चाय अधिनियम, 1953
(1953 का अधिनियम संख्यांक 29)
[28 मई, 1953]
संघ द्वारा चाय उद्योग का नियंत्रण करने, जिसके अन्तर्गत, इस समय प्रवृत्त
अन्तर्राष्ट्रीय करार के अनुसरण में, भारत में चाय की खेती तथा
भारत से चाय के निर्यात का नियंत्रण भी है, और
उस प्रयोजन के लिए चाय बोर्ड की स्थापना
करने और [भारत में उत्पादित चाय
पर उत्पाद-शुल्क का उद्ग्रहण]
करने का उपबन्ध
करने के लिए
अधिनियम
संसद् द्वारा निम्नलिखित रुप में यह अधिनियमित हो : -
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1.संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम चाय अधिनियम, 1953 है ।
(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है :
परन्तु यह जम्मू-कश्मीर राज्य को उस हद तक ही लागू होगा जहां तक इस अधिनियम के उपबन्ध भारत से चाय के निर्यात और भारत में चाय की खेती के नियन्त्रण से संबधित हैं ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. संघ द्वारा नियन्त्रण समीचीन है इसके बारे में घोषणा-यह घोषित किया जाता है कि लोकहित में यह समीचीन है कि चाय उद्योग को संघ अपने नियन्त्रण में ले ले ।
3. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) बोर्ड" से धारा 4 के अधीन गठित चाय बोर्ड अभिप्रेत है;
(ख) दलाल" से चाय का दलाल अभिप्रेत है;
(ग) उपकर" से धारा 25 द्वारा अधिरोपित [उत्पाद-शुल्क] अभिप्रेत है;
[(घ) सीमाशुल्क आयुक्त" से सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) की धारा 3 के खंड (ख) में विनिर्दिष्ट सीमाशुल्क आयुक्त अभिप्रेत है;]
(ङ) व्यवहारी" से चाय का व्यवहारी अभिप्रेत है;
(च) निर्यात" से केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त राजपत्र में अधिसूचना द्वारा अधिसूचित किसी देश या राज्यक्षेत्र से भिन्न भारत के बाहर किसी स्थान को भूमि, समुद्र या वायु मार्ग द्वारा भारत के बाहर ले जाना अभिप्रेत है;
(छ) निर्यात आबंटन" से चाय की वह कुल मात्रा अभिप्रेत है जो किसी एक वित्तीय-वर्ष के दौरान निर्यात की जा सकेगी;
(ज) निधि" से धारा 27 में निर्दिष्ट चाय निधि अभिप्रेत है;
(झ) विनिर्माता" से चाय का विनिर्माता अभिप्रेत है;
(ञ) सदस्य" से बोर्ड का सदस्य अभिप्रेत है;
(ट) स्वामी" से-
(i) किसी चाय सम्पदा या बागान या उसके उपखण्ड के बारे में, जिसका कब्जा पट्टे या बन्धक द्वारा या अन्यथा अन्तरित किया गया है, जब तक उसका कब्जे का अधिकार अस्तित्व में होता है, अन्तरिती अभिप्रेत है; और
(ii) उस चाय सम्पदा या बागान या उपखण्ड के बारे मे, जिसके लिए कोई अभिकर्ता नियोजित किया गया है, अभिकर्ता अभिप्रेत है यदि और जहां तक वह स्वामी द्वारा उस निमित्त सम्यक् रुप से प्राधिकृत किया गया हो;
(ठ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(ड) मानक निर्यात अंक" से ऐसी मात्रा अभिप्रेत है जैसी केन्द्रीय सरकार इस निमित्त किसी अन्तर्राष्ट्रीय करार के अनुसरण में, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे;
(ढ) चाय" से कैमेलिया सिनेनसिस (एल) ओ० कुन्टजे का पौधा और कैमेलिया सिनेनसिस (एल) ओ० कुन्टजे के पौधे की पत्तियों से बने उत्पाद की सभी किस्में जो वाणिज्यिक रुप से चाय के नाम से ज्ञात हैं, जिनके अन्तर्गत हरी चाय भी है, अभिप्रेत हैं ;
(ण) चाय के बीज" के अन्तर्गत बीज, जड़ें, ठूंट, कटे हुए टुकड़े, कलियां तथा कैमेलिया सिनेनसिस (एल) ओ० कुन्टजे के पौधे का कोई ऐसा जीवित भाग भी है जिसका उस पौधे के प्रवर्धन के लिए उपयोग किया जा सके ।
अध्याय 2
चाय बोर्ड
4. चाय बोर्ड की स्थापना और गठन-(1) ऐसी तारीख से, जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए एक बोर्ड की स्थापना की जाएगी जिसका नाम चाय बोर्ड होगा ।
(2) बोर्ड पूर्वोक्त नाम से निगमित निकाय होगा जिसका शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होगी और जिसे स्थावर और जंगम दोनों प्रकार की सम्पत्ति के अर्जन, धारण और व्ययन करने की और संविदा करने की शक्ति होगी और उक्त नाम से वह वाद ला सकेगा और उस पर वाद लाया जा सकेगा ।
(3) बोर्ड का गठन एक अध्यक्ष और चालीस से अनधिक उतने अन्य सदस्यों से होगा जितने केन्द्रीय सरकार समीचीन समझे और वे उस सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उन व्यक्तियों में से नियुक्त किए जाएंगे जो उसकी राय में,-
(क) चाय सम्पदाओं तथा बागान के स्वामियों और चाय उत्पादकों;
(ख) चाय सम्पदाओं और बागान मे नियोजित व्यक्तियों;
(ग) चाय के विनिर्माताओं;
(घ) व्यवहारियों जिनके अन्तर्गत निर्यातकर्ताओं और चाय के अन्तर्देशीय व्यापारी दोनों ही आते हैं;
(ङ) उपभोक्ताओं;
(च) संसद्;
(छ) चाय उपजाने वाले मुख्य राज्यों की सरकारों;
(ज) ऐसे अन्य व्यक्तियों अथवा व्यक्तियों के वर्ग जिनका, केन्द्रीय सरकार की राय में, बोर्ड में प्रनिनिधित्व होना चाहिए,
का प्रतिनिधित्व करने के योग्य हैं ।
[(3क) यह घोषित किया जाता है कि बोर्ड के सदस्य का पद उसके धारक को संसद् के किसी भी सदन का सदस्य चुने जाने या बने रहने के लिए निरर्हित नहीं करेगा ।]
(4) उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट प्रत्येक प्रवर्ग में से सदस्यों के रुप में नियुक्त किए जाने वाले व्यक्तियों की संख्या, बोर्ड के सदस्यों के पद की अवधि, उनके कृत्यों के निर्वहन में उनके द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया तथा उनमें हुई रिक्तियों को भरने की रीति ऐसी होगी जैसी विहित की जाए ।
(5) केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी को, जब वह उस सरकार द्वारा इस निमित्त प्रतिनियुक्त किया जाता है, बोर्ड के अधिवेशनों में हाजिर होने और उनकी कार्यवाहियों में भाग लेने का अधिकार होगा किन्तु वह मत देने का हकदार नहीं होगा ।
5. रिक्तियों, आदि का कार्यों और कार्यवाहियों को अविधिमान्य न करना-इस अधिनियम के अधीन बोर्ड द्वारा किया गया कोई कार्य या की गई कोई कार्यवाही बोर्ड में किसी रिक्ति के रहने के या उनके गठन में किसी त्रुटि के आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी ।
6. अध्यक्ष के वेतन और भत्ते-अध्यक्ष ऐसे वेतन और भत्ते का तथा छुट्टी, पेंशन, भविष्य निधि और अन्य विषयों की बाबत सेवा की ऐसी शर्तों का हकदार होगा जैसी केन्द्रीय सरकार द्वारा समयद्भसमय पर नियत की जाए ।
7. उपाध्यक्ष-बोर्ड अपने सदस्यों में से एक उपाध्यक्ष का निर्वाचन करेगा जो अध्यक्ष की ऐसी शक्तियों का प्रयोग और उसके ऐसे कर्तव्यों का निर्वहन करेगा जैसे विहित किए जाएं या जो अध्यक्ष द्वारा उसे प्रत्यायोजित किए जाएं ।
8. कार्यकारिणी और अन्य समितियां-(1) बोर्ड की एक कार्यकारिणी समिति होगी जो विहित रीति से गठित की जाएगी ।
(2) कार्यकारिणी समिति बोर्ड की ऐसी शक्तियों का प्रयोग और उसके ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगी जैसे विहित किए जाएं या जो बोर्ड द्वारा उसे प्रत्यायोजित किए जाएं ।
(3) ऐसे नियंत्रण और निर्बन्धनों के अधीन रहते हुए जैसे विहित किए जाएं, बोर्ड अन्य स्थायी समितियां या तदर्थ समितियां, बोर्ड की किसी शक्ति का प्रयोग या उसके किसी कर्तव्य का निर्वहन करने या किसी अन्य विषय में, जिसे बोर्ड उन्हें निर्दिष्ट करे, जांच करने या उसके सम्बन्ध में रिपोर्ट और सलाह देने के लिए गठित कर सकेगा ।
(4) स्थायी समिति का गठन केवल बोर्ड के सदस्यों से होगा ।
(5) तदर्थ समिति मे ऐसे व्यक्ति भी सम्मिलित हो सकेंगे जो बोर्ड के सदस्य नहीं हैं किन्तु उनकी संख्या समिति की सदस्य संख्या के आधे से अधिक नहीं होगी ।
9. सचिव और कर्मचारिवृन्द-(1) केन्द्रीय सरकार-
[(क) बोर्ड का एक नायब अध्यक्ष नियुक्त करेगी जो अध्यक्ष को उसके कर्तव्यों के पालन में सहायता करेगा और उसकी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो विहित किए जाएं या बोर्ड द्वारा या धारा 8 के अधीन बोर्ड द्वारा गठित समिति द्वारा या अध्यक्ष द्वारा उसे प्रत्योजित किए जाएं;]
[(कक)] बोर्ड का एक सचिव नियुक्त करेगी जो ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा जैसे विहित किए जाएं या जो बोर्ड या अध्यक्ष द्वारा उसे प्रत्यायोजित किए जाएं;
(ख) बोर्ड के ऐसे अन्य सब अधिकारी नियुक्त करेगी जो [प्रतिमास एक हजार सात सौ रुपए से अधिक वेतन] लेते हों ।
(2) ऐसे नियंत्रण और निर्बन्धनों के अधीन रहते हुए जैसे विहित किए जाएं , बोर्ड ऐसे अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों को नियुक्त कर सकेगा जैसे उसके कृत्यों के दक्ष पालन के लिए आवश्यक हों तथा उन्हें ऐसे वेतन और भत्ते दे सकेगा जैसे वह समयद्भसमय पर अवधारित करे ।
(3) बोर्ड का अध्यक्ष [नायब अध्यक्ष, सचिव और अन्य कर्मचारीट, केन्द्रीय सरकार की अनुज्ञा के बिना, इस अधिनियम के अधीन अपने कर्तव्यों से असंसक्त कोई कार्य करने का भार अपने ऊपर नहीं लेंगे ।
10. बोर्ड के कृत्य-(1) बोर्ड का यह कर्तव्य होगा कि वह केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण के अधीन चाय उद्योग के विकास की ऐसी उपायों द्वारा अभिवृद्धि करे जैसे वह ठीक समझे ।
(2) उपधारा (1) के उपबन्धों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उसमें निर्दिष्ट उपायों द्वारा निम्नलिखित के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा, अर्थात्ः -
(क) चाय के उत्पादन और उसकी खेती के विस्तार का विनियमन करना;
(ख) चाय की क्वालिटी में सुधार करना;
(ग) चाय के उत्पादकों और विनिर्माताओं में सहकारिता के प्रयासों की अभिवृद्धि;
(घ) वैज्ञानिक, प्रौद्योगिक और आर्थिक गन्वेषणा का उपक्रम करना, उसमें सहायता करना या उसे प्रोत्साहित करना तथा निदर्शन फार्मों और विनिर्माण केन्द्रों को बनाए रखना या उनके बनाए रखने में सहायता करना;
(ङ) चाय को लग जाने वाले कीटों और अन्य नाशक जीवों तथा रोगों के नियंत्रण में सहायता करना;
(च) चाय के विक्रय और निर्यात का विनियमन करना;
(छ) चाय के चखने के लिए प्रशिक्षण देना और चाय के श्रेणी-मानक नियत करना;
(ज) भारत में और अन्यत्र चाय का उपभोग बढ़ाना और उस प्रयोजन के लिए प्रचार करना;
(झ) चाय के विनिर्माताओं, दलालों, चाय के अपशिष्ट के व्यवहारियों तथा चाय सम्मिश्रण के कारबार में लगे हुए व्यक्तियों का रजिस्ट्रीकरण और अनुज्ञापन;
(ञ) भारत में और अन्यत्र चाय के विपणन की अभिवृद्धि;
(ञञ) भारत में और अन्यत्र चाय उद्योग का विकास करने के प्रयोजन के लिए या चाय की अभिवृद्धि और उसके विपणन के लिए किसी निगमित निकाय की शेयर पूंजी प्रतिश्रुत करना या उससे कोई करार या अन्य ठहराव (भागीदारी के रुप में, संयुक्त उद्यम के रुप में या किसी अन्य रीति से) करना;]
