लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951
(1951 का अधिनियम संख्यांक 43)
[17 जुलाई, 1951]
संसद् के सदनों और हर एक राज्य के विधान-मंडल के सदन या सदनों के लिए निर्वाचनों के
संचालन के लिए, उन सदनों की सदस्यता के लिए अर्हताओं और निर्हरताओं के
लिए ऐसे निर्वाचनों में या उनसे संसक्त/भ्रष्ट ॥। आचरणों
और अन्य अपराधों के, और ऐसे निर्वाचनों
से उद्भूत या संसक्त शंकाओं और
विवादों के लिए उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
भाग 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम-यह अधिनियम लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 कहा जा सकेगा ।
2. निर्वचन-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) उस हर एक पद का, जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) की धारा 2 में या धारा 27 की उपधारा (1) में परिभाषित है किंतु इस अधिनियम में परिभाषित नहीं है, वही अर्थ होगा जो इस अधिनियम में है;
(ख) समुचित प्राधिकारी” से लोक सभा या राज्य सभा ॥। के निर्वाचन के संबंध में केन्द्रीय सरकार और राज्य की विधान सभा या विधान परिषद् के निर्वाचन के संबंध में राज्य सरकार अभिप्रेत है;
[(खख) मुख्य निर्वाचन आफिसर" से लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) की धारा 13क के अधीन नियुक्त आफिसर अभिप्रेत है;]
(ग) भ्रष्ट आचरण" से धारा 123 ॥। में विनिर्दिष्ट आचरणों में से कोई भी आचरण अभिप्रेत है;
[(गग) जिला निर्वाचन आफिसर" से लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) की धारा 13कक के अधीन पदाभिहित या नामनिर्दिष्ट आफिसर अभिप्रेत है;]
(घ) निर्वाचन" से संसद् के दोनों सदनों से किसी में के या जम्मू-कश्मीर ॥। राज्य से भिन्न किसी राज्य के विधान-मंडल के सदन या दोनों सदनों में से किसी सदन के स्थान या स्थानों को भरने के लिए निर्वाचन अभिप्रेत है;
[(ङ) निर्वाचक" से किसी निर्वाचन-क्षेत्र के संबंध में वह व्यक्ति अभिप्रेत है जिसका नाम उस निर्वाचन-क्षेत्र के लिए तत्समय प्रवृत्त निर्वाचक नामावली में प्रविष्ट है और जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) की धारा 16 में वर्णित निरर्हताओं में से किसी के अध्यधीन नहीं है;]
[(च) राजनैतिक दल" से भारत के व्यष्टिक नागरिकों का ऐसा संगम या निकाय अभिप्रेत है जो धारा 29क के अधीन राजनैतिक दल के रूप में निर्वाचन आयोग के पास रजिस्ट्रीकृत है;]
(छ) विहित" इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
[(ज) लोक अवकाश दिन" से कोई ऐसा दिन अभिप्रेत है जो परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (1881 का 26) की धारा 25 के प्रयोजनों के लिए लोक अवकाश दिन है;]
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[(झ)] हस्ताक्षर करने" से ऐसे व्यक्ति के संबंध में, जो अपना नाम लिखने में असमर्थ है, ऐसी रीति में अधिप्रमाणित करना अभिप्रेत है जैसी विहित की जाए ।
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(2) ॥। संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र, सभा निर्वाचन-क्षेत्र, परिषद् निर्वाचन-क्षेत्र, स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन-क्षेत्र, स्नातक निर्वाचन-क्षेत्र और शिक्षक निर्वाचन-क्षेत्र में से हर एक इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए विभिन्न वर्ग का निर्वाचन-क्षेत्र समझा जाएगा ।
(3) इस अधिनियम के अधीन ऐसी किसी अपेक्षा का, कि किसी प्राधिकारी द्वारा निकाली गई या बनाई गई अधिसूचना, आदेश, नियम, घोषणा, सूचना या सूची को शासकीय राजपत्र में प्रकाशित किया जाए, अर्थ जब तक कि इस अधिनियम में अन्यथा अभिव्यक्त रूप से उपबंधित न हो, ऐसे लगाया जाएगा मानो यह अपेक्षा है कि वह अधिसूचना, आदेश, नियम, घोषणा, सूचना या सूची-
(क) जहां कि वह केन्द्रीय सरकार द्वारा निकाली गई या बनाई गई है, वहां भारत के राजपत्र में प्रकाशित की जाए;
(ख) जहां कि वह राज्य सरकार द्वारा निकाली गई या बनाई गई है, वहां राज्य के शासकीय राजपत्र में प्रकाशित की जाए; तथा
(ग) जहां कि वह किसी अन्य प्राधिकारी द्वारा निकाली गई या बनाई गई है, वहां यदि वह संसद् के दोनों सदनों में से किसी के लिए निर्वाचन या उसकी सदस्यता के संबंध में है, तो भारत के राजपत्र में और यदि वह किसी राज्य के विधान-मंडल के सदन या दोनों में से किसी सदन के लिए निर्वाचन 7॥। या उसकी सदस्यता के संबंध में है, तो उस राज्य के शासकीय राजपत्र में प्रकाशित की जाए ।
(4) जहां कि इस अधिनियम के उपबंधों में से किसी के अधीन कोई बात विहित की जानी है वहां विभिन्न मामलों या मामलों के वर्गों के लिए विभिन्न उपबंध किए जा सकेंगे ।
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[8[(5)] इस अधिनियम में किसी ऐसी विधि के प्रति, जो जम्मू-कश्मीर राज्य में प्रवृत्त नहीं है, किसी निर्देश का अर्थ उस राज्य के संबंध में यह लगाया जाएगा कि वह उस राज्य में प्रवृत्त तत्समान विधि के, यदि कोई है, प्रति निर्देश है ।]
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भाग 2
[अर्हताएं और निरर्हताएं]
अध्याय 1-संसद् की सदस्यता के लिए अर्हताएं
[3. राज्य सभा की सदस्यता के लिए अर्हता-राज्य सभा में, किसी राज्य ॥। या संघ राज्यक्षेत्र के प्रतिनिधि के रूप में चुने जाने के लिए कोई व्यक्ति तब तक अर्हित न होगा जब तक कि वह [भारत में] संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक न हो ।]
4. लोक सभा की सदस्यता के लिए अर्हताएं-लोक सभा ॥। में किसी स्थान को भरने के लिए चुने जाने के लिए कोई व्यक्ति तब तक अर्हित न होगा जब तक कि-
(क) अनुसूचित जातियों के लिए किसी राज्य में आरक्षित स्थान की दशा में, वह उस राज्य की या किसी अन्य राज्य की अनुसूचित जातियों में से किसी का सदस्य न हो और किसी संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक न हो;
(ख) (असम के स्वशासी जिलों में की अनुसूचित जनजातियों से भिन्न) अनुसूचित जनजातियों के लिए किसी राज्य में आरक्षित स्थान की दशा में वह (असम के जनजाति क्षेत्रों का अपवर्जन करके) उस राज्य की या किसी अन्य राज्य की अनुसूचित जनजातियों में से किसी का सदस्य न हो और किसी संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक न हो;
(ग) असम के स्वशासी जिलों में की अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित स्थान की दशा में, वह उन अनुसूचित जनजातियों में से किसी का सदस्य न हो और उस संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र के लिए जिसमें ऐसा स्थान आरक्षित है या किसी ऐसे स्वशासी जिले को समाविष्ट करने वाले अन्य संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक न हो; ॥।
[(गग) [लक्षद्वीप] के संघ राज्यक्षेत्र में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित स्थान की दशा में, वह उन अनुसूचित जनजातियों में से किसी का सदस्य न हो और उस संघ राज्यक्षेत्र के संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक न हो; ॥।]
[(गगग) सिक्किम राज्य को आबंटन में मिले स्थान की दशा में, वह सिक्किम के संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक न हो, तथा]
(घ) किसी अन्य स्थान की दशा में, वह किसी संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक न हो ।
अध्याय 2-राज्य विधान-मंडलों की सदस्यता के लिए अर्हताएं
5. विधान सभा की सदस्यता के लिए अर्हताएं-किसी राज्य की विधान सभा में के स्थान को भरने के लिए चुने जाने के लिए कोई व्यक्ति तब तक अर्हित न होगा जब तक कि-
(क) उस राज्य की अनुसूचित जातियों के लिए या अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित स्थान की दशा में, वह, यथास्थिति, उन जातियों में से या उन जनजातियों में से किसी का सदस्य न हो और उस राज्य में के किसी सभा निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक न हो;
(ख) असम ॥। के किसी स्वशासी जिले के लिए आरक्षित स्थान की दशा में, वह [किसी स्वशासी जिले की अनुसूचित जनजाति] का सदस्य न हो और उन सभा निर्वाचन-क्षेत्र के लिए, जिसमें उस जिले के लिए ऐसा स्थान या कोई अन्य स्थान आरक्षित है निर्वाचक न हो, तथा
(ग) किसी अन्य स्थान की दशा में वह उस राज्य में के किसी सभा निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक न हो:
[परन्तु अनुच्छेद 371 के खण्ड (2) में निर्दिष्ट कालावधि के लिए कोई व्यक्ति तब तक नागालैण्ड की विधान सभा में ट्यूनसांग जिले को आबंटित किसी स्थान को भरने के लिए चुने जाने के लिए अर्हित नहीं होगा जब तक कि वह उस अनुच्छेद में निर्दिष्ट प्रादेशिक परिषद् का सदस्य न हो ।]
[5क. सिक्किम की विधान सभा की सदस्यता के लिए अर्हताएं- [(1)] धारा 5 में किसी बात के होते हुए भी, सिक्किम की विधान सभा में (जो संविधान के अधीन उस राज्य की सम्यक्त रूप से गठित विधान सभा समझी जाती है) स्थान को भरने के लिए चुने जाने के लिए कोई व्यक्ति तब तक अर्हित नहीं होगा जब तक कि वह-
(क) भूटिया-लेप्चा उद्भव के सिक्किमियों के लिए आरक्षित स्थान की दशा में, या तो भूटिया या लेप्चा उद्भव का व्यक्ति न हो और राज्य में किसी ऐसे सभा निर्वाचन-क्षेत्र के लिए, जो संघों के लिए आरक्षित निर्वाचन-क्षेत्र से भिन्न है, निर्वाचक न हो;
(ख) नेपाली उद्भव के सिक्किमियों के लिए आरक्षित स्थान की दशा में, नेपाली उद्भव का व्यक्ति न हो और राज्य में किसी सभा निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक न हो;
(ग) अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित स्थान की दशा में, रिप्रजेंटेशन आफ सिक्किम सब्जेक्ट्स ऐक्ट, 1974 में विनिर्दिष्ट जातियों में से किसी जाति का सदस्य न हो और राज्य में किसी सभा निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक न हो; तथा
(घ) संघों के लिए आरक्षित स्थान की दशा में संघ निर्वाचन-क्षेत्र का निर्वाचक न हो ।]
[(2) धारा 5 में किसी बात के होते हुए भी, सिक्किम राज्य की विधान सभा में, जो लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1980 के प्रारम्भ के पश्चात् किसी भी समय गठित की जानी है, स्थान को भरने के लिए चुने जाने के लिए कोई व्यक्ति तब तक अर्हित नहीं होगा जब तक कि वह-
(क) भूटिया-लेप्चा उद्भव के सिक्किमियों के लिए आरक्षित स्थान की दशा में, या तो भूटिया या लेप्चा उद्भव का व्यक्ति न हो और राज्य में किसी ऐसे सभा निर्वाचन-क्षेत्र के लिए, जो संघों के लिए आरक्षित निर्वाचन-क्षेत्र से भिन्न है, निर्वाचक न हो;
(ख) अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित स्थान की दशा में, सिक्किम राज्य में उन जातियों में से किसी का सदस्य न हो और राज्य में किसी सभा निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक न हो;
(ग) संघों के लिए आरक्षित स्थान की दशा में, संघ निर्वाचन-क्षेत्र का निर्वाचक न हो;
(घ) किसी अन्य स्थान की दशा में, राज्य में के किसी सभा निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक न हो ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा में, भूटिया" के अन्तर्गत चूम्बिपा, डोप्थापा, दकपा, कगाते, शेरपा, तिब्बती, टोमोपा और योल्मो भी है ।]
6. विधान परिषद् की सदस्यता के लिए अर्हताएं-(1) किसी राज्य की विधान परिषद् में के उस स्थान को भरने के लिए, जो निर्वाचन द्वारा भरा जाना है, चुने जाने के लिए कोई व्यक्ति तब तक अर्हित न होगा जब तक कि वह उस राज्य में के किसी सभा निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक न हो ।
(2) किसी राज्य की विधान परिषद् में के उस स्थान को भरने के लिए, जो राज्यपाल ॥। द्वारा नामनिर्देशन द्वारा भरा जाना है, चुने जाने के लिए कोई व्यक्ति तब तक अर्हित न होगा जब तक कि वह उस राज्य में मामूली तौर से निवासी न हो ।
[अध्याय 3-संसद् और राज्य विधान-मंडलों की सदस्यता के लिए निरर्हताएं
7. परिभाषाएं-इस अध्याय में-
(क) समुचित सरकार" से संसद् के दोनों सदनों में से किसी का सदस्य चुने जाने या सदस्य होने या रहने के लिए किसी निरर्हता के सम्बन्ध में केन्द्रीय सरकार तथा किसी राज्य की विधान सभा या विधान परिषद् का सदस्य चुने जाने या सदस्य होने या रहने के लिए किसी निरर्हता के सम्बन्ध में वह राज्य सरकार अभिप्रेत है;
(ख) निरर्हित" से [इस अध्याय के उपबंधों के अधीन और न कि किसी अन्य आधार परट संसद् के दोनों सदनों से किसी का या किसी राज्य की विधान सभा या विधान परिषद् का सदस्य चुने जाने और सदस्य होने या रहने के लिए निरर्हित अभिप्रेत है ।
8. कतिपय अपराधों के लिए दोषसिद्धि पर निरर्हता- [(1) निम्नलिखित के अधीन दंडनीय किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया व्यक्ति [जहां सिद्धदोष ठहराया गया व्यक्ति-
(i) केवल जुर्माने से दंडादिष्ट किया जाता है, वहां ऐसी दोषसिद्धि की तारीख से छह वर्ष की कालावधि के लिए निरर्हित होगा;
(ii) कारावास से दंडादिष्ट किया जाता है, वहां ऐसी दोषसिद्धि की तारीख से निरर्हित होगा और उसके छोड़े जाने से छह वर्ष की अतिरिक्त कालावधि के लिए निरर्हित बना रहेगा], अर्थात्: -
(क) भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 153क (धर्म, मूलवंश, जन्म-स्थान, निवास-स्थान, भाषा, इत्यादि के आधारों पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता का संप्रवर्तन और सौहार्द्र बने रहने पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले कार्य करने का अपराध) या धारा 171ङ (रिश्वत का अपराध) या धारा 171च (निर्वाचनों में असम्यक्त असर डालने या प्रतिरूपण का अपराध) या धारा 376 की उपधारा (1) या उपधारा (2) या धारा 376क या धारा 376ख या धारा 376ग या धारा 376घ (बलात्संग से संबंधित अपराध), या धारा 498क (किसी स्त्री के पति या पति के नातेदार द्वारा उसके प्रति क्रूरता करने का अपराध), या धारा 505 की उपधारा (2) या उपधारा (3) या (विभिन्न वर्गों में शत्रुता, घृणा या वैमनस्य पैदा या संप्रवर्तित करने वाले कथन अथवा किसी पूजा के स्थान में या किसी जमाव में, जो धार्मिक पूजा या धार्मिक कर्म करने में लगा हुआ हो, ऐसा कथन करने से संबंधित अपराध) ;
(ख) सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 (1955 का 22) जो अस्पृश्यता" का प्रचार और आचरण करने और उससे उपजी किसी निर्योग्यता को लागू करने के लिए दंड का उपबंध करता है; या
(ग) सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) (प्रतिषिद्ध माल का आयात या निर्यात करने का अपराध); या
(घ) विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 (1967 का 37) की धारा 10 से धारा 12 तक (विधिविरुद्ध घोषित किए गए किसी संगम का सदस्य होने का अपराध, किसी विधिविरुद्ध संगम की निधियों के बरतने से संबंधित अपराध या किसी अधिसूचित स्थान के संबंध में किए गए आदेश के उल्लंघन से संबंधित अपराध); या
(ङ) विदेशी मुद्रा (विनियमन) अधिनियम, 1973 (1973 का 46); या
(च) स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (1985 का 61); या
(छ) आतंकवादी और विध्वंसकारी क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1987 (1987 का 28) की धारा 3 (आतंकवादी कार्य करने का अपराध) या धारा 4 (विध्वंसकारी क्रियाकलाप करने का अपराध); या
(ज) धार्मिक संस्था (दुरुपयोग निवारण) अधिनियम, 1988 (1988 का 41) की धारा 7 (धारा 3 से धारा 6 तक के उपबंधों के उल्लंघन का अपराध); या
(झ) इस अधिनियम की धारा 125 (निर्वाचन के संबंध में वर्गों के बीच शत्रुता संप्रवर्तित करने का अपराध) या धारा 135 (मतदान केन्द्रों से मतपत्रों को हटाने का अपराध) या धारा 135क (बूथों के बलात् ग्रहण का अपराध) या धारा 136 की उपधारा (2) का खंड (क) (किसी नामनिर्देशन को कपटपूर्वक विरूपित करने या कपटपूर्वक नष्ट करने का अपराध); [या]
1[(ञ) उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 की धारा 6 (किसी उपासना स्थल के संपरिवर्तन का अपराध)]; [या]
