास का न्यासी, जब कि-
(क) ऐसा न्यास ऐसे व्यक्ति द्वारा सृष्ट किया गया है ; या
(ख) ऐसे व्यक्ति द्वारा न्यास को अभिदत्त आस्तियों का मूल्य (जिसके अन्तर्गत उसके द्वारा पहले अभिदत्त आस्तियों का, यदि कोई हों, मूल्य भी है) उस तारीख को, जिसको अभिदाय किया जाता है, न्यास की आस्तियों के उस मूल्य के, जो उस तारीख को हो, बीस प्रतिशत से कम न हो ;
(vii) जहां सक्षम प्राधिकारी का, ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, यह विचार है कि ऐसे व्यक्ति की किसी सम्पत्ति को उसकी ओर से कोई अन्य व्यक्ति धारण किए हुए है वहां ऐसा अन्य व्यक्ति ।
स्पष्टीकरण 4-शंकाएं दूर करने के लिए इसके द्वारा यह उपबन्ध किया जाता है कि इस प्रश्न का अवधारण कि क्या कोई व्यक्ति ऐसा व्यक्ति है जिसको इस अधिनियम के उपबन्ध लागू होते हैं, ऐसे तथ्यों, परिस्थितियों या घटनाओं के सन्दर्भ में (जिनके अन्तर्गत कोई दोषसिद्धि या निरोध भी हैं) किया जा सकता है जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व उत्पन्न या घटित हुई हों ।
[2क. अधिनियम का कतिपय व्यक्तियों को लागू न होना-स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (1985 का 61) के अध्याय 5क के उपबंधों के प्रारम्भ से ही, इस अधिनियम के उपबंध उन व्यक्तियों को लागू नहीं होंगे, जिनके संबंध में उस अध्याय के अधीन कोई आदेश या कार्यवाही की जा सकती है ।]
3. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) अपील अधिकरण" से समपहृत सम्पत्ति अपील अधिकरण अभिप्रेत है जो धारा 12 के अधीन गठित किया गया है ;
(ख) सक्षम प्राधिकारी" से केन्द्रीय सरकार का ऐसा अधिकारी अभिप्रेत है जो इस अधिनियम के अधीन सक्षम प्राधिकारी के कृत्यों का पालन करने के लिए उसके द्वारा धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकृत किया गया है ;
(ग) किसी ऐसे व्यक्ति के सम्बन्ध में जिसको यह अधिनियम लागू होता है, अवैध रूप से अर्जित सम्पत्ति" से अभिप्रेत है-
(i) कोई सम्पत्ति जो ऐसे व्यक्ति द्वारा, चाहे इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात्, किसी ऐसी आय, उपार्जनों या आस्तियों से या उनके माध्यम से पूर्णतः या भागतः अर्जित है जो किसी ऐसे विषय के बारे में, जिसकी बाबत संसद् को विधियां बनाने की शक्ति है, उस समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या उसके अधीन प्रतिषिद्ध किसी कार्य से व्युत्पन्न या अभिप्राप्त की गई हैं अथवा उसके फलस्वरूप की गई मानी जा सकती हैं ; या
(ii) कोई सम्पत्ति जो ऐसे व्यक्ति द्वारा, चाहे इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात्, किसी ऐसी आय, उपार्जनों या आस्तियों से या उनके माध्यम से पूर्णतः या भागतः अर्जित हैं जिनकी बाबत किसी ऐसी विधि का उल्लंघन किया गया है ; या
(iii) कोई सम्पत्ति जो ऐसे व्यक्ति द्वारा, चाहे इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात्, किसी ऐसी आय, उपार्जनों या आस्तियों से या उनके माध्यम से पूर्णतः या भागतः अर्जित हैं जिनका स्रोत साबित नहीं किया जा सकता है और जिनके बारे में यह दर्शाया नहीं जा सकता है कि वे किसी ऐसे विषय के बारे में, जिसकी बाबत संसद् को विधियां बनाने की शक्ति नहीं है, किए गए किसी कार्य या की गई किसी बात से हुई मानी जा सकती हैं ; या