(ट) चाय उद्योग से संबंधित किसी विषय में उत्पादकों, विनिर्माताओं, व्यवहारियों और ऐसे अन्य व्यक्तियों से जैसे विहित किए जाएं, आंकड़ों का संग्रहण; इस प्रकार संगृहीत आंकड़ों या उनके प्रभागों या उनके उद्धरणों का प्रकाशन;
(ठ) कर्मकारों के लिए काम करने की अधिक अच्छी अवस्थाएं प्राप्त कराना और उनकी सुख-सुविधाओं और प्रोत्साहनों का उपबंध तथा उनमें सुधार करना;
(ड) अन्य ऐसे विषय जो विहित किए जाएं ।
(3) बोर्ड इस धारा के अधीन के अपने कृत्यों का पालन ऐसे नियमों के अनुसार और अधीन रहते हुए करेगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए जाएं ।
11. बोर्ड का विघटन-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगी कि बोर्ड का ऐसी तारीख से और ऐसी अवधि के लिए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, विघटन हो जाएगा ।
(2) जब उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन बोर्ड का विघटन हो जाता है तब-
(क) सब सदस्य, विघटन की तारीख से, सदस्यों की हैसियत में अपने पद खाली कर देंगे
(ख) विघटन की अवधि के दौरान बोर्ड की सब शक्तियों का प्रयोग और कर्तव्यों का पालन ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा किया जाएगा जिन्हें केन्द्रीय सरकार इस निमित्त नियुक्त करे;
(ग) बोर्ड में निहित सब निधियां और अन्य सम्पत्ति, विघटन की अवधि के दौरान, केन्द्रीय सरकार में निहित रहेंगी और;
(घ) विघटन की अवधि का अवसान होते ही, बोर्ड का पुनर्गठन इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार किया जाएगा ।
अध्याय 3
चाय की खेती के विस्तारण पर नियंत्रण
12. चाय की खेती के विस्तारण पर नियंत्रण की रीति-(1) कोई भी व्यक्ति किसी ऐसी भूमि पर चाय जिस पर इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख को चाय न लगी हुई हो तब तक नहीं लगाएगा जब तक उसे बोर्ड द्वारा या उसकी ओर से लिखित रुप में अनुज्ञा न दे दी गई हो ।
(2) कोई भी चाय क्षेत्र, किसी ऐसे क्षेत्र पर चाय लगाकर जिस पर चाय न लगी हुई हो, तब तक नहीं बदला जाएगा जब तक बोर्ड द्वारा या उसकी ओर से लिखित रुप में अनुज्ञा न दे दी गई हों ।
(3) इस धारा की कोई भी बात इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख को चाय लगी हुई किसी भूमि पर बीचद्भबीच में या खाली स्थानों में चाय लगाने को या निम्नलिखित पर चाय फिर से लगाने को प्रतिषिद्ध नहीं करेगी, अर्थात्ः-
(i) 31 मार्च, 1950 को चाय लगी हुई भूमि जिसमें से मूल झाडियां उखाड़ ली गई हों, या
(ii) 31 मार्च, 1948 को चाय लगी हुई भूमि जिसमें से मूल झाड़ियां उखाड़ ली गई हों ।
13. चाय की खेती के विस्तारण पर निर्बन्धन-(1) धारा 15 और धारा 16 उपबन्धों के अधीन रहते हुए उस भूमि का कुल क्षेत्र जिसके संबंध में धारा 12 में निर्दिष्ट अनुज्ञा दी जाए उतने क्षेत्र से अधिक नहीं होगा जितना केन्द्रीय सरकार के साधारण अनुदेशों के अधीन बोर्ड द्वारा अवधरित किया जाए ।
(2) किसी राज्य में भूमि का कुल क्षेत्र, जिसके सम्बन्ध में ऐसी अनुज्ञा दी जाए, उतना होगा जितना बोर्ड द्वारा अवधारित किया जाए परन्तु बोर्ड किसी राज्य के लिए इस प्रकार अवधारित कुल क्षेत्र में, दूसरें राज्य के उस क्षेत्र को जिसके सम्बन्ध में ऐसी अनुज्ञा दी जाए, उतनी मात्रा के बराबर बढ़ाने या घटाने के लिए फेरफार कर सकेगा जितनी मात्रा तक प्रथमवर्णित राज्य का क्षेत्र घटाया या बढ़ाया गया है ।
(3) बोर्ड इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र केन्द्रीय सरकार के राजपत्र में अधिसूचना द्वारा भारत के लिए अवधारित कुल क्षेत्र तथा विभिन्न राज्यों के लिए अवधारित कुल क्षेत्रों को प्रकाशित करेगा और ऐसे कुल क्षेत्रों के पश्चात्वर्ती फेरफार को भी उसी रीति से प्रकाशित करेगा ।
14. चाय लगाने के लिए अनुज्ञा का दिया जाना-(1) किसी ऐसी भूमि पर जिस पर इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख को चाय न लगी हुई हो, चाय लगाने की अनुज्ञा के लिए आवेदन बोर्ड को किए जाएंगे और उनके साथ आवेदन को न्यायोचित ठहराने वाली सभी विशेष परिस्थितियों से सम्बन्धित एक स्पष्ट कथन होगा ।
(2) बोर्ड, आवेदन पर कार्यवाही करने हेतु बोर्ड को समर्थ बनाने के लिए, आवेदक से ऐसी सूचना देने के लिए अपेक्षा कर सकेगा जैसी वह ठीक समझे ।
(3) बोर्ड ऐसी शर्तों और निर्बन्धनों के अधीन रहते हुए जो विहित किए जाएं आवेदित अनुज्ञा, आदेश द्वारा, दे सकेगा या देने से इंकार कर सकेगा या वह उसी रीति से उसे केवल भागतः दे सकेगा या आवेदक से और जानकारी मांग सकेगा ।
(4) उपधारा (3) के अधीन बोर्ड द्वारा किया गया कोई आदेश किसी न्यायालय द्वारा प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।
15. विशेष परिस्थितियों में चाय लगाने की अनुज्ञा का दिया जाना-(1) जहां कोई भूमि जिस पर 31 मार्च, 1933 को चाय लगी हुई थी (जिसके अन्तर्गत 31 मार्च, 1931 को चाय लगी हुई वह भूमि भी है जिससे मूल झाड़ियां उखाड़ ली गई थीं और जिस पर उक्त 31 मार्च, 1933 को चाय फिर से नहीं लगाई गई थी) या जहां 31 मार्च, 1933 के पश्चात् चाय लगी हुई कोई भूमि, -
(क) युद्ध के कारण अथवा धंसाव, बाढ़, कटाव, भूचाल या किसी अन्य ऐसे प्राकृतिक कारण से जिसे रोका न जा सके चाय की खेती के लिए पूर्णतः अयोग्य हो गई है; या
(ख) भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 (1894 का 1) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबन्धों के अधीन अनिवार्यतः अर्जित कर ली गई है और उस पर अब चाय की खेती नहीं होती; या
(ग) केन्द्रीय या किसी राज्य सरकार को या किसी स्थानीय प्राधिकारी को अन्तरित कर दी गई है और उस पर अब चाय की खेती नहीं होती है; या
(घ) किसी पट्टे के निबन्धनों के अधीन पट्टाकर्ता द्वारा उसका पुनर्ग्रहण कर लिया गया है और उस पर अब चाय की खेती नहीं होती है;
वहां उस चाय-सम्पदा का स्वामी, जिसमें ऐसी भूमि स्थित है, उस भूमि पर जिस पर चाय न लगी हुई हो चाय लगाने की अनुज्ञा के लिए बोर्ड को आवेदन कर सकेगा ।
स्पष्टीकरण-युद्ध करने से सम्बद्ध प्रयोजनों के लिए ली गई भूमि के बारे में, जिस पर चाय की झाड़ियां संरक्षण के प्रयोजनों के लिए रहने दी गई हों, यद्यपि उस पर अब खेती नहीं होती है, इस धारा के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि वह चाय की खेती के अयोग्य है या उस पर अब चाय की खेती नहीं होती है ।
(2) ऐसा आवेदन किए जाने पर और बोर्ड के समाधानप्रद रुप में यह सबूत दिए जाने पर कि आवेदक उपधारा (1) के फायदों के लिए हकदार है बोर्ड उस भूमि पर चाय लगाने की अनुज्ञा, आदेश द्वारा, दे सकेगा जिस पर चाय न लगी हुई हो
परन्तु भूमि का क्षेत्र जिसकी बाबत ऐसी अनुज्ञा दी गई है उसी या पार्श्वस्थ जिले में होगा और उसी या पार्श्वस्थ चाय-सम्पदा से सम्बद्ध होगा और, यथास्थिति, चाय की खेती के अयोग्य या अनिवार्यतः अर्जित, अन्तरित या पुनर्गृहीत भूमि के क्षेत्र से मात्रा में अधिक नहीं होगा ।
(3) भूमि के वे सब क्षेत्र जिनकी बाबत इस धारा के अधीन चाय लगाने की अनुज्ञा दी गई है, धारा 13 के प्रयोजन के लिए उस भूमि के कुल क्षेत्र की संगणना करते समय अपवर्जित कर दिए जाएंगे जिसकी बाबत धारा 12 में निर्दिष्ट अनुज्ञा दी जाए ।
(4) यदि उपधारा (1) के स्पष्टीकरण के अन्तर्गत आने वाली कोई भूमि तत्पश्चात् उस चाय-सम्पदा को प्रत्यावर्तित कर दी जाती है जिसमें से वह निकाल ली गई थी तो उस सम्पदा का स्वामी या तो उसमें लगी हुई चाय को उखाड़ लेगा या उपधारा (2) के अधीन दी गई अनुज्ञा के अनुसरण में अपने द्वारा लगाई गई चाय को उखाड़ लेगा ।
16. चाय की नर्सरी-(1) चाय सम्पदा का स्वामी उस भूमि पर, जिस पर पहले चाय नहीं लगी हुई थी, बीच-बीच में या खाली स्थानों में पौधे उपजाने के लिए या सम्पदा के क्षेत्र के भीतर चाय लगी हुई भूमि पर चाय फिर से लगाने के लिए या बोर्ड द्वारा अनुमोदित किसी अन्य प्रयोजन के लिए, नर्सरी स्थापित कर सकेगा ।
(2) इस धारा के अनुसार नर्सरी के लिए उपयोग किए गए भूमि के सब क्षेत्र धारा 13 के प्रयोजन के लिए उस भूमि के कुल क्षेत्र की संगणना करते समय अपवर्जित कर दिए जाएंगे जिसकी बाबत धारा 12 में निर्दिष्ट अनुज्ञा दी जा सकेगी ।
[अध्याय 3क
कुछ परिस्थितियों में केन्द्रीय सरकार द्वारा चाय उपक्रमों या चाय यूनिटों का प्रबंध या नियंत्रण
16क. परिभाषाएं-(1) इस अध्याय में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) प्राधिकृत व्यक्ति" से इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा किसी चाय उपक्रम या चाय यूनिट का प्रबंध ग्रहण करने के लिए प्राधिकृत या नियुक्त व्यक्ति या व्यक्तियों का निकाय अभिप्रेत है,
(ख) कंपनी" से कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 3 के अर्थ में कंपनी अभिप्रेत है;
(ग) जिला औसत" पैदावार से उस जिले; जिसमें एक या अधिक चाय यूनिटें स्थित हैं, बोर्ड द्वारा यथा प्रकाशित चाय की औसत पैदावार अभिप्रेत है;
(घ) अधिसूचित आदेश" से राजपत्र में अधिसूचित आदेश अभिप्रेत है;
(ङ) चाय उपक्रम" से वह उपक्रम अभिप्रेत है जो एक या अधिक चाय यूनिटों के माध्यम से चाय के उत्पादन या विनिर्माण, या दोनों में लगा हुआ हो;
(च) चाय यूनिट" से वह चाय-संपदा या चाय बागान, जिसके अन्तर्गत उसका उपखंड भी है, अभिप्रेत है जिसका ऐसा सुभिन्न अस्तित्व हो जिसके लिए लेखे रखे जाते हों और जिसका चाय के उत्पादन और विनिर्माण के लिए अपना स्वयं का कारखाना हो ।
(2) उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) के ऐसे उपबन्धों में, जो इस अध्याय के उपबन्धों के आधार पर किसी चाय उपक्रम या चाय यूनिट को लागू होते हैं, किसी औद्योगिक उपक्रम के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे, यथास्थिति, किसी चाय उपक्रम या चाय यूनिट के प्रति निर्देश हैं और पूर्वोक्त अधिनियम में उस अधिनियम के किसी ऐसे उपबंध के, जो ऐसे चाय उपक्रम या चाय यूनिट को लागू हैं और जिसके संबंध में इस अधिनियम में तत्स्थानी उपबंध बनाया गया है, प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे ऐसे तत्स्थानी उपबन्ध के प्रति निर्देश ।
16ख. किसी चाय उपक्रम या चाय यूनिट के बारे में अन्वेषण करवाने की शक्ति-(1) जहां किसी चाय उपक्रम या चाय यूनिट के सम्बन्ध में केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि: -
