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सिनेमा कर्मकार और सिनेमा थिएटर कर्मकार (नियोजन का विनियमन) अधिनियम, 1981 ( Cine-Workers and Cinema Theatre Workers (Regulation of Employment)Act, 1981 )


 

सिनेमा कर्मकार और सिनेमा थिएटर कर्मकार (नियोजन का विनियमन) अधिनियम, 1981

(1981 का अधिनियम संख्यांक 50)

[24 दिसम्बर, 1981]

कतिपय सिनेमा कर्मकारों और सिनेमा थिएटर कर्मकारों

के नियोजन की शर्तों के विनियमन और

उससे सम्बद्ध विषयों का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के बत्तीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम सिनेमा कर्मकार और सिनेमा थिएटर कर्मकार (नियोजन का विनियमन) अधिनियम, 1981 है ।

(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है ।

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे और इस अधिनियम के विभिन्न उपबंधों के लिए तथा विभिन्न क्षेत्रों के लिए, विभिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) सिनेमा थिएटर" से ऐसा स्थान अभिप्रेत है जो चलचित्र अधिनियम, 1952 (1952 का 37) के भाग 3 के अधीन या किसी राज्य में उस समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन, चलचित्र फिल्म के प्रदर्शन के लिए अनुज्ञप्त है ;

(ख) चलचित्र फिल्म" का वही अर्थ है जो उसका चलचित्र अधिनियम, 1952 (1952 का 37) में है ;

(ग) सिनेमा कर्मकार" से ऐसा व्यष्टि अभिप्रेत है,-

(i) जो किसी कथा फिल्म के निर्माण में या उसके संबंध में कलाकार के (जिसके अन्तर्गत अभिनेता, संगीतकार, नृत्यकार भी है) रूप में कार्य करने या कुशल, अकुशल, शारीरिक, पर्यवेक्षकीय, तकनीकी, कलात्मक या अन्यथा कोई कार्य करने के लिए सीधे या किसी ठेकेदार या अन्य व्यक्ति के माध्यम से नियोजित है, और

(ii) जिसका ऐसी कथा फिल्म के निर्माण में या उसके संबंध में ऐसे नियोजन की बाबत पारिश्रमिक, जहां ऐसा पारिश्रमिक मासिक मजदूरी के रूप में है वहां एक हजार छह सौ रुपए प्रतिमास से अधिक नहीं है और जहां ऐसा पारिश्रमिक एकमुश्त राशि के रूप में है, वहां पन्द्रह हजार रुपए से अधिक नहीं है ;

(घ) सक्षम प्राधिकारी" से वह प्राधिकारी अभिप्रेत है जिसे केन्द्रीय सरकार ने राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के अधीन सक्षम प्राधिकारी के सभी या किन्हीं कृत्यों का पालन करने के लिए प्राधिकृत किया है ;

(ङ) ठेकेदार" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो किसी कथा फिल्म के निर्माण में या उसके संबंध में नियोजित किए जाने के लिए सिनेमा कर्मकार प्रदान करता है या प्रदान करने का जिम्मा लेता है, और इसके अन्तर्गत उप-ठेकेदार या अभिकर्ता भी है ;

(च) कथा फिल्म" से भारत में पूर्णतः या भागतः निर्मित पूरी लंबाई वाली ऐसी चलचित्र फिल्म अभिप्रेत है जिसका कोई रूप विधान हो और जिसकी कहानी कुछ पात्रों के आसपास घूमती हो और जिसका कथानक मुख्यतः संवादों के माध्यम से व्यक्त होता हो, न कि पूर्णतः वर्णन, सजीव या कार्टून चित्रण द्वारा व्यक्त किया जाता हो और इसके अन्तर्गत विज्ञापन फिल्म नहीं है ;

(छ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;

(ज) किसी कथा फिल्म के सम्बन्ध में निर्माता" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो ऐसी फिल्म बनाने के लिए (जिसके अन्तर्गत ऐसी फिल्म के निर्माण के लिए वित्त जुटाना और सिनेमा कर्मकारों को नियुक्त करना भी है) आवश्यक इंतजाम करने के लिए जिम्मेदारी लेता है ;