(iv) कोई सम्पत्ति जो ऐसे व्यक्ति द्वारा, चाहे इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात्, प्रतिफल देकर या किन्हीं ऐसे साधनों से अर्जित है जो उपखंड (i) से (iii) में निर्दिष्ट किसी सम्पत्ति से अथवा ऐसी सम्पत्ति से हुई आय या उपार्जनों से पूर्णतः या भागतः सम्बन्धित है,
और इसके अन्तर्गत निम्नलिखित भी हैं, अर्थात् :-
(क) ऐसे व्यक्ति द्वारा धारित कोई सम्पत्ति, जो उसके किसी पूर्वतन धारक द्वारा उसे धारण करना बन्द न किए जाने की दशा में, ऐसे पूर्वतन धारक के संबंध में इस खंड के अधीन उस दशा के सिवाय अवैध रूप से अर्जित सम्पत्ति होती जब कि ऐसा व्यक्ति या कोई अन्य व्यक्ति जो ऐसे पूर्वतन धारक या, जहां दो या अधिक ऐसे पूर्वतन धारक हों वहां ऐसे पूर्वतन धारकों में से अन्तिम धारक के पश्चात् किसी समय उस सम्पत्ति का धारण किए हुए था, सद्भावपूर्ण पर्याप्त सप्रतिफल अन्तरिती है या था ;
(ख) कोई सम्पत्ति जो ऐसे व्यक्ति द्वारा, चाहे इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात्, प्रतिफल देकर या किन्हीं ऐसे साधनों से अर्जित है जो मद (क) के अन्तर्गत आने वाली किसी सम्पत्ति से अथवा उससे हुई आय या उपार्जनों से पूर्णतः या भागतः संबंधित हैं ;
(घ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(ङ) सम्पत्ति" के अन्तर्गत जंगम या स्थावर सम्पत्ति में कोई हित भी है ;
(च) न्यास" के अन्तर्गत कोई अन्य विधिक बाध्यता भी है ।
(2) इस अधिनियम में किसी ऐसी विधि के प्रति, जो किसी क्षेत्र में प्रवृत्त नहीं है, निर्देश का अर्थ उस क्षेत्र के सम्बन्ध में यह लगाया जाएगा कि वह उस क्षेत्र में प्रवृत्त तत्स्थानी विधि के, यदि कोई हो, प्रति निर्देश है ।
(3) इस अधिनियम में किसी अधिकारी या प्राधिकारी के प्रति निर्देश का अर्थ, किसी ऐसे क्षेत्र के सम्बन्ध में जिसमें वैसे ही पदाभिधान वाला कोई अधिकारी या प्राधिकारी नहीं है, यह लगाया जाएगा कि वह ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी के प्रति निर्देश है जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे ।
4. अवैध रूप से अर्जित सम्पत्ति को धारण करने का प्रतिषेध-(1) इस अधिनियम के प्रारम्भ से, किसी व्यक्ति के लिए, जिसको यह अधिनियम लागू होता है, यह विधिपूर्ण नहीं होगा कि वह अवैध रूप से अर्जित सम्पत्ति स्वयं या अपनी ओर से किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से धारण करे ।
(2) जहां कोई व्यक्ति अवैध रूप से अर्जित सम्पत्ति उपधारा (1) के उपबंधों का उल्लंघन करके धारण करता है वहां ऐसी सम्पत्ति इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार केन्द्रीय सरकार को समपहृत हो जाएगी ।
5. सक्षम प्राधिकारी-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, केन्द्रीय सरकार के उतने अधिकारियों को (जो उस सरकार के संयुक्त सचिव की पंक्ति से नीचे के नहीं होंगे), जितने वह ठीक समझे, इस अधिनियम के अधीन सक्षम प्राधिकारी के कृत्यों का पालन करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगी ।
(2) सक्षम प्राधिकारी ऐसे व्यक्तियों या व्यक्ति-वर्ग की बाबत, जिन्हें केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, निदिष्ट करे, अपने कृत्यों का पालन करेंगे ।