(क) चाय उपक्रम या, यथास्थिति, चाय यूनिट को उस वर्ष के जिसमें ऐसी राय बनाई गई है, ठीक पूर्ववर्ती पांच वर्ष में से तीन वर्ष में हानि हुई है; या
(ख) चाय उपक्रम या, यथास्थिति, चाय यूनिट की औसत पैदावार उस वर्ष के जिसमें ऐसी राय बनाई गई है, ठीक पूर्ववर्ती पांच वर्ष में से तीन वर्ष के दौरान, जिला औसत पैदावार से पच्चीस प्रतिशत या उससे अधिक कम हुई हैः या
(ग) चाय उपक्रम या, यथास्थिति, चाय यूनिट का स्वामित्व रखने वाले व्यक्तियों ने अभ्यासतः कर्मकारों और अन्य कर्मचारियों की मजदूरियों या भविष्य निधि शोध्यों के अथवा भूमि के भाटक अथवा उत्पाद-शुल्कों अथवा ऐसे अन्य शोध्यों के संदाय में व्यतिक्रम किया है, जिनका संदाय करने के लिए वे तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन बाध्य हैं; या
(घ) चाय उपक्रम या, यथास्थिति, चाय यूनिट का प्रबंध चाय उद्योग अथवा लोक हित के लिए अत्यन्त हानिकर रीति से किया जा रहा है,
वहां केन्द्रीय सरकार, यथास्थिति, चाय उपक्रम या चाय यूनिट के कार्यकलापों का पूर्ण और पूरा-पूरा अन्वेषण ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय के माध्यम से कर सकेगी या करवा सकेगी, जो वह इस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे ।
(2) जहां किसी चाय उपक्रम का स्वामित्व रखने वाली किसी कम्पनी का न्यायालय द्वारा या उसके पर्यवेक्षणाधीन परिसमापन किया जा रहा हो और उस कम्पनी का कारबार चालू न रखा जा रहा हो वहां केन्द्रीय सरकार, यदि उसकी यह राय हो कि जनसाधारण के हित में और विशिष्टतया चाय के उत्पादन, प्रदाय या वितरण के हित में उस चाय उपक्रम को चलाने या पुनः प्रारंभ करने की संभावना का अन्वेषण किया जाना आवश्यक है तो न्यायलय से ऐसे व्यक्ति का व्यक्तियों के निकाय के माध्यम से, जो वह सरकार उस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे, ऐसी संभावना का अन्वेषण करने या करवाने की अनुज्ञा के लिए आवेदन कर सकेगी और जहां ऐसा आवेदन किया जाता है वहां न्यायालय, कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, आवेदित अनुज्ञा देगा ।
(3) उपधारा (1) या, यथास्थिति, उपधारा (2) के अधीन कोई अन्वेषण करने के लिए नियुक्त किए गए व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय की वही शक्तियां होंगी जो उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की धारा 18 में विनिर्दिष्ट हैं ।
16ग. अन्वेषण पूरा होने पर केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) यदि कोई ऐसा अन्वेषण, जो धारा 16ख की उपधारा (1) में निर्दिष्ट है, करने या करवाने के पश्चात् केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि इस धारा के अधीन कार्रवाई वांछनीय है तो वह संबंधित चाय उपक्रम या चाय यूनिट को ऐसे निदेश जो उन परिस्थितियों में समुचित हों, निम्नलिखित सभी या किन्हीं प्रयोजनों के लिए दे सकेगी, अर्थात्ः-
(क) चाय उपक्रम या, यथास्थिति, चाय यूनिट द्वारा चाय के उत्पादन का विनियमन करना और उत्पादन के मानकों को नियत करना;
(ख) चाय उपक्रम या, यथास्थिति, चाय यूनिट से ऐसी कार्रवाई करने की अपेक्षा करना जो केन्द्रीय सरकार चाय के उत्पादन, विनिर्माण या रोपण को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक समझे;
(ग) चाय उपक्रम या, यथास्थिति, चाय यूनिट को किसी ऐसे कार्य या पद्धति का आश्रय लेने से प्रतिषिद्ध करना जिससे उसका उत्पादन, क्षमता या आर्थिक मूल्य कम हो जाए;
(घ) चाय उपक्रम या, यथास्थिति, चाय यूनिट द्वारा उत्पादित अथवा विनिर्मित चाय की कीमतों का नियंत्रण करना या वितरण का विनियमन करना ।
(2) जहां किसी चाय उपक्रम या चाय यूनिट के सम्बन्ध में कोई मामला अन्वेषणाधीन हो वहां केन्द्रीय सरकार, सम्बन्धित चाय उपक्रम या चाय यूनिट को उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रकार का कोई निदेश किसी भी समय दे सकेगी और ऐसा कोई निदेश तब तक प्रभावी रहेगा जब तक उसमें केन्द्रीय सरकार द्वारा फेराफार या उसका प्रतिसंहरण न किया जाए ।
16घ. कुछ दशाओं में चाय उपक्रम या चाय यूनिट का प्रबन्ध या नियंत्रण ग्रहण करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि-
(क) किसी ऐसे चाय उपक्रम या चाय यूनिट ने, जिसको धारा 16ग के अनुसरण में निदेश दिए गए हैं, ऐसे निदेशों का पालन नहीं किया है अथवा, यथास्थिति, चाय उपक्रम या चाय यूनिट को उस वर्ष के जिसमें ऐसी राय बनाई गई है, ठीक पूर्ववर्ती पांच वर्ष में से तीन वर्ष में होनि हुई है;
(ख)चाय उपक्रम या, यथास्थिति, चाय यूनिट की औसत पैदावार उस वर्ष के जिसमे ऐसी राय बनाई गई है, ठीक पूर्ववर्ती पांच वर्ष में से तीन वर्ष के दौरान, जिला औसत पैदावार से पच्चीस प्रतिशत या उससे अधिक कम हुई है; या
(ग) चाय उपक्रम या, यथास्थिति, चाय यूनिट का स्वामित्व रखने वाले व्यक्तियों ने अभ्यासतः कर्मकारों और अन्य कर्मचारियों की मजदूरियों या भविष्य निधि शोध्यों के अथवा भूमि के भाटक अथवा उत्पाद-शुल्कों के संदाय में अथवा ऐसे अन्य शोध्यों के संदाय में व्यतिक्रम किया है, जो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन बाध्यकर हैं; या
(घ) चाय उपक्रम या, यथास्थिति, चाय यूनिट का प्रबन्ध चाय उद्योग अथवा लोक हित के लिए अन्यन्त हानिकर रीति से किया जा रहा है,
तो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचित आदेश द्वारा, किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय को, यथास्थिति, सम्पूर्ण चाय उपक्रम या चाय यूनिट या उसके किसी भाग का प्रबन्ध ग्रहण करने के लिए या, यथास्थिति, संपूर्ण चाय उपक्रम या चाय यूनिट या उसके किसी भाग के सम्बन्ध में नियन्त्रण से सम्बद्ध ऐसे कृत्यों का जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं, प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन जारी किया गया कोई अधिसूचित आदेश पांच वर्ष से अनधिक की उतनी अवधि के लिए जितनी उस आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, प्रभावी होगाः
परन्तु यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि लोक हित में यह समीचीन है कि कोई ऐसा अधिसूचित आदेश पूर्वोक्त पांच वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् भी प्रभावी बना रहना चाहिए तो वह ऐसे प्रभावी बने रहने के लिए निदेश एक समय पर एक वर्ष से अनधिक की उतनी अवधि के लिए, जितनी उस निदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, समय-समय पर दे सकेगी, किन्तु ऐसे प्रभावी बने रहने की कुल अवधि (पांच वर्ष की उक्त अवधि के पश्चात्) [छह वर्षट से अधिक न हो और जहां कोई ऐसा निदेश दिया जाता है वहां उसकी एक प्रति यथाशीघ्र, संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखी जाएगी ।
(3) उपधारा (1) के अधीन जारी किए गए किसी अधिसूचित आदेश का वही प्रभाव होगा मानो वह उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की धारा 18क की उपधारा (1) के अधीन किया गया कोई आदेश था और उस अधिनियम की धारा 18ख के उपबन्ध तदनुसार लागू होंगे ।
(4) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति जो उपधारा (3) के उपबन्धों के आधार पर किसी चाय उपक्रम या चाय यूनिट को यथा लागू उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की धारा 18ख के खण्ड (क) में अन्तर्विष्ट उपबन्धों के कारण किसी पद पर नहीं रहता है अथवा जिसकी प्रबन्ध संविदा उक्त धारा के खण्ड (ख) में अन्तर्विष्ट उपबन्धों के कारण समाप्त कर दी जाती है, अपने पद की हानि अथवा अपनी प्रबन्ध संविदा की समय पूर्व समाप्ति के लिए किसी प्रतिकर का हकदार नहीं होगाः
परन्तु इस धारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति के, यथास्थिति, चाय उपक्रम या चाय यूनिट से ऐसी धनराशियों के वसूल करने के अधिकार पर प्रभाव नहीं डालेगी जो ऐसे प्रतिकर से भिन्न रुप में वसूलीय हैं ।
16ङ कुछ परिस्थितियों में अन्वेषण के बिना चाय उपक्रम या चाय यूनिट को ग्रहण करने की शक्ति-(1) इस अधिनियम के किसी अन्य उपबन्ध पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, यदि केन्द्रीय सरकार का अपने कब्जे में के दस्तावेजी या अन्य साक्ष्य के आधार पर किसी चाय उपक्रम या चाय यूनिट के सम्बन्ध में यह समाधान हो जाता है कि-
(क) ऐसे चाय उपक्रम या चाय यूनिट के भारसाधक व्यक्तियों ने [बिना सोचे विचारे विनिधानों द्वारा या चाय उपक्रम या चाय यूनिट की आस्तियों पर विल्लंगमों के सृजन द्वाराट या निधियों को दूसरे काम में लगाकर ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जिससे चाय उपक्रम या चाय यूनिट द्वारा विनिर्मित या उत्पादित चाय के उत्पादन पर प्रभाव पड़ना सम्भव है तथा किसी ऐसी स्थिति का निवारण करने के लिए तुरन्त कारवाई करना आवश्यक है; या
(ख) वह (चाहे चाय उपक्रम या चाय यूनिट का स्वामित्व रखने वाली कम्पनी के स्वेच्छया परिसमापन के कारण अथवा किसी अन्य कारण से) कम से कम तीन मास की अवधि से बन्द है और इस प्रकार बन्द किए जाने से, संबंधित चाय उपक्रम या चाय यूनिट पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तथा उस चाय उपक्रम या चाय यूनिट का स्वामित्व रखने वाली कम्पनी की वित्तीय स्थिति और उस चाय उपक्रम या चाय यूनिट के प्लांट और मशीनरी ऐसी हैं कि उस चाय उपक्रम या चाय यूनिट का पुनः प्रारम्भ किया जाना सम्भव है और इस प्रकार उसका पुनः प्रारम्भ किया जाना जनसाधारण के हित में आवश्यक है,
तो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचित आदेश द्वारा, किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय को सम्पूर्ण चाय उपक्रम या चाय यूनिट या उसके किसी भाग का प्रबन्ध ग्रहण करने के लिए या सम्पूर्ण चाय उपक्रम या चाय यूनिट या उसके किसी भाग के सम्बन्ध में नियंत्रण से सम्बद्ध ऐसे कृत्यों का, जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं, प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगी ।
[स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए विल्लंगमों" में ऐसा कोई दायित्व भी है जो, यथास्थिति, चाय उपक्रम या चाय यूनिट या ऐसे व्यक्ति की आस्तियों से, जिसके स्वामित्व में चाय उपक्रम या चाय यूनिट है, वसूल किया जा सकता है या उससे तुष्ट किया जा सकता है।]
(2) उपधारा (1) के अधीन किसी चाय उपक्रम या चाय यूनिट के सम्बन्ध में किसी अधिसूचित आदेश के जारी किए जाने पर, -
