रबड़ अधिनियम, 1947
(1947 का अधिनियम संख्यांक 24)1
[18 अप्रैल, 1947]
2[संघ के नियंत्रणाधीन] रबड़ उद्योग 3॥। के विकास के लिए
उपबंध करने के लिए
अधिनियम
यह समीचीन है कि संघ के नियंत्रणाधीन रबड़ उद्योग 3॥। के विकास के लिए उपबन्ध किया जाए;
अतः इसके द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता हैः-
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम रबड़ 4॥। अधिनियम, 1947 कहा जा सकता है ।
(2) इसका विस्तार, 5[जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय], सम्पूर्ण भारत पर है ।
6[2. संघ के नियंत्रण की समीचीनता के बारे में घोषणा-इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि लोकहित में यह समीचीन है कि रबड़ उद्योग को संघ अपने नियंत्रण में ले ले ।]
3. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि कोई बात विषय या संदर्भ में विरुद्ध न हो, -
(क) “बोर्ड" से इस अधिनियम के अधीन गठित 7॥। रबड़ बोर्ड अभिप्रेत है;
(ख) “व्यवहारी" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जो रबड़ का थोक या फुटकर कारबार करता है या रबड़ के स्टाक रखता है, और इसके अन्तर्गत किसी व्यवहारी का प्रतिनिधि या अभिकर्ता भी है;
(ग) “सम्पदा" से एक एकक के रूप में प्रशासित कोई ऐसा क्षेत्र अभिप्रेत है जिसमें ऐसी भूमि हो जिस पर रबड़ के पौधे रोपे गए हैं;
8[(गग) “कार्यपालक निदेशक" से इस अधिनियम के अधीन नियुक्त कार्यपालक निदेशक अभिप्रेत है;]
(घ) “निर्यात" और आयात" से समुद्र, भूमि या वायु मार्ग द्वारा क्रमशः 9[भारत] से, बाहर ले जाना या भारत में लाना अभिप्रेत है;
10[(घघ) “भारत" से, जम्मू-कश्मीर राज्य को छोड़कर, भारत का राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है;]
(ङ) “विनिर्माता" से किसी ऐसी वस्तु के विनिर्माण में लगा कोई व्यक्ति अभिप्रेत है जिसके बनाने में रबड़ का प्रयोग किया गया है;
(च) “स्वामी" के अन्तर्गत स्वामी का कोई अभिकर्ता और किसी संपदा का सकब्जा बन्धकदार तथा पट्टेदार भी है;
(छ) “विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
1[(छक) “प्रसंस्करणकर्ता" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जो रबड़ का प्रसंस्करण करने का भार अपने ऊपर लेता है;]
(ज) “रबड़" से निम्नलिखित अभिप्रेत हैः-
- यह अधिनियम 1963 के विनियम सं० 7 की धारा 3 और अनुसूची 1 द्वारा (1-10-1963 से) पांडिचेरी को और 1963 के विनियम सं० 6 की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा (1-7-1965 से) दादरा और नागर हवेली को विस्तारित किया गया ।
- 1954 के अधिनियम सं० 54 की धारा 2 द्वारा केन्द्रीय नियंत्रण के अधीन के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1954 के अधिनियम सं० 54 की धारा 2 द्वारा कतिपय शब्दों का लोप किया गया ।
- 1954 के अधिनियम सं० 54 की धारा 3 द्वारा (उत्पादन और विपणन) शब्दों का लोप किया गया ।
- 1951 के अधिनियम सं० 3 की धारा और अनुसूची द्वारा भाग ख राज्यों के सिवाय के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1954 के अधिनियम सं० 54 की धारा 4 द्वारा पूर्ववर्ती धारा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1954 के अधिनियम सं० 54 की धारा 5 द्वारा भारतीय शब्द का लोप किया गया ।
- 1982 के अधिनियम सं० 54 की धारा 2 द्वारा (अधिसूचना की तारीख से) अंतःस्थापित ।
- 1951 के अधिनियम सं० 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा राज्यों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1951 के अधिनियम सं० 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2010 के अधिनियम सं० 4 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित ।
(I) कच्चा रबड़, अर्थात् किसी रबड़ के पौधे की पत्ती, छाल या रबड़-क्षीर (लेटेक्स) से तौयार किया गया रबड़;
(II) किसी रबड़ के पौधे का रबड़-क्षीर, चाहे वह तरल हो या स्कंदित, जो रबड़ के संपरिवर्तन की प्रक्रिया के दैरान उस पर की जाने वाली अभिक्रिया के किसी भी प्रक्रम पर हो;
(III) रबड़-क्षीर (शुष्क रबड़ अन्तर्वस्तु) जो सान्द्रण की किसी भी अवस्था में हो,
और इसके अन्तर्गत स्क्रैप रबड़, शीट रबड़, चूर्ण के रूप में रबड़ और सभी प्रकार और किस्म का क्रैप रबड़ है, किन्तु इसके अन्तर्गत वह रबड़ नहीं है जो किसी विनिर्मित वस्तु में अन्तर्विष्ट है;
(झ) “रबड़ के पौधे" के अन्तर्गत निम्नलिखित में से किसी के पौधे, वृक्ष, झाड़ियां या लताएं भी हैंः-
(I) हेविया ब्रेजिलिएन्सिस (पारा रबड़),
(II) मैनीहाट ग्लेजिआवाई (सियारा रबड़),
(III) कास्टिलोआ इलास्टिका,
(IV) फाइकस इलास्टिका (रामबोंग), और
(ध्) कोई अन्य पौधा जिसे बोर्ड, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, भारत के राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, रबड़ का पौधा घोषित करे;
(ञ) “रबड़ उत्पादन आयुक्त" से इस अधिनियम के अधीन नियुक्त रबड़ उत्पादन आयुक्त अभिप्रेत है;
2[(ट) “छोटा उत्पादक" से ऐसा स्वामी अभिप्रेत है जिसकी सम्पदा का क्षेत्र 3[दस हैक्टेयर] से अधिक नहीं है ।]
4. बोर्ड का गठन-(1) इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, एक बोर्ड का गठन करेगी, जो 4॥। रबड़ बोर्ड कहलाएगा ।