6. समपहरण की सूचना-(1) यदि सक्षम प्राधिकारी को, किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा, जिसको यह अधिनियम लागू होता है, स्वयं या उसकी ओर से किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से धारित सम्पत्ति के मूल्य को, आय, उपार्जनों या आस्तियों के उसके ज्ञात स्रोतों को और धारा 18 के अधीन की गई कार्रवाई के परिणामस्वरूप या अन्यथा उसको उपलब्ध किसी अन्य जानकारी या सामग्री को ध्यान में रखते हुए, यह विश्वास करने का कारण है (ऐसे विश्वास के लिए जो कारण हैं उन्हें लेखबद्ध किया जाएगा) कि ऐसी सभी या कोई सम्पत्ति अवैध रूप से अर्जित सम्पत्ति है तो वह ऐसे व्यक्ति पर (जिसे इसमें इसके पश्चात् प्रभावित व्यक्ति कहा गया है) उससे यह अपेक्षा करते हुए ऐसी सूचना की तामील कर सकेगा कि वह उस सूचना में यथाविनिर्दिष्ट समय के भीतर, जो सामान्यतः तीस दिन से कम नहीं होगा, अपनी ऐसी आय, उपार्जनों या आस्तियों के स्रोतों को, जिनसे या जिनके माध्यम से उसने ऐसी सम्पत्ति अर्जित की है, उस साक्ष्य को जिस पर वह निर्भर करता है और अन्य सुसंगत जानकारी और विशिष्टियों को उपदर्शित करे और यह हेतुक दर्शित करे कि, यथास्थिति, ऐसी सभी या उनमें से कोई सम्पत्ति इस अधिनियम के अधीन अवैध रूप से अर्जित सम्पत्ति के रूप में क्यों न घोषित की जाए और केन्द्रीय सरकार को क्यों न समपहृत हो जाए ।
(2) जहां किसी व्यक्ति को उपधारा (1) के अधीन सूचना में किसी सम्पत्ति के सम्बन्ध में यह विनिर्दिष्ट किया जाता है कि वह ऐसे व्यक्ति की ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा धारित है, वहां उस सूचना की एक प्रति की तामील ऐसे अन्य व्यक्ति पर भी की जाएगी ।
7. कुछ दशाओं में सम्पत्ति का समपहरण-(1) सक्षम प्राधिकारी, धारा 6 के अधीन जारी की गई हेतुक दर्शित करने के लिए सूचना के स्पष्टीकरण पर, यदि कोई हो, और अपने समक्ष उपलब्ध सामग्री पर विचार करने के पश्चात् तथा प्रभावित व्यक्ति को (और किसी ऐसी दशा में जहां प्रभावित व्यक्ति उस सूचना में विनिर्दिष्ट कोई सम्पत्ति किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से धारित करता है, वहां ऐसे अन्य व्यक्ति को भी) सुनवाई का उचित अवसर देने के पश्चात्, आदेश द्वारा, यह निष्कर्ष लेखबद्ध कर सकेगा कि प्रश्नगत सभी या कोई सम्पत्ति अवैध रूप से अर्जित सम्पत्ति है या नहीं ।
(2) जहां सक्षम प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि हेतुक दर्शित करने के लिए सूचना में निर्दिष्ट सम्पत्ति में से कतिपय सम्पत्ति अवैध रूप से अर्जित सम्पत्ति है किन्तु वह ऐसी सम्पत्ति की विनिर्दिष्ट रूप से पहचान करने में असमर्थ है, वहां सक्षम प्राधिकारी के लिए ऐसी सम्पत्ति को विनिर्दिष्ट करना विधिपूर्ण होगा जो, उसके श्रेष्ठ निर्णय के अनुसार, अवैध रूप से अर्जित सम्पत्ति है और वह तद्नुसार उपधारा (1) के अधीन निष्कर्ष लेखबद्ध करेगा ।
(3) जहां सक्षम प्राधिकारी इस धारा के अधीन इस आशय का निष्कर्ष लेखबद्ध करता है कि कोई सम्पत्ति अवैध रूप से अर्जित सम्पत्ति है वहां वह यह घोषणा करेगा कि ऐसी सम्पत्ति, इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, सभी विल्लंगमों से मुक्त होकर केन्द्रीय सरकार को समपहृत हो जाएगी ।
(4) जहां किसी कम्पनी के कोई शेयर इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार को समपहृत हो जाते हैं वहां वह कम्पनी, कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) या उस कम्पनी के संगम-अनुच्छेदों में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार को ऐसे शेयरों के अन्तरिती के रूप में तत्काल दर्ज करेगी ।
8. सबूत का भार-इस अधिनियम के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों में यह साबित करने का भार कि धारा 6 के अधीन तामील की गई सूचना में विनिर्दिष्ट कोई सम्पत्ति अवैध रूप से अर्जित सम्पत्ति नहीं है, प्रभावित व्यक्ति पर ही होगा ।
