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उच्च न्यायालय न्यायाधीश (वेतन और सेवा शर्त) अधिनियम, 1954 ( High Court Judges (Salaries and Conditions of Service) Act, 1954 )


 

उच्च न्यायालय न्यायाधीश (वेतन और सेवा शर्त)

अधिनियम, 1954

(1954 का अधिनियम संख्यांक 28)

[20 मार्च, 1954]

*** उच्च न्यायालय के  [न्यायाधीशों के वेतन और उनकी सेवा की

कुछ शर्तोंट का विनियमन

करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के पांचवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम उच्च न्यायालय न्यायाधीश  [(वेतन और सेवा शर्त)] अधिनियम,             1954 है ।

2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

                (क) ‘कार्यकारी मुख्य न्यायाधिपतिऱ’ से मुख्य न्यायाधिपति के कर्तव्यों का पालन करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 223 के अधीन नियुक्त न्यायाधीश अभिप्रेत है ;

                (ख) ‘कार्यकारी न्यायाधीशऱ’ से  *** संविधान के अनुच्छेद 224 के खंड (2) के अधीन न्यायाधीश के रूप में कार्य करने के लिए नियुक्त  *** व्यक्ति अभिप्रेत है ;

                                (ग) ‘वास्तविक सेवा’ के अन्तर्गत निम्नलिखित आते हैं :-

(i) न्यायाधीश के रूप में कर्तव्य पर रहते हुए अथवा ऐसे अन्य कृत्यों के पालन में, जिनका निर्वहन करने का वह, भारत के राष्ट्रपित के अनुरोध पर जिम्मा लें, किसी न्यायाधीश द्वारा बिताया गया समय,

(ii) दीर्घावकाश, उस समय को छोड़कर जिसके दौरान न्यायाधीश छुट्टी पर है,

(iii) किसी उच्च न्यायालय से उच्चतम न्यायालय को या किसी एक उच्च न्यायालय से दूसरे को या उच्चतम न्यायालय से किसी उच्च न्यायालय को स्थानान्तरित होने पर कार्यग्रहण की अवधि,

(iv) किसी भूतपूर्व भारतीय उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में  किसी न्यायाधीश द्वारा कर्तव्य पर बिताया गया समय,

(v) संविधान के अनुच्छेद 127 के अधीन तदर्थ न्यायाधीश के रूप में उच्चतम न्यायालय की बैंठकों में उपस्थित रहने के लिए किसी न्यायाधीश द्वारा बिताया गया समय, और

(vi) किसी भूतपूर्व भारतीय उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में किसी न्यायाधीश द्वारा लिया गया दीर्घावकाश (उस समय को छोड़कर जिसके दौरान वह न्यायाधीश छुट्टी पर रहा है) ;

(घ) ‘अपर न्यायाधीश’ से 4*** संविधान के अनुच्छेद 224 के खंड (1) के अधीन अपर न्यायाधीश के रूप में नियुक्त 5*** व्यक्ति अभिप्रेत है ;

4।                                            ।                                              ।                                              ।

(च) ‘उच्च न्यायालय’ से किसी  [राज्य का] उच्च न्यायालय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत ऐसा उच्च न्यायालय आता है जो संविधान के प्रारम्भ से पूर्व,  [किसी भाग क राज्य में या] किसी तत्स्थानी प्रांत में, अधिकारिता का प्रयोग करता था ;

(छ) ‘न्यायाधीशऱ’ से किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधिपति,  [कार्यकारी मुख्य न्यायाधिपति, अपर न्यायाधीश और कार्यकारी न्यायाधीश] भी हैं ;

 [(छछ) ‘पेंशनऱ’ से किसी भी किस्म की कोई ऐसी पेंशन अभिप्रेत है जो किसी न्यायाधीश को, या उसकी बाबत, संदेय हो और इसके अन्तर्गत मृत्यु अथवा सेवानिवृत्ति प्रसुविधाओं के रूप में इस प्रकार संदेय कोई उपदान या अन्य राशि या राशियां भी हैं ;]

(ज) ‘पेंशन के लिए सेवा’ के अन्तर्गत निम्नलिखित हैं :-

(i) वास्तविक सेवा ;

 [(ii) वेतन की मासिक दर के बराबर दर से पूरे भत्तों पर छुट्टी की प्रत्येक अवधि की वस्तुतः ली              गई मात्रा ;]

(iii) भारत से बाहर छुट्टी से वापस आने पर कार्यग्रहण की अवधि ;

(झ) 'विहित' से इस अधिनियम द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ।

(2) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए सेवा की संगणना करने में  [कार्यकारी न्यायाधीश या अपर न्यायाधीश के रूप में किसी अवधि या अवधियों के लिए की गई सेवा] न्यायाधीश के रूप में की गई सेवा के रूप में गिनी जाएगी, किन्तु जैसा अभिव्यक्त रूप से उपबन्धित है उसके सिवाय, कार्यकारी मुख्य न्यायाधिपति के रूप में की गई पूर्व सेवा मुख्य न्यायाधिपति के रूप में की गई सेवा के रूप में नहीं गिनी जाएगी ।

 ।                                             ।                                              ।                                              ।                                              ।

अध्याय 2

छुट्टी

3. न्यायाधीश को अनुज्ञेय छुट्टी की किस्में-(1) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, किसी न्यायाधीश को मंजूर की गई छुट्टी, उसके विकल्प पर,-

                 [(क) पूरे भत्तों पर छुट्टी (जिसके अन्तर्गत आधे भत्तों पर छुट्टी को चिकित्सा प्रमाणपत्र पर पूरे भत्तों पर छुट्टी के रूप में परिवर्तित छुट्टी भी है); अथवा]

