संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963
(1963 का अधिनियम संख्यांक 20)
[10 मई, 1963]
कतिपय संघ राज्यक्षेत्रों के लिए विधान सभाओं
और मंत्रि-परिषदों तथा कतिपय
अन्य मामलों के लिए
उपबन्ध करने हेतु
अधिनियम
भारत गणराज्य के चौदहवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
भाग 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 है ।
(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे :
[परन्तु यह मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र में उस तारीख1 को प्रवृत्त होगा, जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे । यह तारीख संघ राज्यक्षेत्र शासन (संशोधन) अधिनियम, 1971 (1971 का 83) के प्रारंभ की तारीख से पूर्वतर तारीख नहीं होगी:]
[परन्तु यह और कि यह अरुणाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र में उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे । यह तारीख संघ राज्यक्षेत्र शासन (संशोधन) अधिनियम 1975 (1975 का 29) के प्रारंभ की तारीख से पूर्वतर तारीख नहीं होगी:]
[परन्तु यह और भी कि पूर्ववर्ती परन्तुकों के अधीन रहते हुए] इस अधिनियम के विभिन्न उपबंधों के लिए तथा विभिन्न संघ राज्यक्षेत्रों के लिए विभिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और किसी ऐसे उपबंध में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा मानो वह उस उपबंध के प्रवृत्त होने के प्रति निर्देश है ।
2. परिभाषाएं तथा निर्वचन-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) प्रशासक" से [संघ राज्यक्षेत्र] के लिए राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 239 के अधीन नियुक्त प्रशासक अभिप्रेत है;
(ख) अनुच्छेद" से संविधान का अनुच्छेद अभिप्रेत है ;
(ग) सभा निर्वाचन-क्षेत्र" से 5[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा के निर्वाचनों के प्रयोजन के लिए इस अधिनियम के अधीन उपबंधित निर्वाचन-क्षेत्र अभिप्रेत है ;
(घ) निर्वाचन आयोग" से राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 324 के अधीन नियुक्त निर्वाचन आयोग अभिप्रेत है ;
(ङ) न्यायिक आयुक्त" के अन्तर्गत अतिरिक्त न्यायिक आयुक्त अभिप्रेत है ;
(च) अनुसूचित जातियों" से अभिप्रेत हैं, [संघ राज्यक्षेत्र] के सम्बन्ध में ऐसी जातियां, मूलवंश या जनजातियां अथवा ऐसी जातियों, मूलवंशों या जनजातियों के भाग या उनमें के यूथ, जो उस संघ राज्यक्षेत्र के सम्बन्ध में अनुच्छेद 341 के अधीन अनुसूचित जातियां समझी जाती हैं ;
(छ) अनुसूचित जनजातियों" से अभिप्रेत है, 1[संघ राज्यक्षेत्र] के सम्बन्ध में ऐसी जनजातियां या जनजाति समुदाय अथवा ऐसी जनजातियों या जनजाति समुदायों के भाग या उनमें के यूथ, जो उस संघ राज्यक्षेत्र के सम्बन्ध में अनुच्छेद 342 के अधीन अनुसूचित जनजातियां समझी जाती हैं ;
[(ज) संघ राज्यक्षेत्र" से [पुदुचेरी] संघ राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है ।]
(2) इस अधिनियम में संसद् द्वारा बनाई गई विधियों के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अन्तर्गत अनुच्छेद 123 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित अध्यादेश के प्रति निर्देश तथा अनुच्छेद 240 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा बनाए गए विनियमों के प्रति निर्देश भी हैं ।
भाग 2
विधान सभाएं
3. संघ राज्यक्षेत्रों के लिए विधान सभाएं तथा उनकी संरचना-(1) प्रत्येक संघ राज्यक्षेत्र के लिए एक विधान सभा होगी ।
[(2) 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा में ऐसे स्थानों की कुल संख्या, जो प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने गए व्यक्तियों से भरे जाएंगे, तीस होगी ।]
(3) केन्द्रीय सरकार तीन से अनधिक ऐसे व्यक्तियों को, जो सरकार की सेवा में नहीं हैं, 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा के सदस्यों के रूप में नामनिर्देशित कर सकेगी ।
[(4) संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा में अनुसूचित जातियों के लिए स्थान आरक्षित किए जाएंगे ।]
(5) उपधारा (4) के अधीन 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा में अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या का अनुपात उस विधान सभा में स्थानों की समस्त संख्या से यथाशक्य वही होगा, जो, यथास्थिति, उस संघ राज्यक्षेत्र की अनुसूचित जातियों की अथवा उस संघ राज्यक्षेत्र की अनुसूचित जनजातियों की, जिनके सम्बन्ध में स्थान इस प्रकार आरक्षित हैं, जनसंख्या का अनुपात उस संघ राज्यक्षेत्र की कुल जनसंख्या से है ।
[स्पष्टीकरण-इस उपधारा में, जनसंख्या" पद से ऐसी अंतिम पूर्वगामी जनगणना में, जिसके तत्संबंधी आंकडे़ प्रकाशित हो चुके हैं, अभिनिश्चित की गई जनसंख्या अभिप्रेत है :
परन्तु इस स्पष्टीकरण में ऐसी अंतिम पूर्वगामी जनगणना के, जिसके तत्संबंधी आंकडे़ प्रकाशित हो चुके हैं, प्रति निर्देश का अर्थ तब तक जब तक सन् [2026] के पश्चात् की गई पहली जनगणना के तत्संबंधी आंकडे़ प्रकाशित नहीं हो जाते हैं, यह लगाया जाएगा कि वह सन् 6[2001] की जनगणना के प्रति निर्देश है ।]
[(6) उपधारा (4) में किसी बात के होते हुए भी, संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा में अनुसूचित जातियों के लिए स्थानों का आरक्षण उस तारीख से समाप्त हो जाएगा, जिसको अनुच्छेद 334 के अधीन लोक सभा में अनुसूचित जातियों के लिए स्थानों का आरक्षण समाप्त होगा :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात, संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा में किसी प्रतिनिधित्व पर तत्समय विद्यमान सभा के विघटन तक कोई प्रभाव नहीं डालेगी ।]
4. विधान सभा की सदस्यता के लिए अर्हताएं-कोई व्यक्ति 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा के किसी स्थान को भरने के लिए चुने जाने के लिए अर्हित तभी होगा, जब-
(क) वह भारत का नागरिक हो और निर्वाचन आयोग द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष, पहली अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्ररूप के अनुसार शपथ ले या प्रतिज्ञान करे और उस पर हस्ताक्षर करे;
(ख) कम से कम पच्चीस वर्ष की आयु का हो ; और
(ग) उसके पास ऐसी अन्य अर्हताएं हों जो इस निमित्त किसी विधि द्वारा या उसके अधीन विहित की जाएं ।
5. विधान सभाओं की अवधि- [संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा यदि पहले ही विघटित नहीं कर दी जाती है, तो अपने प्रथम अधिवेशन के लिए नियत तारीख से पांच वर्ष तक चालू रहेगी, इससे अधिक नहीं और पांच वर्ष की उक्त अवधि की समाप्ति का परिणाम उस सभा का विधटन होगा :
परन्तु उक्त अवधि को, जब अनुच्छेद 352 के खण्ड (1) के अधीन जारी की गई आपात की उद्घोषणा प्रवर्तन में है, राष्ट्रपति आदेश द्वारा किसी ऐसी अवधि के लिए बढ़ा सकेगा, जो एक बार में एक वर्ष से अधिक की नहीं होगी और उद्घोषण के प्रवृत्त न रह जाने के पश्चात् किसी भी दशा में उसका विस्तार छह मास की अवधि से अधिक नहीं होगा ।
6. विधान सभा के सत्र, सत्रावसान तथा विघटन-(1) प्रशासक समय-समय पर विधान सभा को ऐसे समय और स्थान पर, जो वह ठीक समझे, अधिवेशन के लिए आहूत करेगा, किन्तु उसके एक सत्र की अंतिम बैठक और आगामी सत्र की प्रथम बैठक के लिए नियत तारीख के बीच छह मास का अन्तर नहीं होगा ।
(2) प्रशासक समय-समय पर,-
(क) सभा का सत्रावसान कर सकेगा ;
(ख) सभा का विघटन कर सकेगा ।
7. विधान सभा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष-(1) प्रत्येक विधान सभा यथाशीघ्र अपने दो सदस्यों को अपना अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनेगी और जब-जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष का पद रिक्त होता है, तब-तब विधान सभा किसी अन्य सदस्य को, यथास्थिति, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष चुनेगी ।
(2) सभा के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के रूप में पद धारण करने वाला सदस्य-
(क) यदि विधान सभा का सदस्य नहीं रहता, तो अपना पद रिक्त कर देगा ;
(ख) किसी भी समय, यदि वह सदस्य अध्यक्ष है, तो उपाध्यक्ष को सम्बोधित और यदि वह सदस्य उपाध्यक्ष है, तो अध्यक्ष को सम्बोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा, अपना पद त्याग सकेगा ।
(ग) विधान सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा अपने पद से हटाया जा सकेगा :
परन्तु खण्ड (ग) के प्रयोजन के लिए कोई संकल्प तब तक प्रस्तावित नहीं किया जाएगा जब तक कि उस संकल्प को प्रस्तावित करने के आशय की कम से कम चौदह दिन की सूचना न दे दी गई हो :
परन्तु यह और कि जब कभी विधान सभा का विघटन किया जाता है, तो विघटन के पश्चात् होने वाले विधान सभा के प्रथम अधिवेशन के ठीक पहले तक अध्यक्ष अपने पद को रिक्त नहीं करेगा ।
(3) जब अध्यक्ष का पद रिक्त है तब उपाध्यक्ष, अथवा यदि उपाध्यक्ष का पद भी रिक्त है, तो विधान सभा का ऐसा सदस्य, जिसे विधान सभा की प्रक्रिया के नियमों द्वारा अवधारित किया जाए, उस पद के कर्तव्यों का पालन करेगा ।
(4) विधान सभा की किसी बैठक से अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष या यदि वह भी अनुपस्थित है तो ऐसा व्यक्ति, जो विधान सभा की प्रक्रिया के नियमों द्वारा अवधारित किया जाता है या, यदि ऐसा कोई व्यक्ति उपस्थित नहीं हो तो, ऐसा अन्य व्यक्ति जो विधान सभा द्वारा अवधारित किया जाता है, अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा ।
(5) विधान सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को ऐसे वेतन और भत्तों का जो संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा विधि द्वारा नियत करे और जब तक इस निमित्त इस प्रकार उपबन्ध नहीं किया जाता है तब तक ऐसे वेतन और भत्तों का उपबन्ध किया जाएगा जो प्रशासक राष्ट्रपति के अनुमोदन से आदेश द्वारा अवधारित करे ।
8. जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना-(1) विधान सभा की किसी बैठक में, जब अध्यक्ष को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब अध्यक्ष या जब उपाध्यक्ष को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उपाध्यक्ष, उपस्थित रहने पर भी पीठासीन नहीं होगा और धारा 7 की उपधारा (4) के उपबन्ध ऐसी प्रत्येक बैठक के सम्बन्ध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे उस बैठक के संबंध में लागू होते हैं जिससे, यथास्थिति, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष अनुपस्थित है ।
(2) जब अध्यक्ष को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विधान सभा में विचाराधीन हो तब उसको विधान सभा में बोलने और उसकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग लेने का अधिकार होगा और वह धारा 12 में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे संकल्प पर या ऐसी कार्यवाहियों के दौरान किसी अन्य विषय पर प्रथमतः ही मत देने का हकदार होगा किन्तु मत बराबर होने की दशा में मत देने का हकदार नहीं होगा ।
9. विधान सभा में अभिभाषण का और संदेश भेजने का प्रशासक का अधिकार-(1) प्रशासक विधान सभा में अभिभाषण कर सकेगा और इस प्रयोजन के लिए सदस्यों की उपस्थित की अपेक्षा कर सकेगा ।
(2) प्रशासक विधान सभा में उस समय लंबित किसी विधेयक के संबंध में संदेश या अन्यथा संदेश विधान सभा को भेज सकेगा और जब विधान सभा को कोई संदेश इस प्रकार भेजा गया है तो वह विधान सभा उस संदेश द्वारा विचार करने के लिए अपेक्षित विषय पर सुविधानुसार शीघ्रता से विचार करेगी ।
10. विधान सभा के बारे में मंत्रियों के अधिकार-प्रत्येक मंत्री को यह अधिकार होगा कि वह संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा में बोले और उसकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग ले और विधान सभा की किसी और समिति में, जिसमें उसका नाम सदस्य के रूप में दिया गया है, बोले और उसकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग ले किन्तु इस धारा के आधार पर वह मत देने का हकदार नहीं होगा ।
11. सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान- [संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा का प्रत्येक सदस्य अपना स्थान ग्रहण करने से पहले प्रशासक या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त व्यक्ति के समक्ष पहली अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्ररूप के अनुसार शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर हस्ताक्षर करेगा ।
12. विधान सभा में मतदान, रिक्तियों के होते हुए भी विधान सभा की कार्य करने की शक्ति तथा गणपूर्ति-(1) इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा की किसी बैठक में सभी प्रश्नों का अवधारण, अध्यक्ष या उसके रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति को छोड़कर, उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के बहुमत से किया जाएगा ।
(2) अध्यक्ष या उसके रूप में कार्य करने वाला व्यक्ति, प्रथमतः मत नहीं देगा किन्तु मत बराबर होने की दशा में उसका निर्णायक मत होगा और वह उसका प्रयोग करेगा ।
(3) 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा की सदस्यता में कोई रिक्ति होने पर भी उस सभा को कार्य करने की शक्ति होगी और यदि बाद में यह पता चलता है कि कोई व्यक्ति, जो ऐसा करने का हकदार नहीं था कार्यवाहियों में उपस्थित रहा है या उसने मत दिया है या अन्यथा भाग लिया तो भी संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा की कार्यवाही विधिमान्य होगी ।
(4) 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा का अधिवेशन गठित करने के लिए गणपूर्ति सभा के सदस्यों की कुल संख्या की एक-तिहाई होगी ।
(5) यदि 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा के अधिवेशन में किसी समय गणपूर्ति नहीं है तो, अध्यक्ष या उस रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति का कर्तव्य होगा कि वह विधान सभा को स्थगित कर दे या अधिवेशन को तब तक के लिए निलंबित कर दे जब तक कि गणपूर्ति नहीं हो जाती है ।
13. स्थानों का रिक्त होना-(1) कोई व्यक्ति संसद् और 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा दोनों का सदस्य नहीं होगा और यदि कोई व्यक्ति संसद् और ऐसी विधान सभा, दोनों का सदस्य चुन लिया जाता है तो ऐसी अवधि की समाप्ति के पश्चात् जो राष्ट्रपति द्वारा बनाए गए नियमों में विनिर्दिष्ट की जाए, संसद् में ऐसे व्यक्ति का स्थान रिक्त हो जाएगा यदि उसने संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के अपने स्थान को पहले ही नहीं त्याग दिया है ।
(2) यदि 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा का सदस्य-
(क) विधान सभा की सदस्यता के लिए [धारा 14 या धारा 14क] में वर्णित किसी निरर्हता से ग्रस्त हो जाता है, या
(ख) अध्यक्ष को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपने स्थान का त्याग कर देता है,
तो ऐसा होने पर उसका स्थान रिक्त हो जाएगा ।
(3) यदि 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा का सदस्य साठ दिन की अवधि तक विधान सभा की अनुज्ञा के बिना उसके सभी अधिवेशनों से अनुपस्थित रहता है तो विधान सभा उसके स्थान को रिक्त घोषित कर सकेगी :
परन्तु साठ दिन की उक्त अवधि की संगणना करने में किसी ऐसी अवधि को हिसाब में नहीं लिया जाएगा जिसके दौरान विधान सभा सत्रावसित या निरंतर चार से अधिक दिनों के लिए स्थगित रहती है ।
14. सदस्यता के लिए निरर्हताएं-(1) कोई व्यक्ति 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा का सदस्य चुने जाने के लिए और सदस्य होने के लिए निरर्हित होगा-
(क) यदि वह भारत सरकार के या किसी राज्य की सरकार के या 1[संघ राज्यक्षेत्र] की सरकार के अधीन ऐसे पद को छोड़कर जिसे धारण करने वाले का निरर्हित न होना संसद् ने या 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा ने विधि द्वारा घोषित किया है कोई लाभ का पद धारण करता है ; अथवा
(ख) यदि वह अनुच्छेद 102 के खण्ड (1) के उपखण्ड (ख), उपखण्ड (ग) या उपखण्ड (घ) के उपबंधों के अधीन या उस अनुच्छेद के अनुसरण में बनाई गई किसी विधि के अधीन संसद् के दोनों सदनों में से किसी के सदस्य के रूप में चुने जाने के लिए और सदस्य होने के लिए तत्समय निरर्हित है ।
(2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए कोई व्यक्ति केवल इसलिए भारत सरकार के या किसी राज्य की सरकार के या [संघ राज्यक्षेत्र] की सरकार के अधीन लाभ का पद धारण करने वाला नहीं समझा जाएगा कि वह संघ का या ऐसे राज्य का या संघ राज्यक्षेत्र का मंत्री है ।
(3) यदि कोई प्रश्न उठता है कि 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा का कोई सदस्य ऐसा होने के लिए उपधारा (1) के अधीन निरर्हित हो गया है या नहीं तो वह प्रश्न राष्ट्रपति को विनिश्चय के लिए निर्दिष्ट किया जाएगा और उसका विनिश्चय अंतिम होगा ।
(4) ऐसे किसी प्रश्न पर विनिश्चय करने से पूर्व राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग की राय लेगा तथा ऐसी राय के अनुसार कार्य करेगा ।
[14. सदस्य होने के लिए दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता-संविधान की दसवीं अनुसूची के उपबन्घ आवश्यक उपांतरणों के अधीन रहते हुए (जिनके अन्तर्गत उसमें किसी राज्य की विधान सभा, अनुच्छेद 188, अनुच्छेद 194 और अनुच्छेद 212 के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाने के लिए उपांतरण भी है कि वह क्रमशः 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा, इस अधिनियम की धारा 11, धारा 16 और धारा 37 के प्रति निर्देश हैं) 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा के सदस्यों को और उनके संबंध में उसी प्रकार लागू होंगे जैसे वे किसी राज्य की विधान सभा के सदस्यों को और उनके संबंध में लागू होते हैं और तद्नुसार-
(क) इस प्रकार उपांतरित उक्त दसवीं अनुसूची को इस अधिनियम का भाग समझा जाएगा; और
(ख) कोई व्यक्ति 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा का सदस्य होने के लिए निरर्हित होगा यदि वह इस प्रकार उपांतरित उक्त दसवीं अनुसूची के अधीन इस प्रकार निरर्हित हो जाता है ।]
15. शपथ या प्रतिज्ञान करने से पूर्वया अर्हित न होते हुए या निरर्हित किए जाने पर उपस्थित रहने और मत देने के लिए शास्ति-यदि 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा में कोई व्यक्ति धारा 11 की अपेक्षाओं का अनुपालन करने से पूर्व या यह जानते हुए कि वह उसकी सदस्यता के लिए अर्हित नहीं है या निरर्हित कर दिया गया है सदस्य के रूप में उपस्थित रहता है या मत देता है, तो वह प्रत्येक दिन के लिए, जब वह इस प्रकार उपस्थित रहता है या मत देता है, पांच सौ रुपए की शास्ति का भागी होगा जो संघ को देय ऋण के रूप में वसूल की जाएगी ।
16. सदस्यों की शक्तियां, विशेषाधिकार आदि-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के और विधान सभा की प्रक्रिया के विनियमन करने वाले नियमों और स्थायी आदेशों के अधीन रहते हुए प्रत्येक 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा में वाक् स्वातंत्र्य होगा ।
(2) विधान सभा में या उसकी किसी समिति में 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा के किसी सदस्य द्वारा कही गई किसी बात या दिए हुए किसी मत के विषय में उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी और कोई व्यक्ति ऐसी सभा के प्राधिकार द्वारा या उसके अधीन किसी रिपोर्ट, पत्र, मतों या कार्यवाहियों के प्रकाशन के संबंध में इस प्रकार दायी नहीं होगा ।
(3) अन्य बातों में, 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा की और उसके सदस्यों और समितियों की शक्तियां, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां ऐसी होंगी, जो तत्समय लोक सभा तथा उसके सदस्यों और समितियों की थी ।
(4) जिन व्यक्तियों को इस अधिनियम के आधार पर 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा में या उसकी किसी समिति के बोलने का और उसकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग लेने का अधिकार है, उनके सम्बन्ध में उपधारा (1), (2) और (3) के उपबन्ध उसी प्रकार लागू होंगे जिस प्रकार वे विधान सभा के सदस्यों के संबंध में लागू होते हैं ।
17. सदस्यों के वेतन और भत्ते-संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के सदस्य, ऐसे वेतन और भत्ते जो, 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा समय-समय पर विधि द्वारा अवधारित करे और जब तक इस संबंध में इस प्रकार उपबंध नहीं किया जाता है तब तक ऐसे वेतन और भत्ते, जो प्रशासक राष्ट्रपति के अनुमोदन से आदेश द्वारा अवधारित करे, प्राप्त करने के हकदार होंगे ।
18. विधायी शक्ति का विस्तार-(1) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा संपूर्ण संघ राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य-सूची या समवर्ती-सूची में प्रगणित किसी भी विषय के संबंध में, जहां तक ऐसा कोई विषय संघ राज्यक्षेत्र के सम्बन्ध में लागू है, विधियां बना सकेगी ।
(2) उपधारा (1) की कोई भी बात 1[संघ राज्यक्षेत्र] या उसके किसी भाग के लिए किसी विषय के संबंध में विधि बनाने की संविधान द्वारा संसद् को प्रदत्त शक्ति को कम नहीं करेगी ।
19. संघ की सम्पत्ति को करों से छूट-वहां तक के सिवाय जहां तक संसद् विधि द्वारा अन्यथा उपबंध करे 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा द्वारा बनाई गई विधि द्वारा या उसके अधीन या 1[संघ राज्यक्षेत्र] में प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा या उसके अधीन अधिरोपित सभी करों से संघ की संपत्ति को छूट होगी:
परन्तु जब तक संसद् विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे तब तक इस धारा की कोई भी बात [संघ राज्यक्षेत्र] के भीतर किसी प्राधिकारी को संघ की किसी संपत्ति पर कोई ऐसा कर, जिसका दायित्व इस संविधान के प्रारम्भ के ठीक पहले ऐसी संपत्ति पर था या माना जाता था, उद्गृहीत करने से तब तक नहीं रोकोगी जब तक कि वह कर उस संघ राज्यक्षेत्र में उद्गृहीत होता रहता है ।
20. कतिपय विषयों के बारे में विधान सभा द्वारा पारित विधियों पर निर्बन्धन- [(1)] अनुच्छेद 286, अनुच्छेद 287 और अनुच्छेद 288 के उपबंध उन अनुच्छेदों में निर्दिष्ट किसी भी विषय की बाबत 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा द्वारा पारित किसी विधि के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे उन विषयों की बाबत किसी राज्य के विधान-मंडलों द्वारा पारित किसी विधि के संबंध में लागू होते हैं ।
[(2) अनुच्छेद 304 के उपबन्ध आवश्यक उपांतरणों सहित, उस अनुच्छेद में निर्दिष्ट किसी भी विषय के संबंध में 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा द्वारा पारित किसी विधि के संबंध में वैसे ही लागू होंगे, जैसे वे उन विषयों की बाबत किसी राज्य विधान-मंडल द्वारा पारित किसी विधि के संबंध में लागू होते हैं ।]
[21. संसद् द्वारा बनाई गई विधियों और विधान सभा द्वारा बनाई गई विधियों में असंगति-यदि 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा द्वारा संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य अनुसूची में प्रगणित किसी विषय की बाबत में बनाई गई विधि का कोई उपबंध संसद् द्वारा उस विषय की बाबत में बनाई गई विधि के, चाहे वह संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा द्वारा बनाई गई विधि के पहले या उसके पश्चात् पारित की गई हो, किसी उपबंध के विरुद्ध है, या यदि 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा द्वारा, संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची में प्रगणित किसी विषय की बाबत में बनाई गई विधि का कोई उपबंध, उस विषय की बाबत में किसी ऐसी पूर्वतर विधि के, जो उस संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा द्वारा बनाई गई विधि से भिन्न है, किसी उपबंध के विरुद्ध है तो दोनों में से प्रत्येक दशा में, यथास्थिति, संसद् द्वारा बनाई गई विधि या ऐसी पूर्वतर विधि अभिभावी होगी और संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा द्वारा बनाई गई विधि, उस विरोध की मात्रा तक शून्य होगी :