(झ) किसी कथा फिल्म के सम्बन्ध में निर्माण" के अन्तर्गत उसके बनाने की बाबत कोई क्रियाकलाप भी है ;

(ञ) अधिकरण" से धारा 7 के अधीन गठित सिनेमा कर्मकार अधिकरण अभिप्रेत है ;

(ट) मजदूरी" से वे सभी उपलब्धियां अभिप्रेत हैं जो कर्मकार को नियोजन की संविदा के निबन्धन के अनुसर नकद संदेय हैं, किन्तु इसके अन्तर्गत निम्नलिखित नहीं हैं :-

(i) किसी खाद्य रियायत का नकद मूल्य ;

(ii) कोई महंगाई भत्ता (अर्थात् वे सब नकद संदाय, चाहे वे किसी भी नाम से ज्ञात हों, जो कर्मकार को निर्वाह व्यय में वृद्धि के कारण या उससे उस स्थान से जहां वह सामान्यतया निवास करता है भिन्न स्थान पर कार्य करने की अपेक्षा किए जाने के कारण दिए जाते हैं), मकान  किराया भत्ता, अतिकाल भत्ता, बोनस, कमीशन या कोई अन्य समरूप भत्ता जो कर्मकार को उसके नियोजन या ऐसे नियोजन में किए गए कार्य की बाबत संदेय है ;

(iii) किसी पेंशन निधि या भविष्य निधि में या उस कर्मकार की प्रसुविधा के लिए तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन नियोजक द्वारा संदत्त या संदेय कोई अभिदाय ;

(iv) संविदा के पर्यवसान पर संदेय कोई उपदान ।

अध्याय 2

सिनेमा कर्मकारों के नियोजन का विनियमन

3. करार के बिना सिनेमा कर्मकार के नियोजन का प्रतिषेध-(1) किसी व्यक्ति को किसी कथा फिल्म के निर्माण में या उसके संबंध में सिनेमा कर्मकार के रूप में तब तक नियोजित नहीं किया जाएगा जब तक कि :-

(क) ऐसे व्यक्ति के साथ ऐसी फिल्म के निर्माता द्वारा या जहां ऐसा व्यक्ति किसी ठेकेदार या अन्य व्यक्ति के माध्यम से नियोजित है वहां ऐसी फिल्म के निर्माता और ऐसे ठेकेदार या अन्य व्यक्ति द्वारा लिखित करार नहीं कर लिया जाता है ; और

(ख) ऐसे करार को ऐसी फिल्म के निर्माता द्वारा सक्षम प्राधिकारी के पास रजिस्ट्रीकृत नहीं किया जाता है ।

(2) ऐसा प्रत्येक करार जो उपधारा (1) में निर्दिष्ट है-

(क) विहित प्ररूप में होगा ;

(ख) उसमें ऐसे व्यक्ति का नाम जिसके नियोजन से यह संबंधित है (जिसे इसमें इसके पश्चात् इस उपधारा में कर्मचारी कहा गया है) और उससे सम्बन्धित ऐसी अन्य विशिष्टियां जो विहित की जाएं विनिर्दिष्ट होंगी ;

(ग) उसमें कर्मचारी के कार्य की प्रकृति, उसके काम के घंटे, मजदूरी और अन्य फायदे (जिसके अन्तर्गत भविष्य निधि, यदि कोई हो, के रूप में फायदे भी हैं) जिसके लिए वह हकदार है, ऐसी मजदूरी तथा ऐसी भविष्य निधि में अभिदायों के संदाय का ढंग और नियोजन के अन्य सभी निबंधन और शर्तें विनिर्दिष्ट होंगी ;

(घ) उसमें, जहां ऐसा कर्मचारी किसी ठेकेदार या अन्य व्यक्ति के माध्यम से नियोजित है, वहां इस आशय की एक शर्त विनिर्दिष्ट होगी कि ठेकेदार या अन्य व्यक्ति के करार के अधीन कर्मचारी के प्रति मजदूरी के संदाय या किसी अन्य विषय की बाबत अपनी बाध्यताओं का निर्वहन करने में असफल रहने की दशा में संबंधित फिल्म का निर्माता ऐसी बाध्यताओं का निर्वहन करने के लिए दायी होगा और वह ठेकेदार या अन्य व्यक्ति द्वारा उसके लिए प्रतिपूर्ति का हकदार होगा ।