                (ख) आधे भत्तों पर छुट्टी ; अथवा

(ग) अंशतः पूरे भत्तों पर छुट्टी और अंशतः आधे भत्तों पर छुट्टी,

हो सकेगी ।

 (2) इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए, पूरे भत्तों पर छुट्टी की अवधि आधे भत्तों पर छुट्टी की उसी अवधि से दुगनी गिनी जाएगी ।

 [(3) इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए किसी न्यायाधीश को किसी कलेण्डर वर्ष में इतने दिनों की और ऐसी शर्तों के अध्यधीन, जो विहित की जाएं, आकस्मिक छुट्टी अनुज्ञेय हो सकेगी ।]

4. शोध्य छुट्टी की अवधि दिखाने वाला छुट्टी का खाता-(1) प्रत्येक न्यायाधीश के लिए एक छुट्टी का खाता रखा जाएगा जिसमें आधे भत्तों पर छुट्टी के रूप में उसे शोध्य छुट्टी की अवधि दिखाई जाएगी ।

(2) किसी न्यायाधीश के छुट्टी के खाते में-

                (क) उसके नाम में निम्नलिखित जमा किए जाएंगे,-

                                (i) वास्तविक सेवा में उसके द्वारा बिताए गए समय का चतुर्थांश ;  ***

(ii) जहां कोई न्यायाधीश, इस कारण कि उसे ऐसे कर्तव्यों का, जो उच्च न्यायालय से सम्बन्धित नहीं हैं, पालन करने के लिए रोका गया है, किसी ऐसे दीर्घावकाश का उपभोग नहीं कर सकता जिसका उपभोग करने का वह उस दशा में अन्यथा हकदार होता जब उसे इस प्रकार रोका न गया होता, ऐसे दीर्घावकाश के लिए, जिसका उसने उपभोग नहीं किया है, क्षतिपूर्ति के रूप में उतनी अवधि से दुगनी अवधि, जितनी एक मास में से वह दीर्घावकाश कम करके बचती हो जिसका उसने एक वर्ष में उपभोग कर लिया है ; और

 [(iii) जहां किसी न्यायाधीश ने, उसके इस रूप में नियुक्त होने के पूर्व, संघ या किसी राज्य के अधीन कोई पेंशन योग्य पद धारण किया है वहां उसके द्वारा उक्त पद में उपार्जित छुट्टी की अवधि,  *** और] ;

(ख) उसके द्वारा भत्तों सहित ली गई सभी छुट्टी उसके नामे डाली जाएगी ।

 [4क. छु्ट्टी भुनाना-कोई न्यायाधीश अपने पूर्ण सेवाकाल में, जिसके अन्तर्गत सेवा की वह अवधि भी है, जो उसने संघ या किसी राज्य के अधीन किसी पेंशन वाले पद पर या पुनर्नियोजन पर, यदि कोई हो, की है,  [पूरे भत्तों के आधार पर संगणित अपने खाते में जमा छुट्टी की अवधि की बाबत,] अपनी सेवा निवृत्ति पर छुट्टी वेतन के समतुल्य नकद का अखिल भारतीय सेवा (छुट्टी) नियम, 1905 के अधीन ऐसी छु्ट्टी के भुनाए जाने के लिए विहित अधिकतम अवधि की सीमा तक दावा करने का हकदार होगा ।]

5. जितनी छुट्टी मंजूर की जा सकती है उसका योग-(1) वह कुल छुट्टी, जो किसी न्यायाधीश को, उस रूप में उसकी सेवा की सम्पूर्ण अवधि के दौरान मंजूर की जा सकती है, आधे भत्तों पर छुट्टी के रूप में, उन अवधियों के, यदि कोई, हों, योग सहित, जो धारा 4 की उपधारा (2)(क)(त्त्) के अधीन उसके छुट्टी के खाते में उस दीर्घावकाश की, जिसका उपभोग नहीं किया गया है, क्षतिपूर्ति के रूप में जमा की गई हों, तीन वर्ष से अधिक की नहीं होगी ।

(2) पूरे भत्तों पर की कुल छुट्टी, जो किसी न्यायाधीश को उस रूप में उसकी सेवा की पूरी अवधि के दौरान मंजूर की जा सकती है, वास्तविक सेवा पर उसके द्वारा बिताई गई अवधि के, यदि कोई हों, योग सहित, जो धारा 4 की उपधारा (2)(क)(त्त्) के अधीन इसके छुट्टी के खाते में उस दीर्घावकाश की, जिसका उपभोग नहीं किया गया है, क्षतिपूर्ति के रूप में जमा की गई हो, एक बटा चौबीस से अधिक नहीं होगी ।

(3)  [धारा 5क की उपधारा (2) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, उस छुट्टी की अधिकतम अवधि, जो] एक बार में 5[मंजूर की जाए] पूरे भत्तों पर छुट्टी की दशा में पांच मास, और किसी भी प्रकार के भत्तों सहित छुट्टी की दशा में सोलह मास, होगी ।

 [5क. आधे भत्तों पर छुट्टी का पूरे भत्तों पर छुट्टी में परिवर्तित किया जाना-(1) धारा 5 की उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी किसी न्यायाधीश को, न्यायाधीश के रूप में उसकी सेवा की कुल अवधि के दौरान, आधे भत्तों पर छुट्टी को चिकित्सा प्रमाणपत्र पर, अधिक से अधिक तीन मास की, पूरे भत्तों पर छुट्टी के रूप में परिवर्तित करने के लिए अनुज्ञात किया जा सकेगा ।