9. समपहरण के बदले में जुर्माना-(1) जहां सक्षम प्राधिकारी यह घोषणा करता है कि कोई सम्पत्ति धारा 7 के अधीन केन्द्रीय सरकार को समपहृत हो गई है और वह ऐसा मामला है जिसमें ऐसी आय, उपार्जनों या आस्तियों का, जिनसे ऐसी सम्पत्ति अर्जित की गई थी, केवल एक भाग का जो आधे से कम है, स्रोत सक्षम प्राधिकारी को समाधानप्रद रूप में साबित नहीं हुआ है, वहां वह प्रभावित व्यक्ति को यह विकल्प देते हुए आदेश करेगा कि वह समपहरण के बदले में ऐसे भाग के मूल्य के एक सही एक बटा पांच गुने के बराबर जुर्माना दे ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, ऐसी आय, उपार्जनों या आस्तियों के, जिनसे कोई सम्पत्ति अर्जित की गई है, किसी भाग का मूल्य निम्नलिखित होगा, अर्थात् :-
(क) आय या उपार्जनों के किसी भाग की दशा में, आय या उपार्जनों के ऐसे भाग की रकम ;
(ख) आस्तियों के किसी भाग की दशा में, ऐसी आस्तियों के अर्जन के लिए प्रतिफल के पूरे मूल्य का आनुपातिक भाग ।
(2) उपधारा (1) के अधीन कोई जुर्माना अधिरोपित करने का आदेश करने के पूर्व प्रभावित व्यक्ति को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाएगा ।
(3) जहां प्रभावित व्यक्ति उपधारा (1) के अधीन देय जुर्माना उतने समय के भीतर देता है जो उस निमित्त अनुज्ञात किया जाए वहां सक्षम प्राधिकारी, आदेश द्वारा, धारा 7 के अधीन समपहरण की घोषणा को प्रतिसंहृत कर सकेगा और तब ऐसी सम्पत्ति निर्मुक्त हो जाएगी ।
10. कतिपय न्यास सम्पत्ति के सम्बन्ध में प्रक्रिया-धारा 2 की उपधारा (2) के स्पष्टीकरण 3 के खंड (vi) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति की दशा में, यदि सक्षम प्राधिकारी को, उसको उपलब्ध जानकारी और सामग्री के आधार पर यह विश्वास करने का कारण है (ऐसे विश्वास के लिए जो कारण हैं उन्हें लेखबद्ध किया जाएगा) कि न्यास में धारित कोई सम्पत्ति अवैध रूप से अर्जित सम्पत्ति है तो वह, यथास्थिति, न्यासकर्ता या ऐसी आस्तियों के अभिदाता पर, जिनसे या जिनके माध्यम से ऐसी सम्पत्ति न्यास द्वारा अर्जित थी और न्यासियों पर, सूचना में यथा विनिर्दिष्ट इतने समय के भीतर जो सामान्यतः तीस दिन से कम नहीं होगा, धन या अन्य आस्तियों के स्रोत को, जिनसे या जिनके माध्यम से ऐसी सम्पत्ति अर्जित की गई थी, यथास्थिति, धन या अन्य आस्तियों के स्रोत को, जो ऐसी सम्पत्ति अर्जित करने के लिए न्यास को अभिदत्त थीं, उनसे स्पष्ट करने की अपेक्षा करते हुए सूचना की तामील कर सकेगा, और तब ऐसी सूचना धारा 6 के अधीन तामील की गई सूचना समझी जाएगी और इस अधिनियम के सभी अन्य उपबन्ध तद्नुसार लागू होंगे ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए न्यास में धारित किसी सम्पत्ति के सम्बन्ध में अवैध रूप से अर्जित सम्पत्ति" के अन्तर्गत निम्नलिखित भी हैं, अर्थात् :-
(i) यदि किसी सम्पत्ति को न्यासकर्ता या न्यास को ऐसी सम्पत्ति का अभिदाता धारित करता रहता तो वह ऐसे न्यासकर्ता या अभिदाता के सम्बन्ध में अवैध रूप से अर्जित सम्पत्ति होती ;
(ii) यदि किसी व्यक्ति द्वारा किए गए किन्हीं अभिदायों में से न्यास द्वारा अर्जित किसी सम्पत्ति को ऐसा व्यक्ति ऐसे अभिदायों में से अर्जित करता तो वह उस व्यक्ति के सम्बन्ध में अवैध रूप से अर्जित सम्पत्ति होती ।
