अन्तर्राज्यिक जल विवाद अधिनियम, 1956
(1956 का अधिनियम संख्यांक 33)
[28 सितम्बर, 1956]
अन्तर्राज्यिक नदियों और नदी-दूनों के जल से सम्बन्धित विवादों के
न्यायनिर्णयन के लिए उपबंध करने हेतु
अधिनियम
भारत गणराज्य के सातवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम और विस्तार-(1) यह अधिनियम का संक्षिप्त नाम अन्तर्राज्यिक जल विवाद अधिनियम, 1956 है ।
(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो-
(क) “विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(ख) “अधिकरण" से धारा 4 के अधीन गठित जल विवाद अधिकरण अभिप्रेत है ;
(ग) “जल विवाद" से दो या अधिक राज्य सरकारों के बीच कोई ऐसा विवाद या मतभेद अभिप्रेत है जो-
(i) किसी अन्तर्राज्यिक नदी या नदी-दूनों के जल के उपयोग, वितरण या नियंत्रण के बारे में हो ; अथवा
(ii) ऐसे जल के उपयोग, वितरण या नियंत्रण से संबंधित किसी करार के निबन्धनों के निर्वचन या ऐसे करार के कार्यान्वयन के बारे में हो ; अथवा
(iii) धारा 7 में अन्तर्विष्ट प्रतिषेध के उल्लंघन में किसी जल दर के उदग्रहण के बारे में हो ।
3. जल विवादों के बारे में राज्य सरकारों द्वारा परिवाद-यदि किसी राज्य की सरकार को यह प्रतीत होता है कि दूसरे राज्य की सरकार के साथ जल विवाद इस कारण उत्पन्न हो गया है या होने की संभावना है कि अंतर्राज्यिक नदी या नदी-दून के जल में राज्य या उसके किन्हीं निवासियों के हित पर निम्नलिखित किसी कारण से प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है या पड़ना संभाव्य है, अर्थात् :-
(क) दूसरे राज्य द्वारा की गई या प्रस्थापित किसी कार्यपालक कार्रवाई अथवा पारित या प्रस्थापित किसी विधान से ; अथवा
(ख) जल के उपयोग, वितरण या नियंत्रण के बारे में दूसरे राज्य या उसके किसी प्राधिकारी के अपनी शक्तियों में से किसी का प्रयोग न करने से ; अथवा
(ग) जल के उपयोग, वितरण या नियंत्रण से संबंधित किसी करार के निबन्धनों के दूसरे राज्य द्वारा कार्यान्वित न किए जाने से,
तो राज्य सरकार ऐसे प्ररूप और रीति में, जो विहित की जाए, न्यायनिर्णयन के लिए अधिकरण को जल विवाद निर्देशित करने का केन्द्र से अनुरोध कर सकेगी ।
4. अधिकरण का गठन-(1) जब धारा 3 के अधीन कोई अनुरोध जल विवाद के बारे में किसी राज्य सरकार से प्राप्त होता है और केन्द्रीय सरकार की यह राय हो सकती हो कि जल विवाद बातचीत से तय नहीं किया जा सकता है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा जल विवाद के न्यायनिर्णयन के लिए जल विवाद अधिकरण का गठन करेगी ।
[(2) अधिकरण में एक अध्यक्ष और दो अन्य सदस्य होंगे जो इस निमित्त भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा उन व्यक्तियों में से नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे जो ऐसे नामनिर्देशन के समय उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हों ।]
(3) अपने समक्ष कार्यवाही में राय देने के लिए अधिकरण दो या अधिक व्यक्तियों को असेसर के रूप में नियुक्त कर सकेगा ।
5. जल विवादों का न्यायनिर्णयन-(1) जब अधिकरण का धारा 4 के अधीन गठन हो गया हो, तो केन्द्रीय सरकार, धारा 8 में अन्तर्विष्ट प्रतिषेधों के अध्यधीन जल विवाद और जल विवाद से सम्बद्ध या सुसंगत प्रतीत होने वाले किसी मामले को न्यायनिर्णयन के लिए अधिकरण को निर्दिष्ट करेगी ।
(2) अधिकरण उन मामलों का अन्वेषण करेगा जो उसको निर्दिष्ट किए गए हैं और वह केन्द्रीय सरकार को एक रिपोर्ट भेजेगा जिसमें उसके द्वारा पाए गए तथ्य और उसको निर्दिष्ट मामलों पर उसके द्वारा दिया गया विनिश्चय उपवर्णित होगा ।