(2) पूरे भत्तों पर छुट्टी की अधिकतम अवधि, की जो धारा 5 की उपधारा (3) के अधीन किसी न्यायाधीश को एक ही समय मंजूर की जा सकती है, गणना करने में इस धारा के अधीन उसे अनुज्ञात परिवर्तित छुट्टी की अवधि को हिसाब में नहीं लिया जाएगा ।]

6. अनर्जित छुट्टी मंजूर किया जाना-धारा 5 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अधिकतम सीमा के अधीन रहते हुए, किसी न्यायाधीश को, उसकी जमा छुट्टी से अधिक आधे भत्तों पर छुट्टी,-

(i) चिकित्सा प्रमाणपत्र पर मंजूर की जा सकती है, अथवा

(ii) चिकित्सा प्रमाणपत्र पर देने से अन्यथा, न्यायाधीश के रूप में उसकी सेवा की कुल अवधि के दौरान छह मास से अनधिक के लिए,  [अथवा कुल मिलाकर छह मास से अनधिक की दो या अधिक अवधियों के लिए,] मंजूर की जा सकती है :

परन्तु यदि ऐसी संभावना न हो कि न्यायाधीश अपने कर्तव्य पर लौटेगा और मंजूर की गई छुट्टी अर्जित करेगा, तो ऐसी छुट्टी मंजूर नहीं की जाएगी ।

7. विशेष निःशक्तता छुट्टी-केन्द्रीय सिविल सेवा वर्ग 1 के किसी ऐसे अधिकारी के सम्बन्ध में जिसने 1931 की जुलाई के सोलहवें दिन को या उसके पश्चात् सेवा में प्रवेश किया है और जो अपने शासकीय कर्तव्यों के सम्यक् पालन में या उसके परिणामस्वरूप या अपनी शासकीय स्थिति के परिणामस्वरूप हुई किसी क्षति से निःशक्त हो जाता है, विशेष निःशक्तता छुट्टी प्रदान किए जाने के बारे में उस समय प्रवृत्त नियम न्यायाधीश के सम्बन्ध में लागू होंगे ।

8. आसाधारण छुट्टी-न्यायाधीश के रूप में उनकी सेवा की कुल अवधि के दौरान  [छह मास से अनधिक की, अथवा कुल मिलाकर छह मास से अनधिक की दो या अधिक अवधियों के लिए असाधारण छुट्टी] इस अध्याय के पूर्वगामी उपबन्धों के अधीन अनुज्ञेय छुट्टी के अतिरिक्त किसी न्यायाधीश को,  [मंजूर की जा सकती है] किन्तु ऐसी छुट्टी के दौरान या उसकी बाबात कोई भी वेतन या भत्ते संदेय नहीं होंगे :

 [9. छुट्टी भत्ते-किसी न्यायाधीश को, संदेय छुट्टी वेतन की मासिक दर धारा 3 की उपधारा (1) के उपबंधों के                    अनुसार होगी ।]

 ।                                             ।                                              ।                                              ।                                              ।

11. दीर्घावकाश के साथ छुट्टी का मिलाया जाना-न्यायाधीश को छुट्टी के साथ पूरे वेतन पर के दीर्घावकाश को मिला लेने की अनुज्ञा दी जा सकती है, यदि-

(क) जहां दीर्घावकाश एक निरन्तर अवधि के लिए है वहां, वह छुट्टी या तो दीर्घावकाश के प्रारंभ पर ली गई हो या उसके अन्त में, किन्तु दोनों ही दशाओं में नहीं;

(ख) जहां दीर्घावकाश दो अलग-अलग अवधियों में विभाजित किया जाता है वहां, वह छुट्टी उस दीर्घावकाश की दो अवधियों के बीच की अन्तरावधि या अन्तरावधि के एक भाग के लिए, या उस दीर्घावकाश की दूसरी अवधि और ठीक अगले दीर्घावकाश के प्रारम्भ के बीच की अन्तरावधि या अन्तरावधि के एक भाग के लिए ली जाए :

परन्तु दीर्घावकाश को छुट्टी के साथ मिलाने की ऐसी कोई अनुज्ञा उस दशा में नहीं दी जाएगी जब दीर्घावकाश की अवधि के दौरान किसी कार्यकारी मुख्य न्यायाधिपति को नियुक्त करना आवश्यक हो जाता है अथवा उस न्यायाधीश के ऐसी छुट्टी के अन्त में अपने कर्तव्य पर लौटने की संभावना न हो ।

12. छुट्टी या दीर्घावकाश से अधिक ठहरने के परिणाम-यदि कोई न्यायाधीश अपनी छुट्टी या किसी दीर्घावकाश के, चाहे उसमें छुट्टी मिलाई गई हो या नहीं, बाद भी उपस्थित रहता है तो, यथास्थिति, उसे उतनी छुट्टी से, जितनी उसे मंजूर की गई है, अधिक की अवधि में उसकी अनुपस्थिति के लिए या दीर्घावकाश की समाप्ति के बाद की उसकी अनुपस्थिति के लिए, कोई वेतन नहीं मिलेगा :

परन्तु यदि ऐसी अनुपस्थिति उन परिस्थितियों के कारण हुई है जो उसके नियंत्रण के बाहर हैं तो अनुपस्थिति की अवधि को छुट्टी माना जा सकता है और उसे उसके छुट्टी के खाते में डाला जा सकता है ।

