मजदूरी संदाय अधिनियम, 1936
(1936 का अधिनियम संख्यांक 4)1
[23 अप्रैल, 1936]
2[नियोजित व्यक्तियों के] कतिपय वर्गों को मजदूरी का संदाय
विनियमित करने के लिए
अधिनियम
2[नियोजित व्यक्तियों के] कतिपय वर्गों को मजदूरी का संदाय विनियमित करना समीचीन है;
अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है: -
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार, प्रारम्भ और लागू होना-(1) यह अधिनियम मजदूरी संदाय अधिनियम, 1936 कहा जा सकेगा ।
3[(2) इसका विस्तार 4॥। सम्पूर्ण भारत पर है ।]
(3) यह उस तारीख5 को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
(4) यह प्रथमतः किसी कारखाने में नियोजित 6[व्यक्तियों को, किसी रेल में] रेल प्रशासन द्वारा अथवा रेल प्रशासन के साथ कोई संविदा पूरी करने वाले किसी व्यक्ति द्वारा, या तो सीधे या उप-ठेकेदार के माध्यम से (कारखाने में नियोजित से अन्यथा) नियोजित व्यक्तियों को 7[और धारा 2 के खंड (ii) के उपखंड (क) से (छ) में विनिर्दिष्ट किसी औद्योगिक या अन्य स्थापन में नियोजित व्यक्तियों को] मजदूरी का संदाय करने को लागू है ।
(5) राज्य सरकार, 8[धारा 2 के खंड (ii) के उपखंड (ज) के अधीन केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट किसी स्थापन में या स्थापनों के किसी वर्ग में] नियोजित व्यक्तियों के किसी वर्ग को मजदूरी के संदाय पर 9[इस अधिनियम के उपबन्धों का या उनमें से किसी विस्तारण, ऐसा करने के अपने आशय की तीन मास की सूचना देने के पश्चात्, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा कर सकेगी:
10[परन्तु केन्द्रीय सरकार के स्वामित्वाधीन किसी ऐसे स्थापन के सम्बन्ध में ऐसी कोई अधिसूचना उस सरकार की सहमति से ही जारी की जाएगी अन्यथा नहीं ।]
11[(6) यह अधिनियम किसी मजदूरी-कालावधि के संबंध में नियोजित किसी व्यक्ति को संदेय मजदूरी को लागू होता है यदि उस मजदूरी-कालावधि के लिए ऐसी मजदूरी छह हजार पांच सौ रुपए प्रतिमास से या ऐसी अन्य उच्चतर धनराशि से अधिक नहीं है, जो केन्द्रीय सरकार, राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन द्वारा प्रकाशित उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण के आंकड़ों के आधार पर, प्रत्येक पांच वर्ष के पश्चात्, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे ।]
- इस अधिनियम का विस्तार, 1962 के विनियम 12 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा गोवा, दमन और दीव पर; 1963 के विनियम 6 की धारा 2 और पहली अनुसूची द्वारा दादरा और नागर हवेली पर; 1963 के विनियम 7 की धारा 3 और पहली अनुसूची द्वारा पांडिचेरी पर; और 1965 के विनियम 8 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा लक्षद्वीप पर, किया गया है ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 2 द्वारा (15-10-1982 से) उद्योगों में नियोजित व्यक्तियों के के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- विधि अनुकूलन आदेश 1950 द्वारा उपधारा (2) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1970 के अधिनियम सं० 51 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा (1-9-1971 से) जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय शब्दों के लोप किया गया ।
- 28 मार्च, 1937 देखिए भारत का राजपत्र (अंग्रेजी), 1937, भाग 1, पृ० 626 ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 3 द्वारा (15-10-1982 से) व्यक्तियों को, और किसी रेल में के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 3 द्वारा (15-10-1982 से) अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 3 द्वारा (15-10-1982 से) किसी औद्योगिक स्थापनों के किसी वर्ग या समूह में शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1957 के अधिनियम सं० 68 की धारा 2 द्वारा (1-4-1958 से) अधिनियम के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 3 द्वारा (15-10-1982 से) परन्तुक के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2005 के अधिनियम सं० 41 की धारा 2 द्वारा प्रतिस्थापित ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि विषय या संदर्भ में कोई बात विरुद्ध न हो, -
1[(i) रेल, वायु परिवहन सेवाओं, खानों और तेल क्षेत्रों के संबंध में, “समुचित सरकार" से केन्द्रीय सरकार और अन्य सभी मामलों के संबंध में राज्य सरकार अभिप्रेत है;]
2[(iक)] नियोजित व्यक्ति" के अन्तर्गत मृत नियोजित व्यक्ति का विधिक प्रतिनिधि आता है;]
13[(iख)] नियोजक" के अन्तर्गत मृत नियोजक का विधिक प्रतिनिधि आता है;
3[(iग)] कारखाना" से कारखाना अधिनियम, 1948 (1948 का 63) की धारा 2 के खंड (ङ) में यथापरिभाषित कारखाना अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत ऐसा कोई स्थान आता है जिसको उस अधिनियम के उपबन्ध उसकी धारा 85 की उपधारा
(1) के अधीन लागू किए गए हैं;
(ii) 4[औद्योगिक या अन्य स्थापन" से अभिप्रेत है] कोई-
5[(क) ट्रामवे सेवा या मोटर परिवहन सेवा जो यात्रियों को, या माल को या दोनों को ही भाड़े या इनाम के लिए सड़क द्वारा वहन करने में लगी है;
(कक) विमान परिवहन सेवा जो ऐसी सेवा से भिन्न है जो संघ की सेना, नौसेना या वायुसेना की है या उसमें अनन्यतः नियोजित है या भारत सरकार के सिविल विमानन विभाग की है या उसमें अनन्यतः नियोजित हैं;]
(ख) डाक, घाट या जेटी;
6[(ग) यंत्रनोदित अन्तर्देशीय जलयान;]
(घ) खान, खदान, या तेल-क्षेत्र;
(ङ) बागान;
(च) कर्मशाला या अन्य स्थापन, जिसमें वस्तुओं को, उनके उपयोग, परिवहन या विक्रय की दृष्टि से, उत्पादित, अनुकूलित या विनिर्मित किया जाता है;
7[(छ) स्थापन, जिसमें भवनों, सड़कों, पुलों या नहरों के सन्निर्माण, विकास या अनुरक्षण संबंधी, या नौपरिवहन, सिंचाई या जलप्रदाय से संशक्त क्रियाओं संबंधी, या विद्युत या किसी अन्य रूप की शक्ति के उत्पादन, पारेषण और वितरण संबंधी कोई काम किया जाता है;]
8[(ज) कोई अन्य स्थापन या स्थापनों का वर्ग, जिसे केन्द्रीय सरकार या कोई राज्य सकरार उसकी प्रकृति को, उसमें नियोजित व्यक्तियों के संरक्षण की आवश्यकता को और अन्य सुसंगत परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे;]
- 2005 के अधिनियम सं० 41 की धारा 4 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2005 के अधिनियम सं० 41 की धारा 4 द्वारा पुनःसंख्यांकित ।
- 2005 के अधिनियम सं० 41 की धारा 4 द्वारा पुनःसंख्यांकित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 4 द्वारा (15-10-1982 से) औद्योगिक स्थापन से अभिप्रेत है के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 3 द्वारा (1-2-1965 से) उपखण्ड (क) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1957 के अधिनियम सं० 68 की धारा 3 द्वारा (1-4-1958 से) उपखण्ड (ग) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1957 के अधिनियम सं० 68 की धारा 3 द्वारा (1-4-1958 से) अन्तःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 4 द्वारा (15-10-1982 से) अन्तःस्थापित ।
1[(iiक) “खान" का अर्थ वही है जो उसे खान अधिनियम, 1952 (1952 का 35) की धारा 2 की उपधारा (1) के खण्ड (ञ) में समनुदिष्ट है;]
2[(iii) “बागान" का अर्थ वही है जो उसे बागान श्रम अधिनियम, 1951 (1951 का 69) की धारा 2 के खण्ड (च) में समनुदिष्ट है;]
(iv) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
3[(v) “रेल प्रशासन" का वही अर्थ है जो रेल अधिनियम, 1989 (1989 का 24) की धारा 2 के खंड (32) में है;] तथा
4[(vi) मजदूरी" से धन के रूप में अभिव्यक्त अथवा ऐसे अभिव्यक्त हो सकने वाला वह सब पारिश्रमिक (चाहे वह सम्बलम् या भत्तों के रूप में हो या अन्यथा) अभिप्रेत है, जो किसी नियोजित व्यक्ति को, यदि नियोजन के अभिव्यक्त या विवक्षित निबंधनों की पूर्ति हो गई होती तो, उसके नियोजन की बाबत या ऐसे नियोजन में किए गए काम की बाबत उसे संदेय होता, और निम्नलिखित इसके अन्तर्गत आते हैं-
(क) पक्षकारों के बीच के किसी अधिनिर्णय या समझौता या किसी न्यायालय के आदेश के अधीन संदेय कोई पारिश्रमिक;
(ख) कोई पारिश्रमिक, जिसका नियोजित व्यक्ति अतिकालिक काम या अवकाश-दिनों या किसी छुट्टी-कालावधि की बाबत हकदार है;
(ग) नियोजन के निबन्धनों के अधीन संदेय कोई अतिरिक्त पारिश्रमिक (चाहे वह बोनस कहलाता हो या उसका कोई अन्य नाम हो);
(घ) कोई राशि, जो नियोजित व्यक्ति का नियोजन पर्यवसित हो जाने के कारण किसी ऐसी विधि, संविदा या लिखत के अधीन संदेय है जिसमें ऐसी राशि के, कटौतियों के सहित या बिना, संदाय के लिए तो उपबन्ध किया गया है किन्तु उस समय के लिए उपबन्ध नहीं किया गया है जिसके भीतर संदाय किया जाना है;
(ङ) कोई राशि, जिसका नियोजित व्यक्ति किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन विरचित किसी स्कीम के अधीन हकदार है,
किंतु निम्नलिखित इसके अन्तर्गत नहीं आते हैं-
(1) (लाभ में अंश बांटने की किसी स्कीम के अधीन या अन्यथा) कोई बोनस, जो नियोजन के निबंधनों के अधीन संदेय पारिश्रमिक का भाग नहीं है या पक्षकारों के बीच हुए किसी अधिनिर्णय या समझौता या न्यायालय के आदेश के अधीन संदेय नहीं है;
