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निक्षेपागार अधिनियम, 1996 ( Depositories Act, 1996 )


 

निक्षेपागार अधिनियम, 1996

(1996 का अधिनियम संख्यांक 22)

[10 अगस्त, 1996]

प्रतिभूतियों के निक्षेपागारों का विनियमन

करने का और उनसे संबंधित

या उनके आनुषंगिक

विषयों का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

                भारत गणराज्य के सैंतालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम निक्षेपागार अधिनियम, 1996 है ।

                (2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है ।

                (3) यह 20 सितंबर, 1995 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।

2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) फायदाग्राही स्वामी" से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसका नाम किसी निक्षेपागार में उस रूप में अभिलिखित है;

(ख) बोर्ड" से भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अभिप्रेत है;

(ग) उपविधि" से धारा 26 के अधीन किसी निक्षेपागार द्वारा बनाई गई उपविधि अभिप्रेत है;

(घ) कम्पनी विधि बोर्ड" से कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 10ङ के अधीन गठित कंपनी विधि प्रशासन बोर्ड अभिप्रेत है;

(ङ) निक्षेपागार" से कोई ऐसी कंपनी अभिप्रेत है जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन बनाई गई और रजिस्ट्रीकृत है और जिसे भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) की धारा 12 की उपधारा (1क) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दिया गया है;

(च) निर्गमकर्ता" से प्रतिभूतियों का निर्गमन करने वाला कोई व्यक्ति अभिप्रेत है;

(छ) सहभागी" से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) की धारा 12 की उपधारा (1क) के अधीन उस रूप में रजिस्ट्रीकृत है;

(ज) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

(झ) अभिलेख" के अन्तर्गत ऐसे अभिलेख हैं जो जिल्दों के रूप में रखे जाते हैं अथवा किसी कंप्यूटर में या किसी ऐसे अन्य रूप में, जो विनियमों द्वारा अवधारित किया जाए, भंडारित किए जाते हैं;

(ञ) रजिस्ट्रीकृत स्वामी" से कोई ऐसा निक्षेपागार अभिप्रेत है जिसका नाम निर्गमकर्ता के रजिस्टर में उस रूप में दर्ज किया जाता है;

(ट) विनियम" से बोर्ड द्वारा बनाए गए विनियम अभिप्रेत हैं;

 [(टक) प्रतिभूति अपील अधिकरण" से भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) की धारा 15] की उपधारा (1) के अधीन स्थापित प्रतिभूति अपील अधिकरण अभिप्रेत है;]

(ठ) प्रतिभूति" से ऐसी प्रतिभूति अभिप्रेत है, जो बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए;

(ड) सेवा" से कोई ऐसी सेवा अभिप्रेत है जिसका संबंध किसी निक्षेपागार के अभिलेख में प्रतिभूतियों के आबंटन के अभिलेखन से या प्रतिभूतियों के स्वामित्व के अंतरण से है ।

                (2) उन शब्दों और पदों के जो इसमें प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं है किन्तु कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) या प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956(1956 का 42) या भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992(1992 का 15) में परिभाषित हैं, वही अर्थ हैं जो उन अधिनियमों में हैं ।

अध्याय 2

कारबार के प्रारंभ का प्रमाणपत्र

3. निक्षेपागारों द्वारा कारबार के प्रारंभ का प्रमाणपत्र-(1) कोई निक्षेपागार, निक्षेपागार के रूप में तब तक कार्य नहीं करेगा जब तक कि वह बोर्ड से कारबार के प्रारंभ का प्रमाणपत्र प्राप्त नहीं कर लेता है ।

                (2) उपधारा (1) के अधीन दिया गया प्रमाणपत्र ऐसे प्ररूप में होगा, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए ।

                (3) बोर्ड, उपधारा (1) के अधीन प्रमाणपत्र तब तक नहीं देगा जब तक कि उसका यह समाधान नहीं हो जाता है कि निक्षेपागार के पास अभिलेखों और संव्यवहारों का छलसाधन का निवारण करने के लिए पर्याप्त तंत्र और रक्षोपाय हैं :

                परन्तु इस धारा के अधीन कोई प्रमाणपत्र देने से तब तक इंकार नहीं जाएगा जब तक कि संबंधित निक्षेपागार की सुनवाई को उचित अवसर नहीं दे दिया जाता है ।

अध्याय 3

निक्षेपागारों, सहभागियों, निर्गमकर्ताओं और फायदाग्राही स्वामियों के अधिकार और बाध्यताएं

4. निक्षेपागार और सहभागी के बीच करार-(1) निक्षेपागार, एक या अधिक सहभागियों के साथ करार करेगा जो उसके अभिकर्ता होंगे ।

                (2) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक करार ऐसे प्ररूप में होगा जो उपविधियों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए ।

5. निक्षेपागार की सेवाएं-कोई व्यक्ति, किसी निक्षेपागार के साथ उसकी सेवाएं प्राप्त करने के लिए ऐसे प्ररूप में, जो उपविधियों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए, किसी सहभागी के माध्यम से, करार कर सकेगा ।

6. प्रतिभूति प्रमाणपत्र का अभ्यर्पण-(1) कोई ऐसा व्यक्ति, जिसने धारा 5 के अधीन कोई करार किया है ऐसा प्रतिभूति प्रमाणपत्र, जिसके लिए वह किसी निक्षेपागार की सेवाएं प्राप्त करना चाहता है, निर्गमकर्ता को ऐसे रीति से अभ्यर्पित करेगा जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए ।

                (2) निर्गमकर्ता, उपधारा (1) के अधीन प्रतिभूति प्रमाणपत्र के प्राप्त होने पर, प्रतिभूति प्रमाणपत्र को रद्द करेगा और उक्त प्रतिभूति के संबंध में निक्षेपागार का नाम रजिस्ट्रीकृत स्वामी के रूप में अपने अभिलेख में प्रतिस्थापित करेगा और तद्नुसार निक्षेपागार को सूचित करेगा ।

                (3) निक्षेपागार, उपधारा (2) के अधीन जानकारी प्राप्त होने पर, उपधारा (1) में निर्दिष्ट व्यक्ति का नाम अपने अभिलेखों में फायदाग्राही स्वामी के रूप में दर्ज करेगा ।

7. निक्षेपागार द्वारा प्रतिभूतियों के अन्तरण का रजिस्ट्रीकरण-(1) प्रत्येक निक्षेपागार, किसी सहभागी से सूचना प्राप्त होने पर, अंतरिती के नाम में प्रतिभूति का अंतरण रजिस्टर करेगा ।

                (2) यदि किसी प्रतिभूति का कोई फायदाग्राही स्वामी या अंतरिती ऐसी प्रतिभूति को अभिरक्षा में लेना चाहता है तो तद्नुसार निक्षेपागार, निर्गमकर्ता को सूचित करेगा ।

8. प्रतिभूति प्रमाणपत्र प्राप्त करने या निक्षेपागार में प्रतिभूतियां रखने का विकल्प-(1) किसी निर्गमकर्ता द्वारा प्रस्थापित प्रतिभूतियों में अभिदाय करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह विकल्प होगा कि वह प्रतिभूति प्रमाणपत्र प्राप्त करे या किसी निक्षेपागार में प्रतिभूतियां रखे ।

                (2) जहां कोई व्यक्ति किसी निक्षेपागार में प्रतिभूति रखने के विकल्प का प्रयोग करता है वहां निर्गमकर्ता, प्रतिभूति के आंबटन के ब्यौरे के बारे में ऐसे निक्षेपागार को सूचित करेगा और निक्षेपागार ऐसी जानकारी प्राप्त होने पर आंबटिती का नाम अपने अभिलेखों में उस प्रतिभूति के फायदाग्राही स्वामी के रूप में दर्ज करेगा ।

9. निक्षेपागारों में की प्रतिभूतियों का प्रतिमोच्य रूप में होना-(1) किसी निक्षेपागार द्वारा धारित सभी प्रतिभूतियों को अमूर्तरूप दिया जाएगा और वे प्रतिमोच्य रूप में होंगी ।

 [(2) कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 153, धारा 153क, धारा 153ख, धारा 187ख, धारा 187ग और धारा 372 की कोई भी बात, निक्षेपागार द्वारा फायदाग्राही स्वामियों की ओर से धारित प्रतिभूतियों की बाबत लागू नहीं होगी ।]

10. निक्षेपागारों और फायदाग्राही स्वामी के अधिकार-(1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, किसी निक्षेपागार को किसी फायदाग्राही स्वामी की ओर से प्रतिभूति के स्वामित्व के अंतरण को प्रभावी करने के प्रयोजनों के लिए रजिस्ट्रीकृत स्वामी समझा जाएगा ।

                (2) उपधारा (1) में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, निक्षेपागार को, उसके द्वारा धारित प्रतिभूतियों के संबंध में रजिस्ट्रीकृत स्वामी के रूप में कोई मत देने का अधिकार या कोई अन्य अधिकार नहीं होगा ।