(क) धारा 16घ की उपधारा (2), उपधारा (3) और उपधारा (4) के उपबन्ध और धारा 16छ के उपबन्ध, उपधारा (1) के अधीन किए गए अधिसूचित आदेश को वैसे ही लागू होंगे जैसे वे धारा 16घ की उपधारा (1) के अधीन किए गए अधिसूचित आदेश को लागू होते हैं;
(ख) उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 की 65) की धारा 18कक की उपधारा (3) और उपधारा (4) के उपबन्ध, यथास्थिति, चाय उपक्रम या चाय यूनिट को उसी परिमाण तक लागू होंगे जिस तक वे किसी औद्योगिक उपक्रम को लागू होते हैं ।
16च. दुर्भाव से की गई संविदाएं, आदि रद्द की जा सकेंगी या उनमें फेरफार किया जा सकेगा-किसी चाय उपक्रम या, यथास्थिति, चाय यूनिट को यथा लागू उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65 ) की धारा 18ख के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, किसी चाय उपक्रम या चाय यूनिट का प्रबन्ध ग्रहण करने के लिए, यथास्थिति, धारा 16घ या धारा 16ङ के अधीन प्राधिकृत व्यक्ति या व्यक्तियों का निकाय किसी भी ऐसी संविदा या करार को, जो चाय उपक्रम या चाय यूनिट और किसी अन्य व्यक्ति के बीच धारा 16घ या धारा 16ङ के अधीन अधिसूचित आदेश के जारी किए जाने से पूर्व किसी भी समय किया गया हो, रद्द करने या उसमें फेरफार करने के प्रयोजन के लिए, इस निमित्त अधिकारिता रखने वाले किसी भी न्यायालय को, केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन से, आवेदन कर सकेगा और यदि सम्यक् जांच करने के पश्चात् न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि ऐसी संविदा या ऐसा करार दुर्भाव से किया गया था या चाय उपक्रम या चाय यूनिट के हितों के लिए हानिकार है तो वह उस संविदा या करार को (चाहे बिना शर्तया ऐसी शर्तों के अधीन जो वह अधिरोपित करना ठीक समझे) रद्द या उसमें फेरफार करने वाले आदेश दे सकेगा और वह संविदा या करार तद्नुसार प्रभावी होगा ।
16छ. 1956 के अधिनियम 1 का लागू होना-(1) जहां किसी कंपनी के स्वामित्व में के किसी चाय उपक्रम या चाय यूनिट का प्रबन्ध, इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है वहां उक्त अधिनियम में या ऐसी कंपनी के संगम-ज्ञापन या संगम-अनुच्छेदों में किसी बात के होते हुए भी, -
(क) ऐसी कंपनी के शेयरधारकों या किसी अन्य व्यक्ति के लिए यह विधिपूर्ण नहीं होगा कि वह उस कंपनी का निदेशक होने के लिए किसी व्यक्ति को नाम निर्देशित या नियुक्त करे;
(ख) ऐसी कम्पनी के शेयरधारकों के किसी अधिवेशन में पारित किसी संकल्प को तब तक प्रभावी नहीं किया जाएगा जब तक उसका केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदन नहीं कर दिया जाए;
(ग) ऐसी कम्पनी के परिमापन के लिए या उसके सम्बन्ध में रिसीवर की नियुक्ति के लिए कोई भी कार्यवाही किसी न्यायालय में केन्द्रीय सरकार की अनुमति से ही होगा, अन्यथा नहीं ।
(2) उपधारा (1) के उपबन्धों और इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए तथा ऐसे अन्य अपवादों, निर्बन्धनों और परिसीमाओं के, यदि कोई हों, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, अधीन रहते हुए कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) ऐसी कंपनी को उसी रीति से लागू होता रहेगा जिस रीति से वह अधिसूचित आदेश के जारी किए जाने से पूर्व लागू था ।
16ज. धारा 16घ या धारा 16ङ के अधीन किए गए अधिसूचित आदेश को रद्द करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-यदि केन्द्रीय सरकार को, चाय उपक्रम या चाय यूनिट के स्वामी के आवेदन पर या अन्यथा किसी भी समय यह प्रतीत होता है कि धारा 16घ या धारा 16ङ के अधीन किए गए आदेश का प्रयोजन पूरा हो गया है या किसी अन्य कारण से यह आवश्यक नहीं है कि वह आदेश प्रवृत्त रहे तो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचित आदेश द्वारा ऐसे आदेश को रद्द कर सकेगी और ऐसे किसी आदेश के रद्द किए जाने पर, यथास्थति, चाय उपक्रम या चाय यूनिट का, यथास्थिति, प्रबन्ध या नियन्त्रण उस उपक्रम या यूनिट के स्वामी में निहित हो जाएगा ।
16झ चाय उपक्रम या चाय यूनिट का प्रबंध या नियंत्रण ग्रहण करने के लिए व्यक्तियों को न्यायालय की अनुज्ञा से प्राधिकृत करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि किसी ऐसे चाय उपक्रम या चाय यूनिट को, जिसके सम्बन्ध में धारा 16ख की उपधारा (2) के अधीन अन्वेषण किया गया है, चलाना या पुनः प्रारंभ करने की संभावनाएं हैं और ऐसे चाय उपक्रम या चाय यूनिट को चाय का उत्पादन, प्रदाय या वितरण बनाए रखने या बढ़ाने के लिए चलाया या पुनः प्रारंभ किया जाना चाहिए, तो वह सरकार उस न्यायलय को जिसने ऐसे चाय उपक्रम या चाय यूनिट का स्वामित्व रखने वाली कम्पनी के परिसमापन के लिए आदेश किया है, यथास्थिति, चाय उपक्रम या चाय यूनिट का प्रबन्ध ग्रहण करने या सपूंर्ण चाय उपक्रम या चाय यूनिट या उसके किसी भाग के संबंध में नियंत्रण से सम्बद्ध ऐसे कृत्यों का, जो उस आवेदन में विनिर्दिष्ट किए जाएं, प्रयोग करने के लिए किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय को नियुक्त करने की अनुज्ञा के लिए आवेदन कर सकेगी ।
(2) जहां उपधारा (1) के अधीन कोई आवेदन किया जाता है वहां, -
(क) उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की धारा 18चक की उपधारा (2) के उपबन्ध, यथास्थिति, चाय उपक्रम या चाय यूनिट को इस उपांतर के अधीन रहते हुए लागू होंगे कि उसके द्वितीय परन्तुक में आने वाले बारह वर्ष" शब्दों के स्थान पर [छह वर्ष] शब्द रखे जाएंगे;
(ख) उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की धारा 18चक की उपधारा (3) से उपधारा (10) (जिनमें ये दोनों धाराएं सम्मिलित हैं) के उपबन्ध उपधारा (1) में निर्दिष्ट चाय उपक्रम या चाय यूनिट को उसी परिमाण तक लागू होंगे जिस तक वे किसी औद्योगिक उपक्रम को लागू होते हैं ।
16ञ. चाय उपक्रम या चाय यूनिट के संबंध में कुछ घोषणाएं करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-यदि केन्द्रीय सरकार का ऐसे चाय उपक्रम या चाय यूनिट या उसके किसी भाग के सम्बन्ध में, जिसका प्रबंध या नियंत्रण धारा 16घ या धारा 16ङ या धारा 16झ के अधीन ग्रहण कर लिया गया है, यह समाधान हो जाता है कि चाय के उत्पादन के परिमाण में कमी का निवारण करने की दृष्टि से जनसाधारण के हित में ऐसा करना आवश्यक है तो वह ऐसे चाय उपक्रम या चाय यूनिट या उसके किसी भाग के सम्बन्ध में उन्हीं शक्तियों का प्रयोग कर सकेगी जो उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की धारा 18चख के अधीन किसी औद्योगिक उपक्रम के सम्बन्ध में उसके द्वारा प्रयोक्तव्य हैं और उक्त धारा और उसमें निर्दिष्ट तृतीय अनुसूची, चाय उपक्रम या चाय यूनिट को तद्नुसार लागू होंगी ।
16ट. उस चाय उपक्रम या चाय यूनिट के जिसका प्रबन्ध ग्रहण कर लिया गया है, कार्यकलापों और कार्यकरण की रिपोर्ट मांगने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) जहां, यथास्थिति, किसी चाय उपक्रम या चाय यूनिट का प्रबन्ध या नियंत्रण धारा 16घ या धारा 16ङ या धारा 16झ के अधीन ग्रहण किया गया हो वहां केन्दीय सरकार प्राधिकृत व्यक्ति से, ऐसे प्रबन्ध या नियंत्रण के चालू रहने के दौरान किसी भी समय, चाय उपक्रम या चाय यूनिट के कार्यकलापों और कार्यकरण की रिपोर्ट मांग सकेगी और रिपोर्ट भेजते समय प्राधिकृत व्यक्ति धारा 16ठ के अधीन तैयार की गई तालिका और सदस्यों और लेनदारों की सूची को ध्यान में रखेगा ।
(2) प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा भेजी गई रिपोर्ट के प्राप्त होने पर, केन्द्रीय सरकार उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की धारा 18चघ, धारा 18चङ और धारा 18चच द्वारा अपने को प्रदत्त सभी या किन्हीं शक्तियों का उसी परिमाण तक और उन्हीं शर्तों, परिसीमाओं या निर्बन्धनों के अधीन रहते हुए, जो उक्त धाराओं में विनिर्दिष्ट हैं, प्रयोग कर सकेगी और उक्त धाराओं के उपबन्ध, यथास्थिति, चाय उपक्रम या चाय यूनिट को लागू हो जाएंगे ।
16ठ. उस चाय उपक्रम या चाय यूनिट की जिसका प्रबन्ध ग्रहण कर लिया गया है, आस्तियों और दायित्वों की तालिका और उसके सदस्यों और लेनदारों की सूची की तैयारी -इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, प्राधिकृत व्यक्ति, चाय उपक्रम या चाय यूनिट का प्रबन्ध ग्रहण करने के पश्चात् यथाशीघ्र, यथास्थिति, ऐसे चाय उपक्रम या चाय यूनिट की संपत्ति, माल-असबाब, दायित्वों और बाध्यताओं की पूर्ण तालिका और ऐसे चाय उपक्रम या चाय यूनिट के सदस्यों और लेनदारों की सूची, उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की धारा 18चछ के उपबन्धों के अनुसार तैयार करेगा और उक्त धारा किसी चाय उपक्रम या चाय यूनिट को तदनुसार लागू होगी ।
[16ठठ. प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा उपगत ऋणों और किए गए विनिधानों को पूर्विकता-किसी सम्पूर्ण चाय उपक्रम या चाय यूनिट या उसके किसी भाग के सम्बन्ध में, जिसका धारा 16घ या धारा 16ङ या धारा 16झ के अधीन प्रबन्ध ग्रहण कर लिया गया है, या किया जाना तात्पर्यित है, प्रबन्ध चलाए जाने या उसके नियंत्रण के बारे में कृत्यों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा प्राप्त किसी उधार या किसी अन्य वित्तीय सौकर्य से उद्भूत प्रत्येक ऋण, -
(क) को ऐसे चाय उपक्रम या चाय यूनिट के प्रबन्ध ग्रहण से पूर्व अवगत अन्य सभी ऋणों पर, चाहे वे प्रतिभूत हों या अप्रतिभूत हों, पूर्विकता होगी;
(ख) कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 530 के अर्थ में अधिमानी ऋण होगा,
और ऐसे सभी ऋण परस्पर एक ही कोटि के होंगे और उनका चाय उपक्रम या चाय यूनिट की आस्तियों में से पूर्ण रुप से संदाय किया जाएगा जब तक कि ऐसी आस्तियां उन्हें पूरा करने के लिए अपर्याप्त न हों और आस्तियां अपर्याप्त होने की दशा में उन्हें चाय उपक्रम या चाय यूनिट के स्वामी से भू-राजस्व की बकाया के रुप में, इस बात के होते हुए भी वसूल किया जाएगा कि प्रबंध या नियंत्रण की अवधि का उस अवधि की समाप्ति के कारण, जिसके लिए उसका प्रबन्ध ग्रहण किया गया था या धारा 16ज के अधीन आदेश रद्द किए जाने के कारण या किसी न्यायालय के आदेश के अनुसरण में, अवसान हो गया है ।]
16ङ चाय उपक्रम या चाय यूनिट के सम्बन्ध में वादों और अन्य कार्यवाहियों का वर्जन-किसी ऐसे चाय उपक्रम या चाय यूनिट के विरुद्ध, जिसके सम्बन्ध में धारा 16घ या धारा 16ङ के अधीन कोई आदेश किया गया हो, कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही, केन्द्रीय सरकार या इस निमित्त उस सरकार द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी की पूर्व अनुज्ञा से ही संस्थित की जाएगी या चालू रखी जाएगी, अन्यथा नहीं ।