परन्तु यदि संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा द्वारा बनाई गई ऐसी विधि राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखी गई है और उस पर उसकी अनुमति मिल चुकी है तो ऐसी विधि उस संघ राज्यक्षेत्र में अभिभावी होगी :
परन्तु यह और कि उस धारा की कोई बात संसद् को उसी विषय के संबंध में कोई विधि, जिसके अन्तर्गत ऐसी विधि है, जो संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा द्वारा इस प्रकार बनाई गई विधि का परिवर्धन, संशोधन, परिवर्तन या निरसन करती है, किसी भी समय अधिनियमित करने से निवारित नहीं करेगी ।]
22. कतिपय विधायी प्रस्तावों के लिए प्रशासक की मंजूरी की आवश्यकता-कोई भी विधियेक या संशोधन 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा में, प्रशासक की पूर्व मंजूरी से ही पुरःस्थापित या प्रस्तावित किया जाएगा अन्यथा नहीं, यदि ऐसा विधेयक या संशोधन निम्नलिखित विषयों में से किसी के बारे में उपबंध करता है, अर्थात्: -
(क) न्यायिक आयुक्त के न्यायालय का गठन और संगठन;
(ख) संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य-सूची या समवर्ती-सूची के किसी भी विषय की बाबत न्यायिक आयुक्त के न्यायालय की अधिकारिता तथा शक्तियां ।
23. वित्त विधेयकों के बारे में विशेष उपबन्ध-(1) 2[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा में कोई विधेयक या संशोधन, यदि ऐसा विधेयक या संशोधन निम्नलिखित विषयों में से किसी के लिए उपबंध करता है, प्रशासक की सिफारिश से ही पुरःस्थापित या प्रस्तावित किया जाएगा अन्यथा नहीं, अर्थात्: -
(क) किसी कर का अधिरोपण, उत्साहन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन,
(ख) संघ राज्यक्षेत्र की सरकार द्वारा अपने ऊपर ली गई या ली जाने वाली किन्हीं वित्तीय बाध्यताओं से संबंधित विधि का संशोधन,
(ग) संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि से धन का विनियोग,
(घ) किसी व्यय को संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि पर भारित व्यय घोषित करना या ऐसे किसी व्यय की रकम को बढ़ाना,
[(ङ) संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि या संघ राज्यक्षेत्र के लोक लेखा मद्धे धन की प्राप्ति अथवा ऐसे धन की अभिरक्षा या उसका निकाला जाना या संघ राज्यक्षेत्र के लेखाओं की लेखा-परीक्षा]:
परन्तु किसी कर को कम करने या उत्सांदित करने के लिए उपबन्ध करने वाले किसी संशोधन को प्रस्तावित करने के लिए इस धारा के अधीन किसी सिफारिश की आवश्यकता नहीं होगी ।
(2) कोई विधेयक या संशोधन केवल इसी लिए कि वह जुर्मानों या अन्य धन संबंधी शास्तियों के अधिरोपण का अथवा अनुज्ञप्तियों के लिए फीसों की या की हुई सेवाओं के लिए फीसों की मांगों या उनके संदाय का उपबंध करता है अथवा इसी लिए कि वह किसी स्थानीय प्राधिकारी या निकाय द्वारा स्थानीय प्रयोजनों के लिए किसी कर के अधिरोपण, उत्सादन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन का उपबन्ध करता है, उपर्युक्त विषयों में से किसी के लिए उपबन्ध करने वाला नहीं समझा जाएगा ।
(3) जिस विधेयक को अधिनियमित या प्रवर्तित किए जाने पर संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि से व्यय करना पडे़गा वह विधेयक उस संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा द्वारा तब तक पारित नहीं किया जाएगा जब तक उस विधेयक पर विचार करने के लिए उस सभा से प्रशासक ने सिफारिश नहीं की है ।
24. व्यपगत विधेयकों के बारे में प्रक्रिया-(1) [संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा में लंबित विधेयक उस सभा के सत्रावसान के कारण व्यपगत नहीं होगा
(2) कोई विधेयक, जो 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा में लंबित है, उस सभा के विघटन पर व्यपगत हो जाएगा ।
[25. विधेयकों पर अनुमति-जब कोई विधेयक 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा द्वारा पारित कर दिया गया हो तब वह प्रशासक के समक्ष उपस्थित किया जाएगा और प्रशासक घोषित करेगा कि वह विधेयक पर अपनी अनुमति देता है या अनुमति रोक लेता है अथवा वह विधेयक को राष्ट्रपति के विचारों के लिए आरक्षित रखता है:
परन्तु प्रशासक, अनुमति के लिए अपने समक्ष विधेयक उपस्थित किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र उस विधेयक को, यदि वह धन विधेयक नहीं है, तो विधान सभा को इस संदेश के साथ लौटा सकेगा कि विधान सभा उस विधेयक पर या उसकेकिन्हीं विनिर्दिष्ट उपबन्धों पर पुनर्विचार करे और विशिष्टतया किन्हीं ऐसे संशोधनोंकेपुरःस्थापन की वांछनीयता पर विचार करे, जिनकी उसने अपने संदेश में सिफारिश की है, और जब विधेयक इस प्रकार लौटा दिया जाता है तब विधान सभा विधेयक पर तद्नुसार पुनर्विचार करेगी और यदि विधेयक, संशोधन सहित या उसके बिना फिर से पारित कर दिया जाता है और प्रशासक के समक्ष अनुमति के लिए उपस्थित किया जाता है तो प्रशासक घोषित करेगा कि वह विधेयक पर अपनी अनुमति देता है या विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखता है :
परन्तु यह और कि प्रशासक ऐसे किसी विधेयक पर अनुमति नहीं देगा अपितु उसे राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखेगा, -
(क) जिसके विधि बन जाने पर प्रशासक की राय में, उच्च न्यायालय की शक्तियों का ऐसा अल्पीकरण होगा कि वह स्थान, जिसकी पूर्ति के लिए वह न्यायालय इस संविधान द्वारा बनाया गया है, संकटापन्न हो जाएगा, या
(ख) जो अनुच्छेद 31क के खण्ड (1) में विनिर्दिष्ट विषयों में से किसी के संबंध में है, या
(ग) जिसे राष्ट्रपति आदेश द्वारा, अपने विचार के लिए आरक्षित रखने का निदेश दे, या
(घ) जो धारा 7 की उपधारा (5) या धारा 17 या धारा 34 या धारा 45 की उपधारा (6) में या संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 1 में या प्रविष्टि 2 में निर्दिष्ट विषयों के सम्बन्ध में है:
परन्तु यह और भी कि द्वितीय परन्तुक के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्रशासक ऐसे किसी विधेयक पर, जो मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा द्वारा पारित हो चुका है और जो संविधान की छठी अनुसूची के अधीन उस संघ राज्यक्षेत्र के किसी स्वायत्तशासी जिले में सम्मिलित किसी क्षेत्र के संबंध में है, अनुमति नहीं देगा अपितु उसे राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखेगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा तथा धारा 25क के प्रयोजनों के लिए कोई विधेयक धन विधेयक समझा जाएगा, यदि उसमें केवल धारा 23 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट विषयों में से सबसे या किसी से अथवा उन विषयों में से किसी के आनुषंगिक किसी विषय से संबंध रखने वाले उपबन्ध ही अंतर्विष्ट हैं और, प्रत्येक दशा में, उस पर विधान सभा के अध्यक्ष के हस्ताक्ष्ज्ञर सहित यह प्रमाणपत्र है कि वह विधेयक धन विधयेक है ।
25क. विचार के लिए आरक्षित विधेयक-जब कोई विधेयक प्रशासक द्वारा राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रख लिया जाता है तब राष्ट्रपति यह घोषित करेगा कि वह विधेयक पर अनुमति देता है या अनुमति रोक लेता है:
परन्तु जहां विधेयक धन विधेयक नहीं है, वहां राष्ट्रपति प्रशासक को यह निदेशक दे सकेगा कि वह विधेयक को ऐसे संदेश के साथ, जो धारा 25 के प्रथम परन्तुक में वर्णित है लौटा दे और जब कोई विधेयक इस प्रकार लौटा दिया जाता है तब ऐसा संदेश मिलने की तारीख से छह मास की अवधि के भीतर विधान सभा द्वारा उस पर तद्नुसार पुनःविचार किया जाएगा और यदि वह विधान सभा द्वारा संशोधन सहित या उसके बिना फिर से पारित कर दिया जाता है तो उसे राष्ट्रपति के समक्ष उसके विचार के लिए फिर से उपस्थित किया जाएगा ।]
26. मंजूरी और सिफारिशों के बारे में अपेक्षाओं को केवल प्रक्रिया का विषय मानना-यदि [संघ राज्यक्षेत्र] के विधान सभा के किसी अधिनियम को [प्रशासक ने या राष्ट्रपति के विचारण के लिए प्रशासक द्वारा आरक्षित रख लिए जाने पर राष्ट्रपति ने] अनुमति दे दी है तो ऐसा अधिनियम और ऐसे किसी अधिनियम का कोई उपबन्ध केवल इसी लिए अविधिमान्य नहीं होगा कि इस अधिनियम द्वारा अपेक्षित कोई पूर्व मंजूरी नहीं दी गई थी या सिफारिश नहीं की गई थी ।
27. वार्षिक वित्तीय विवतरण-(1) प्रत्येक संघ राज्यक्षेत्र का प्रशासक, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के संबंध में, प्रत्येक संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के समक्ष, राष्ट्रपति के पूर्वानुमोदन से, उस संघ राज्यक्षेत्र की उस वर्ष के लिए प्राक्कलित प्राप्तियों और व्ययों का विवरण रखवाएगा जिसे इस भाग में वार्षिक वित्तीय विवरण" कहा गया है ।
(2) वार्षिक वित्तीय विवरण में दिए हुए व्यय के प्राक्कलनों में-
(क) इस अधिनियम में संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि पर भारित व्यय के रूप में वर्णित व्यय की पूर्ति के लिए अपेक्षित राशियां, तथा
(ख) संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि में से किए जाने के लिए प्रस्थापित अन्य व्यय की पूर्ति के लिए अपेक्षित राशियां,
पृथक्-पृथक् दिखाई जाएंगी, और राजस्व लेखे पर होने वाले व्यय का अन्य व्यय से भेद किया जाएगा ।
(3) निम्नलिखित व्यय प्रत्येक संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि पर भारित व्यय होगा, अर्थात्: -
(क) प्रशासक की उपलब्धियां और भत्ते तथा उसके पद से संबंधित अन्य व्यय जिसे राष्ट्रपति साधारण या विशेष आदेश द्वारा अवधारित करे;
(ख) भारत की संचित निधि से संघ राज्यक्षेत्र को दिए गए उधारों की बाबत संदेय भारत, जिनमें ब्याज निक्षेप-निधि-भार और मोचन भार तथा उससे संबंधित अन्य व्यय भी है;
(ग) विधान सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के वेतन और भत्ते;
(घ) न्यायिक आयुक्त के वेतन और भत्तों से संबंधित व्यय;
(ङ) किसी न्यायालय या माध्यस्थम् अधिकरण के निर्णय, डिक्री या पंचाट के भुगतान के लिए अपेक्षित कोई राशियां;
(च) प्रशासक द्वारा अपने विशेष उत्तरदायित्व के निर्वहन में उपगत व्यय;
(छ) कोई अन्य व्यय जो संविधान द्वारा या संसद् या संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा द्वारा बनाई गई विधि द्वारा इस प्रकार भारित घोषित किया जाए ।
28. विधान सभा में प्राक्कलनों के संबंध में प्रक्रिया-(1) प्राक्कलनों में से जितने प्राक्कलन 1[संघ राज्यक्षेत्र] की संचित निधि पर भारित व्यय से संबंधित हैं, वे 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा में मतदान के लिए नहीं रखे जाएंगे, किन्तु इस उपधारा की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह विधान सभा में उन प्राक्कलनों में से किसी प्राक्कलन पर चर्चा को निवारित करती है ।
(2) उक्त प्राक्कलनों में से जितने प्राक्कलन अन्य व्यय से संबंधित हैं वे विधान सभा के समक्ष अनुदानों की मागों के रूप में रखे जाएंगे और विधान सभा की शक्ति होगी कि किसी मांग को अनुमति दे या अनुमति देने से इंकार कर दे अथवा किसी मांग को, उसमें विनिर्दिष्ट रकम को कम करके, अनुमति दे ।
(3) किसी अनुदान की मांग प्रशासक की सिफारिश से ही की जाएगी अन्यथा नहीं ।
29. विनियोग विधेयक-(1) विधान सभा द्वारा धारा 28 के अधीन अनुदान किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि में से-
(क) विधान सभा द्वारा इस प्रकार किए गए अनुदानों की; और
(ख) संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि पर भारित किन्तु विधान सभा के समक्ष पहले रखे गए विवरण में दर्शित रकम से किसी भी दशा में अनधिक व्यय की,
पूर्ति के लिए अपेक्षित सभी धनराशियों के विनियोग का उपबंध करने के लिए विधेयक पुरःस्थापित किया जाएगा ।
(2) इस प्रकार किए गए किसी अनुदान की रकम में परिवर्तन करने या अनुदान के लक्ष्य को बदलने अथवा संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि पर भारित व्यय की रकम में परिवर्तन करने का प्रभाव रखने वाला कोई संशोधन ऐसे किसी विधेयक में विधान सभा में प्रस्थापित नहीं किया जाएगा और पीठासीन व्यक्ति का इस बारे में विनिश्चय अंतिम होगा कि कोई संशोधन इस उपधारा के अधीन अग्राह्य है या नहीं ।