(2) किसी गृहवास सुविधा का या रोशनी, जल, चिकित्सीय परिचर्या या अन्य सुख-सुविधा के प्रदाय का या किसी ऐसी सेवा का मूल्य, जो राज्य सरकार के साधारण या विशेष आदेश द्वारा मजदूरी की संगणना से अपवर्जित हैं;
(3) किसी पेंशन या भविष्य-निधि में नियोजक द्वारा संदत्त कोई अभिदाय, और ब्याज जो उस पर प्रोद्भूत हुआ हो;
(4) कोई यात्रा-भत्ता या किसी रियायत का मूल्य;
(5) किसी नियोजित व्यक्ति को विशेष व्यय चुकाने के लिए संदत्त कोई राशि, जो उसे अपने नियोजन की प्रकृति के कारण उठाने पड़े;
(6) उपखंड (घ) में विनिर्दिष्ट मामलों से भिन्न मामलों में नियोजन के पर्यवसित होने पर संदेय कोई उपदान ।]
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 3 द्वारा (1-2-1965 से) अन्तःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 3 द्वारा (1-2-1965 से) खण्ड (iii) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2005 के अधिनियम सं० 41 की धारा 4 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1957 के अधिनियम सं० 68 की धारा 3 द्वारा (1-4-1958 से) खण्ड (vi) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
1[3. मजदूरी के संदाय के लिए उत्तरदायित्व-(1) प्रत्येक नियोजक, अपने द्वारा नियोजित व्यक्तियों को इस अधिनियम के अधीन संदत्त की जाने के लिए अपेक्षित सब मजदूरी का संदाय करने के लिए उत्तरदायी होगा और,-
(क) कारखानों में नियोजित व्यक्तियों की दशा में, यदि कोई व्यक्ति कारखाना अधिनियम, 1948 (1948 का 63) की धारा 7 की उपधारा (1) के खण्ड (च) के अधीन कारखाने के प्रबंधक के रूप में नामित किया गया है;
(ख) औद्योगिक या अन्य स्थापनों में नियोजित व्यक्तियों की दशा में, यदि औद्योगिक या अन्य स्थापनों के पर्यवेक्षण और नियंत्रण के लिए कोई व्यक्ति नियोजक के प्रति उत्तरदायी है;
(ग) (कारखानों को छोड़कर) रेल में नियोजित व्यक्तियों की दशा में, यदि नियोजक रेल प्रशासन है और रेल प्रशासन ने संबंधित स्थानीय क्षेत्र के लिए इस निमित्त किसी व्यक्ति को नामनिर्दिष्ट कर दिया है;
(घ) ठेकेदार की दशा में, यदि ऐसे ठेकेदारा द्वारा ऐसे व्यक्ति को, जो सीधे उसके भारसाधन के अधीन है, अभिहित किया गया है; और
(ङ) किसी अन्य दशा में, यदि नियोजक द्वारा अधिनियम के उपबंधों का पालन करने के लिए उत्तरदायी व्यक्ति के रूप में किसी व्यक्ति को अभिहित किया गया है,
तो, यथास्थिति, इस प्रकार नामित व्यक्ति, नियोजक के प्रति उत्तरदायी व्यक्ति इस प्रकार नामनिर्दिष्ट व्यक्ति या इस प्रकार अभिहित व्यक्ति, ऐसा संदाय करने के लिए उत्तरदायी होगा ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, नियोजक का यह उत्तरदायित्व होगा कि वह, ठेकेदार या नियोजक द्वारा अभिहित व्यक्ति के ऐसा संदाय करने में असफल रहने की दशा में, इस अधिनियम के अधीन संदाय किए जाने के लिए अपेक्षित सब मजदूरी का संदाय करे ।]
4. मजदूरी-कालावधियों का नियत किया जाना-(1) धारा 3 के अधीन मजदूरी का संदाय करने के लिए उत्तरदायी हर व्यक्ति उन कालावधियों को (जो इस अधिनियम में मजदूरी-कालावधियों के रूप में निर्दिष्ट हैं) नियत करेगा जिनकी बाबत ऐसी मजदूरी संदेय होगी ।
(2) कोई भी मजदूरी-कालावधि एक मास से अधिक की नहीं होगी ।
5. मजदूरी के संदाय का समय-(1) ऐसे हर व्यक्ति की मजदूरी का संदाय, जो-
(क) किसी रेल, कारखाने या 2[औद्योगिक या अन्य स्थापन] में नियोजित है जिसमें एक हजार से कम व्यक्ति नियोजित हैं, उस मजदूरी-कालावधि के, जिसकी बाबत मजदूरी संदेय है, अन्तिम दिन के पश्चात् सातवें दिन का अवसान होने से पूर्व,
(ख) किसी अन्य रेल, कारखाने या 3[औद्योगिक या अन्य स्थापन] में नियोजित है, उस मजदूरी-कालावधि के, जिसकी बाबत मजदूरी संदेय है, अंतिम दिन के पश्चात् दसवें दिन का अवसान होने से पूर्व, किया जाएगा:
- 2005 के अधिनियम सं० 41 की धारा 5 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 6 द्वारा (15-10-1982 से) औद्योगिक स्थापन के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 6 द्वारा (15-10-1982 से) औद्योगिक स्थापन के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
1[परन्तु उन व्यक्तियों की दशा में जो डॉक, घाट या जैटी पर या खान में नियोजित हैं, ऐसे पोत या माल-डिब्बों का जिन पर, यथास्थिति, माल लादा गया है, या जिन पर से माल उतारा गया है, टन धारिता का अन्तिम लेखा पूरा होने पर शोध्य पाए गए मजदूरी अतिशेष का संदाय ऐसा पूरा होने के दिन के सातवें दिन के अवसान से पूर्व किया जाएगा ।]
(2) जहां कि किसी व्यक्ति का नियोजन, नियोजक द्वारा या उसकी ओर से पर्यवसित किया जाता है, वहां उसके द्वारा उपार्जित मजदूरी का संदाय उस दिन से, जिस दिन उसका नियोजन पर्यवसित किया जाता है, दूसरे कार्य दिवस के अवसान से पूर्व किया जाएगा:
2[परन्तु जहां कि स्थापन में किसी व्यक्ति के नियोजन का पर्यवसान, साप्ताहिक या अन्य मान्यताप्राप्त अवकाश-दिन से भिन्न किसी कारण से स्थापन के बन्द होने के कारण किया जाता है वहां उसके द्वारा उपार्जित मजदूरी का संदाय उस दिन से, जिस दिन उसका नियोजन इस प्रकार पर्यवसित किया जाता है, दूसरे दिन के अवसान से पूर्व किया जाएगा ।]
(3) राज्य सरकार (कारखाने को छोड़कर) किसी रेल में नियोजित व्यक्तियों को 3[या केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के लोक निर्माण विभाग में दैनिक मजदूरी वाले कर्मकारों के रूप में नियोजित व्यक्तियों को] मजदूरी का संदाय करने के लिए उत्तरदायी व्यक्ति को किन्हीं ऐसे व्यक्तियों या ऐसे व्यक्तियों के वर्ग की मजदूरी की बाबत इस धारा के प्रवर्तन से छूट, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, उस विस्तार तक और ऐसी शर्तों के अध्यधीन दे सकेगी जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं:
3[परन्तु उन व्यक्तियों की दशा में, जो यथापूर्वोक्त रूप में दैनिक मजदूरी वाले कर्मकारों के रूप में नियोजित हैं, ऐसा कोई भी आदेश केन्द्रीय सरकार के परामर्श से किए जाने के सिवाय नहीं किया जाएगा ।]
(4) मजदूरी के 3[सभी संदाय, उपधारा (2) में जैसा अन्यथा उपबंधित किया गया है उसे छोड़कर] कार्य-दिवस को किए जाएंगे ।
4[6. मजदूरी का चालू सिक्के या करेंसी नोटों में या चेक द्वारा या बैंक खाते में जमा करके दिया जाना-सभी मजदूरी चालू सिक्के या करेंसी नोटों में या चेक द्वारा या कर्मचारी के बैंक खाते में मजदूरी जमा करके दी जाएगी:
परंतु समुचित सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे औद्योगिक या अन्य संस्थापन को विनिर्दिष्ट कर सकेगी, जिसका नियोजक ऐसे औद्योगिक या अन्य स्थापन में नियोजित प्रत्येक व्यक्ति को केवल चेक द्वारा या उसके बैंक खाते में मजदूरी जमा करके, मजदूरी का संदाय करेगा ।]
7. कटौतियां, जो मजदूरी में से की जा सकेंगी-(1) 5[रेल अधिनियम, 1989 (1989 का 24) के उपबन्धों के होते हुए भी, नियोजित व्यक्ति की मजदूरी, इस अधिनियम के द्वारा या अधीन प्राधिकृत कटौतियों के सिवाय, किसी भी प्रकार की कटौतियां किए बिना, उसे दी जाएगी ।
6[स्पष्टीकरण 1]-नियोजित व्यक्ति द्वारा नियोजक या उसके अभिकर्ता को किया गया हर संदाय, इस अधिनियम के प्रयाजनों के लिए, मजदूरी में से कटौती समझा जाएगा ।
7[स्पष्टीकरण 2-किसी नियोजित व्यक्ति पर हर निम्नलिखित शास्ति, अर्थात्: -
- वेतन-वृद्धि या प्रोन्नति का विधारण (जिसके अन्तर्गत दक्षता रोध पर वेतन वृद्धि का रोका जाना आता है);
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 5 द्वारा (1-2-1965 से) जोड़ा गया ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 5 द्वारा (1-2-1965 से) अन्तःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 5 द्वारा (1-2-1965 से) सभी संदाय के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2017 के अधिनियम सं० 1 की धारा 2 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2005 के अधिनियम सं० 41 की धारा 6 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1957 के अधिनियम सं० 68 की धारा 5 द्वारा (1-4-1958 से) स्पष्टीकरण को स्पष्टीकरण 1 के रूप में पुनः संख्यांकित किया गया ।
- 1957 के अधिनियम सं० 68 की धारा 5 द्वारा (1-4-1958 से) अन्तःस्थापित ।
(ii) किसी निम्नतर पद या काल-वेतमान पर या काल-वेतनमान में के किसी निम्नतर प्रक्रम पर अवनति; अथवा
(iii) निलम्बन,
में से किसी अधिरोपण, अच्छे और पर्याप्त कारण से, किए जाने के परिणामस्वरूप हुई मजदूरी की कोई हानि किसी ऐसे मामले में मजदूरी में से कटौती नहीं समझी जाएगी, जहां कि ऐसी किसी शास्ति के अधिरोपण के लिए नियोजक द्वारा विरचित नियम उन अपेक्षाओं के, यदि कोई हों, अनुरूप हों, जो राज्य सरकार द्वारा, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट की जाएं ।]
(2) किसी नियोजित व्यक्ति की मजदूरी में से कटौतियां इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार ही की जाएंगी और केवल निम्नलिखित प्रकार की हो सकेंगी, अर्थात्: -
(क) जुर्माने;
(ख) कर्तव्य से अनुपस्थिति के लिए कटौतियां;
(ग) उस माल के नुकसान या हानि के लिए जो नियोजित व्यक्ति की अभिरक्षा के लिए अभिव्यक्त रूप से न्यस्त किया गया है या उस धन की हानि के लिए, जिसके लिए उससे लेखा देने की अपेक्षा की जाती है, उस दशा में कटौतियां, जिसमें ऐसा नुकसान या हानि उसकी उपेक्षा या व्यतिक्रम के फलस्वरूप प्रत्यक्षतः हुई मानी जा सकती है;