16ढ़ 1951 के अधिनियम 65 के अधीन बनाए गए नियमों का लागू होना-जब तक इस अध्याय में विनिर्दिष्ट किसी विषय के संबंध में कोई नियम नहीं बनाया जाए तब तक उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए गए नियम, ऐसे विषय के सम्बन्ध में, जहां तक हो सके, उस परिमाण तक लागू होंगे, जिस तक वे इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम के किसी उपबन्ध के विरुद्ध न हों और ऐसे नियमों में उस अधिनियम के उपबन्धों के प्रति निर्देशों का तद्नुसार अर्थ लगाया जाएगा ।
अध्याय 4
चाय और चाय के बीज के निर्यात पर नियंत्रण
17. चाय और चाय के बीज के निर्यात पर नियंत्रण-(1) कोई भी चाय तब तक निर्यात नहीं की जाएगी जब तक वह बोर्ड द्वारा या उसकी ओर से जारी की गई अनुज्ञाप्ति के अन्तर्गत न आती हो ।
(2) चाय का कोई भी बीज तब तक निर्यात नहीं किया जाएगा जब तक वह केन्द्रीय सरकार द्वारा या उसकी ओर से जारी किए गए किसी अनुज्ञापत्र के अन्तर्गत न आता हो ।
(3) कोई भी चाय या चाय का बीज किसी राज्य के बाहर भारत द्वार सीमाबद्ध किसी भी पुर्तगाली उपनिवेश को भूमि, समुद्र या वायु मार्ग द्वारा तब तक नहीं ले जाया जाएगा जब तक वह बोर्ड द्वारा उसकी ओर से जारी किए गए अनुज्ञापत्र के अन्तर्गत न आता हो ।
18. निर्यात की जाने वाली चाय और चाय के बीज का अनुज्ञप्ति या अनुज्ञापत्र के अन्तर्गत होना-(1) चाय या चाय के बीज का कोई भी परेषण निर्यात के लिए तब तक जहाज पर नहीं लादा जाएगा या जहाज पर लादने के लिए जलमार्ग से नहीं ले जाया जाएगा अथवा निर्यात नहीं किया जाएगा जब तक उसके स्वामी ने जहाज में लादी जाने वाली मात्रा से संबंधित, यथास्थिति, बोर्ड या केन्द्रीय सराकर द्वारा या उसकी ओर से जारी की गई विधिमान्य निर्यात अनुज्ञप्ति या विशेष निर्यात अनुज्ञप्ति या विधिमान्य अनुज्ञापत्र [सीमाशुल्क आयुक्तट कलक्टर को परिदत्त नहीं कर दिया हो ।
(2) चाय या चाय के बीज का कोई भी परेपण भारत द्वारा सीमाबद्ध किसी भी पुर्तगाली उपनिवेश को परिवहन के लिए तब तक जहाज पर नहीं लादा जाएगा या जहाज पर लादने के लिए जलमार्ग से नहीं ले जाया जाएगा (अथवा भूमि या वायुमार्ग द्वारा नहीं ले जाया जाएगा) जब तक उसके स्वामी ने जहाज में लादी जाने वाली मात्रा से संबंधित, बोर्ड द्वारा या उसकी ओर से जारी किया गया अनुज्ञापत्र 1[सीमाशुल्क आयुक्तट को परिदत्त नहीं कर दिया हो ।
(3) भारत द्वारा सीमाबद्ध किसी भी । । ।पुर्तगाली उपनिवेश में चाय या चाय के बीज भेजने के लिए कोई भी अनुज्ञापत्र भूमि सीमाशुल्क अधिनियम, 1924 (1924 का 19) की धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक ऐसे अनुज्ञापत्र के लिए आवेदन के साथ, इस प्रकार भेजी जाने वाली मात्रा से संबंधित, बोर्ड द्वारा इस निमित्त दिया गया अनुज्ञापत्र न हो ।
19. निर्यात आबंटन-केन्द्रीय सरकार, बोर्ड से परामर्श कर के तथा सभी सम्पृक्त हितों और मानक निर्यात अंक का सम्यक् ध्यान रखनेके पश्चात्, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए निर्यात आबंटन की घोषणा करेगी:
परन्तु केन्द्रीय सरकार, वित्तीय वर्ष के दौरान किसी भी समय पश्चात्वर्ती अधिसूचना द्वारा, निर्यात आबंटन में परिवर्तन कर सकेगी और तदुपरि इस प्रकार परिवर्तित निर्यात आबंटन उस वर्ष के लिए निर्यात आबंटन होगा ।
20. निर्यात कोटा और अनुज्ञप्तियां-(1) ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जैसी विहित की जाएं, किसी चाय-संपदा को या चाय-संपदा के किसी उपखंड को इस अधिनियम के अधीन, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए निर्यात कोटा प्राप्त करने का अधिकार होगा ।
(2) किसी चाय-संपदा या चाय-संपदा के उपखंड का निर्यात कोटा, अर्थात् चाय की कुल मात्रा जो किसी चाय-संपदा या चाय-संपदा के किसी उपखंड के स्वामी द्वारा वित्तीय वर्ष के दौरान निर्यात की जा सकेगी, उतनी मात्रा होगी जो बोर्ड द्वारा ऐसे सिद्धांतों के अनुसार अवधारित की जाए जैसे विहित किए जाएं:
परन्तु जब कोई आबंटन धारा 19 के उपबन्धों के अधीन परिवर्तित कर दिया जाता है तब निर्यात कोटा तदनुसार परिवर्तनीय होगा ।
(3) चाय-सम्पदा और को उसके उपखण्डों को किसी वित्तीय वर्ष के दौरान किसी भी समय आबंटित कुल निर्यात कोटा उस वर्ष के लिए तत्समय निर्यात आबंटन से अधिक नहीं होगा ।
21. निर्यात अनुज्ञाप्तियों के लिए अधिकार-(1) किसी चाय-संपदा या चाय-संपदा के उपखंड के स्वामी को जिसे किसी वित्तीय वर्ष के लिए निर्यात कोटा आबंटित कर दिया गया हो, उस वर्ष के दौरान किसी भी समय कोटे की मात्रा तक चाय के निर्यात से संबंधित निर्यात अनुज्ञाप्तियां अभिप्राप्त करने का अधिकार होगा जिसमें से वह मात्रा घटा दी जाएगी जिसके लिए निर्यात अनुज्ञप्तियां पहले ही जारी की जा चुकी हैं ।
(2) इस धारा के अधीन किसी चाय-संपदा या चाय-संपदा के उपखंड के स्वामी का अधिकार, ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जैसी विहित की जाएं, अन्तरित किया जा सकेगा और ऐसे किसी अधिकार का अन्तरिती अपना संपूर्ण अधिकार या उसका कोई भाग किसी चाय-संपदा या चाय-संपदा के उपखंड के स्वामी को पुनः अन्तरित कर सकेगा किन्तु किसी अन्य व्यक्ति को नहींः
परन्तु इस उपधारा की कोई बात अभिव्यक्त रुप से निर्यात के अधिकारों सहित विक्रय की जाने वाली चाय के निर्यात के लिए अनुज्ञप्तियों के जारी किए जाने पर निर्बन्धित नहीं होगी ।
(3) किसी चाय-संपदा या चाय-संपदा के उपखंड का स्वामी, जिसे निर्यात कोटा आबंटित कर दिया गया हो या कोई व्यक्ति जिसे उसने अपने अधिकार अन्तरित कर दिए हों, उस वित्तीय वर्ष के मार्च के 21वें दिन से पूर्व किसी भी समय, जिससे कोटा संबंधित है, कोटे के अतिशेष की मात्रा तक चाय के निर्यात से संबंधित निर्यात अनुज्ञप्ति के लिए बोर्ड को लिखित रुप में आवेदन कर सकेगा ।
(4) प्रत्येक अनुज्ञप्ति विहित प्ररुप में दो प्रतियों में होगी, उस पर उसके जारी किए जाने की तारीख होगी और वह उस वित्तीय वर्ष के अन्त तक विधिमान्य होगी जिसमें वह जारी की गई है:
परन्तु, धारा 22 में यथा उपबंधित के सिवाय, बोर्ड उस वित्तीय वर्ष के अन्त के पश्चात्, जिसमें अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन किया गया था, कोई निर्यात अनुज्ञप्ति जारी नहीं करेगा।
22 विशेष निर्यात अनुज्ञप्तियां-(1) जहां उस चाय का, जिसकी बाबत इस अधिनियाम के अधीन निर्यात अनुज्ञप्ति दी गई है या दी जा सकती है या दी जा सकती थी, उस वित्तीय वर्ष के अन्त से पूर्व निर्यात न किया गया हो जिसमें अनुज्ञप्ति दी गई थी या दी जा सकती थी वहां ऐसा व्यक्ति जिसे अनुज्ञप्ति दी गई थी या दी जा सकती थी, अगले वित्तीय वर्ष के अप्रैल के 14वें दिन से पूर्व चाय की उतनी ही मात्रा से संबंधित विशेष निर्यात अनुज्ञप्ति के लिए बोर्ड को आवेदन भेज सकेगा और तद्नुसार बोर्ड विहित फीस की, यदि कोई हो, प्राप्ति कर विशेष निर्यात अनुज्ञप्ति जारी करेगा ।
(2) कोई ऐसा व्यक्ति, जिसे विशेष निर्यात अनुज्ञप्ति उपधारा (1) के अधीन जारी की गई है, विशेष निर्यात अनुज्ञप्ति का अन्तरण, उसके द्वारा प्रदत्त सभी अधिकारों सहित, उसके द्वारा नामनिर्देशित किसी व्यक्ति या व्यक्तियों को कर सकेगा किन्तु इस प्रकार एक बार अन्तरित की गई कोई अनुज्ञप्ति आगे अन्तरणीय नहीं होगी ।
(3) विशेष निर्यात अनुज्ञप्ति विहित प्ररुप में दो प्रतियों में होगी, उस पर उसके जारी किए जाने की तारीख होगी और वह उस वित्तीय वर्ष की मई के 31वें दिन तक विधिमान्य होगी जिसमें वह जारी की गई थी ।
(4) विशेष निर्यात अनुज्ञप्ति के अन्तर्गत आने वाली चाय की मात्रा उस वर्ष के निर्यात कोटा से मुजरा की जाएगी जिसमें मूल अनुज्ञप्ति इस अधिनियम के अधीन जारी की गई थी या की जा सकती थी ।
(5) पूर्ववर्ती उपधाराओं में किसी बात के होते हुए भी बोर्ड, केन्द्रीय सरकार की साधारण या विशेष पूर्व मंजूरी से विशेष निर्यात अनुज्ञप्ति जारी करने से इंकार कर सकेगा या किसी विशेष निर्यात अनुज्ञप्ति के जारी किए जाने को, उतनी अवधि के लिए जितनी केन्द्रीय सरकार अपेक्षा करे, मुल्तवी कर सकेगा ।
23. बोर्ड द्वारा कोटा का लेखा रखा जाना-(1) बोर्ड प्रत्येक निर्यात कोटा का एक लेखा रखेगा, जिसमें ऐसी अन्य विशिष्टियों के अतिरिक्त जिन्हें बोर्ड ठीक समझे, कोटा में से जारी की गई अनुज्ञप्तियां और अतिशेष भी दिखाया जाएगा ।
(2) किसी चाय-संपदा या चाय-संपदा के उपखंड का स्वामी, अपेक्षित फीस का संदाय किए जाने पर, अपने कोटा से संबंधित लेखे की एक प्रति जो बोर्ड द्वारा बनाई गई उपविधियों में अधिकथित रीति से प्रमाणित की गई हो, प्राप्त करने का हकदार होगा ।
24. अध्याय के लागू होने पर निर्बन्धन-अध्याय की कोई बात ऐसी चाय को लागू नहीं होगी, -
(क) जिसके संबंध में [सीमाशुल्क आयुक्त] के समाधानप्रद रुप में यह साबित हो गया है कि वह भारत से बाहर के किसी पत्तन से भारत में आयात की गई है; या
(ख) जो किसी जलयान या वायुयान के फलक पर स्टोर के रुप में उतनी मात्रा में लादी गई हो जितनी 1[सीमाशुल्क आयुक्त], कर्मीदल और यात्रियों की संख्या को और उस यात्रा की दूरी को जिसके लिए जलयान या वायुयान प्रस्थान करने वाला है, ध्यान में रखते हुए युक्तियुक्त समझे; या
(ग) जो भार में [पांच किलोग्राम से अनधिक] के पैकेटों में डाक द्वारा निर्यात की गई हो; या
(घ) जो समुद्रपार फौज की सुखसुविधा की व्यवस्था करने के लिए किसी रेड क्रास सोसाइटी द्वारा या किसी संस्था द्वारा, इस निमित्त विहित सीमाओं के भीतर केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से निर्यात की गई हो; या
(ङ) जो किसी यात्री के वैयक्तिक सामान के भाग-रुप में ले जाई गई हो ।
अध्याय 5
वित्त, लेखा और संपरीक्षा
[25. भारत में उत्पादित चाय पर उपकर का अधिरोपण-(1) भारत में उत्पादित सब चाय पर, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उपकर के रुप में, [पचास पैसे प्रति किलोग्राम से अनधिक ऐसी दर से, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे,] उत्पाद-शुल्क उद्गृहीत और संगृहीत किया जाएगाः
[परन्तु चाय की भिन्न-भिन्न किस्मों या श्रेणियों के लिए, भिन्न-भिन्न दरें, चाय की ऐसी किस्मों या श्रेणियों का उत्पादन करने वाली चाय संपदाओं या बागानों की अवस्थिति और उनमें विद्यमान जलवायु संबधी दशाओं और ऐसे उत्पादों का लागू किन्हीं अन्य परिस्थतियों को ध्यान में रखते हुए, नियत की जा सकेंगी ।]