(3) इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि में से इस धारा के उपबंधों के अनुसार पारित विधि द्वारा किए गए विनियोग के अधीन ही कोई धन निकाला जाएगा अन्यथा नहीं ।
30. अनुपूरक, अतिरिक्त या अधिक अनुदान-(1) यदि-
(क) धारा 29 के उपबंधों के अनुसार बनाई गई किसी विधि द्वारा किसी विशिष्ट सेवा पर चालू वित्तीय वर्ष के लिए व्यय किए जाने के लिए प्राधिकृत कोई रकम उस वर्ष के प्रयोजनों के लिए अपर्याप्त पाई जाती है या उस वर्ष के वार्षिक वित्त विवरण से अनुध्यात न की गई किसी नई सेवा पर अनुपूरक या अतिरिक्त व्यय की चालू वित्तीय वर्ष के दौरान आवश्यकता पैदा हो गई है; या
(ख) किसी वित्तीय वर्ष के दौरान किसी सेवा पर, उस सेवा और उस वर्ष के लिए अनुदान की गई रकम से अधिक कोई धन व्यय हो गया है,
तो प्रशासक राष्ट्रपति के पूर्वानुमोदन से, यथास्थिति, संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के समक्ष उस व्यय की प्राक्कलित की गई रकम को दर्शित करने वाला दूसरा विवरण रखवाएगा या संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा में ऐसे आधिक्य के लिए मांग उपस्थित करवाएगा ।
(2) ऐसे किसी विवरण और व्यय या मांग के संबंध में तथा संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि में से ऐसे व्यय या ऐसी मांग से संबंधित अनुदान की पूर्ति के लिए धन का विनियोग प्राधिकृत करने के लिए बनाई जाने वाले किसी विधि के संबंध में भी, धारा 27, 28 और 29 के उपबंध वैसे ही प्रभावी होंगे जैसे वे वार्षिक वित्तीय विवरण और उसमें वर्णित व्यय के संबंध में या अनुदान की किसी मांग के संबंध में और संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि में से ऐसे व्यय या अनुदान की पूर्ति के लिए धन का विनियोग प्राधिकृत करने के लिए बनाई जाने वाले विधि के संबंध में प्रभावी है ।
31. लेखानुदान-(1) इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, [संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा को किसी वित्तीय वर्ष के भाग के लिए प्राक्कलित व्यय के संबंध में कोई अनुदान, उस अनुदान के लिए मतदान करने के लिए धारा 28 में विहित प्रक्रिया के पूरा होने तक और उस व्यय के संबध में धारा 20 के उपबंधों के अनुसार विधि के पारित होने तक, पेशगी देने की शक्ति होगी और जिन प्रयोजनों के लिए उक्त अनुदान किए गए हैं उनके लिए संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि में से धन निकालना विधि द्वारा प्राधिकृत करने की विधान सभा को शक्ति होगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन किए जाने वाले किसी अनुदान या उक्त उपधारा के अधीन बनाई जाने वाली किसी विधि के संबंध में धारा 28 और धारा 29 के उपबंध वैसे ही प्रभावी होंगे जैसे वे वार्षिक वित्तीय विवरण में वर्णित किसी व्यय के बारे में कोई अनुदान करने के संबंध में और संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि में से ऐसे व्यय की पूर्ति के लिए धन का विनियोग प्राधिकृत करने के लिए बनाई जाने वाली विधि के संबंध में प्रभावी हैं ।
32. विधान सभा द्वारा व्यय की मंजूरी दिए जाने तक व्यय को प्राधिकृत किया जाना-इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, प्रशासक, संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि में से ऐसा व्यय जैसा वह संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि के गठन की तारीख से प्रारंभ होने वाली छह मास से अनधिक अवधि के लिए आवश्यक समझे । संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा द्वारा ऐसे व्यय की मंजूरी दिए जाने तक प्राधिकृत कर सकेगा ।
33. प्रक्रिया के नियम-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, 1[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा अपनी प्रक्रिया के तथा अपने कार्य संचालन के विनियमन के लिए नियम बना सकेगी:
परन्तु प्रशासक, विधान सभा के अध्यक्ष से परामर्श करने के पश्चात् और राष्ट्रपति के अनुमोदन से-
(क) वित्तीय कार्य का समय के अन्दर समाप्त करना सुनिश्चित करने के लिए;
(ख) किसी वित्तीय विषय से या संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि में से धन का विनियोग करने वाले किसी विधेयक से संबंधित विधान सभा की प्रक्रिया और कार्य संचालन के विनियमन के लिए;
(ग) इस अधिनियम द्वारा प्रशासक से जहां तक अपने स्वविवेकानुसार कार्य करने की अपेक्षा की जाती है वहां तक उसके कृत्यों के निर्वहन पर प्रभाव डालने वाली किसी बात पर विचार-विमर्श करने का या प्रश्न पूछने का प्रतिषेध करने के लिए,
नियम बना सकेगा ।
(2) जब तक उपधारा (1) के अधीन नियम नहीं बनाए जाते हैं तब तक उत्तर प्रदेश राज्य की विधान सभा के संबंध में जो प्रक्रिया के नियम और स्थायी आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ से ठीक पहले, 1[संघ राज्यक्षेत्र] में प्रवृत्त थे वे ऐसे उपान्तरणों और अनुकूलनों के अधीन रहते हुए उस संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के संबंध में प्रभावी होंगे जिन्हें प्रशासक उनमें करे:
। । । । ।
34. संघ राज्यक्षेत्र की राजभाषा या भाषाएं और उसकी विधान सभा में प्रयोग होने वाली भाषा या भाषाएं-(1) किसी संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा, विधि द्वारा [संघ राज्यक्षेत्र] में प्रयोग होने वाली भाषाओं में से किसी एक या अधिक भाषाओं को या हिन्दी को उस संघ राज्यक्षेत्र के सभी या किन्हीं शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषाया भाषाओं के रूप में अंगीकार कर सकेगी:
परन्तु जब तक पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा अन्यथा विनिश्चय न करे तब तक उन शासकीय प्रयोजनों के लिए उस संघ राज्यक्षेत्र की राजभाषा के रूप में फ्रांसिसी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा, जिनके लिए, उसका इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पहले उस राज्यक्षेत्र में प्रयोग किया जा रहा था:
परन्तु यह और कि राष्ट्रपति आदेश द्वारा निदेश दे सकेगा कि-
(i) संघ की राजभाषा संघ राज्यक्षेत्र के ऐसे शासकीय प्रयोजनों के लिए अंगीकृत की जाएगी, जैसा उस आदेश में विनिर्दिष्ट हो;
(ii) कोई अन्य भाषा भी संपूर्ण संघ राज्यक्षेत्र में या उसके ऐसे भाग में संघ राज्यक्षेत्र के शासकीय प्रयोजनों में से ऐसे प्रयोजनों के लिए अंगीकृत की जाएगी जैसा उस आदेश में विनिर्दिष्ट हो, यदि राष्ट्रपति का यह समाधान हो जाए कि संघ राज्यक्षेत्र की जनसंख्या का पर्याप्त भाग ऐसे सभी प्रयोजनों या उनमें से किसी प्रयोजन के लिए, उस अन्य भाषा के प्रयोग की वांछा करता है ।
(2) संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा में कार्य संघ राज्यक्षेत्र की राजभाषा या भाषाओं में या हिन्दी में या अंग्रेजी में किया जाएगा:
परन्तु, यथास्थिति, विधान सभा का अध्यक्ष या उस रूप में कार्य करने वाला व्यक्ति किसी सदस्य को, जो पूर्वोक्त भाषाओं मेंसे किसी भाषा में अपनी पर्याप्त अभिव्यक्ति नहीं कर सकता, उसकी मातृभाषा में सभा को संबोधित करने की अनुज्ञा दे सकेगा ।
35. अधिनियमों, विधेयकों आदि के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा-धारा 34 में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जब तक संसद् विधि द्वारा अन्यथा उपबंधन करे, तब तक-
(क) संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा में पुरःस्थापित किए जाने वाले सभी विधेयकों या प्रस्तावित किए जाने वाले उनके संशोधनों के;
(ख) संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा द्वारा पारित सभी अधिनियमों के; और
(ग) संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन, जारी किए गए सभी आदेशों, नियमों विनियमों और उपविधियों के,
प्राधिकृत पाठ अंग्रेजी भाषा में होंगे:
परन्तु जहां 2[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा ने उस विधान सभा में पुरःस्थापित विधेयकों या उसके द्वारा पारित अधिनियमों में अथवा उस संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन निकाले गए किसी आदेश, नियम, विनियम या उपविधि में प्रयोग के लिए अंग्रेजी भाषा से भिन्न कोई भाषा विहित की है, वहां राजपत्र में प्रशासक के प्राधिकार से प्रकाशित अंग्रेजी भाषा में उसका अनुवाद, अंग्रेजी भाषा में उसका प्राधिकृत पाठ समझा जाएगा ।
36. विधान सभा में चर्चा पर निर्बन्धन-किसी न्यायिक आयुक्त या उच्चतम न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश के उसके कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए आचरण के विषय में 2[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा में कोई चर्चा नहीं होगी ।
37. न्यायालयों द्वारा विधान सभा की कार्यवाहियों की जांच न किया जाना-(1) 2[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा की किसी कार्यवाही की विधिमान्यता को प्रक्रिया में किसी अधिकथित अनियमितता के आधार पर प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।
(2) 2[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा का कोई अधिकारी या सदस्य, जिसमें इस अधिनियम द्वारा या उनके अधीन उस विधान सभा में प्रक्रिया या कार्य संचालन का विनियमन करने की अथवा व्यवस्था बनाए रखने की शक्तियां निहित हैं, उन शक्तियों के अपने द्वारा प्रयोग के विषय में किसी न्यायालय की अधिकारिता के अधीन नहीं होगा ।
भाग 3
निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन
38. परिभाषाएं-इस भाग में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) सहयुक्त सदस्य" से धारा 42 के अधीन परिसीमन आयोग के साथ [या [धारा 43क के या धारा 43ग के अधीन] निर्वाचन आयोग के साथ] सहयुक्त सदस्य अभिप्रेत है;
(ख) परिसीमन आयोग" से परिसीमन आयोग अधिनियम, 1962 (1962 का 61) की धारा 3 के अधीन गठित परिसीमन आयोग अभिप्रेत है;
2[(खख) निर्वाचन आयोग" से राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 324 के अधीन नियुक्त निर्वाचन आयोग अभिप्रेत है;]
(ग) नवीनतम जनगणना के आंकड़ों" से [संघ राज्यक्षेत्र] में उस नवीनतम जनगणना पर, जिसके अंतिम रूप से प्रकाशित आंकड़े उपलब्ध हैं, अभिनिश्चित किए गए जनगणना के आंकड़े अभिप्रेत हैं;
(घ) संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र" से 3[संघ राज्यक्षेत्र] से लोक सभा के निर्वाचनों के प्रयोजन के लिए विधि द्वारा उपबंधित कोई निर्वाचन-क्षेत्र अभिप्रेत है, जिसके अन्तर्गत दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र भी है ।
39. सभा निर्वाचन-क्षेत्र-3[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा के लिए निर्वाचनों के प्रयोजन के लिए वह संघ राज्यक्षेत्र इस भाग के उपबन्धों के अनुसार एक सदस्य सभा निर्वाचन-क्षेत्रों में ऐसी रीति से विभाजित किया जाएगा कि निर्वाचन-क्षेत्रों में प्रत्येक की जनसंख्या, जहां तक संभव हो, समस्त संघ राज्यक्षेत्र में वही होगी ।
40. लोक सभा में पांडिचेरी का प्रतिनिधित्व-लोक सभा में, पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्र को एक स्थान आबंटित किया जाएगा औरवह संघ राज्यक्षेत्र एक संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र होगा ।
41. परिसीमन आयोग के कर्तव्य-(1) परिसीमन आयोग का यह कर्तव्य होगा कि-
(क) वह प्रत्येक संघ राज्यक्षेत्र में सभा निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन करे; और
(ख) वह नवीनतम जनगणना के आंकड़ों के आधार पर गोवा, दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र से भिन्न 3[संघ राज्यक्षेत्र] की विधान सभा में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित रखे जाने वाले स्थानों की संख्या का और उन निर्वाचन-क्षेत्रों का अवधारण करे, जिनमें ये स्थान इस प्रकार आरक्षित रखे जाएंगे ।
(2) परिसीमन आयोग का यह भी कर्तव्य होगा कि-
(क) वह नवीनतम जनगणना के आंकड़ों के आधार पर दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर और त्रिपुरा के संघ राज्यक्षेत्रों में से प्रत्येक का संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों में पुनःसमायोजन करे, [यह संख्या 7, 4, 2 तथा 2 होगी];
(ख) वह उस निर्वाचन-क्षेत्र का अवधारण करे जिसमें, यथास्थिति, अनुसूचति जातियों या अनुसूचति जनजातियों के लिए स्थान आरक्षित रखा जाएगा; और