(2) बोर्ड, रबड़ बोर्ड नाम का शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाला एक निगमित निकाय होगा, जिसे स्थावर और जंगम दोनों प्रकार की सम्पत्ति का अर्जन और धारण करने तथा संविदा करने की शक्ति होगी और उक्त नाम से वह वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा ।
5[(3) बोर्ड निम्नलिखित से मिलकर बनेगा-
(क) एक अध्यक्ष, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा;
1[(ख) 2[तमिलनाडु] राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले दो सदस्य, जिनमें से एक रबड़ उत्पादकों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाला व्यक्ति होगा, और
(ग) केरल राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले आठ सदस्य, जिनमें से छह सदस्य रबड़ उत्पादकों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति होंगे इन छह सदस्यों में से तीन छोटे उत्पादकों का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति होंगे;]
(घ) केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले दस सदस्य, जिनमें से दो विनिर्माताओं का और चार श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करेंगे;
3[(घक) केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले तीन सदस्य, जिनमें से दो वाणिज्य विभाग से और एक कृषि और सहकारिता विभाग से होगा;]
(ङ) संसद् के तीन सदस्य, जिनमें से दो लोक सभा द्वारा और एक राज्य सभा द्वारा निर्वाचित किए जाएंगे; 4[और]
5[(ङङ) कार्यपालक निदेशक, पदेन; और]
- 1954 के अधिनियम सं० 54 की धारा 5 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2010 के अधिनियम सं० 4 की धारा 2 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1954 के अधिनियम सं० 54 की धारा 6 द्वारा भारतीय शब्द का लोप किया गया ।
- 1954 के अधिनियम सं० 54 की धारा 6 द्वारा उपधारा (3), (4) और (5) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- विधि अनुकूलन (सं० 3) आदेश, 1956 द्वारा पूर्ववर्ती खंड (ख) और खंड (ग) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- मद्रास राज्य (नाम परिवर्तन) (संघ विषयों पर विधि अनुकूलन) आदेश, 1970 द्वारा (14-1-1969 से) मद्रास के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2010 के अधिनियम सं० 4 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 54 की धारा 3 द्वारा (अधिसूचना की तारीख से) कोष्ठक के अंदर के शब्द का लोप हो जाएगा ।
- 1982 के अधिनियम सं० 54 की धारा 3 द्वारा (अधिसूचना की तारीख से) अंतःस्थापित ।
(च) रबड़ उत्पादन आयुक्त, पदेन ।
(4) 5[तमिलनाडु] और 6[केरल] राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति यथा-विहित निर्वाचित अथवा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे ।
(5) केन्द्रीय सरकार के किसी भी अधिकारी को, जब उसे इस निमित्त सरकार द्वारा प्रतिनियुक्त किया जाए, बोर्ड के अधिवेशनों में हाजिर होने और उसकी कार्यवाहियों में भाग लेने का अधिकार होगा किन्तु उसे मत देने का हक नहीं होगा ।
(6) बोर्ड अपने सदस्यों में से एक उपाध्यक्ष का निर्वाचन करेगा जो अध्यक्ष की ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का पालन करेगा जो विहित किए जाएं या अध्यक्ष द्वारा उसे प्रत्यायोजित किए जाएं ।
(7) बोर्ड के सदस्य बोर्ड से ऐसे भत्ते प्राप्त करेंगे जो विहित किए जाएं ।
(8) इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि बोर्ड के सदस्य का पद उसके धारक को संसद् के किसी भी सदन का सदस्य चुने जाने, या होने, के लिए निरर्हित नहीं करेगा ।]
5. बोर्ड में रिक्तियां-(1) यदि कोई प्राधिकारी अथवा निकाय, समुचित समय के भीतर कोई ऐसा नामनिर्देशन करने में असफल रहता है जिसे वह धारा 4 के अधीन करने का हकदार है तो केन्द्रीय सरकार उस रिक्ति को भरने के लिए स्वयं किसी सदस्य को नामनिर्दिष्ट कर सकेगी ।
(2) जहां बोर्ड के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है, या कोई सदस्य पद त्याग देता है, या हटा दिया जाता है, या भारत में निवासी नहीं रह जाता, या कार्य करने में असमर्थ हो जाता है वहां, केन्द्रीय सरकार, धारा 4 के अधीन उस सदस्य को नामनिर्दिष्ट करने के हकदार प्राधिकारी या निकाय की सिफारिश पर, या यदि ऐसी सिफारिश उचित समय के भीतर नहीं की जाती है तो स्वप्रेरणा पर, उस रिक्ति को भरने के लिए किसी व्यक्ति को नियुक्त कर सकेगी ।
(3) बोर्ड द्वारा किए गए किसी भी कार्य को केवल इस आधार पर प्रश्नगत नहीं किया जाएगा कि बोर्ड में कोई रिक्ति या उसके गठन में कोई त्रुटि विद्यमान है ।
1[6. अध्यक्ष का वेतन और भत्ते- 2[अध्यक्ष] ऐसे वेतन और भत्तों का हकदार होगा और वह छुट्टी, पेंशन, भविष्य निधि तथा अन्य विषयों की बाबत सेवा की ऐसी शर्तों द्वारा शासित होगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा समय-समय पर नियत की जाएं 3[और अंशकालिक अध्यक्ष के रूप में नियुक्त व्यक्ति ऐसे मानदेय और भत्तों का, यदि कोई हों, और सेवा की ऐसी अन्य शर्तों का हकदार होगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा समय-समय पर नियत की जाएं ।]
6क. बोर्ड के कार्यपालक अधिकारी- 4[(1) केन्द्रीय सरकार, बोर्ड के निदेशाधीन ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का पालन करने के लिए, जो विहित किए जाएं या अध्यक्ष द्वारा उसे प्रत्यायोजित किए जाएं, एक कार्यपालक निदेशक की नियुक्ति कर सकेगी ।]