[(ट) राष्ट्र-गौरव अपमान-निवारण अधिनियम, 1971 (1971 का 69) की धारा 2 (भारतीय राष्ट्रीय ध्वज या भारत के संविधान का अपमान करने का अपराध) या धारा 3 (राष्ट्रगान के गायन को रोकने का अपराध)] [; या]
4[(ठ) सती (निवारण) अधिनियम, 1987 (1988 का 3); या
(ड) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (1988 का 49); या
(ढ) आंतकवाद निवारण अधिनियम, 2002 (2002 का 15) ।]
(2) कोई व्यक्ति जो-
(क) जमाखोरी या मुनाफाखोरी का निवारण करने का उपबंध करने वाली किसी विधि; या
(ख) खाद्य या ओषधि के अपमिश्रण से संबंधित किसी विधि; या
(ग) दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 (1961 का 28) के किन्ही उपबंधों; ॥।
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के उल्लंघन के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है और छह मास से अन्यून के कारावास से दंडादिष्ट किया गया है, वह ऐसी दोषसिद्धि की तारीख से निरर्हित होगा और अपने छोड़े जाने से छह वर्ष की अतिरिक्त कालावधि के लिए निरर्हित बना रहेगा ।
(3) कोई व्यक्ति जो [उपधारा (1) या उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी अपराध से भिन्नट किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है और दो वर्ष से अन्यून के कारावास से दंडादिष्ट किया गया है, ऐसी दोषसिद्धि की तारीख से निरर्हित होगा और उसे छोड़े जाने से छह वर्ष की अतिरिक्त कालावधि के लिए निरर्हित बना रहेगा ।]
[(4)] [ उपधारा (1), उपधारा (2) या उपधारा (3) में] किसी बात के होते हुए भी दोनों उपधाराओं में से किसी के अधीन निरर्हता उस व्यक्ति की दशा में जो दोषसिद्धि की तारीख को संसद् का या राज्य के विधान-मंडल का सदस्य है, तब तक प्रभावशील नहीं होगी जब तक उस तारीख से तीन मास न बीत गए हों, अथवा, यदि उस कालावधि के भीतर उस दोषसिद्धि या दंडादेश की बाबत अपील या पुनरीक्षण के लिए आवेदन किया गया है तो जब तक न्यायालय द्वारा उस अपील या आवेदन का निपटारा न हो गया हो ।
स्पष्टीकरण-इस धारा में-
(क) जमाखोरी या मुनाफाखोरी के निवारण के लिए उपबंध करने वाली विधि" से कोई ऐसी विधि या विधि का बल रखने वाला कोई ऐसा आदेश, नियम या अधिसूचना अभिप्रेत है जो निम्नलिखित के लिए उपबंध करती है-
(i) किसी आवश्यक वस्तु के उत्पादन या विनिर्माण का विनियमन,
(ii) उस कीमत का नियंत्रण जिस पर कोई आवश्यक वस्तु खरीदी या बेची जा सके,
(iii) किसी आवश्यक वस्तु के अर्जन, कब्जे, भंडारकरण, परिवहन, वितरण, व्ययन, उपयोग या उपभोग का विनियमन,
(iv) किसी ऐसी आवश्यक वस्तु के विधारण का प्रतिषेध, जो मामूली तौर पर विक्रय के लिए रखा जाता है;
(ख) ओषधि" का वह अर्थ है जो उसे ओषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 (1940 का 23) में समनुदिष्ट है;
(ग) आवश्यक वस्तु" का वह अर्थ है जो उसे आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 (1955 का 10) में समनुदिष्ट है;
(घ) खाद्य" का वह अर्थ है जो उसे खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954 (1954 का 37) में समनुदिष्ट है ।
[8क. भ्रष्ट आचरण के लिए निरर्हता-(1) धारा 99 के अधीन किसी आदेश द्वारा भ्रष्ट आचरण के दोषी ठहराए गए प्रत्येक व्यक्ति का मामला, [ऐसे आदेश के प्रभावशील होने की तारीख से तीन मास की अवधि के भीतर यथाशक्य शीघ्र,] ऐसे प्राधिकारी द्वारा, जिसे केन्द्रीय सरकार उस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, इस प्रश्न का अवधारण करने के लिए राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाएगा कि क्या ऐसा व्यक्ति निरर्हित किया जाए और यदि किया जाए तो कितनी कालावधि के लिए:
परन्तु वह कालावधि जिसके लिए कोई व्यक्ति इस उपधारा के अधीन निरर्हित किया जा सकेगा, किसी भी दशा में उस तारीख से छह वर्ष से अधिक नहीं होगी जिसको धारा 99 के अधीन उसके संबंध में किया गया आदेश प्रभावशील होता है ।
(2) कोई व्यक्ति जो इस अधिनियम की धारा 8क के अधीन, जैसी कि वह निर्वाचन विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 (1975 का 40) के आरम्भ के ठीक पहले थी, निरर्हित हो गया है, यदि ऐसी निरर्हता की कालावधि समाप्त नहीं हो गई है तो, उक्त कालावधि के शेष भाग के लिए ऐसी निरर्हता के हटाए जाने के लिए राष्ट्रपति को अर्जी प्रस्तुत कर सकेगा ।
(3) उपधारा (1) में वर्णित किसी प्रश्न या उपधारा (2) के अधीन प्रस्तुत की गई किसी अर्जी पर विनिश्चय देने से पूर्व राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग से किसी ऐसे प्रश्न और अर्जी पर राय लेगा और उस राय के अनुसार, कार्य करेगा ।]
9. भ्रष्टाचार या अभक्ति के लिए पदच्युत होने पर निरर्हता-(1) वह व्यक्ति, जो भारत सरकार के अधीन या किसी राज्य की सरकार के अधीन पद धारण करते हुए भ्रष्टाचार के कारण या राज्य के प्रति अभक्ति के कारण पदच्युत किया गया है, ऐसी पदच्युति की तारीख से पांच वर्ष की कालावधि के लिए निरर्हित होगा ।
(2) उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए निर्वाचन आयोग द्वारा निकाला गया इस भाव का प्रमाणपत्र कि कोई व्यक्ति भारत सरकार के अधीन या किसी राज्य सरकार के अधीन पद धारण करते हुए भ्रष्टाचार के कारण या राज्य के प्रति अभक्ति के कारण पदच्युत किया गया था या नहीं, उस तथ्य का निश्चायक सबूत होगा:
परन्तु इस भाव का कोई भी प्रमाणपत्र कि कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार या राज्य के प्रति अभक्ति के कारण पदच्युत किया गया है, तब तक नहीं निकाला जाएगा जब तक कि उक्त व्यक्ति को सुने जाने का अवसर न दे दिया गया हो ।
9क. सरकार के साथ की गई संविदाओं आदि के लिए निरर्हता-कोई भी व्यक्ति निरर्हित होगा यदि और जब तक कोई ऐसी संविदा विद्यमान है जो उसने समुचित सरकार के साथ अपने व्यापार या कारबार के अनुक्रम में उस सरकार को माल का प्रदाय करने के लिए या उस सरकार द्वारा उपक्रांत किन्ही संकर्मों के निष्पादन के लिए की है ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, जहां कि कोई संविदा उस व्यक्ति द्वारा, जिसके द्वारा वह समुचित सरकार के साथ की गई थी, पूर्णतया निष्पादित कर दी गई है, वहां उस संविदा के बारे में केवल इस तथ्य के कारण कि सरकार ने उस संविदा के अपने भाग का पूर्णतः या भागतः पालन नहीं किया है यह नहीं समझा जाएगा कि वह विद्यमान है ।
10. सरकारी कम्पनी के अधीन पद के लिए निरर्हता-कोई भी व्यक्ति निरर्हित होगा यदि और जब तक वह (सहकारी सोसाइटी से भिन्न) किसी ऐसी कम्पनी या निगम का जिसकी पूंजी में समुचित सरकार का पच्चीस प्रतिशत से अन्यून अंश है, प्रबंध अभिकर्ता, प्रबंधक या सचिव है ।
[10क. निर्वाचन व्ययों का लेखा दाखिल करने में असफलता के कारण निरर्हता-यदि निर्वाचन आयोग का समाधान हो जाता है कि कोई व्यक्ति-
(क) निर्वाचन व्ययों का लेखा उस समय के भीतर और उस रीति में जैसी इस अधिनियम के द्वारा या अधीन अपेक्षित है, दाखिल करने में असफल रहा है; तथा
(ख) उस असफलता के लिए कोई अच्छा कारण या न्यायोचित्य नहीं रखता है,
तो निर्वाचन आयोग शासकीय राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा उसको निरर्हित घोषित करेगा और ऐसा व्यक्ति उस आदेश की तारीख से तीन वर्ष की कालावधि के लिए निरर्हित होगा ।
11. निरर्हता की कालावधि को हटाना या कम करना-निर्वाचन आयोग उन कारणों के लिए, जो अभिलिखित किए जाएंगे इस अध्याय के अधीन [(सिवाय धारा 8क) के अधीन,] की किसी निरर्हता को हटा सकेगा या ऐसी किसी निरर्हता की कालावधि को कम कर सकेगा ।
अध्याय 4-मत देने के लिए निरर्हताएं
1[11क. दोषसिद्धि और भ्रष्ट आचरणों से उद्भूत निरर्हता- [(1)] यदि कोई व्यक्ति इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात्-
॥। भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 171ङ या धारा 171च अथवा इस अधिनियम की धारा 125 या धारा 135 के अधीन या धारा 136 की उपधारा (2) के खंड (क) के अधीन दंडनीय किसी अपराध का सिद्धदोष ठहराया गया है, ॥।
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तो वह, दोषसिद्धि की तारीख से या उस तारीख से जिसको वह आदेश प्रभावशील होता है, छह वर्ष की कालावधि के लिए, किसी भी निर्वाचन में मत देने से निरर्हित होगा ।
[(2) धारा 8 की उपधारा (1) के अधीन राष्ट्रपति के किसी आदेश द्वारा किसी कालावधि के लिए निरर्हित व्यक्ति, किसी निर्वाचन में मत देने से उसी कालावधि के लिए निरर्हित होगा ।
(3) किसी व्यक्ति द्वारा संसद् के किसी सदन का या किसी राज्य की विधान सभा या विधान परिषद् का सदस्य चुने जाने और सदस्य होने या रहने के लिए किसी निरर्हता की बाबत धारा 8क की उपधारा (2) के अधीन प्रस्तुत की गई किसी अर्जी पर राष्ट्रपति का विनिश्चय, जहां तक हो सके इस अधिनियम की धारा 11क की उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन, जैसा कि वह निर्वाचन विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 (1975 का 40) के प्रारम्भ के ठीक पहले था, किसी निर्वाचन में मत देने के लिए उसके द्वारा उपगत निरर्हता की बाबत, उसी प्रकार लागू होगा मानो ऐसा विनिश्चय मत देने के लिए उक्त निरर्हता की बाबत विनिश्चय हो।]
1[11ख. निरर्हताओं का हटाया जाना-निर्वाचन आयोग उन कारणों के लिए, जो अभिलिखित किए जाएंगे, [धारा 11क की उपधारा (1) के अधीन किसी निरर्हता] को हटा सकेगा ।]
[भाग 3
साधारण निर्वाचनों की अधिसूचना
12. राज्य सभा के द्विवार्षिक निर्वाचन के लिए अधिसूचना-राज्य सभा के उन सदस्यों के स्थानों को भरने के प्रयोजन के लिए, जो अपनी पदावधि के अवसान के पश्चात् निवृत्त हो रहे हैं, राष्ट्रपति ऐसी तारीख या तारीखों को, जिसकी सिफारिश निर्वाचन आयोग द्वारा की जाए, भारत के राजपत्र में प्रकाशित एक या अधिक अधिसूचनाओं द्वारा हर एक संपृक्त राज्य को, यथास्थिति, विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों से या निर्वाचकगण के सदस्यों से अपेक्षा करेगा कि वे इस अधिनियम के और तद्धीन बनाए गए नियमों और किए गए आदेशों के उपबंधों के अनुसार सदस्य निर्वाचित करे :
परन्तु इस धारा के अधीन कोई भी अधिसूचना उस तारीख से तीन मास से अधिक पूर्व न निकाली जाएगी जिस तारीख को निवृत्त होने वाले सदस्यों की पदावधि का अवसान होना है ।
[12क. राज्य सभा में सिक्किम राज्य को आबंटन में मिले स्थान को भरने के लिए निर्वाचन की अधिसूचना-राज्य सभा में सिक्किम राज्य को संविधान (छत्तीसवां संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा आबंटन में मिले स्थान को प्रथम बार भरने के प्रयोजन के लिए राष्ट्रपति, भारत के राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना द्वारा ऐसी तारीख को, जिसकी सिफारिश निर्वाचन आयोग द्वारा की जाए, सिक्किम राज्य की विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों से अपेक्षा करेगा कि वे इस अधिनियम के और उसके अधीन बनाए गए नियमों तथा आदेशों के उपबंधों के अनुसरण में एक सदस्य को निर्वाचित करें और इस प्रकार से किया गया निर्वाचन सभी प्रयोजनों और आशय के लिए धारा 12 के अधीन किया गया निर्वाचन समझा जाएगा।]
13. [कुछ संघ राज्यक्षेत्रों के लिए निर्वाचकगण के पुनर्गठन की अधिसूचना ।]-क्षेत्रीय परिषद् अधिनियम, 1956 (1956 का 103) की धारा 66 द्वारा निरसित ।
14. लोक सभा के साधारण निर्वाचन के लिए अधिसूचना-(1) नई लोक सभा गठित करने के प्रयोजन के लिए साधारण निर्वाचन वर्तमान सदन की अस्तित्वावधि के अवसान पर या उसके विघटन पर किया जाएगा ।
(2) उक्त प्रयोजन के लिए राष्ट्रपति ऐसी तारीख या तारीखों को, जिनकी सिफारिश निर्वाचन आयोग द्वारा की जाए, भारत के राजपत्र में प्रकाशित एक या अधिक अधिसूचनाओं द्वारा सब संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों से अपेक्षा करेगा कि वे इस अधिनियम के और तद्धीन बनाए गए नियमों और किए गए आदेशों के उपबंधों के अनुसार सदस्य निर्वाचित करें:
परन्तु जहां कि वर्तमान लोक सभा के विघटन पर होने से अन्यथा साधारण निर्वाचन होता है वहां ऐसी कोई अधिसूचना उस तारीख से, जिसको सदन की अस्तित्वावधि का अवसान अनुच्छेद 83 के खंड (2) के उपबंधों के अधीन होता, पूर्व के छह मास के पहले न निकाली जाएगी ।
2[14क. विद्यमान लोक सभा में सिक्किम राज्य के प्रतिनिधि का निर्वाचन करने के लिए अधिसूचना-लोक सभा में सिक्किम राज्य के प्रतिनिधि का निर्वाचन करने के प्रयोजन के लिए, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 371च के खंड (ङ) में विनिर्दिष्ट है, निर्वाचन आयोग सिक्किम राज्य की विधान सभा के सदस्यों से अपेक्षा करेगा कि वे इस अधिनियम के और उसके अधीन बनाए गए नियमों और आदेशों के ऐसे उपबंधों के अनुसरण में, जो राज्य सभा के सदस्यों के निर्वाचन के लिए लागू हैं, प्रतिनिधि निर्वाचित करें ।]
15. राज्य की विधान सभा के लिए साधारण निर्वाचन के लिए अधिसूचना-(1) नई विधान सभा गठित करने के प्रयोजन के लिए, साधारण निर्वाचन वर्तमान सभा की अस्तित्वावधि के अवसान पर या उसके विघटन पर किया जाएगा ।
(2) उक्त प्रयोजन के लिए [यथास्थिति, राज्यपाल या प्रशासक] ॥। ऐसी तारीख या तारीखों को, जिनकी सिफारिश निर्वाचन आयोग द्वारा की जाए, राज्य के शासकीय राजपत्र में प्रकाशित एक या अधिक अधिसूचनाओं द्वारा राज्य में के सब सभा निर्वाचन-क्षेत्रों से अपेक्षा करेगा कि वे इस अधिनियम के और तद्धीन बनाए गए नियमों और किए गए आदेशों के उपबंधों के अनुसार सदस्य निर्वाचित करें:
परन्तु जहां कि वर्तमान विधान सभा के विघटन पर होने से अन्यथा साधारण निर्वाचन होता है वहां ऐसी कोई अधिसूचना उस तारीख से, जिसको सभा की अस्तित्वावधि का अवसान [यथास्थिति] अनुच्छेद 172 के खंड (1) 4॥। उपबंधों के अधीन 5[या संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 (1963 का 20) की धारा 5 के उपबंधों के अधीन होता, पूर्व के छह मास से पहले न निकाली जाएगी ।]
[15क. विधान परिषदों के कतिपय निर्वाचनों के लिए अधिसूचना-राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 (1956 का 37) के अधीन मध्य प्रदेश राज्य की विधान परिषद् के गठन और [आंध्र प्रदेश विधान परिषद् अधिनियम, 2005 (2006 का 1) के अधीन] आंध्र प्रदेश राज्य की विधान परिषद् के गठन [और तमिलनाडु विधान परिषद् अधिनियम, 2010 (2010 का 16) के अधीन तमिलनाडु राज्य की विधान परिषद् के गठनट [और आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 के अधीन तेलंगाना राज्य की विधान परिषद् के गठनट के प्रयोजन के लिए पूर्वोक्त राज्यों में से हर एक का राज्यपाल, ऐसी तारीख या तारीखों, जिनकी सिफारिश निर्वाचन आयोग द्वारा की जाए, राज्य के शासकीय राजपत्र में प्रकाशित एक या अधिक अधिसूचनाओं द्वारा, राज्य की विधान सभा के सदस्यों से और सब परिषद् निर्वाचन-क्षेत्रों से अपेक्षा करेगा कि वे इस अधिनियम के और तद्धीन बनाए गए नियमों और किए गए आदेशों के उपंबंधों के अनुसार सदस्य निर्वाचित करें ।]
16. राज्य विधान परिषद् के द्विवार्षिक निर्वाचन के लिए अधिसूचना-राज्य की विधान परिषद् के उन सदस्यों के स्थानों को भरने के प्रयोजन के लिए, जो अपनी पदावधि के अवसान के पश्चात् निवृत्त हो रहे हैं, राज्यपाल ॥। ऐसी तारीख या तारीखों को, जिनकी सिफारिश निर्वाचन आयोग द्वारा की जाए, राज्य के शासकीय राजपत्र में प्रकाशित एक या अधिक अधिसूचनाओं द्वारा राज्य की विधान सभा के सदस्यों से और संपृक्त सब परिषद् निर्वाचन-क्षेत्रों से अपेक्षा करेगा कि वे इस अधिनियम के और तद्धीन बनाए गए नियमों और किए गए आदेशों के उपबंधों के अनुसार सदस्य निर्वाचित करें :
परन्तु इस धारा के अधीन कोई भी अधिसूचना उस तारीख से तीन मास से अधिक पूर्व न निकाली जाएगी जिस तारीख को निवृत्त होने वाले सदस्यों की पदावधि का अवसान होना है ।]
भाग 4
निर्वाचनों के संचालन के लिए प्रशासनिक मशीनरी
19. परिभाषा-इस भाग में और 5 में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, निर्वाचन क्षेत्र" से ॥। संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र या सभा निर्वाचन-क्षेत्र या परिषद् निर्वाचन-क्षेत्र अभिप्रेत है ।