(ग) वह गोवा, दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र को दो एक-सदस्य संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों में विभाजित करे ।
42. सहयुक्त सदस्य-(1) परिसीमन आयोग को उसके कर्तव्यों में सहायता करने के प्रयोजन के लिए, परिसीमन आयोग अपने साथ निम्नलिखित व्यक्तियों को सहयुक्त करेगा, -
(क) दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र के बारे में, उस संघ राज्यक्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले लोक सभा के सभी सदस्य;
(ख) हिमाचल प्रदेश, मणिपुर और त्रिपुरा संघ राज्यक्षेत्रों में से प्रत्येक के बारे में उन संघ राज्यक्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले लोक सभा के सभी सदस्य और उस संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के सदस्यों में से विधान सभा के अध्यक्ष द्वारा नामनिर्देशित उस संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के तीन सदस्य;
(ग) गोवा, दमण और दीव के संघ राज्यक्षेत्र के बारे में उस संघ राज्यक्षेत्र का प्रतिनधित्व करने वाले लोक सभा के दो सदस्य;
(घ) पांडेचेरी संघ राज्यक्षेत्र के बारे में उस संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के सदस्यों में से विधान सभा के अध्यक्ष द्वारा नामनिर्देशित उस विधान सभा के तीन सदस्य ।
(2) उपधारा (1) के अधीन विभिन्न विधान सभाओं के सदस्यों का नामनिर्देशन उनके अपने-अपने अध्यक्षों द्वारा यथासाध्य शीघ्रता से किया जाएगा और परिसीमन आयोग को संसूचित किया जाएगा ।
(3) यदि मृत्यु या त्यागपत्र के कारण किसी सहयुक्त सदस्य का पद रिक्त हो जाता है तो उसकी पूर्ति, यथासाध्य शीघ्रता से, इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबन्धों के अधीन और उनके अनुसार की जाएगी ।
(4) सहयुक्त सदस्यों में से किसी को भी परिसीमन आयोग के किसी विनिश्चय पर मत देने या हस्ताक्षर करने का अधिकार नहीं होगा ।
43. परिसीमन के बारे में प्रक्रिया-(1) परिसीमन आयोग अधिनियम, 1962 (1962 का 69) की धारा 7, 9, 10 और 11 के उपबन्ध इस भाग के अधीन संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्र के सम्बन्ध में यावत्शक्य वैसे ही लागू होंगे जैसे वे उस अधिनियम के अधीन संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन को लागू होते हैं ।
[43क. मिजोरम विधान सभा के निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन के लिए विशेष उपबन्ध-(1) मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र के विधान सभा के निर्वाचन के प्रयोजन के लिए धारा 39 से 43 तक (जिसमें ये दोनों धाराएं सम्मिलित हैं) के उपबन्ध निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन को लागू नहीं होंगे ।
(2) मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा को धारा 3 की उपधारा (2) के अधीन दिए गए स्थानों को एक-सदस्य निर्वाचन-क्षेत्रों में, निर्वाचन आयोग इसमें उपबन्धित रीति से, वितरित करेगा और संविधान के उपबन्धों को तथा निम्नलिखित उपबन्धों को ध्यान में रखते हुए नवीनतम जनगणना के आंकड़ों के आधार पर उनका परिसीमन करेगा-
(क) यथासंभव सभी निवार्चन-क्षेत्र भौगोलिक रूप से संहृत क्षेत्र होंगे;
(ख) निर्वाचन-क्षेत्र का परिसीमन करने में भौगोलिक लक्षणों, प्रशासनिक इकाइयों की विद्यमान सीमाओं, संचार सुविधाओं और लोक सुविधाओं का ध्यान रखा जाएगा ।
(3) निर्वाचन आयोग उपधारा (2) के अधीन अपने कृत्यों के पालन में अपनी सहायता के प्रयोजनार्थ निम्नलिखित को सहयुक्त सदस्यों के रूप में अपने साथ सहयुक्त करेगा: -
(क) पूर्वोत्तर क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम, 1971 (1971 का 81) की धारा 2 के खण्ड (ख) के अधीन नियत दिन के ठीक पूर्व असम राज्य की विधान सभा के सभी सदस्य जो असम राज्य की विधान सभा के लिए लुंगलेड, एजल पूर्व तथा एजल पश्चिम प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों से निर्वाचित हुए हैं; तथा
(ख) मिजो जिला परिषद् के ऐसे तीन निर्वाचित सदस्य जिन्हें उसका अध्यक्ष नामनिर्देशित करे:
परन्तु किसी सहयुक्त सदस्य को मत देने का अथवा निर्वाचन आयोग के किसी विनिश्चय पर हस्ताक्षर करने का अधिकार नहीं होगा ।
(4) यदि मृत्यु अथवा त्यागपत्र के कारण किसी सहयुक्त सदस्य का पद रिक्त हो जाता है तो वह यथासाध्य, उपधारा (3) के उपबन्धों के अनुसार भरा जाएगा ।
(5) निर्वाचन आयोग-
(क) निर्वाचन-क्षेत्र के परिसीमन के लिए अपनी प्रस्थापनाएं, किसी ऐसे सहयुक्त सदस्य की विसम्मत प्रस्थापनाओं सहित, यदि कोई हों, जो उनका प्रकाशन चाहता हो, राजपत्र में और अन्य ऐसी रीति से, जिसे आयोग ठीक समझे, प्रकाशित करेगा और साथ-साथ एक ऐसी सूचना भी प्रकाशित करेगा जिसमें प्रस्थापनाओं के सम्बन्ध में आक्षेप और सुझाव आमंत्रित किए गए हों और वह तारीख भी विनिर्दिष्ट हो जिसको या जिसके पश्चात् वह प्रस्थापनाओं पर आगे विचार करेगा;
(ख) उन सभी आक्षेपों और सुझावों पर, जो उसे इस प्रकार विनिर्दिष्ट तारीख के पूर्व प्राप्त हुए हों, विचार करेगा;
(ग) उन आक्षेपों और सुझावों पर विचार करने के पश्चात् जो उसे इस प्रकार विनिर्दिष्ट तारीख के पूर्व प्राप्त हुए हों, एक या अधिक आदेशों द्वारा निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसमीन अवधारित करेगा और ऐसे आदेश या आदेशों को राजपत्र में प्रकाशित कराएगा और ऐसे प्रकाशन पर ऐसे आदेश या आदेशों को विधि का पूर्ण बल प्राप्त होगा और वे किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किए जाएंगे ।
(6) निर्वाचन आयोग समय-समय पर, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा-
(क) उपधारा (5) के अधीन किए गए किसी आदेश में मुद्रण संबंधी भूल को या अनवधानता से हुई भूल या लोप के कारण होने वाली किसी गलती को ठीक कर सकेगा;
(ख) जहां ऐसे किसी आदेश या आदेशों में वर्णित किसी प्रादेशिक खण्ड की सीमाओं या नाम में परिवर्तन किए जाते हैं वहां ऐसे संशोधन जो उसे ऐसे आदेश को अद्यतन करने के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों कर सकेगा ।
(7) उपधारा (5) के अधीन किए गए प्रत्येक आदेश को और उपधारा (6) के अधीन निकाली गई प्रत्येक अधिसूचना को उसे किए जाने अथवा निकाले जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के समक्ष रखा जाएगा ।
(8) मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के निर्वाचनों के प्रयोजनार्थ उस संघ राज्यक्षेत्र के प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन करने की दृष्टि से उस संघ राज्यक्षेत्र में इस अधिनियम के आरम्भ के पूर्व किए गए सभी कार्य और सभी उपाय, जहां तक वे इस धारा के पूर्वगमी उपबन्धों के अनुरूप हैं, उन उपबन्धों के अधीन किए गए समझे जाएंगे, मानो वे उपबन्ध उस समय प्रवृत्त हों जब ऐसे कार्य या उपाय किए गए हों ।]
[43ख. लोक सभा में अरुणाचल प्रदेश का प्रतिनिधित्व-(1) संघ राज्यक्षेत्र शासन (संशोधन) अधिनियम, 1975 (1975 का 29) के प्रारम्भ के पश्चात् होने वाले लोक सभा के साधारण निर्वाचन के पश्चात् गठित होने वाली लोक सभा में और उसके आगे भी अरुणाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र को दो स्थान आबंटित किए जाएंगे तथा लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) की प्रथम अनुसूची तद्नुसार संशोधित समझी जाएगी ।
43ग. अरुणाचल प्रदेश में संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों और अरुणाचल प्रदेश विधान सभा के निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन के लिए विशेष उपबन्ध-(1) धारा 39 से धारा 43 तक (जिनमें ये दोनों धाराएं सम्मिलित हैं) के उपबन्ध अरुणाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र में संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन को अथवा उस संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के निर्वाचनों के प्रयोजन के लिए निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन को लागू नहीं होंगे ।
(2) निर्वाचन आयोग नवीनतम जनगणना के आंकड़ों के आधार पर अरुणाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र को दो एक-सदस्य संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों में विभाजित करेगा ।
(3) निर्वाचन आयोग अरुणाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा की धारा 3 की उपधारा (2) के अधीन दिए गए स्थानों को एक-सदस्य सभा-निर्वाचन-क्षेत्रों में, इसमें उपबन्धित रीति से, वितरित भी करेगा और नवीनतम जनगणना के आंकड़ों के आधार पर निम्नलिखित उपबंधों का ध्यान रखते हुए उनका परिसीमन भी करेगा: -
(क) यथासाध्य सभी निर्वाचन-क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से संहृत क्षेत्र होंगे;
(ख) प्रत्येक सभा-निर्वाचन-क्षेत्र का इस प्रकार परिसीमन किया जाएगा जिससे कि वह एक ही संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र में पडे़;
(ग) निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन में, भौतिक लक्षणों, प्रशासनिक ईकाइयों की विद्यमान सीमाओं, संचार की सुविधाओं और लोक सुविधाओं का ध्यान रखा जाएगा ।
(4) निर्वाचन आयोग उपधारा (2) और (3) के अधीन अपने कृत्यों का पालन करने में सहायता के प्रयोजनार्थ निम्नलिखित को सहयुक्त सदस्यों के रूप में अपने साथ सहयुक्त करेगा-
(क) अरुणाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाला लोक सभा का सदस्य;
(ख) अरुणाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के ऐसे पांच सदस्य जिन्हें उस सभा का अध्यक्ष विधान सभा की संरचना को ध्यान में रखते हुए नामनिर्देशित करे:
परन्तु किसी सहयुक्त सदस्य को मत देने अथवा निर्वाचन आयोग के किसी विनिश्चय पर हस्ताक्षर करने का अधिकार नहीं होगा ।
(5) यदि मृत्यु अथवा त्यागपत्र के कारण किसी सहयुक्त सदस्य का पद रिक्त हो जाता है तो वह, यथासाध्य, उपधारा (4) के उपबंधों के अनुसार भरा जाएगा ।
(6) निर्वाचन आयोग-
(क) निर्वाचन-क्षेत्र के परिसीमन के लिए अपनी प्रस्थापनाएं किसी ऐसे सहयुक्त सदस्य का विसम्मत प्रस्थापनाओं सहित, यदि कोई हों, जो उनका प्रकाशन चाहता हो, राजपत्र में और अन्य ऐसी रीति से, जिसे आयोग ठीक समझे, प्रकाशित करेगा और साथ-साथ एक ऐसी सूचना भी प्रकाशित करेगा जिसमें उन प्रस्थापनाओं के संबंध में आक्षेप और सुझाव आमंत्रित किए गए हों और वह तारीख विनिर्दिष्ट हो, जिसकी या जिसके पश्चात् वह प्रस्थापनाओं पर आगे विचार करेगा;
(ख) उन सभी आक्षेपों और सुझावों पर, जो उसे इस प्रकार विनिर्दिष्ट तारीख के पूर्व प्राप्त हुए हों, विचार करेगा;
(ग) उन आक्षेपों और सुझावों पर विचार करने के पश्चात्, जो उसे इस प्रकार विनिर्दिष्ट तारीख के पूर्व प्राप्त हुए हों, एक या अधिक आदेशों द्वारा निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन अवधारित करेगा और ऐसे आदेश या आदेशों को राजपत्र में प्रकाशित करेगा, और ऐसे प्रकाशन पर ऐसे आदेश या आदेशों का विधि का पूर्ण बल प्राप्त होगा और वे किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं होंगे ।
(7) निर्वाचन आयोग, समय-समय पर, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा-
(क) उपधारा (6) के अधीन किए गए किसी आदेश में मुद्रण संबंधी किसी भूल को या अनवधानता से हुई भूल या लोप के कारण उत्पन्न होने वाली किसी गलती को ठीक कर सकेगा;
(ख) जहां ऐसे किसी आदेश या आदेशों में वर्णित किसी प्रादेशिक खण्ड की सीमाओं में या नाम में परिवर्तन किए जाते हैं वहां ऐसे आदेश को अद्यतन करने के लिए ऐसे संशोधन, जो उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों कर सकेगा ।
(8) उपधारा (6) के अधीन किए गए प्रत्येक आदेश को और उपधारा (7) के अधीन जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना को उसके किए जाने अथवा जारी किए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र लोक सभा और अरुणाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के समक्ष रखा जाएगा ।