5[(1क)] केन्द्रीय सरकार, एक रबड़ उत्पादन आयुक्त नियुक्त करेगी जो बोर्ड के निदेशाधीन ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा जो विहित किए जाएं ।
(2) केन्द्रीय सरकार, बोर्ड का एक सचिव नियुक्त करेगी, जो बोर्ड के निदेशाधीन ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा जो विहित किए जाएं या अध्यक्ष द्वारा उसे प्रत्यायोजित किए जाएं ।
(3) 6[रबड़ उत्पादन आयुक्त] और बोर्ड का सचिव ऐसे वेतन और भत्तों के हकदार होंगे और वे छुट्टी, पेंशन, भविष्य-निधि या तथा अन्य विषयों की बाबत सेवा की ऐसी शर्तों द्वारा शासित होंगे जो केन्द्रीय सरकार द्वारा समय-समय पर नियत की जाएं ।
6. विधि अनुकूलन (सं० 3) आदेश, 1956 द्वारा त्रावनकोर कोचीन के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1954 के अधिनियम सं० 54 की धारा 7 द्वारा पूर्ववर्ती धारा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 54 की धारा 4 द्वारा (अधिसूचना की तारीख से) कोष्ठक के अंदर के शब्दों के स्थान पर पूर्ण कालिक अध्यक्ष के रूप में नियुक्त व्यक्ति शब्द प्रतिस्थापित हो जाएंगे ।
- 1982 के अधिनियम सं० 54 की धारा 4 द्वारा (अधिसूचना की तारीख से) अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 54 की धारा 5 द्वारा (अधिसूचना की तारीख से) अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 54 की धारा 5 द्वारा (अधिसूचना की तारीख से) उपधारा (1) को उपधारा (1क) के रूप में पुनः संख्यांकित किया जाएगा ।
- 1982 के अधिनियम सं० 54 की धारा 5 द्वारा (अधिसूचना की तारीख से) कोष्ठकों में दिए गए शब्दों के स्थान पर कार्यपालक निदेशक, रबड़ उत्पादन आयुक्त प्रतिस्थापित किया जाएगा ।
(4) केन्द्रीय सरकार की अनुमति के बिना, 7[अध्यक्ष], रबड़ उत्पादन आयुक्त और सचिव, ऐसा कोई कार्य अपने हाथ में नहीं लेंगे, जिसका सम्बन्ध इस अधिनियम के अधीन उनके कर्तव्यों से न हो ।
7. बोर्ड की समितियां- 8। । । ।
(2) बोर्ड ऐसी 9॥। समितियां नियुक्त कर सकेगा जो इस अधिनियम के अधीन उसके कर्तव्यों और कृत्यों का दक्षता से पालन करने के लिए आवश्यक हों ।
(3) बोर्ड को यह शक्ति होगी कि वह उपधारा (2) के अधीन नियुक्त किसी समिति में सदस्यों के रूप में उतने व्यक्तियों को, जो बोर्ड के सदस्य न हों, सहयोजित कर ले, जितने वह ठीक समझे ।
(4) बोर्ड रबड़ के विपणन या भंडारकरण के सम्बन्ध में अपनी ओर से किन्हीं कृत्यों का निर्वहन करने के लिए अभिकर्ता नियुक्त कर सकेगा और प्राधिकृत कर सकेगा ।
8. बोर्ड के कर्तव्य-(1) बोर्ड का यह कर्तव्य होगा कि वह रबड़ उद्योग के विकास 10॥। की ऐसे उपायों द्वारा अभिवृद्धि करे जैसे वह ठीक समझे ।
(2) पूर्वगामी उपबन्ध की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उसमें निर्दिष्ट उपायों द्वारा निम्नलिखित के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा, -
(क) वैज्ञानिक, प्रौद्योगिक और आर्थिक गवेषणा करना, उसमें सहायता देना या उसे प्रोत्साहित करना;
(ख) रोपण, जुताई, खाद देने और फुहार के समुन्नत तरीकों में विद्यार्थियों को प्रशिक्षित करना;
(ग) रबड़ उत्पादकों को तकनीकी सलाह देना;
(घ) रबड़ के विपणन में सुधार करना;
1[(घक) रबड़ की क्वालिटी में सुधार करना और भारत में उत्पादित या प्रसंस्कृत, आयातित या भारत से निर्यातित रबड़ की क्वालिटी, चिह्नांकन, लेबल लगाने और पैकिंग के मानकों को लागू करना;]
(ङ) सम्पदाओं के स्वामियों, व्यवहारियों 2[विनिर्माताओं और प्रसंस्करणकर्ताओं से आंकड़े संग्रह करना];
3[(च) कर्मकारों को काम की अधिक अच्छी दशाएं प्राप्त कराना तथा उनकी सुख-सुविधाओं और प्रोत्साहन का उपबन्ध तथा उनमें सुधार करना;]
(छ) ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करना जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों के अधीन बोर्ड में निहित किए जाएं ।
(3) बोर्ड का यह भी कर्तव्य होगा कि वह, -
(क) रबड़ उद्योग के विकास से सम्बन्धित सभी मामलों पर, जिनके अन्तर्गत रबड़ का आयात और निर्यात भी है, केन्द्रीय सरकार को सलाह दे;
(ख) रबड़ सम्बन्धी किसी अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन या स्कीम में भाग लेने के बारे में केन्द्रीय सरकार को सलाह दे;
(ग) अपने क्रियाकलापों तथा इस अधिनियम के कार्यकरण के सम्बन्ध में 3[वार्षिक रिपोर्ट] केन्द्रीय सरकार को तथा ऐसे अन्य प्राधिकारियों को दे, जो विहित किए जाएं;
(घ) रबड़ उद्योग के बारे में ऐसी अन्य रिपोर्टें तैयार करे और दे जिनकी केन्द्रीय सरकार समय-समय पर अपेक्षा करे ।
4[8क. अन्तर्देशीय बाजार में विक्रय के लिए रबड़ आयात अथवा रबड़ का क्रय करने की बोर्ड की शक्ति-बोर्ड के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह उन कीमतों पर, जिन्हें केन्द्रीय सरकार नियत करे, अन्तर्देशीय बाजार में विक्रय के लिए रबड़ का आयात, अथवा ऐसे बाजार में रबड़ का क्रय, केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन से करे ।
- 1982 के अधिनियम सं० 54 की धारा 5 द्वारा (अधिसूचना की तारीख से) कोष्ठकों में दिए गए शब्दों के स्थान पर अध्यक्ष, यदि वह पूर्णकालिक है, कार्यपालक निदेशक, प्रतिस्थापित किया जाएगा ।
- 1954 के अधिनियम सं० 54 की धारा 8 द्वारा उपधारा (1) का लोप किया गया ।