                (3) किसी व्यक्ति के किसी सिनेमा कर्मकार के रूप में नियोजन की बाबत उपधारा (1) में निर्दिष्ट करार की एक प्रति, यदि ऐसा व्यक्ति धारा 16 के अधीन भविष्य निधि के फायदे के लिए हकदार है, तो फिल्म निर्माता द्वारा कर्मचारी भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 (1952 का 19) के अधीन सम्बद्ध प्रादेशिक भविष्य निधि आयुक्त को भी अग्रेषित की जाएगी ।

4. सुलह अधिकारी-केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा उतने व्यक्तियों को जितने वह ठीक समझे सुलह अधिकारी नियुक्त कर सकेगी, जिन पर किसी सिनेमा कर्मकार और किसी ऐसी फिल्म के, जिसमें या जिसके संबंध में वह नियोजित किया गया है, किसी निर्माता या किसी ऐसे ठेकेदार या अन्य व्यक्ति के बीच जिसके माध्यम से वह इस प्रकार नियोजित किया गया है, ऐसे सिनेमा कर्मकार के नियोजन के निबंधनों और शर्तों या उसके पर्यवसान की बाबत, किसी विवाद में (जिसे इसमें इसके पश्चात् विवाद कहा गया है) मध्यस्थता करने और उनमें समझौता कराने का भार होगा ।

5. सुलह अधिकारियों के कर्तव्य-(1) जहां कोई विवाद विद्यमान है या उसके होने की आशंका है, वहां सुलह अधिकारी विहित रीति से सुलह कार्यवाहियां कर सकेगा ।

                (2) सुलह अधिकारी विवाद का समझौता कराने के प्रयोजन के लिए विवाद का तथा उसके गुणावगुण और उसके ठीक समझौता होने पर प्रभाव डालने वाले सभी मामलों का अन्वेषण अविलम्ब करेगा और विवाद का उचित तथा सौहार्द्रपूर्ण समझौता करने के लिए पक्षकारों को उत्प्रेरित करने के प्रयोजनार्थ वे सभी बातें कर सकेगा जिन्हें वह ठीक समझे ।

                (3) यदि विवाद का या विवादग्रस्त मामलों में से किसी का भी समझौता सुलह कार्यवाहियों के अनुक्रम में हो जाता है, तो सुलह अधिकारी केन्द्रीय सरकार को उसकी एक रिपोर्ट, विवाद के पक्षकारों द्वारा हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन सहित भेजेगा ।

                (4) यदि ऐसा कोई समझौता नहीं हो पाता है तो सुलह अधिकारी अन्वेषण समाप्त होने के पश्चात्, यथासाध्य शीघ्रता से केन्द्रीय सरकार को एक पूरी रिपोर्ट भेजेगा, जिसमें विवाद के सम्बद्ध तथ्यों और परिस्थितियों का अभिनिश्चय करने और विवाद का समझौता कराने के लिए उसके द्वारा किए गए उपाय, और साथ ही उन तथ्यों और परिस्थितियों का पूरा-पूरा विवरण और वे कारण भी, जिनसे उसकी राय में समझौता नहीं हो सका, उपवर्णित होंगे ।

                (5) यदि उपधारा (4) में निर्दिष्ट रिपोर्ट पर विचार करने पर केन्द्रीय सरकार का समाधान हो जाता है कि अधिकरण को निर्देश करने के लिए मामला बनता है तो वह धारा 17 के अधीन ऐसा निर्देश कर सकेगी और जहां वह सरकार ऐसा निर्देश नहीं करती है वहां वह उसके लिए अपने कारण अभिलिखित करेगी और सम्पृक्त पक्षकारों को संसूचित करेगी ।

                (6) इस धारा के अधीन रिपोर्ट, सुलह कार्यवाहियां प्रारम्भ होने के तीन मास के भीतर या ऐसी अल्पतर अवधि के भीतर, जैसी केन्द्रीय सरकार नियत करे प्रस्तुत की जाएगी :