(2) उपधारा (1) के अधीन उद्ग्रहीत उत्पाद-शुल्क, केन्द्रीय उत्पाद-शुल्क और नमक अधिनियम, 1944 (1944 का 1) के या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन उद्गृहणीय उत्पाद-शुल्क के अतिरिक्त होगा ।
(3) केन्द्रीय उत्पाद-शुल्क और नमक अधिनियम, 1944 (1944 का 1) के और उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंध, जिनके अन्तर्गत वापसी संबंधी और शुल्क से छूट संबंधी उपबंध भी हैं, इस धारा के अधीन उत्पाद-शुल्क के उद्ग्रहण और संग्रहण के संबंध में यावत्शक्य वैसे ही लागू होंगे जैसे वे उक्त अधिनियम के अधीन चाय पर उत्पाद-शुल्क के उद्ग्रहण और संग्रहण के संबंध में लागू होते हैं ।]
26. उपक्रम के आगमों का बोर्ड को संदाय-धारा 25 की उपधारा (1) के अधीन उद्गृहीत उपकर के आगम प्रथमतः भारत की संचित निधि में जमा किए जाएंगे और उसके पश्चात् केन्द्रीय सरकार समय-समय पर बोर्ड को ऐसे आगमों में से, संग्रहण करने के व्यय की कटौती करने के पश्चात् ऐसी धनराशियां दे सकेगी जिन्हें वह ठीक समझे ।]
[26 क. केन्द्रीय सरकार द्वारा बोर्ड को अनुदान और उधार-केन्द्रीय सरकार इस निमित्त विधि द्वारा संसद् द्वारा किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात् बोर्ड को ऐसी धनराशियां अनुदान या उधार के रुप में दे सकेगी जिन्हें वह आवश्यक समझे ।]
27. निधि का गठन-(1) चाय निधि के नाम से ज्ञात होने वाली एक निधि बनाई जाएगी और उसमें निम्नलिखित जमा किए जाएंगे, अर्थात्ः-
(क) उपकार के वे आगम जो केन्द्रीय सरकार द्वारा बोर्ड को दिए गए हों;
[(कक) धारा 10 की उपधारा (2) के खंड (ञञ) में निर्दिष्ट कोई उपाय करते हुए बोर्ड द्वारा वसूल की गई धनराशि, जिसमें लाभांश, यदि कोई है, सम्मिलित है;]
[ (कख)] कोई धनराशि जो धारा 26क के अधीन बोर्ड को अनुदान या उधार के रुप में दी गई हो; ]
(ख) इस अधिनियम के अधीन जारी की गई अनुज्ञप्तियों, अनुज्ञापत्रों और अनुज्ञा की बाबत उद्गृहीत और संगृहीत सब फीस;
(ग) कोई अन्य फीस जो इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन उद्गृहीत और संगृहीत की जाए ।
(2) निधि का उपयोजन बोर्ड के व्ययों और धारा 10 में निर्दिष्ट उपायों के खर्च को पूरा करने के लिए किया जाएगा ।
28. बोर्ड की उधार लेने की शक्तियां-ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए जो इस निमित्त बनाए जाएं, बोर्ड को निधि की या किसी अन्य आस्ति की प्रतिभूति पर ऐसे किन्हीं प्रयोजनों के लिए उधार लेने की शक्ति होगी जिनके लिए निधि का उपयोजन किया जा सकेगा ।
[28क. हानियों को अपलिखित करना-ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं, जहां बोर्ड की यह राय है कि बोर्ड को देय कोई रकम अथवा उसके द्वारा उपगत धन या संपत्ति की कोई हानि अवसूलीय है वहां बोर्ड, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, उक्त रकम या हानि को अंतिम रुप से अपलिखित करने की मंजूरी दे सकेगाः
परन्तु केन्द्रीय सरकार का कोई ऐसा अनुमोदन उस दशा में आवश्यक नहीं होगा जिसमें ऐसी अवसूलीय रकम या हानि किसी एकल मामले में और किसी वर्ष में कुल मिलाकर ऐसी रकम से अधिक नहीं होती है, जो विहित की जाए ।]
29. लेखा और संपरीक्षा-(1) बोर्ड अपने द्वारा प्राप्त और व्यय किए गए सब धन के लेखा रखवाएगा ।
(2) लेखाओं की, केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त नियुक्त किए गए संपरीक्षकों द्वारा, प्रतिवर्ष संपरीक्षा की जाएगी और ऐसे संपरीक्षक ऐसी प्रत्येक मद को नामंजूर कर देंगे जो उनकी राय में इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए किसी नियम या जारी किए गए निदेश द्वारा प्रधिकृत नहीं है ।
(3) बोर्ड, यथापूर्वोक्त किसी मद की नामंजूरी के उसको संसूचित किए जाने की तारीख से तीन मास के भीतर, ऐसी नामंजूरी के विरुद्ध केन्द्रीय सरकार को अपील कर सकेगा जिसका विनिश्चय अन्तिम होगा ।
अध्याय 6
केन्द्रीय सरकार द्वारा नियंत्रण
30. चाय या चाय के अपशिष्ट की कीमत और वितरण का नियंत्रण करने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचित आदेश द्वारा, उसमें विनिर्दिष्ट किसी भी वर्णन की चाय की बाबत, -
(क) वह अधिकतम कीमत या न्यूनतम कीमत अथवा वे अधिकतम और न्यूनतम कीमतें नियत कर सकेगी जो चाय के उत्पादक द्वारा, विनिर्माता द्वारा अथवा थोक या खुदरा व्यवहारी द्वारा, भारतीय बाजार के लिए या निर्यात के लिए, प्रभारित की जा सकेगी;
(ख) वह अधिकतम मात्रा नियत कर सकेगी जो एक ही संव्यवहार में किसी व्यक्ति को विक्रय की जा सकेगी ।
(2) कोई ऐसा आदेश, उसमें विनिर्दिष्ट किए जाने वाले कारणों से, -
(क) ऐसी चाय के लिए विभिन्न परिक्षेत्रों में या व्यवहारियों के विभिन्न वर्गों के लिए चाय के उत्पादकों या विनिर्माताओं के लिए विभिन्न कीमतें नियत कर सकेगा;
(ख) प्रभारित की जाने वाली कीमत या कीमतें विनिर्दिष्ट करने की बजाय यह निर्दिष्ट कर सकेगा कि कीमत या कीमतें ऐसी रीति से और ऐसे विषयों के प्रति निर्देश से जो आदेश द्वारा उपबन्धित किए जाएं, संगणित की जाएंगी ।
(3) केन्द्रीय सरकार, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, -
(क) चाय या चाय के अपशिष्ट का व्ययन, सिवाय ऐसी परिस्थितियों के और ऐसी शर्तों के अधीन जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, प्रतिषिद्ध कर सकेगी;
(ख) चाय या चाय के अपशिष्ट को उपजाने वाले, उसका विनिर्माण करने वाले या उसे स्टाक में रखने वाले किसी व्यक्ति को किसी विनिर्दिष्ट अवधि के दौरान इस प्रकार उपजाई गई या विनिर्मित ऐसी सम्पूर्ण चाय या चाय के अपशिष्ट के या उसके किसी भाग के विक्रय के लिए या इस प्रकार स्टाक में रखी गई सम्पूर्ण चाय या चाय के अपशिष्ट के या उसके किसी भाग के ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के वर्ग को और ऐसी परिस्थितियों में विक्रय के लिए जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, निदेश दे सकेगी;
(ग) अनुज्ञप्तियों द्वारा, अनुज्ञापत्रों द्वारा या अन्यथा चाय या चाय के अपशिष्ट के उत्पादन, भण्डारकरण, परिवहन या वितरण को विनियमित कर सकेगी ।
(4) जहां उपधारा (3) के खण्ड (ख) के प्रति निर्देश से किए गए किसी आदेश के अनुसरण में, कोई व्यक्ति सम्पूर्ण चाय या चाय के अपशिष्ट या उसके किसी भाग का विक्रय करता है वहां उसके लिए कीमत के रुप में उसे निम्नलिखित दिया जाएगा, अर्थात्ः-
(क) जहां उपधारा (1) के अधीन कीमत नियत करने से सम्बन्धित जारी किए गए आदेश से, यदि कोई हो, संगत करार द्वारा कीमत नियत की जा सकती है वहां इस प्रकार करार पाई गई कीमत;
(ख) जहां ऐसा कोई करार नहीं हो सकता हो वहां किसी ऐसे आदेश के प्रति निर्देश से, जो खण्ड (क) में निर्दिष्ट है, संगणित कीमतः
(ग) जहां न तो खण्ड (क) और न खण्ड (ख) लागू होता है वहां विक्रय की तारीख को उस परिक्षेत्र में प्रचलित बाजार भाव के आधार पर संगणित कीमत ।
(5) उपधारा (1) और उपधारा (3) द्वारा प्रदत्त शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उनके अधीन किया गया कोई आदेश, -
(क) उन व्यक्तियों से, जो चाय या चाय के अपशिष्ट के उत्पादन, प्रदाय या वितरण अथवा व्यापार और वाणिज्य में लगे हुए हों, यह अपेक्षा करने का उपबन्ध कर सकेगा कि वे अपने कारबार से सम्बन्धित ऐसी बहियां, लेखे और अभिलेख रखें और निरीक्षण के लिए पेश करें तथा उनसे सम्बन्धित ऐसी जानकारी दें जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए,
(ख) ऐसे ही अन्य विषयों के लिए उपबन्ध कर सकेगा जिनके अन्तर्गत विशिष्टतया परिसरों, यानों, जलयानों और वायुयानों में प्रवेश करना और उनकी तालाशी लेना, ऐसी तालाशी लेने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा ऐसी चाय या चाय के अपशिष्ट का जिसकी बाबत ऐसे व्यक्ति के पास यह विश्वास करने का कारण हो कि उस आदेश का उल्लंघन किया गया है या किया जा रहा है या किया जाने वाला है, अभिग्रहण करना, अनुज्ञाप्तियां, अनुज्ञापत्र या अन्य दस्तावेजें देना और जारी करना और उनके सम्बन्ध में फीस प्रभारित करना, आते हैं ।
31. बोर्ड के कार्यों और कार्यवाहियों पर साधारण नियंत्रण-(1) बोर्ड के सब कार्य और कार्यवाहियां केन्द्रीय सरकार के नियन्त्रणाधीन होंगी जो बोर्ड द्वारा की गई किसी कार्रवाई को, जैसा वह ठीक समझे, रद्द, निलम्बित या उपान्तरित कर सकेगी ।
(2) बोर्ड ऐसे निदेशों को कार्यान्वित करेगा जो इस अधिनियम के दक्ष प्रशासन के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा समय-समय पर उसे दिए जाएं ।
(3) बोर्ड के अभिलेख, केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा सभी युक्तियुक्त समयों पर निरीक्षण के लिए, खुले रहेंगे ।
32. केन्द्रीय सरकार को अपील-धारा 14, धारा 15 या धारा 20 के अधीन बोर्ड के किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति उस आदेश की तारीख से साठ दिन के भीतर केन्द्रीय सरकार को अपील कर सकेगा और केन्द्रीय सरकार किसी ऐसे आदेश को रद्द, उपान्तरित या निलम्बित कर सकेगी ।
अध्याय 7
प्रकीर्ण
33. दलालों, चाय के विनिर्माताओं, आदि का अनुज्ञापन-केन्द्रीय सरकार, जब कभी वह ऐसा करना आवश्यक समझे, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह अपेक्षा कर सकेगी कि कोई भी व्यक्ति ऐसी तारीख को और से जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, दलाल, विनिर्माता या चाय के अपशिष्ट के व्यवहारी के रुप में या चाय सम्मिश्रण के कारबार में अपने आपको, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार बोर्ड द्वारा जारी की गई किसी अनुज्ञप्ति के उपबंधों के अनुसार और उनके अधीन ही लगाएगा, अन्यथा नहीं और ऐसे किसी व्यक्ति के बारे में, जो बोर्ड द्वारा जारी की गई अनुज्ञप्ति अभिप्राप्त किए बिना ऐसी तारीख को और उसके पश्चात् अपने आपको इस प्रकार लगाएगा, यह समझा जाएगा कि उसने इस धारा के उपबंधों का उल्लंघन किया है ।
34. निरीक्षण की शक्ति-केन्द्रीय सरकार द्वारा या बोर्ड द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत कोई व्यक्ति या अध्यक्ष द्वारा लिखित रुप में इस प्रकार प्राधिकृत कोई सदस्य या बोर्ड का कोई अधिकारी सभी युक्तियुक्त समयों पर किसी चाय-संपदा या किसी स्थान या परिसर में जहां चाय या चाय के अपशिष्ट को विक्रय के लिए भण्डार किया जाता है, रखा जाता है या अभिदर्शित किया जाता है, प्रवेश कर सकेगा और उसमें रखी किसी बही, रजिस्टर, अभिलेख या अन्य कागजातार को अपने निरिक्षण के लिए पेश करने की अपेक्षा कर सकेगा तथा चाय या चाय के अपशिष्ट के उत्पादन, भंडारकरण या विक्रय के लिए रखे जाने से संबंधित कोई भी जानकारी मांग सकेगा ।