- 1954 के अधिनियम सं० 54 की धारा 8 द्वारा अन्य शब्द का लोप किया गया ।
- 1954 के अधिनियम सं० 54 की धारा 9 द्वारा जहां तक रबड़ के उत्पादन और विपणन का प्रश्न है शब्द का लोप किया गया ।
- 2010 के अधिनियम सं० 4 की धारा 4 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2010 के अधिनियम सं० 4 की धारा 4 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1954 के अधिनियम सं० 54 की धारा 9 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1954 के अधिनियम सं० 54 की धारा 10 द्वारा अंतःस्थापित ।
8ख. बोर्ड से परामर्श-इस अधिनियम के अधीन बोर्ड के कार्यकलाप के सम्बन्ध में कोई कार्रवाई करने से पूर्व, केन्द्रीय सरकार, सामान्यतया बोर्ड से परामर्श करेगीः
परन्तु केन्द्रीय सरकार द्वारा की गई कोई कार्रवाई केवल इस आधार पर ही अविधिमान्य न होगी या प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि वह कार्रवाई ऐसे परामर्श के बिना की गई थी ।]
5[9. रबड़ विकास निधि-(1) रबड़ विकास निधि नामक एक निधि होगी और उसमें निम्नलिखित जमा किए जाएंगे, -
(क) वे सभी धन, जो रबड़ (संशोधन) अधिनियम, 2009 के प्रारंभ से ठीक पूर्व बोर्ड की निधियां थीं;
(ख) धारा 12 की उपधारा (7) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बोर्ड को संदत्त उपकर के आगम;
(ग) ऐसी कोई धनराशि, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुदानों या उधारों के रूप में बोर्ड को संदत्त की जाए;
(घ) बोर्ड के आंतरिक और बाह्य बजट संसाधन;
(ङ) धारा 26क के अधीन प्राप्त और संगृहीत सभी धन; और
(च) ऐसी कोई अन्य राशि, जो इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन उद्गृहीत और संगृहीत की जाए ।
(2) रबड़ विकास निधि का उपयोजन-
(क) बोर्ड के व्यय को;
(ख) धारा 8 में निर्दिष्ट उपायों पर होने वाले खर्च को;
(ग) इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन उसके कृत्यों के अनुपालन में उपगत व्यय को;
(घ) लघु उत्पादकों के पुनर्वास के लिए व्यय को; और
(ङ) रबड़ संपदाओं को ऐसे अनुदान देने के लिए या रबड़ संपदाओं को ऐसी अन्य सहायता देने पर होने वाले खर्च को, जिसे बोर्ड ऐसी संपदाओं के विकास के लिए आवश्यक समझे,
पूरा करने के लिए किया जाएगा ।]
1। । ।
11. रबड़ के आयात और निर्यात को प्रतिषिद्ध या नियंत्रित करने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार 2॥। रबड़ का आयात या निर्यात या तो साधारणतया या विनिर्दिष्ट वर्गों के मामलों में, प्रतिषिद्ध या निर्बन्धित या अन्यथा नियंत्रित करने के लिए उपबन्ध, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, कर सकेगी ।
(2) वह सभी माल, जिसे उपधारा (1) के अधीन कोई आदेश लागू होता है, ऐसा माल समझा जाएगा जिसका आयात या निर्यात सी कस्टम्स ऐक्ट, 1878 (1878 का 8) की धारा 19 के अधीन प्रतिषिद्ध या निर्बन्धित किया गया है, और उस अधिनियम के सभी उपबन्ध तद्नुसार प्रभावशाली होंगे सिवाय उसकी धारा 183 के जिसका प्रभाव इस प्रकार होगा मानो उसमें आए हुए देगा" शब्द के स्थान पर दे सकेगा" शब्द रखे गए हों ।
(3) यदि कोई व्यक्ति उपधारा (1) के अधीन किए गए किसी आदेश का उल्लंघन करेगा तो वह किसी ऐसे अधिकरण या शास्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जिसके दायित्व के अधीन वह उपधारा (2) द्वारा यथा लागू सी कस्टम्स ऐक्ट, 1878 (1878 का 8) के उपबन्धों के अधीन हो, कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, अथवा दोनों से, दंडनीय होगा ।
3[12. नया रबड़ उपकर लगाना-(1) उस तारीख से जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे, भारत में उत्पादित सभी रबड़ पर इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उपकर के रूप में उत्पाद-शुल्क, ऐसे उत्पादित रबड़ के प्रति किलोग्राम पर 4[दो रुपए] से अनधिक ऐसी दर से, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे, उद्गृहीत किया जाएगा ।
- 2010 के अधिनियम सं० 4 की धारा 5 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2010 के अधिनियम सं० 4 की धारा 6 द्वारा लोप किया गया ।
- 1954 के अधिनियम सं० 54 की धारा 13 द्वारा बोर्ड से परामर्श करने के पश्चात् शब्दों का लोप किया गया ।
- 1960 के अधिनियम सं० 21 की धारा 2 द्वारा (1-11-1960 से) धारा 12 के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1994 के अधिनियम सं० 33 की धारा 2 द्वारा पचास नए पैसे के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(2) उपधारा (1) के अधीन उद्गृहीत उत्पाद-शुल्क इस निमित्त बनाए गए नियमों के अनुसार या तो उस सम्पदा के स्वामी से, जिस पर रबड़ का उत्पादन किया जाता है, या उस विनिर्माता से, जिसके द्वारा 1[ऐसी रबड़ का प्रयोग किया जाता है या ऐसे निर्यातक से, जिसके द्वारा ऐसी रबड़ का निर्यात किया जाता है,] बोर्ड द्वारा संगृहीत किया जाएगा:
2[परंतु केन्द्रीय सरकार, यदि लोकहित में आवश्यक समझती है, उन कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, आदेश द्वारा निर्यातित रबड़ पर उत्पाद-शुल्क से, ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जिन्हें वह ठीक समझे, छूट दे सकेगी या उसे कम कर सकेगीः