                (3) फायदाग्राही स्वामी, किसी निक्षेपागार द्वारा धारित अपनी प्रतिभूतियों के संबंध में सभी अधिकारों और फायदों का हकदार होगा और सभी दायित्वों के अधीन होगा ।

11. फायदाग्राही स्वामी का रजिस्टर-प्रत्येक निक्षेपागार, कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 150, धारा 151 और धारा 152 में उपबंधित रीति से फायदाग्राही स्वामियों का एक रजिस्टर और अनुक्रमणिका रखेगा ।

12. निक्षेपागार में धारित प्रतिभूतियों की गिरवी या आड्मान-(1) ऐसे विनियमों और उपविधियों के अधीन रहते हुए, जो इस निमित्त बनाए जाएं, कोई फायदाग्राही स्वामी, निक्षेपागार के पूर्व अनुमोदन से, ऐसी किसी प्रतिभूति के संबंध में, जो किसी निक्षेपागार के माध्यम से उसके स्वामित्व में है, गिरवी या आड्मान का सृजन कर सकेगा ।

                (2) प्रत्येक फायदाग्राही स्वामी, ऐसी गिरवी या आड्मान की सूचना निक्षेपागार को देगा और तब ऐसा निक्षेपागार तद्नुसार अपने अभिलेखों में प्रविष्टियां करेगा ।

                (3) उपधारा (2) के अधीन किसी निक्षेपागार के अभिलेखों में कोई प्रविष्टि, किसी गिरवी या आड्मान का साक्ष्य होगी ।

13. निक्षेपागार और निर्गमकर्ता द्वारा जानकारी और अभिलेखों का दिया जाना-(1) प्रत्येक निक्षेपागार, फायदाग्राही स्वामियों के नाम में प्रतिभूतियों के अन्तरण के बारे में जानकारी निर्गमकर्ता को ऐसे अन्तरालों पर और ऐसी रीति से देगा, जो उपविधियों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए ।

                (2) प्रत्येक निर्गमकर्ता, ऐसे निक्षेपागार द्वारा धारित प्रतिभूतियों के संबंध में सुसंगत अभिलेखों की प्रतियां निक्षेपागार को उपलब्ध कराएगा ।

14. किसी प्रतिभूति के संबंध में अलग होने का विकल्प-(1) यदि कोई फायदाग्राही स्वामी किसी प्रतिभूति के संबंध में किसी निक्षेपागार से अलग होना चाहता है तो वह तद्नुसार निक्षेपागार को सूचित करेगा ।

                (2) निक्षेपागार, उपधारा (1) के अधीन सूचना के प्राप्त होने पर, अपने अभिलेखों में समुचित प्रविष्टियां करेगा और निर्गमकर्ता को सूचित करेगा ।

                (3) प्रत्येक निर्गमकर्ता, निक्षेपागार से सूचना की प्राप्ति से तीस दिन के भीतर और ऐसी शर्तें पूरी करने पर और ऐसी फीस का संदाय करने पर, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं, प्रतिभूतियों का प्रमाणपत्र, यथास्थिति, फायदाग्राही स्वामी या अंतरिती को जारी करेगा ।

15. 1891 के अधिनियम 18 का निक्षेपागारों को लागू होना-बैंककार वही साक्ष्य अधिनियम, 1891, किसी निक्षेपागार के संबंध में, उसी प्रकार लागू होगा मानो वह उस अधिनियम की धारा 2 में परिभाषित कोई बैंक हो ।

16. कतिपय दशाओं में निक्षेपागारों द्वारा हानि की क्षतिपूर्ति किया जाना-(1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, निक्षेपागार या सहभागी की उपेक्षा के कारण फायदाग्राही स्वामी को हुई किसी हानि की क्षतिपूर्ति निक्षेपागार ऐसे फायदाग्राही स्वामी को करेगा ।

                (2) जहां उपधारा (1) के अधीन सहभागी की उपेक्षा के कारण हुई हानि की क्षतिपूर्ति निक्षेपागार द्वारा की जाती है वहां निक्षेपागार को ऐसे सहभागी से उसे वसूल करने का अधिकार होगा ।

17. निक्षेपागारों, आदि के अधिकार और बाध्यताएं-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, ऐसे निक्षेपागारों, सहभागियों और निर्गमकर्ताओं के जिनकी प्रतिभूतियों के विषय में किसी निक्षेपागार द्वारा व्यवहार किया जाता है, अधिकार और बाध्यताएं, विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएंगी ।

                (2) निक्षेपागार में प्रतिभूतियों के ग्रहण किए जाने के लिए पात्रता के मानदण्ड, विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएंगे ।

अध्याय 4

जांच और निरीक्षण

18. जानकारी मांगने और जांच करने की बोर्ड की शक्ति-(1) बोर्ड, यह समाधान हो जाने पर कि लोकहित में या विनिधानकर्ताओं के हित में ऐसा करना आवश्यक है, लिखित आदेश द्वारा,-

(क) किसी निक्षेपागार में धारित प्रतिभूतियों के संबंध में किसी निर्गमकर्ता, निक्षेपागार, सहभागी या फायदाग्राही स्वामी से ऐसे जानकारी, जिसकी वह अपेक्षा करे, लिखित रूप में देने की मांग कर सकेगा; या

(ख) किसी व्यक्ति को निर्गमकर्ता, फायदाग्राही स्वामी, निक्षेपागार या सहभागी के कार्यकलापों के संबंध में कोई जांच या निरीक्षण करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा, जो उसे ऐसी अवधि के भीतर, जिसे आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, ऐसी जांच या निरीक्षण की रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा ।

                (2) निक्षेपागार या निर्गमकर्ता या सहभागी या फायदाग्राही स्वामी का प्रत्येक निदेशक, प्रबन्धक, भागीदार, सचिव, अधिकारी या कर्मचारी, मांग किए जाने पर, जांच या निरीक्षण करने वाले व्यक्ति के समक्ष सभी जानकारी या अपनी अभिरक्षा में के ऐसे अभिलेख और अन्य दस्तावेजें पेश करेगा, जो ऐसी जांच या निरीक्षण की विषयवस्तु से सम्बद्ध है ।

19. कतिपय दशाओं में निदेश देने की बोर्ड की शक्ति-इस अधिनियम में जैसा उपबन्धित है उसके सिवाय, यदि कोई जांच या निरीक्षण करने या कराए जाने के पश्चात्, बोर्ड का यह समाधान हो जाता है, कि-

                                (i) विनिधानकर्ताओं के हित में या प्रतिभूति बाजार के व्यवस्थित विकास के लिए; या

(ii) किसी निक्षेपागार या सहभागी के ऐसे कार्यकलापों को, जो ऐसी रीति से संचालित किए जाते हैं, जो विनिधानकर्ताओं या प्रतिभूति बाजार के हितों के लिए हानिकारक है, रोकने के लिए,

ऐसा करना आवश्यक है तो वह-

                                (क) प्रतिभूति बाजार के साथ सहयुक्त किसी निक्षेपागार या सहभागी या किसी व्यक्ति को; या

                                (ख) किसी निर्गमकर्ता को, 

ऐसे निदेश दे सकेगा, जो विनिधानकर्ताओं या प्रतिभूति बाजार के हित में समुचित हों ।

                 [स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि इस धारा के अधीन निदेशों को जारी करने की शक्ति में, किसी ऐसे व्यक्ति को, निदेश करने की शक्ति सम्मिलित होगी और सदैव उसका सम्मिलित होना समझा जाएगा, जो इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए विनियमों के उल्लंघन में, किसी संव्यवहार या क्रियाकलाप में लगकर, ऐसे उल्लंघन से कमाए गए सदोष अभिलाभ या टाली गई हानि के समान रकम का प्रत्यर्पण करने के लिए लाभ कमाता है या हानि को टालता है ।]

 [19क. जानकारी, विवरणी आदि देने में असफलता के लिए शास्ति-कोई व्यक्ति, जिससे इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों या विनियमों या उपविधियों के अधीन,-

(क) कोई जानकारी, दस्तावेज, बहियां, विवरणियां या रिपोर्ट बोर्ड को देने की अपेक्षा की जाती है, उनके लिए विनिर्दिष्ट समय के भीतर उन्हें देने में असफल रहेगा तो वह  [ऐसी शास्ति के लिए, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किन्तु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा;]

(ख) कोई विवरणी या कोई जानकारी, बहियां या अन्य दस्तावेज, विनियमों या उपविधियों में उनके लिए विनिर्दिष्ट समय के भीतर फाइल करना या देना अपेक्षित है, विनिर्दिष्ट समय के भीतर विवरणी फाइल करने या उन्हें देने में असफल रहेगा तो वह 3[ऐसी शास्ति के लिए, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किन्तु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा;]

(ग) लेखाबहियां या अभिलेख रखना अपेक्षित है, उन्हें रखने में असफल रहेगा तो 3[ऐसी शास्ति के लिए, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किन्तु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा ।] 