13. छुट्टी आदि मंजूर करने के लिए सक्षम प्राधिकारी-किसी न्यायाधीश को छुट्टी मंजूर या नामंजूर करने या किसी न्यायाधीश को मंजूर की गई छुट्टी प्रतिसंहृत या कम करने के लिए सक्षम प्राधिकारी उस राज्य का राज्यपाल होगा जिसमें उच्च न्यायालय का प्रधान स्थान है वह ऐसा उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति से परामर्श करने के पश्चात् कर सकेगा ।

अध्याय 3

[वेतन और पेंशन]

 [13क. न्यायाधीशों के वेतन-(1) उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति को वेतन के रूप में  [नब्बे हजार रुपए प्रति मासट का संदाय किया जाएगा ।

(2) उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को वेतन के रूप में 6[अस्सी हजार रुपए प्रति मासट का संदाय किया जाएगा ।]

14. न्यायाधीशों को संदेय पेंशन-इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक न्यायाधीश को उसकी सेवा-निवृत्ति पर प्रथम अनुसूची के भाग 1 के मापमान और उपबन्धों के अनुसार पेंशन दी जाएगी :

परन्तु ऐसी कोई पेंशन किसी न्यायाधीश को तब तक नहीं दी जाएगी जब तक-

                (क) उसने पेंशन के लिए सेवा के कम से कम बारह वर्ष पूरे न कर लिए हों ; अथवा

                 [(ख) उसने बासठ वर्ष की आयु न प्राप्त कर ली हो ; या]

                (ग) चिकित्सीय दृष्टि से यह प्रमाणित न कर दिया गया हो कि उसकी सेवानिवृत्ति अस्वस्थ रहने के कारण आवश्यक हो गई है :

 [परन्तु यह और कि यदि कोई न्यायाधीश अपनी नियुक्ति के समय संघ या राज्य में किसी पूर्व सेवा की बाबत कोई पेंशन (जो निःशक्तता या ऋण पेंशन से भिन्न हो) पा रहा है, तो इस अधिनियम के अधीन संदेय पेंशन उस पेंशन के बदले में होगी, न कि उसके अतिरिक्त ।]

 [स्पष्टीकरण-इस धारा में स्त्र्न्यायाधीशऱ् से ऐसा न्यायाधीश अभिप्रेत है जिसने संघ या किसी राज्य के अधीन कोई अन्य पेंशन योग्य पद धारण न किया हो और इसके अंतर्गत ऐसा न्यायाधीश भी है, जिसने संघ या राज्य के अधीन कोई अन्य पेंशन योग्य पद धारण कर लेने पर, प्रथम अनुसूची के भाग 1 के अधीन संदेय पेंशन लेने का चयन किया है ।]

 [14क. सेवा के जोड़े गए वर्षों का फायदा-इस अधिनियम के उपबंधों के अध्यधीन कोई ऐसा न्यायाधीश, जो संविधान के अनुच्छेद 217 के खंड (2) के उपखंड (ख) के अधीन ऐसे न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया है, की सेवा में पेंशन के प्रयोजनों के लिए दस वर्ष की अवधि जोड़ी जाएगी और उसे 1 अप्रैल, 2004 से जोड़ा हुआ समझा जाएगा ।]

15. ऐसे न्यायाधीशों की बाबत जो सेवा के सदस्य हैं, पेंशन के लिए विशेष उपबन्ध- [(1)] प्रत्येक न्यायाधीश को-

 ।                                             ।                                              ।                                              ।

(ख) 5*** संघ या राज्य के अधीन किसी अन्य  [पेंशन योग्य पदट पर रहा है, अपनी सेवानिवृत्ति पर, प्रथम अनुसूची के भाग 3 में दिए गए मापमान और उपबन्धों के अनुसार पेंशन दी जाएगी :

परन्तु ऐसे प्रत्येक न्यायाधीश को यह चयन करना होगा कि वह, 5*** प्रथम अनुसूची के भाग 1 के अधीन उसे संदेय पेंशन लेगा या प्रथम अनुसूची के 5*** भाग 3 के अधीन संदेय पेंशन लेगा, और तद्नुसार उसे संदेय पेंशन की संगणना की जाएगी ।

 [(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते भी, कोई न्यायाधीश जिसको वह उपधारा लागू होती है और जो 1974 के अक्तूबर के प्रथम दिन को या उसके पश्चात् सेवा में है, यदि उसने, प्रथम अनुसूची के 5*** भाग 3 के अधीन अपने को संदेय पेंशन लेने का चयन उस उपधारा के परन्तुक के अधीन उस तारीख के पूर्व जिसको उच्च न्यायालय न्यायाधीश (सेवा शर्त) संशोधन अधिनियम, 1976 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, कर लिया है तो, ऐसे चयन को रद्द कर सकता है और प्रथम अनुसूची के भाग 1 के अधीन अपने को संदेय पेंशन लेने का फिर से चयन कर सकता है और ऐसे किसी न्यायाधीश के बारे में, जिसकी मृत्यु ऐसी अनुमति की तारीख के पूर्व हो जाती है, यह समझा जाएगा कि उसने उक्त भाग 1 के उपबन्धों द्वारा शासित होने के लिए फिर से चयन उस दशा में किया है जिसमें उस भाग के उपबन्ध उसके लिए अधिक अनुकूल हैं ।]

16. पेंशन के लिए सेवा में अवधि जोड़ने की राष्ट्रपति की शक्ति-भारत का राष्ट्रपति विशेष कारणों से यह निदेश दे सकेगा कि तीन मास से अनधिक की कोई भी अवधि किसी न्यायाधीश की पेंशन के लिए सेवा में जोड़ दी जाएगी :

परन्तु प्रथम अनुसूची के भाग 1 या  *** भाग 3 के अधीन किसी अतिरिक्त पेंशन की संगणना करने में उक्त प्रकार से जोड़ी गई अवधि को निकाल दिया जाएगा ।