[19क. निर्वाचन आयोग के कृत्यों का प्रत्यायोजन-संविधान के, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) के और इस अधिनियम के या तद्धीन बनाए गए नियमों के अधीन, निर्वाचन आयोग के कृत्यों का, उपनिर्वाचन आयुक्त द्वारा या निर्वाचन आयोग के सचिव द्वारा भी ऐसे साधारण या विशेष निदेशों के अध्यधीन, यदि कोई हों, जो निर्वाचन आयोग द्वारा इस निमित्त दिए जाएं, पालन किया जा सकेगा ।]
[20. मुख्य निर्वाचन आफिसरों के साधारण कर्तव्य-निर्वाचन आयोग के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण के अध्यधीन रहते हुए हर एक राज्य का मुख्य निर्वाचन आफिसर उस राज्य में इस अधिनियम के अधीन के सब निर्वाचनों के संचालन का पर्यवेक्षण करेगा ।
[20क. जिला निर्वाचन आफिसर के साधारण कर्तव्य-(1) मुख्य निर्वाचन आफिसर के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण के अध्यधीन रहते हुए, जिला निर्वाचन आफिसर उस जिले में या अपनी अधिकारिता के भीतर के क्षेत्र में संसद् और राज्य के विधान-मण्डल के सब निर्वाचनों के संचालन के संसद् में सब काम का समन्वय और पर्यवेक्षण करेगा ।
(2) जिला निर्वाचन आफिसर ऐसे अन्य कृत्यों का भी पालन करेगा जो उसे निर्वाचन आयोग और मुख्य निर्वाचन आफिसर द्वारा न्यस्त किए जाएं ।]
[20ख. प्रेक्षक-(1) निर्वाचन आयोग, एक प्रेक्षक का, जो सरकार का अधिकारी होगा, किसी निर्वाचन-क्षेत्र या निर्वाचन-क्षेत्रों के समूह में निर्वाचन या निर्वाचनों के संचालन की निगरानी करने के लिए और ऐसे अन्य कृत्यों का पालन करने के लिए जो निर्वाचन आयोग द्वारा सौंपे जाएं, नामनिर्देशन कर सकेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन नामनिर्देशित प्रेक्षक को उस निर्वाचन-क्षेत्र के या ऐसे निर्वाचन-क्षेत्रों में से किसी के, जिसके लिए उसे नामनिर्देशित किया गया है, रिटर्निंग आफिसर को परिणाम की घोषणा के पूर्व किसी भी समय मतों की गणना रोक देने या परिणाम को घोषित न करने के लिए निदेश देने की शक्ति होगी, यदि प्रेक्षक की राय में बहुत से मतदान केन्द्रों में अथवा मतदान के लिए नियत स्थानों में या मतों की गणना के लिए नियत स्थानों में बूथों का बलात् ग्रहण किया गया है या किसी मतदान केन्द्र में या मतदान के लिए नियत किसी स्थान में प्रयुक्त किन्हीं मतपत्रों को रिटर्निंग आफिसर की अभिरक्षा में से विधिविरुद्धतया निकाल लिया गया है या घटनावश या साशय विनष्ट कर दिया गया है या खो दिया गया है या उस सीमा तक उन्हें नुकसान पहुंचाया गया है या उनमें गड़बड़ की गई है कि उस मतदान केन्द्र या स्थान पर मतदान का परिणाम अभिनिश्चित नहीं किया जा सकता है ।
(3) जहां किसी प्रेक्षक ने इस धारा के अधीन रिटर्निंग आफिसर को मतों की गणना रोकने या परिणाम की घोषणा न करने का निदेश दिया गया है, वहां प्रेक्षक, उस मामले की रिपोर्ट तुरन्त निर्वाचन आयोग को करेगा और ऐसा होने पर निर्वाचन आयोग, सभी तात्त्विक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर, धारा 58क या धारा 64क या धारा 66 के अधीन समुचित निर्देश देगा ।
स्पष्टीकरण-उपधारा (2) और उपधारा (3) के प्रयोजनों के लिए, प्रेक्षक" के अन्तर्गत प्रादेशिक आयुक्त या निर्वाचन आयोग का कोई ऐसा अधिकारी है, जिसे आयोग द्वारा इस धारा के अधीन किसी निर्वाचन-क्षेत्र में या निर्वाचन-क्षेत्रों के समूह में निर्वाचन या निर्वाचनों के संचालन की निगरानी करने का कर्तव्य सौंपा गया है ।]
21. रिटर्निंग आफिसर-निर्वाचन आयोग, हर निर्वाचन-क्षेत्र के लिए राज्य सभा में के स्थान या स्थानों को भरने के लिए हर निर्वाचन के लिए और राज्य की विधान सभा के सदस्य द्वारा राज्य की विधान परिषद् में के स्थान या स्थानों को भरने के लिए हर निर्वाचन के लिए, राज्य की सरकार के परामर्श से, एक रिटर्निंग आफिसर पदाभिहित या नामनिर्दिष्ट करेगा जो [सरकार का या स्थानीय प्राधिकारी का आफिसर] ही होगा:
परन्तु एक निर्वाचन-क्षेत्र से अधिक के लिए उसी व्यक्ति को रिटर्निंग आफिसर पदाभिहित या नामनिर्दिष्ट करने से निर्वाचन आयोग को इस धारा की कोई बात निवारित न करेगी ।]
22. सहायक रिटर्निंग आफिसर-(1) निर्वाचन आयोग किसी रिटर्निंग आफिसर की उसके कृत्यों के पालन में सहायता करने के लिए एक या अधिक व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगा:
परंतु हर ऐसा व्यक्ति 1[सरकार का या स्थानीय प्राधिकारी का आफिसरट ही होगा ।
(2) हर सहायक रिटर्निंग आफिसर, रिटर्निंग आफिसर के नियंत्रण के अध्यधीन रहते हुए, रिटर्निंग आफिसर के सब कृत्यों या उनमें से किसी का भी पालन करने के लिए सक्षम होगा:
परन्तु रिटर्निंग आफिसर के जो कृत्य ॥॥ नामनिर्देशनों की संवीक्षा ॥। से सम्बद्ध हैं उनमें से किसी को कोई सहायक रिटर्निंग आफिसर तब तक न करेगा जब तक कि रिटर्निंग आफिसर उक्त कृत्य को करने से अपरिवर्जनीयतः निवारित न हो जाए ।
23. रिटर्निंग आफिसर के अन्तर्गत रिटर्निंग आफिसर के कृत्यों का पालन करने वाले सहायक रिटर्निंग आफिसर आएंगे-इस अधिनियम में रिटर्निंग आफिसर के प्रति निर्देशों के अन्तर्गत, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, उस किसी कृत्य का पालन करने वाला सहायक रिटर्निंग आफिसर आता है जिस कृत्य का पालन करने के लिए वह धारा 22 की उपधारा (2) के अधीन प्राधिकृत है, यह समझा जाएगा ।
24. रिटर्निंग आफिसर का साधारण कर्तव्य-किसी भी निर्वाचन में रिटर्निंग आफिसर का यह साधारण कर्तव्य होगा कि वह वे सब कार्य और बातें करे जो इस अधिनियम और तद्धीन बनाए गए नियमों और किए गए आदेशों द्वारा उपबन्धित रीति में निर्वाचन का प्रभावी रूप से संचालन करने के लिए आवश्यक हो ।
[25. निर्वाचन-क्षेत्रों के लिए मतदान केन्द्रों का उपबन्ध-जिला निर्वाचन आफिसर, निर्वाचन आयोग के पूर्व अनुमोदन से, हर ऐसे निर्वाचन-क्षेत्र के लिए पर्याप्त संख्या में मतदान केन्द्रों का उपबन्ध करेगा जो सम्पूर्ण या जिसका अधिक भाग उसकी अधिकारिता के भीतर है, और ऐसे उपबन्धित मतदान केन्द्रों को और उन मतदान क्षेत्रों को या मतदाताओं के समूहों को, जिनके लिए वे क्रमशः उपबन्धित किए गए हैं, दर्शित करने वाली सूची ऐसी रीति में, जैसी निर्वाचन आयोग निर्दिष्ट करे, प्रकाशित करेगा।]
26. मतदान केन्द्रों के लिए पीठासीन आफिसरों की नियुक्ति-(1) [जिला निर्वाचन आफिसर] हर एक मतदान केन्द्र के लिए एक पीठासीन आफिसर और ऐसे मतदान आफिसर या ऐसे मतदान आफिसरों को, जैसे वह आवश्यक समझे, नियुक्त करेगा, किन्तु वह किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त नहीं करेगा जो निर्वाचन में या निर्वाचन की बाबत किसी अभ्यर्थी द्वारा या उसकी ओर से नियोजित किया गया है या अन्यथा उसके लिए काम करता रहा है:
परन्तु यदि मतदान केन्द्र से मतदान आफिसर अनुपस्थित है तो पीठासीन आफिसर उस व्यक्ति से भिन्न, जो निर्वाचन में या निर्वाचन की बाबत किसी अभ्यर्थी द्वारा या उसकी ओर से नियोजित किया गया है या अन्यथा उसके लिए काम करता रहा है, किसी ऐसे व्यक्ति को, जो मतदान केन्द्र में उपस्थित है, पूर्व कथित आफिसर की अनुपस्थिति के दौरान मतदान आफिसर होने के लिए नियुक्त कर सकेगा और जिला निर्वाचन आफिसर को तद्नुसार इत्तिला देगा:
[परन्तु यह और भी कि इस उपधारा की कोई भी बात जिला निर्वाचन आफिसर को एक ही व्यक्ति को एक ही परिसर में के एक से अधिक मतदान केन्द्रों के लिए पीठासीन आफिसर नियुक्त करने से निवारित न करेगी ।]
(2) यदि मतदान आफिसर पीठासीन आफिसर द्वारा ऐसा करने के लिए निर्दिष्ट किया जाए तो वह इस अधिनियम के या तद्धीन बनाए गए किन्हीं नियमों या किए गए आदेशों के अधीन पीठासीन आफिसर के सब या किन्हीं कृत्यों का पालन करेगा ।
(3) यदि पीठासीन आफिसर रुग्णता या अन्य अपरिवर्जनीय हेतुक के कारण मतदान केन्द्र से स्वयं अनुपस्थित रहने के लिए बाध्य हो जाए तो उसके कृत्यों का पालन ऐसे मतदान आफिसर द्वारा किया जाएगा जिसे [जिला निर्वाचन आफिसर] ने किसी ऐसी अनुपस्थिति के दौरान ऐसे कृत्यों के पालन के लिए पहले से ही प्राधिकृत किया है ।
(4) इस अधिनियम में पीठासीन आफिसर के प्रति निर्देशों के अन्तर्गत, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, उस किसी कृत्य का पालन करने वाला कोई व्यक्ति आता है जिस कृत्य का पालन करने के लिए वह, यथास्थिति, उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन प्राधिकृत है, यह समझा जाएगा ।
। । । । । ।
27. पीठासीन आफिसर का साधारण कर्तव्य-मतदान केन्द्र में व्यवस्था बनाए रखना और यह सुनिश्चित करना कि मतदान ऋजुता से हो मतदान केन्द्र में के पीठासीन आफिसर का साधारण कर्तव्य होगा ।
28. मतदान आफिसर के कर्तव्य-मतदान केन्द्र के मतदान आफिसरों का यह कर्तव्य होगा कि वे ऐसे केन्द्र के पीठासीन आफिसर की उसके कृत्यों के पालन में सहायता करें ।
[28क. रिटर्निंग आफिसर, पीठासीन आफिसर, आदि को निर्वाचन आयोग में प्रतिनियुक्त समझना-किसी निर्वाचन के संचालन के लिए रिटर्निंग आफिसर, सहायक रिटर्निंग आफिसर, पीठासीन आफिसर, मतदान आफिसर और इस भाग के अधीन नियुक्त कोई अन्य आफिसर, और किसी राज्य सरकार द्वारा तत्समय पदाभिहित कोई पुलिस आफिसर, उस अवधि के लिए, जो ऐसे निर्वाचन की अपेक्षा करने वाली अधिसूचना की तारीख से प्रारंभ होती है और ऐसे निर्वाचन के परिणामों के घोषित किए जाने की तारीख को समाप्त होती है, निर्वाचन आयोग में प्रतिनियुक्त समझे जाएंगे और तद्नुसार ऐसे आफिसर उस अवधि के दौरान निर्वाचन आयोग के नियंत्रण, अधीक्षण और अनुशासन के अधीन होंगे ।]
29. कतिपय निर्वाचनों की दशा में विशेष उपबंध-(1) राज्य सभा में के स्थान या स्थानों को भरने के लिए निर्वाचन के लिए या राज्य की विधान परिषद् में के स्थान या स्थानों को भरने के लिए राज्य की विधान सभा के सदस्यों द्वारा निर्वाचन के लिए ॥। रिटर्निंग आफिसर निर्वाचन आयोग के पूर्वानुमोदन से वह स्थान नियत करेगा जहां कि ऐसे निर्वाचन के लिए मतदान होगा और ऐसे नियत स्थान को ऐसी रीति में अधिसूचित करेगा जैसी निर्वाचन आयोग निर्दिष्ट करे ।
(2) रिटर्निंग आफिसर ऐसे नियत स्थान में ऐसे निर्वाचन में पीठासीन होगा और अपनी सहायता के लिए ऐसा या ऐसे मतदान आफिसर नियुक्त करेगा जैसे वह आवश्यक समझे, किन्तु वह किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त नहीं करेगा जो निर्वाचन में या निर्वाचन की बाबत अभ्यर्थी द्वारा या उसकी ओर से नियोजित किया गया है या अन्यथा उसके लिए काम करता रहा है ।
[भाग 4क
राजनैतिक दलों का रजिस्ट्रीकरण
29क. संगमों और निकायों का राजनैतिक दलों के रूप में आयोग के पास रजिस्ट्रीकरण-(1) भारत के व्यष्टिक नागरिकों का कोई संगम या निकाय, जो स्वयं को राजनैतिक दल कहता है और जो इस भाग के उपबंधों का लाभ उठाना चाहता है, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, राजनैतिक दल के रूप में अपना रजिस्ट्रीकरण कराने के लिए निर्वाचन आयोग को आवेदन करेगा ।
(2) ऐसा प्रत्येक आवेदन, -
(क) यदि संगम या निकाय लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1988 (1989 का 1) के प्रारंभ पर विद्यमान है तो ऐसे प्रारंभ के ठीक आगामी साठ दिन के भीतर किया जाएगा;
(ख) यदि संगम या निकाय ऐसे प्रारंभ के पश्चात् बनाया जाता है तो उसके बनाए जाने की तारीख के ठीक आगामी तीस दिन के भीतर किया जाएगा ।
(3) उपधारा 1 के अधीन प्रत्येक आवेदन पर संगम या निकाय के मुख्य कार्यपालक अधिकारी के (चाहे ऐसा मुख्य कार्यपालक अधिकारी सचिव के रूप में जाना जाता है या किसी अन्य पदाभिधान से जाना जाता है) हस्ताक्षर होंगे और वह आयोग के सचिव को पेश किया जाएगा या ऐसे सचिव को रजिस्ट्री डाक से भेजा जाएगा ।
(4) ऐसे प्रत्येक आवेदन में निम्नलिखित विशिष्टियां होंगी, अर्थात्: -
(क) संगम या निकाय का नाम;
(ख) वह राज्य जिसमें उसका प्रधान कार्यालय स्थित है;
(ग) वह पता जिस पर उसके लिए आशयित पत्र और अन्य संसूचनाएं भेजी जाएं;
(घ) उसके अध्यक्ष, सचिव, कोषाध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों के नाम;
(ङ) उसके सदस्यों की संख्या और यदि उसके सदस्यों के प्रवर्ग हैं तो प्रत्येक प्रवर्ग की संख्या;
(च) क्या उसके कोई स्थानीय एकक हैं, यदि हैं, तो किन स्तरों पर हैं;
(छ) क्या संसद् के या किसी राज्य विधान-मंडल के किसी सदन में किसी सदस्य या किन्हीं सदस्यों द्वारा उसका प्रतिनिधित्व किया जाता है; यदि किया जाता है तो ऐसे सदस्य या सदस्यों की संख्या ।
(5) उपधारा (1) के अधीन आवेदन के साथ संगम या निकाय के, ज्ञापन या नियमों और विनियमों की चाहे वह जिस नाम से ज्ञात हो, एक प्रति होगी और ऐसे ज्ञापन या नियमों और विनियमों में यह विनिर्दिष्ट उपबंध होगा कि वह संगम या निकाय विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति तथा समाजवाद, पंथनिरपेक्षता और लोकतंत्र के सिद्धांतों के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखेगा और भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता को अक्षुण्ण रखेगा ।
(6) आयोग संगम या निकाय से ऐसी अन्य विशिष्टियां मंगा सकेगा जैसी वह ठीक समझे ।
(7) आयोग अपने कब्जे में की यथापूर्वोक्त सभी विशिष्टियों और कोई अन्य आवश्यक और सुसंगत बातों पर विचार करने के पश्चात् और संगम या निकाय के प्रतिनिधियों को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् या तो उस संगम या निकाय को इस भाग के प्रयोजनों के लिए राजनैतिक दल के रूप में रजिस्ट्रीकृत करने का, या जो इस प्रकार रजिस्ट्रीकृत न करने का, विनिश्चय करेगा; और आयोग अपना विनिश्चय ऐसे संगम या निकाय को संसूचित करेगा:
परंतु कोई संगम या निकाय इस उपधारा के अधीन राजनैतिक दल के रूप में तब तक रजिस्ट्रीकृत नहीं किया जाएगा जब तक कि ऐसे संगम या निकाय का ज्ञापन या नियम और विनियम उपधारा (5) के उपबन्धों के अनुरूप नहीं हैं ।
(8) आयोग का विनिश्चय अंतिम होगा ।
(9) किसी संगम या निकाय के यथापूर्वोक्त राजनैतिक दल के रूप में रजिस्ट्रीकृत किए जाने के पश्चात् उसके नाम, प्रधान कार्यालय, पदाधिकारियों, पते या किन्हीं अन्य तात्त्विक विषयों में कोई तब्दीली आयोग को अविलंब संसूचित की जाएगी ।]
[29ख. राजनैतिक दलों का अभिदाय स्वीकार करने का हकदार होना-कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक राजनैतिक दल, सरकारी कंपनी से भिन्न किसी व्यक्ति या कंपनी द्वारा उसे स्वेच्छया प्रस्थापित अभिदाय की कोई भी रकम स्वीकार कर सकेगा:
परन्तु कोई भी राजनैतिक दल विदेशी अभिदाय (विनियमन) अधिनियम, 1976 (1976 का 49) की धारा 2 के खंड (ङ) के अधीन परिभाषित किसी विदेशी स्रोत से कोई अभिदाय स्वीकार करने का पात्र नही होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा और धारा 29ग के प्रयोजनों के लिए, -
(क) कंपनी" से धारा 3 में यथापरिभाषित कोई कंपनी अभिप्रेत है;
(ख) सरकारी कंपनी" से धारा 617 के अर्थांतर्गत कोई कंपनी अभिप्रेत है; और
(ग) अभिदाय" का वही अर्थ है जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 293क में है और इसके अंतर्गत किसी राजनैतिक दल को किसी व्यक्ति द्वारा प्रस्थापित कोई संदान या अभिदान भी है; और
(घ) व्यक्ति" का वही अर्थ है जो आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की धारा 2 के खंड (31) में है किन्तु इसके अंतर्गत सरकारी कंपनी, स्थानीय प्राधिकारी और सरकार द्वारा पूर्णतः या भागतः वित्त पोषित प्रत्येक कृत्रिम विधिक व्यक्ति नहीं है ।
29ग. राजनैतिक दलों द्वारा प्राप्त संदान की घोषणा-] (1) किसी राजनैतिक दल का कोषाध्यक्ष या उक्त राजनैतिक दल द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत कोई अन्य व्यक्ति, प्रत्येक वित्तीय वर्ष में, निम्नलिखित के संबंध में एक रिपोर्ट तैयार करेगा, अर्थात्ः-
(क) ऐसे राजनैतिक दल द्वारा उस वित्तीय वर्ष में किसी व्यक्ति से प्राप्त बीस हजार रुपए से अधिक का अभिदाय;
(ख) ऐसे राजनैतिक दल द्वारा उस वित्तीय वर्ष में सरकारी कंपनियों से भिन्न कंपनियों से प्राप्त बीस हजार रुपए से अधिक अभिदाय ।
[स्लिप---------------------------------------------------------------------------------------------------------]
(2) उपधारा (1) के अधीन रिपोर्ट ऐसे प्ररूप में होगी जो विहित किया जाए ।