                परन्तु सुलह अधिकारी के अनुमोदन के अधीन रहते हुए रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने का समय इतनी अवधि के लिए बढ़ाया जा सकेगा जितनी के बारे में विवाद के सभी पक्षकारों में लिखित रूप में सहमति हो जाए ।

6. समझौते का आबद्धकर होना और सक्षम प्राधिकारी द्वारा प्रवर्तित किया जाना-इस अध्याय के अधीन सुलह कार्यवाही के अनुक्रम में किया गया प्रत्येक समझौता विवाद के सभी पक्षकारों पर आबद्धकर होगा और उसे किसी भी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा तथा सक्षम प्राधिकारी का यह कर्तव्य होगा कि वह उक्त समझौते के निबन्धनों को प्रवर्तित करे ।

7. अधिकरणों का गठन-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, धारा 3 में निर्दिष्ट प्रकृति के किसी करार में विनिर्दिष्ट किसी भी विषय सम्बन्धी विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए एक या अधिक अधिकरण गठित कर सकेगी जो सिनेमा कर्मकार अधिकरण कहलाएंगे और जिनके मुख्यालय ऐसे स्थान पर होंगे जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं ।

                (2) अधिकरण का गठन केवल एक व्यक्ति से होगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा ।

                (3) कोई भी व्यक्ति अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए तब तक अर्हित नहीं होगा जब तक कि वह-

(क) किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश न हो, या न रह चुका हो या होने के लिए अर्हित न हो ; या

(ख) कम से कम तीन वर्ष की अवधि तक जिला न्यायाधीश या अपर जिला न्यायाधीश न रह चुका हो ; या

(ग) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) के अधीन गठित किसी औद्योगिक अधिकरण के पीठासीन अधिकारी का पद कम से कम दो वर्ष की अवधि तक धारण न कर चुका हो ।

                (4) केन्द्रीय सरकार, यदि वह ऐसा करना ठीक समझे, अधिकरण को उसके समक्ष की कार्यवाहियों में सलाह देने के लिए दो व्यक्तियों को असेसरों के रूप में नियुक्त कर सकेगी ।

8. अधिकरणों के पीठासीन अधिकारियों के लिए निरर्हताएं-कोई भी व्यक्ति किसी अधिकरण में पीठासीन अधिकारी के पद पर नियुक्त नहीं किया जाएगा और न बना रहेगा, यदि-

                                (क) वह स्वतंत्र व्यक्ति नहीं है ; या

                                (ख) उसने पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर ली है ।

9. रिक्तियों का भरा जाना-यदि अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के पद में (अस्थायी अनुपस्थिति से भिन्न) कोई रिक्ति किसी भी कारण हो जाती है, तो केन्द्रीय सरकार किसी अन्य व्यक्ति को उस रिक्ति को भरने के लिए इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार नियुक्त करेगी और कार्यवाही उस प्रक्रम से, जब रिक्ति भर दी जाती है अधिकरण के समक्ष चालू रखी जा सकेगी ।

10. अधिकरणों आदि को गठित करने वाले आदेशों की अंतिमता-(1) केन्द्रीय सरकार का कोई भी आदेश, जिससे किसी व्यक्ति की नियुक्ति अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के रूप में की गई है, किसी भी रीति से प्रश्नगत नहीं किया जाएगा, और किसी अधिकरण के समक्ष का कोई भी कार्य या कार्यवाही ऐसे अधिकरण के गठन में किसी त्रुटि के आधार पर ही किसी भी रीति से प्रश्नगत नहीं की जाएगी ।

                (2) सुलह कार्यवाही के अनुक्रम में किया गया कोई भी समझौता केवल इस तथ्य के कारण ही अविधिमान्य नहीं होगा कि ऐसा समझौता, धारा 5 की उपधारा (6) में निर्दिष्ट अवधि के अवसान के पश्चात् किया गया था ।