1[(घ) नियोजक या सरकार या किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन स्थापित किसी आवासन बोर्ड द्वारा (चाहे सरकार या बोर्ड नियोजक हो या न हो) या गृहवास-सुविधा के लिए साहाय्यिकी देने के कारबार में लगे किसी ऐसे अन्य प्राधिकारी द्वारा, जिसे राज्य सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, प्रदत्त गृहवास-सुविधा के लिए कटौतियां;]
(ङ) नियोजक द्वारा प्रदत्त ऐसी सुख-सुविधाओं और सेवाओं के लिए कटौतियां, जिन्हें 2॥। राज्य सरकार 3[या उसके द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट कोई आफिसर] साधारण या विशेष आदेश द्वारा, प्राधिकृत करे ।
स्पष्टीकरण- 4[इस खंड] में “सेवाओं" शब्द के अन्तर्गत नियोजन के प्रयोजनों के लिए अपेक्षित औजारों और कच्ची सामग्री का प्रदाय नहीं आता है;
5[(च) अधिदायों की, चाहे वे किसी भी प्रकार के हों (जिनके अन्तर्गत यात्रा-भत्ते या प्रवहण-भत्ते के लिए अभिदाय आते है) और उनकी बाबत शोध्य ब्याज की वसूली के लिए या मजदूरी के अतिसंदायों के समायोजन के लिए कटौतियां;
(चच) राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित नियमों के अनुसार श्रम-कल्याण के लिए गठित किसी निधि में से दिए गए उधारों और उनकी बाबत शोध्य ब्याज की वसूली के लिए कटौतियां;
(चचच) गृह-निर्माण के लिए या अन्य प्रयोजनों के लिए, जो राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित हों, अनुदत्त उधारों या और उनकी बाबत शोध्य ब्याज की वसूली के लिए कटौतियां;]
(छ) उस आय-कर की कटौतियां जो नियोजित व्यक्ति द्वारा संदेय है;
(ज) न्यायालय के या अन्य प्राधिकारी के आदेश से, जो ऐसा आदेश करने के लिए सक्षम है, की जाने के लिए अपेक्षित कटौतियां;
- 1957 के अधिनियम सं० 68 की धारा 5 द्वारा (1-4-1958 से) खण्ड (घ) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा सपरिषद् गवर्नर जनरल या शब्दों का लोप किया गया ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 6 द्वारा (1-2-1965 से) अन्तःस्थापित ।
- 1974 के अधिनियम सं० 56 की धारा 3 और अनुसूची 2 द्वारा इस उपखण्ड के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 6 द्वारा (1-2-1965 से) खण्ड (च) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(झ) किसी ऐसी भविष्य निधि में, जिसे भविष्य निधि अधिनियम, 1925 (1925 का 19) लागू है, या 1[आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की धारा 2 के खंड (38) में] यथापरिभाषित किसी मान्यताप्राप्त भविष्य-निधि में, या राज्य सरकार द्वारा, इस निमित्त अनुमोदित किसी भविष्य-निधि में, ऐसे अनुमोदन के चालू रहने के दौरान, चन्दे के लिए या ऐसी किसी भविष्य-निधि में से अभिदायों के प्रतिसंदाय के लिए कटौतियां; 2॥।
3[(ञ) राज्य सरकार द्वारा 3[या उसके द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किसी आफिसर] द्वारा अनुमोदित सहकारी सोसाइटियों को या भारतीय डाकघर की किसी स्कीम में संदाय करने के लिए कटौतियां; 4[तथा]
9[5[(ट) जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 (1956 का 31) के अधीन स्थापित जीवन बीमा निगम को नियोजित व्यक्ति की जीवन-बीमा पालिसी पर किसी प्रीमियम के संदाय के लिए, या भारत सरकार की या किसी राज्य सरकार की प्रतिभूतियों के क्रय के लिए, या ऐसी किसी सरकार की किसी बचत स्क्रीम को अग्रसर करने में किसी डाकघर बचत बैंक में निक्षिप्त किए जाने के लिए, उस व्यक्ति के लिखित प्राधिकरण से की गई कटौतियां;]]
6[(टट) नियोजित व्यक्तियों या उनके कुटुम्बों के सदस्यों या दोनों के कल्याण के लिए नियोजक या व्यवसाय संघ अधिनियम, 1926 (1926 का 16) के अधीन रजिस्ट्रीकृत व्यवसाय संघ द्वारा स्थापित और राज्य सरकार या इस निमित्त उसके द्वारा विनिर्दिष्ट किसी अधिकारी द्वारा अनुमोदित निधि के लिए, ऐसे अनुमोदन के जारी रहने के दौरान नियोजित व्यक्ति के अभिदाय का संदाय करने के लिए उस व्यक्ति के लिखित प्राधिकरण से की गई कटौतियां;
(टटट) व्यवसाय संघ अधिनियम, 1926 (1926 का 16) के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी व्यवसाय संघ की सदस्यता के लिए नियोजित व्यक्ति द्वारा संदेय फीस का संदाय करने के लिए, उस व्यक्ति के लिखित प्राधिकरण से की गई कटौतियां;]
7[(ठ) विश्वस्तता प्रत्याभूति बन्धपत्रों पर बीमा प्रीमियमों के संदाय के लिए कटौतियां;
(ड) कूटकृत या खोटे सिक्कों या विकृत या कूटरचित करेंसी नोटों का प्रतिग्रहण नियोजित व्यक्ति द्वारा किए जाने के कारण किसी रेल प्रशासन को हुई हानियों की वसूली के लिए कटौतियां;
(ढ) किसी रेल प्रशासन को शोध्य समुचित प्रभारों का, चाहे वे यात्री-भाड़े, ढुलाई, डेमरेज, घाट-भाड़े या क्रेन-भाड़े की बाबत हों, या खान-पान स्थापनों में खाद्य वस्तुओं के विक्रय की बाबत हों या अन्य की दुकानों में वस्तुओं के विक्रय की बाबत हों या अन्यथा, बीजक बनाने, बिल बनाने, वसूल करने या उनका लेखा देने में नियोजित व्यक्ति की असफलता के कारण उस प्रशासन को हुई हानि की वसूली के लिए कटौतियां;
(ण) नियोजित व्यक्ति द्वारा गलती से अनुदत्त रिबेटों या प्रतिदायों के कारण किसी रेल प्रशासन को हुई हानियों की वूसली के लिए उस दिशा में कटौतियां जिसमें ऐसी हानि उसकी उपेक्षा या व्यक्तिक्रम के फलस्वरूप प्रत्यक्षतः हुई मानी जा सकती हैं;]
- 2005 के अधिनियम सं० 41 की धारा 6 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1940 के अधिनियम सं० 3 की धारा 2 द्वारा और शब्द का लोप किया गया ।
- भारत रक्षा अधिनियम, 1971 (1971 का 42) की धारा 6 उपबन्ध करती है कि पूर्वोक्त अधिनियम के प्रवृत्त रहने के दौरान धारा 7 इस प्रकार प्रभाव होगी मानो उसकी उपधारा (2) के खण्ड (झ) के पश्चात् निम्नलिखित खण्ड अन्तःस्थापित किया गया था:
(झझ) राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित राष्ट्रीय रक्षा निधि या किसी रक्षा बचत स्कीम में अभिदाय के लिए निम्नलिखित व्यक्तियों के लिखित प्राधिकार से की गई कटौती:
- नियोजित व्यक्ति; अथवा
- जिस रजिस्ट्रीकरण व्यवसाय संघ का नियोजित व्यक्ति सदस्य है उसके अध्यक्ष या सचिव द्वारा ऐसी शर्तों पर जो विहित की जाएं ।
- 1940 के अधिनियम सं० 3 की धारा 2 द्वारा जोड़ा गया ।
- 1957 के अधिनियम सं० 68 की धारा 5 द्वारा (1-4-1958 से) खण्ड (ट) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 7 द्वारा (15-10-1982 से) अंतःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 6 द्वारा (1-2-1965 से) अन्तःस्थापित ।
1[(त) नियोजित व्यक्तियों के लिखित प्राधिकरण से प्रधान मंत्री राष्ट्रीय सहायता कोष में या ऐसे अन्य कोष में जो केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे, अभिदाय करने के लिए की गई कटौतियां;]
2[(थ) केन्द्रीय सरकार द्वारा अपने कर्मचारियों के फायदे के लिए बनाई गई किसी बीमा स्कीम में अभिदाय के लिए कटौतियां ।]
2[(3) इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, उन कटौतियों की कुल रकम, जो किसी मजदूरी-कालावधि में किसी नियोजित व्यक्ति की मजदूरी में से उपधारा (2) के अधीन की जा सकेगी, -
(i) उन दशाओं में, जहां कि ऐसी कटौतियां उपधारा (2) के खण्ड (ञ) के अधीन सहकारी सोसाइटियों को संदाय के लिए पूर्णतः या भागतः की जाती हैं ऐसी मजदूरी के पचहत्तर प्रतिशत से, तथा
(ii) किसी अन्य दशा में, ऐसी मजदूरी के पचास प्रतिशत से अधिक न होगी:
परन्तु जहां कि उपधारा (2) के अधीन प्राधिकृत कुल कटौतियां, यथास्थिति, पचहत्तर प्रतिशत से या पचास प्रतिशत से अधिक हो जाएं वहां आधिक्य ऐसी रीति से वसूल किया जा सकेगा, जैसी विहित की जाए ।
(4) इस धारा में अन्तर्विष्ट किसी भी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह नियोजक को नियोजित व्यक्ति की मजदूरी में से या अन्यथा किसी ऐसी रकम को वसूल करने से प्रवारित करती है 3[जो रेल अधिनियम, 1989 (1989 का 24) से भिन्न किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन ऐसे व्यक्ति द्वारा संदेय हैं ।]
8. जुर्माने-(1) किसी नियोजित व्यक्ति पर कोई भी जुर्माना, उसके ऐसे कार्यों और लोपों की बाबत अधिरोपित करने के सिवाय, जिन्हें नियोजक ने राज्य सरकार या विहित प्राधिकारी के पूर्वानुमोदन से उपधारा (2) के अधीन सूचना द्वारा विनिर्दिष्ट किया हो, अधिरोपित नहीं किया जाएगा ।
(2) ऐसे कार्यों और लोपों को विनिर्दिष्ट करने वाली सूचना उस परिसर में, जिसमें वह काम किया जाता है जिसके लिए नियोजित हैं, या (कारखाने को छोड़कर) किसी रेल में नियोजित व्यक्तियों की दशा में विहित स्थान या स्थानों पर विहित रीति से प्रदर्शित की जाएगी ।
(3) किसी नियोजित व्यक्ति पर कोई भी जुर्माना तब तक, जब तक कि उसे जुर्माने के विरुद्ध हेतुक दर्शित करने का अवसर न दे दिया गया हो, या ऐसी प्रक्रिया के अनुसार अधिरोपित किए जाने से अन्यथा, जैसी जुर्मानों के अधिरोपण के लिए विहित की जाए, अधिरोपित नहीं किया जाएगा ।
(4) उस जुर्माने की कुल रकम, जो किसी नियोजित व्यक्ति पर किसी एक मजदूरी-कालावधि में अधिरोपित की जा सकेगी, उस मजदूरी-कालावधि की बाबत उसे संदेय मजदूरी के 4[तीन प्रतिशत] के बराबर रकम न होगी ।
(5) उस नियोजित व्यक्ति पर, जो पन्द्रह वर्ष से कम की आयु का है, कोई भी जुर्माना अधिरोपित नहीं किया जाएगा ।