(3) उपधारा (1) के अधीन किसी वित्तीय वर्ष के लिए रिपोर्ट, किसी राजनैतिक दल के कोषाध्यक्ष या उक्त राजनैतिक दल द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति द्वारा आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की धारा 139 के अधीन उस वित्तीय वर्ष की उसकी आय की विवरणी देने के लिए नियत तारीख से पूर्व, निर्वाचन आयोग को प्रस्तुत की जाएगी ।
(4) जहां किसी राजनैतिक दल का कोषाध्यक्ष या उक्त राजनैतिक दल द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत कोई अन्य व्यक्ति, उपधारा (3) के अधीन कोई रिपोर्ट प्रस्तुत करने में असफल रहता है, वहां, ऐसा राजनैतिक दल, आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) में किसी बात के होते हुए भी, उस अधिनियम के अधीन किसी कर राहत का हकदार नहीं होगा ।]
भाग 5
निर्वाचनों का संचालन
अध्याय 1-अभ्यर्थियों का नामनिर्देशन
[30. नामनिर्देशनों आदि के लिए तारीखें नियत करना-जैसे ही सदस्य या सदस्यों को निर्वाचित करने के लिए निर्वाचन-क्षेत्र से अपेक्षा करने वाली अधिसूचना निकाली जाए वैसे ही निर्वाचन आयोग शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा-
(क) नामनिर्देशन करने के लिए अंतिम तारीख जो प्रथम वर्णित अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख के पश्चात् वाले [सातवें दिन] की होगी या यदि वह दिन लोक अवकाश दिन है तो निकटतम उत्तरवर्ती ऐसे दिन की होगी जो लोक अवकाश दिन नहीं है;
(ख) नामनिर्देशनों की संवीक्षा की तारीख जो नामनिर्देशन करने के लिए नियत अंतिम तारीख के [अव्यवहित आगामी दिन] की होगी या यदि वह दिन लोक अवकाश दिन है तो निकटतम उत्तरवर्ती ऐसे दिन की होगी जो लोक अवकाश दिन नहीं है;
(ग) अभ्यर्थिता वापस लेने के लिए नियत अंतिम तारीख, जो नामनिर्देशनों की संवीक्षा के लिए नियत तारीख के पश्चात् [दूसरे दिन] की होगी या यदि वह दिन लोक अवकाश दिन है तो निकटतम उत्तरवर्ती ऐसे दिन की होगी जो अवकाश दिन नहीं है;
(घ) वह तारीख या वे तारीखें जिसको या जिनको यदि आवश्यक हो तो मतदान होगा और जो तारीख या जिन तारीखों में से पहली तारीख अभ्यर्थिताएं वापस लेने के लिए नियत अंतिम तारीख के पश्चात् [चौदहवें दिन] से पूर्वतर न होने वाली तारीख होगी; तथा
(ङ) वह तारीख जिसके पूर्व निर्वाचन समाप्त कर दिया जाएगा ।
। । । । । ।]
31. निर्वाचन की लोक सूचना- ॥। रिटर्निंग आफिसर धारा 30 के अधीन अधिसूचना के निकाले जाने पर ऐसे निर्वाचन के लिए अभ्यर्थियों के नामनिर्देशन आमंत्रित करते हुए, और वह स्थान जहां नामनिर्देशन-पत्र परिदत्त किए जाने हैं, विनिर्दिष्ट करते हुए आशयित निर्वाचन की लोक सूचना ऐसे प्ररूप और रीति में देगा जैसा या जैसी विहित किया या की जाए ।
32. निर्वाचन अभ्यर्थियों का नामनिर्देशन-यदि कोई व्यक्ति ॥। किसी स्थान को भरने के लिए चुने जाने के लिए [यथास्थितिट संविधान और इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन ॥। 2[या संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 (1963 का 20)] के उपबन्धों के अधीन अर्हित है तो वह उस स्थान को भरने के लिए निर्वाचन अभ्यर्थी के रूप में नामनिर्दिष्ट किया जा सकेगा ।
[33. नामनिर्देशन-पत्र का उपस्थित किया जाना और विधिमान्य नामनिर्देशन के लिए अपेक्षाएं-(1) हर एक अभ्यर्थी विहित प्ररूप में पूरित और अपने द्वारा तथा निर्वाचन-क्षेत्र में के एक निर्वाचक द्वारा प्रस्थापक के रूप में हस्ताक्षरित नामनिर्देशन-पत्र रिटर्निंग आफिसर को उस स्थान पर जो धारा 31 के अधीन निकाली गई सूचना में इस निमित्त विनिर्दिष्ट है धारा 30 के खंड (क) के अधीन नियत तारीख को या के और पूर्व पूर्वाह्न ग्यारह बजे और अपराह्न तीन बजे के बीच या तो स्वयं या अपने प्रस्थापक द्वारा परिदत्त करेगा:
[परन्तु ऐसा कोई अभ्यर्थी, जो किसी मान्यताप्राप्त राजनैतिक दल द्वारा खड़ा नहीं किया गया है, किसी निर्वाचन-क्षेत्र से निर्वाचन के लिए सम्यक् रूप से तब तक नामनिर्देशित किया गया नहीं समझा जाएगा जब तक कि नामनिर्देशन-पत्र पर ऐसे दस प्रस्थापकों द्वारा, जो निर्वाचन-क्षेत्र के निर्वाचक हों, हस्ताक्षर न किए गए हों:
परन्तु यह और कि कोई भी नामनिर्देशन-पत्र रिटर्निंग आफिसर को ऐसे दिन परिदत्त नहीं किया जाएगा जो लोक अवकाश दिन हो:
परन्तु यह भी कि स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन-क्षेत्र, स्नातक निर्वाचन-क्षेत्र या शिक्षक निर्वाचन-क्षेत्र की दशा में, निर्वाचन-क्षेत्र में के एक निर्वाचक द्वारा प्रस्थापक के रूप में" के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह निर्वाचन-क्षेत्र के निर्वाचकों के दस प्रतिशत द्वारा या ऐसे दस निर्वाचकों द्वारा, इनमें से जो भी कम हो, प्रस्थापकों के रूप में" के प्रति निर्देश हैं ।]
[(1क) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी सिक्किम विधान सभा के (जो संविधान के अधीन उस राज्य की सम्यक्त रूप से गठित विधान सभा समझी जाती है) निर्वाचन के लिए रिटर्निंग आफिसर को परिदत्त किया जाने वाला नामनिर्देशन-पत्र ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से होगा जिन्हें विहित किया जाए:
परन्तु उक्त नामनिर्देशन-पत्र अभ्यर्थी द्वारा यह दर्शाने के लिए हस्ताक्षरित किया जाएगा कि उसने नामनिर्देशन के लिए अपनी अनुमति दे दी है अथवा-
(क) भूटिया-लेप्चा उद्भव के सिक्किमियों के लिए आरक्षित स्थान की दशा में, प्रस्थापकों के रूप में उस निर्वाचन-क्षेत्र के कम से कम बीस निर्वाचकों द्वारा और समर्थकों के रूप में निर्वाचन-क्षेत्र के बीस निर्वाचकों द्वारा भी;
(ख) संघों के लिए आरक्षित स्थान की दशा में प्रस्थापकों के रूप में उस निर्वाचन-क्षेत्र के कम से कम बीस निर्वाचकों द्वारा और समर्थकों के रूप में उस निर्वाचन-क्षेत्र के कम से कम बीस निर्वाचकों द्वारा भी;
(ग) नेपाली उद्भव के सिक्किमियों के लिए आरक्षित स्थान की दशा में, प्रस्थापक के रूप में उस निर्वाचन-क्षेत्र के एक निर्वाचक द्वारा,
हस्ताक्षरित किया जाएगा:
परन्तु यह और कि रिटर्निंग आफिसर को कोई नामनिर्देशन-पत्र ऐसे दिन परिदत्त नहीं किया जाएगा जो लोक अवकाश दिन है ।]
(2) जिस निर्वाचन-क्षेत्र में कोई स्थान आरक्षित है उसमें कोई अभ्यर्थी उस स्थान को भरने के लिए चुने जाने के लिए अर्हित न समझा जाएगा जब तक कि उसके अपने नामनिर्देशन-पत्र में वह विशिष्ट जाति या जनजाति जिसका वह सदस्य है और वह क्षेत्र जिसके संबंध में वह जाति या जनजाति उस राज्य की, यथास्थिति, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति है विनिर्दिष्ट करने वाली उसके द्वारा की गई घोषणा अन्तर्विष्ट न हो ।
(3) जहां कि अभ्यर्थी [धारा 9] में निर्दिष्ट किसी पद को धारण करने वाला ऐसा व्यक्ति है जो पदच्युत कर दिया गया है और पदच्युति से पांच वर्ष की कालावधि बीती नहीं है वहां जब तक कि विहित रीति में निर्वाचन आयोग द्वारा किया गया यह प्रमाणपत्र कि वह भ्रष्ट आचरण या राज्य के प्रति अभक्ति के लिए पदच्युत नहीं किया गया है उसके नामनिर्देशन-पत्र के साथ न हो तो ऐसा व्यक्ति अभ्यर्थी के रूप में सम्यक्त रूप से नामनिर्दिष्ट हुआ न समझा जाएगा ।
(4) नामनिर्देशन-पत्र के उपस्थित किए जाने पर रिटर्निंग आफिसर अपना यह समाधान करेगा कि नामनिर्देशन-पत्र में यथाप्रविष्ट अभ्यर्थी और उसके प्रस्थापक के नाम और निर्वाचक नामावली संख्यांक वे ही हैं जो निर्वाचक नामावलियों में प्रविष्ट हैं:
[परन्तु निर्वाचक नामावली या नामनिर्देशन-पत्र में वर्णित अभ्यर्थी या उसके प्रस्थापक या किसी अन्य व्यक्ति के नाम के बारे में या किसी स्थान के बारे में किसी गलत नाम या अशुद्ध वर्णन अथवा लेखन संबंधी तकनीकी या मुद्रण संबंधी भूल का और निर्वाचक नामावली में या नामनिर्देशन-पत्र में ऐसे किसी व्यक्ति के निर्वाचक नामावली संख्यांकों के बारे में लेखन संबंधी तकनीकी या मुद्रण संबंधी भूल का प्रभाव ऐसे व्यक्ति या स्थान की बाबत निर्वाचक नामावली या नामनिर्देशन-पत्र के पूरे प्रवर्तन पर किसी ऐसी दशा में नहीं पड़ेगा जिसमें उस व्यक्ति या स्थान के नाम के बारे में वर्णन ऐसा है जो सामान्यतः समझा जा सकने वाला है और रिटर्निंग आफिसर ऐसे किसी गलत नाम या अशुद्ध वर्णन अथवा लेखन संबंधी तकनीकी या मुद्रण संबंधी भूल को शुद्ध किए जाने की अनुज्ञा देगा और जहां कि आवश्यक हो वहां यह निदेश देगा कि निर्वाचक नामावली में या नामनिर्देशन-पत्र में ऐसे किसी गलत नाम, अशुद्ध वर्णन, लेखन संबंधी, तकनीकी या मुद्रण संबंधी भूल की अनुवेक्षा की जाए ।]
(5) जहां कि अभ्यर्थी किसी भिन्न निर्वाचन-क्षेत्र का निर्वाचक है, वहां उस निर्वाचन-क्षेत्र की निर्वाचक नामावली की या उसके सुसंगत भाग की एक प्रति या ऐसी नामावली में की सुसंगत प्रविष्टियों की एक प्रमाणित प्रति, जब तक कि वह नामनिर्देशन-पत्र के साथ फाइल न कर दी गई हो, संवीक्षा के समय रिटर्निंग आफिसर के समक्ष पेश की जाएगी ।
[(6) इस धारा की कोई भी बात किसी अभ्यर्थी को एक से अधिक नामनिर्देशन-पत्र द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने से निवारित न करेगी:
परन्तु एक ही निर्वाचन-क्षेत्र में निर्वाचन के लिए चार से अधिक नामनिर्देशन-पत्र किसी अभ्यर्थी द्वारा या उसकी ओर से न तो उपस्थित किए जाएंगे और न रिटर्निंग आफिसर द्वारा प्रतिगृहीत किए जाएंगे ।]
[(7) इस अधिनियम की उपधारा (6) में या उसके किन्हीं अन्य उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति, -
(क) लोक सभा के लिए साधारण निर्वाचन की दशा में (चाहे सभी संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों में साथ-साथ निर्वाचन कराए गए हों या नहीं), दो से अधिक संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों से;
(ख) राज्य की विधान सभा के लिए साधारण निर्वाचन की दशा में (चाहे सभी विधान सभा निर्वाचन-क्षेत्रों में साथ-साथ निर्वाचन कराए गए हों या नहीं), उस राज्य में दो से अधिक विधान सभा निर्वाचन-क्षेत्रों से;
(ग) राज्य की विधान परिषद् के लिए, जहां ऐसी परिषद् है, द्विवार्षिक निर्वाचन की दशा में, उस राज्य में दो से अधिक परिषद् निर्वाचन-क्षेत्रों से;
(घ) किसी राज्य को आबंटित दो या अधिक स्थानों को भरने के लिए राज्य सभा के लिए द्विवार्षिक निर्वाचन की दशा में, ऐसे दो से अधिक स्थानों को भरने के लिए;
(ङ) दो या अधिक संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों से लोक सभा के लिए उप-निर्वाचनों की दशा में, जो साथ-साथ कराए गए हों, ऐसे दो से अधिक संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों से;
(च) दो या अधिक संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों से राज्य की विधान सभा के लिए उप-निर्वाचनों की दशा में, जो साथ-साथ कराए गए हों, ऐसे दो से अधिक विधान सभा निर्वाचन-क्षेत्रों से;
(छ) राज्य को आबंटित दो या अधिक स्थानों को भरने के लिए राज्य सभा के लिए उप-निर्वाचनों की दशा में, जो साथ-साथ कराए गए हों, ऐसे दो से अधिक स्थानों को भरने के लिए;
(ज) दो या अधिक परिषद् निर्वाचन-क्षेत्रों से राज्य की विधान परिषद् के लिए, जहां ऐसी परिषद् है, उप-निर्वाचनों की दशा में, जो साथ-साथ कराए गए हों, ऐसे दो से अधिक परिषद् निर्वाचन-क्षेत्रों से,
निर्वाचन के लिए अभ्यर्थी के रूप में नामनिर्देशित नहीं किया जाएगा ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए दो या अधिक उप-निर्वाचन साथ-साथ कराए गए तब समझे जाएंगे, जब ऐसे उप-निर्वाचनों की अपेक्षा करने वाली अधिसूचना निर्वाचन आयोग द्वारा, यथास्थिति, धारा 147, धारा 149, धारा 150 या धारा 151 के अधीन एक ही तारीख को निकाली जाती है ।]
[33क. सूचना का अधिकार-(1) कोई अभ्यर्थी, ऐसी सूचना के अतिरिक्त जिसकी उससे धारा 33 की उपधारा (1) के अधीन परिदत्त किए गए अपने नामनिर्देशन-पत्र में इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों के अधीन दिए जाने की अपेक्षा की जाती है, इस बारे में भी सूचना देगा कि क्या वह, -
(i) किसी ऐसे लंबित मामले में, जिसमें सक्षम अधिकारिता वाले किसी न्यायालय द्वारा आरोप विरचित कर दिया गया है, दो वर्ष या उससे अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय किसी अपराध का अभियुक्त है;
(ii) [धारा 8 की उपधारा (1) या उपधारा (2) में निर्दिष्ट अथवा उपधारा (3) के अंतर्गत आने वाले किसी अपराध से भिन्नट किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है और एक वर्ष या उससे अधिक के कारावास से दंडादिष्ट किया गया है ।
(2) यथास्थिति, अभ्यर्थी या उसका प्रस्थापक, धारा 33 की उपधारा (1) के अधीन रिटर्निंग आफिसर को नामनिर्देशन-पत्र परिदत्त करते समय, विहित प्ररूप में उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट सूचना सत्यापित करते हुए अभ्यर्थी द्वारा दिया गया शपथपत्र भी परिदत्त करेगा ।
(3) रिटर्निंग आफिसर, उपधारा (1) के अधीन उसको सूचना दिए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, उपधारा (2) के अधीन परिदत्त शपथपत्र की एक प्रति, किसी ऐसे निर्वाचन-क्षेत्र से जिसके लिए नामनिर्देशन-पत्र परिदत्त किया गया है, संबंधित मतदाताओं की जानकारी के लिए अपने कार्यालय के किसी सहजदृश्य स्थान पर चिपका कर पूर्वोक्त सूचना प्रदर्शित करेगा ।]
[33ख. अभ्यर्थी द्वारा केवल अधिनियम और नियमों के अधीन ही सूचना का दिया जाना-किसी न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश अथवा निर्वाचन आयोग द्वारा जारी किए गए किसी निदेश, आदेश या किसी अन्य अनुदेश में किसी बात के होते हुए भी, कोई अभ्यर्थी अपने निर्वाचन की बाबत ऐसी कोई सूचना प्रकट करने या देने के दायित्वाधीन नहीं होगा जो इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों के अधीन प्रकट किए जाने या दिए जाने के लिए अपेक्षित नहीं है ।]
34. निक्षेप- [(1) जब तक कि अभ्यर्थी-
(क) किसी संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र से निर्वाचन की दशा में, [पच्चीस हजार रुपए की राशि, अथवा जहां अभ्यर्थी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य है वहां बारह हजार पांच सौ रुपए की राशि]; और
(ख) किसी विधान सभा या परिषद् निर्वाचन-क्षेत्र से किसी निर्वाचन की दशा में, 3[दस हजार रुपए की राशि, अथवा जहां अभ्यर्थी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य है वहां पांच हजार रुपए की राशि,]
निक्षिप्त न कर दे या निक्षिप्त न करा दे, वह किसी निर्वाचन-क्षेत्र से निर्वाचन के लिए सम्यक्त रूप से नामनिर्दिष्ट हुआ वहां समझा जाएगा:
परन्तु जहां अभ्यर्थी एक ही निर्वाचन-क्षेत्र में निर्वाचन के लिए एक से अधिक नामनिर्देशन-पत्रों द्वारा नामनिर्दिष्ट किया गया है वहां इस उपधारा के अधीन उससे एक से अधिक निक्षेप की अपेक्षा नहीं की जाएगी ।]
(2) उपधारा (1) के अधीन निक्षेप के लिए अपेक्षित कोई राशि उस उपधारा के अधीन निक्षिप्त की गई नहीं समझी जाएगी जब तक कि [धारा 33 की, यथास्थिति, उपधारा (1) या उपधारा (1क) के अधीन] नामनिर्देशन-पत्रों के परिदान के समय अभ्यर्थी ने रिटर्निंग आफिसर के पास या तो नकदी में उसे निक्षिप्त नहीं कर दिया है या निक्षिप्त नहीं करवा दिया है या नामनिर्देशन-पत्र के साथ यह दर्शित करने वाली रसीद कि उक्त राशि रिजर्व बैंक आफ इंडिया या सरकारी खजाने में उसके द्वारा या उसकी ओर से निक्षिप्त कर दी गई है, नहीं लगा दी है ।
35. नामनिर्देशनों की सूचना और उनकी संवीक्षा के लिए समय और स्थान-रिटर्निंग आफिसर [धारा 33 4यथास्थिति, की उपधारा (1) या उपधारा (1क) के अधीन] नामनिर्देशन-पत्र की प्राप्ति पर उसे परिदत्त करने वाले व्यक्ति या व्यक्तियों को नामनिर्देशनों की संवीक्षा के लिए नियत तारीख, समय और स्थान की इत्तिला देगा और नामनिर्देशन-पत्र पर उसका क्रम संख्यांक प्रविष्ट करेगा और उस पर वह तारीख जिसको और वह समय जिस पर उसे नामनिर्देशन-पत्र परिदत्त किया गया है कथित वाला प्रमाणपत्र हस्ताक्षरित करेगा और तत्पश्चात् यथाशक्य शीघ्र नामनिर्देशन की ऐसी सूचना जिनमें अभ्यर्थी और [प्रस्थापकट दोनों के वैसे ही वर्णन अन्तर्विष्ट हों जैसे वे नामनिर्देशन-पत्र में हैं अपने कार्यालय में किसी सहजदृश्य स्थान में लगवाएगा ।