19ख. कोई करार करने में असफल रहने के लिए शास्ति-यदि किसी निक्षेपागार या निक्षेपागार में भागीदार या किसी निर्गमनकर्ता या उसके अभिकर्ता या ऐसे किसी व्यक्ति से, जो भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) की धारा 12 के उपबंधों के अधीन मध्यवर्ती के रूप में रजिस्ट्रीकृत है, इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों या विनियमों के अधीन कोई करार करना अपेक्षित है, और वह ऐसा करार करने में असफल रहेगा तो ऐसा निक्षेपागार या भागीदार या निर्गमनकर्ता या उसका अभिकर्ता या मध्यवर्ती  [ऐसी शास्ति के लिए, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किन्तु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा ।]

19ग. विनिधानकर्ताओं की शिकायतों को दूर करने में असफल रहने के लिए शास्ति-यदि कोई निक्षेपागार या निक्षेपागार में भागीदार या कोई निर्गमनकर्ता या उसका अभिकर्ता या ऐसा कोई व्यक्ति जो भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) की धारा 12 के उपबंधों के अधीन मध्यवर्ती के रूप में रजिस्ट्रीकृत है, बोर्ड द्वारा विनिधानकर्ताओं की शिकायतों को दूर करने की लिखित रूप में मांग किए जाने के पश्चात्, ऐसी शिकायतों को बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट समय के भीतर दूर करने में असफल रहेगा तो ऐसा निक्षेपागार या भागीदार या निर्गमनकर्ता या उसका अभिकर्ता या मध्यवर्ती,  [ऐसी शास्ति के लिए, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किन्तु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा ।]

19घ. डिमैटेरियलाइज करने या प्रतिभूतियों का प्रमाणपत्र जारी करने में विलंब के लिए शास्ति-यदि कोई निर्गमनकर्ता या उसका अभिकर्ता या कोई व्यक्ति, जो भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) की धारा 12 के उपबंधों के अधीन मध्यवर्ती के रूप में रजिस्ट्रीकृत है, विनिधानकर्ताओं द्वारा निक्षेपागार का विकल्प दिए जाने पर प्रतिभूतियों को इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए विनियमों या उपविधियों के अधीन विनिर्दिष्ट समय के भीतर डिमैटेरियलाइजेशन करने या उनका प्रमाणपत्र जारी करने में असफल रहेगा या प्रतिभूतियों के निक्षेपागार का विकल्प किए जाने पर प्रतिभूतियों को डिमैटेरियलाज करने या उनका प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में विलंब करने को दुष्प्रेरित करेगा तो ऐसा निर्गमनकर्ता या उसका अभिकर्ता या मध्यवर्ती  [ऐसी शास्ति के लिए, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किन्तु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा ।]

19ङ. अभिलेखों का मिलान करने में असफलता के लिए शास्ति-यदि कोई निक्षेपागार या निक्षेपागार का भागीदार या कोई निर्गमनकर्ता या उसका अभिकर्ता या कोई व्यक्ति, जो भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) की  धारा 12 के उपबंधों के अधीन मध्यवर्ती के रूप में रजिस्ट्रीकृत है, विनियमों में यथाविनिर्दिष्ट निर्गमनकर्ता द्वारा जारी की गई सभी प्रतिभूतियों के साथ मैटेरियलाइज की गई प्रतिभूतियों के अभिलेखों का मिलान करने में असफल रहेगा तो ऐसा निक्षेपागार या भागीदार या निर्गमनकर्ता या उसका अभिकर्ता या मध्यवर्ती  [ऐसी शास्ति के लिए, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किन्तु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा ।]

19च. अधिनियम की धारा 19 के अधीन बोर्ड द्वारा जारी निदेशों का पालन करने में असफलता के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति, धारा 19 के अधीन बोर्ड द्वारा जारी निदेशों का, उसके द्वारा विनिर्दिष्ट समय के भीतर अनुपालन करने में असफल रहेगा तो वह  [ऐसी शास्ति के लिए, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किन्तु जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, एक करोड़ रुपए की अधिकतम शास्ति के अधीन रहते हुए एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा ।]

19छ. ऐसे उल्लंघन के लिए शास्ति, जहां किसी पृथक् शास्ति का उपबंध नहीं किया गया है-जो कोई इस अधिनियम के किसी उपबंध या उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों या उपविधियों या बोर्ड द्वारा जारी किए गए ऐसे निदेशों का पालन करने में असफल रहेगा जिसके लिए अलग से शास्ति का उपबंध नहीं किया गया है  [ऐसी शास्ति के लिए दायी होगा, जो एक लाख रुपए से कम की नहीं होगी, किन्तु जो एक करोड़ रुपए तक की हो सकेगी ।]

19ज. न्यायनिर्णयन करने की शक्ति-(1) धारा 19क, धारा 19ख, धारा 19ग, धारा 19घ, धारा 19ङ, धारा 19च और 19छ के अधीन न्यायनिर्णयन के प्रयोजन के लिए कोई शास्ति अधिरोपित करने के प्रयोजन के लिए बोर्ड संबद्ध व्यक्ति को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् विहित रीति में जांच करने के लिए ऐसे अधिकारी को, जो भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के प्रभाग प्रमुख की पंक्ति से नीचे का न हो, न्यायनिर्णायक अधिकारी के रूप में नियुक्त करेगा ।

(2) न्यायनिर्णायक अधिकारी को, जांच करते समय ऐसे किसी व्यक्ति को, जो मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से परिचित है, साक्ष्य देने के लिए या ऐसा दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए समन करने और उसे हाजिर कराने की शक्ति होगी, जो न्यायनिर्णायक अधिकारी की राय में जांच की विषय-वस्तु के लिए उपयोगी या सुसंगत हो सकेगा और यदि ऐसी जांच के पश्चात् उसका यह समाधान हो जाता है कि वह व्यक्ति उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट किसी धारा के उपबंध का पालन करने में असफल रहा है तो वह उन धाराओं में से किसी के उपबंधों के अनुसार ऐसी शास्ति जो वह ठीक समझे, अधिरोपित कर सकेगा ।

 [(3) बोर्ड इस धारा के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों के अभिलेख को मंगा सकेगा और उनकी परीक्षा कर सकेगा तथा यदि उसका यह विचार है कि न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा पारित आदेश उस विस्तार तक गलत है जहां तक यह प्रतिभूति बाजार के हितों में नहीं है तो वह ऐसी जांच करने या करवाने के पश्चात्, जो वह आवश्यक समझे, यदि मामले की परिस्थितियां उसको न्यायोचित ठहराती हैं, शास्ति की मात्रा में वृद्धि करते हुए, आदेश पारित कर सकेगा :

परन्तु ऐसा आदेश तब तक पारित नहीं किया जाएगा जब तक संबद्ध व्यक्ति को मामले में सुने जाने का अवसर प्रदान नहीं किया जाता है :

परन्तु यह और कि इस उपधारा में अंतर्विष्ट कोई बात, न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा पारित आदेश की तारीख से तीन मास की अवधि के अवसान या धारा 23क के अधीन अपील के निपटान के पश्चात्, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, लागू नहीं होगी ।]

19झ. न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा विचार में ली जाने वाली बातें-न्यायनिर्णायक अधिकारी धारा 19ज के अधीन शास्ति की मात्रा का न्यायनिर्णयन करते समय, निम्नलिखित बातों का सम्यक् ध्यान रखेगा, अर्थात् :-

(क) व्यतिक्रम के परिणामस्वरूप प्राप्त अननुपातिक लाभ या अनुचित फायदों की मात्रा, जहां उसकी गणना की जा सकती है; या

(ख) व्यतिक्रम के परिणामस्वरूप विनिधानकर्ता या विनिधानकर्ताओं के समूह को कारित हानि की रकम; या

(ग) व्यतिक्रम की आवृत्तीय प्रकृति ।

[19झक. प्रशासनिक और सिविल कार्यवाहियों का निपटारा-(1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति, जिसके विरुद्ध कोई कार्यवाही, यथास्थिति, धारा 19 या धारा 19ज के अधीन आरंभ की गई है या आरंभ की जाए, अभिकथित व्यतिक्रमों के लिए आरंभ की गई या आरंभ की जाने वाली कार्यवाहियों के निपटारे का प्रस्ताव करने के लिए बोर्ड को लिखित में आवेदन फाइल कर सकेगा ।

                (2) बोर्ड, व्यतिक्रमों की प्रकृति, गंभीरता और समाघात पर विचार करने के पश्चात्, व्यतिक्रमी द्वारा ऐसी राशि के संदाय पर या ऐसे अन्य निबंधनों पर, जो बोर्ड द्वारा भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) के अधीन बनाए गए विनियमों के अनुसार अवधारित किए जाएं, निपटारे के लिए प्रस्ताव से सहमत हो सकेगा ।

                (3) इस धारा के अधीन निपटारे के प्रयोजन के लिए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) के अधीन बोर्ड द्वारा यथाविनिर्दिष्ट प्रक्रिया लागू होगी ।

                (4) इस धारा के अधीन बोर्ड या न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा पारित किसी आदेश के विरुद्ध धारा 23क के अधीन कोई अपील नहीं होगी ।]