(6) किसी नियोजित व्यक्ति पर अधिरोपित कोई भी जुर्माना उससे किस्तों द्वारा या उस दिन से, जिसको वह अधिरोपित किया गया था, 5[नब्बे दिन] के अवसान के पश्चात् वसूल नहीं किया जाएगा ।
(7) हर जुर्माना उस कार्य या लोप के दिन अधिरोपित किया गया समझा जाएगा जिसकी बाबत वह अधिरोपित किया था ।
- 1976 के अधिनियम सं० 29 की धारा 4 द्वारा (12-11-1976 से) अन्तःस्थापित ।
- 1977 के अधिनियम सं० 19 की धारा 2 द्वारा अन्तःस्थापित ।
- 2005 के अधिनियम सं० 41 की धारा 6 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम स० 38 की धारा 8 द्वारा (15-10-1982 से) प्रति रुपए में आधा आना शब्द के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2005 के अधिनियम सं० 41 की धारा 7 द्वारा प्रतिस्थापित ।
(8) सभी जुर्माने और उसके सभी आपन उस रजिस्टर में अभिलिखित किए जाएंगे जो उस व्यक्ति द्वारा, जो धारा 3 के अधीन मजदूरी के संदाय के लिए उत्तरदायी है, ऐसे प्ररूप में रखा जाएगा जो विहित किया जाए; और ऐसे सभी आपन कारखाने या स्थापन में नियोजित व्यक्तियों के लिए फायादाप्रद उन्हीं प्रयोजनों के लिए उपयोजित किए जाएंगे, जो विहित प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित किए गए हों ।
स्पष्टीकरण-जब कि किसी रेल, कारखाने या 1[औद्योगिक या अन्य स्थापन] में नियोजित व्यक्ति उसी प्रबन्ध के अधीन नियोजित कर्मचारिवृन्द के ही भाग हों तो ऐसे सभी आपन संपूर्ण कर्मचारिवृन्द के लिए रखी गई किसी सामान्य निधि में जमा किए जा सकेंगे, परन्तु वह निधि केवल उन्हीं प्रयोजनों के लिए उपयोजित की जाएगी, जो विहित प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित किए गए हों ।
9. कर्तव्य से अनुपस्थिति के लिए कटौतियां-(1) धारा 7 की उपधारा (2) के खण्ड (ख) के अधीन कटौतियां नियोजित व्यक्ति की उस स्थान या उन स्थानों से, जहां उसके नियोजन के निबन्धनों द्वारा उससे काम करने की अपेक्षा की जाती है, उस अनुपस्थिति के कारण ही की जा सकेगी जो उस सम्पूर्ण कालावधि या उसके किसी भाग के लिए हो, जिसके दौरान उससे इस प्रकार काम करने की अपेक्षा की जाती है ।
(2) ऐसी कटौती की रकम का उस मजदूरी से अनुपात, जो नियोजित व्यक्ति को उस मजदूरी-कालावधि की बाबत संदेय है, जिसके लिए कटौती की गई है, उस अनुपात से किसी भी दशा में अधिक न होगा जो उस कालावधि का, जिसमें वह अनुपस्थित रहा है, ऐसी मजदूरी कालावधि में की उस कुल कालावधि से है जिसके दौरान उसके नियोजन के निबन्धन उससे काम करने की अपेक्षा करते हैं:
परन्तु राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए गए किन्हीं भी नियमों के अध्यधीन यह है कि यदि मिलकर कार्य करते हुए दस या अधिक नियोजित व्यक्ति सम्यक् सूचना के बिना (अर्थात् वैसी सूचना दिए बिना जैसी उनकी नियोजन संविदाओं के निबन्धनों के अधीन अपेक्षित है) और युक्तियुक्त हेतुक के बिना, अनुपस्थित रहते हैं तो, ऐसे किसी व्यक्ति से की गई ऐसी कटौती में आठ दिनों की उसकी मजदूरी से अनधिक उतनी रकम सम्मिलित हो सकेगी जितनी सम्यक् सूचना के बदले में किन्हीं ऐसे निबन्धनों के अनुसार नियोजक को शोध्य हो ।
2[स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि नियोजित व्यक्ति उस स्थान से, जहां उससे काम करने की अपेक्षा की जाती है, अनुपस्थित है, यदि वह उस स्थान में उपस्थित रहने पर भी, हाजिर हड़ताल के अनुसरण में या किसी अन्य कारण से, जो परिस्थितियों में युक्तियुक्त नहीं है, अपना काम करने से इंकार करता है ।]
10. नुकसान या हानि के लिए कटौतियां- 3[(1) धारा 7 की उपधारा (2) के खंड (ग) या खंड (ण) के अधीन कटौती नियोजित व्यक्ति की उपेक्षा या व्यतिक्रम द्वारा नियोजक को हुए नुकसान या हानि की रकम से अधिक नहीं होगी ।
(1क) धारा 7 की उपधारा (2) के खंड (ग) या खंड (ड) या खंड (ढ) या खंड (ण) के अधीन कटौती तब तक, जब तक कि नियोजित व्यक्ति को कटौती के विरुद्ध हेतुक दर्शित करने का अवसर न दे दिया गया हो, या ऐसी प्रक्रिया के अनुसार किए जाने से अन्यथा, जो ऐसी कटौतियां करने के लिए विहित की जाएं, न की जाएगी ।]
(2) ऐसी सभी कटौतियां और उनके सभी आपन उस रजिस्टर में अभिलिखित किए जाएंगे जो उस व्यक्ति द्वारा, जो धारा 3 के अधीन मजदूरी के संदाय के लिए उत्तरदायी है, ऐसे प्ररूप में रखा जाएगा जो विहित किया जाए ।
11. की गई सेवाओं के लिए कटौतियां-धारा 7 की उपधारा (2) के खंड (घ) या खंड (ङ) के अधीन कटौती नियोजित व्यक्ति की मजदूरी में से तब तक नहीं की जाएगी जब तक कि उसने गृह-वास सुविधा या सेवा को, नियोजन संबंधी निबन्धन के रूप में या अन्यथा, प्रतिगृहीत न कर लिया हो, और ऐसी कटौती प्रवृत्त गृह-वास सुविधा या सेवा के मूल्य के बराबर की रकम से अधिक नहीं होगी,
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 8 द्वारा (15-10-1982 से) औद्योगिक स्थापन के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1937 के अधिनियम सं० 22 की धारा 2 द्वारा जोड़ा गया ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 7 द्वारा (1-2-1965 से) उपधारा (1) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
और उक्त खंड (ङ) के अधीन किसी कटौती की दशा में ऐसी शर्तों के अध्यधीन होगी जैसी 1॥। राज्य सरकार अधिरोपित करे ।
12. अधिदायों की वसूली के लिए कटौतियां-धारा 7 की उपधारा (2) के खंड (च) के अधीन कटौतियां निम्नलिखित शर्तों के अध्यधीन होंगी, अर्थात्: -
(क) नियोजन के आरम्भ होने से पूर्व दिए गए धन के किसी अधिदाय की वसूली सम्पूर्ण मजदूरी-कालावधि की बाबत मजदूरी के प्रथम संदाय में से की जाएगी, किन्तु यात्रा-व्ययों के लिए दिए गए ऐसे अधिदायों की कोई भी वसूली नहीं की जाएगी;
2[(कक) नियोजन के आरंभ होने के पश्यात् दिए गए धन के अभिदायों की वसूली ऐसी शर्तों के अध्यधीन होगी जैसी राज्य सरकार अधिरोपित करे;]
(ख) जो मजदूरी पहले से उपार्जित नहीं की गई है, उसके अधिदायों की वसूली राज्य सरकार द्वारा बनाए गए उन नियमों के अध्यधीन होगी जिनमें उस परिमाण का, जिस तक ऐसे अधिदाय किए जा सकेंगे, और उन किस्तों का, जिनमें वे वसूल किए जा सकेंगे, विनियमन किया गया होगा ।
3[12क. उधारों की वसूली के लिए कटौतियां-धारा 7 की उपधारा (2) के खंड (चचच) के अधीन अनुदत्त उधारों की वसूली के लिए कटौतियां राज्य सरकार द्वारा बनाए गए उन नियमों के अध्यधीन होंगी जिनमें वह परिमाण जिस तक ऐसे उधार अनुदत्त किए जा सकेंगे और ब्याज की उस दर का जो उस पर संदेय होगी विनियमन किया गया होगा ।]
13. सहकारी सोसाइटियों को और बीमा स्कीमों में संदायों के लिए कटौतियां-धारा 7 की उपधारा (2) के खंड (ञ) 4[और खंड (ट)] के अधीन कटौतियां ऐसी शर्तों के अध्यधीन होंगी जैसी राज्य सरकार अधिरोपित करे ।
5[13क. रजिस्टरों और अभिलेखों का रखा जाना-(1) हर नियोजक अपने द्वारा नियोजित व्यक्तियों की, उनके द्वारा किए गए काम की उनको दी गई मजदूरी की, उनकी मजदूरी में से की गई कटौतियों की, उनके द्वारा दी गई रसीदों की ऐसी विशिष्टियों और अन्य ऐसी विशिष्टियों वाले ऐसे रजिस्टर और अभिलेख ऐसे प्ररूप में रखेगा, जैसा विहित किया जाए ।
(2) इस धारा के अधीन रखे जाने के लिए अपेक्षित हर रजिस्टर और अभिलेख, उसमें की गई अन्तिम प्रविष्टि की तारीख के पश्चात् तीन वर्ष की कालावधि के लिए, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए परिरक्षित किया जाएगा ।]
14. निरीक्षक-(1) 6[कारखाना अधिनियम, 1948 (1948 का 63) की धारा 8 की उपधारा (1) के अधीन] नियुक्त कारखाना निरीक्षक उन सब कारखानों की बाबत, जो उसे समनुदेशित स्थानीय सीमाओं के भीतर हों, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए निरीक्षक होगा ।
(2) राज्य सरकार (कारखाने को छोड़कर) किसी रेल में नियोजित सब व्यक्तियों की बाबत, जिन्हें यह अधिनियम लागू है, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए निरीक्षक नियुक्त कर सकेगी ।
(3) राज्य सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे अन्य व्यक्तियों को जिन्हें वह ठीक समझे, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए निरीक्षक नियुक्त कर सकेगी और उन स्थानीय सीमाओं को जिनके भीतर और उन कारखानों और 7[औद्योगिक या अन्य स्थापनों] के वर्ग को, जिनकी बाबत वे अपने कृत्यों का प्रयोग करेंगे, परिभाषित कर सकेगी ।
8[(4) निरीक्षक-
- ऐसी परीक्षा और जांच कर सकेगा जैसी वह यह अभिनिश्चित करने के लिए ठीक समझे कि इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों के उपबंधों का अनुपालन हो रहा है या नहीं;
- भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा सपरिषद् गवर्नर जनरल या शब्दों का लोप किया गया ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 8 द्वारा (1-2-1965 से) अन्तःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 9 द्वारा (1-2-1965 से) अन्तःस्थापित ।
- 1940 के अध्यादेश सं० 3 की धारा 3 द्वारा अन्तःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 10 द्वारा (1-2-1965 से) अन्तःस्थापित ।