11. कतिपय अन्तरणों का अकृत और शून्य होना-जहां धारा 6 के अधीन या धारा 10 के अधीन सूचना जारी की जाने के पश्चात्, उक्त सूचना में निर्दिष्ट कोई सम्पत्ति किसी भी प्रकार से अन्तरित की जाती है वहां ऐसे अन्तरण पर, इस अधिनियम के अधीन कार्यवाहियों के प्रयोजनों के लिए, ध्यान नहीं दिया जाएगा और यदि तत्पश्चात् ऐसी सम्पत्ति धारा 7 के अधीन केन्द्रीय सरकार को समपहृत हो जाती है तो ऐसी सम्पत्ति का अन्तरण अकृत और शून्य समझा जाएगा ।
12. अपील अधिकरण का गठन-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, समपहृत सम्पत्ति अपील अधिकरण के नाम से ज्ञात होने वाला एक अपील अधिकरण गठित कर सकेगी, जिसमें एक अध्यक्ष और उतने अन्य सदस्य होंगे (जो केन्द्रीय सरकार के ऐसे अधिकारी होंगे जो उस सरकार के संयुक्त सचिव की पंक्ति के नीचे के नहीं होंगे) जितने केन्द्रीय सरकार ठीक समझे और वे धारा 7, धारा 9 की उपधारा (1) या धारा 10 के अधीन किए गए आदेशों के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई के लिए उस सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे ।
(2) अपील अधिकरण का अध्यक्ष ऐसा व्यक्ति होगा जो उच्चतम न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है या होने के लिए अर्हित है ।
(3) अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की सेवा के निबंधन और शर्तें ऐसी होंगी जो विहित की जाएं ।
(4) धारा 7, धारा 9 की उपधारा (1) या धारा 10 के अधीन किए गए सक्षम प्राधिकारी के किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति उस तारीख से, जिसको ऐसा आदेश उस पर तामील किया जाता है, पैंतालीस दिन के भीतर अपील अधिकरण को अपील कर सकता है :
परन्तु यदि अपील अधिकरण का यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी समय के भीतर अपील फाइल करने से पर्याप्त हेतुक के कारण निवारित हो गया था तो वह पैंतालीस दिन की उक्त अवधि के पश्चात् कोई अपील ग्रहण कर सकेगा किन्तु साठ दिन के पश्चात् नहीं ।
(5) अपील अधिकरण, उपधारा (4) के अधीन अपील की प्राप्ति पर, अपीलार्थी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, यदि वह ऐसा चाहता है तो, और ऐसी अतिरिक्त जांच करने के पश्चात्, जो वह ठीक समझे, उस आदेश को, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, पुष्ट, उपांतरित या अपास्त कर सकेगा ।
(6) अपील अधिकरण की शक्तियों और कृत्यों का प्रयोग और निर्वहन न्यायपीठों द्वारा किया जा सकेगा जिनमें तीन सदस्य होंगे और जो अपील अधिकरण के अध्यक्ष द्वारा गठित की जाएंगी ।
[(6क) उपधारा (6) में किसी बात के होते हुए भी जहां अध्यक्ष इस धारा के अधीन अपीलों के शीघ्र निपटारे के लिए ऐसा करना आवश्यक समझता है, वहां वह दो सदस्यों की एक न्यायपीठ का गठन कर सकेगा, और इस प्रकार गठित न्यायपीठ अपील अधिकरण की शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन कर सकेगी :
परन्तु यदि इस प्रकार गठित न्यायपीठ के सदस्यों का किसी प्रश्न या प्रश्नों पर मतभेद हो तो वे उस प्रश्न या उन प्रश्नों का, जिन पर उनका मतभेद है, विवरण देंगे और उन्हें किसी तीसरे सदस्य को (जो अध्यक्ष द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाएगा) ऐसे प्रश्न या प्रश्नों की सुनवाई के लिए निर्दिष्ट करेंगे और ऐसे प्रश्न या प्रश्नों का विनिश्चय उस सदस्य की राय के अनुसार किया जाएगा ।]
(7) अपील अधिकरण अपनी प्रक्रिया स्वयं विनियमित कर सकेगा ।