(3) यदि, अधिकरण के विनिश्चय पर विचार करने पर, केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार की यह राय है कि उसमें अन्तर्विष्ट किसी बात का स्पष्टीकरण अपेक्षित है या किसी मामले पर, जिसे अधिकरण को मूलतः निर्दिष्ट नहीं किया गया है, मार्गदर्शन की आवश्यकता है तो, यथास्थिति, केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार, विनिश्चय की तारीख से तीन माह के अंदर, मामले पर विचार करने के लिए अधिकरण को पुनःनिर्दिष्ट कर सकेगी ; और ऐसे निर्देश पर अधिकरण एक और रिपोर्ट ऐसे स्पष्टीकरण या मार्गदर्शन देते हुए जो वह ठीक समझे केन्द्रीय सरकार को भेजेगा और ऐसी दशा में, अधिकरण का विनिश्चय तद्नुसार उपान्तरित किया गया समझा जाएगा ।
[(4) यदि अधिकरण के सदस्यों में किसी बात पर मतभेद होता है, तो उस बात का विनिश्चय बहुमत से किया जाएगा ।]
[5क. रिक्तियों का भरा जाना-यदि किसी कारण से अधिकरण के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य का पद (अस्थायी अनुपस्थिति से अन्यथा) खाली होता है तो ऐसी रिक्ति धारा 4 की उपधारा (2) के उपबन्धों के अनुसार मुख्य न्यायाधीश द्वारा इस निमित्त नामनिर्देशित किए जाने वाले व्यक्ति द्वारा भरी जाएगी और अधिकरण को निर्दिष्ट मामले का अन्वेषण रिक्ति भरे जाने के पश्चात् अधिकरण द्वारा उसी प्रक्रम से जहां कि रिक्ति हुई थी, जारी रखा जा सकेगा ।]
6. अधिकरण के विनिश्चय का प्रकाशन-केन्द्रीय सरकार अधिकरण के विनिश्चय का प्रकाशन राजपत्र में करेगी और वह विनिश्चय अन्तिम होगा और विवाद के पक्षकारों पर आबद्धकर होगा तथा उनके द्वारा कार्यान्वित किया जाएगा ।
[6क. अधिकरण के विनिश्चय के कार्यान्वयन के लिए स्कीमें बनाने की शक्ति-(1) धारा 6 के उपबन्धों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा अधिकरण के विनिश्चय को प्रभावी करने के लिए आवश्यक सभी विषयों की बाबत उपबन्ध करने के लिए कोई स्कीम या स्कीमें विरचित कर सकेगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन विरचित स्कीमों में निम्नलिखित के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा, अर्थात् :-
(क) अधिकरण के विनिश्चय या निदेशों के कार्यान्वयन के लिए किसी प्राधिकरण की (चाहे उसका नाम प्राधिकरण है या कोई समिति या अन्य निकाय) स्थापना,
(ख) प्राधिकरण की संरचना, अधिकारिता, शक्तियां और कृत्य, तथा ऐसे प्राधिकरण के सदस्यों की पदावधि और सेवा की अन्य शर्तें, उनके द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया तथा उनके रिक्त स्थानों को भरने की रीति ;
(ग) प्रति वर्ष प्राधिकरण के किए जाने वाले अधिवेशनों की न्यूनतम संख्या, ऐसे अधिवेशनों की गणपूर्ति तथा उनके लिए प्रक्रिया ;
(घ) प्राधिकरण द्वारा किसी स्थायी, तदर्थ या अन्य समितियों की नियुक्ति ;
(ङ) प्राधिकरण द्वारा किसी सचिव और अन्य कर्मचारिवृन्द का नियोजन, ऐसे कर्मचारिवृन्द के वेतन, भत्ते तथा सेवा की अन्य शर्तें ;
(च) प्राधिकरण द्वारा किसी निधि का गठन, ऐसी निधि में जमा की जा सकने वाली रकमें और वे व्यय जिनके लिए ऐसी निधि का उपयोग किया जा सकता है ;
(छ) वह प्ररूप और रीति जिसमें प्राधिकरण लेखा रखेगा ;
(ज) प्राधिकरण द्वारा अपने क्रियाकलापों की बाबत किसी वार्षिक रिपोर्ट का प्रस्तुत किया जाना ;
(झ) प्राधिकरण के विनिश्चय, जो पुनर्विलोकन के अधीन होंगे ;
(ञ) ऐसा पुनर्विलोकन करने के लिए किसी समिति का गठन और ऐसी समिति द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया ; और
(ट) कोई अन्य विषय जो अधिकरण के विनिश्चय या निदेशों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए आवश्यक या उचित है ।
(3) किसी अधिकरण के विनिश्चय को प्रभावी करने के लिए किसी प्राधिकरण की स्थापना के लिए उपधारा (1) के अधीन विरचित किसी स्कीम में उपबन्ध करते समय, केन्द्रीय सरकार, ऐसे विनिश्चय के अनुसार ऐसे प्राधिकरण में निहित होने के लिए अपेक्षित अधिकारिता, शक्तियों और कृत्यों की प्रकृति को और सभी अन्य सुसंगत परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, उक्त स्कीम में घोषणा कर सकती है कि ऐसा प्राधिकरण उक्त स्कीम में विनिर्दिष्ट नाम में सम्पत्ति अर्जित, धारण और व्ययनित करने, संविदा करने और वाद लाने के लिए समर्थ होगा और इसी नाम में उसके विरुद्ध वाद लाया जा सकेगा और वह ऐसे सभी कार्य कर सकेगा जो उसकी अधिकारिता, शक्तियों और कृत्यों के उचित प्रयोग तथा निर्वहन के लिए आवश्यक है ।