11. विवादों का अधिकरणों को निर्देशित किया जाना-(1) जहां धारा 5 की उपधारा (4) में निर्दिष्ट रिपोर्ट पर विचार करने के पश्चात्, केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि ऐसा करना आवश्यक है, वहां वह लिखित आदेश द्वारा विवाद को या ऐसे किसी विषय को जो विवाद से संबंधित या सुसंगत प्रतीत हो, न्यायनिर्णयन के लिए किसी अधिकरण को निर्देशित कर सकेगी ।

                (2) जहां उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी आदेश में या किसी पश्चात्वर्ती आदेश में केन्द्रीय सरकार ने न्यायनिर्णयन के लिए विवाद्यक प्रश्नों को विनिर्दिष्ट किया है वहां अधिकरण अपना न्यायनिर्णयन उन प्रश्नों और उससे आनुषंगिक विषयों तक ही सीमित रखेगा ।

12. सुलह अधिकारियों और अधिकरणों की प्रक्रिया और शक्तियां-(1) उन नियमों के अधीन रहते हुए जो इस निमित्त बनाए जाएं, सुलह अधिकारी या अधिकरण ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगा जैसी अधिकारी या अधिकरण ठीक समझे ।

                (2) सुलह अधिकारी या अधिकरण, किसी विद्यमान या आशंकित विवाद की जांच के प्रयोजन के लिए युक्तियुक्त सूचना देने के पश्चात् किसी ऐसे परिसर में प्रवेश कर सकेगा जो विवाद के किसी पक्षकार के अधिभोग में हो ।

                (3) प्रत्येक अधिकरण को निम्नलिखित विषयों की बाबत, अर्थात् :-

(क) किसी व्यक्ति को हाजिर कराने और शपथ पर उसकी परीक्षा करने के लिए,

(ख) दस्तावेज और भौतिक पदार्थ पेश करने के लिए विवश करने के लिए,

(ग) साक्षियों की परीक्षा करने के लिए कमीशन निकालने के लिए, और

(घ) ऐसे अन्य विषयों की बाबत जैसे विहित किए जाएं,

वे ही शक्तियां होंगी जो वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय में दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन निहित होती हैं और अधिकरण द्वारा की जाने वाली प्रत्येक जांच या अन्वेषण को भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ के अन्दर न्यायिक कार्यवाही समझा जाएगा और अधिकरण को दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए एक सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।

                (4) सुलह अधिकारी किसी ऐसी दस्तावेज को मंगा सकेगा और उसका निरीक्षण कर सकेगा, जिसके बारे में उसके पास यह समझने का आधार हो कि वह विवाद से सुसंगत है या किसी अधिनिर्णय के कार्यान्वयन को सत्यापित करने या इस अध्याय के अधीन उस पर अधिरोपित किसी अन्य कर्तव्य का पालन करने के लिए आवश्यक है और पूर्वोक्त प्रयोजनों के लिए दस्तावेजों का पेश किया जाना विवश करने की बाबत सुलह अधिकारी को वे ही शक्ितयां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन सिविल न्यायालय में निहित होती हैं ।

                (5) यदि अधिकरण ऐसा करना ठीक समझे तो वह विचाराधीन विषय का विशिष्ट ज्ञान रखने वाले एक या अधिक व्यक्तियों को अपने समक्ष की कार्यवाहियों में सलाह देने के लिए असेसर या असेसरों के रूप में नियुक्त कर सकेगा ।

                (6) अधिकरण, किसी संविदा के एकपक्षीय रूप से समाप्त किए जाने को या किसी कर्मकार की पदच्युति को अपास्त करके या किसी कर्मकार को पुनः बहाल करके अपने समक्ष कार्यवाही के किसी पक्षकार को ऐसा अंतरिम या अन्य अनुतोष (चाहे वह किसी शर्त के अधीन हो अथवा नहीं) जिसके अन्तर्गत धारा 3 में निर्दिष्ट करार के अधीन संदेय मजदूरी या किसी अन्य रकम के संदाय की बाबत किसी आदेश का स्थगन, किसी व्यादेश या निदेश का जारी किया जाना भी है, दे सकेगा जो वह मामले की परिस्थितियों में न्यायसंगत और उचित समझे :