[(8) अपील अधिकरण को आवेदन करने पर और विहित फीस के संदाय पर, अधिकरण किसी अपील के पक्षकार को या ऐसे पक्षकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति को इस बात के लिए अनुज्ञात कर सकेगा कि वह कार्यालय समय के दौरान किसी भी समय अधिकरण के सुसंगत अभिलेखों और रजिस्टरों का निरीक्षण करे और उनके किसी भाग की प्रमाणित प्रति अभिप्राप्त करे ।]
13. सूचना या आदेश में वर्णन सम्बन्धी गलती के कारण उसका अविधिमान्य न होना-इस अधिनियम के अधीन जारी या तामील की गई सूचना, की गई कोई घोषणा और पारित कोई आदेश उसमें उल्लिखित सम्पत्ति या व्यक्ति के वर्णन में किसी गलती के कारण अविधिमान्य नहीं समझा जाएगा यदि ऐसी सम्पत्ति या व्यक्ति की पहचान इस प्रकार उल्लिखित वर्णन से की जा सकती है ।
14. अधिकारिता का वर्जन-इस अधिनियम के अधीन पारित कोई आदेश या की गई कोई घोषणा इसमें यथा उपबन्धित के सिवाय अपीलनीय नहीं होगी और किसी सिविल न्यायालय को किसी ऐसे विषय की बाबत अधिकारिता नहीं होगी जिसको अपील अधिकरण या कोई सक्षम प्राधिकारी इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन अवधारित करने के लिए सशक्त है और इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन प्रदत्त शक्ति के अनुसरण में की गई या की जाने वाली किसी कार्रवाई की बाबत कोई व्यादेश किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी द्वारा नहीं दिया जाएगा ।
15. सक्षम प्राधिकारी और अपील अधिकरण को सिविल न्यायालय की शक्तियां होना-सक्षम प्राधिकारी और अपील अधिकरण को निम्नलिखित विषयों की बाबत वे सभी शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय की होती हैं, अर्थात् :-
(क) किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना ;
(ख) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना ;
(ग) शपथ पर साक्ष्य लेना ;
(घ) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रति की अध्यपेक्षा करना ;
(ङ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना ;
(च) कोई अन्य विषय जो विहित किया जा सकता है ।
16. सक्षम प्राधिकारी को जानकारी-(1) किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, सक्षम प्राधिकारी को केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी या प्राधिकारी से अथवा किसी राज्य सरकार से या किसी स्थानीय प्राधिकारी से यह अपेक्षा करने की शक्ति होगी कि वह ऐसे व्यक्तियों, प्रश्नों या विषयों के सम्बन्ध में जानकारी दे जो सक्षम प्राधिकारी की राय में इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उपयोगी या सुसंगत होगी ।
(2) आय-कर विभाग, सीमाशुल्क विभाग या केन्द्रीय उत्पाद-शुल्क विभाग का कोई अधिकारी या विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46) के अधीन नियुक्त कोई प्रवर्तन अधिकारी किसी ऐसी जानकारी को, जो उसे उपलब्ध है ; यदि वह उस अधिकारी की राय में इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए सक्षम प्राधिकारी के लिए उपयोगी है तो ; सक्षम प्राधिकारी को स्वयंमेव दे सकेगा ।
17. कतिपय अधिकारियों द्वारा सक्षम प्राधिकारी और अपील अधिकरण की सहायता करना-इस अधिनियम के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों के प्रयोजनों के लिए निम्नलिखित अधिकारियों को सक्षम प्राधिकारी और अपील अधिकरण की सहायता करने के लिए इसके द्वारा सशक्त किया जाता है और उनसे ऐसा करने की अपेक्षा की जाती है, अर्थात् :-
(क) सीमाशुल्क विभाग के अधिकारी ;