परंतु यह और कि केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, भारत में उत्पादित और प्राकृतिक रबड़ के निर्यातकों द्वारा निर्यात के लिए उपाप्त, प्राकृतिक रबड़ पर 1 अप्रैल, 1961 से 31 अगस्त, 2003 तक की अवधि के लिए शून्य पैसा प्रति किलोग्राम उत्पाद-शुल्क की दर विनिर्दिष्ट कर सकेगी ।]
5[(3) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, यथास्थिति, प्रत्येक स्वामी, निर्यातक या विनिर्माता उत्पाद-शुल्क का संदाय बोर्ड को उपधारा (4) में निर्दिष्ट रीति में और अवधि के लिए करेगा और, यदि वह ऐसा करने में असफल रहता है तो शुल्क, यथास्थिति, स्वामी, निर्यातक या विनिर्माता से संग्रहण के खर्चे और ऐसी दर पर ब्याज सहित, जो विहित की जाए, भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूल किया जा सकेगा ।]
(4) इस धारा के अधीन उद्गृहीत उत्पाद-शुल्क की रकम निर्धारित करने में बोर्ड को समर्थ बनाने के प्रयोजनार्थ,-
(क) बोर्ड, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, वह अवधि नियत करेगा जिसकी बाबत निर्धारण किया जाएगा; और
(ख) धारा 20 के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्रत्येक स्वामी और प्रत्येक विनिर्माता बोर्ड को एक विवरणी उस अवधि की, जिससे वह विवरणी सम्बन्धित है, समाप्ति के पश्चात् 3[तीस दिन] से पहले देगा जिसमें निम्नलिखित का उल्लेख होगा-
(I) स्वामी की दशा में, ऐसी प्रत्येक अवधि में सम्पदा में उत्पादित रबड़ की कुल मात्रा;
परन्तु भारत में केवल अंशतः स्थित किसी सम्पदा की दशा में, स्वामी उक्त विवरणी में भारत के भीतर और बाहर उत्पादित रबड़ की मात्रा अलग से दिखाएगा;
(II) विनिर्माता की दशा में, भारत में उत्पादित रबड़ में से उस अवधि में उसके द्वारा 1[अर्जित की गई रबड़] की कुल मात्रा ।
(5) यदि कोई 1[स्वामी, निर्यातक या विनिर्माता], विहित समय के भीतर, उपधारा (4) में निर्दिष्ट विवरणी देने में असफल रहता है या ऐसी विवरणी देता है जिसके बारे में बोर्ड के पास यह विश्वास करने का कारण है कि वह गलत या त्रुटिपूर्ण है तो बोर्ड उत्पाद-शुल्क की रकम ऐसी रीति से निर्धारित कर सकेगा जो विहित की जाए 4[और, सूचना जारी करने के पश्चात् और ऐसी जांच करने के पश्चात्, जो वह आवश्यक समझे, यथास्थिति, स्वामी, निर्यातक या विनिर्माता से, ब्याज की ऐसी दर, जो उपधारा (3) में नियत की गई है, सहित उपकर संगृहीत कर सकेगाः
परंतु जहां किसी कारण से बोर्ड यह पाता है कि, यथास्थिति, स्वामी, निर्यातक या विनिर्माता ने उससे शोध्य उपकर से अधिक उपकर का संदाय कर दिया है, वहां वह उससे शोध्य भावी संदाय, यदि कोई हो, के प्रति समायोजित किया जाएगा या उसे वापस किया जाएगा ।]
(6) इस धारा के अधीन किए गए निर्धारण से व्यथित व्यक्ति, उपधारा (3) के अधीन सूचना की तामील के तीन मास के भीतर, उस निर्धारण को रद्द करने या उसमें परिवर्तन करने के लिए जिला न्यायाधीश को आवेदन कर सकेगा और जिला न्यायाधीश, बोर्ड को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, ऐसा आदेश देगा (जो अन्तिम होगा) जैसा वह ठीक समझे ।
(7) इस धारा के अधीन संगृहीत उत्पाद-शुल्क के आगमों को उसके संग्रहण में हुए खर्च को घटा कर, जैसा केन्द्रीय सरकार अवधारित करे, प्रथमतः भारत की संचित निधि में जमा किया जाएगा और तब इस अधिनियम के प्रयोजन के उपयोग के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा बोर्ड को दिया जाएगा यदि संसद् इस निमित्त विधि द्वारा विनियोजन द्वारा वैसा उपबन्ध करे ।]
- 2010 के अधिनियम सं० 4 की धारा 7 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2010 के अधिनियम सं० 4 की धारा 7 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2010 के अधिनियम सं० 4 की धारा 7 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2010 के अधिनियम सं० 4 की धारा 7 द्वारा अंतःस्थापित ।
13. रबड़ के विक्रय के लिए अधिकतम और न्यूनतम कीमतें नियत करने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार 1[यदि वह आवश्यक समझे,] 2॥।, राजपत्र में प्रकाशित आदेश3 द्वारा, वह अधिकतम कीमत या न्यूनतम कीमत अथवा वे अधिकतम और न्यूनतम कीमतें नियत कर सकेगी, जो आदेश में विनिर्दिष्ट किसी प्रकार के कारबार के दौरान, ऐसे विनिर्दिष्ट किसी वर्णन के रबड़ के लिए प्रभारित की जाएंगी ।
(2) ऐसे किसी भी आदेश द्वारा एक ही वर्णन के रबड़ के लिए विभिन्न प्रकार के कारबारों के दौरान प्रभारित की जाने वाली विभिन्न अधिकतम या न्यूनतम कीमतें नियत की जा सकेंगी ।
(3) यदि कोई व्यक्ति रबड़ का उस कीमत पर, जो उस निमित्त उपधारा (1) के अधीन नियत अधिकतम कीमत से अधिक या न्यूनतम कीमत से कम है, क्रय या विक्रय करेगा या क्रय या विक्रय करने का करार करेगा तो वह कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, अथवा दोनों से, दंडनीय होगा ।
14. रबड़ संबंधी संव्यवहार करने के लिए अनुज्ञप्ति देना-कोई भी व्यक्ति रबड़ का विक्रय या अन्यथा व्ययन, और कोई भी व्यक्ति रबड़ का क्रय या अन्यथा अर्जन, बोर्ड द्वारा दी गई साधारण या विशेष अनुज्ञप्ति के निबन्धनों के अधीन और अनुसार ही करेगा अन्यथा नहीं ।
4। । । ।
15. धारा 14 के अधीन अनुज्ञप्तियों के बारे में उपबन्ध-(1) धारा 14 के अधीन दी गई प्रत्येक साधारण अनुज्ञप्ति बोर्ड द्वारा भारत के राजपत्र में तथा ऐसे समाचारपत्रों में प्रकाशित की जाएगी जिन्हें बोर्ड निर्दिष्ट करे ।