                परन्तु अधिकरण ऐसा कोई अंतरिम अनुतोष तब तक नहीं देगा जब तक कि कार्यवाही के सभी पक्षकारों को ऐसे अंतरिम अनुतोष के लिए किए गए आवेदन पर सूचना की तामील न कर दी गई हो तथा उन्हें सुने जाने का युक्तियुक्त अवसर न दे दिया गया हो :

                परन्तु यह और कि अधिकरण ईप्सित अंतरिम अनुतोष की प्रकृति और मामले की परिस्थितियों का ध्यान रखते हुए कार्यवाहियों के पक्षकारों पर पूर्ववर्ती परन्तुक में निर्दिष्ट सूचना की तामील किए जाने से पहले ऐसा अंतरिम अनुतोष जो वह मामले की परिस्थितियों में न्यायसंगत और उचित समझे, देने वाले समुचित आदेश पारित कर सकेगा :

                परन्तु यह और भी कि जहां अधिकरण ठीक पूर्ववर्ती परन्तुक के अधीन कोई आदेश करता है, वहां वह प्रथम परन्तुक में विनिर्दिष्ट अपेक्षाओं का अनुपालन करने के पूर्व आदेश किए जाने के कारणों को अभिलिखित करेगा ।

                (7) ऐसे किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए जो इस निमित्त बनाए जाएं, किसी अधिकरण के समक्ष किसी कार्यवाही में नुकसानी और उसके और उससे आनुषंगिक खर्चों का अधिनिर्णय करना उस अधिकरण के विवेकानुसार होगा तथा अधिकरण को यह पूर्ण शक्ति होगी कि वह यह अवधारित करे कि किस के द्वारा और किस को और किस मात्रा तक तथा किन शर्तों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए ऐसी नुकसानी या खर्चों का संदाय किया जाएगा और पूर्वोक्त प्रयोजनों के लिए सभी आवश्यक निदेश दे और ऐसी नुकसानी या खर्चों को, हकदार व्यक्ति द्वारा केन्द्रीय सरकार को किए गए आवेदन पर उस सरकार द्वारा वैसी ही रीति में वसूल किए जाने का निदेश दिया जा सकेगा जिस रीति से भू-राजस्व की बकाया वसूल की जाती है ।

13. अधिकरणों के कर्तव्य-जहां अधिकरण को कोई विवाद न्यायनिर्णय के लिए निर्देशित किया गया है वहां वह अपनी कार्यवाही शीघ्रतापूर्वक करेगा और अपना अधिनिर्णय उस तारीख से जिसको ऐसा औद्योगिक विवाद उसे निर्देशित किया गया था, साधारणतः तीन मास की अवधि के भीतर केन्द्रीय सरकार को प्रस्तुत करेगा :

                परन्तु इस धारा के अधीन तीन मास की अवधि की संगणना करने में उस अवधि को जिसके लिए अधिकरण के समक्ष कोई व्यादेश या आदेश द्वारा कार्यवाहियों को रोक दिया गया है, अपवर्जित किया जाएगा ।

14. अधिकरण के अधिनिर्णयों का प्रकाशन-(1) अधिकरण का प्रत्येक अधिनिर्णय केन्द्रीय सरकार द्वारा उसकी प्राप्ति की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर, ऐसी रीति से जो वह सरकार उचित समझे, प्रकाशित किया जाएगा ।

                (2) धारा 15 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए अधिनिर्णय अंतिम होगा और विवाद के सभी पक्षकारों पर आबद्धकर होगा और उसे किसी न्यायालय में किसी भी रीति से प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।

                (3) अधिकरण के अधिनिर्णय को उसी रीति से निष्पादित किया जाएगा मानो वह किसी सिविल न्यायालय की कोई डिक्री हो ।

15. पुनरीक्षण-(1) उच्च न्यायालय, अधिकरण के अधिनिर्णय से व्यथित किसी व्यक्ति द्वारा किए गए आवेदन पर, ऐसे अधिकरण के समक्ष कार्यवाही की नियमितता या उसमें पारित किसी अधिनिर्णय की सत्यता, वैधता या औचित्य के बारे में अपना समाधान करने के लिए अधिकरण के अभिलेख को मंगा सकेगा और उसकी परीक्षा कर सकेगा और यदि किसी मामले में उच्च न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि ऐसे किसी अधिनिर्णय का उपांतरण, बातिलकरण या उसे उलट देने की आवश्यकता है तो वह तद्नुसार ऐसे आदेश कर सकेगा: 