17. असाधारण पेंशन-केन्द्रीय सिविल सेवा वर्ग-1 के किसी ऐसे अधिकारी के सम्बन्ध में, जिसने 1937 की पहली अप्रैल को या उसके पश्चात् सेवा में प्रवेश किया है और जिसे हिंसा के परिणामस्वरूप क्षति पहुंचती है या जिसकी मृत्यु हो जाती है, असाधारण पेंशन और उपदान दिए जाने के सम्बन्ध में उस समय प्रवृत्त नियम, किसी न्यायाधीश के सम्बन्ध में, इस उपान्तरण के अधीन रहते हुए लागू होंगे कि उन नियमों में क्षति, उपदान और पेंशन की तालिकाओं के प्रति तथा कुटुम्ब उपदानों और पेंशनों के प्रति निर्देशों का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वे द्वितीय अनुसूची की तालिकाओं के प्रति निर्देश हैं ।

 [17क. कुटुम्ब पेंशन और उपदान- [ [(1)] जहां किसी ऐसे न्यायाधीश की जो उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश (सेवा शर्त) संशोधन अधिनियम, 1986 के प्रारम्भ पर या उसके पश्चात् सेवा में है, चाहे सेवानिवृत्ति के पूर्व या उसके पश्चात् ऐसी परिस्थितियों में, जिनको धारा 17 लागू नहीं होती है, मृत्यु हो जाती है वहां उसकी मृत्यु की तारीख को  [उसके वेतन के पचास  ***] की दर से संगणित कुटुम्ब पेंशन उसके हकदार व्यक्ति या व्यक्तियों को संदेय होगी और इस प्रकार संदेय रकम न्यायाधीश की मृत्यु की तारीख के अगले दिन से सात वर्ष की अवधि के लिए या उस तारीख तक की अवधि के लिए, जिसको, यदि वह न्यायाधीश जीवित रहता तो, उसने पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त की होती, इनमें से जो भी पूर्वतर हो,  [और उसके पश्चात्  [उसके वेतन के तीस प्रतिशतट की दर सेट संदत्त की जाएगी :

 [परंतु किसी भी दशा में, इस उपधारा के अधीन संगणित कुटुम्ब पेंशन की रकम इस अधिनियम के अधीन न्यायाधीश को संदेय पेंशन से अधिक नहीं होगी ।]

स्पष्टीकरण-इस उपधारा के अधीन कुटुम्ब पेंशन के हकदार व्यक्ति या व्यक्तियों का अवधारण करने के प्रयोजनों के लिए-

(i) किसी ऐसे न्यायाधीश के संबंध में, जो प्रथम अनुसूची के भाग 1 के अधीन पेंशन लेने का चयन करता है या पेंशन पाने का पात्र है, केन्द्रीय सिविल सेवा, समूह “क” के किसी अधिकारी के संबंध में कुटुम्ब पेंशन के हकदार व्यक्ति या व्यक्तियों की बाबत तत्समय प्रवृत्त नियम, अधिसूचनाएं और आदेश लागू होंगे ;

(ii) किसी ऐसे न्यायाधीश के संबंध में, जो प्रथम अनुसूची के  *** भाग 3 के अधीन पेंशन लेने का चयन करता है, कुटुम्ब पेशन के हकदार व्यक्ति या व्यक्तियों की बाबत, यदि वह न्यायाधीश नियुक्त न किया गया होता, तो उसकी सेवा के साधारण नियम लागू होंगे और न्यायाधीश के रूप में उसकी सेवा उसमें की गई सेवा मानी जाएगी ।]

(2) जहां कोई ऐसा न्यायाधीश, जिसने प्रथम अनुसूची के 4*** भाग 3 के अधीन उसे संदेय पेंशन लेने का चयन किया है, सेवानिवृत्त हो जाता है या  ऐसी परिस्थितियों में जिनको धारा 17 लागू नहीं होती है, उसकी मृत्यु हो जाती है वहां उसे उपदान, यदि कोई हो, उसकी सेवा के साधारण नियमों के अधीन, यदि वह न्यायाधीश नियुक्त न किया गया होता तो, उसके हकदार व्यक्ति या व्यक्तियों को संदेय होगा और न्यायाधीश के रूप में उसकी सेवा उस उपदान की संगणना करने के प्रयोजन के लिए उसमें की गई सेवा मानी जाएगी ।]

 (3) केन्द्रीय सिविल सेवा के प्रथम वर्ग के अधिकारी को या उसके सम्बन्ध में मृत्यु तथा निवृत्ति उपदान फायदा प्रदान किए जाने की बाबत ऐसे नियम, अधिसूचनाएं और आदेश, जो उस समय प्रवृत्त हैं (जिनके अन्तर्गत इस प्रयोजन के लिए पेंशन की कटौतियों से सम्बन्धित उपबंध भी हैं) ऐसे न्यायाधीश के सम्बन्ध में, जो 1974 के अक्तूबर के प्रथम दिन को या उसके पश्चात् सेवा में है और जो ऐसी परिस्थितियों में, जिनमें धारा 17 लागू नहीं होती है, सेवानिवृत्त हो जाता है या उसकी मृत्यु हो जाती, मृत्यु तथा निवृत्ति उपदान फायदा प्रदान किए जाने के लिए या उसके सम्बन्ध में निम्नलिखित उपांतरों के अधीन रहते हुए लागू होंगे, अर्थात् :-

(i) उपदान के लिए हकदार होने के प्रयोजन के लिए न्यूनतम अर्हक सेवा दो वर्ष छह मास होगी ;