(ख) केन्द्रीय उत्पाद-शुल्क विभाग के अधिकारी ;
(ग) आय-कर विभाग के अधिकारी ;
(घ) विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46) के अधीन नियुक्त प्रवर्तन अधिकारी ;
(ङ) पुलिस के अधिकारी ;
(च) केन्द्रीय या राज्य सरकार के ऐसे अन्य अधिकारी जो केन्द्रीय सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
18. कतिपय शक्तियों का प्रयोग करने के लिए कतिपय अधिकारियों से अपेक्षा करने की सक्षम प्राधिकारी की शक्ति-(1) इस अधिनियम के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों के या किन्हीं ऐसी कार्यवाहियों के प्रारम्भ किए जाने के प्रयोजनों के लिए, सक्षम प्राधिकारी को किसी व्यक्ति, स्थान, सम्पत्ति, आस्तियों, दस्तावेजों, लेखा बहियों या किन्हीं अन्य सुसंगत विषयों की बाबत ऐसी जांच, अन्वेषण या सर्वेक्षण करवाने की शक्ति होगी ।
(2) सक्षम प्राधिकारी, उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए, ऐसी जांच, अन्वेषण या सर्वेक्षण की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, आय-कर विभाग के किसी अधिकारी से ऐसी जांच, अन्वेषण या सर्वेक्षण करने या कराने की अपेक्षा कर सकेगा ।
(3) आय-कर विभाग का कोई ऐसा अधिकारी, जो उपधारा (2) के अधीन की जाने के लिए अपेक्षित कोई जांच, अन्वेषण या सर्वेक्षण कर रहा है या करा रहा है, ऐसी जांच, अन्वेषण या सर्वेक्षण के प्रयोजनों के लिए, किसी ऐसी शक्ति का (जिसके अन्तर्गत किसी शक्ति का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत करने की शक्ति भी है), प्रयोग कर सकेगा जो आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) के अधीन किसी प्रयोजन के लिए उसके द्वारा प्रयोक्तव्य है और उक्त अधिनियम के उपबन्ध यथासम्भव तद्नुसार लागू होंगे ।
19. कब्जा लेने की शक्ति-(1) जहां कोई सम्पत्ति इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार को समपहृत घोषित की गई है या जहां प्रभावित व्यक्ति धारा 9 की उपधारा (1) के अधीन देय जुर्माने का संदाय उस धारा की उपधारा (3) के अधीन उसके लिए अनुज्ञात समय के भीतर करने में असफल रहा है वहां सक्षम प्राधिकारी प्रभावित व्यक्ति को और साथ ही किसी ऐसे अन्य व्यक्ति को, जो उस सम्पत्ति का कब्जा रखता है, यह आदेश कर सकेगा कि वह उसका कब्जा सक्षम प्राधिकारी को या उसके द्वारा इस निमित्त सम्यक् रूप से प्राधिकृत किसी व्यक्ति को उस आदेश की तामील से तीस दिन के भीतर अभ्यर्पित या परिदत्त कर दे ।
(2) यदि कोई व्यक्ति उपधारा (1) के अधीन किए गए किसी आदेश का अनुपालन करने से इंकार करता है या करने में असफल रहता है तो सक्षम प्राधिकारी उस सम्पत्ति का कब्जा ले सकेगा और उस प्रयोजन के लिए ऐसा बल प्रयोग कर सकेगा जो आवश्यक हो ।
(3) उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, सक्षम प्राधिकारी उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी सम्पत्ति का कब्जा लेने के प्रयोजन के लिए, सक्षम प्राधिकारी की सहायता करने के लिए किसी पुलिस अधिकारी की सेवा की अध्यपेक्षा कर सकेगा और ऐसे अधिकारी का यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसी अध्यपेक्षा का अनुपालन करे ।
20. भूल सुधार-अभिलेख से प्रकट किन्हीं भूलों को सुधारने की दृष्टि से, यथास्थिति, सक्षम प्राधिकारी या अपील अधिकरण अपने द्वारा किए गए आदेश को, ऐसे आदेश की तारीख से एक वर्ष की अवधि के भीतर संशोधित कर सकेगा :