36. नामनिर्देशनों की संवीक्षा-(1) धारा 30 के अधीन नामनिर्देशनों की संवीक्षा के लिए नियत तारीख को अभ्यर्थी, उनके निर्वाचन अभिकर्ता, हर एक अभ्यर्थी का एक प्रस्थापक ॥। और हर एक अभ्यर्थी द्वारा लिखित रूप में सम्यक्त रूप से प्राधिकृत एक दूसरा व्यक्ति, न कि कोई भी अन्य व्यक्ति, ऐसे समय और स्थान में जैसा रिटर्निंग आफिसर नियत करे हाजिर हो सकेंगे और रिटर्निंग आफिसर सब अभ्यर्थियों के नामनिर्देशन-पत्रों की जो उसे धारा 33 में अधिकथित समय के भीतर और रीति में प्रदत्त किए गए हैं, परीक्षा करने के लिए उन्हें सब युक्तियुक्त सुविधाएं देगा ।
(2) रिटर्निंग आफिसर तब नामनिर्देशन-पत्रों की परीक्षा करेगा और उन सब आक्षेपों का विनिश्चय करेगा जो किसी नामनिर्देशन की बाबत किए जाएं और ऐसी संक्षिप्त जांच के पश्चात् यदि कोई हो, जैसी वह आवश्यक समझे किसी नामनिर्देशन को ऐसे आक्षेप पर या स्वप्रेरणा से निम्नलिखित आधारों में से किसी आधार पर, अर्थात्: -
[(क) इस आधार पर [कि अभ्यर्थी नामनिर्देशनों की संवीक्षा के लिए नियत की गई तारीखट को निम्नलिखित उपबन्धों, अर्थात्: -]
अनुच्छेद 84, 102, 173 और 191 ॥।
[इस अधिनियम के भाग 2 और संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 (1963 का 20) की धाराओं 4 और 14 ॥। में से जो भी लागू होती हो उसके अधीन उस स्थान को भरने के लिए चुने जाने के लिए या तो अर्हित नहीं है या निरर्हित है, अथवा
(ख) इस आधार पर कि धारा 33 या धारा 34 के उपबंधों में से किसी का अनुवर्तन करने में असफलता हुई है, अथवा
(ग) इस आधार पर नामनिर्देशन-पत्र पर अभ्यर्थी का या प्रस्थापक का हस्ताक्षर असली नहीं है,
[रद्द] कर सकेगा ।
(3) यदि अभ्यर्थी किसी ऐसे अन्य नामनिर्देशन-पत्र द्वारा जिसके बारे में कोई अनियमितता नहीं की गई है सम्यक् रूप से नामनिर्दिष्ट कर दिया गया है तो उपधारा (2) के [खंड (ख) या खंड (ग)] में अन्तर्विष्ट किसी भी बात के बारे में यह न समझा जाएगा कि वह किसी अभ्यर्थी के नामनिर्देशन-पत्र में किसी अनियमितता के आधार पर [प्रतिक्षेपित] करने के लिए प्राधिकृत करती है ।
(4) रिटर्निंग आफिसर किसी नामनिर्देशन-पत्र को ऐसी किसी ॥। त्रुटि के आधार पर जो सारवान् रूप की नहीं है, प्रतिक्षेपित न करेगा ।
(5) रिटर्निंग आफिसर धारा 30 के खंड (ख) के अधीन इस निमित्त नियत तारीख को संवीक्षा करेगा और कार्यवाहियों का कोई स्थगन उस दशा के सिवाय अनुज्ञात न करेगा जिसमें ऐसी कार्यवाहियों में बलवे या खुली हिंसा से या उसके नियंत्रण के बाहर वाले कारणों से विघ्न या बाधा हुई है:
परंतु उस दशा में जिसमें [आक्षेप रिटर्निंग आफिसर द्वारा उठाया जाता है या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किया जाता है] संपृक्त अभ्यर्थी को संवीक्षा के लिए नियत तारीख से एक दिन छोड़कर अगले दिन तक का न कि उसके पश्चात् का समय उसका खंडन करने के लिए अनुज्ञात किया जा सकेगा और रिटर्निंग आफिसर अपना विनिश्चय उस तारीख को, जिस तक कार्यवाहियां स्थगित की गई हैं; अभिलिखित करेगा ।
(6) रिटर्निंग आफिसर हर एक नामनिर्देशन-पत्र पर उसे प्रतिगृहीत करने या प्रतिक्षेपित करने का अपना विनिश्चय पृष्ठांकित करेगा और यदि नामनिर्देशन-पत्र प्रतिक्षेपित किया गया है तो ऐसे प्रतिक्षेपण के लिए अपने कारणों का संक्षिप्त कथन लिखित रूप में अभिलिखित करेगा ।
[(7) जब तक कि यह साबित न कर दिया जाए कि वह लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) की धारा 16 में वर्णित निरर्हता के अध्यधीन है, किसी निर्वाचन-क्षेत्र की तत्समय प्रवृत्त निर्वाचक नामावली में की प्रविष्टि की प्रमाणित प्रति इस धारा के प्रयोजनों के लिए इस तथ्य का निश्चायक साक्ष्य होगी कि वह व्यक्ति, जो उस प्रविष्टि में निर्दिष्ट किया गया है, उस निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक है ।
(8) रिटर्निंग आफिसर सब नामनिर्देशन-पत्रों की संवीक्षा किए जाने और उनके प्रतिगृहीत या प्रतिक्षेपित किए जाने के विनिश्चयों के अभिलिखित किए जाने के अव्यवहित पश्चात् विधिमान्यतः नामनिर्दिष्ट अभ्यर्थियों की अर्थात् उन अभ्यर्थियों की, जिनके नामनिर्देशन विधिमान्य ठहराए गए हैं, सूची तैयार करेगा और उसे अपने सूचना फलक पर लगवाएगा ।]
37. अभ्यर्थिता वापस लेना-(1) कोई भी अभ्यर्थी अपनी अभ्यर्थिता ऐसी लिखित सूचना द्वारा वापस ले सकेगा जिसमें ऐसी विशिष्टियां अन्तर्विष्ट होंगी जैसी विहित की जाएं और जो स्वयं उस द्वारा हस्ताक्षरित होंगी और रिटर्निंग आफिसर को या तो स्वयं ऐसे अभ्यर्थी द्वारा या उसके प्रस्थापक द्वारा ॥। या ऐसे निर्वाचन अभिकर्ता द्वारा जो ऐसे अभ्यर्थी द्वारा लिखित रूप में इस निमित्त प्राधिकृत किया गया है धारा 30 के खण्ड (ग) के अधीन नियत दिन को अपराह्न तीन बजे से पहले परिदत्त कर दी जाएगी ।
12। । । । ।
(2) जिस व्यक्ति ने अपनी अभ्यर्थिता वापस लेने की सूचना उपधारा (1) के अधीन दी है उसे उस सूचना को रद्द करने के लिए अनुज्ञात न किया जाएगा ।
[(3) रिटर्निंग आफिसर अभ्यर्थिता वापस लेने की सूचना के असली होने के बारे में और उपधारा (1) के अधीन उसे परिदत्त करने वाले व्यक्ति की अनन्यता के बारे में अपना समाधान हो जाने पर उस सूचना को अपने कार्यालय के किसी सहजदृश्य स्थान में लगवाएगा ।]
[38. निर्वाचन लड़ने वाले अभ्यर्थियों की सूची का प्रकाशन-(1) रिटर्निंग आफिसर उस कालावधि के जिसके भीतर धारा 37 की उपधारा (1) के अधीन अभ्यर्थिताएं वापस ली जा सकेंगी, अवसान के अव्यवहित पश्चात् निर्वाचन लड़ने वाले अभ्यर्थियों की अर्थात् उन अभ्यर्थियों की, जो विधिमान्यतः नामनिर्दिष्ट अभ्यर्थियों की सूची के अन्तर्गत थे और जिन्होंने उक्त कालावधि के भीतर अपनी अभ्यर्थिता वापस नहीं ली है, सूची ऐसे प्ररूप और रीति में जैसी विहित की जाए, तैयार करेगा और प्रकाशित करेगा ।
[(2) उपधारा (1) के अधीन नामों को सूचीबद्ध करने के प्रयोजन के लिए अभ्यर्थियों को निम्नलिखित रूप में वर्गीकृत किया जाएगा, अर्थात्: -
(i) मान्यताप्राप्त राजनैतिक दलों के अभ्यर्थी;
(ii) खंड (i) में उल्लिखित अभ्यर्थियों से भिन्न रजिस्ट्रीकृत राजनैतिक दलों के अभ्यर्थी;
(iii) अन्य अभ्यर्थी ।
(3) उपधारा (2) में उल्लिखित प्रवर्ग उसमें विनिर्दिष्ट रूप में क्रमबद्ध किए जाएंगे और प्रत्येक प्रवर्ग में से अभ्यर्थियों के नाम वर्णक्रम में तथा निर्वाचन लड़ने वाले अभ्यर्थियों के पते ऐसे जैसे वे नामनिर्देशन-पत्रों में दिए गए हैं, ऐसी अन्य विशिष्टियों सहित, जो विहित की जाएं, क्रमबद्ध किए जाएंगे ।]
[39. अन्य निर्वाचनों में अभ्यर्थियों का नामनिर्देशन-(1) जैसे ही किसी राज्य की विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों से या किसी [संघ राज्यक्षेत्र] के निर्वाचकगण के सदस्यों से सदस्य या सदस्यों का निर्वाचन करने के लिए अपेक्षा करने वाली अधिसूचना निकाली जाए वैसे ही निर्वाचन आयोग शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा-
(क) नामनिर्देशन करने के लिए अन्तिम तारीख, जो प्रथम वर्णित अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख के पश्चात् वाले [सातवें दिन] की होगी या यदि वह दिन लोक अवकाश दिन है तो निकटतम उत्तरवर्ती ऐसे दिन की होगी जो लोक अवकाश दिन नहीं है;
(ख) नामनिर्देशनों की संवीक्षा की तारीख जो नामनिर्देशन करने के लिए नियत अंतिम तारीख के [अव्यवहित आगामी दिन] की होगी या यदि वह दिन लोक अवकाश दिन है तो निकटतम उत्तरवर्ती ऐसे दिन की होगी जो लोक अवकाश दिन नहीं है;
(ग) अभ्यर्थिताएं वापस लेने के लिए नियत अंतिम तारीख जो नामनिर्देशनों की संवीक्षा के लिए नियत तारीख के पश्चात् [दूसरे दिन] की होगी या यदि वह दिन लोक अवकाश दिन है, तो निकटतम उत्तरवर्ती ऐसे दिन की होगी जो लोक अवकाश दिन नहीं है;
(घ) वह तारीख या वे तारीखें जिसको या जिनको यदि आवश्यक हो तो मतदान होगा और जो तारीख या जिन तारीखों में से पहली तारीख अभ्यर्थिताएं वापस लेने के लिए नियत अंतिम तारीख के पश्चात् सातवें दिन के पूर्वतर न होने वाली तारीख होगी; तथा
(ङ) वह तारीख जिसके पूर्व निर्वाचन समाप्त कर लिया जाएगा,
नियत करेगा ।
। । । । ।
(2) धारा 33 की उपधारा (2) और (5) और [धारा 34 की उपधारा (1) के खण्ड (क)] का अपवर्जन करके धारा 31 से लेकर धारा 38 तक के उपबंध किसी ऐसे निर्वाचन के संबंध में ऐसे लागू होंगे जैसे वे किसी निर्वाचन-क्षेत्र में के निर्वाचन के संबंध में लागू होते हैं:
परंतु-
(क) जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो निर्वाचन-क्षेत्र की निर्वाचक नामावली के प्रति जो कोई निदेश उक्त उपबंधों में हैं उनका अर्थ यह लगाया जाएगा कि वे राज्य की विधान सभा के सदस्यों या निर्वाचित सदस्यों द्वारा निर्वाचन की दशा में उस सभा के, यथास्थिति, सदस्यों या निर्वाचित सदस्यों की उस सूची के प्रति निर्देश हैं जो धारा 152 की उपधारा (1) के अधीन रखी जाती हैं, और किसी [संघ राज्यक्षेत्र] के निर्वाचकगण के सदस्यों द्वारा निर्वाचन की दशा में ऐसे निर्वाचकगण के सदस्यों की उस सूची के प्रति निर्देश हैं जो उस धारा की उपधारा (2) के अधीन रखी जाती है ;
[(कक) धारा 33 की उपधारा (1) के प्रारम्भिक पैरा में निर्वाचन-क्षेत्र में के एक निर्वाचक द्वारा प्रस्थापक के रूप में" के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह यथास्थिति, निर्वाचित सदस्यों के या किसी राज्य की विधान सभा के सदस्यों के या संघ राज्यक्षेत्र के निर्वाचकगण के सदस्यों के दस प्रतिशत द्वारा या संबंधित दस सदस्यों द्वारा, इनमें से जो भी कम हो, प्रस्थापकों के रूप में" के प्रति निर्देश है:
परंतु जहां इस खंड में निर्दिष्ट प्रतिशतता की गणना के परिणामस्वरूप प्राप्त सदस्य संख्या में कोई भिन्न आती है और यदि इस प्रकार प्राप्त भिन्न आधे से अधिक है तो उसे एक गिना जाएगा और यदि इस प्रकार प्राप्त भिन्न आधी से कम है तो उसकी उपेक्षा की जाएगी;]
[ [(कख)] किसी राज्य की विधान परिषद् के उस राज्य की विधान सभा के सदस्यों द्वारा निर्वाचन की दशा में धारा 36 की उपधारा (2) के खंड (क) का, अर्थ यह लगाया जाएगा कि उसके अन्तर्गत अनुच्छेद 171 के खंड (3) के उपखंड (घ) के प्रति निर्देश आता है;]
(ख) धारा 30 के प्रति जो कोई निर्देश उक्त उपबंधों में हैं उनका अर्थ यह लगाया जाएगा कि वे उस धारा की उपधारा (1) के प्रति निर्देश हैं, तथा
(ग) रिटर्निंग आफिसर नामनिर्देशन-पत्र के उपस्थित किए जाने के समय उसे पेश करने वाले व्यक्ति से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह निर्वाचक नामावली की या निर्वाचक नामावली के उस भाग की जिसमें अभ्यर्थी का नाम सम्मिलित है एक प्रति अथवा ऐसी निर्वाचक नामावली में की सुसंगत प्रविष्टियों की एक प्रमाणित प्रति उपस्थित करे ।]
[39क. समय की साम्यापूर्ण भागीदारी का आबंटन-(1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, निर्वाचन आयोग, निर्वाचनों के दौरान, किसी मान्यताप्राप्त राजनैतिक दल के पूर्व प्रदर्शन के आधार पर, केबल टेलीविजन नेटवर्क और अन्य इलैक्ट्रानिक मीडिया पर समय की साम्यापूर्ण भागीदारी का आबंटन ऐसी रीति से करेगा जो किसी निर्वाचन विषय के संप्रदर्शन या प्रचार के लिए या किसी निर्वाचन के संबंध में जनता को संबोधित करने के लिए, विहित की जाए ।
(2) किसी निर्वाचन के संबंध में, उपधारा (1) के अधीन समय की साम्यापूर्ण भागीदारी का आबंटन, निर्वाचन के लिए धारा 38 के अधीन निर्वाचन लड़ने वाले अभ्यर्थियों की सूची के प्रकाशन के पश्चात्, किया जाएगा और वह ऐसे निर्वाचन के लिए मतदान के लिए नियत समय के अड़तालीस घंटे पूर्व तक विधिमान्य होगा ।
(3) उपधारा (1) के अधीन समय की साम्यापूर्ण भागीदारी का आबंटन सभी संबंधित राजनैतिक दलों पर आबद्धकर होगा ।
(4) निर्वाचन आयोग, इस धारा के प्रयोजनों के लिए, केबल आपरेटरों और इलैक्ट्रानिक मीडिया के लिए आचार संहिता बना सकेगा और केबल आपरेटर तथा इलैक्ट्रानिक मीडिया का प्रबंध करने वाला या प्रबंध करने के लिए उत्तरदायी प्रत्येक व्यक्ति, ऐसी आचार संहिता का पालन करेगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -
(क) इलैक्ट्रानिक मीडिया" के अंतर्गत रेडियो और कोई अन्य प्रसारण मीडिया है जो केन्द्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचित किया गया हो;
(ख) केबल टेलीविजन नेटवर्क" और केबल आपरेटर" के वही अर्थ हैं जो क्रमशः उनके केबल टेलीविजन नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम, 1995 (1995 का 7) में हैं ।]
अध्याय 2-अभ्यर्थी और उनके अभिकर्ता
[40. निर्वाचन अभिकर्ता-निर्वाचन में अभ्यर्थी अपने से भिन्न किसी एक व्यक्ति को अपना निर्वाचन अभिकर्ता होने के लिए विहित रीति में नियुक्त कर सकेगा और जबकि ऐसी कोई नियुक्ति की जाए तब उस नियुक्ति की सूचना रिटर्निंग आफिसर को विहित रीति में दी जाएगी।]
[41. निर्वाचन अभिकर्ता होने के लिए निरर्हता-कोई भी व्यक्ति, जो संविधान के अधीन या इस अधिनियम के अधीन संसद् के दोनों सदनों में से किसी का या किसी राज्य के विधान-मंडल के सदन का या दोनों सदनों में से किसी का सदस्य होने या रहने के लिए, या निर्वाचनों में मत देने के लिए तत्समय निरर्हित है, तब तक जब तक कि निरर्हता विद्यमान है, किसी भी निर्वाचन में निर्वाचन अभिकर्ता होने के लिए भी निरर्हित होगा।]
42. निर्वाचन अभिकर्ता की नियुक्ति का प्रतिसंहरण या उसकी मृत्यु-(1) निर्वाचन अभिकर्ता ॥। की नियुक्ति का कोई भी प्रतिसंहरण अभ्यर्थी द्वारा हस्ताक्षरित किया जाएगा और उस तारीख से प्रवर्तित होगा जिस तारीख को वह रिटर्निंग आफिसर के पास दाखिल किया जाए ।
[(2) ऐसे प्रतिसंहरण की या निर्वाचन अभिकर्ता की मृत्यु की दशा में चाहे वह घटना निर्वाचन के पूर्व या दौरान या निर्वाचन के पश्चात् किन्तु अभ्यर्थी के निर्वाचन व्ययों के लेखाओं की धारा 78 के उपबंधों के अनुसार दाखिल किए जाने के पूर्व हुई हो, अभ्यर्थी किसी अन्य व्यक्ति को अपना निर्वाचन अभिकर्ता, विहित रीति में नियुक्त कर सकेगा और जबकि ऐसी नियुक्ति हो जाए, तब उस नियुक्ति की सूचना रिटर्निंग आफिसर को विहित रीति में दी जाएगी ।]
43. [धारा 42 के अन्तर्गत निर्वाचन अभिकर्ता की नियुक्ति की त्रुटि पर प्रभाव ।]-लोक प्रतिनिधित्व (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1956 (1956 का 27) की धारा 25 द्वारा निरसित ।
44. [निर्वाचन अभिकर्ता का लेखा रखने का कृत्य ।]-लोक प्रतिनिधित्व (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1956 (1956 का 27) की धारा 25 द्वारा निरसित ।
[45. निर्वाचन अभिकर्ताओं के कृत्य-निर्वाचन अभिकर्ता निर्वाचन के संबंध में ऐसे कृत्यों का पालन कर सकेगा जैसे निर्वाचन अभिकर्ता द्वारा किए जाने के लिए इस अधिनियम के द्वारा या अधीन प्राधिकृत हैं ।]
[46. मतदान अभिकर्ताओं की नियुक्ति-निर्वाचन लड़ने वाला अभ्यर्थी या उसका निर्वाचन अभिकर्ता इतनी संख्या में अभिकर्ता और अवमुक्ति अभिकर्ता विहित रीति में नियुक्त कर सकेगा जितनी धारा 25 के अधीन उपबंधित हर एक मतदान केन्द्र में या मतदान के लिए धारा 29 की उपधारा (1) के अधीन नियत स्थान में ऐसे अभ्यर्थी के मतदान अभिकर्ताओं के रूप में कार्य करने के लिए विहित की जाए ।]
[47. गणन अभिकर्ताओं की नियुक्ति-निर्वाचन लड़ने वाला अभ्यर्थी या उसका निर्वाचन अभिकर्ता एक या अधिक किन्तु ऐसी संख्या से अनधिक, जैसी विहित की जाए, व्यक्तियों को अपने गणन अभिकर्ताओं या अभिकर्ताओं के रूप में मतों की गणना के अवसर पर उपस्थित रहने के लिए विहित रीति में नियुक्त कर सकेगा और जबकि ऐसी कोई नियुक्ति की जाए तब उस नियुक्ति की सूचना रिटर्निंग आफिसर को विहित रीति में दी जाएगी ।]
48. मतदान अभिकर्ताओं या गणन अभिकर्ता की नियुक्ति का प्रतिसंहरण या उसकी मृत्यु-(1) मतदान अभिकर्ता की नियुक्ति का कोई भी प्रतिसंहरण अभ्यर्थी द्वारा या उसके निर्वाचन अभिकर्ता द्वारा हस्ताक्षरित किया जाएगा, और उस तारीख से प्रवर्तित होगा जिस तारीख को वह ऐसे आफिसर के पास, जैसा विहित किया जाए, दाखिल किया गया है और मतदान के बंद होने से पूर्व ऐसे प्रतिसंहरण की या मतदान अभिकर्ता की मृत्यु की दशा में, अभ्यर्थी या उसका निर्वाचन अभिकर्ता मतदान बन्द होने से पूर्व किसी भी समय दूसरा मतदान अभिकर्ता विहित रीति में नियुक्त कर सकेगा और ऐसी नियुक्ति की सूचना विहित रीति में ऐसे आफिसर को तत्क्षण देगा जैसा विहित किया जाए ।