(ii) उपदान की रकम की संगणना न्यायाधीश के रूप में  [प्रत्येक संपूरित छह मास की अवधि] की सेवा के लिए 5[दस दिन] के वेतन के आधार पर की जाएगी ;  ***

6।                                            ।                                              ।                                              ।                                              ।

स्पष्टीकरण- [उपधारा (3)] में “न्यायाधीश” पद का वही अर्थ है जो उसका धारा 14 में है ।

 [17ख. पेंशन या कुटुंब पेंशन की अतिरिक्त मात्रा-यथास्थिति, प्रत्येक सेवानिवृत्त न्यायाधीश या उसकी मृत्यु के पश्चात् कुटुम्ब निम्नलिखित मान के अनुसार पेंशन या कुटुम्ब पेंशन की अतिरिक्त मात्रा का हकदार होगा, अर्थात् :-

पेंशनभोगी या कुटुंब पेंशनभोगी की आयु

पेंशन या कुटुंब पेंशन की अतिरिक्त मात्रा

अस्सी वर्ष से लेकर पचासी वर्ष से कम

पचासी वर्ष से लेकर नब्बे वर्ष से कम

नब्बे वर्ष से लेकर पचानवे वर्ष से कम

पचानवे वर्ष से लेकर सौ वर्ष से कम

एक सौ वर्ष या उससे अधिक

 

 

मूल पेंशन या कुटुंब पेंशन का बीस प्रतिशत

मूल पेंशन या कुटुंब पेंशन का तीस प्रतिशत

मूल पेंशन या कुटुंब पेंशन का चालीस प्रतिशत 

मूल पेंशन या कुटुंब पेंशन का पचास प्रतिशत

मूल पेंशन या कुटुंब पेंशन का सौ प्रतिशत ।]

               

 ।                                             ।                                              ।                                              ।                                              ।

 

 ।                                             ।                                              ।                                              ।                                              ।

19. पेंशनों का संराशीकरण-उस समय प्रवृत्त सिविल पेंशन (संराशीकरण) नियम, आवश्यक उपान्तरों सहित, न्यायाधीशों को लागू होंगे ।

20. भविष्य-निधि-प्रत्येक न्यायाधीश साधारण भविष्य-निधि (केन्द्रीय सेवा) में अभिदाय करने का हकदार होगा :

परन्तु ऐसा न्यायाधीश  *** जिसने संघ या राज्य के अधीन कोई अन्य पेंशन योग्य सिविल पद धारण किया है, उस भविष्य निधि में अभिदाय करता रहेगा जिसमें वह न्यायाधीश के रूप में अपनी नियुक्ति के पूर्व अभिदाय करता था :

2।                                            ।                                              ।                                              ।                                              ।

 [20क. निक्षेप सहबद्ध बीमा स्कीम-साधारण भविष्य निधि (केन्द्रीय सेवा) नियम, 1960 के अधीन तत्समय प्रवृत्त निक्षेप सहबद्ध बीमा स्कीम प्रत्येक न्यायाधीश को, चाहे वह साधारण भविष्य निधि (केन्द्रीय सेवा) या धारा 20 में निर्दिष्ट किसी अन्य भविष्य निधि में अभिदाय करता हो, लागू होगी ।]

21. पेंशन मंजूर करने के लिए सक्षम प्राधिकारी-असाधारण पेंशनों और उपदानों को मंजूर किए जाने के संबंध में सुसंगत नियमों द्वारा जैसा अभिव्यक्त रूप से उपबन्धित किया जाए उस छोड़कर, इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन किसी न्यायाधीश को पेंशन मंजूर करने के लिए सक्षम प्राधिकारी भारत का राष्ट्रपति होगा ।

अध्याय 4

प्रकीर्ण

22. न्यायाधीश को दिए जाने वाले यात्रा भत्ते-प्रत्येक न्यायाधीश को, भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर कर्तव्य पर यात्रा करने में हुए व्ययों की प्रतिपूर्ति के लिए ऐसे उचित भत्ते मिलेंगे और उसे यात्रा के सम्बन्ध में ऐसी उचित सुविधाएं दी जाएंगी जो समय-समय पर विहित की जाएं ।

 [22क. किराया-मुक्त मकानों की सुविधा-(1) प्रत्येक न्यायाधीश किराए का संदाय किए बिना सरकारी निवास का उपयोग करने के लिए ऐसे नियमों के अनुसार हकदार होगा जो इस निमित्त समय-समय पर बनाए जाएं ।                                                                                                                                                                

(2) यदि कोई न्यायाधीश सरकारी निवास का उपयोग नहीं करता है, तो उसे प्रतिमास  [वेतन के तीस प्रतिशत  *** की रकम  के बराबर] का संदाय भत्ते के रूप में किया जा सकेगा ।

 [22ख. सवारी सुविधा-प्रत्येक न्यायाधीश स्टाफ कार और  [दो सौ लीटर प्रतिमास पैट्रोल या पैट्रोल की प्रतिमास वास्तविक खपत,] इनमें से जो भी कम हो, का हकदार होगा ।

 [22ग. सत्कार भत्ता-प्रत्येक उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति और प्रत्येक अन्य न्यायाधीश क्रमशः पंद्रह हजार रुपए प्रति मास और बारह हजार रुपए प्रति मास सत्कार भत्ता प्राप्त करने का हकदार होगा ।]

 [22घ. न्यायाधीश द्वारा प्राप्त कतिपय परिलब्धियों पर आय-कर के संदाय के दायित्व से छूट-आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) में किसी बात के होते हुए भी,-