 [19झख. रकमों की वसूली-(1) यदि कोई व्यक्ति न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा अधिरोपित शास्ति का संदाय करने में असफल रहता है या धारा 19 के अधीन जारी प्रत्यर्पण आदेश के निदेश का अनुपालन करने में असफल रहता है या बोर्ड को देय किन्हीं फीसों का संदाय करने में असफल रहता है तो वसूली अधिकारी, व्यक्ति से देय रकम विनिर्दिष्ट करते हुए, विनिर्दिष्ट प्ररूप में अपने लेख में एक कथन (ऐसे कथन को इस अध्याय में इसके पश्चात् प्रमाणपत्र कहा गया है) तैयार कर सकेगा और ऐसे व्यक्ति से प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट रकम को निम्नलिखित एक या अधिक पद्धतियों से वसूल करने के लिए कार्यवाही करेगा, अर्थात् :-

                                (क) व्यक्ति की जंगम संपत्ति की कुर्की और विक्रय;

                                (ख) व्यक्ति के बैंक खातों की कुर्की;

                                (ग) व्यक्ति की स्थावर संपत्ति की कुर्की और विक्रय;

                                (घ) व्यक्ति की गिरफ्तारी और कारागार में उसका निरोध;

                                (ङ) व्यक्ति की जंगम और स्थावर संपत्तियों के प्रबंध के लिए प्रापक की नियुक्ति,

और इस प्रयोजन के लिए आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की धारा 220 से धारा 227, धारा 228क, धारा 229, धारा 232, दूसरी और तीसरी अनुसूचियों तथा समय-समय पर प्रवृत्त आय-कर (प्रमाणपत्र कार्यवाही) नियम, 1962 के उपबंध, जहां तक हो सके ऐसे आवश्यक उपांतरणों के साथ लागू हो सकेंगे मानो उक्त उपबंध और उसके अधीन बनाए गए नियम, इस अधिनियम के उपबंध थे और आय-कर अधिनियम, 1961 के अधीन आय-कर के स्थान पर इस अधिनियम के अधीन देय रकम के प्रति निर्देश हैं ।

                स्पष्टीकरण 1-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए व्यक्ति की जंगम या स्थावर संपत्ती या बैंक खातों में धारित धन में, ऐसी कोई संपत्ति या बैंक खातों में धारित धन सम्मिलित है, जो ऐसी तारीख को या उसके पश्चात्, प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः अंतरित किए गए हैं, जब प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट कोई रकम, व्यक्ति द्वारा पर्याप्त प्रतिफल से भिन्न उसके पति या पत्नी या अप्राप्तवय बालक या पुत्र की पत्नी या पुत्र के अप्राप्तवय बालक को देय हो चुकी थी और जो पूर्वोक्त किन्हीं व्यक्तियों द्वारा धारित की गई है या उनके नाम पर है और जहां तक उसके अप्राप्तवय बालक या उसके पुत्र के अप्राप्तवय बालक को इस प्रकार अंतरित जंगम या स्थावर संपत्ति या बैंक खातों में धारित धन का संबंध है वहां उसका, यथास्थिति, ऐसे अप्राप्तवय बालक या पुत्र के अप्राप्तवय बालक के वयस्क होने की तारीख के पश्चात् भी इस अधिनियम के अधीन व्यक्ति से देय किसी रकम की वसूली करने के लिए व्यक्ति की जंगम या स्थावर संपत्ति या बैंक खातों में धारित धन में सम्मिलित होना बना रहेगा ।

                स्पष्टीकरण 2-आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की दूसरी और तीसरी अनुसचियों और आय-कर (प्रमाणपत्र कार्यवाही) नियम, 1962 के उपबंधों के अधीन निर्धारिती के प्रति किसी निर्देश का, प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट व्यक्ति के बारे में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उसके प्रति निर्देश है ।

                स्पष्टीकरण 3-आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) के अध्याय 17घ और दूसरी अनुसूची में अपील के प्रति निर्देश का, इस अधिनियम की धारा 23क के अधीन प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष अपील के बारे में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उसके प्रति निर्देश है ।         

                (2) वसूली अधिकारी, उपधारा (1) के अधीन शक्तियों का प्रयोग करते समय स्थानीय जिला प्रशासन की सहायता प्राप्त करने के लिए सशक्त होगा ।

                (3) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, धारा 19 के अधीन बोर्ड द्वारा जारी किसी निदेश के अननुपालन के अनुसरण में उपधारा (1) के अधीन किसी वसूली अधिकारी द्वारा स्कमों की वसूली की, ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध किसी अन्य दावे पर अग्रता होगी ।

                (4) उपधारा (1), उपधारा (2) और उपधारा (3) के प्रयोजनों के लिए वसूली अधिकारी पद से बोर्ड का कोई ऐसा अधिकारी अभिप्रेत है जिसको लिखित में सामान्य या विशेष आदेश द्वारा वसूली अधिकारी की शक्तियों का प्रयोग करने के लिए, प्राधिकृत किया जाए ।]

19ञ. शास्तियों के रूप में वसूल की गई राशियों का भारत की संचित निधि में जमा किया जाना-इस अधिनियम के अधीन शास्तियों के रूप में वसूल की गई सभी राशियां भारत की संचित निधि में जमा की जाएंगी ।]

अध्याय 5

शास्ति

 [20. अपराध-(1) इस अधिनियम के अधीन न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा शास्ति के किसी अधिनिर्णय पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, यदि कोई व्यक्ति इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों, विनियमों या उपविधियों के उपबंधों का उल्लंघन करेगा या उल्लंघन करने का प्रयत्न करेगा या उल्लंघन के लिए दुष्प्रेरणा करेगा तो वह कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो पच्चीस करोड़ रुपए तक का हो सकेगा अथवा दोनों से, दंडनीय होगा ।

                (2) यदि कोई व्यक्ति न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा अधिरोपित शास्ति का संदाय करने में असफल रहेगा या उसके किसी निदेश या आदेश का पालन करने में असफल रहेगा तो वह कारावास से, जिसकी अवधि एक मास से कम की नहीं होगी, किन्तु जो दस वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से जो पच्चीस करोड़ रुपए तक का हो सकेगा अथवा दोनों से दंडनीय होगा ।]

21. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध, किसी कम्पनी द्वारा किया गया है वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कम्पनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने के भागी होंगे :

                परंतु इस उपधारा की कोई बात, किसी ऐसे व्यक्ति को इस अधिनियम में उपबन्धित किसी दण्ड का भागी नहीं बनाएगी, यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सभी सम्यक् तत्परता बरती थी ।

                (2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने का भागी होगा ।

                स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-

                                (क) कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम है; और

                                (ख) किसी फर्म के संबंध में, निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।

अध्याय 6

प्रकीर्ण

 [22. न्यायालयों द्वारा अपराधों का संज्ञान-(1) कोई न्यायालय इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों या विनियमों या उपविधियों के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड या किसी व्यक्ति द्वारा किए गए परिवाद पर के सिवाय, नहीं लेगा ।

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                           ।

22क. कतिपय अपराधों का शमन-दंड प्रकिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन दंडनीय ऐसे किसी अपराध का जो केवल कारावास से या कारावास और जुर्माने से भी दंडनीय अपराध नहीं है, किसी कार्यवाही को संस्थित करने से पूर्व या पश्चात् किसी ऐसे प्रतिभूति अपील अधिकरण या किसी ऐसे न्यायालय द्वारा शमन किया जाएगा जिसके समक्ष ऐसी कार्यवाहियां लंबित हैं ।

22ख. उन्मुक्ति प्रदान करने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, बोर्ड द्वारा सिफारिश किए जाने पर, यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि ऐसे किसी व्यक्ति ने जिसके बारे में यह अभिकथन किया गया है कि उसने इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के उपबंधों में से किसी का अतिक्रमण किया है, अभिकथित अतिक्रमण के संबंध में पूरा और सही प्रकटन किया है, ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जिन्हें वह अधिरोपित करना ठीक समझे, ऐसे व्यक्ति को इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के अधीन किसी अपराध के अभियोजन से या अभिकथित अतिक्रमण के संबंध में इस अधिनियम के अधीन किसी शास्ति के अधिरोपण से भी उन्मुक्ति प्रदान कर सकेगी :

परन्तु ऐसी कोई उन्मुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसे मामलों में नहीं दी जाएगी, जिनमें ऐसे किसी अपराध के लिए अभियोजन की कार्यवाहियां ऐसी उन्मुक्ति के अनुदान के लिए आवेदन की प्राप्ति की तारीख से पूर्व संस्थित की जा चुकी हैं :

परन्तु यह और कि इस उपधारा के अधीन बोर्ड की सिफारिश केन्द्रीय सरकार पर आबद्धकर नहीं होगी ।