(2) धारा 14 के अधीन दी गई विशेष अनुज्ञप्ति केवल उसी अवधि के लिए विधिमान्य होगी जो उसमें विनिर्दिष्ट की जाएः
परन्तु बोर्ड ऐसी किसी अनुज्ञप्ति की विधिमान्यता की अवधि को समय-समय पर बढ़ा सकेगा ।
(3) धारा 14 के अधीन अनुदत्त विशेष अनुज्ञप्ति को बोर्ड किसी भी समय ऐसे कारणों सहित जो उसके द्वारा लेखबद्ध किए जाएंगे, प्रतिसंहृत कर सकेगा और ऐसे प्रतिसंहरण पर उस व्यक्ति द्वारा जिसे वह दी गई थी बोर्ड को लौटा देगा ।
(4) ऐसे व्यक्ति द्वारा, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ से ठीक पूर्व व्यवहारी या विनिर्माता के रूप में कारबार कर रहा था, विशेष अनुज्ञप्ति के लिए किया गया कोई भी आवेदन बोर्ड द्वारा ऐसे विशेष कारणों के सिवाय जिन्हें लेखबद्ध किया जाएगा, नामंजूर नहीं किया जाएगा ।
16. रबड़ को अपने कब्जे में रखने पर निर्बन्धन-(1) कोई व्यक्ति, जो किसी सम्पदा का स्वामी या अधिभोगी या ऐसा व्यक्ति नहीं है, जिसने धारा 14 के अधीन बोर्ड द्वारा दी गई साधारण या विशेष अनुज्ञप्ति के अधीन रबड़ अर्जन किया है, अपने कब्जे में किसी प्रकार का रबड़ नहीं रखेगा ।
(2) उपधारा (1) के उल्लंघन का विचारण करने वाला कोई न्यायालय धारा 26 के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना यह निदेश दे सकेगा कि ऐसा रबड़, जिसके बारे में न्यायालय का समाधान हो गया है कि उक्त उल्लंघन किया गया है, सरकार को समपहृत हो जाए ।
1[17. रबड़ की क्वालिटी, चिह्नांकन, आदि के लिए मानकों को लागू करना-(1) बोर्ड, भारत में उत्पादित या प्रसंस्कृत, आयातित या भारत से निर्यातित रबड़ के लिए रबड़ के विभिन्न विपणन योग्य रूपों की क्वालिटी, चिह्नांकन, लेबल लगाने और पैकिंग के लिए मानकों को लागू करेगा ।
(2) अध्यक्ष द्वारा प्राधिकृत बोर्ड का कोई अधिकारी उपधारा (1) के अधीन मानकों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए किसी युक्तियुक्त समय पर किसी व्यौहारी, प्रसंस्करणकर्ता या विनिर्माता या निर्यातक के किसी कारखाने या अन्य परिसरों में किसी व्यौहारी या प्रसंस्करणकर्ता द्वारा विक्रय या क्रय की गई रबड़ का निरीक्षण कर सकेगा ।]
2। । । ।
- 2010 के अधिनियम सं० 4 की धारा 8 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1954 के अधिनियम सं० 54 की धारा 15 द्वारा धारा 7 की उपधारा (1) के अधीन गठित रबड़ मूल्य सलाहकार समिति से परामर्श करने के पश्चात् शब्दों का लोप किया गया ।
- ऐसे आदेशों के लिए, देखिए भारत का राजपत्र, 1947 (अंग्रेजी), भाग 1, पृष्ठ 1380 और भारत का राजपत्र, 1947 (अंग्रेजी), असाधारण, पृ० 1383 ।
- 1949 के अधिनियम सं० 50 की धारा 2 द्वारा परन्तुक का लोप किया गया ।
- 2010 के अधिनियम सं० 4 की धारा 9 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2010 के अधिनियम सं० 4 की धारा 10 द्वारा लोप किया गया ।
19. विशेष अनुज्ञप्ति के लिए फीस-बोर्ड धारा 14, 3[या धारा 15] के अधीन विशेष अनुज्ञप्तियां देने और उनका नवीकरण करने के लिए ऐसी फीस उद्गृहीत कर सकेगा जो विहित की जाए ।
20. विवरणियां भेजना और लेखे रखना-ऐसे अपवादों के अधीन रहते हुए, जो विहित किए जाएं, प्रत्येक स्वामी, प्रत्येक विनिर्माता और धारा 14 के अधीन दी गई विशेष अनुज्ञप्ति का प्रत्येक धारक, जो स्वामी या विनिर्माता न हो, -
(क) बोर्ड को ऐसी विवरणियां, ऐसे समय, ऐसे प्ररूप में और ऐसी विशिष्टियों सहित भेजेगा, जो विहित की जाएं;
(ख) यथास्थिति, अपनी सम्पदा या कारबार के सम्बन्ध में सच्चा और सही लेखा तथा अन्य अभिलेख ऐसे प्ररूप में रखेगा जो विहित किए जाएं;
4[(ग) केन्द्रीय सरकार या बोर्ड द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति को या अध्यक्ष द्वारा लिखित रूप में प्राधिकृत बोर्ड के किसी सदस्य को या बोर्ड के किसी अधिकारी को खंड (ख) में निर्दिष्ट लेखाओं और अभिलेखों का निरीक्षण करने की अनुज्ञा देगा ।]
5[21. भूमि और परिसर का निरीक्षण-केन्द्रीय सरकार अथवा बोर्ड द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत कोई व्यक्ति या अध्यक्ष द्वारा लिखित रूप में प्राधिकृत कोई सदस्य या 6[अध्यक्ष द्वारा प्राधिकृत बोर्ड का कोई अधिकारी] किसी भी उचित समय पर किसी व्यवहारी के कारबार के किसी स्थान का अथवा 2[किसी विनिर्माता या प्रसंस्करणकता] के किसी कारखाने या अन्य परिसर का, इस अधिनियम के अधीन दिए गए किसी विवरण या विवरणी को सत्यापित करने के प्रयोजन के लिए अथवा इस अधिनियम के किन्हीं अन्य प्रयोजनों के लिए, निरीक्षण कर सकेगा ।]
22. केन्द्रीय सरकार द्वारा नियंत्रण-(1) बोर्ड के सभी कार्य केन्द्रीय सरकार के नियंत्रणाधीन होंगे जो बोर्ड द्वारा की गई किसी कार्रवाई को रद्द कर सकेगी, निलम्बित कर सकेगी या उपान्तरित कर सकेगी जैसा भी वह ठीक समझे ।
(2) बोर्ड के अभिलेख, केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा सब युक्तियुक्त समयों पर निरीक्षण के लिए खुले रहेंगे ।
7[22क. बोर्ड को निदेश जारी करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, बोर्ड, इस अधिनियम के अधीन कृत्यों और कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए, नीतिगत प्रश्नों के संबंध में ऐसे निदेशों द्वारा आबद्ध होगा जो केन्द्रीय सरकार उसे समय-समय पर लिखित रूप में दे:
परंतु बोर्ड को यथासाध्य, इस उपधारा के अधीन कोई निदेश किए जाने से पूर्व, अपने विचार व्यक्त करने का अवसर दिया जाएगा ।
(2) इस बारे में केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा कि क्या कोई प्रश्न नीति संबंधी है या नहीं ।]
23. अपील-धारा 14, धारा 15 या धारा 17 के अधीन विशेष अनुज्ञप्ति देने, या उसका नवीकरण करने से इन्कार अथवा उसे प्रतिसंहृत करने के बोर्ड के किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, ऐसा आदेश किए जाने से साठ दिन के भीतर और विहित फीस देने पर, केन्द्रीय सरकार को अपील कर सकेगा, और उस पर केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय, तथा केवल ऐसे विनिश्चय के अधीन रहते हुए बोर्ड का आदेश, अन्तिम होगा और उसे किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।
24. बोर्ड के लेखे-(1) बोर्ड अपने द्वारा प्राप्त और व्यय की गई सब धनराशियों के बारे में ऐसे लेखे ऐसी रीति और ऐसे प्ररूप में रखेगा जो विहित किया जाए ।
(2) बोर्ड केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त लेखा-परीक्षकों से लेखाओं की प्रतिवर्ष परीक्षा कराएगा, और लेखा-परीक्षकों को किसी ऐसे व्यय की मद नामंजूर करने की शक्ति होगी जो उनकी राय में इस अधिनियम के अधीन उचित रूप से नहीं किया गया है ।
- 2010 के अधिनियम सं० 4 की धारा 11 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1954 के अधिनियम सं० 54 की धारा 16 द्वारा पूर्ववर्ती खंड के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1954 के अधिनियम सं० 54 की धारा 17 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2010 के अधिनियम सं० 4 की धारा 12 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 2010 के अधिनियम सं० 4 की धारा 13 द्वारा अंतःस्थापित ।
(3) केन्द्रीय सरकार, बोर्ड के आवेदन पर, किसी ऐसे व्यय की मद मंजूर कर सकेगी जिसे लेखा-परीक्षकों ने उपधारा (2) के अधीन नामंजूर कर दिया हो ।
1[24क. प्रत्यायोजित करने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा प्रयोक्तव्य किसी शक्ति का प्रयोग और पालन किए जाने वाले कृत्यों का पालन, ऐसे मामलों में और ऐसी शर्तों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा किया जा सकेगा जो उसमें विनिर्दिष्ट किया जाए ।]
25. केन्द्रीय सरकार की नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम2, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
3[(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, इस धारा के अधीन बनाए गए नियम निम्नलिखित सब विषयों या उनमें से किसी के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात्:
(I) धारा 4 की उपधारा (3) के खंड (घ) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बोर्ड के सदस्यों के नामनिर्देशन तथा उसके खंड (ख) और (ग) में निर्दिष्ट सदस्यों के निर्वाचन या नामनिर्देशन का विनियमन करने वाले सिद्धांत:
परन्तु अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए कोई नामनिर्देशन करने से पूर्व केन्द्रीय सरकार खंड (घ) में निर्दिष्ट हितों वाले संगमों से, जिन्हें उस सरकार द्वारा मान्यता दी गई है, नामों के पैनल भेजने की मांग करेगी;
(II) बोर्ड के सदस्यों की पदावधि, वे परिस्थितियां जिनमें और वह प्राधिकारी जिसके द्वारा सदस्यों को हटाया जा सकता है, तथा बोर्ड में आकस्मिक रिक्तियों का भरा जाना;
(III) कामकाज के संचालन के लिए बोर्ड के अधिवेशनों और उसकी समितियों में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया और सदस्यों की वह संख्या, जिससे किसी अधिवेशन में गणपूर्ति होगी;
(IV) बोर्ड द्वारा किए गए कामकाज के अभिलेखों का बोर्ड द्वारा रखा जाना और उसकी प्रतियों का केन्द्रीय सरकार को प्रस्तुत किया जाना;
(V) प्रति वर्ष बोर्ड द्वारा की जाने वाली न्यूनतम अधिवेशनों की संख्या;
(VI) व्यय उपगत करने की बाबत बोर्ड, उसके अध्यक्ष और उसकी समितियों की शक्तियां तथा 4[कार्यपालक निदेशक,] रबड़ उत्पादन आयुक्त और बोर्ड के सचिव की शक्तियां और कर्तव्य;
(VII) वे शर्तें, जिनके अधीन रहते हुए बोर्ड भारत से बाहर व्यय कर सकता है;
(VIII) बोर्ड की प्राप्तियों और व्यय के बजट प्राक्कलन तैयार करना और वह प्राधिकारी जिसके द्वारा प्राक्कलन मंजूर किए जाएंगे ;
(IX) बोर्ड की आय और व्यय के लेखाओं का रखा जाना तथा ऐसे लेखाओं की परीक्षा;
(X) बोर्ड की निधियों का बैंकों में जमा किया जाना और ऐसी निधियों का विनिधान;
(XI) प्राक्कलित बचतों का बजट के एक शीर्ष से किसी दूसरे शीर्ष को पुनर्विनियोग;
(XII) वे शर्तें, जिनके अधीन बोर्ड निधियां उधार ले सकेगा;
(XIII) वे शर्तें, जिनके अधीन और वह रीति जिससे बोर्ड द्वारा या उसकी ओर से संविदाएं की जा सकती हैं;
(XIV) इस अधिनियम के अधीन बोर्ड की किन्हीं शक्तियों और कर्तव्यों का उसकी समितियों या उसके अध्यक्ष या उपाध्यक्ष या सदस्यों या अधिकारियों को प्रत्यायोजन;
(XV) वह कर्मचारिवृन्द, जो बोर्ड द्वारा नियोजित किया जा सकता है और बोर्ड के अधिकारियों तथा अन्य कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा छुट्टी और सेवा की अन्य शर्तें;
- 2010 के अधिनियम सं० 4 की धारा 14 द्वारा अंतःस्थापित ।
- रबड़ (उत्पादन और विपणन) नियम, 1947 के लिए देखिए भारत का राजपत्र (अंग्रेजी), 1947 असाधारण, पृष्ठ 1241.