(क) धारा 22क की उपधारा (1) के अधीन न्यायाधीश को दिए गए किराया मुक्त सरकारी निवास का मूल्य या उस धारा की उपधारा (2) के अधीन उसे संदत्त भत्ता ;

(ख) धारा 22ख के अधीन न्यायाधीश को दी गई सवारी सुविधाओं का मूल्य ;

(ग) धारा 22ग के अधीन न्यायाधीश को दिया गया सत्कार भत्ता ;

 [(घ) न्यायाधीश और उसके कुटुम्ब के सदस्यों को दी गई छुट्टी यात्रा रियायत का मूल्य,]

आय-कर अधिनियम, 1961 की धारा 15 के अधीन “वेतन” शीर्ष के अधीन प्रभार्य उसकी आय की संगणना करने में सम्मिलित नहीं किया जाएगा ।]

23. चिकित्सीय-उपचार के लिए सुविधाएं तथा सेवा की अन्य शर्तें-(1) प्रत्येक न्यायाधीश और उसके कुटुम्ब के सदस्य चिकित्सीय-उपचार के लिए तथा अस्पतालों में वाससुविधा प्राप्त करने के लिए ऐसी सुविधाओं के हकदार होंगे जो समय-समय पर विहित की जाएं ।

(2) उस न्यायाधीश की जिसके लिए इस अधिनियम में कोई अभिव्यक्त उपबन्ध नहीं किया गया है, सेवा की शर्तें वे होंगी जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा अवधारित की जाएं ।

(3) यह धारा 26 जनवरी, 1950 को प्रवृत्त हुई समझी जाएगी और इस धारा के अधीन कोई भी नियम इस प्रकार बनाया जा सकता है कि उसे किसी ऐसी तारीख से भूतलक्षी प्रभाव दिया जा सके जो इस धारा के प्रारंभ से पहले की न हो ।

 [23क. उच्च न्यायालयों के दीर्घावकाश-(1) प्रत्येक उच्च न्यायालय के लिए ऐसे दीर्घावकाश ऐसी अवधि या अवधियों के होंगे जो राष्ट्रपति राजपत्र में इस निमित्त अधिसूचित आदेश द्वारा, समय-समय पर नियत करे, और ऐसा प्रत्येक आदेश उच्च न्यायालय के दीर्घावकाश का विनियमन करने वाली किसी अन्य विधि, नियम या आदेश में दी गई किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

 ।                                             ।                                              ।                                              ।                                              ।

 [23ग. जम्मू-कश्मीर के उच्च न्यायालय से स्थानान्तरित न्यायाधीशों के बाबत विशेष उपबन्ध-() जम्मू-कश्मीर के उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश की, जिसे किसी उच्च न्यायालय को स्थानान्तरित किया गया है, पेंशन के लिए सेवा की संगणना करने में, जम्मू-कश्मीर के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप मे, जम्मू-कश्मीर के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पेंशन के लिए उसकी सेवा इस अधिनियम के अधीन पेंशन के लिए सेवा गिनी जाएगी ।

(2) जम्मू-कश्मीर के उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश की, जिसका स्थानान्तरण किसी अन्य उच्च-न्यायालय को किया गया है, जमा छुट्टी की अवधि की संगणना करने में, जम्मू-कश्मीर के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में उसे शोध्य छुट्टी की अवधि इस अधिनियम के अधीन उसके नाम में जमा छुट्टी की अवधि मे जोड़ दी जाएगी ।]

 [23घ. सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के लिए चिकित्सीय सुविधाएं-(1) प्रत्येक सेवानिवृत्त न्यायाधीश अपने लिए और अपने कुटुम्ब के लिए, उस तारीख से, जिसको उच्च न्यायालय न्यायाधीश (सेवा शर्तें) संशोधन अधिनियम, 1976 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, चिकित्सीय उपचार के सम्बन्ध में वैसी ही सुविधाओं और उन्हीं शर्तों पर हकदार होगा जिनके लिए और जिन पर केन्द्रीय सिविल सेवा के प्रथम वर्ग का सेवा निवृत्त अधिकारी और उसका कुटुम्ब उस समय प्रवृत्त केन्द्रीय सरकार के किन्हीं नियमों और आदेशों के अधीन हकदार हैं ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, किन्तु ऐसी शर्तों और निबन्धनों के अधीन रहते हुए जो केन्द्रीय सरकार अधिरोपित करे, किसी राज्य के उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश अपने लिए और अपने कुटुम्ब के लिए चिकित्सीय उपचार के लिए ऐसी सुविधाएं प्राप्त कर सकता है जो उस राज्य की सरकार उसे प्रदान करे ।]

24. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, इन नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं भी बातों के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा, अर्थात् :-

                (क) किसी न्यायाधीश की अनुपस्थिति छुट्टी ;

                 [(कक) आकस्मिक छुट्टियों की संख्या और वे शर्तें, जिनके अध्यधीन इन्हें धारा 3 की उपधारा (3) के अधीन अनुज्ञात किया जा सकेगा ;]

(ख) किसी न्यायाधीश को संदेय पेंशन ;

(ग) किसी न्यायाधीश को दिए जाने वाले यात्रा भत्ते ;

 [(गक) किसी न्यायाधीश द्वारा सरकारी निवास का धारा 22क की उपधारा (1) के अधीन उपयोग ;]

(घ) किसी न्यायाधीश के लिए चिकित्सीय उपचार की सुविधाएं और उसकी सेवा की अन्य शर्तें ;

(ङ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या विहित किया जाए ।

 [(3) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]

 ।                                             ।                                              ।                                              ।                                              ।