- 1957 के अधिनियम सं० 68 की धारा 6 द्वारा (1-4-1958 से) कारखाना अधिनियम, 1934 की धारा 10 की उपधारा (1) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 9 द्वारा (15-10-1982 से) औद्योगिक स्थापनों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 11 द्वारा (1-2-1965 से) उपधारा (4) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(ख) ऐसी सहायता के साथ, यदि कोई हो, जिसे वह ठीक समझे, इस अधिनियम के उद्देश्यों के कार्यान्वयन के प्रयोजन के लिए किसी भी युक्तियुक्त समय पर किसी रेल, कारखाने या 1[औद्योगिक या अन्य स्थापन] के परिसर में प्रवेश कर सकेगा, उसका निरीक्षक कर सकेगा और उसकी तलाशी ले सकेगा;
(ग) किसी रेल या कारखाने 8[औद्योगिक या अन्य स्थापन] में नियोजित व्यक्तियों को मजदूरी का संदाय किए जाने का पर्यवेक्षण कर सकेगा;
(घ) इस अधिनियम के अनुसरण में रखे गए रजिस्टर या अभिलेख को लिखित आदेश द्वारा ऐसे स्थान पर, जो विहित किया जाए, पेश करने की अपेक्षा कर सकेगा और व्यक्तियों के ऐसे कथन, जिन्हें वह इस अधिनियम के प्रयोजनों के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक समझे, स्थल पर ही या अन्यत्र ले सकेगा;
(ङ) ऐस रजिस्टरों या दस्तावेजों को, जिन्हें वह इस अधिनियम के अधीन किसी ऐसे अपराध की बाबत, जिसके बारे में उसके पास यह विश्वास करने के कारण हों, कि वह नियोजक द्वारा किया गया है, सुसंगत समझता है, अभिगृहीत कर सकेगा या उनके प्रभागों की प्रतिलिपियां ले सकेगा;
(च) ऐसी अन्य शाक्तियों का प्रयोग कर सकेगा जो विहित की जाएं :
परन्तु इस उपधारा के अधीन कोई भी व्यक्ति किसी ऐसे प्रश्न का उत्तर देने या कोई ऐसा कथन करने के लिए विवश नहीं किया जाएगा, जो उसे किसी अपराध में फंसाने की प्रवृत्ति रखता हो ।
(4क) 2[दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2)] के उपबंध इस उपधारा के अधीन की तलाशी या अभिग्रहण को यावत्शक्य वैसे ही लागू होंगे जैसे वे किसी ऐसी तलाशी या अभिग्रहण को लागू होते हैं जो उक्त संहिता की 3[धारा 94] के अधीन निकाले गए वारण्ट के प्राधिकार के अधीन की जाती है ।]
(5) हर निरीक्षक भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) के अर्थ के अन्दर लोक सेवक समझा जाएगा ।
4[14क. निरीक्षकों को दी जाने वाली सुविधाएं-हर नियोजक निरीक्षक को इस अधिनियम के अधीन प्रवेश, निरीक्षण, पर्यवेक्षण, परीक्षा या जांच करने के लिए सभी युक्तियुक्त सुविधाएं देगा ।]
15. मजदूरी में से की गई कटौतियों से या मजदूरी के संदाय में हुए विलम्ब से उद्भूत दावे तथा विद्वेषपूर्ण या तंग करने वाले दावों के लिए शास्ति- 5[(1) समुचित सरकार, -
(क) किसी कर्मकार प्रतिकर आयुक्त को; या
(ख) केन्द्रीय सरकार के किसी ऐसे अधिकारी को जो, -
(i) प्रादेशिक श्रम आयुक्त के रूप में कृत्य कर रहा हो; या
(ii) ऐसे सहायक श्रम आयुक्त के रूप में कृत्य कर रहा हो जिसके पास कम-से-कम दो वर्ष का अनुभव हो; या
- राज्य सरकार के ऐसे अधिकारी को, जो सहायक श्रम आयुक्त से निम्न पंक्ति का न हो और जिसके पास कम-से-कम दो वर्ष का अनुभव हो; या
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 9 द्वारा (15-10-1982 से) औद्योगिक स्थापन के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 9 द्वारा (15-10-1982 से) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898ञ्ज् के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 9 द्वारा (15-10-1982 से) धारा 98ञ्ज् के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 12 द्वारा (1-2-1965 से) अन्तःस्थापित ।
- 2005 के अधिनियम सं० 41 की धारा 8 द्वारा प्रतिस्थापित ।
(घ) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) के अधीन या औद्योगिक विवादों के अन्वेषण और परिनिर्धारण के संबंध में उक्त राज्य में तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन गठित किसी श्रम न्यायालय या औद्योगिक अधिकरण के किसी पीठासीन अधिकारी को; या
(ङ) किसी सिविल न्यायालय के न्यायाधीश या न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में अनुभव रखने वाले किसी अन्य अधिकारी को,
किसी विनिर्दिष्ट क्षेत्र में नियोजित व्यक्तियों की या उनको संदत्त मजदूरी में से कटौतियों से या मजदूरी के संदाय में विलंब से उद्भूत हुए सभी दावों की, जिनके अन्तर्गत ऐसे दावों के आनुषंगिक सभी मामले भी हैं, सुनवाई करने और उनका विनिश्चय करने के लिए उस क्षेत्र के लिए प्राधिकारी के रूप में, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियुक्त कर सकेगी:
परन्तु जहां समुचित सरकार ऐसा करना आवश्यक समझती है वहां वह किसी विनिर्दिष्ट क्षेत्र के लिए एक से अधिक प्राधिकारी नियुक्त कर सकेगी और इस अधिनियम के अधीन उनके द्वारा किए जाने वाले कार्य के वितरण और आबंटन के लिए, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, उपबंध कर सकेगी ।]
(2) जहां कि इस अधिनियम के उपबन्धों के प्रतिकूल, कोई कटौती किसी नियोजित व्यक्तियों की मजदूरी में से की गई है या मजदूरी के किसी संदाय में विलम्ब हुआ है वहां ऐसा व्यक्ति स्वयं, या उसकी ओर से कार्य करने के लिए लिखित रूप में प्राधिकृत कोई विधि-व्यवसायी या रजिस्ट्रीकृत व्यवसाय संघ का कोई पदधारी, या इस अधिनियम के अधीन कोई निरीक्षक या उपधारा (1) के अधीन नियुक्त प्राधिकारी की अनुज्ञा से कार्य करने वाला कोई अन्य व्यक्ति, उपधारा (3) के अधीन के किसी निदेश के लिए आवेदन ऐसे प्राधिकारी से कर सकेगा :
परन्तु ऐसा हर आवेदन, यथास्थिति, उस तारीख से, जिसको मजदूरी में से कटौती की गई थी, या उस तारीख से, जिसको मजदूरी का संदाय किया जाना शोध्य हो गया था, 1[बारह मास] के भीतर उपस्थापित किया जाएगा:
परन्तु यह और भी कि यदि आवेदक उस प्राधिकारी का यह समाधान कर देता है कि ऐसी कालावधि के भीतर आवेदन न करने के लिए उसके पास पर्याप्त हेतुक था तो आवेदन 2[बारह मास] की उक्त कालावधि के पश्चात् भी ग्रहण किया जा सकेगा ।
3[(3) जब उपधारा (2) के अधीन कोई आवेदन ग्रहण किया गया है तब प्राधिकारी आवेदक की और नियोजक या अन्य व्यक्ति की, जो धारा 3 के अधीन मजदूरी के संदाय के लिए उत्तरदायी है, सुनवाई करेगा या उन्हें सुनवाई का अवसर देगा और यदि कोई अतिरिक्त जांच आवश्यक हो तो उसके पश्चात् किसी ऐसी अन्य शास्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना जिसका ऐसा नियोजक या अन्य व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन दायी है, नियोजित व्यक्ति को काटी गई रकम का प्रतिदाय करने या उस मजदूरी के, जिसमें विलम्ब हुआ है संदाय के साथ ऐसे प्रतिकर का संदाय करने का, जिसे प्राधिकारी उचित समझे और जो पूर्ववर्ती दशा में काटी गई रकम के दस गुने से अनधिक तथा पश्चात्वर्ती दशा में तीन हजार रुपए से अनधिक किन्तु एक हजार पांच सौ रुपए से अन्यून नहीं होगा, निदेश देगा और उस दशा में जिसमें काटी गई रकम या वह मजदूरी जिसमें विलंब हुआ है, आवेदन के निपटाए जाने के पहले संदत्त कर दी गई है तो दो हजार रुपए से अनधिक उतने प्रतिकर के संदाय का जितना प्राधिकारी ठीक समझे, निदेश दे सकेगा :
परन्तु इस अधिनियम के अधीन किसी दावे का निपटान, जहां तक साध्य हो, प्राधिकारी द्वारा दावे के रजिस्ट्रीकरण की तारीख से तीन मास की अवधि के भीतर किया जाएगा:
परन्तु यह और कि तीन मास की अवधि विस्तारित की जा सकेगी, यदि विवाद के दोनों पक्षकार किसी ऐसे सद्भाविक कारण से सहमत हों, जो प्राधिकारी द्वारा लेखबद्ध किया जाए, कि तीन मास की उक्त अवधि ऐसी अवधि के लिए विस्तारित की जाए जो विवाद के न्यायोचित रीति से निपटारे के लिए आवश्यक हो:
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 13 द्वारा (1-2-1965 से) छह मास के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 13 द्वारा (1-2-1965 से) छह मास के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2005 के अधिनियम सं० 41 की धारा 8 द्वारा प्रतिस्थापित ।
परन्तु यह भी कि ऐसी मजदूरी की दशा में जिसमें विलंब हुआ है, प्रतिकर के संदाय के लिए कोई निदेश नहीं दिया जाएगा यदि प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि विलंब-
(क) नियोजित व्यक्ति को संदेय रकम के संबंध में सद्भाविक गलती या सद्भाविक विवाद के कारण हुआ था; अथवा
(ख) किसी आपात के घटित होने या ऐसी असाधारण परिस्थितियों के विद्यमान होने के कारण हुआ था कि वह व्यक्ति जो मजदूरी के संदाय के लिए उत्तरदायी था, युक्तियुक्त तत्परता बरतने पर भी त्वरित संदाय करने में असमर्थ था; अथवा
(ग) नियोजित व्यक्ति को संदाय के लिए आवेदन करने या संदाय प्रतिगृहीत करने में असफलता के कारण हुआ था ।]
1[(4) यदि इस धारा के अधीन किसी आवेदन की सुनवाई करने वाले प्राधिकारी का समाधान हो जाता है कि-
(क) आवेदन या विद्वेषपूर्ण या तंग करने वाला है तो प्राधिकारी निदेश दे सकेगा कि आवेदन उपस्थापित करने वाला व्यक्ति नियोजक को या अन्य व्यक्ति को, जो मजदूरी का संदाय करने के लिए उत्तरदायी है, 2[तीन सौ पचहत्तर रुपए से अनधिक] शास्ति दे, अथवा
(ख) किसी ऐसी दशा में, जिसमें उपधारा (3) के अधीन प्रतिकर का संदत्त किया जाना निर्दिष्ट किया गया है, आवेदक को इस धारा के अधीन प्रतितोष की मांग करने के लिए विवश नहीं किया जाना चाहिए था, तो वह यह निदेश दे सकेगा कि नियोजक या अन्य व्यक्ति जो मजदूरी के संदाय के लिए उत्तरदायी है राज्य सरकार को 2[तीन सौ पचहत्तर रुपए से अनधिक] शास्ति दे ।