- 1954 के अधिनियम सं० 54 की धारा 18 द्वारा पूर्ववर्ती उपधारा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 54 की धारा 6 द्वारा (अधिसूचना की तारीख से) अन्तःस्थापित ।
(XVI) बोर्ड के और उसकी समितियों के सदस्यों के यात्रा तथा अन्य भत्ते;
(XVII) वे प्रयोजन जिनके लिए बोर्ड की निधियां व्यय की सकती हैं;
(XVIII) बोर्ड और उसकी विभिन्न समितियों के रजिस्टरों तथा अन्य अभिलेखों का रखा जाना;
(XIX) रबड़ या रबड़ के किसी उत्पाद के संबंध में किसी जानकारी या आंकड़ों का संग्रहण;
1। । । । ।
2[(XXक) ऐसे मामले और परिस्थितियां, जिनमें धारा 12 के अधीन उत्पाद-शुल्क क्रमशः स्वामी और विनिर्माताओं द्वारा संदेय होगा, वह रीति जिससे शुल्क निर्धारित, संदत्त या संगृहीत किया जा सकता है, रबड़ के उत्पादन, विनिर्माण, परिवहन या विक्रय का विनियमन जहां तक कि ऐसा विनियमन शुल्क के समुचित उद्ग्रहण, संदाय या संग्रहण के लिए आवश्यक है;]
3[(XXख) धारा 12 की उपधारा (3) के अधीन शुल्क के विलंबित संदाय की दशा में, वसूल किया जाने वाला संग्रहण खर्च और ब्याज की दर;]
(XXI) धारा 14 1॥। के अधीन विशेष अनुज्ञप्तियों के लिए आवेदन का प्ररूप, ऐसी अनुज्ञप्तियां देने या उनके नवीकरण के लिए फीस और ऐसी अनुज्ञप्तियों के प्ररूप;
(XXII) वह रीति जिससे रबड़ का वर्गीकरण और विपणन किया जाएगा;
(xxiii) धारा 23 के अधीन अपीलों पर संदेय फीस;
(xxiv) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या किया जाए ।
4[1[(3) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के, जिसमें वह ऐसे रखा गया हो, या ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]]]
26. शास्तियां- 2[(1)] यदि कोई व्यक्ति,
(क) इस अधिनियम की धारा 11 या धारा 13 से भिन्न उसके किसी उपबन्ध का, या इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किसी नियम का उल्लंघन करेगा; अथवा
(ख) इस अधिनियम के अधीन दी जाने वाली किसी रिपोर्ट या विवरणी में कोई ऐसा कथन करेगा जो मिथ्या है और जिसका मिथ्या होना वह जानता है या जिसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है; अथवा
(ग) इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन बोर्ड के किसी अधिकारी पर अधिरोपित या उसे सौंपे गए किसी कर्तव्य के निर्वहन में उस अधिकारी को बाधा पहंचाएगा; अथवा
(घ) किसी लेखा-बही या अन्य अभिलेख को नियन्त्रण या अभिरक्षा में रखते हुए, उस बही या अभिलेख को उस दशा में पेश करने में असफल रहेगा जब उससे वैसा करने की अपेक्षा किसी प्राधिकृत अधिकारी द्वारा की जाए;
तो वह कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो 3[पांच हजार रुपए] तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से, दंडनीय होगा ।
- 2010 के अधिनियम सं० 4 की धारा 15 द्वारा लोप किया गया ।
- 1960 के अधिनियम सं० 21 की धारा 3 द्वारा (1-11-1960 से) अंतःस्थापित ।
- 2010 के अधिनियम सं० 4 की धारा 15 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1982 के अधिनियम सं० 54 की धारा 6 द्वारा (अधिसूचना की तारीख से) उपधारा (3) के स्थान पर:
(3) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं, तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।।
- 1960 के अधिनियम सं० 21 की धारा 3 द्वारा (1-11-1960 से) उपधारा (3) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1954 के अधिनियम सं० 54 की धारा 19 द्वारा धारा 26 को उस धारा की उपधारा (1) के रूप में पुनःसंख्यांकित किया गया ।
- 2010 के अधिनियम सं० 4 की धारा 17 द्वारा प्रतिस्थापित ।
4[(2) यदि उपधारा (1) के अधीन कोई अपराध करने वाला व्यक्ति कम्पनी है तो प्रत्येक व्यक्ति जो अपराध किए जाने के समय कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कम्पनी भी ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे तथा तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे:
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को इस अधिनियम में उपबन्धित किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(3) उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, जहां उपधारा (1) के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है तथा यह साबित होता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक या प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए,
(क) “कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है, तथा
(ख) “फर्म के सम्बन्ध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।]
1[26क. अपराधों का शमन-दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का, अभियोजन संस्थित किए जाने से पूर्व या अभियोजन संस्थित किए जाने के पश्चात् न्यायालय की अनुमति से बोर्ड को ऐसी धनराशि जो उस माल के मूल्य से अधिक न हो जिसकी बाबत उल्लंघन किया गया है, के संदाय पर बोर्ड द्वारा शमन किया जा सकेगा ।]
27. अभियोजनों के लिए प्रक्रिया-इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध के लिए कोई अभियोजन केन्द्रीय सरकार या बोर्ड द्वारा या उसकी सहमति से ही संस्थित किया जाएगा अन्यथा नहीं ।
2[27क. न्यायालयों की अधिकारिता-प्रेसिडेन्सी मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट से अवर कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।
28. विधिक कार्यवाहियों का वर्जन-इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही बोर्ड या बोर्ड के किसी अधिकारी के विरुद्ध न होगी ।
29. [राज्य सरकार की अस्थायी शक्तिया-रबड़ (उत्पादन और विपणन) संशोधन अधिनियम, 1954 (1954 का 54) की धारा 21 द्वारा निरसित ।]
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- 1954 के अधिनियम सं० 54 की धारा 19 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2010 के अधिनियम सं० 4 की धारा 18 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1954 के अधिनियम सं० 54 की धारा 20 द्वारा अंतःस्थापित ।