(2) उपधारा (1) के अधीन किसी व्यक्ति को अनुदत्त उन्मुक्ति किसी भी समय केन्द्रीय सरकार द्वारा वापस ली जा सकेगी, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसे व्यक्ति ने कार्यवाहियों के अनुक्रम में उस शर्त का पालन नहीं किया था जिस पर उन्मुक्ति दी गई थी या उसने मिथ्या साक्ष्य दिया था और तदुपरांत, ऐसे व्यक्ति का, ऐसे अपराध के लिए जिसके संबंध में उन्मुक्ति दी गई थी या किसी ऐसे अन्य अपराध के लिए, जिसका वह उल्लंघन के संबंध में दोषी होना प्रतीत होता है, विचारण किया जा सकेगा और वह इस अधिनियम के अधीन ऐसी शास्ति के अधिरोपण का भी दायी हो जाएगा, जिसके लिए ऐसा व्यक्ति उस समय दायी होता यदि उसे ऐसी उन्मुक्ति नहीं दी गई होती ।]

 [22ग. विशेष न्यायालयों की स्थापना किया जाना-(1) केंद्रीय सरकार, इस अधिनियम के अधीन अपराधों का शीघ्र, विचारण प्रदान करने के प्रयोजन के लिए अधिसूचना द्वारा, उतने विशेष न्यायालयों को, जितने आवश्यक हों, स्थापित या नामनिर्दिष्ट कर सकेगी ।

(2) विशेष न्यायालय, ऐसे एकल न्यायाधीश से गठित होगा, जो केंद्रीय सरकार द्वारा ऐसे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति की सहमति से, जिसकी अधिकारिता के भीतर नियुक्त किया जाने वाला न्यायाधीश कार्यरत है, नियुक्त किया जाएगा ।

(3) कोई व्यक्ति किसी विशेष न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए तब तक अर्हित नहीं होगा जब तक वह ऐसी नियुक्ति से ठीक पूर्व, यथास्थिति, किसी सेशन न्यायाधीश या अपर सेशन न्यायाधीश का पद धारण नहीं कर रहा है ।

22घ. विशेष न्यायालयों द्वारा विचारणीय अपराध-दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, प्रतिभूति विधि (संशोधन) अधिनियम, 2014 के प्रारंभ की तारीख से पूर्व या ऐसे प्रारंभ की तारीख को या उसके पश्चात् किए गए इस अधिनियम के अधीन सभी अपराधों का, ऐसे क्षेत्र के लिए, जिसमें अपराध किया गया है, स्थापित विशेष न्यायालय द्वारा या जहां ऐसे क्षेत्र के लिए एक से अधिक विशेष न्यायालय हैं, उनमें से ऐसे किसी एक द्वारा, जो संबंधित उच्च न्यायालय द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किया जाए, संज्ञान लिया जाएगा और विचारण किया जाएगा ।

22ङ. अपील और पुनरीक्षण-उच्च न्यायालय, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अध्याय 29 और अध्याय 30 द्वारा, उच्च न्यायालय को प्रदत्त सभी शक्तियों का, जहां तक लागू हो सकें, उसी प्रकार प्रयोग कर सकेगा मानो उच्च न्यायालय की अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर कोई विशेष न्यायालय, उच्च न्यायालय की अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर मामलों का विचारण करने वाला कोई सेशन न्यायालय था ।

22च. विशेष न्यायालयों के समक्ष कार्यवाहियों में संहिता का लागू होना-(1) इस अधिनियम में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबंध, विशेष न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों को लागू होंगे और उक्त उपबंधों के प्रयोजनों के लिए विशेष न्यायालय का, सेशन न्यायालय होना समझा जाएगा तथा विशेष न्यायालय के समक्ष अभियोजन संचालित करने वाले व्यक्ति का, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 2 के खंड (प) के अर्थान्तर्गत लोक अभियोजक होना समझा जाएगा ।

                (2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट अभियोजन संचालित करने वाले व्यक्ति को, सात वर्ष से अन्यून के लिए अधिवक्ता के रूप में व्यवसाय में होना चाहिए या संघ या राज्य के अधीन सात वर्ष से अन्यून की अवधि के लिए विधि के विशेष ज्ञान की अपेक्षा करने वाले किसी पद को धारण करना चाहिए ।

22छ. संक्रमणकालीन उपबंध-इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी अपराध का, जो विशेष न्यायालय द्वारा विचारणीय है, जब तक विशेष न्यायालय स्थापित न किया जाए, तब तक दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी क्षेत्र पर अधिकारिता का प्रयोग करने वाले सेशन न्यायालय द्वारा संज्ञान लिया जाएगा और विचारण किया जाएगा :

                परंतु इस धारा में अंतर्विष्ट कोई बात, इस धारा के अधीन सेशन न्यायालय द्वारा संज्ञान लिए गए किसी मामले या मामलों के वर्ग को अंतरित करने के लिए संहिता की धारा 407 के अधीन उच्च न्यायालय की शक्तियों को प्रभावित नहीं करेगी ।]

23. अपीलें- (1) इस अधिनियम के अधीन  [प्रतिभूति विधि (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1999 के प्रारंभ के पूर्व बोर्ड द्वारा किए गए किसी आदेश सेट या इसके अधीन बनाए गए विनियमों से व्यथित व्यक्ति, ऐसे समय के भीतर जो विहित किया जाए, केन्द्रीय सरकार को अपील कर सकेगा ।

(2) कोई अपील, यदि वह उसके लिए विहित अवधि की समाप्ति के पश्चात् की जाती है तो, ग्रहण नहीं की जाएगी :

परन्तु कोई अपील उसके लिए विहित अवधि की समाप्ति के पश्चात् ग्रहण की जा सकेगी यदि अपीलार्थी केन्द्रीय सरकार का यह समाधान कर देता है कि उसके पास विहित अवधि के भीतर अपील न करने के लिए पर्याप्त हेतुक था ।

(3) इस धारा के अधीन की गई प्रत्येक अपील, ऐसे प्ररूप में की जाएगी और उसके साथ उस आदेश की जिसके विरुद्ध अपील की गई है, एक प्रति और ऐसी फीस होगी, जो विहित की जाए ।

(4) किसी अपील को निपटाने की प्रक्रिया ऐसी होगी, जो विहित की जाए :

परन्तु किसी अपील का निपटारा करने के पूर्व अपीलार्थी को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाएगा ।]

 [23क. प्रतिभूति अपील अधिकरण को अपील-(1) उपधारा (2) में जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, प्रतिभूति विधि (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1999 के प्रारंभ को उसके पश्चात् इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए विनियमों के अधीन  [बोर्ड द्वारा किए गए किसी आदेश या इस अधिनियम के अधीन न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा किए गए किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति]    इस विषय पर अधिकारिता रखने वाले प्रतिभूति अपील अधिकरण को अपील कर सकेगा ।

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                           ।

                (3) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक अपील उस तारीख से, जिसको बोर्ड द्वारा किए गए आदेश की प्रति उपधारा (1) में निर्दिष्ट व्यक्ति द्वारा प्राप्त की जाती है, पैंतालीस दिन की अवधि के भीतर फाइल की जाएगी, और वह ऐसे प्ररूप में होगी और उसके साथ ऐसी फीस होगी जो विहित की जाए :

                परन्तु प्रतिभूति अपील अधिकरण कोई अपील उक्त पैंतालीस दिन की अवधि की समाप्ति के पश्चात् ग्रहण कर सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उस अवधि के भीतर उसके फाइल न किए जाने का पर्याप्त कारण था ।

                (4) उपधारा (1) के अधीन अपील प्राप्त होने पर, प्रतिभूति अपील अधिकरण, अपील के पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् उस आदेश की, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, पुष्टि करके, उसे उपांतरित या अपास्त करके, उस पर ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जो वह ठीक समझे ।

                (5) प्रतिभूति अपील अधिकरण, अपने द्वारा किए गए प्रत्येक आदेश की एक प्रति बोर्ड को और अपील के पक्षकारों को भेजेगा ।

                (6) उपधारा (1) के अधीन प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष फाइल की गई अपील पर उसके द्वारा यथाशक्य शीघ्र कार्रवाई की जाएगी और उसके द्वारा अपील के प्राप्त होने की तारीख से छह मास के भीतर अंतिम रूप से निपटाने के लिए प्रयास किया जाएगा ।

23ख. प्रतिभूति अपील अधिकरण की प्रक्रिया और शक्तियां-(1) प्रतिभूति अपील अधिकरण, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) द्वारा अधिकथित प्रक्रिया से आबद्ध नहीं होगा, किन्तु यह नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों से मार्गदर्शन प्राप्त करेगा और इस अधिनियम और किन्हीं नियमों के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्रतिभूति अपील अधिकरण को अपनी प्रक्रिया का विनियमन करने की शक्ति होगी, जिसके अंतर्गत वे स्थान भी हैं जहां वह अपनी बैठकें करेगा ।

                (2) प्रतिभूति अपील अधिकरण को, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करने के प्रयोजनों के लिए, निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन वाद का विचारण करते समय किसी सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात् :-

                (क) किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना;

                (ख) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;

                (ग) शपथ-पत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;

                (घ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना;

                (ङ) अपने विनिश्चयों का पुनर्विलोकन करना;