(4क) जहां कि किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के विषय में यह विवाद हो कि वह या वे नियोजक या नियोजित व्यक्ति का या के विधिक प्रतिनिधि है या हैं अथवा नहीं वहां ऐसे विवाद पर उस प्राधिकारी का विनिश्चय अन्तिम होगा ।
(4ख) इस धारा के अधीन की जांच भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धाराओं 193, 219 और 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी ।
(5) इस धारा के अधीन दी जाने के लिए निर्दिष्ट रकम-
(क) यदि प्राधिकारी मजिस्ट्रेट है तो उस प्राधिकारी द्वारा ऐसे वसूल की जा सकेगी मानो वह मजिस्ट्रेट के रूप में उसके द्वारा अधिरोपित जुर्माना हो; तथा
(ख) यदि प्राधिकारी मजिस्ट्रेट नहीं है तो किसी ऐसे मजिस्ट्रेट द्वारा, जिससे प्राधिकारी इस निमित्त आवेदन करे, ऐसे वसूली की जा सकेगी मानो वह उस मजिस्ट्रेट द्वारा अधिरोपित जुर्माना हो ।
16. असंदत्त समूह के दावों की बाबत एक ही आवेदन-(1) नियोजित व्यक्ति एक ही असंदत्त समूह के कहे जाते हैं यदि वे एक ही स्थापन द्वारा धारित हैं और 2[उनकी मजदूरी में से कटौती इस अधिनियम का उल्लंघन करते हुए एक ही हेतुक के लिए और एक ही मजदूरी-कालावधि या मजदूरी-कालावधियों के दौरान की गई है या] एक ही मजदूरी-कालावधि या मजदूरी-कालावधियों को उनकी मजदूरी धारा 5 द्वारा नियत दिन के पश्चात् असंदत्त रही है ।
(2) एक ही असंदत्त समूह में के कितने भी नियोजित व्यक्तियों की ओर से या बाबत एक ही आवेदन धारा 15 के अधीन उपस्थापित किया जा सकेगा, और ऐसी दशा में ऐसे 3[हर व्यक्ति को, जिसकी ओर से ऐसा आवेदन उपस्थापित किया गया है, धारा 15 की उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट परिमाण तक अधिकतम प्रतिकर अधिनिर्णीत किया जा सकेगा ।]
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 13 द्वारा (1-2-1965 से) उपधारा (4) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 14 द्वारा (1-2-1965 से) अन्तःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 14 द्वारा (1-2-1965 से) कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(3) प्राधिकारी एक ही असंदत्त समूह के व्यक्तियों की बाबत धारा 15 के अधीन उपस्थापित किए गए अलग-अलग लम्बित कितने ही आवेदनों पर कार्यवाही, उन्हें इस धारा की उपधारा (2) के अधीन उपस्थापित किया गया एक ही आवेदन मानकर कर सकेगा और उस उपधारा के उपबन्ध तदनुसार लागू होंगे ।
17. अपील-(1) 1[धारा 15 की उपधारा (2) के अधीन किए गए किसी आवेदन को या तो पूर्णतः या भागतः खारिज करने वाले किसी आदेश के विरुद्ध या उस धारा की उपधारा (3) या उपधारा (4) के अधीन दिए गए किसी निदेश के विरुद्ध अपील]-
(क) नियोजक या अन्य व्यक्ति द्वारा जो, धारा 3 के अधीन मजदूरी के संदाय के लिए उत्तरदायी है, उस दशा में जिसमें कि मजदूरी और प्रतिकर के रूप में दी जाने के लिए निदिष्ट कुल राशि तीन सौ रुपए से अधिक 2[या उस दशा में जिसमें कि ऐसा निदेश, नियोजक या उस अन्य व्यक्ति पर एक हजार रुपए से अधिक वित्तीय दायित्व अधिरोपित करने का प्रभाव रखता है,] अथवा
3[(ख) किसी नियोजित व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से कार्य करने के लिए लिखित रूप में प्राधिकृत किसी विधि-व्यवसायी या रजिस्ट्रीकृत व्यवसाय संघ के किसी पदधारी द्वारा, या इस अधिनियम के अधीन के किसी निरीक्षक द्वारा, या धारा 15 की उपधारा (2) के अधीन आवेदन करने के लिए प्राधिकारी से अनुज्ञा-प्राप्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा, उस दशा में जिसमें कि मजदूरी की ऐसी कुल रकम, जिसके लिए यह दावा किया गया है कि वह नियोजित व्यक्ति से विधारित की गई है, बीस रुपए से अधिक है, या जिसके लिए यह दावा किया गया है कि वह असंदत्त समूह से, जिसमें नियोजित व्यक्ति है या था, विधारित की गई है, पचाए रुपए से अधिक है, अथवा]
(ग) धारा 15 की 4[उपधारा (4)] के अधीन शास्ति देने के लिए निर्दिष्ट किसी व्यक्ति द्वारा,
प्रेसिडेंसी नगर 5॥। में लघुवाद न्यायालय के समक्ष और अन्यत्र जिला न्यायालय के समक्ष, उस तारीख से, जिसको 6[वह आदेश या निदेश] किया गया था, तीस दिन के भीतर की जा सकेगी ।
4[(1क) उपधारा (1) के खण्ड (क) के अधीन की कोई भी अपील तब तक नहीं होगी जब तक कि अपील के ज्ञापन के साथ प्राधिकारी का इस बात का प्रमाणपत्र न हो कि अपीलार्थी ने वह रकम निक्षिप्त कर दी है जो उस निदेश के अधीन संदेय है जिसके विरुद्ध अपील की गई है ।]
7[(2) उपधारा (1) में उपबन्धित के सिवाय, धारा 15 की उपधारा (2) के अधीन किए गए किसी आवेदन को या तो पूर्णतः या भागतः खारिज करने वाला कोई आदेश या उस धारा की उपधारा (3) या उपधारा (4) के अधीन दिया गया निदेश अन्तिम होगा ।]
4[(3) जहां कि कोई नियोजक इस धारा के अधीन अपील करता है वहां वह प्राधिकारी जिसके विनिश्चय के विरुद्ध अपील की गई है अपने पास निक्षिप्त किसी राशि का संदाय, अपील का विनिश्चय होने तक, विधारित कर सकेगा और यदि उपधारा (1) में निर्दिष्ट न्यायालय द्वारा ऐसा निर्दिष्ट किया गया हो तो विधारित करेगा ।
(4) उपधारा (1) में निर्दिष्ट न्यायालय, यदि वह ठीक समझे, कोई भी विधि-प्रश्न विनिश्चय के लिए उच्च न्यायालय को निवेदित कर सकेगा और यदि वह ऐसा करता है तो वह उस प्रश्न को ऐसे विनिश्चय के अनुरूप ही विनिश्चित करेगा ।]
- 1957 के अधिनियम सं० 68 की धारा 7 द्वारा (1-4-1958 से) धारा 15 की उपधारा (3) या उपधारा (4) के अधीन किए गए किसी निदेश के विरुद्ध अपील के स्थान पर प्रतिस्थापित । मोटे अक्षरों के छपे हुए शब्द तथा अंक 1937 के अधिनियम सं० 20 की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा उपधारा (3) के स्थान पर प्रतिस्थापित किए गए थे ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 15 द्वारा (1-2-1965 से) अन्तःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 15 द्वारा (1-2-1965 से) खण्ड (ख) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1937 के अधिनियम सं० 20 की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा उपधारा (5) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा रंगून में शब्दों का लोप किया गया ।
- 1957 के अधिनियम सं० 68 की धारा 7 द्वारा (1-4-1958 से) निदेश के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1957 के अधिनियम सं० 68 की धारा 7 द्वारा (1-4-1958 से) उपधारा (2) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
1[17क. नियोजक या अन्य व्यक्ति की, जो मजदूरी के संदाय के लिए उत्तरदायी है, सम्पत्ति की सशर्त कुर्की-(1) जहां कि धारा 15 की उपधारा (2) के अधीन आवेदन किए जाने के पश्चात् किसी भी समय प्राधिकारी का या जहां कि किसी नियोजित व्यक्ति द्वारा या 2[उनकी ओर से कार्य करने के लिए लिखित रूप में प्राधिकृत किसी विधि-व्यवसायी या रजिस्ट्रीकृत व्यवसाय संघ के किसी पदधारी द्वारा, या इस अधिनियम के अधीन के किसी निरीक्षक द्वारा या धारा 15 की उपधारा (2) के अधीन आवेदन करने के लिए प्राधिकारी से अनुज्ञा-प्राप्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा] धारा 17 के अधीन अपील फाइल कर दी जाने के पश्चात् किसी भी समय उस धारा में निर्दिष्ट न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि यह सम्भाव्य है कि नियोजक या अन्य व्यक्ति जो धारा 3 के अधीन मजदूरी के संदाय के लिए उत्तरदायी है किसी ऐसी रकम का, जो धारा 15 या धारा 17 के अधीन संदत्त की जाने के लिए निर्दिष्ट की जाए, अपवंचन करे तो, यथास्थिति, वह प्राधिकारी या वह न्यायालय, उन दशाओं में के सिवाय जहां कि प्राधिकारी या न्यायालय की यह राय है कि विलम्ब करने से न्याय के उद्देश्य विफल हो जाएंगे, नियोजक को या अन्य व्यक्ति को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् नियोजक या अन्य व्यक्ति को जो मजदूरी के संदाय के लिए उत्तरदायी है, संपत्ति में से उतनी कुर्क करने का निदेश दे सकेगा जितनी उस प्राधिकारी या न्यायालय की राय में उस रकम के, जो निदेश के अधीन संदेय हो, चुकाए जाने के लिए पर्याप्त हो ।
(2) सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन होने वाले निर्णय के पहले की कुर्की से संबंधित उस संहिता के उपबन्ध, यावत्शक्य, उपधारा (1) के अधीन कुर्की के किसी भी आदेश को लागू होंगे ।]
18. धारा 15 के अधीन नियुक्त प्राधिकारियों की शक्तियां-धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त हर प्राधिकारी को साक्ष्य लेने, साक्षियों को हाजिर कराने और दस्तावेज पेश करने को विवश करने के प्रयोजन के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन के सिविल न्यायालय की सभी शक्तियां प्राप्त होंगी और हर प्राधिकारी 3[दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 के और अध्याय 26 के] सभी प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
19. [कतिपय दशाओं में नियोजक से वसूल करने की शक्ति ।]-मजदूरी संदाय (संशोधन) अधिनियम, 1964 (1964 का 53) की धारा 17 द्वारा (1 फरवरी, 1965 से) निरसित ।