35. विवरणियां मांगने की बोर्ड की शक्ति-(1) बोर्ड किसी चाय-संपदा या चाय-संपदा के किसी उपखंड के स्वामी पर या उसके प्रबंधक पर सूचना की तामील रजिस्ट्रीकृत डाक द्वारा, यह अपेक्षा करते हुए, कर सकेगा कि वह ऐसी अवधि के भीतर जो उसके द्वारा उस सूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, संपदा में उत्पादित चाय के उत्पादन, विक्रय और निर्यात से या किसी अन्य बात से संबंधित ऐसी विवरणियां दे जिन्हें वह आवश्यक समझे ।
(2) जहां किसी चाय-सम्पदा या चाय-सम्पदा के किसी उपखंड का स्वामी या उसका प्रबंधक, जिससे उपधारा (1) के अधीन कोई विवरण देने की अपेक्षा की गई है, उस सूचना में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर ऐसी विवरणी देने में असफल रहेगा या ऐसी विवरणी देगा जिसमें अन्तर्विष्ट कोई विशिष्टि मिथ्या है और जिसके मिथ्या होने का उसे ज्ञान है या जिसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है वहां बोर्ड उस सम्पदा या उपखंड को धारा 20 के अधीन कोई निर्यात कोटा आबंटित करने से इंकार कर सकेगा या जहां कोई निर्यात कोटा पहले ही आबंटित कर दिया गया हो वहां उस कोटा के अतिशेष को रद्द कर सकेगा और उस कोटा में से कोई और निर्यात अनुज्ञाप्तियां जारी करने से अथवा धारा 21 के अधीन कोटा के किसी अन्तरण को मान्यता देने से या उसे प्रभावी करने से इंकार कर सकेगा ।
(3) बोर्ड विनिर्माता, दलाल, व्यवहारी या चाय के अपशिष्ट के व्यवहारी पर सूचना की तामील रजिस्ट्रीकत डाक द्वारा, यह अपेक्षा करते हुए, कर सकेगा कि वह ऐसी अवधि के भीतर जो उसके द्वारा उस सूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, चाय या चाय के अपशिष्ट के विनिर्माण, स्टाक, क्रय, विक्रय या निर्यात से सम्बन्धित ऐसी विवरणियां दे जिन्हें वह आवश्यक समझे ।
36. अवैध निर्यात के लिए शास्ति-धारा 18 की उपधारा (1) या उपधारा (2) के उपबंधों का कोई भंग वैसे ही दंडनीय होगा मानो वह, सागर सीमा-शुल्क अधिनियम, 1878 (1878 का 8) की धारा 167 की मद सं० 18 के अधीन कोई अपराध हो और उस अधिनियम की धारा 168 के और अध्याय 17 के उपबंध तदनुसार लागू होंगे ।
37. मिथ्या विवरणी देने के लिए शास्ति-जो व्यक्ति, जिससे इस अधिनियम के अधीन कोई विवरणी देने की अपेक्षा की गई है, ऐसी विवरणी देने में असफल रहेगा या ऐसी विवरणी देगा, जिसमें अन्तर्विष्ट कोई विशिष्टि मिथ्या है और जिसके मिथ्या होने का उसे ज्ञान है या जिसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है, वह जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
38. बोर्ड के किसी अधिकारी या सदस्य को उसके कर्तव्यों के निर्वहन में बाधा डालने के लिए तथा बहियों और अभिलेखों को पेश करने में असफलता के लिए शास्ति-जो व्यक्ति
(क) अध्यक्ष द्वारा लिखित रुप में प्राधिकृत किसी सदस्य को या बोर्ड के किसी अधिकारी को अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा या बोर्ड द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति को, इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन, प्रदत्त किसी शक्ति के प्रयोग में या उस पर अधिरोपित किसी कर्तव्य के निर्वहन में बाधा डालेगा, या
(ख) किसी लेखा बही या अन्य अभिलेख को नियंत्रण या अभिरक्षा में रखते हुए ऐसी बही या अभिलेख को तब पेश करने में असफल रहेगा जब उससे इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन ऐसा करने की अपेक्षा की जाती है,
वह कारावास से, जो एक वर्ष तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
39. अवैध खेती के लिए शास्ति-जो कोई धारा 12 के उल्लंघन में किसी भूमि पर जानबूझकर चाय लगाएगा या चाय लगवाएगा, वह प्रथम अपराध के लिए जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा और किसी पश्चात्वर्ती अपराध के लिए जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
40. अनुज्ञा के बिना लगाई गई चाय का हटाया जाना-जहां कोई व्यक्ति धारा 39 के अधीन किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है वहां सिद्धदोष ठहराने वाला न्यायालय यह निदेश दे सकेगा कि वह चाय, जिसकी बाबत अपराध किया गया था, विनिर्दिष्ट समय के भीतर उस भूमि से हटा ली जाए और आदेश का सम्यक् अनुपालन न किए जाने की दशा में, चाय वहां से हटवा सकेगा और सिद्धदोष ठहराए गए व्यक्ति से उसका खर्च ऐसे वसूल कर सकेगा मानो वह उस चाय-सम्पदा पर शोध्य भू-राजस्व की बकाया हो जिस पर अपराध किया गया था ।
41. कीमत और वितरण के नियंत्रण से संबंधित आदेश के उल्लंघन के लिए शास्ति-(1) यदि कोई व्यक्ति धारा 30 की उपधारा (1) या उपधारा (3) के अधीन किए गए किसी आदेश का उल्लंघन करेगा तो वह कारावास से जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा और जिस संपत्ति की बाबत आदेश का उल्लंघन किया गया है वह संपत्ति या उसका उतना भाग जितना न्यायालय ठीक समझे केन्द्रीय सरकार को समपहृत हो जाएगा ।
(2) जो व्यक्ति धारा 30 की उपधारा (1) या उपधारा (3) के अधीन के किसी आदेश के उल्लंघन का प्रयत्न करेगा या उल्लंघन करने का दुष्प्रेरण करेगा उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने उस आदेश का उल्लंघन किया है ।
42. अन्य शास्तियां-जो कोई, उन उपबंधों से भिन्न, जिनके उल्लंघन के लिए धारा 36, धारा 37, धारा 38, धारा 39 और धारा 41 में दंड उपबन्धित किया गया है, इस अधिनियम के या इसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के उपबन्धों का उल्लंघन करेगा या उल्लंघन करने का प्रयत्न करेगा या उल्लंघन करने का दुष्प्रेरण करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, तथा जारी रहने वाले उल्लंघन की दशा में ऐसे अतिरिक्त जुर्माने से, जो ऐसे प्रथम उल्लंघन के लिए दोषसिद्धि के पश्चात् ऐसे प्रत्येक दिन के लिए जिसके दौरान ऐसा उल्लंघन जारी रहता है, पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
43. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) यदि इस अधिनियम के या इसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन कोई अपराध करने वाला व्यक्ति कंपनी है तो प्रत्येक व्यक्ति जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे:
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी जहां इस अधिनियम के या इसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है तथा यह साबित होता है कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए
(क) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है; तथा
(ख) फर्म के संबंध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
44. न्यायालयों की अधिकारिता-प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट के न्यायालय से अवर कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।
45. अभियोजन के लिए केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी-इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध के लिए कोई भी अभियोजन केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना संस्थित नहीं किया जाएगा ।
46. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण- [(1)] इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए [किसी नियम या आदेश] के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही किसी व्यक्ति के विरुद्ध न होगी ।
[(2) इस अधिनियम के अधीन या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या आदेश के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या किए जाने के लिए आशयित किसी बात से हुए या होने के लिए संभाव्य किसी नुकसान के लिए केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं की जा सकेगी ।]
47. प्रत्यायोजन करने की शक्ति- केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचित आदेश द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा प्रयोक्तव्य किसी शक्ति का प्रयोग, ऐसे मामलों में और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, यदि कोई हों, जैसी उस आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा भी किया जा सकेगा जो उसमें विनिर्दिष्ट किया जाए ।
48. अधिनियम के प्रवर्तन का निलंबन-(1) यदि केन्द्रीय सरकार का समाधान हो जाता है कि ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हैं जिनसे यह आवश्यक हो गया है कि इस अधिनियम द्वारा अधिरोपित कतिपय निर्बन्धनों के अधिरोपित रहने का अन्त कर दिया जाना चाहिए अथवा यदि वह लोकहित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन समझती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के सब उपबंधों या उनमें से किन्हीं के प्रवर्तन को, चाहे अनिश्चित समय के लिए या ऐसी अवधि के लिए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, निलंबित या विनिर्दिष्ट विस्तार तक शिथिल कर सकेगी ।
(2) जहां इस अधिनियम के किन्हीं उपबंधों का प्रवर्तन उपधारा (1) के अधीन अनिश्चित समय के लिए निलंबित या शिथिल कर दिया गया है वहां ऐसा निलंबन या शिथिलीकरण किसी भी समय, जब तक यह अधिनियम प्रवृत्त रहता है केन्द्रीय सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, हटाया जा सकेगा ।
49. नियम बनाने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, पूर्व प्रकाशन की शर्त के अधीन रहते हुए, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टितया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं बातों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्:
(क) बोर्ड का गठन, धारा 4 की उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट प्रत्येक प्रवर्ग में से सदस्यों के रुप में नियुक्त किए जाने वाले व्यक्तियों की संख्या, बोर्ड के सदस्यों की पदावधि और सेवा की अन्य शर्तें, उनके द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया तथा उनमें हुई रिक्तियां भरने की रीति;
(ख) वे परिस्थितियां जिनमें और वह प्राधिकारी जिसके द्वारा सदस्य हटाए जा सकेंगे;
(ग) प्रत्येक वर्ष किए जाने वाले बोर्ड के अधिवेशनों की न्यूनतम संख्या;
(घ) केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए गए [नायब/अध्यक्ष, सचिव] और अन्य अधिकारियों के वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तें;