(9) अरुणाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के निर्वाचनों के प्रयोजनार्थ उस संघ राज्यक्षेत्र के प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन करने की दृष्टि से उस संघ राज्यक्षेत्र में इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व किए गए सभी कार्य और सभी उपाय जहां तक वे इस धारा के पूर्वगामी उपबन्धों के अनुरूप हैं, उन उपबंधों के अधीन किए गए समझे जाएंगे, मानो वे उपबंध उस समय प्रवृत्त हों जब ऐसे कार्य या उपाय किए गए हों ।]
[43घ. अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए गोवा, दमण और दीव की विधान सभा में निर्वाचन-क्षेत्रों के अवधारण के लिए विशेष उपबंध-(1) निर्वाचन आयोग नवीनतम जनगणना के आंकड़ों के आधार पर निम्नलिखित का अवधारण करेगा, अर्थात्-
(i) उन स्थानों की संख्या, जो धारा 3 की उपधारा (5) के उपबंधों को ध्यान में रखते हुए, गोवा, दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा में (जिसे इसमें इसके विधान सभा कहा गया है) अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित रखे जाने हैं; और
(ii) वे निर्वाचन-क्षेत्र, जिनमें ऐसे स्थान परिसीमन अधिनियम की धारा 9 की उपधारा (1) के, यथास्थिति, खण्ड (ग) या खण्ड (घ) के उपबंधों को ध्यान में रखते हुए और परिसीमन आयोग द्वारा यथापरिसीमित किसी निर्वाचन-क्षेत्र के विस्तार में कोई परिवर्तन किए बिना इस प्रकार आरक्षित किए जाएंगे ।
(2) निर्वाचन आयोग-
(क) उन निर्वाचन-क्षेत्रों के अवधारण के लिए जिनमें, यथास्थिति, अनुसूचति जातियों या अनुसूचति जनजातियों के लिए स्थान आरक्षित रखे जाएंगे, अपनी प्रस्थापनाएं उन प्रस्थापनाओं के संबंध में आक्षेपों और सुझावों को आमंत्रित करने वाली सूचना सहित और वह तारीख विनिर्दिष्ट करते हुए जिसको या जिसके पश्चात् उन प्रस्थापनाओं पर आगे विचार किया जाएगा । भारत के राजपत्र में और गोवा, दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र के राजपत्र में और ऐसी अन्य रीति से भी जो निर्वाचन आयोग उचित समझे, प्रकाशित करेगा;
(ख) उन सभी आक्षेपों और सुझावों पर, जो उसे इस प्रकार विनिर्दिष्ट की गई तारीख से पूर्व प्राप्त हो, विचार करेगा;
(ग) उन आक्षेपों और सुझावों पर जो उसे इस प्रकार विनिर्दिष्ट की गई तारीख के पूर्व प्राप्त हों, विचार करने के पश्चात् उन स्थानों की संख्या का, जो विधान सभा में, यथास्थिति, अनुसूचति जातियों या अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित किए जाएंगे और उन निर्वाचन-क्षेत्रों का, जिनमें वे स्थान इस प्रकार आरक्षित किए जाएंगे, एक या अधिक आदेशों द्वारा, अवधारण करेगा और ऐसे आदेश या आदेशों को भारत के राजपत्र में और गोवा, दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र के राजपत्र में प्रकाशित कराएगा और भारत के राजपत्र में ऐसे प्रकाशन पर ऐसे आदेश या आदेशों को विधि का पूर्ण बल प्राप्त होगा और वे किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं होंगे और लोक प्रतिनिधित्व, 1950 (1950 का 43) की द्वितीय अनुसूची और परिसीमन अधिनियम की धारा 9 के अधीन विधान सभा के संबंध में परिसीमन आयोग द्वारा किए गए आदेश तद्नुसार संशोधित किए गए समझे जाएंगे ।
(3) उपधारा (4) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, विधान सभा में किन्हीं प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व का पुनः समायोजन, जो इस धारा के अधीन निर्वाचन आयोग द्वारा किए गए आदेश द्वारा आवश्यक हो गया है, ऐसे आदेश के उपधारा (2) के अधीन भारत के राजपत्र में प्रकाशन के पश्चात् होने वाले विधान सभा के प्रत्येक निर्वाचन के संबंध में लागू होगा ।
(4) पूर्वगामी उपधाराओं की कोई बात, निर्वाचन आयोग द्वारा किए गए आदेश के उपधारा (2) के अधीन भारत के राजपत्र में प्रकाशन की तारीख को विद्यमान विधान सभा में प्रतिनिधित्व पर प्रभाव नहीं डालेगी ।
(5) निर्वाचन आयोग भारत के राजपत्र में और गोवा, दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र के राजपत्र में अधिसूचना द्वारा समय-समय पर-
(क) उपधारा (2) के अधीन किए गए किसी आदेश में मुद्रण संबंधी गलती को या अनवधानता से हुई भूल या लोप के कारण हुई किसी गलती को ठीक कर सकता है;
(ख) जहां किसी ऐसे आदेश में वर्णित किसी प्रादेशिक खण्ड की सीमाओं में या नाम में कोई परिवर्तन किए जाने हैं वहां ऐसे आदेश को अद्यतन करने के लिए ऐसे संशोधन कर सकेगा जो उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत होते हैं ।
(6) उपधारा (2) के अधीन किए गए प्रत्येक आदेश और उपधारा (5) के अधीन जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना को, उसके किए जाने या जारी किए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र विधान सभा के समक्ष रखा जाएगा ।
स्पष्टीकरण- इस धारा में-
(क) परिसीमन अधिनियम" से परिसीमन अधिनियम, 1972 (1972 का 76) अभिप्रेत है ।
(ख) परिसीमन आयोग" से परिसीमन अधिनियम की धारा 3 के अधीन गठित परिसीमन आयोग अभिप्रेत है ।]
[43ङ. प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों के पुनः समायोजन के बारे में विशेष उपबंध-धारा 38 से धारा 43घ में (जिनमें ये दोनों धाराएं सम्मिलित हैं) किसी बात के होते हुए भी, जब तक सन् [2026] के पश्चात् की गई पहली जनगणना के तत्संबंधी आंकड़े प्रकाशित नहीं हो जाते हैं, तब तक प्रत्येक संघ राज्यक्षेत्र के प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों में विभाजन का पुनः समायोजन करना आवश्यक नहीं होगा, तथा इस भाग में नवीनतम जनगणना के आंकड़ों" के प्रति किसी निर्देश का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वह 2[2001] की जनगणना के आंकड़ों के प्रतिनिर्देश हैं ।]
[43च. परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 10 की उपधारा (1) के अधीनआदेशों के प्रकाशन या उक्त धारा की उपधारा (2) अथवा उपधारा (4) में किसी बात के होते हुए भी, उक्त अधिनियम के अधीनपरिसीमन आयोगद्वारा 2001 की जनगणनाकेआधार पर संघ राज्यक्षेत्र के प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों में विभाजन में कोई पुनः समायोजन उस तारीख से प्रभावी होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशितआदेश द्वारा, विनिर्दिष्ट करे और ऐसे पुनः समायोजन के प्रभावी होने तक, विधान सभा के लिए कोई निर्वाचन ऐसे पुनः समायोजनसे पूर्व विद्यमान प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों के आधार पर कराया जा सकेगा ।]
भाग 4
मंत्रि-परिषद्
44. मंत्रि-परिषद्-(1) जिन बातों में इस अधिनियम द्वारा या उनके अधीन प्रशासक से यह अपेक्षित है कि वह अपने विवेकानुसार कार्य करे या किसी विधि द्वारा या उसके अधीन किसी न्यायिक या न्यायवत् कृत्यों का निर्वहन करे उन बातों को छोड़कर प्रशासक को उन विषयों के संबंध में जिनकी बाबत संघ राज्य की विधान सभा को विधियां बनाने की शक्ति है उसके कृत्य का प्रयोग करने में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रि-परिषद् होगी, जिसका प्रधान मुख्य मंत्री होगा:
परन्तु किसी विषय पर प्रशासक तथा उसके मंत्रियों के बीच मतभेद की दशा में, प्रशासक उस विषय को विनिश्चय के लिए राष्ट्रपति को निर्देशित करेगा और राष्ट्रपति द्वारा उस पर दिए गए विनिश्चय के अनुसार कार्य करेगा तथा ऐसा विनिश्चय होने तक प्रशासक, किसी ऐसे मामले में, जहां मामला उसकी राय में इतना अत्यावश्यक है कि उसके लिए तुरन्त कार्रवाई करना आवश्यक है वहां उस विषय में ऐसी कार्रवाई करने या ऐसा निदेश देने के लिए जैसा कि वह ठीक समझे सक्षम होगा:
। । । । ।
। । । । ।
(3) इस अधिनियम के अधीन यदि और जहां तक प्रशासक का कोई विशेष उत्तरदायित्व है, वह अपने कृत्यों का प्रयोग करने में अपने विवेकानुसार कार्य करेगा ।
(4) यदि कोई प्रश्न उठता है कि कोई विषय ऐसा है या नहीं जिसकेसंबंध में इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन प्रशासक से यह अपेक्षित है कि वह अपने विवेकानुसार कार्य करे तो उस पर प्रशासक का विनिश्चय अंतिम होगा ।
(5) यदि कोई प्रश्न उठता है कि कोई विषय ऐसा है या नहीं जिसके संबंध में किसी विधि द्वारा प्रशासक से यह अपेक्षित है कि वह कोई न्यायिक या न्यायवत् कृत्य करे तो उस पर प्रशासक का विनिश्चय अंतिम होगा ।
(6) इस प्रश्न की किसी न्यायालय में जांच नहीं की जाएगी कि क्या मंत्रियों ने प्रशासक को कोई सलाह दी और यदि दी तो क्या दी ।
45. मंत्रियों के बारे में अन्य उपबंध-(1) मुख्य मंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति मुख्य मंत्री की सलाह पर करेगा ।
(2) मंत्री राष्ट्रपति के प्रसाद-पर्यन्त अपने पद धारण करेंगे ।
(3) मंत्रि-परिषद् संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तदायी होगा ।
(4) किसी मंत्री द्वारा अपना पदग्रहण करन से पहले, प्रशासक पहली अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्ररूपों के अनुसार उसको पद की और गोपनीयता की शपथ दिलाएगा ।
(5) कोई मंत्री, जो निरन्तर छह मास की अवधि तक संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा का सदस्य नहीं रहता है, उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा ।
(6) मंत्रियों के वेतन और भत्ते ऐसे होंगे जो उस संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा, विधि द्वारा, समय-समय पर अवधारित करे और जब तक विधान सभा इस प्रकार अवधारित नहीं करती है तब तक ऐसे होंगे जो राष्ट्रपति के अनुमोदन से प्रशासक द्वारा अवधारित किए जाएं ।
46. कार्य-संचालन-(1) राष्ट्रपति-
(क) मंत्रियों के कार्य के आबंटन के लिए; और
(ख) मंत्रियों के साथ अधिक सुविधापूर्ण कार्य-संचालन के लिए, जिसमें प्रशासक और मंत्रि-परिषद् या किसी मंत्री के बीच मतभेद के मामले में अंगीकृत की जाने वाली प्रक्रिया भी है,
नियम बनाएगा ।
(2) इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय प्रशासक की समस्त कार्यपालिका कार्यवाही, चाहे उसके मंत्रियों की मंत्रणा पर या अन्यथा की गई हो, प्रशासक के नाम से की हुई कही जाएगी ।
(3) प्रशासक के नाम से किए गए और निष्पादित आदेशों और अन्य लिखतों को ऐसी रीति से अधिप्रमाणित किया जाएगा जो प्रशासक द्वारा बनाए जाने वाले नियमों में विनिर्दिष्ट हो और इस प्रकार अधिप्रमाणित आदेश या लिखत की विधिमान्यता इस आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि वह प्रशासक द्वारा किया गया या निष्पादित आदेश या लिखत नहीं है ।
भाग 5
प्रकीर्ण तथा संक्रमणकालीन उपबन्ध
47. संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि-(1) ऐसी तारीख से, जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त नियत करे, किसी ऐसे विषय के सम्बन्ध में, जिसकी बाबत संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा को विधियां बनाने की शक्ति है, भारत सरकार द्वारा या संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक द्वारा [संघ राज्यक्षेत्र] में प्राप्त सभी राजस्व तथा [भारत की संचित निधि में से उस संघ राज्यक्षेत्र को दिए गए सभी अनुदान तथा सभी उधार और भारत सरकार या संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक द्वारा उस संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि की प्रतिभूति पर लिए गए सभी उधार] तथा उधारों के प्रतिसंदाय में संघ राज्यक्षेत्र द्वारा प्राप्त सभी धन राशियों की एक संचित निधि बनेगी जो संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि के नाम से ज्ञात होगी ।
(2) 2[संघ राज्यक्षेत्र] की संचित निधि में से कोई धन राशियां इस अधिनियम के अनुसार और उसमें उपबंधित प्रयोजनों के लिए और रीतिसे ही विनियोजित की जाएंगी अन्यथा नहीं ।
(3) 2[संघ राज्यक्षेत्र] की संचित निधि की अभिरक्षा, ऐसी निधि से धन राशियों का संदाय, उससे धन राशियों का निकालना और उन विषयों से संबंधित या आनुषंगिक सभी अन्य विषय राष्ट्रपति के अनुमोदन से प्रशासक द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा विनियमित किए जाएंगे ।
[47क. संघ राज्यक्षेत्र का लोक लेखा और उसमें जमा किया गया धन-(1) उस तारीख से जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त, नियत करे, प्रशासक द्वारा या उसकी ओर से प्राप्त किए गए अन्य सभी लोक धन संघ राज्यक्षेत्र का लोक लेखा" नाम से ज्ञात लोक लेखा में जमा किए जाएंगे ।