                (च) किसी आवेदन को व्यतिक्रम के लिए खारिज करना या उसका एकपक्षीय रूप से विनिश्चय करना;

(छ) किसी आवेदन को व्यतिक्रम के लिए खारिज करने के किसी आदेश या अपने द्वारा एकपक्षीय रूप से पारित किसी आदेश को अपास्त करना; और

(ज) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाए ।

                (3) प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष प्रत्येक कार्यवाही भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थान्तर्गत और धारा 196 के प्रयोजनों के लिए न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी और प्रतिभूति अपील अधिकरण, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के सभी प्रयोजनों के लिए, सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।

23ग. विधिक प्रतिनिधित्व का अधिकार-अपीलार्थी प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए स्वयं हाजिर हो सकेगा या एक या अधिक चार्टर्ड अकाउन्टेंट या कंपनी सचिव या लागत लेखापाल या विधि व्यवसायी या अपने अधिकारियों में से किसी को प्राधिकृत कर सकेगा ।

                स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-

(क) चार्टर्ड अकाउन्टेंट" से चार्टर्ड अकाउन्टेंट अधिनिमय, 1949 (1949 का 38) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ख) में यथापरिभाषित ऐसा चार्टर्ड अकाउन्टेंट अभिप्रेत है जिसने उस अधिनियम की धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन व्यवसाय का प्रमाणपत्र अभिप्राप्त कर लिया है;

(ख) कंपनी सचिव" से कंपनी सचिव अधिनियम, 1980 (1980 का 56) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ग) में यथापरिभाषित ऐसा कंपनी सचिव अभिप्रेत है जिसने उस अधिनियम की धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन व्यवसाय का प्रमाणपत्र अभिप्राप्त कर लिया है;

(ग) लागत लेखापाल" से लागत और संकर्म लेखापाल अधिनियम, 1959 (1959 का 23) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ख) में यथापरिभाषित ऐसा कोई लागत लेखापाल अभिप्रेत है जिसने उस अधिनियम की धारा 6 के अधीन व्यवसाय का प्रमाणपत्र अभिप्राप्त कर लिया है;

(घ) विधि व्यवसायी" से कोई अधिवक्ता, वकील या उच्च न्यायालय का कोई अटर्नी अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत व्यवसायरत कोई प्लीडर भी है ।

23घ. परिसीमा-परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का 36) के उपबंध, जहां तक हो सके, प्रतिभूति अपील अधिकरण को की गई अपील को लागू होंगे ।

23ङ. सिविल न्यायालय की अधिकारिता होना-किसी सिविल न्यायालय को ऐसे विषय से संबंधित कोई वाद ग्रहण करने या कार्यवाही करने की अधिकारिता नहीं होगी जिसका अवधारण करने के लिए प्रतिभूति अपील अधिकरण को इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन सशक्त बनाया गया है और किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी द्वारा, इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन प्रदत्त किसी शक्ति के अनुसरण में की गई या की जाने वाली किसी कार्रवाई की बाबत व्यादेश मंजूर नहीं किया जाएगा ।

 [23च. उच्चतम न्यायालय को अपील-प्रतिभूति अपील अधिकरण के किसी विनिश्चय या आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, प्रतिभूति अपील अधिकरण के विनिश्चय या आदेश के उसे संसूचित किए जाने की तारीख से साठ दिन के भीतर ऐसे आदेश से उद्भूत विधि के प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय को अपील कर सकेगा :

                परन्तु यदि उच्चतम न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी उक्त अवधि के भीतर अपील फाइल करने से पर्याप्त कारण से निवारित हुआ था तो वह उसे साठ दिन से अनधिक की और अवधि के भीतर अपील फाइल करने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा ।]

24. नियम बनाने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।

                (2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए, उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात् :-

 [(क) धारा 19ज की उपधारा (1) के अधीन जांच की रीति;

(कक) वह समय, जिसके भीतर धारा 23 की उपधारा (1) के अधीन अपील की जा सकेगी;]

(ख) वह प्ररूप, जिसमें धारा 23 की उपधारा (3) के अधीन कोई अपील की जा सकेगी और ऐसी अपील की     बाबत संदेय फीसें;

                (ग) धारा 23 की उपधारा (4) के अधीन अपील को निपटाने की प्रक्रिया;

                 [(घ) वह प्ररूप जिसमें धारा 23क के अधीन प्रतिभूति अपील अधिकरण के समक्ष अपील फाइल की जा सकेगी और ऐसी अपील की बाबत संदेय फीस ।]

25. विनियम बनाने की बोर्ड की शक्ति-(1) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) की धारा 30 के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, बोर्ड इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए ऐसे विनियम, जो इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबन्धों से संगत हो, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगा ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियमों में निम्नलिखित के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा अर्थात् :-

                (क) वह प्ररूप, जिसमें धारा 2 के खण्ड (झ) के अधीन अभिलेख रखा जाएगा;

                (ख) वह प्ररूप, जिसमें धारा 3 की उपधारा (2) के अधीन कारबार के प्रारम्भ का प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा; 

                (ग) वह रीति, जिससे धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन प्रतिभूति प्रमाणपत्र अभ्यर्पित किया जाएगा;

(घ) धारा 12 की उपधारा (1) के अधीन किसी फायदाग्राही स्वामी के स्वामित्व में की प्रतिभूति की बाबत गिरवी या आड्मान का सृजन करने की रीति;

(ङ) धारा 14 की उपधारा (3) के अधीन प्रतिभूति प्रमाणपत्र के जारी किए जाने से संबंधित शर्तें और संदेय फीस;

(च) धारा 17 की उपधारा (1) के अधीन निक्षेपागारों, सहभागियों और निर्गमकर्ताओं के अधिकार और बाध्यताएं;

(छ) धारा 17 की उपधारा (2) के अधीन निक्षपेगार में प्रतिभूतियों के ग्रहण किए जाने के लिए पात्रता के मानदण्ड;

 [(ज) धारा 19झक की उपधारा (2) के अधीन कार्यवाहियों के निपटारे के लिए बोर्ड द्वारा अवधारित निबंधन; और

(झ) कोई अन्य विषय जिनको विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाना अपेक्षित है या जिनको विनिर्दिष्ट किया जाए या जिनके संबंध में उपबंध, विनियमों द्वारा किया जाना है ।]   

26. उपविधियां बनाने की निक्षेपागारों की शक्ति-(1) कोई निक्षेपागार, बोर्ड के पूर्व अनुमोदन से, ऐसी उपविधियां, जो इस अधिनियम और विनियमों के उपबन्धों से संगत हों, बना सकेगा ।

                (2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसी उपविधियों में निम्नलिखित के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा, अर्थात :-

                                (क) निक्षेपागार में प्रतिभूतियों के ग्रहण किए जाने और हटाए जाने के लिए पात्रता के मानदण्ड;

                                (ख) वे शर्तें, जिनके अधीन प्रतिभूतियों के विषय में व्यवहार किया जाएगा;

                                (ग) सहभागी के रूप में किसी व्यक्ति के प्रवेश के लिए पात्रता के मानदंड;

                                (घ) प्रतिभूतियों की भौतिकता दूर करने की रीति और प्रक्रिया;

                                (ङ) निक्षेपागार के भीतर संव्यवहारों के लिए प्रक्रिया;

                                (च) वह रीति, जिससे प्रतिभूतियों के विषय में व्यवहार किया जाएगा या वे निक्षेपागार से वापस ली जाएंगी;

(छ) सहभागियों और फायदाग्राही स्वामियों के हितों का संरक्षण करने के रक्षोपाय सुनिश्चित करने के लिए प्रक्रिया;

(ज) किसी फायदाग्राही स्वामी द्वारा सहभागी के रूप में प्रवेश और उससे अलग होने की शर्तें;

(झ) लाभांश की घोषणा, शेयरधारियों के अधिवेशनों और फायदाग्राही स्वामियों के हित के अन्य विषयों के संबंध में सहभागियों और फायदाग्राही स्वामियों को जानकारी पहुंचाने के लिए प्रक्रिया;

(ञ) कम्पनी से प्राप्त लाभांश, ब्याज और धनीय फायदों के फायदाग्राही स्वामियों के बीच वितरण की रीति;

(ट) किसी निक्षेपागार के पास धारित प्रतिभूतियों की बाबत गिरवी या आड्मान का सृजन करने की रीति;

(ठ) निक्षेपागार, निर्गमकर्ता, सहभागियों और फायदाग्राही स्वामियों के बीच अधिकार और बाध्यताएं, जो एक-दूसरे के मुकाबले में हैं;

(ड) बोर्ड, निर्गमकर्ता और अन्य व्यक्तियों को जानकारी देने की रीति और कालिकता;

(ढ) उन विवादों को निपटाने की प्रक्रिया जिनमें निक्षेपागार, निर्गमकर्ता, कम्पनी या कोई फायदाग्राही स्वामी अन्तर्ग्रस्त है;