(2) गणन अभिकर्ता की नियुक्ति का कोई भी प्रतिसंहरण अभ्यर्थी द्वारा या उसके निर्वाचन अभिकर्ता द्वारा हस्ताक्षरित किया जाएगा और उस तारीख से प्रवर्तित होगा जिस तारीख को वह रिटर्निंग आफिसर के पास दाखिल किया गया है और मतों की गणना के प्रारम्भ होने से पूर्व ऐसे प्रतिसंहरण की या गणन अभिकर्ता की मृत्यु की दशा में अभ्यर्थी या उसका निर्वाचन अभिकर्ता मतों की गणना के प्रारम्भ होने से पूर्व किसी भी समय दूसरा गणन अभिकर्ता विहित रीति में नियुक्त कर सकेगा और ऐसी नियुक्ति की सूचना रिटर्निंग आफिसर को विहित रीति में तत्क्षण देगा ।
49. मतदान अभिकर्ताओं और गणन अभिकर्ताओं के कृत्य-(1) मतदान अभिकर्ता मतदान से संसक्त ऐसे कृत्यों का पालन कर सकेगा जैसों का मतदान अभिकर्ता द्वारा पालन किया जाना इस अधिनियम के द्वारा या अधीन प्राधिकृत है ।
(2) गणन अभिकर्ता मतों की गणना से संसक्त ऐसे कृत्यों का पालन कर सकेगा जैसों का गणन अभिकर्ता द्वारा पालन किया जाना इस अधिनियम के द्वारा या अधीन प्राधिकृत है ।
50. निर्वाचन लड़ने वाला अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता की मतदान केन्द्रों में हाजिरी और मतदान अभिकर्ता या गणन अभिकर्ता के कृत्यों का उसके द्वारा पालन-(1) हर ऐसे निर्वाचन में, जिसमें मतदान होता है ऐसे निर्वाचन में के हर एक [निर्वाचन लड़ने वाले अभ्यर्थी] और उसके निर्वाचन अभिकर्ता का यह अधिकार होगा कि वह मतदान के लिए धारा 25 के अधीन उपबंधित किसी भी मतदान केन्द्र में या मतदान के लिए धारा 29 की उपधारा (1) के अधीन नियत किसी भी स्थान में उपस्थित रहे ।
(2) 1[निर्वाचन लड़ने वाला अभ्यर्थी] या उसका निर्वाचन अभिकर्ता स्वयं वह कार्य या बात कर सकेगा जिसे यदि ऐसे निर्वाचन लड़ने वाले अभ्यर्थी या कोई मतदान अभिकर्ता या गणन अभिकर्ता नियुक्त किया गया होता तो वह उसे करने के लिए इस अधिनियम के द्वारा या अधीन प्राधिकृत होता या ऐसे 1[निर्वाचन लड़ने वाले अभ्यर्थी] के किसी भी मतदान अभिकर्ता या गणन अभिकर्ता की किसी ऐसे कार्य या बात करने में सहायता कर सकेगा ।
51. मतदान या गणन अभिकर्ताओं की गैरहाजिरी-जहां कि कोई कार्य या बात मतदान या गणन अभिकर्ता की उपस्थिति में किए जाने के लिए इस अधिनियम के द्वारा या अधीन अपेक्षित या प्राधिकृत है, वहां उस प्रयोजन के लिए नियत समय और स्थान पर किसी ऐसे अभिकर्ता या अभिकर्ताओं की गैरहाजिरी उस किए गए कार्य या बात को, यदि वह कार्य या बात अन्यथा सम्यक् रूप से की गई, अविधिमान्य नहीं करेगी ।
अध्याय 3-निर्वाचनों में साधारण प्रक्रिया
[52. मतदान के पूर्व मान्यताप्राप्त राजनैतिक दल के अभ्यर्थी की मृत्यु-(1) यदि ऐसे अभ्यर्थी की, जो किसी मान्यताप्राप्त राजनैतिक दल द्वारा खड़ा किया गया है, -
(क) नामनिर्देशन करने के अंतिम तारीख को पूर्वाह्न 11 बजे के पश्चात् किसी समय मृत्यु हो जाती है और उसका नामनिर्देशन धारा 36 के अधीन संवीक्षा पर विधिमान्य ठहराया गया है; या
(ख) जिसका नामनिर्देशन धारा 36 के अधीन संवीक्षा पर विधिमान्य ठहराया गया है और जिसने धारा 37 के अधीन अपनी अभ्यर्थिता वापस नहीं ली है, मृत्यु हो जाती है,
और दोनों में से प्रत्येक दशा में, उसकी मृत्यु की रिपोर्ट, धारा 38 के अधीन निर्वाचन लड़ने वाले अभ्यर्थियों की सूची के प्रकाशन के पूर्व किसी समय, प्राप्त हो जाती है; या
(ग) निर्वाचन लड़ने वाले अभ्यर्थी के रूप में मृत्यु हो जाती है और उसकी मृत्यु की रिपोर्ट, मतदान के प्रारंभ होने के पूर्व प्राप्त हो जाती है,
तो रिटर्निंग आफिसर, उस अभ्यर्थी की मृत्यु के तथ्य के संबंध में अपना समाधान हो जाने पर, आदेश द्वारा, उस तारीख तक जो बाद में अधिसूचित की जाएगी, मतदान के स्थगन की घोषणा करेगा और इस तथ्य की रिपोर्ट निर्वाचन आयोग को और समुचित प्राधिकारी को भी करेगा:
परंतु खंड (क) में निर्दिष्ट दशा में, मतदान का स्थगन करने वाला कोई आदेश, सभी नामनिर्देशनों की, जिनके अंतर्गत मृत अभ्यर्थी का नामनिर्देशन है, संवीक्षा के पश्चात् ही किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।
(2) निर्वाचन आयोग, उपधारा (1) के अधीन रिटर्निंग आफिसर से रिपोर्ट प्राप्त होने पर, उस मान्यताप्राप्त राजनैतिक दल से, जिसके अभ्यर्थी की मृत्यु हो गई है, उक्त मतदान के लिए ऐसे राजनैतिक दल को ऐसी सूचना के जारी किए जाने से सात दिन के भीतर किसी अन्य अभ्यर्थी को नामनिर्दिष्ट करने की अपेक्षा करेगा और धारा 30 से धारा 37 के उपबंध, जहां तक हो सके, ऐसे नामनिर्देशन के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे अन्य नामनिर्देशनों के संबंध में लागू होते:
परंतु ऐसा कोई व्यक्ति, जिसने मतदान का स्थगन किए जाने के पूर्व अपनी अभ्यर्थिता वापस लेने की सूचना धारा 37 की उपधारा (1) के अधीन दे दी है, ऐसा स्थगन किए जाने के पश्चात् निर्वाचन के लिए अभ्यर्थी के रूप में नामनिर्देशन किए जाने के लिए अपात्र नहीं होगा ।
(3) जहां निर्वाचन लड़ने वाले अभ्यर्थियों की कोई सूची, उपधारा (1) के अधीन मतदान के स्थगन के पूर्व, धारा 38 के अधीन, प्रकाशित की गई थी वहां रिटर्निंग आफिसर निर्वाचन लड़ने वाले अभ्यर्थियों की नई सूची उस धारा के अधीन नए सिरे से तैयार करेगा और प्रकाशित करेगा जिसमें कि उस अभ्यर्थी का नाम, जिसे उपधारा (2) के अधीन विधिमान्य रूप से नामनिर्दिष्ट किया गया है, सम्मिलित किया जा सके ।
स्पष्टीकरण-इस धारा, धारा 33 और धारा 38 के प्रयोजनों के लिए, मान्यताप्राप्त राजनैतिक दल" से निर्वाचन प्रतीक (आरक्षण और आबंटन) आदेश, 1968 के अधीन निर्वाचन आयोग द्वारा मान्यताप्राप्त राजनैतिक दल अभिप्रेत है ।]
53. सविरोध और अविरोध निर्वाचनों में प्रक्रिया- [(1) यदि निर्वाचन लड़ने वाले अभ्यर्थियों की संख्या भरे जाने वाले स्थानों की संख्या से अधिक है, तो मतदान होगा ।]
(2) यदि ऐसे अभ्यर्थियों की संख्या भरे जाने वाले स्थानों की संख्या के बराबर है, तो रिटर्निंग आफिसर तत्क्षण ऐसे सभी अभ्यर्थियों के उन स्थानों को भरने के लिए सम्यक् रूप से निर्वाचित घोषित कर देगा ।
(3) यदि ऐसे अभ्यर्थियों की संख्या भरे जाने वाले स्थानों की संख्या से कम है, तो रिटर्निंग आफिसर तत्क्षण ऐसे सभी अभ्यर्थियों को निर्वाचित घोषित कर देगा और [निर्वाचन आयोग,] यथास्थिति, सम्पृक्त निर्वाचन-क्षेत्र से या निर्वाचित सदस्यों से या राज्य की विधान सभा के सदस्यों से या निर्वाचकगण के सदस्यों से ॥। शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा अपेक्षा करेगा कि वे शेष स्थान या स्थानों को भरने के लिए व्यक्ति या व्यक्तियों को निर्वाचित करें ॥।:
परंतु जहां कि निर्वाचन-क्षेत्र या निर्वाचित सदस्यों या राज्य विधान सभा के सदस्यों या निर्वाचकगण के सदस्यों से 2॥। इस उपधारा के अधीन पहले ही ऐसी अपेक्षा की जा चुकी है और वह या वे रिक्ति या रिक्तियों को भरने के लिए अपेक्षित संख्या में, यथास्थिति, व्यक्ति या व्यक्तियों को निर्वाचित करने में असफल रहा है या रहे हैं वहां 1[निर्वाचन आयोग] व्यक्ति या व्यक्तियों को निर्वाचित करने के लिए निर्वाचित क्षेत्र से या ऐसे सदस्यों से पुनः अपेक्षा करने के लिए तब तक आबद्ध न होगा [जब तक कि उसका समाधान नहीं हो जाता कि यदि उससे या उनसे पुनः अपेक्षा की गई तो ऐसा निर्वाचन-क्षेत्र या ऐसे सदस्य ऐसे असफल न रहेगा या न रहेंगेट।
54. [अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के लिए जहां स्थान आरक्षित हैं वहां निर्वाचन के लिए निर्वाचन-क्षेत्रों में विशेष प्रक्रिया ।]-लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1961 (1961 का 40) की धारा 2 द्वारा (20-9-1961 से) निरसित ।
55. अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के लिए जो स्थान आरक्षित नहीं हैं उन्हें धारण करने की उन जातियों या जनजातियों के सदस्यों की पात्रता-शंका के परिवर्जन के लिए एतद्द्वारा घोषित किया जाता है कि अनुसूचित जातियों का या अनुसूचित जनजातियों का कोई सदस्य किसी ऐसे स्थान को जो उन जातियों या जनजातियों के सदस्यों के लिए आरक्षित नहीं हैं, धारण करने के लिए निरर्हित नहीं होगा यदि वह, [यथास्थिति,] संविधान और इस अधिनियम के 5[या संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 (1963 का 49)] के अधीन उस स्थान को धारण करने के लिए अन्यथा अर्हित है ।
55क. [संसदीय और विधान सभा निर्वाचन-क्षेत्रों में निर्वाचन लड़ने से निवृत्त होना ।]-लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1958 (1958 का 58) की धारा 22 द्वारा निरसित ।
अध्याय 4-मतदान
56. मतदान के लिए समय नियत करना- [निर्वाचन आयोग] ऐसा समय नियत करेगा जिसके दौरान मतदान होगा और ऐसा नियत समय ऐसी रीति में प्रकाशित किया जाएगा जैसा विहित किया जाए:
परंतु [संसदीय या सभा के निर्वाचन-क्षेत्र] में निर्वाचन के लिए मतदान के लिए आबंटित कुल कालावधि किसी एक दिन में आठ घंटों से कम की न होगी ।
57. आपात में मतदान का स्थगन-(1) यदि निर्वाचन में धारा 25 के अधीन उपबन्धित किसी मतदान केन्द्र में या मतदान के लिए धारा 29 की उपधारा (1) के अधीन नियत स्थान में कार्यवाहियों में बलवे या खुली हिंसा के द्वारा विघ्न या बाधा पड़ जाए या यदि निर्वाचन में किसी मतदान केन्द्र या ऐसे स्थान में किसी प्राकृतिक विपत्ति के कारण या किसी अन्य पर्याप्त हेतुक से मतदान होना संभव नहीं है, तो, यथास्थिति, ऐसे मतदान केन्द्र के लिए पीठासीन आफिसर या ऐसे स्थान में पीठासीन रिटर्निंग आफिसर मतदान को ऐसी तारीख तक के लिए स्थगित किए जाने का आख्यापन करेगा जो तत्पश्चात् अधिसूचित की जाएगी और जहां कि मतदान पीठासीन आफिसर द्वारा ऐसे स्थगित किया जाता है, वहां वह संयुक्त रिटर्निंग आफिसर को तत्क्षण इत्तिला देगा ।
(2) जब कभी मतदान उपधारा (1) के अधीन स्थगित किया जाए तब रिटर्निंग आफिसर परिस्थितियों की रिपोर्ट समुचित प्राधिकारी और निर्वाचन आयोग को अविलम्ब करेगा और वह निर्वाचन आयोग के पूर्व अनुमोदन से यथाशक्य शीघ्र वह दिन नियत करेगा जिसको मतदान पुनः प्रारम्भ होगा और वह मतदान केन्द्र या स्थान जहां, और वह समय जिसके भीतर मतदान होगा, नियत करेगा और ऐसे निर्वाचन में दिए गए मतों की गणना तब तक न करेगा जब तक ऐसा स्थगित मतदान पूरा न हो गया हो ।
(3) रिटर्निंग आफिसर यथापूर्वोक्त हर मामले में, मतदान के लिए वह तारीख, स्थान और समय, जो उपधारा (2) के अधीन नियत की गई या किया गया है, ऐसी रीति में अधिसूचित करेगा जैसी निर्वाचन आयोग निर्दिष्ट करे ।
[58. मतपेटियों के विनष्ट होने आदि की दशा में नया मतदान-(1) यदि किसी निर्वाचन में-
(क) मतदान केन्द्र में या मतदान के लिए नियत स्थान में उपयोग में लाई गई कोई मतपेटी पीठासीन आफिसर या रिटर्निंग आफिसर की अभिरक्षा में से विधिविरुद्धतया निकाल ली जाती है या घटनावश या साशय विनष्ट हो जाती है या कर दी जाती है या खो जाती है या खो दी जाती है अथवा इस विस्तार तक उसे नुकसान पहुंचाया जाता है या उसमें गड़बड़ कर दी जाती है कि उस मतदान केन्द्र या स्थान पर के मतदान का परिणाम अभिनिश्चित नहीं किया जा सकता, अथवा
[(कक) किसी मतदान मशीन में अभिलिखित करने के अनुक्रम में कोई यांत्रिक विफलता पैदा हो जाती है, अथवा]
(ख) मतदान केन्द्र या मतदान के लिए नियत स्थान में प्रक्रिया संबंधी ऐसी कोई गलती या अनियमितता की जाती है जिससे यह सम्भाव्य है कि मतदान दूषित हो जाए,
तो रिटर्निंग आफिसर उस मामले की रिपोर्ट निर्वाचन आयोग को तत्क्षण करेगा ।
(2) निर्वाचन आयोग तब सब तात्त्विक परिस्थितियों को ध्यान में रख कर, या तो-
(क) उस मतदान केन्द्र या स्थान में उस मतदान को शून्य घोषित करेगा, उस मतदान केन्द्र या स्थान में नए मतदान के लिए दिन और समय नियत करेगा और ऐसे नियत दिन और नियत समय को ऐसी रीति में अधिसूचित करेगा जैसी वह ठीक समझे, अथवा
(ख) यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उस मतदान केन्द्र या स्थान में नए मतदान के परिणाम से निर्वाचन परिणाम किसी भी प्रकार प्रभावित नहीं होगा या कि 1[मतदान मशीन की यांत्रिक विफलता या] प्रक्रिया संबंधी गलती या अनियमितता तात्त्विक नहीं है, तो रिटर्निंग आफिसर को उस निर्वाचन के आगे संचालन और पूरा किए जाने के लिए ऐसे निदेश देगा जैसे वह उचित समझे ।
(3) इस अधिनियम के और तद्धीन बनाए गए नियमों या किए गए आदेशों के उपबंध हर ऐसे नए मतदान को ऐसे लागू होंगे जैसे वे मूल मतदान को लागू हैं ।]
[58क. बूथों के बलात् ग्रहण के कारण मतदान का स्थगित या निर्वाचन का प्रत्यादिष्ट किया जाना-(1) यदि किसी निर्वाचन में, -
(क) किसी मतदान केन्द्र पर या मतदान पर या मतदान के लिए नियत स्थान पर (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् स्थान कहा गया है) बूथ का बलात् ग्रहण ऐसी रीति से किया गया है जिससे ऐसे मतदान केन्द्र या स्थान में मतदान का परिणाम अभिनिश्चित नहीं किया जा सकता है; अथवा
(ख) किसी मतगणना स्थान पर बूथ का बलात् ग्रहण ऐसी रीति से किया जाता है कि उस स्थान पर मतगणना का परिणाम अभिनिश्चित नहीं किया जा सकता है,
तो रिटर्निंग आफिसर उस मामले की रिपोर्ट निर्वाचन आयोग को तत्क्षण करेगा ।
(2) निर्वाचन आयोग रिटर्निंग आफिसर से उपधारा (1) के अधीन रिपोर्ट प्राप्त होने पर और सब तात्त्विक परिस्थितियों को ध्यान में रख कर या तो, -
(क) उस मतदान केन्द्र या स्थान में उस मतदान को, शून्य घोषित करेगा, उस मतदान केन्द्र या स्थान में नए सिरे से मतदान के लिए दिन और समय नियत करेगा और ऐसे नियत दिन और समय को ऐसी रीति में अधिसूचित करेगा, जैसी वह ठीक समझे; अथवा
(ख) यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अधिक संख्या में मतदान केन्द्रों या स्थानों के बलात् ग्रहण को देखते हुए, निर्वाचन के परिणाम पर प्रभाव पड़ने की संभाव्यता है या यह कि बूथों के बलात् ग्रहण का मतों की गणना पर ऐसी रीति से प्रभाव पड़ा है जिससे निर्वाचन का परिणाम प्रभावित होगा, तो वह उस निर्वाचन-क्षेत्र में निर्वाचन को प्रत्यादिष्ट करेगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा में, बूथों के बलात् ग्रहण" का वही अर्थ है जो धारा 135क में है ।]
59. निर्वाचनों में मत देने की रीति-ऐसे हर निर्वाचन में, जिसमें मतदान होता है, मतपत्र द्वारा ऐसी रीति में मत दिए जाएंगे जैसी विहित की जाए [और इस अधिनियम द्वारा अभिव्यक्त रूप से जैसा उपबंधित है, उसके सिवाय, कोई मत परोक्षी के माध्यम से नहीं लिया जाएगा]
[परन्तु राज्य सभा में किसी स्थान या स्थानों को भरने के लिए हर निर्वाचन में खुले मतपत्र द्वारा मत दिए जाएंगे ।]
[60. कुछ वर्गों के व्यक्तियों द्वारा मत दिए जाने के लिए विशेष प्रक्रिया-धारा 59 में अन्तर्विष्ट उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा, -
(क) किसी व्यक्ति को, जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् 1950 का अधिनियम कहा गया है) की धारा 20 की उपधारा (8) के खंड (क) या खंड (ख) में निर्दिष्ट किया गया है, निर्वाचन-क्षेत्र में के किसी निर्वाचन में, स्वयं या डाक मतपत्र द्वारा या परोक्षी द्वारा, न कि किसी अन्य रीति में, अपना मत देने में;
(ख) निम्नलिखित व्यक्तियों में से किसी को निर्वाचन-क्षेत्र में के किसी निर्वाचन में, जिसमें मतदान होता है, स्वयं या डाक-मतपत्र द्वारा, न कि किसी अन्य रीति में, अपना मत देने में, अर्थात्: -
(i) कोई ऐसा व्यक्ति, जो 1950 के अधिनियम की धारा 20 की उपधारा (8) के खंड (ग) या खंड (घ) में निर्दिष्ट है;
(ii) किसी ऐसे व्यक्ति की, जिसको 1950 के अधिनियम की धारा 20 की उपधारा (3) के उपबंध लागू होते हैं, पत्नी और जो पत्नी उस धारा की उपधारा (6) के निबंधनों के अनुसार उस व्यक्ति के साथ मामूली तौर पर निवास कर रही हो;
(ग) किसी ऐसे व्यक्ति को, जो व्यक्तियों के किसी ऐसे वर्ग का व्यक्ति हो, जो निर्वाचन आयोग द्वारा सरकार के परामर्श से अधिसूचित किया गया है, निर्वाचन-क्षेत्र में के किसी निर्वाचन में, जिसमें मतदान होता है, ऐसी अपेक्षाओं की पूर्ति करने के अध्यधीन रहते हुए, जैसी उन नियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं, डाक मतपत्र द्वारा, न कि किसी अन्य रीति में, अपना मत देने में;