(4) स्कीम द्वारा प्राधिकरण को, स्कीम के प्रयोजनों को प्रभावी करने के लिए केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन से, विनियम बनाने की शक्ति प्रदान की जा सकती है ।
(5) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उपधारा (1) के अधीन विरचित किसी स्कीम में परिवर्धन, संशोधन या परिवर्तन कर सकती है ।
(6) इस धारा के अधीन विरचित प्रत्येक स्कीम, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में (जो इस अधिनियम से भिन्न है) या इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के आधार पर प्रभावी किसी लिखत में, किसी बात के होते भी, प्रभावी होगी ।
(7) प्रत्येक स्कीम और किसी स्कीम के अधीन बनाया गया प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस स्कीम या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह स्कीम या विनियम ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह स्कीम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह स्कीम या विनियम निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु स्कीम या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उस स्कीम या विनियम के अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
7. मालिकाना आदि के उद्ग्रहण का प्रतिषेध-(1) कोई राज्य सरकार, केवल इस कारण से कि अन्तर्राज्यिक नदी के जल-साधनों के संरक्षण, विनियमन या उपयोग के लिए कोई संकर्म राज्य की सीमाओं के अंदर निर्मित किए गए हैं, किसी दूसरे राज्य या उसके निवासियों द्वारा ऐसे जल के उपयोग के बारे में कोई मालिकाना या अतिरिक्त दर या फीस (चाहे किसी भी नाम से ज्ञात हो) अधिरोपित नहीं करेगी, और न उसका अधिरोपण प्राधिकृत करेगी ।
(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट प्रतिषेध के उल्लंघन में किसी जल दर के उद्ग्रहण के बारे में दो या अधिक राज्य सरकारों के बीच कोई विवाद या मतभेद जल विवाद समझा जाएगा ।
8. अधिकरण को कतिपय विवादों के निर्देश के लिए वर्जन-धारा 3 या धारा 5 में किसी बात के होते हुए भी कोई ऐसा विवाद अधिकरण को निर्दिष्ट नहीं किया जाएगा जो ऐसे किसी मामले के सम्बन्ध में उत्पन्न हुआ है जिसे नदी बोर्ड अधिनियम, [1956ट (1956 का 49) के अधीन माध्यस्थम् के लिए निर्दिष्ट किया जा सके ।
9. अधिकरण की शक्तियां-(1) अधिकरण को निम्नलिखित मामलों के बारे में वही शक्तियां होंगी जो कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी सिविल न्यायालय में निहित हैं, अर्थात् :-
(क) किसी व्यक्ति को समन करना और उसको उपस्थित कराना और उसकी शपथ पर परीक्षा करना ;
(ख) दस्तावेजों और तात्त्विक पदार्थों के प्रकटीकरण और पेश करने की अपेक्षा करना ;
(ग) साक्षियों की परीक्षा के लिए या स्थानीय अन्वेषण के लिए कमीशन जारी करना ;
(घ) कोई अन्य मामला जो विहित किया जा सकता है ।
(2) अधिकरण किसी राज्य सरकार से ऐसे सर्वेक्षण और अन्वेषण कराने या कराने की अनुज्ञा देने की अपेक्षा कर सकेगा जो उसके समक्ष लम्बित जल विवाद के न्यायनिर्णयन के लिए आवश्यक समझे जाएं ।
(3) अधिकरण के विनिश्चय में यह निर्देश दिया जा सकेगा कि किस सरकार द्वारा अधिकरण के व्यय और अधिकरण के समक्ष उपस्थित होने में किसी राज्य सरकार द्वारा उपगत कोई खर्च संदत्त किए जाने हैं और उसमें इस प्रकार संदत्त होने वाले व्ययों और खर्चों की रकम नियत की जा सकेगी और जहां तक विनिश्चय का व्ययों और खर्चों से सम्बन्ध है वह इस प्रकार प्रवर्तित किया जा सकेगा मानो वह उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया आदेश हो ।