(ण) विनियमों को भंग करने वाले सहभागी के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए प्रक्रिया तथा निक्षेपागार से सहभागियों के निलंबन और निष्कासन के लिए उपबंध तथा निक्षेपागार के साथ किए गए करारों का रद्दकरण;

(त) आंतरिक नियंत्रण मानक, जिनके अंतर्गत संपरीक्षा, पुनर्विलोकन और मानीटर करने के लिए प्रक्रिया है ।

                (3) जहां बोर्ड ऐसा करना समीचीन समझता है वहां वह किसी निक्षेपागार को ऐसी अवधि के भीतर जो वह इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, कोई उपविधि बनाने के लिए या पहले बनाई गई किन्हीं उपविधियों का संशोधन या प्रतिसंहरण करने के लिए, लिखित आदेश द्वारा, निदेश दे सकेगा ।

                (4) यदि निक्षेपागार विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर ऐसे आदेश का अनुपालन करने में असफल रहता है या उसकी उपेक्षा करता है तो बोर्ड, उपविधियां बना सकेगा अथवा बनाई गई उपविधियों का, आदेश में विनिर्दिष्ट रूप में या उसका ऐसे उपान्तरणों के साथ, जो बोर्ड ठीक समझे, संशोधन या प्रतिसंहरण कर सकेगा ।

27. नियमों और विनियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले ही की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडे़गा ।

28. अन्य विधियों का लागू होना वर्जित होना-इस अधिनियम के उपबन्ध, प्रतिभूतियों के धारण और अंतरण से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अतिरिक्त होंगे, न कि उसके अल्पीकरण में ।

29. कठिनाइयों का दूर किया जाना-(1) यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबन्ध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत न हों और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों :

                परन्तु इस धारा के अधीन कोई आदेश, इस अधिनियम के प्रारंभ से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।

                (2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष              रखा जाएगा ।

[30. कतिपय अधिनियमितियों का संशोधन-इस अधिनियम की अनुसूची में विनिर्दिष्ट अधिनियमितियां, उसमें उपबन्धित रीति से संशोधित की जाएंगी ।]

 [30क. कतिपय अधिनियमों का विधिमान्यकरण-प्रशासनिक तथा सिविल कार्यवाहियों के निपटान के संबंध में मूल अधिनियम के अधीन किया गया या किए जाने के लिए तात्पर्यित कोई कार्य या कोई बात, सभी प्रयोजनों के लिए इस प्रकार विधिमान्य और प्रभावी समझी जाएगी मानो मूल अधिनियम में किए गए संशोधन सभी तात्त्विक समयों पर प्रवृत्त थे ।]

31. निरसन और व्यावृत्ति-(1) निक्षेपागार (तीसरा) अध्यादेश, 1996 (1996 का अध्यादेश संख्यांक 28) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।

                (2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई, इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबन्धों के अधीन की गई समझी जाएगी ।

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                           ।

।अनुसूची

(धारा 30 देखिए)

कतिपय अधिनियमितियों का संशोधन

भाग 1

भारतीय-स्टांप अधिनियम, 1899 (1899 का 2) का संशोधन

संशोधन

                धारा 8 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अन्तःस्थापित की जाएगी, अर्थात् :-

8क. प्रतिभूतियों का स्टांप शुल्क के दायित्वाधीन होना-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी,-

(क) कोई निर्गमकर्ता, एक या अधिक निक्षेपागारों को प्रतिभूतियों का निर्गमन करके, ऐसे निर्गमन की बाबत अपने द्वारा निर्गमित प्रतिभूति की कुल रकम पर शुल्क से प्रभार्य होगा और ऐसी प्रतिभूतियों को स्टापित करने की आवश्यकता नहीं होगी;

(ख) जहां कोई निर्गमकर्ता, निक्षेपागार अधिनियम, 1996 की धारा 14 की उपधारा (3) के अधीन प्रतिभूति प्रमाणपत्र जारी करता है वहां ऐसे प्रमाणपत्र पर वही शुल्क संदेय होगा जो इस अधिनियम के अधीन प्रमाणपत्र की दूसरी प्रति जारी करने पर संदेय है;

(ग) किसी व्यक्ति से किसी निक्षेपागार को या किसी निक्षेपागार से किसी फायदाग्राही स्वामी को शेयरों के रजिस्ट्रीकृत स्वामित्व का अंतरण किसी स्टांप शुल्क के दायित्वाधीन नहीं होगा;

(घ) शेयरों के फायदाग्राही स्वामित्व का अंतरण, जब ऐसे शेयर किसी कम्पनी के ऐसे शेयर हों, जिनके विषय में किसी निक्षेपागार द्वारा व्यवहार किया जाता है, इस अधिनियम की अनुसूची 1 के अनुच्छेद 62 के अधीन शुल्क के दायित्वाधीन नहीं होगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजन के लिए, फायदाग्राही स्वामी", निक्षेपागार" और निर्गमकर्ता" पदों के वही अर्थ हैं जो निक्षेपागार अधिनियम, 1996 की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (क), खंड (ङ) और खण्ड (च) में हैं ।ऱ् ।

भाग 2

कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) का संशोधन

संशोधन

1. धारा 2 के खंड (45क) के पश्चात् निम्नलिखित खंड अन्तःस्थापित किया जाएगा, अर्थात् :-

 (45ख) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड" से भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992   (1992 का 15) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अभिप्रेत है ।ऱ् ।

2. धारा 2 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अन्तःस्थापित की जाएगी, अर्थात् :-

2क. कतिपय शब्दों और पदों का निर्वचन-उन शब्दों और पदों के जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं किन्तु निक्षेपागार अधिनियम, 1996 (1996 का 22) में परिभाषित हैं वही अर्थ हैं जो उस अधिनियम      में हैं ।" ।

3. धारा 41 की उपधारा (2) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा अन्तःस्थापित की जाएगी, अर्थात्  :-

(3) प्रत्येक ऐसा व्यक्ति, जो कम्पनी की साधारण अंश (शेयर) पूंजी धारण कर रहा है और जिसका नाम निक्षेपागार के अभिलेखों में फायदाग्राही स्वामी के रूप में दर्ज कर लिया गया है, संबंधित कम्पनी का सदस्य समझा जाएगा ।" ।

4. धारा 49 की उपधारा (5) के खंड (ख) के पश्चात् निम्नलिखित खंड अन्तःस्थापित किया जाएगा, अर्थात् :-

(ग) किसी निक्षेपागार के नाम में विनिधानों को, जब ऐसे विनिधान कंपनी द्वारा किसी फायदाग्राही स्वामी के रूप में धारित प्रतिभूतियों के रूप में हैं, धारित करने से निवारित करती है ।" ।

5. धारा 51 में निम्नलिखित परन्तुक अन्तःस्थापित किया जाएगा, अर्थात् :-

परन्तु जहां प्रतिभूतियां किसी निक्षेपागार में धारित हैं वहां फायदाग्राही स्वामित्व के अभिलेखों की तामील ऐसे निक्षेपागार द्वारा कम्पनी पर इलेक्ट्रानिक पद्धति के माध्यम से अथवा फ्लापी या डिस्क का परिदान करके की जा सकेगी ।" ।

6. धारा 83 का लोप किया जाएगा ।

7. धारा 108 की उपधारा (2) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा अन्तःस्थापित की जाएगी, अर्थात्  :-

(3) इस धारा की कोई बात, ऐसे अंतरक और अंतरिती द्वारा किए गए प्रतिभूति के अंतरण को वहां लागू नहीं होगी, जहां दोनों ही किसी निक्षेपागार के अभिलेखों में फायदाग्राही स्वामियों के रूप में दर्ज किए जाते हैं ।" ।

8. धारा 111 की उपधारा (13) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा अन्तःस्थापित की जाएगी, अर्थात्  :-

(14) इस धारा में, कम्पनी" से कोई प्राइवेट कम्पनी अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत ऐसी प्राइवेट कम्पनी है जो इस अधिनियम की धारा 43क के आधार पर पब्लिक कम्पनी हो गई है ।ऱ् ।9. धारा 111 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अन्तःस्थापित की जाएगी, अर्थात्  :-

111क. अंतरण पर रजिस्टर का परिशोधन-(1) इस धारा में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, कम्पनी से इस अधिनियम की धारा 111 की उपधारा (14) में निर्दिष्ट कम्पनी से भिन्न कोई कम्पनी अभिप्रेत है ।ऱ् ।

(2) इस धारा के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, किसी कम्पनी के अंश (शेयर) या डिबेंचर और उसमें कोई हित निर्बाध रूप से अंतरणीय होंगे ।

(3) कम्पनी विधि बोर्ड, यथास्थिति, किसी निक्षेपागार द्वारा धारित किन्हीं अंशों (शेयरों) या डिबेंचरों के अंतरण की तारीख से या ऐसी तारीख से, जिसको अंतरण को लिखत या पारेषण की सूचना कंपनी को परिदत्त की गई थी, दो मास के भीतर किसी निक्षेपागार कम्पनी, सहभागी या विनिधानकर्ता अथवा भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा आवेदन किए जाने पर, ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे, किसी कम्पनी या निक्षेपागार के रजिस्टर या अभिलेखों को परिशोधित करने का निदेश दे सकेगा, यदि अंशों (शेयरों) या डिबेंचरों का अंतरण भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) या उसके अधीन बनाए गए विनियमों अथवा रुग्ण औद्योगिक कम्पनी (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1985 (1986 का 1) के किसी उपबंध के उल्लंघन में है ।