20. अधिनियम के अधीन के अपराधों के लिए शास्ति-(1) जो कोई किसी नियोजित व्यक्ति को मजदूरी का संदाय करने के लिए उत्तरदायी होते हुए निम्नलिखित धाराओं के अर्थात् 4[धारा 5 की उपधारा (4) के सिवाय उस धारा के, धारा 7 के, धारा 8 की उपधारा (8) के सिवाय उस धारा के, धारा 9क, धारा 10 की उपधारा 2 के सिवाय उस धारा के और धारा 11 से धारा 13 तक के], जिनके अन्तर्गत ये दोनों धाराएं आती हैं, उपबंधों में से किन्हीं का भी उल्लंघन करेगा, वह 5[जुर्माने से, 6[एक हजार पांच सौ रुपए से कम नहीं होगा किन्तु जो सात हजार पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा] दण्डनीय होगा ।
(2) जो कोई धारा 4, 7[धारा 5 की उपधारा (4), धारा 6, धारा 8 की उपधारा (8), धारा 10 की उपधारा (2)] या धारा 25 के उपबन्धों का उल्लंघन करेगा, वह 4[जुर्माने से, जो 8[तीन हजार सात सौ पचास रुपए] तक का हो सकेगा] दण्डनीय होगा ।
9[(2क) जो कोई, जिससे अधिनियम की धारा 3 के अधीन किसी व्यक्ति को नामनिर्दिष्ट या अभिहित करने की अपेक्षा की गई है, ऐसा करने में असफल रहेगा तो ऐसा व्यक्ति जुर्माने से, जो तीन हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।]
1[(3) जो कोई इस अधिनियम के अधीन कोई अभिलेख या रजिस्टर रखने के लिए या कोई जानकारी या विवरणी देने के लिए अपेक्षित होते हुए-
- 1957 के अधिनियम सं० 68 की धारा 8 द्वारा (1-4-1958 से) अन्तःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 16 द्वारा (1-2-1965 से) कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 10 द्वारा (15-10-1982 से) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 195 के और अध्याय 35 के” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 18 द्वारा (1-2-1965 से) धारा 5 तथा धाराओं 7 से 13 तक के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2005 के अधिनियम सं० 41 की धारा 9 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 11 द्वारा (15-10-1982 से) जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 18 द्वारा (1-2-1965 से) धारा 6 के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 11 द्वारा (15-10-1982 से) दो सौ रुपए के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2005 के अधिनियम सं० 41 की धारा 9 द्वारा अंतःस्थापित ।
(क) ऐसा रजिस्टर या अभिलेख रखने में असफल रहेगा; अथवा
(ख) ऐसी जानकारी या विवरणी देने से जानबूझकर इंकार करेगा या उसे देने में विधिपूर्ण प्रतिहेतु के बिना उपेक्षा करेगा; अथवा
(ग) कोई ऐसी जानकारी या विवरणी जानबूझकर देगा या दिलवाएगा जिसका मिथ्या होना उसे ज्ञात है; अथवा
(घ) इस अधिनियम के अधीन दी जाने के लिए अपेक्षित किसी भी जानकारी को अभिप्राप्त करने के लिए आवश्यक किसी भी प्रश्न का उत्तर देने से इंकार करेगा या जानबूझकर मिथ्या उत्तर देगा,
वह ऐसे हर एक अपराध के लिए 4[जुर्माने से, 5[जो एक हजार पांच सौ रुपए से कम नहीं होगा किन्तु जो सात हजार पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा,]] दण्डनीय होगा ।
(4) जो कोई-
(क) निरीक्षक के इस अधिनियम के अधीन के कर्तव्यों के निर्वहन में जानबूझकर बाधा डालेगा; अथवा
(ख) निरीक्षक को किसी भी रेल, कारखाने या 2[औद्योगिक या अन्य स्थापन] के संबंध में इस अधिनियम के द्वारा या अधीन प्राधिकृत प्रवेश, निरीक्षण, परीक्षा, पर्यवेक्षण या जांच करने के लिए कोई युक्तियुक्त सुविधा देने से इंकार करेगा या देने में जानबूझकर उपेक्षा करेगा, अथवा
(ग) इस अधिनियम के अनुसरण में रखे गए किसी रजिस्टर या अन्य दस्तावेज को निरीक्षक की मांग पर पेश करने से जानबूझकर इंकार करेगा, अथवा
(घ) इस अधिनियम के अधीन अपने कर्तव्यों के अनुसरण में कार्य करने वाले किसी निरीक्षक के समक्ष किसी व्यक्ति को उपसंजात होने से या उस निरीक्षक द्वारा उसकी परीक्षा किए जाने से निवारित करेगा या निवारित करने का प्रयत्न करेगा या कोई ऐसी बात करेगा जिसके बारे में उसके पास यह विश्वास करने का कारण हो कि उससे उस व्यक्ति का ऐसे निवारित किया जाना संभाव्य है वह 3[जुर्माने से, 4[जो एक हजार पचास सौ रुपए से कम नहीं होगा किन्तु जो सात हजार पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा,]] दण्डनीय होगा ।
(5) यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया है, उसी उपबन्ध के उल्लंघन को अन्तर्वलित करने वाले किसी अपराध का पुनः दोषी होगा तो वह पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि पर, कारावास से, 5[जिसकी अवधि एक मास से कम नहीं होगी किन्तु जो छह मास तक की हो सकेगी और 2[जुर्माने से जो तीन हजार सात सौ पचास] रुपए से कम नहीं होगा किन्तु जो बाईस हजार पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा,] दण्डनीय होगा:
परन्तु इस उपधारा के प्रयोजन के लिए किसी ऐसी दोषसिद्धि का संज्ञान नहीं किया जाएगा जो उस तारीख से, जिसको उस अपराध का, जिसके लिए दण्ड दिया जा रहा है, किया जाना निरीक्षक को ज्ञात हुआ था, दो वर्षों से अधिक पूर्व की गई थी ।
(6) यदि कोई व्यक्ति किसी नियोजित व्यक्ति की मजदूरी प्राधिकारी द्वारा इस निमित्त नियत तारीख तक देने में असफल रहेगा या जानबूझकर उपेक्षा करेगा तो वह, किसी अन्य कार्रवाई पर, जो उसके विरुद्ध की जा सकती है,
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 18 द्वारा (1-2-1965 से) अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 11 द्वारा (15-10-1982 से) औद्योगिक स्थापन के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2005 के अधिनियम सं० 41 की धारा 9 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 11 द्वारा (15-10-1982 से) जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 11 द्वारा (15-10-1982 से) जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी या जुर्माने से जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, अतिरिक्त जुर्माने से, जो हर एक ऐसे दिन के लिए, जिसमें ऐसी असफलता या उपेक्षा चालू रहती है, 2[ 1[सात सौ पचास रुपए]] तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।]
21. अपराधों के विचारण में प्रक्रिया-(1) कोई भी न्यायालय, धारा 20 की उपधारा (1) के अधीन के किसी अपराध के लिए किसी व्यक्ति के विरुद्ध परिवाद का संज्ञान तब के सिवाय नहीं करेगा जब कि अपराध गठित करने वाले तथ्यों की बाबत आवेदन धारा 15 के अधीन उपस्थापित किया गया हो और उसे पूर्णतः या भागतः मंजूर कर लिया गया हो और धारा 15 के अधीन सशक्त प्राधिकारी ने या ऐसे आवेदन को मंजूर करने वाले अपील न्यायालय ने परिवाद किए जाने की मंजूरी दे दी हो ।
(2) धारा 20 की उपधारा (1) के अधीन किसी अपराध के लिए किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई परिवाद किए जाने की मंजूरी देने से पूर्व, यथास्थिति, धारा 15 के अधीन सशक्त प्राधिकारी या अपील न्यायालय ऐसे व्यक्ति को ऐसी मंजूरी देने के विरुद्ध हेतुक दर्शित करने का अवसर देगा, और यदि ऐसा व्यक्ति उस प्राधिकारी या न्यायालय का समाधान कर देता है कि उसका व्यतिक्रम-
(क) नियोजित व्यक्ति को संदेय रकम के संबंध में सद्भाविक गलती या सद्भाविक विवाद के कारण हुआ था, अथवा
(ख) ऐसे आपात के घटित होने या ऐसी असाधारण परिस्थितियों के अस्तित्व के कारण हुआ था कि वह व्यक्ति जो मजदूरी के संदाय के लिए उत्तरदायी था, युक्तियुक्त तत्परता बरतने पर भी, सत्वर संदाय करने में असमर्थ था, अथवा
(ग) नियोजित व्यक्ति को संदाय के लिए आवेदन करने या संदाय को प्रतिगृहीत करने में असफलता के कारण हुआ था,
तो मंजूरी न दी जाएगी ।
(3) कोई भी न्यायालय धारा 20 की उपधारा (3) या उपधारा (4) के अधीन दण्डनीय बनाए गए किसी नियम के उल्लंघन का संज्ञान, इस अधिनियम के अधीन निरीक्षक द्वारा या उसकी मंजूरी से किए गए परिवाद पर करने के सिवाय, न करेगा ।
2[(3क) कोई भी न्यायालय धारा 20 की उपधारा (3) या उपधारा (4) के अधीन दण्डनीय किसी भी अपराध का संज्ञान, इस अधिनियम के अधीन के निरीक्षक द्वारा या उसकी मंजूरी से किए गए परिवाद पर करने के सिवाय, न करेगा ।]
(4) धारा 20 की उपधारा (1) के अधीन के किसी अपराध के लिए जुर्माना अधिरोपित करने में न्यायालय धारा 15 के अधीन की गई कार्यवाहियों में अभियुक्त के विरुद्ध पहले ही अधिनिर्णीत प्रतिकर की रकम को ध्यान में रखेगा ।
22. वादों का वर्जन-कोई भी न्यायालय मजदूरी की या मजदूरी में से की गई किसी कटौती की वसूली के लिए किसी वाद को वहां तक ग्रहण न करेगा जहां तक कि इस प्रकार दावाकृत राशि-
(क) धारा 15 के अधीन किए गए उस आवेदन का, जो वादी द्वारा उपस्थापित किया गया है और जो उस धारा के अधीन नियुक्त प्राधिकारी के समक्ष लम्बित है, या धारा 17 के अधीन किसी अपील का विषय है; अथवा
(ख) धारा 15 के अधीन वादी के पक्ष में दिए गए किसी निदेश का विषय रही है; अथवा
(ग) की बाबत यह न्यायनिर्णय धारा 15 के अधीन किसी कार्यवाही में हो चुका है कि वह वादी को देय नहीं है; अथवा
(घ) धारा 15 के अधीन आवेदन द्वारा वसूल की जा सकती थी ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 11 द्वारा (15-10-1982 से) पचास रुपए के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 19 द्वारा (1-2-1965 से) अन्तःस्थापित ।
1[22क. सद्भावपूर्वक की गई कार्यवाही के लिए परित्राण-कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए सरकार या सरकार के किसी आफिसर के विरुद्ध न होगी ।]