(घ) किसी ऐसे व्यक्ति को, जो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन निवारक निरोध के अध्यधीन है, निर्वाचन-क्षेत्र के ऐसे निर्वाचन में, जिसमें मतदान होता है, ऐसी अपेक्षाओं की पूर्ति करने के अध्यधीन रहते हुए, जैसी उन नियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं, डाक मतपत्र द्वारा, न कि किसी अन्य रीति में, अपना मत देने में, समर्थ बनाने के लिए उपबंध किया जा सकेगा ।]
[61. निर्वाचकों के प्रतिरूपण का निवारण करने के लिए विशेष प्रक्रिया-इस दृष्टि से कि निर्वाचकों के प्रतिरूपण का निवारण किया जा सके, -
(क) ऐसे हर निर्वाचक के, जो मतदान केन्द्र में मत देने के प्रयोजन के लिए मतपत्र या मतपत्रों के लिए आवेदन करता है, अंगूठे या किसी दूसरी अंगुली को अमिट] स्याही से, उसे ऐसे पत्र या ऐसे पत्रों के परिदान के पूर्व, चिह्नित करने के लिए,
(ख) यदि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) के अधीन उस निमित्त बनाए गए नियमों के अधीन, उस निर्वाचन-क्षेत्र के, जिसमें मतदान केन्द्र स्थित है, अभ्यर्थियों को अभिज्ञान-पत्र उन पर संलग्न उनके अपने फोटोग्राफों के सहित या उनके बिना दिए गए हैं तो यथोपरोक्त ऐसे हर निर्वाचक को मतपत्र या मतपत्रों के परिदान के पूर्व, उसके द्वारा मतदान केन्द्र के पीठासीन आफिसर या मतदान आफिसर के समक्ष अपना अभिज्ञान-पत्र पेश किए जाने के लिए, तथा
(ग) यदि जिस समय ऐसा व्यक्ति ऐसे मतपत्र के लिए आवेदन करता है उस समय उसके अंगूठे या किसी दूसरी अंगुली पर ऐसा चिह्न पहले से ही है या वह मांग पर अपने अभिज्ञान-पत्र को मतदान केन्द्र के पीठासीन आफिसर या मतदान आफिसर के समक्ष पेश नहीं करता तो वैसे किसी व्यक्ति को मतदान केन्द्र में मत देने के लिए किसी मतपत्र के परिदान का प्रतिषेध करने के लिए,
उपबंध इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा किया जा सकेगा ।]
[61क. निर्वाचनों में मतदान मशीनें-इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों में किसी बात के होते हुए भी, मतदान मशीनों से ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, मत देना और अभिलिखित करना ऐसे निर्वाचन-क्षेत्र या निर्वाचन-क्षेत्रों में अंगीकार किया जा सकेगा जो निर्वाचन आयोग प्रत्येक मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, विनिर्दिष्ट करे ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजन के लिए मतदान मशीन" से अभिप्रेत है मत देने या अभिलिखित करने के लिए प्रयुक्त कोई मशीन या साधित्र, चाहे वह इलैक्ट्रानिकी द्वारा या अन्यथा प्रचालित हों और इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए, नियमों में मतपेटी या मतपत्र के प्रति किसी निर्देश का अर्थ, जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, इस प्रकार लगाया जाएगा मानो उसके अंतर्गत जहां कहीं ऐसी मतदान मशीन का किसी निर्वाचन में प्रयोग होता है, ऐसी मतदान मशीन के प्रति निर्देश है ।]
62. मत देने का अधिकार-(1) कोई भी व्यक्ति जिसका नाम किसी निर्वाचन-क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में तत्समय प्रविष्ट नहीं है उस निर्वाचन-क्षेत्र में मत देने का हकदार न होगा और हर व्यक्ति जिसका नाम किसी निर्वाचन-क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में तत्समय प्रविष्ट है इस अधिनियम में अन्यथा स्पष्टतः उपबंधित के सिवाय उस निर्वाचन-क्षेत्र में मत देने का हकदार होगा ।
(2) कोई भी व्यक्ति किसी निर्वाचन-क्षेत्र में निर्वाचन में मत न देगा यदि वह लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) की धारा 16 में निर्दिष्ट निरर्हताओं में से किसी के अध्यधीन है ।
(3) कोई भी व्यक्ति साधारण निर्वाचन में एक ही वर्ग के एक निर्वाचन-क्षेत्र से अधिक में मत न देगा और यदि कोई व्यक्ति एक से अधिक ऐसे निर्वाचन-क्षेत्र में मत दे, तो ऐसे सब निर्वाचन-क्षेत्रों में के उसके मत शून्य होंगे ।
(4) कोई भी व्यक्ति किसी निर्वाचन में एक ही निर्वाचन-क्षेत्र में एक से अधिक बार इस बात के होते हुए भी, मत न देगा कि उसका नाम उस निर्वाचन-क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में एक से अधिक बार रजिस्ट्रीकृत है और यदि वह ऐसे मत दे देता है, तो उस निर्वाचन-क्षेत्र में उसके सब मत शून्य होंगे ।
(5) कोई भी व्यक्ति, किसी निर्वाचन में मत नहीं देगा यदि वह कारावास या निर्वासन के दण्डादेश के अधीन या अन्यथा कारावास में परिरुद्ध है या पुलिस की विधिपूर्ण अभिरक्षा में है:
परंतु इस उपधारा की कोई बात किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन निवारक निरोध के अध्यधीन व्यक्ति को लागू न होगीः
[परंतु यह और कि ऐसा कोई व्यक्ति, जिसका नाम निर्वाचक नामावली में दर्ज किया जा चुका है, इस उपधारा के अधीन मत देने पर प्रतिषेध के कारण, मतदाता होने से प्रविरत नहीं होगा ।]
[(6) उपधारा (3) और उपधारा (4) की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को लागू नहीं होगी जिसे इस अधिनियम के अधीन किसी मतदाता की ओर से, जहां तक वह ऐसे मतदाता की ओर से परोक्षी के रूप मे मत देता है, परोक्षी के रूप में मत देने के लिए प्राधिकृत किया गया है ।]
63. [मतदान पद्धति ।]-लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1961 (1961 का 40) की धारा 14 द्वारा (20-9-1961 से) निरसित ।
अध्याय 5-मतों की गणना
64. मतों की गणना-ऐसे हर निर्वाचन में, जिसमें मतदान होता है, मतों की गणना रिटर्निंग आफिसर द्वारा या उसके [पर्यवेक्षण और निदेशन] के अधीन की जाएगी और हर एक [विरोधी अभ्यर्थी] का, उसके निर्वाचन अभिकर्ता का और उसके [गणन अभिकर्ताओं] का यह अधिकार होगा कि वे गणना के समय उपस्थित रहें ।
[64क. गणना के समय मतपत्रों का विनाश, हानि, आदि-(1) यदि मतों की गणना समाप्त होने से पूर्व, किसी भी समय किसी मतदान केन्द्र पर या मतदान के लिए नियत स्थान पर उपयोग में लाए गए कोई मतपत्र निर्वाचन आफिसर की अभिरक्षा में से विधिविरुद्धतया निकाल लिए जाते हैं अथवा घटनावश या साशय विनष्ट हो जाते हैं या कर दिए जाते हैं या खो जाते हैं अथवा इस विस्तार तक उनको नुकसान पहुंचाया जाता है या उनमें गड़बड़ कर दी जाती है कि उस मतदान केन्द्र या स्थान पर के मतदान का परिणाम अभिनिश्चित नहीं किया जा सकता तो रिटर्निंग आफिसर उस मामले की रिपोर्ट निर्वाचन आयोग को तत्क्षण करेगा ।
(2) निर्वाचन आयोग तब सब तात्त्विक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर, या तो-
(क) निदेश देगा कि मतों की गणना बंद की जाए, घोषणा करेगा कि उस मतदान केन्द्र या स्थान पर का मतदान शून्य है उस मतदान केन्द्र या स्थान पर नए मतदान के लिए कोई दिन और समय नियत करेगा तथा ऐसी नियत तारीख और ऐसा नियत समय ऐसी रीति में अधिसूचित करेगा जैसी वह ठीक समझे, अथवा
(ख) यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उस मतदान केन्द्र या स्थान पर नए मतदान के परिणाम से निर्वाचन परिणाम किसी भी प्रकार प्रभावित नहीं होगा तो रिटर्निंग आफिसर को गणना के पुनरारम्भ और पूरे किए जाने के लिए और उस निर्वाचन के आगे संचालन और पूरे किए जाने के लिए जिसके बारे में मतों की गणना की गई है ऐसे निदेश देगा, जैसे वह उचित समझे ।
(3) इस अधिनियम के और तद्धीन बनाए गए नियमों या निकाले गए आदेशों के उपबंध हर ऐसे नए मतदान को ऐसे लागू होंगे जैसे वे मूल मतदान को लागू हैं ।]
65. मत बराबर होना-यदि मतों की गणना के समाप्त होने के पश्चात् यह पता चलता है कि किन्हीं अभ्यर्थियों के बीच मत बराबर हैं और मतों में से एक मत जोड़ दिए जाने से उन अभ्यर्थियों में से कोई निर्वाचित घोषित किए जाने के लिए हकदार हो जाएगा तो रिटर्निंग आफिसर उन अभ्यर्थियों के बीच लाट द्वारा तत्क्षण विनिश्चय करेगा और ऐसे अग्रसर होगा मानो जिस अभ्यर्थी के हक में लाट निकली है उसे अतिरिक्त मत प्राप्त हो गया है ।
66. निर्वाचन परिणाम की घोषणा-जब मतों की गणना समाप्त हो जाए तब रिटर्निंग आफिसर निर्वाचन परिणाम को [निर्वाचन आयोग के द्वारा तत्प्रतिकूल किसी निदेश के अभाव में तत्क्षण] उस रीति में घोषित करेगा जो इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों द्वारा उपबंधित है ।
67. निर्वाचन परिणाम की रिपोर्ट-निर्वाचन के परिणाम के घोषित किए जाने के पश्चात्, यथाशक्य निर्वाचन आफिसर उस निर्वाचन परिणाम की रिपोर्ट समुचित प्राधिकारी और निर्वाचन आयोग को और संसद् के या राज्य के विधान-मंडल के किसी सदन के निर्वाचन की दशा में, उस सदन के सचिव को भी भेज देगा और समुचित प्राधिकारी निर्वाचित अभ्यर्थियों के नामों को अन्तर्विष्ट रखने वाली घोषणाएं शासकीय राजपत्र में प्रकाशित कराएगा ।
[67क. अभ्यर्थी के निर्वाचन की तारीख-रिटर्निंग आफिसर द्वारा जिस तारीख को अभ्यर्थी के बारे में यह घोषणा की जाती है कि वह संसद् या राज्य के विधान-मंडल के ॥। किसी सदन के लिए धारा 53 ॥। ॥। या धारा 66 के उपबंधों के अधीन निर्वाचित हो गया है, उस तारीख की बाबत इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि वह उस अभ्यर्थी के निर्वाचन की तारीख है ।]
अध्याय 6-बहुस्थानिक निर्वाचन
68. संसद् के दोनों सदनों के लिए निर्वाचित हो जाने पर स्थानों का रिक्त हो जाना-(1) जो कोई व्यक्ति लोक सभा और राज्य सभा दोनों का सदस्य चुन लिया जाता है और जिसने दोनों सदनों में से किसी में अपना स्थान ग्रहण नहीं किया है वह अपने द्वारा हस्ताक्षरित और निर्वाचन आयोग के सचिव को परिदत्त लिखित सूचना द्वारा [उस तारीख के या उन तारीखों के पश्चात् वाली तारीख से दस दिन के भीतर, जिसको या जिनको वह ऐसे चुना गया है, यह प्रज्ञापित कर सकेगाट कि वह दोनों सदनों में से किस में सेवा करना चाहता है और ऐसा करने पर उसका उस सदन में स्थान, जिसमें वह सेवा नहीं करना चाहता, रिक्त हो जाएगा ।
(2) पूर्वोक्त कालावधि के भीतर ऐसी प्रज्ञापना के देने में व्यतिक्रम करने पर राज्य सभा में का उसका स्थान उस कालावधि के अवसान पर रिक्त हो जाएगा ।
(3) उपधारा (1) के अधीन दी गई प्रज्ञापना अंतिम और अप्रतिसंहरणीय होगी ।
[(4) जिस तारीख को व्यक्ति संसद् के किसी सदन का सदस्य होने के लिए चुना गया है, इस धारा और धारा 69 के प्रयोजनों के लिए वह तारीख, निर्वाचित सदस्य की दशा में, उसके निर्वाचन की तारीख होगी और नामनिर्दिष्ट सदस्य की दशा में, उसके नामनिर्देशन के भारत के राजपत्र में प्रथम प्रकाशन की तारीख होगी ।]
69. जो व्यक्ति संसद् के एक सदन के सदस्य पहले से ही हैं दूसरे सदन के लिए उनके निर्वाचित हो जाने पर उनके स्थानों का रिक्त हो जाना-(1) जो व्यक्ति लोक सभा का पहले से ही सदस्य है और ऐसे सदन में अपना स्थान ग्रहण कर चुका है यदि वह राज्य सभा का सदस्य चुन लिया जाता है तो लोक सभा में उसका स्थान [उस तारीख को, जिसको वह ऐसे चुना जाता है,] रिक्त हो जाएगा ।
(2) जो व्यक्ति राज्य सभा का पहले से ही सदस्य है और ऐसी सभा में अपना स्थान ग्रहण कर चुका है यदि वह लोक सभा का सदस्य चुन लिया जाता है तो राज्य सभा में का उसका स्थान 8[उस तारीख को, जिसको वह ऐसे चुना जाता है,] रिक्त हो जाएगा ।
70. संसद् के दोनों सदनों में से किसी में या राज्य के विधान-मंडल के सदन या दोनों सदनों में से किसी में के एक से अधिक स्थान के लिए निर्वाचन-यदि कोई व्यक्ति संसद् के दोनों सदनों में से किसी में या राज्य के विधान-मंडल के सदन या दोनों सदनों में से किसी एक से अधिक स्थान के लिए निर्वाचित हो गया है तो जब तक कि वह, [यथास्थिति, अध्यक्ष या सभापति को या ऐसे अन्य प्राधिकारी या आफिसर को, जैसा विहित किया जाए, संबोधित अपने हस्ताक्षर सहितट लेख द्वारा उन स्थानों में से केवल एक के अतिरिक्त सब के त्यागपत्र विहित समय के अन्दर नहीं दे देता वे सब स्थान रिक्त हो जाएंगे ।
अध्याय 7-निर्वाचन परिणामों और नामनिर्देशनों का प्रकाशन
[71. राज्य सभा के निर्वाचन परिणामों का और राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्दिष्ट व्यक्तियों के नामों का प्रकाशन-धारा 12 के अधीन निकाली गई अधिसूचनाओं के अनुसरण में, किसी वर्ष में किए गए निर्वाचनों के पश्चात् उन सदस्यों के नाम, जो राज्यों की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा और विभिन्न [संघ राज्यक्षेत्रों] के लिए निर्वाचकगणों के सदस्यों द्वारा उक्त निर्वाचनों में निर्वाचित किए गए हैं, ऐसे किन्हीं व्यक्तियों के नामों के सहित, जिन्हें राष्ट्रपति ने, राज्य सभा के लिए अनुच्छेद 80 के खंड (1) के उपखंड (क) के अधीन या किन्हीं अन्य उपबंधों के अधीन नामनिर्दिष्ट किया है, शासकीय राजपत्र में समुचित प्राधिकारी द्वारा अधिसूचित किए जाएंगे ।
72. [कतिपय संघ राज्यक्षेत्रों के निर्वाचकगण के पुनर्गठन के लिए निर्वाचनों के परिणामों का प्रकाशन ।]-क्षेत्रीय परिषद् अधिनियम, 1956 (1956 का 103) की धारा 66 द्वारा निरसित ।
73. लोक सभा और राज्य विधान सभाओं के लिए साधारण निर्वाचनों के परिणामों का प्रकाशन-जहां कि नई लोक सभा या नई राज्य विधान सभा गठित करने के प्रयोजन के लिए साधारण निर्वाचन किया जाता है वहां [सभी निर्वाचन-क्षेत्रों में (जो उन निर्वाचन-क्षेत्रों से भिन्न हों जिनमें धारा 30 के खंड (घ) के अधीन मूलतः नियत तारीख को किसी कारणवश मतदान नहीं हो सका था जिनके लिए निर्वाचन समाप्त होने का समय धारा 153 के उपबंधों के अधीन बढ़ा दिया गया है) यथास्थिति, धारा 53 या धारा 66 के उपबंधों के अधीन रिटर्निंग आफिसर द्वारा परिणामों की घोषणा किए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र उन सदस्यों के नाम, जो उन निर्वाचन-क्षेत्रों से निर्वाचित हुए हों, शासकीय राजपत्र में [निर्वाचन आयोग] द्वारा अधिसूचित किए जाएंगेट ॥। और ऐसी अधिसूचना के निकलने पर उस लोक सभा या विधान सभा की बाबत यह समझा जाएगा कि वह सम्यक् रूप से गठित हो गई है :
परंतु ऐसी अधिसूचना के निकाले जाने से यह न समझा जाएगा कि वह-
[(क) (i) किसी संसदीय या किसी सभा निर्वाचन-क्षेत्र या निर्वाचन-क्षेत्रों में, जिनमें धारा 30 के खंड (घ) के अधीन मूलतः नियत तारीख को किसी कारणवश मतदान नहीं हो सका था, मतदान करने और निर्वाचन की समाप्ति को, अथवा
(ii) किसी संसदीय या किसी सभा निर्वाचन-क्षेत्र या निर्वाचन-क्षेत्रों के, जिनके लिए धारा 153 के उपबंधों के अधीन समय बढ़ा दिया गया है, निर्वाचन की समाप्ति को,
प्रवारित करती है; अथवा]
(ख) उक्त अधिसूचना के निकाले जाने से अव्यवहित पूर्व कृत्य कर रही लोक सभा या राज्य विधान सभा की, यदि कोई हो, अस्तित्चावधि पर प्रभाव डालती है ।
[73क. कुछ निर्वाचनों के बारे में विशेष उपबंध-इस अधिनियम की धारा 73 में या उसके किसी अन्य उपबंध में किसी बात के होते हुए भी, नवीं लोक सभा के विघटन पर नई लोक सभा का गठन करने के प्रयोजन के लिए साधारण निर्वाचन के संबंध में, -
(क) धारा 73 के अधीन अधिसूचना जम्मू-कश्मीर राज्य के संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों को हिसाब में लिए बिना जारी की जा सकेगी; और
(ख) निर्वाचन आयोग जम्मू-कश्मीर राज्य के संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों से निर्वाचनों के संबंध में पृथक् रूप से और ऐसी रीति से तथा ऐसी तारीख या तारीखों को, जो वह समुचित समझे, कार्रवाई कर सकेगा ।]
74. राज्य विधान परिषदों के लिए निर्वाचन परिणामों का और ऐसी परिषदों के लिए नामनिर्दिष्ट व्यक्तियों के नामों का प्रकाशन- [धारा 15क के अधीन निकाली गई अधिसूचनाओं के अनुसरण में] या धारा 16 के अधीन निकाली गई अधिसूचनाओं के अनुसरण में, किसी वर्ष में किए गए निर्वाचनों के पश्चात् उन सदस्यों के नाम, जो विभिन्न परिषद् निर्वाचन-क्षेत्रों के लिए और राज्य की विधान सभा के सदस्यों द्वारा उक्त निर्वाचनों में निर्वाचित किए गए हैं, किन्हीं ऐसे व्यक्तियों के नामों सहित, जिन्हें राज्यपाल ॥। अनुच्छेद 171 के खंड (3) के उपखंड (ङ) के अधीन नामनिर्दिष्ट किया है, शासकीय राजपत्रों में समुचित प्राधिकारी द्वारा अधिसूचित किए जाएंगे ।]