(4) कम्पनी विधि बोर्ड, उपधारा (3) के अधीन कार्रवाई करते समय, मत देने के अधिकारों को निलंबित करने के बारे में अंतरिम आदेश, ऐसी जांच करने या उस जांच के पूरा होने के पूर्व, स्वाविवेकानुसार, कर सकेगा ।

(5) इस धारा के उपबंध, अंशों (शेयरों) या डिबेंचरों के धारक के ऐसे अंशों (शेयरों) या डिबेंचरों के अंतरण के अधिकार को निर्बन्धित नहीं करेंगे और ऐसे अंशों (शेयरों) या डिबेंचरों का अर्जन करने वाला कोई व्यक्ति मत देने के अधिकारों का तब तक हकदार होगा जब तक कि कम्पनी विधि बोर्ड के किसी आदेश द्वारा मत देने के अधिकारों का लम्बन नहीं कर दिया जाता है ।

(6) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी, कम्पनी विधि बोर्ड के पास आवेदन के लंबित रहने के दौरान, अंशों (शेयरों) या डिबेंचरों का कोई और अंतरण, अंतरिती को तब तक मत देने के अधिकारों का हकदार बनाएगा जब तक कि ऐसे अंतरिती की बाबत मत देने का अधिकार भी निलंबित नहीं कर दिया जाता है ।

(7) धारा 111 की उपधारा (5), उपधारा (7), उपधारा (9), उपधारा (10) और उपधारा (12) के उपबंध, इस धारा के अधीन कम्पनी विधि बोर्ड के समक्ष कार्यवाहियों को जहां तक हो सके, उसी प्रकार लागू होंगे जैसे कि वे उस धारा के अधीन कार्यवाहियों को लागू होते हैं ।" । 

                10. धारा 113 की उपधारा (3) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा अन्तस्थापित की जाएगी, अर्थात् :-

(4) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां प्रतिभूतियों के विषय में किसी निक्षेपागार में व्यवहार किया जाता है वहां कम्पनी, ऐसी प्रतिभूतियों के आंबटन पर प्रतिभूतियों के आबंटन के ब्यौरों के बारे में निक्षेपागार को तुरन्त सूचित करेगी ।" । 

                11. धारा 150 की उपधारा (1) के खंड (ख) में, जिनमें से हर एक अंश (शेयर) अपने संख्यांक द्वारा सुभिन्न किया हुआ होगा" शब्द और कोष्ठकों का लोप किया जाएगा ।

                12. धारा 152 की उपधारा (1) के खंड (ख) में, जिनमें से हर एक डिबेंचर अपने संख्यांक द्वारा सुभिन्न किया गया होगा" शब्दों का लोप किया जाएगा ।

                13. धारा 152 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अन्तःस्थापित की जाएगी, अर्थात्  :-

152क. फायदाग्राही स्वामियों का रजिस्टर और अनुक्रमणिका-निक्षेपागार अधिनियम, 1996 (1996 का 22) की धारा 11 के अधीन किसी निक्षेपागार द्वारा रखा गया फायदाग्राही स्वामियों का रजिस्टर और अनुक्रमणिका इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, यथास्थिति, सदस्यों की अनुक्रमणिका और डिबेंचरधारियों का रजिस्टर और अनुक्रमणिका  समझी जाएगी ।" ।

14. अनुसूची 2 के भाग 2 के खंड ग में, उपखंड 9 के पश्चात् निम्नलिखित उपखंड अन्तःस्थापित किया जाएगा, अर्थात् :-

9क. ऐसी प्रतिभूतियों को, जिनके विषय में किसी निक्षेपागार में व्यवहार किया जाता है, प्रतिश्रुत करने के लिए विकल्प के ब्यौरे ।" ।

भाग 3

प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 (1956 का 42) का संशोधन

संशोधन

                1. धारा 2 के खंड (झ) के स्थान पर निम्नलिखित खंड रखा जाएगा अर्थात् :-

                                (झ) हाजिर संविदा" से ऐसी संविदा अभिप्रेत है जिसमें-

(क) संविदा की तारीख के ही दिन या उसके अगले दिन, प्रतिभूतियों के वास्तविक परिदान और उनकी कीमत के संदाय के लिए उपबंध है, यदि संविदा के पक्षकार एक ही नगर या स्थान में निवास नहीं करते हैं तो पूर्वोक्त अवधि की संगणना करने में, प्रतिभूतियों के भेजने में या उनके लिए डाक द्वारा धन भेजने में लगी वास्तविक अवधि अपवर्जित की जाएगी;

(ख) किसी फायदाग्राही स्वामी के खाते से दूसरे फायदाग्राही स्वामी के खाते में निक्षेपागार द्वारा प्रतिभूतियों के अंतरण के लिए उपबंध है, जब ऐसी प्रतिभूतियों के विषय में किसी निक्षेपागार द्वारा व्यवहार किया जाता है ।" ।

                2. धारा 22क का लोप किया जाएगा ।

भाग 4

आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) का संशोधन

संशोधन

                धारा 45 की उपधारा (2) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा अन्तःस्थापित की जाएगी, अर्थात् :-

(2) जहां किसी व्यक्ति का पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय किन्हीं प्रतिभूतियों में फायदाप्रद हित रहा हैं, वहां प्रतिभूतियों की बाबत ऐसे फायदाप्रद हित के निक्षेपागार या सहभागी द्वारा किए गए अंतरण से उद्भूत कोई लाभ या अभिलाभ, ऐसे पूर्ववर्ष की फायदाग्राही स्वामी की आय के रूप में आय-कर से प्रभार्य होंगे जिसमें ऐसा अंतरण किया जाता है और वे उस निक्षेपागार की आय के रूप में नहीं माने जाएंगे जिसे निक्षेपागार अधिनियम, 1996 की धारा 10 की उपधारा (1) के आधार पर प्रतिभूतियों का रजिस्ट्रीकृत स्वामी समझा जाता है, और-

                (i) धारा 48; और

                (ii) धारा 2 के खंड (42) के परन्तुक,

के प्रयोजनों के लिए, किन्हीं प्रतिभूतियों के अर्जन की लागत और धारण की अवधि, प्रथम आवक प्रथम जावक पद्धति के आधार पर अवधारित की जाएगी

                स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, फायदाग्राही स्वामी", निक्षेपागार" और प्रतिभूति" पदों के वही अर्थ हैं जो निक्षेपागार अधिनियम, 1996 की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (), खंड () और खंड () में है

भाग 5

बेनामी संव्यवहार (प्रतिषेध) अधिनियम, 1988 (1988 का 45) का संशोधन

संशोधन

                धारा 3 की उपधारा (2) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी, अर्थात् :-

                                (2) उपधारा (1) की कोई बात,-

() किसी व्यक्ति द्वारा अपनी पत्नी या अविवाहित पुत्री के नाम में किए गए संपत्ति के क्रय को लागू नहीं होगी और जब तक इसके विपरीत साबित नहीं कर दिया जाता है तब तक यह उपधारणा की जाएगी कि उक्त संपत्ति पत्नी या अविवाहित पुत्री के फायदे के लिए क्रय की गई थी-

() (i) निक्षेपागार अधिनियम, 1996 की धारा 10 की उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रीकृत स्वामी के रूप में किसी निक्षेपागार द्वारा;

(ii) किसी निक्षेपागार के अभिकर्ता के रूप में सहभागी द्वारा,

                धारित प्रतिभूतियों को लागू नहीं होगी

स्पष्टीकरण-निक्षेपागार" और सहभागी" पदों के वही अर्थ हैं जो निक्षेपागार अधिनियम, 1996 की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड () और खंड () में हैं "

भाग 6

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) का संशोधन

संशोधन

                1. धारा 2 की उपधारा (2) में, प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 (1956 का 42)" शब्द, कोष्ठक और अंकों के स्थान पर प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 या निक्षेपागार अधिनियम, 1996" शब्द, अंक और कोष्ठक रखे जाएंगे

                2. धारा 11 की उपधारा (2) के खंड (खक) में, निक्षेपागारों, प्रतिभूति अभिरक्षकों" शब्दों के स्थान पर निक्षेपागारों, सहभागियों, प्रतिभूति अभिरक्षकों" शब्द रखे जाएंगे

                3. धारा 12 की उपधारा (1) में, निक्षेपागार" शब्द के स्थान पर दोनों स्थानों पर जहां वह आता है निक्षेपागार, सहभागी" शब्द रखे जाएंगे

                4. धारा 16 की उपधारा (1) में, इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबंधों पर" शब्दों के स्थान पर इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबंधों पर या निक्षेपागार अधिनियम, 1996 पर" शब्द और अंक रखे जाएंगे

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