(2) प्रशासक द्वारा या उसकी ओर से प्राप्त लोक धन की जो संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि या संघ राज्यक्षेत्र की आकस्मिकता निधि में जमा किए गए धन से भिन्न है, अभिरक्षा, संघ राज्यक्षेत्र के लोक लेखा में उनका संदाय और ऐसे लेखा से धन का निकाला जाना तथा पूर्वोक्त विषयों से संसक्त या सहायक अन्य सभी विषय राष्ट्रपति के अनुमोदन से प्रशासक द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा विनियमित किए जाएंगे ।]
48. संघ राज्यक्षेत्र की आकस्मिकता निधि-(1) अग्रदाय के स्वरूप की एक आकस्मिकता निधि स्थापित की जाएगी जो संघ राज्यक्षेत्र की आकस्मिकता निधि" के नाम से ज्ञात होगी जिसमें संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि में से ऐसी राशियां जमा की जाएंगी जो समय-समय पर उस राज्यक्षेत्र की विधान सभा द्वारा बनाई गई विधि द्वारा अवधारित की जाए और ऐसी निधि में से अग्रिम धन देने के लिए प्रशासक को समर्थ बनाने के लिए उक्त निधि प्रशासक द्वारा धारित की जाएगी ।
(2) संघ राज्यक्षेत्र की आकस्मिकता निधि में से कोई अग्रिम, किसी अनपेक्षित व्यय का, विधि द्वारा किए गए विनियोजनों के अधीन, संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा द्वारा प्राधिकृत होना लंबित रहने तक ऐसे व्यय की पूर्ति के प्रयोजनों के लिए ही दिया जाएगा अन्यथा नहीं ।
(3) प्रशासक, संघ राज्यक्षेत्र की आकस्मिकता निधि की अभिरक्षा, उसमें धन राशियों का संदाय और उससे धन राशियों को निकालने से संबंधित तथा आनुषंगिक सभी मामलों को विनियमित करने वाले नियम बना सकेगा ।
[48क. संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि की प्रतिभूति पर उधार लेना-(1) संघ की कार्यपालिका शक्ति, संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि की प्रतिभूति पर ऐसी सीमाओं के भीतर, यदि कोई हों, जो संसद् विधि द्वारा, समय-समय पर, नियत करे, उधार लेने और ऐसी सीमाओं के भीतर, यदि कोई हो, जो इस प्रकार नियत की जाएं, प्रत्याभूति देने तक विस्तारित है:
परन्तु इस उपधारा के अधीन भारत सरकार द्वारा प्रयोक्तव्य शक्तियां प्रशासक द्वारा भी, ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, यदि कोई हों, जिन्हें भारत सरकार अधिरोपित करना ठीक समझे, प्रयोक्तव्य होंगी ।
(2) प्रत्याभूति देने के प्रयोजनों के लिए अपेक्षित कोई रकम संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि पर भारित होगी ।
48ख. संघ राज्यक्षेत्र के लेखाओं का प्ररूप-संघ राज्यक्षेत्र के लेखाओं को ऐसे प्ररूप में रखा जाएगा जो प्रशासक, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की सलाह अभिप्राप्त करने के पश्चात् और राष्ट्रपति के अनुमोदन से, नियमों द्वारा, विहित करे ।]
49. लेखापरीक्षा रिपोर्ट-धारा 47 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट तारीख के पश्चात्वर्ती किसी अवधि के लिए [संघ राज्यक्षेत्र] के लेखाओं से संबंधित भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक की रिपोर्टें प्रशासक के समक्ष उपस्थित की जाएंगी जो उन्हें उस संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के समक्ष रखवाएगा ।
50. प्रशासक और उसके मंत्रियों का राष्ट्रपति से सम्बन्ध-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी प्रशासक और उसकी मंत्रिपरिषद् राष्ट्रपति के साधारण नियंत्रण के अधीन होगी और ऐसे विशिष्ट निदेशों का, यदि कोई हों, अनुपालन करेगी जो राष्ट्रपति द्वारा समय-समय पर दिए जाएं ।
51. सांविधानिक तंत्र विफल हो जाने की दशा में उपबन्ध-यदि राष्ट्रपति का 2[संघ राज्यक्षेत्र] के प्रशासक से रिपोर्ट मिलने पर या अन्यथा यह समाधान हो जाता है कि-
(क) ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें उस संघ राज्यक्षेत्र का प्रशासन इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता है; या
(ख) संघ राज्यक्षेत्र के उचित प्रशासन के लिए ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है,
तो राष्ट्रपति आदेश द्वारा इस अधिनियम के सभी उपबंधों का या उनमें से किसी का प्रवर्तन ऐसी अवधि के लिए, जैसा वह ठीक समझे, निलंबित कर सकेगा और ऐसे आनुषंगिक तथा पारिणामिक उपबंध कर सकेगा, जो उसे अनुच्छेद 239 के उपबंधों के अनुसार संघ राज्यक्षेत्र के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों ।
[52. राष्ट्रपति द्वारा व्यय को प्राधिकृत किया जाना-जहां धारा 51 के अधीन किसी आदेश के कारण किसी संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा विघटित कर दी गई है या ऐसी विधान सभा के रूप में उसके कृत्य निलंबित कर दिए गए हैं वहां, जब लोक सभा सत्र में नहीं है तब उस संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि में से व्यय के लिए संसद् की मंजूरी लंबित रहने तक ऐसे व्यय को प्राधिकृत करने की राष्ट्रपति की क्षमता होगी ।]
53. गोवा, दमण और दीव तथा पांडिचेरी से संसद् के निर्वाचन के लिए उपबन्ध-(1) इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् यथासाध्य शीघ्र-
(क) गोवा, दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र को आबंटित लोक सभा में स्थानों को भरने के लिए; तथा
(ख) पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्र को आबंटित लोक सभा तथा राज्य सभा के स्थान को भरने के लिए,
विधि के अनुसार निर्वाचन किए जाएंगे ।
(2) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी लोक सभा में गोवा, दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने के लिए नामनिर्देशित सदस्य तब तक ऐसे रूप में बने रहेंगे, जब तक उस संघ राज्यक्षेत्र को उस सदन में आबंटित दो स्थानों को भरने के लिए सदस्यों का निर्वाचन नहीं किया जाता है:
परन्तु जहां सदस्यों के निर्वाचन की तारीखें भिन्न-भिन्न हों वहां इस प्रकार नामनिर्देशित सदस्य उन दो तारीखों में से पूर्वतर तारीख से उस सदन के सदस्य नहीं रहेंगे ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा में, निर्वाचन की तारीख" पद का वहीं अर्थ है, जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (1951 का 43) की धारा 67क में है ।
[54. मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र स्थित कतिपय क्षेत्रों में न्याय प्रशासन के लिए संक्रमणकालीन उपबंध-इस अधिनियम के प्रारम्भ पर और से मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र में और जब तक सक्षम विधान-मंडल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा इस निमित्त अन्य उपबन्ध नहीं किए जाते हैं तब तक उस संघ राज्यक्षेत्र के उन क्षेत्रों में जो संविधान की छठी अनुसूची के अधीन किसी स्वायत्तशासी जिले में समाविष्ट नहीं है, न्याय प्रशासन उस अनुसूची के पैरा 4 तथा 5 के उपबन्धों के अनुसार चलाया जाएगा, मानो वे क्षेत्र उस अनुसूची के अधीन किसी स्वायत्तशासी जिले में समाविष्ट हों और उक्त पैराओं के उपबन्ध उन क्षेत्रों में प्रवृत्त हों और इस प्रयोजन के लिए-
(i) उक्त पैरा 4 के उपबंधों के अधीन जिला परिषद् की सभी शक्तियों और कृत्यों का प्रयोग प्रशासक द्वारा या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी अधिकारी द्वारा किया जाएगा;
(ii) उक्त पैरा 5 ऐसे प्रभावी मानो जिला परिषद्, क्षेत्रीय परिषद् और जिला परिषद् द्वारा गठित न्यायालयों के प्रति निर्देशों का, चाहे वे किन्हीं शब्दों में क्यों न हों, उसमें से लोप कर दिया गया हो; और
(iii) उक्त पैरा 4 और पैरा 5 में, राज्यपाल के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा मानो वे प्रशासक के प्रति निर्देश हो ।]
[54क. अरुणाचल प्रदेश की अनंतिम विधान सभा के बारे में उपबंध-(1) इस अधिनियम के किसी बात के होते हुए भी (जिसके अन्तर्गत अरुणाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा की सदस्य संख्या से संबंधित उपबंध भी हैं) जब तक अरुणाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा को सम्यक् रूप से गठित और इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन और उनके अनुसार प्रथम सत्र के लिए अधिविष्ट होने के लिए आहूत नहीं किया जाता है तब तक एक इस ऐसी अनंतिम विधान सभा होगी जिसके सदस्य वे व्यक्ति होंगे जो पूर्वोत्तर सीमांत अभिकरण (प्रशासन) अनुपूरक विनियम, 1971 की धारा 3 के खण्ड (ख), (ग) और (घ) में निर्दिष्ट हैं और जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पहले अरुणाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र में उक्त धारा 3 के अधीन गठित प्रदेश परिषद् के सदस्यों के में कार्य कर रहे हैं ।
(2) अनंतिम विधान सभा के सदस्यों की पदावधि उस विधान सभा के प्रथम साधारण निर्वाचन के पश्चात् सम्यक् रूप से गठित विधान सभा के प्रथम अधिवेशन के ठीक पूर्व समाप्त हो जाएगी ।
(3) इस धारा के अधीन गठित अनंतिम विधान सभा के बारे में तब तक, जब तक कि वह अस्तित्व में है, यह समझा जाएगा कि वह इस अधिनियम के अधीन सम्यक् रूप से गठित विधान सभा है और तद्नुसार इस अधिनियम के अन्य उपबंध यथासंभाव अनंतिम विधान सभा के संबंध में उसी प्रकार लागू होंगे जैसे वे विधान सभा के संबंध में लागू होते हैं ।]
55. संविदाएं तथा वाद-शंकाओं के निराकरण के लिए यह घोषित किया जाता है कि-
(क) [संघ राज्यक्षेत्र] के प्रशासन से संबंधित सभी संविदाएं, संघ राज्यक्षेत्र की कार्यपालन शक्ति के प्रयोग में की गई संविदाएं हैं;
(ख) 3[संघ राज्यक्षेत्र] के प्रशासन से संबंधित सभी वादों तथा कार्यवाहियों को भारत सरकार द्वारा या उसके विरुद्ध संस्थित किया जाएगा ।
56. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-यदि इस अधिनियम द्वारा निरसित विधियों में से किसी विधि के उपबंधों के संक्रमण के संबंध में या इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में और विशिष्टतया 3[संघ राज्यक्षेत्र] के लिए विधान सभा के गठन के संबंध में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो राष्ट्रपति ऐसे आदेश द्वारा, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो, ऐसी कोई भी बात कर सकेगा जो उसे उन कठिनाइयों को दूर करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो ।
57. कतिपय अधिनियमितियों का संशोधन-(1) दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट अधिनियमितियां-
(क) उनके अधीन बनाए गए या जारी किए गए सभी नियमों, अधिसूचनाओं और आदेशों के साथ गोवा, दमण और दीव तथा पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्रों पर विस्तारित तथा प्रवृत्त होंगी; और
(ख) उक्त अनुसूची के चतुर्थ स्तम्भ में उल्लिखित संशोधन के अधीन होगी ।
(2) गोवा, दमण और दीव तथा पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्रों से लोक सभा के निर्वाचनों के प्रयोजन के लिए और उन राज्यक्षेत्रों की विधान सभाओं के निर्वाचनों के प्रयोजन के लिए निर्वाचक नामावलियों को तैयार करने या उनके पुनरीक्षण के संबंध में इस अधिनियम के प्रारम्भ से पूर्व की गई सभी बातों और उठाए गए सभी कदमों के बारे में, जहां तक वे इस अधिनियम द्वारा यथासंशोधित लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) के उपबंधों के अनुरूप हों, यह समझा जाएगा कि वे विधि के अनुसार किए गए हैं ।
58. निरसन तथा व्यावृत्ति-(1) निम्नलिखित विधियां निरसित की जाती हैं-
(क) प्रादेशिक परिषद् अधिनियम, 1956 (1956 का 103);
(ख) पांडिचेरी राज्य की प्रतिनिधि सभा से संबंधित तारीख 25 अक्तूबर, 1946 की डिक्री संख्या 46-2381 जैसी कि वह तत्पश्चात् संशोधित हो;
(ग) पांडिचेरी राज्य में सरकार की परिषद् बनाने से संबंधित तारीख 12 अगस्त, 1947 की डिक्री संख्या 47-1490 जैसी कि वह तत्पश्चात् संशोधित हो;
(घ) पांडिचेरी राज्य (लोक प्रतिनिधित्व) आदेश, 1955 जहां तक उसका संबंध पांडिचेरी की प्रतिनिधि सभा से है ।
(2) प्रादेशिक परिषद् अधिनियम, 1956 (1956 का 103) का निरसन होते हुए भी-