(4) [इस अधिनियम और तद्धीन बनाए जाने वाले नियमों के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुएट अधिकरण, आदेश द्वारा, अपनी पद्धति और प्रक्रिया का विनियमन कर सकेगा ।
10. अधिकरण के अध्यक्ष और असेसरों के भत्ते या फीस- [अधिकरण का अध्यक्ष और सदस्य] और असेसर ऐसे पारिश्रमिक, भत्ते या फीस प्राप्त करने के हकदार होंगे जो विहित किए जाएं ।
11. उच्चतम न्यायालय और अन्य न्यायालयों की अधिकारिता का वर्जन-अन्य किसी विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, न तो उच्चतम न्यायालय को और न किसी अन्य न्यायालय को किसी ऐसे जल विवाद के बारे में जो इस अधिनियम के अधीन अधिकरण को निर्दिष्ट किया जाए अधिकारिता होगी और न उनके द्वारा प्रयोग में लाई जाएगी ।
12. अधिकरण का विघटन-केन्द्रीय सरकार, अधिकरण द्वारा रिपोर्ट भेज दिए जाने के पश्चात् और ज्योंहि केन्द्रीय सरकार का समाधान हो जाता है कि मामले में अधिकरण को कोई अतिरिक्त निर्देश आवश्यक नहीं होगा, अधिकरण का विघटन कर देगी ।
13. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकारों से परामर्श के पश्चात् राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतः और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों द्वारा सभी निम्नलिखित मामलों पर या उनमें से किन्हीं के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात् :-
(क) वह प्ररूप और रीति जिसमें कि किसी राज्य सरकार द्वारा जल विवाद के बारे में परिवाद किया जा सकेगा ;
(ख) वे मामले जिनके बारे में अधिकरण में सिविल न्यायालय की शक्तियां निहित हो सकेंगी ;
(ग) इस अधिनियम के अधीन अधिकरण द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया ;
(घ) अधिकरण के [अध्यक्ष और अन्य सदस्यों] को और असेसरों को संदेय पारिश्रमिक, भत्ते या फीस ;
(ङ) अधिकरण के अधिकारियों की सेवा के निबन्धन और शर्तें ;
(च) कोई अन्य मामला जिसे विहित किया जाना है या किया जा सकता है ।
[(3) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्रट में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा ।] [यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्वट दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे उपांतरित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभावी हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे उपांतरित या निष्प्रभावित होने से पूर्व उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
[14. रावी-व्यास जल अधिकरण का गठन-(1) इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, पंजाब समझौते के पैरा 9.1 और पैरा 9.2 में निर्दिष्ट मामलों के सत्यापन और उनके न्यायनिर्णयन के लिए इस अधिनियम के अधीन एक अधिकरण का गठन कर सकेगी जिसका नाम रावी-व्यास जल अधिकरण होगा ।
(2) जब उपधारा (1) के अधीन किसी अधिकरण का गठन किया जाता है तब उसके गठन, अधिकारिता, शक्ति, प्राधिकार और अधिकारिता के वर्जन से सम्बन्धित इस अधिनियम की धारा 4 की उपधारा (2) और उपधारा (3), धारा 5 की उपधारा (2), उपधारा (3) और उपधारा (4) और धारा 5क से धारा 13 तक की धाराओं के (दोनों धाराओं सहित) उपबन्ध, यथाशक्य, इसकी उपधारा (3) के अधीन रहते हुए, उपधारा (1) के अधीन गठित अधिकरण के सम्बन्ध में गठन, अधिकारिता, शक्ति, प्राधिकार और अधिकारिता के वर्जन को लागू होंगे ।
(3) जब किसी अधिकरण का उपधारा (1) के अधीन गठन किया जाता है तब केन्द्रीय सरकार ही स्वप्रेरणा से या सम्बन्धित राज्य सरकार के अनुरोध पर ऐसे अधिकरण को पंजाब समझौते के पैरा 9.1 और पैरा 9.2 में विनिर्दिष्ट मामले निर्देशित कर सकेगी ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, पंजाब समझौता" से 24 जुलाई, 1985 को नई दिल्ली में हस्ताक्षरित समझौते का ज्ञापन अभिप्रेत है ।]
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