परन्तु यदि किसी ऐसे संशोधन से किसी व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना सम्भाव्य है तो वह ऐसे व्यक्ति को सुनवाई का उचित अवसर दिए बिना नहीं किया जाएगा ।
21. अन्य विधियों के अधीन विषयों का इस अधिनियम के अधीन कार्यवाहियों के लिए निश्चायक न होना-किसी अन्य विधि के अधीन किसी अधिकारी या प्राधिकारी का कोई निष्कर्ष इस अधिनियम के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों के प्रयोजनों के लिए निश्चायक नहीं होगा ।
22. सूचना और आदेशों की तामील-इस अधिनियम के अधीन जारी की गई किसी सूचना या किए गए किसी आदेश की तामील निम्नलिखित रूप से की जाएगी :-
(क) सूचना या आदेश उस व्यक्ति को, जिसके लिए वह आशयित है या उसके अभिकर्ता को निविदत्त करके या उसे रजिस्ट्रीकृत डाक द्वारा भेज कर ;
(ख) यदि वह सूचना या आदेश खंड (क) में उपबन्धित रीति से तामील नहीं किया जा सकता है तो उसे उस सम्पत्ति के सहजदृश्य स्थान पर जिसके सम्बन्ध में ऐसी सूचना जारी की जाती है या आदेश किया जाता है, अथवा ऐसे परिसर के किसी सहजदृश्य भाग पर लगाकर जिसमें उस व्यक्ति का, जिसके लिए वह आशयित है, अन्तिम बार निवास किया जाना ज्ञात है या जिसमें उसने कारबार चलाया था या अभिलाभ के लिए स्वयं काम किया था ।
23. सद्भावपूर्वक की गई कार्यवाही के लिए संरक्षण-इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य कार्यवाही केन्द्रीय सरकार के या केन्द्रीय या राज्य सरकार के किसी अधिकारी के विरुद्ध न होगी ।
24. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव-इस अधिनियम के उपबन्ध, उस समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में उनसे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।
25. न्यास में धारित कतिपय सम्पत्ति को अधिनियम के उपबन्धों का लागू न होना-इस अधिनियम की कोई बात पूर्णतः लोक, धार्मिक या पूर्त प्रयोजनों के लिए सृष्ट या स्थापित किसी न्यास या संस्था द्वारा धारित किसी सम्पत्ति के सम्बन्ध में उस दशा में लागू नहीं होगी जिसमें-
(i) ऐसी सम्पत्ति ऐसे न्यास या संस्था द्वारा इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व किसी तारीख से इस प्रकार धारित की गई है ; या
(ii) ऐसी सम्पत्ति ऐसे न्यास या संस्था द्वारा इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व धारित किसी सम्पत्ति से पूर्णतः सम्बन्धित है ।
26. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात् :-
(क) धारा 12 की उपधारा (3) के अधीन अपील अधिकरण के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की सेवा के निबंधन और शर्तें ;
[(कक) ऐसी फीस जो धारा 12 की उपधारा (8) के अधीन अपील अधिकरण के अभिलेखों और रजिस्टरों के निरीक्षण या उनके किसी भाग की प्रमाणित प्रति प्राप्त करने के लिए संदत्त की जाएगी ;]
(ख) किसी सिविल न्यायालय की शक्तियां, जो धारा 15 के खंड (च) के अधीन सक्षम प्राधिकारी और अपील अधिकरण द्वारा प्रयोग की जा सकेंगी ;
(ग) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या किया जा सकता है ।
(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
27. निरसन और व्यावृत्ति-(1) तस्कर और विदेशी मुद्रा छलसाधक (सम्पत्ति समपहरण) अध्यादेश, 1975 (1975 का 20) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी यह है कि इस प्रकार निरसित अध्यादेश के उपबन्धों के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।
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