(क) [संघ राज्यक्षेत्र] की प्रादेशिक परिषद् का प्रत्येक अधिकारी और अन्य कर्मचारी, जो ऐसे निरसन के ठीक पूर्व परिषद् के अधीन सेवा कर रहा है, सरकार का अधिकारी या अन्य कर्मचारी बनेगा और ऐसे पदाभिधान से उस संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासन के संबंध में नियोजित किया जाएगा जैसा प्रशासक अवधारित करे और उसी अवधि के लिए तथा उसी पारिश्रमिक पर तथा सेवा के उन्हीं निबन्धनों और शर्तों पर पद धारण करेगा जैसा वह, यदि ऐसा निरसन न होता तो, धारण करता और जब तक ऐसी अवधि, पारिश्रमिक तथा निबन्धन और शर्तें प्रशासक द्वारा सम्यक् रूप से परिवर्तित नहीं कर दी जाती हैं तब तक ऐसा करता रहेगा :
परन्तु-
(i) किसी ऐसे अधिकारी या अन्य कर्मचारी की सेवा की अवधि, पारिश्रमिक तथा उनके निबन्धन और शर्तें केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना उसके लिए अहितकर रूप से परिवर्तित नहीं की जाएंगी;
(ii) ऐसे निरसन के पूर्व किसी ऐसे अधिकारी या अन्य कर्मचारी द्वारा की गई किसी सेवा के बारे में यह समझा जाएगा कि वह सेवा संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासन के संबंध में की गई है;
(iii) प्रशासक ऐसे कृत्यों के निर्वहन में जैसा वह उचित समझे किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी को नियोजित कर सकेगा और प्रत्येक ऐसा अधिकारी या अन्य कर्मचारी तद्नुसार उन कार्यों का निर्वहन करेगा;
(ख) निरसित अधिनियम के अधीन की गई कोई बात या कोई कार्रवाई (जिसके अन्तर्गत बनाई गई या जारी की गई कोई अधिसूचना, आदेश, स्कीम, नियम, प्ररूप, सूचना या उपविधि, अनुदत्त की गई कोई अनुज्ञप्ति या अनुज्ञा भी है) जहां तक वह इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं है तब तक प्रवृत्त बनी रहेगी जब तक कि उसे विधि के अनुसार की गई किसी बात या कार्रवाई द्वारा अप्रतिष्ठित नहीं कर दिया जाता है;
(ग) ऐसे निरसन के पूर्व प्रादेशिक परिषद् द्वारा, प्रादेशिक परिषद् के या प्रादेशिक परिषद् के लिए उपगत सभी ऋणों, बाध्यताओं और दायित्वों, की गई सभी संविदाओं और ऐसे सभी मामलों तथा बातों के बारे में, जिनके किए जाने के लिए वचनबंध दिया गया है यह समझा जाएगा कि उन्हें संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासन के प्रयोजनों के लिए संघ की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग करते हुए उपगत किया गया है या किए जाने के लिए वचनबंध दिया गया है;
(घ) प्रादेशिक परिषद् द्वारा किए गए सभी निर्धारण, मूल्यांकन, माप या विभाजन जहां तक वे इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं है तब तक प्रवृत्त बने रहेंगे, जब तक वे विधि के अनुसार प्रशासक द्वारा किए गए किसी निर्धारण, मूल्यांकन, माप या विभाजन द्वारा प्रतिष्ठित नहीं कर दिए जाते हैं;
(ङ) ऐसे निरसन के ठीक पूर्व प्रादेशिक परिषद् में निहित स्थावर और जंगम सभी संपत्ति तथा किसी भी प्रकृति या प्रकार के सभी हित उस परिषद् द्वारा किए गए, उपभोग किए गए या कब्जे में रखे गए किसी भी वर्णन के सभी अधिकारों सहित, संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासन के प्रयोजनों के लिए संघ में निहित होंगे;
(च) सभी रेट, कर, उपकर, फीस, किराए, भाड़ा और अन्य प्रभार, जो ऐसे निरसन के ठीक पूर्व प्रादेशिक परिषद् द्वारा विधिपूर्ण रीति से उद्गृहीत किए जाते थे, जब तक कि विधि द्वारा उसके विपरीत उपबंध नहीं किया जाता है, उसी दर पर उद्गृहीत किए जाते रहेंगे जिस पर वे ऐसे निरसन के ठीक पूर्व परिषद् द्वारा उद्गृहीत किए जाते थे;
(छ) ऐसे निरसन के ठीक पूर्व प्रादेशिक परिषद् को शोध्य सभी रेट, कर, उपकर, फीस, किराए, भाड़ा और अन्य प्रभारों के बारे में यह समझा जाएगा कि वे संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासन के संबंध में संघ को देय हैं;
(ज) ऐसे सभी वाद, अभियोजन और अन्य विधिक कार्रवाइयां, जो प्रादेशिक परिषद् द्वारा या उसके विरुद्ध संस्थित हैं या संस्थित की जाती हैं, भारत सरकार द्वारा या उसके विरुद्ध जारी रखी जा सकेंगी या संस्थित की जा सकेंगी ।
पहली अनुसूची
[धारा 4(क), 11 और 45(4) देखिए]
शपथ या प्रतिज्ञान के प्ररूप
I
विधान सभा के निर्वाचन के लिए अभ्यर्थी द्वारा ली जाने वाली शपथ या किए जाने वाले प्रतिज्ञान का प्ररूप
मैं, अमुक.................... जो ..............……................विधान सभा में स्थान भरने के लिए अभ्यर्थी के रूप में
ईश्वर की शपथ लेता हूं
नामनिर्देशित हुआ हूं, ----------------- -------- कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा और सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं
मैं भारत की प्रभुता और अखण्डता अक्षुण्ण रखूंगा ।" ।
II
संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के सदस्य द्वारा ली जाने वाली शपथ या प्रतिज्ञान का प्ररूप
मैं, अमुक, ..................................................... जो .............................की विधान सभा का सदस्य निर्वाचित
ईश्वर की शपथ लेता हूं
(या नामनिर्देशित) हुआ हूं, ------------------------कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं निष्ठा रखूंगा और मैं भारत की प्रभुता और अखण्डता अक्षुण्ण रखूंगा तथा जिस पद को मैं ग्रहण करने वाला हूं उसके कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक निर्वहन करुंगा ।" ।
III
संघ राज्यक्षेत्र की मंत्रि-परिषद् के सदस्य के लिए पद की शपथ का प्ररूप
ईश्वर की शपथ लेता हूं
मैं, अमुक, ......................................................................................--------------------------- कि मैं विधि द्वारा सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं विधि स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा, मैं भारत की प्रभुता और अखण्डता अक्षुण्ण रखूंगा,
मैं .....................................................संघ राज्यक्षेत्र के मंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से निर्वहन करुंगा तथा मैं भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करुंगा ।" । तथा में भया या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करुंगा ।" ।
IV
संघ राज्यक्षेत्र की मंत्रि-परिषद् के सदस्य के लिए गोपनीयता की शपथ का प्ररूप
ईश्वर की शपथ लेता हूं
मैं, अमुक, ............................................................................................ ---------------------------- कि जो सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं
विषय ........................................................................ संघ राज्यक्षेत्र के मंत्री के रूप में मेरे विचार के लिए लाया जाएगा अथवा मुझे ज्ञात होगा उसे किसी व्यक्ति या व्यक्तियों को तब के सिवाय जब कि ऐसे मंत्री के रूप में अपने कर्तव्य के सम्यक् निर्वहन के लिए ऐसा करना अपेक्षित हो, मैं, प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में संसूचित या प्रकट नहीं करुंगा ।" ।
----------
दूसरी अनुसूची
(धारा 57 देखिए)
संशोधित अधिनियमितियां
|
वर्ष |
संख्या |
संक्षिप्त नाम |
संशोधन |
|
|
(1) |
(2) |
(3) |
(4) |
|
|
1950 |
43 |
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 |
धारा 4 की उपधारा (1) में, गोवा, दमण और दीव" शब्दों का लोप किया जाएगा । |
|
|
|
|
|
धारा 13ख की उपधारा (1) में ऐसे संघ राज्यक्षेत्र" शब्दों के स्थान पर, दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र" शब्द रखे जाएंगे । |
|
|
|
|
|
धारा 13घ की उपधारा (1) तथा उपधारा (2) में, ऐसे संघ राज्यक्षेत्र" शब्दों के स्थान पर, दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र" शब्द रखे जाएंगे । |
|
|
|
|
|
धारा 27क में, - |
|
|
(i) |
उपधारा (2) का लोप किया जाएगा; |
|||
|
|
|
|
(ii) |
उपधारा (4) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी, अर्थात्: - |
|
|
|
|
|
(4) हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा और पांडिचेरी के संघ राज्यक्षेत्रों में से प्रत्येक के लिए निर्वाचकगण उस विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों से मिलकर बनेगा, जो संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 के अधीन उस राज्यक्षेत्र के लिए गठित की गई हो ।" । |
|
|
|
|
प्रथम अनुसूची में, - |
|
|
|
|
|
(i) |
प्रविष्टि 24, गोवा, दमण और दीव-2" के पश्चात्, प्रविष्टि 25, पांडिचेरी-1" अन्तःस्थापित की जाएगी और पूर्वोत्तर सीमान्त भू-भाग से संबंधित विद्यमान प्रविष्टि, प्रविष्टि 26 के रूप में पुनः संख्यांकित की जाएगी; |
|
|
|
|
(ii) |
जोड़ के स्थान पर, निम्नलिखित जोड़ प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्: - |
|
|
|
|
जोड़ ......................................................................... 508"। |
|
|
1950 |
43 |
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 |
द्वितीय अनुसूची में-नागालैंड से संबंधित प्रविष्टि 15 के पश्चात् निम्नलिखित प्रविष्टि अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्: - |
|
|
|
|
|
|
16. हिमाचल प्रदेश..................................................40 |
|
|
|
|
|
17. मणिपुर............................................................30 |
|
|
|
|
|
18. त्रिपुरा..............................................................30 |
|
|
|
|
|
19. गोवा, दमण और दीव........................................30 |
|
|
|
|
|
20. पांडिचेरी..........................................................30" । |
|
|
|
|
पंचम अनुसूची का लोप किया जाएगा । |
|
|
वर्ष |
संख्या |
संक्षिप्त नाम |
संशोधन |
|
|
(1) |
(2) |
(3) |
(4) |
|
|
1951 |
43 |
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 |
धारा 4 में गोवा, दमण और दीव को" शब्दों का लोप किया जाएगा; |
|
|
|
|
|
धारा 15 की उपधारा (2) में- |
|
|
|
|
|
(i) |
राज्यपाल" शब्द के स्थान पर यथास्थिति, राज्यपाल या प्रशासक" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे; |
|
|
|
|
(ii) |
परन्तुक में, सभा की अस्तित्वावधि का अवसान अनुच्छेद 172 के खण्ड (i) के उपबन्धों के अधीन होता" शब्दों और अंकों के स्थान पर सभा की अस्तित्वाधीन का अवसान, यथास्थिति, अनुच्छेद 172 के खण्ड (1) के उपबंधों के अधीन या संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 की धारा 5 के उपबंधों के अधीन होता" शब्द रखे जाएंगे । |
|
|
|
|
धारा 32 में चुने जाने के लिए संविधान और इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन अर्हित है" शब्दों के स्थान पर चुने जाने के लिए, यथास्थिति, संविधान और इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन या संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 के उपबंधों के अधीन अर्हित है" शब्द रखे जाएंगे । |
|
|
|
|
|
धारा 36 की उपधारा (2) के खण्ड (क) में- |
|
|
|
|
|
(i) |
191" अंक के पश्चात् आने वाले और" शब्द का लोप किया जाएगा । |
|
|
|
|
(ii) |
इस अधिनियम के भाग 2" शब्दों और अंक के स्थान पर इस अधिनियम के भाग 3 और संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 की धारा 4 और धारा 14" शब्द और अंक रखे जाएंगे । |
|
|
|
|
धारा 55 में यदि वह संविधान और इस अधिनियम के अधीन" शब्दों के स्थान पर यदि वह, यथास्थिति, संविधान और इस अधिनियम या संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 के अधीन" शब्द और अंक रखे जाएंगे । |
|
|
|
|
|
धारा 100 की उपधारा (1) के खण्ड (क) में संविधान या इस अधिनियम के" शब्दों के पश्चात् या संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 के" शब्द और अंक अन्तःस्थापित किए जाएंगे । |
|
|
1956 |
37 |
राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 |
राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 15 के- |
|
|
|
|
|
(i) |
खण्ड (घ) में महाराष्ट्र" शब्द के पश्चात्, और दादरा और नागर हवेली और गोवा, दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र" शब्द अन्तःस्थापित किए जाएंगे; |
|
|
|
|
(ii) |
खण्ड (ङ) में केरल" शब्द के पश्चात् और पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्र" शब्द अन्तःस्थापित किए जाएंगे । |
-----------------