प्रथम अनुसूची

(धारा 14 और धारा 15 देखिए)

न्यायाधीशों की पेंशन

भाग 1

 [1. इस भाग के उपबंध ऐसे न्यायाधीश को, जो संघ या किसी राज्य के अधीन किसी अन्य पेंशन योग्य पद पर नहीं रहा है या ऐसे न्यायाधीश को, जिसने संघ या राज्य के अधीन किसी अन्य पेंशन योग्य पद पर रहते हुए इस भाग के अधीन संदेय पेंशन लेने का चयन किया है, लागू होंगे ।]

 [2. इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी न्यायाधीश को, जिसे यह भाग लागू होता है  *** संदेय पेंशन,-

(क) किसी उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधिपति के रूप में सेवा के लिए, सेवा के प्रत्येक संपूरित वर्ष के लिए  [तैंतालीस हजार आठ सौ नब्बे रुपए] प्रतिवर्ष होगी ;

(ख) किसी उच्च न्यायालय में किसी अन्य न्यायाधीश के रूप में सेवा के लिए सेवा के प्रत्येक संपूरित वर्ष के लिए 6[चौंतीस हजार तीन सौ पचास रुपए] प्रतिवर्ष होगी ;

परन्तु इस पैरा के अधीन पेंशन किसी भी दशा में, किसी मुख्य न्यायाधिपति की दशा में 6[पांच लाख चालीस हजार रुपए] प्रतिवर्ष और किसी अन्य न्यायाधीश की दशा में 6[चार लाख अस्सी हजार रुपए] प्रतिवर्ष से अधिक नहीं होगी ।]

3. ।                                         ।                                              ।                                              ।                                             

4. ।                                         ।                                              ।                                              ।

5. ।                                         ।                                              ।                                              ।

4[6. वह न्यायाधीश, जिसने किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति और अन्य न्यायाधीश, दोनों के रूप में, पेंशन के लिए सेवा की है, यह दावा कर सकेगा कि उसके द्वारा मुख्य न्यायाधिपति के रूप में में की गई एक संपूरित वर्ष से कम सेवा की कोई अवधि, या ऐसी किसी अवधि का कोई भाग, पैरा 2 के प्रयोजनों के लिए उसके द्वारा अन्य न्यायाधीश के रूप में की गई सेवा                 समझा जाए ।]

7. इस भाग के प्रयोजनों के लिए, किसी उच्च न्यायालय के कार्यकारी मुख्य न्यायाधिपति के रूप में अथवा उच्चतम न्यायालय के तदर्थ न्यायाधीश के रूप में की गई सेवा की बाबत यह समझा जाएगा कि वह किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति के रूप में की गई सेवा हो ।

।                                              ।                                              ।                                              ।                                              ।

।                                              ।                                              ।                                              ।                                              ।

।                                              ।                                              ।                                              ।                                              ।

।                                              ।                                              ।                                              ।                                              ।

 ।                                             ।                                              ।                                              ।                                              ।

भाग 3

1. इस भाग के उपबन्ध ऐसे न्यायाधीश को लागू होंगे, जो संघ या राज्य के अधीन किसी  [पेंशन योग्य पद] पर रहा है                (किन्तु भारतीय सिविल सेवा का सदस्य नहीं है) और जिसने भाग-1 के अधीन संदेय पेंशन लेने का चयन नहीं किया है ।

2. ऐसे न्यायाधीश को संदेय पेंशन-

(क) वह पेंशन होगी जिसके लिए वह, यदि वह न्यायाधीश के रूप में नियुक्त न किया गया होता तो, अपनी सेवा के साधारण नियमों के अधीन हकदार है और न्यायाधीश के रूप में उसकी सेवा उस पेंशन की संगणना करने के प्रयोजनों के लिए उसमें की गई सेवा समझी जाएगी ; और

(ख) पेंशन के लिए सेवा के प्रत्येक संपूरित वर्ष की बाबत  [सोलह हजार बीस रुपएट वार्षिक की विशेष अतिरिक्त पेंशन होगी,  ***

 [परन्तु खंड (क) के अधीन पेंशन और खंड (ख) के अधीन अतिरिक्त पेंशन, एक साथ मिलकर किसी भी दशा में, किसी मुख्य न्यायाधिपति की दशा में  [पांच लाख चालीस हजार रुपए] प्रति वर्ष और किसी अन्य न्यायाधीश की दशा में 4[चार लाख अस्सी हजार रुपए] प्रतिवर्ष से अधिक नहीं होगी ।]

3.।                                          ।                                              ।                                              ।                                              ।

4.।                                          ।                                              ।                                              ।                                              ।

 

द्वितीय अनुसूची

(धारा 17 देखिए)

क्षति उपदान और पेंशनें

 

 

अधिकारी

उपदान

वार्षिक पेंशन

 

 

 

 

रु०

उच्चतर मापमान

रु०

निम्नतर मापमान

रु०

1. मुख्य न्यायाधिपति

20,000

5,400

4,700

2. कोई अन्य न्यायाधीश

13,500

4,700

4,000

               

कुटुम्ब उपदान और पेंशनें

-विधवा

अधिकारी

उपदान

वार्षिक पेंशन

 

रु०

रु०

1. मुख्य न्यायाधिपति

15,000  

5,000

2. कोई अन्य न्यायाधीश

13,500

4,000

                               

-बच्चे

 

वार्षिक पेंशन

यदि मातृहीन हो तो

रु०

यदि मातृहीन न हो तो

रु०

1. मुख्य न्यायाधिपति

550

320

2. कोई अन्य न्यायाधीश

550

320

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