(ङ) बोर्ड के अधिवेशनों में किए जाने वाले सब कामकाज का अभिलेख रखना और ऐसे अभिलेखों की प्रतियां केन्द्रीय सरकार को भेजना;
(च) वे शर्तें जिनके अधीन और वह रीति जिससे बोर्ड द्वारा या उसकी ओर से संविदाएं की जा सकेंगी;
(छ) बोर्ड की प्राप्तियों और व्यय के बजट-प्राक्कलनों का तैयार किया जाना और वह प्राधिकारी जिसके द्वारा ऐसे प्राक्कलन मंजूर किए जाएंगे;
(ज) व्यय उपगत करने के बारे में बोर्ड और कार्यकारिणी समिति और अध्यक्ष की शक्तियां तथा किसी बजट शीर्ष में से ऐसे ही अन्य शीर्ष में प्राक्कलित बचतों का पुनर्विनियोग;
(झ) वे शर्तें जिनके अधीन बोर्ड व्यय उपगत कर सकेगा;
(ञ) वे शर्तें जिनके अधीन बोर्ड उधार ले सकेगा;
[(ञक) धारा 28क के परन्तुक के प्रयोजनों के लिए रकम;]
(ट) वह प्ररुप जिसमें और वह रीति जिससे बोर्ड द्वारा लेखे रखे जाने चाहिएं;
(ठ) वह आधार जिस पर किसी चाय-संपदा या चाय-संपदा के उपखंड का निर्यात कोटा अवधारित किया जाएगा;
(ड) वे शर्तें जिनके अधीन निर्यात कोटा निर्यात अनुज्ञप्तियां और विशेष निर्यात अनुज्ञप्तियां अन्तरणीय होंगी;
(ढ) वे शर्तें जिनके अधीन ऐसी भूमि पर, जिस पर चाय नहीं लगाई जाती है, चाय लगाने के लिए अनुज्ञापत्र दिए जा सकेंगे;
(ण) चाय उद्योग और चाय व्यापार की बाबत किसी जानकारी या आंकड़ों का संग्रहण;
(त) इस अधिनियम के अधीन जारी की गई अनुज्ञप्तियों, अनुज्ञापत्रों और अनुज्ञाओं की बाबत उद्ग्रहण की जाने वाली फीस;
(थ) इस अधिनियम के अधीन अनुज्ञप्तियों, अनुज्ञापत्रों या अनुज्ञाओं के दिए जाने या जारी करने के लिए प्रक्रिया, वह समय जिसके भीतर ऐसी अनुज्ञप्तियां, अनुज्ञापत्र या अनुज्ञाएं दी या जारी की जाएंगी, जिसके अन्तर्गत, विशिष्टतया, आवेदन मांगने की सूचनाओं का प्रकाशन और उनके बारे में ऐसी जांच करना भी है जो उन परिस्थितियों में आवश्यक हो;
(द) इस अधिनियम के अधीन अनुज्ञप्तियों, अनुज्ञापत्रों या अनुज्ञाओं के लिए आवेदन का प्ररुप;
(ध) वह रीति जिससे किसी दलाल को या चाय के अपशिष्ट के किसी व्यवहारी को या किसी विनिर्माता को इस अधिनियम के अधीन अनुज्ञप्त किया जाएगा और ऐसी अनुज्ञप्तियों की बाबत फीस का उद्ग्रहण;
(न) वे बातें जिन पर इस अधिनियम के अधीन कोई अनुज्ञप्ति, अनुज्ञापत्र या अनुज्ञा देते या जारी करते समय विचार किया जाएगा जिनके अन्तर्गत, विशिष्टतया, कोई ऐसी अनुज्ञप्तियां, अनुज्ञापत्र या अनुज्ञाएं देने या जारी करने के बारे में बोर्ड द्वारा केन्द्रीय सरकार से पूर्व परामर्श भी है;
(प) वे शर्तें जो किन्हीं अनुज्ञप्तियों, अनुज्ञापत्रों या अनुज्ञाओं में सम्मिलित की जा सकेंगी;
(फ) वे विवरणियां जो चाय और चाय के अपशिष्ट के उत्पादन, विनिर्माण, स्टाक, विक्रय तथा निर्यात के संबंध में चाय-संपदाओं या उनके उपखंडों के स्वामियों, विनिर्माताओं, व्यवहारियों और दलालों द्वारा पेश की जानी हैं तथा वह प्ररुप जिसमें और वह रीति जिससे ऐसी विवरणियां पेश की जानी हैं;
(ब) कोटाओं के लेखाओं की प्रमाणित प्रतियां देने के लिए प्रभारित की जाने वाली फीस;
(भ) कोई अन्य फीस जो बोर्ड के लिए ऐसे आधार को अवधारित या पुनः अवधारित करने हेतु उद्ग्रहण करनी आवश्यक हो जिस पर निर्यात कोटा नियत किया जा सकेगा;
(म) कोई अन्य बात जो विहित की जानी है या की जा सकती है ।
[(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा [दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी ।यदि उस उस सत्र के जिसमें वह ऐसे रखा गया हो, या ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व] दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रुप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
50. उपविधि बनाने की बोर्ड की शक्तियां-(1) बोर्ड निम्नलिखित के लिए उपबंध करने के लिए ऐसी उपविधियां बना सकेगा जो इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों से संगत हों, अर्थात्:
(क) बोर्ड के अधिवेशनों की और कार्यकारिणी तथा अन्य समितियों के अधिवेशनों की तारीखें, समय और स्थान तथा ऐसे अधिवेशनों के लिए गणपूर्ति और उनकी प्रक्रिया;
(ख) कार्यकारिणी या किसी अन्य समिति को या उसके अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, [नायब अध्यक्ष, सचिव] या अधिकारियों में से किसी अन्य अधिकारी को शक्तियों और कर्तव्यों का प्रत्यायोजन;
(ग) सदस्यों के और समितियों के सदस्यों के यात्रा भत्ते;
(घ) केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए गए अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों से भिन्न अपने अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति, प्रोन्नति और पदच्युति तथा उनके पदों का सृजन और उत्सादन;
(ङ) केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए गए अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों से भिन्न अपने अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की सेवा की शर्तें, जिनके अन्तर्गत उनके वेतन, छुट्टी, छुट्टी-भत्ते, पेंशन, उपदान, अनुकम्पा भत्ते और यात्रा भत्ते भी हैं तथा उनके लिए भविष्य निधि की स्थापना और उसे बनाए रखना;
(च) अपने लेखाओं को बनाए रखना;
(छ) वे व्यक्ति जिनके द्वारा और वह रीति जिससे उसकी ओर से संदाय, निक्षेप और विनिधान किए जा सकेंगे;
(ज) अपने चालू व्यय के लिए अपेक्षित धन की अभिरक्षा तथा ऐसे धन का विनिधान जो इस प्रकर अपेक्षित न हो;
(झ) केन्द्रीय और राज्य सरकारों के विभागों तथा अन्य संस्थाओं को आबंटित राशियों को दर्शित करने वाले विवरणों की तैयारी ।
(2) कोई भी उपविधि तब तक प्रभावी नहीं होगी जब तक वह केन्द्रीय सरकार द्वारा पुष्ट और राजपत्र में प्रकाशित न कर दी गई हो और केन्द्रीय सरकार, किसी उपविधि की पुष्टि करते समय उसमें ऐसा परिवर्तन कर सकेगी जो आवश्यक प्रतीत हो ।
(3) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, किसी ऐसी उपविधि को रद्द कर सकेगी जिसकी उसने पुष्टि कर दी है और तदुपरि वह उपविधि प्रभावहीन हो जाएगी ।
[(4) इस धारा के अधीन बनाई गई प्रत्येक उपविधि, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखी जाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस उपविधि मे कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रुप में ही प्रभावी होगी। यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह उपविधि नहीं बनाई जानी चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगी । किंतु उपविधि के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडेगा । ]
51. निरसन और व्यावृत्तियां-(1) भारतीय चाय नियंत्रण अधिनियम, 1938 (1938 का 8) और केन्द्रीय चाय बोर्ड अधिनियम, 1949 (1949 का 13) इसके द्वारा निरसित किए जाते हैं ।
(2) सभी धन और अन्य संपत्ति तथा सभी अधिकार और हित वे चाहे किसी भी प्रकार के हों, जिन पर भारतीय चाय नियंत्रण अधिनियम, 1938 (1938 का 8) के अधीन गठित भारतीय चाय अनुज्ञापन समिति और केन्द्रीय चाय बोर्ड अधिनियम, 1949 (1949 का 13) के अधीन गठित केन्द्रीय चाय बोर्ड का स्वामित्व था, जो उनमें निहित थे, जिनका उनके द्वारा उपयोग, उपभोग किया जाता था या जो उनके कब्जाधीन थे, अथवा जो उनके द्वारा उनके लिए न्याय के रुप में धारित थे और साथ ही उस समिति या उस बोर्ड के विरुद्ध वैध रुप से अस्तित्वयुक्त सभी दायित्व इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख से बोर्ड को संक्रांत हो जाएंगे ।
(3) भारतीय चाय अनुज्ञापन समिति और केन्द्रीय चाय बोर्ड के सभी अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के बारे में जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व उस हैसियत में पद धारण किए हुए थे, यह समझा जाएगा कि वे इस अधिनियम के प्रारम्भ से बोर्ड के अधिकारी और कर्मचारी नियुक्त किए गए हैं और ऐसे किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी द्वारा भारतीय चाय अनुज्ञापन समिति या केन्द्रीय चाय बोर्ड के साथ की गई किसी सेवा-संविदा में किसी बात के होते हुए भी, वे ऐसे वेतन और भत्ते पाने के और अन्य विषयों की बाबत सेवा की ऐसी शर्तों के हकदार होंगे जो केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से बोर्ड द्वारा अवधारित की जाएं ।
(4) भारतीय चाय अनुज्ञापन समिति या केन्द्रीय चाय बोर्ड द्वारा इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व की गई कोई कार्यवाहियां ऐसे प्रारम्भ के पश्चात् बोर्ड द्वारा जारी रखी जा सकेंगी ।
(5) जब तक इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन उस निमित्त अन्य कार्रवाई न की जाए तब तक भारतीय चाय नियंत्रण अधिनियम, 1938 (1938 का 8) के उपबंधों के अधीन जारी की गई या दी गई सभी अनुज्ञप्तियां, अनुज्ञापत्र और अनुज्ञाए, आबंटित सभी निर्यात कोटे और नियत की गई सभी फीस, जब तक कि वे इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों, इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन जारी की गई, दी गई, आबंटित या नियत की गई समझी जाएंगी ।
(6) भारतीय चाय नियंत्रण अधिनियम, 1938 (1938 का 8) या केन्द्रीय चाय बोर्ड अधिनियम, 1949 (1949 का 13) के अधीन दंडनीय कोई अपराध वैसे ही दंडनीय होगा और उसके संबंध में वैसे ही कार्यवाही की जा सकेगी मानो वह इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन दंडनीय कोई अपराध हो ।
(7) भारतीय चाय अनुज्ञापन समिति या केन्द्रीय चाय बोर्ड द्वारा इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व की गई कोई अन्य बात या की गई कार्रवाई जब तक वह इस अधिनियम के उपबंधों में से किसी से असंगत न हो वैसे ही विधिमान्य और प्रभावी होगी मानो वह बोर्ड द्वारा इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् की गई हो ।
(8) शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि उपधारा (2) से उपधारा (7) तक में, जिनके अन्तर्गत ये दोनों उपधाराएं भी हैं, अन्तर्विष्ट उपबंध साधारण खंड अधिनयम, 1897 (1897 का 10) की धारा 6 के साधारण उपयोजन पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना होंगे ।
(9) यदि इस अधिनियम के उपबंधों में से किसी को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न हो तो केन्द्रीय सरकार, जैसा भी अवसर हो, आदेश द्वारा ऐसी कोई बात कर सकेगी जो उस कठिनाई को दूर करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक प्रतीत हो ।
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