23. संविदा द्वारा त्याग-इस अधिनियम के प्रारम्भ के चाहे पूर्व चाहे पश्चात् की गई कोई संविदा या करार जिसके द्वारा कोई नियोजित व्यक्ति इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त किसी अधिकार का त्याग कर देता है वहां तक बातिल और शून्य होगा जहां तक वह ऐसे अधिकार से उसे वंचित करने के लिए तात्पर्यित है ।
2[24. शक्तियों का प्रत्यायोजन-समुचित सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा प्रयोक्तव्य किसी शक्ति का, ऐसे विषयों की बाबत और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, यदि कोई हो, जो निदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, प्रयोग, -
(क) जहां समुचित सरकार केन्द्रीय सरकार है, वहां केन्द्रीय सरकार के अधीनस्थ ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा या राज्य सरकार द्वारा अथवा राज्य सरकार के अधीनस्थ ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए;
(ख) जहां समुचित सरकार राज्य सरकार है, वहां राज्य सरकार के अधीनस्थ ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, भी किया जा सकेगा ।]
25. अधिनियम की संक्षिप्तियों का सूचना द्वारा संप्रदर्शन- वह व्यक्ति जो 3[कारखाने या किसी औद्योगिक या अन्य स्थापन में नियोजित] व्यक्तियों को मजदूरी का संदाय करने के लिए उत्तरदायी है 4[ऐसे कारखाने या औद्योगिक या अन्य स्थापन में] अंग्रेजी में 5[और कारखाने या औद्योगिक या अन्य स्थापन में] नियोजित व्यक्तियों की बहुसंख्या की भाषा में एक सूचना संप्रदर्शित कराएगा, जिसमें इस अधिनियम की और तद्धीन बनाए गए नियमों की ऐसी संक्षिप्तियां अन्तर्विष्ट होंगी जैसी विहित की जाएं ।
6[25क. नियोजित व्यक्ति की मृत्यु की दशा में असंवितरित मजदूरी का संदाय-(1) अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए किसी नियोजित व्यक्ति को मजदूरी के रूप में संदेय भी रकमें, यदि ऐसी रकमों का संदाय करने के पूर्व उसकी मृत्यु के कारण या उसके बारे में कोई जानकारी न होने के कारण संदत्त नहीं की जा सकी हैं या संदत्त नहीं की जा सकती हैं तो, -
(क) इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार इस निमित्त उसके द्वारा नामनिर्दिष्ट व्यक्ति को संदत्त की जाएंगी;
(ख) जहां ऐसा कोई नामनिर्देशन नहीं किया गया है या जहां किसी कारण से ऐसी रकमें इस प्रकार नामनिर्दिष्ट व्यक्ति को संदत्त नहीं की जा सकती हैं वहां उन्हें विहित प्राधिकारी के पास निक्षिप्त किया जाएगा जो इस प्रकार निक्षिप्त रकमों के बारे में कार्यवाही ऐसी रीति से करेगा जो विहित की जाए ।
(2) जहां किसी नियोजित व्यक्ति को मजदूरी के रूप में संदेय सभी रकमें उपधारा (1) के उपबन्धों के अनुसार-
(क) नियोजक ने नियोजित व्यक्ति द्वारा नामनिर्दिष्ट व्यक्ति को संदत्त कर दी है; या
(ख) नियोजक ने विहित प्राधिकारी के पास निक्षिप्त कर दी है,
वहां नियोजक उन मजदूरियों का संदाय करने के अपने दायित्व से उन्मोचित हो जाएगा ।]
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 20 द्वारा (1-2-1965 से) अन्तःस्थापित ।
- 2005 के अधिनियम सं० 41 की धारा 10 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 12 द्वारा (15-10-1982 से) कारखाने में नियोजित के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 12 द्वारा (15-10-1982 से) ऐसे कारखाने में के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 12 द्वारा (15-10-1982 से) और कारखाने में के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 13 द्वारा (1-3-1994 से) अंतःस्थापित ।
26. नियम बनाने की शक्ति-(1) राज्य सरकार धाराओं 15 और 17 में निर्दिष्ट प्राधिकारियों और न्यायालयों द्वारा अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया को विनियमित करने के लिए नियम बना सकेगी ।
(2) राज्य सरकार 1॥। इस अधिनियम के उपबन्धों को क्रियान्वित करने के प्रयोजन के लिए नियम, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(3) विशिष्टतः और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उपधारा (2) के अधीन बनाए गए नियम-
(क) ऐसे अभिलेखों, रजिस्टरों, विवरणियों और सूचनाओं का, जो अधिनियम के प्रवर्तन के लिए आवश्यक हों, रखा जाना अपेक्षित कर सकेंगे 2[तथा उनका प्ररूप और ऐसे रजिस्टरों या अभिलेखों में प्रविष्ट की जाने वाली विशिष्टियां कर सकेंगे];
(ख) उस परिसर में, जिसमें वह काम होता है जिसके लिए नियोजन है, किसी सहजदृश्य स्थान में ऐसी सूचनाओं का संप्रदर्शन अपेक्षित कर सकेंगे जिनमें मजदूरी की वे दरें विनिर्दिष्ट होगी जो ऐसे परिसर में नियोजित व्यक्तियों को संदेय हों;
(ग) ऐसे बाटों, मापों और तोलने की मशीनों के नियमित निरीक्षण के लिए उपबन्ध कर सकेंगे जिसका नियोजित व्यक्तियों की मजदूरी की जांच करने या उसे अभिनिश्चित करने में उपयोग नियोजकों द्वारा किया जाता है;
(घ) उन दिनों की सूचना देने की रीति विहित कर सकेंगे जिनको मजदूरी दी जाएगी;
(ङ) उन कार्यों और लोपों को, जिनकी बाबत जुर्माने अधिरोपित किए जा सकेंगे, धारा 8 की उपधारा (1) के अधीन अनुमोदित करने के लिए सक्षम प्राधिकारी विहित कर सकेंगे;
(च) धारा 8 के अधीन जुर्माना अधिरोपित करने की और धारा 10 में निर्दिष्ट कटौतियां करने की प्रक्रिया विहित कर सकेंगे;
(छ) ऐसी शर्तें विहित कर सकेंगे जिनके अध्यधीन धारा 9 की उपधारा (2) के परन्तुक के अधीन कटौतियां की जा सकेंगी;
(ज) उन प्रयोजनों को, जिनके लिए जुर्मानों के आगम का व्यय किया जाएगा, अनुमोदित करने के लिए सक्षम प्राधिकारी विहित कर सकेंगे;
(झ) धारा 12 के खण्ड (ख) के प्रति निर्देश से वह परिमाण, जिस तक अधिदाय दिए जा सकेंगे और वे किस्तें, जिनमें वे वसूल किए जा सकेंगे, विहित कर सकेंगे;
3[(झक) धारा 12क के प्रति निर्देश से वह परिमाण जिस तक उधार अनुज्ञात किए जा सकेंगे और ब्याज की वह दर जो उन पर संदेय होगी, विहित कर सकेंगे;
(झख) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए निरीक्षकों की शक्तियां विहित कर सकेंगे;]
(ञ) ऐसे खर्चों के मापमान विनियमित कर सकेंगे जो इस अधिनियम के अधीन की कार्यवाहियों में अनुज्ञात किए जा सकेंगे;
(ट) इस अधिनियम के अधीन की किन्हीं भी कार्यवाहियों की बाबत संदेय न्यायालय फीसों की रकम विहित कर सकेंगे; 4॥।
- भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा सपरिषद् गवर्नर जनरल के नियन्त्रणाधीन शब्दों का लोप किया गया ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 22 द्वारा (1-2-1965 से) और उसका प्ररूप विहित करेंगे के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 22 द्वारा (1-2-1965 से) अन्तःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 22 द्वारा (1-2-1965 से) और शब्द का लोप किया गया ।
(ठ) धारा 25 द्वारा अपेक्षित सूचनाओं में अन्तर्विष्ट की जाने वाली संक्षिप्तियां विहित कर सकेंगे; 1॥।
2[(ठक) वह प्ररूप और रीति, जिसमें धारा 25क की उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए नामनिर्देशन किए जा सकते हैं, ऐसे किसी नामनिर्देशन का रद्दकरण या परिवर्तन, अथवा नामनिर्देशिती की नामनिर्देशन करने वाले व्यक्ति से पूर्व मृत्यु हो जाने की दशा में कोई नया नामनिर्देशन किया जाना और ऐसे नामनिर्देशनों से सम्बन्धित अन्य विषय विहित कर सकेंगे;
(ठख) वह प्राधिकारी, जिसके पास धारा 25क की उपधारा (1) के खण्ड (2) के अधीन निक्षिप्त किए जाने के लिए अपेक्षित रकमें निक्षिप्त की जाएंगी और वह रीति, जिसमें ऐसा प्राधिकारी उस खण्ड के अधीन अपने पास निक्षिप्त रकमों के बारे में कार्यवाही करेगा, विहित कर सकेंगे;]
3[(ड) अन्य किसी विषय का उपबंध कर सकेंगे जो विहित किया जाना है या किया जाए ।]
(4) इस धारा के अधीन नियम बनाने में, राज्य सरकार यह उपबंध कर सकेगी कि नियम का उल्लंघन जुर्माने से, 3[जो सात सौ रुपए से कम नहीं होगा किन्तु जो एक हजार पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा], दंडनीय होगा ।
(5) इस धारा के अधीन बनाए गए सभी नियम पूर्व प्रकाशन की शर्त के अध्यधीन होंगे और वह तारीख जो साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 23 के खण्ड (3) के अधीन विनिर्दिष्ट की जाएगी, उस तारीख से, जिसको प्रस्थापित नियमों का प्रारूप प्रकाशित हुआ था, तीन मास से कम की नहीं होगी ।
4[(6) इस धारा के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगी । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन समहत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
5[(7) इस धारा के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाए गए सभी नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखे जाएंगे ।]
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- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 14 द्वारा (15-10-1982 से) तथा शब्द का लोप किया गया ।
- 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 14 द्वारा (15-10-1982 से) अन्तःस्थापित ।
- 2005 के अधिनियम सं० 41 की धारा 11 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं० 53 की धारा 22 द्वारा उपधारा (6) अंतःस्थापित । तत्पश्चात् 1982 के अधिनियम सं० 38 की धारा 14 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2005 के अधिनियम सं० 41 की धारा 11 द्वारा अंतःस्थापित ।