                परन्तु जहां अधिकरण का पीठासीन अधिकारी किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है वहां ऐसे आवेदन की सुनवाई और निपटारा उस उच्च न्यायालय के कम से कम दो न्यायाधीशों द्वारा किया जाएगा:

                परन्तु यह और कि जहां अधिकरण के अधिनिर्णय में किसी फिल्म के निर्माता या, यथास्थिति, ठेकेदार या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा सिनेमा कर्मकार को या तो प्रतिकर के रूप में या नुकसानी के रूप में किसी रकम का संदाय किए जाने का उपबन्ध है वहां निर्माता, ठेकेदार या अन्य व्यक्ति द्वारा किए गए ऐसे आवेदन को उच्च न्यायालय द्वारा तब तक ग्रहण नहीं किया जाएगा जब तक कि आवेदक द्वारा उच्च न्यायालय में या ऐसे अन्य प्राधिकारी के पास, जो विहित किया जाए, वह रकम जमा नहीं करा दी जाती है जिसे देने का उसे आदेश दिया गया है :

                परन्तु यह और भी कि जहां, किसी विशिष्ट मामले में, उच्च न्यायालय की यह राय है कि किसी रकम के, जिसे देने का आदेश दिया गया है, जमा करने से आवेदक को असम्यक् कठिनाई होगी वहां उच्च न्यायालय ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो वह अधिरोपित करना ठीक समझे ऐसे जमा करने से अभिमुक्ति दे सकेगा जिससे कि सम्बन्धित सिनेमा कर्मकार के हितों की रक्षा हो सके ।

                (2) उच्च न्यायालय को उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक आवेदन उस तारीख से नब्बे दिन के भीतर किया जाएगा जिसको अधिकरण द्वारा अधिनिर्णय पारित किया गया था:

                परन्तु यदि उच्च न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि आवेदक के पास इस उपधारा में विनिर्दिष्ट समय के भीतर आवेदन न करने के लिए पर्याप्त कारण था तो वह स्वविवेकानुसार ऐसे आवेदन को फाइल किए जाने के लिए एक मास से अनधिक का अतिरिक्त समय अनुज्ञात कर सकेगा ।

                (3) इस धारा में उच्च न्यायालय" से ऐसा उच्च न्यायालय अभिप्रेत है जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर अधिकरण का मुख्यालय स्थित है ।

16. 1952 के अधिनियम संख्यांक 19 का सिनेमा कर्मकारों को लागू होना-तत्समय यथा प्रवृत्त कर्मचारी भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबन्ध अधिनियम, 1952 ऐसे प्रत्येक सिनेमा कर्मकारों को जिसने, कम से कम तीन कथा फिल्मों में एक या अधिक निर्माताओं के साथ कार्य किया है ऐसे लागू होगा मानो ऐसा सिनेमा कर्मकार उस अधिनियम के अर्थ के भीतर कर्मचारी हो ।

17. शास्तियां-(1) जो कोई धारा 3 के उपबन्धों का उल्लंघन करेगा वह जुर्माने से, जो दस हजार रुपए से कम का नहीं होगा किन्तु जो पचास हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा:

                परन्तु न्यायालय, निर्णय में उल्लिखित किए जाने वाले किन्हीं पर्याप्त और विशेष कारणों से दस हजार रुपए से कम का जुर्माना अधिरोपित कर सकेगा ।

                (2) जहां उपधारा (1) के अधीन किसी अपराध के लिए सिद्धदोष व्यक्ति को उसी उपबंध के अधीन किसी अपराध के लिए पुनः सिद्धदोष ठहराया जाता है वहां वह जुर्माने से जो बीस हजार रुपए से कम का नहीं होगा किन्तु जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा:

                परन्तु न्यायालय, निर्णय में उल्लिखित किए जाने वाले किन्हीं पर्याप्त और विशेष कारणों से बीस हजार रुपए से कम का जुर्माना अधिरोपित कर सकेगा ।

18. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया जाता है, वहां प्रत्येक व्यक्ति जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने के भागी होंगे:

                परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को किसी दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था अथवा उसने ऐसे अपराध के निवारण के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।

                (2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित कर दिया जाता है कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण हुआ माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा तथा तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने का भागी होगा ।

                स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -

(क) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है, तथा

(ख) फर्म के सम्बन्ध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।

19. अपराधों का संज्ञान-कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का संज्ञान केन्द्रीय सरकार या उसके द्वारा इस निमित्त सशक्त किसी अधिकारी द्वारा किए गए परिवाद पर या उसकी लिखित अनुज्ञा से ही करेगा, अन्यथा नहीं और किसी महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय से अवर कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।

20. वर्धित शास्ति अधिरोपित करने की मजिस्ट्रेट की शक्ति-दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 29 में किसी बात के होते हुए भी किसी महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के लिए, इस अधिनियम द्वारा प्राधिकृत कोई दंडादेश पारित करना, विधिपूर्ण होगा ।

21. इस अध्याय से असंगत विधियों और करारों का प्रभाव-इस अध्याय के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या सेवा के किसी करार या संविदा के निबंधनों में उनसे अंसगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।

22. इस अध्याय के अधीन की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के बारे में कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही सक्षम अधिकारी, सुलह अधिकारी या केन्द्रीय सरकार के किसी अन्य कर्मचारी या अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के विरुद्ध नहीं होगी ।

                (2) इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या जारी की गई किसी अधिसूचना या किए गए किसी आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात से हुए या हो सकने वाले किसी नुकसान के बारे में कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध नहीं होगी ।

23. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अध्याय के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।

                (2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या उनमें से किसी विषय के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -

(क) वह प्ररूप जिसमें किसी सिनेमा कर्मकार के साथ किसी निर्माता द्वारा धारा 3 के अधीन कोई करार किया जा सकेगा और नियोजन की अन्य शर्तें;

(ख) वह रीति जिसमें धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन सुलह अधिकारी द्वारा कार्यवाहियां की जा सकेंगी;

                                (ग) वह प्रक्रिया जिसका धारा 12 के अधीन सुलह अधिकारी या अधिकरण द्वारा अनुसरण किया जाएगा;

(घ) वे विषय जो धारा 12 की उपधारा (3) के खंड (घ) में निर्दिष्ट हैं;

(ङ) वह नुकसानी या खर्च जो धारा 12 की उपधारा (7) के अधीन किसी अधिकरण द्वारा अधिनिर्णीत किए जा सकेंगे;

(च) कोई अन्य विषय जिसका विहित किया जाना अपेक्षित है या जो विहित किया जाए ।

(3) इस अध्याय के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

अध्याय 3

सिनेमा थिएटर कर्मकारों के नियोजन का विनियमन

24. 1952 के अधिनियम संख्यांक 19 का लागू होना-तत्समय प्रवृत्त कर्मचारी भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 के उपबंध ऐसे प्रत्येक सिनेमा थिएटर को, जिसमें किसी एक दिन पांच या अधिक कर्मकार नियोजित हैं, वैसे ही लागू होंगे मानो ऐसा सिनेमा थिएटर ऐसा स्थापन हो जिसे उपरोक्त अधिनियम, उसकी धारा 1 की उपधारा (3) के परन्तुक के अधीन केन्द्रीय सरकार की अधिसूचना द्वारा, लागू किया गया हो और मानो प्रत्येक ऐसा कर्मकार उस अधिनियम के अर्थ में कर्मचारी हो ।

25. 1972 के अधिनियम संख्यांक 39 का लागू होना-तत्समय प्रवृत्त उपदान संदाय अधिनियम, 1972 के उपबंध किसी ऐसे सिनेमा थिएटर में, जिसमें पूर्ववर्ती बारह मास में किसी दिन पांच या उससे अधिक कर्मकार नियोजित हैं या नियोजित थे, नियोजित प्रत्येक सिनेमा थिएटर कर्मकार को या उनके संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे उस अधिनियम के अर्थ में कर्मकारों को या उनके सम्बन्ध में लागू होते हैं ।

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