[अध्याय 7क
आस्तियों और दायित्वों की घोषणा
75क. आस्तियों और दायित्वों की घोषणा-(1) संसद् के किसी सदन के लिए प्रत्येक निर्वाचित अभ्यर्थी, उस तारीख से, जिसको वह संसद् के किसी भी सदन में अपना स्थान ग्रहण करने के लिए, संविधान की तीसरी अनुसूची में उक्त प्रयोजन के लिए वर्णित प्ररूप के अनुसार शपथ लेता है या प्रतिज्ञान करता है, नब्बे दिन के भीतर, यथास्थिति, राज्य सभा के सभापति या लोक सभा के अध्यक्ष को निम्नलिखित के संबंध में, सूचना देगा-
(i) जंगम और स्थावर संपत्ति, जिसका वह, उसकी पत्नी या उसका पति और उसके आश्रित बालक संयुक्ततः या पृथक्तः स्वामी है या हिताधिकारी हैं;
(ii) किसी लोक वित्तीय संस्था के प्रति उसके दायित्व; और
(iii) केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार के प्रति उसके दायित्व ।
(2) उपधारा (1) के अधीन सूचना ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से दी जाएगी जो उपधारा (3) के अधीन बनाए गए नियमों में विहित की जाए ।
(3) यथास्थिति, राज्य सभा का सभापति या लोक सभा का अध्यक्ष उपधारा (2) के प्रयोजनों के लिए नियम बना सकेगा ।
(4) यथास्थिति, राज्य सभा के सभापति या लोक सभा के अध्यक्ष द्वारा उपधारा (3) के अधीन बनाए गए नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, यथास्थिति, राज्य सभा या लोक सभा के समक्ष, जब वह ऐसी कुल तीस दिन की अवधि के लिए, जो एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी, सत्र में हो, रखे जाएंगे और वे उक्त तीस दिन की अवधि की समाप्ति के पश्चात् प्रभावी हो जाएंगे जब तक कि उनका उससे पूर्व राज्य सभा या लोक सभा द्वारा उपांतरणों सहित या उनके बिना अनुमोदन नहीं कर दिया जाता अथवा अननुमोदन नहीं कर दिया जाता और जहां उनका इस प्रकार अनुमोदन कर दिया जाता है वहां वे ऐसे अनुमोदन पर, यथास्थिति, उस रूप में प्रभावी हो जाएंगे जिसमें वे रखे गए थे या इस प्रकार उपांतरित रूप में प्रभावी होंगे और जहां उनका इस प्रकार अननुमोदन किया जाता है वहां वे निप्रभावी हो जाएंगे ।
(5) यथास्थिति, राज्य सभा का सभापति या लोक सभा का अध्यक्ष यह निदेश दे सकेगा कि उपधारा (1) में निर्दिष्ट संसद् के किसी सदन के लिए किसी निर्वाचित अभ्यर्थी द्वारा, उपधारा (3) के अधीन बनाए गए नियमों के किसी स्वेच्छया उल्लंघन के संबंध में उसी रीति से कार्रवाई की जा सकेगी जिसमें, यथास्थिति, लोक सभा या राज्य सभा के विशेषाधिकार के भंग की दशा में की जाती है ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -
(i) स्थावर संपत्ति" से भूमि अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत कोई भवन या उक्त भूमि से संलग्न अन्य संरचना या ऐसी किसी चीज से स्थायी रूप से जुड़ी हुई कोई चीज है जो भूमि से संलग्न है;
(ii) जंगम संपत्ति" से कोई ऐसी अन्य संपत्ति अभिप्रेत है जो स्थावर संपत्ति नहीं है और इसके अंतर्गत प्रत्येक प्रकार की मूर्त और अमूर्त संपत्ति भी है;
(iii) लोक वित्तीय संस्था" से कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 4क के अर्थान्तर्गत लोक वित्तीय संस्था अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत बैंक भी है;
(iv) खंड (iii) में निर्दिष्ट बैंक" से अभिप्रेत है-
(क) भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 (1955 का 23) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय स्टेट बैंक";
(ख) समनुषंगी बैंक, जिसका वही अर्थ है जो उसका भारतीय स्टेटट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) की धारा 2 के खंड (ट) में है;
(ग) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 (1976 का 21) की धारा 3 के अधीन स्थापित प्रादेशिक ग्रामीण बैंक;
(घ) तत्स्थानी नया बैंक, जिसका वही अर्थ है जो उसका बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खंड (घक) में है; और
(ङ) सहकारी बैंक, जिसका वही अर्थ है जो उसका बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 56 के खंड (ग) के उपखंड (i)द्वारा यथा उपांतरित उस अधिनियम की धारा 5 के खंड (गगत्) में है; और
(ध्) आश्रित बालक" से ऐसे पुत्र और पुत्रियां अभिप्रेत हैं जिनके उपार्जन के कोई पृथक् साधन नहीं हैं और जो अपनी जीविका के लिए उपधारा (1) में निर्दिष्ट निर्वाचित अभ्यर्थी पर पूर्णतः आश्रित हैं ।]
अध्याय 8-निर्वाचन व्यय
[76. अध्याय का लागू होना-यह अध्याय केवल लोक सभा के और राज्य की विधान सभा के लिए निर्वाचनों को लागू होगा ।]
77. निर्वाचन व्ययों का लेखा और उनकी अधिकतम मात्रा-(1) निर्वाचन में हर अभ्यर्थी निर्वाचन संबंधी उस सब व्यय का जो, [उस तारीख के, जिसको यह नामनिर्दिष्ट किया गया है] और उस निर्वाचन के परिणामों की घोषणा, की तारीख के, जिनके अंतर्गत ये दोनों तारीखें आती हैं, बीच स्वयं द्वारा या उसके निर्वाचन अभिकर्ता द्वारा उपगत या प्राधिकृत किया गया है, पृथक् और सही लेखा या तो वह स्वयं रखेगा या अपने निर्वाचन अभिकर्ता द्वारा रखवाएगा ।
[स्पष्टीकरण 1-शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि, -
(क) किसी राजनैतिक दल के नेताओं द्वारा, राजनैतिक दल के कार्यक्रम का प्रचार करने के लिए वायुयान द्वारा या परिवहन के किसी अन्य साधन द्वारा की गई यात्रा मद्धे उपगत व्यय इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए उस राजनैतिक दल के अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता द्वारा निर्वाचन के संबंध में उपगत या प्राधिकृत व्यय नहीं माना जाएगा;
(ख) सरकार की सेवा में और धारा 123 के खंड (7) में वर्णित वर्गों में से किसी से संबंधित किसी व्यक्ति द्वारा, उस खंड के परन्तुक में यथावर्णित अपने शासकीय कर्तव्य के निर्वहन में या तात्पर्यित निर्वहन में की गई किन्हीं व्यवस्थाओं, प्रदान की गई सुविधाओं या किए गए किसी अन्य कार्य या बात के संबंध में उपगत कोई व्यय, इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता द्वारा निर्वाचन के संबंध में उपगत या प्राधिकृत व्यय नहीं माना जाएगा ।
स्पष्टीकरण 2-स्पष्टीकरण 1 के खंड (क) के प्रयोजनों के लिए, किसी निर्वाचन के संबंध में, राजनैतिक दल के नेताओं" पद से, -
(i) जहां ऐसा राजनैतिक दल मान्यताप्राप्त राजनैतिक दल है, वहां संख्या में चालीस से अनधिक ऐसे व्यक्ति, और
(ii) जहां ऐसा राजनैतिक दल किसी मान्याप्राप्त राजनैतिक दल से भिन्न है, वहां संख्या में बीस से अनधिक ऐसे व्यक्ति,
अभिप्रेत हैं जिनके नाम राजनैतिक दल द्वारा ऐसे निर्वाचन के प्रयोजनों के लिए नेताओं के रूप में ऐसे निर्वाचन के लिए, यथास्थिति, भारत के राजपत्र में या उस राज्य के राजपत्र में इस अधिनियम के अधीन प्रकाशित अधिसूचना की तारीख से सात दिन की अवधि के भीतर निर्वाचन आयोग और राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को संसूचित कर दिए गए हैं:
परन्तु कोई राजनैतिक दल, उस दशा में जहां, यथास्थिति, खंड (i) में या खंड (ii) में निर्दिष्ट व्यक्तियों में से किसी की मृत्यु हो जाती है या वह ऐसे राजनैतिक दल का सदस्य नहीं रहता है, निर्वाचन आयोग और राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को और संसूचना द्वारा, ऐसे निर्वाचन के लिए अंतिम मतदान पूरा होने के लिए नियत समय समाप्त होने के ठीक अड़तालीस घंटे पहले समाप्त होने वाली अवधि के दौरान, इस प्रकार मृत व्यक्ति या सदस्य न रहे व्यक्ति के नाम के स्थान पर, नए नेता को पदाभिहित करने के प्रयोजनों के लिए नया नाम प्रतिस्थापित कर सकेगी ।]
(2) लेखे में ऐसी विशिष्टियां अन्तर्विष्ट होंगी जैसी विहित की जाएं ।
(3) उक्त व्यय का जोड़ उस रकम से अधिक न होगा जो विहित की जाए ।
78. लेखे को जिला निर्वाचन आफिसर के पास दाखिल किया जाना- [(1)] निर्वाचन में का हर निर्वाचन लड़ने वाला अभ्यर्थी निर्वाचित अभ्यर्थी के निर्वाचन की तारीख से या यदि निर्वाचन में एक से अधिक निर्वाचित अभ्यर्थी हैं, और उनके निर्वाचन की तारीखें भिन्न हैं तो उन तारीखों में से पश्चात्वर्ती तारीख से तीस दिन के अन्दर अपने निर्वाचन व्ययों का लेखा जो उस लेखा की सही प्रति होगी जिसे उसने या उसके निर्वाचन अभिकर्ता ने धारा 77 के अधीन रखा है [जिला निर्वाचन आफिसर] के पास दाखिल करेगा ।
। । । । । । ।
[भाग 5क
मान्यताप्राप्त राजनैतिक दलों के अभ्यर्थियों को कतिपय सामग्री का निःशुल्क प्रदाय
78क. निर्वाचक नामावलियों की प्रतियों का निःशुल्क प्रदाय-(1) सरकार, लोक सभा या किसी राज्य की विधान सभा का गठन करने के प्रयोजनों के लिए होने वाले किसी निर्वाचन में, मान्यताप्राप्त राजनैतिक दलों के अभ्यर्थियों को लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) के अधीन अंतिम रूप से यथाप्रकाशित निर्वाचक नामावलियों की उतनी प्रतियों का और ऐसी अन्य सामग्री का, जो विहित की जाए, निःशुल्क प्रदाय करेगी ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट सामग्री का, -
(i) ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जिन्हें अभ्यर्थी द्वारा धारा 77 के अधीन उपगत किए जा सकने वाले अधिकतम व्यय को कम करने के संबंध में, केन्द्रीय सरकार, निर्वाचन आयोग के परामर्श से, अधिरोपित करे; और
(ii) ऐसे अधिकारियों के माध्यम से, जो निर्वाचन आयोग द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं और जो ऐसे साधारण या विशेष निदेशों के अनुसार कार्य करेंगे, जो निर्वाचन आयोग द्वारा दिए जाएं,
प्रदाय किया जाएगा ।
78ख. अभ्यर्थियों आदि, को कतिपय वस्तुओं का प्रदाय-(1) निर्वाचन आयोग, लोक सभा या किसी राज्य की विधान सभा का गठन करने के प्रयोजनों के लिए निर्वाचन को आहूत करने वाली अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख और उस तारीख के, जिसको मतदान होना है, बीच किसी भी समय, संबंधित निर्वाचन-क्षेत्रों में निर्वाचकों को या मान्यताप्राप्त राजनैतिक दलों द्वारा खड़े किए गए अभ्यर्थियों को ऐसी वस्तुएं, जिन्हें केन्द्रीय सरकार, निर्वाचन आयोग के परामर्श से, आदेश द्वारा अवधारित करे, प्रदाय करेगा या करवाएगा ।
(2) जहां निर्वाचन आयोग, उपधारा (1) के अधीन अभ्यर्थियों को वस्तुओं का प्रदाय करता है वहां केन्द्रीय सरकार, निर्वाचन आयोग के परामर्श से, उस अधिकतम व्यय को कम करने के संबंध में, जो अभ्यर्थी द्वारा धारा 77 के अधीन उपगत किया जा सकता है, शर्तें अधिरोपित कर सकेगी ।
स्पष्टीकरण-धारा 39क, इस अध्याय और धारा 169 की उपधारा (2) के खंड (जज) के प्रयोजनों के लिए, मान्यताप्राप्त राजनैतिक दल" का वही अर्थ होगा, जो निर्वाचन संप्रतीक (आरक्षण और आबंटन) आदेश, 1968 में है ।]
भाग 6
निर्वाचनों की बाबत विवाद
अध्याय 1-निर्वाचन
79. परिभाषाएं-इस भाग में और [भाग 7] में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो-
[(क) किसी ऐसे संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में, जहां न्यायिक आयुक्त का न्यायालय है, उच्च न्यायालय के या उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति के या न्यायाधीश के प्रति निर्देश का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वह, यथास्थिति, न्यायिक आयुक्त के उक्त न्यायालय के प्रति या न्यायिक आयुक्त के प्रति या किसी अपर न्यायिक आयुक्त के प्रति निर्देश है;]
[(ख) अभ्यथी" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो किसी निर्वाचन में अभ्यर्थी के रूप में सम्यक्तः नामनिर्दिष्ट किया गया है या सम्यक्ततः नामनिर्दिष्ट होने का दावा करता है;]
(ग) खर्चे” से निर्वाचन अर्जी के विचारण के या उससे आनुषंगिक सब खर्चे, प्रभार और व्यय अभिप्रेत है;
(घ) निर्वाचन अधिकार" से किसी निर्वाचन में अभ्यर्थी के रूप में खड़े होने या न खड़े होने या अभ्यर्थिता [वापस लेने या न लेने] या मत देने से विरत रहने का किसी व्यक्ति का अधिकार अभिप्रेत है;
[(ङ) उच्च न्यायालय" से वह उच्च न्यायालय अभिप्रेत है जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर वह निर्वाचन हुआ है जिससे निर्वाचन अर्जी सम्बद्ध है;]
(च) निर्वाचित अभ्यथी" से ऐसा अभ्यर्थी अभिप्रेत है जिसका नाम सम्यक् निर्वाचित के रूप में धारा 67 के अधीन प्रकाशित कर दिया गया है ।
अध्याय 2-निर्वाचन अर्जियों का [उच्च न्यायालय] को उपस्थित किया जाना
80. निर्वाचन अर्जियां-कोई भी निर्वाचन इस भाग के उपबंधों के अनुसार उपस्थित की गई निर्वाचन अर्जी द्वारा प्रश्नगत किए जाने के सिवाय प्रश्नगत न किया जाएगा ।
[80क. उच्च न्यायालय द्वारा निर्वाचन अर्जियों का विचारण-(1) उच्च न्यायालय ही निर्वाचन अर्जी का विचारण करने की अधिकारिता रखने वाला न्यायालय होगा ।
(2) ऐसी अधिकारिता मामूली तौर पर उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश द्वारा प्रयुक्त की जाएगी और मुख्य न्यायमूर्ति उस प्रयोजन के लिए समय-समय पर एक या अधिक न्यायाधीश समनुदिष्ट करेगा:
परंतु जहां कि उच्च न्यायालय केवल एक न्यायाधीश द्वारा गठित है, वहां वह उस न्यायालय को उपस्थापित सब निर्वाचन अर्जियों का विचारण करेगा ।
(3) उच्च न्यायालय न्याय या सुविधा के हितों में किसी निर्वाचन अर्जी का पूर्णतः या भागतः विचारण ऐसे स्थान में जो उच्च न्यायालय की बैठक के स्थान से भिन्न है स्वविवेकानुसार कर सकेगा ।]
81. अर्जियों का उपस्थित किया जाना-(1) किसी निर्वाचन को प्रश्नगत करने वाली निर्वाचन अर्जी धारा 100 की [उपधारा (1)] और धारा 101 में विनिर्दिष्ट आधारों में से एक या अधिक पर [उच्च न्यायालय] को ऐसे निर्वाचन में के किसी अभ्यर्थी द्वारा या किसी निर्वाचक द्वारा निर्वाचित अभ्यर्थी के [निर्वाचन की तारीख से या यदि निर्वाचन में एक से अधिक निर्वाचित अभ्यर्थी हैं और निर्वाचन की तारीख भिन्न है तो उन तारीखों में से पश्चात्वर्ती तारीख से पैंतालीस दिन के भीतर किंतु उस तारीख से पहले नहींट उपस्थित की जा सकेगी ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा में निर्वाचक" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो उस निर्वाचन से, जिससे निर्वाचन अर्जी सम्बद्ध है मत देने के लिए हकदार था भले ही उसने ऐसे निर्वाचन में मतदान किया हो या न किया हो ।
। । । । । । ।
[(3) हर निर्वाचन अर्जी के साथ उसकी उतनी प्रतियां होंगी जितने प्रत्यर्थी उस अर्जी में वर्णित हैं ॥। और अर्जीदार हर ऐसी प्रति को अपने हस्ताक्षर से अनुप्रमाणित करेगा कि वह अर्जी की सही प्रति है ।]
[82. अर्जी के पक्षकार-अर्जीदार अपनी अर्जी में प्रत्यर्थी के रूप में-
(क) उस दशा में, जिसमें कि अर्जीदार इस घोषणा के लिए कि सब निर्वाचित अभ्यर्थियों या उनमें से किसी का निर्वाचन शून्य है, दावा करने के अतिरिक्त इस अतिरिक्त घोषणा के लिए भी कि वह स्वयं या कोई अन्य अभ्यर्थी सम्यक्त रूप से निर्वाचित हो गया है दावा करता है, अर्जीदार से भिन्न निर्वाचन लड़ने वाले अभ्यर्थियों को और उस दशा मे, जिसमें कि ऐसी अतिरिक्त घोषणा के लिए दावा नहीं किया गया है सब निर्वाचन अभ्यर्थियों को; तथा
(ख) किसी अन्य अभ्यर्थी को जिसके विरुद्ध किसी भ्रष्ट आचरण के अभिकथन अर्जी में किए गए हैं,
संयोजित करेगा ।]
[83. अर्जी की अन्तर्वस्तु-(1) निर्वाचन अर्जी-]
(क) में उन तात्त्विक तथ्यों का संक्षिप्त कथन अन्तर्विष्ट होगा जिन पर अर्जीदार निर्भर करता है;
(ख) में ऐसे किसी भ्रष्ट आचरण की पूरी विशिष्टियां, जिनका अर्जीदार अभिकथन करता है, उन पक्षकारों के नामों के यथाशक्य पूर्ण कथन के सहित जिनकी बाबत यह अभिकथन है कि उन्होंने ऐसा भ्रष्ट आचरण किया है और हर एक ऐसा आचरण किए जाने की तारीख और स्थान उपवर्णित होगा; तथा
(ग) अर्जीदार द्वारा हस्ताक्षरित की जाएगी और उस रीति में सत्यापित की जाएगी जो अभिवचनों के सत्यापन के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में अधिकथित है:
[परंतु जहां कि अर्जीदार किसी भ्रष्ट आचरण का अभिकथन करता है, वहां ऐसे भ्रष्ट आचरण के अभिकथन के और उसकी विशिष्टियों के समर्थन में विहित प्ररूप में एक शपथपत्र भी अर्जी के साथ होगा ।]
(2) अर्जी में लगी हुई कोई अनुसूची या उपाबन्ध भी अर्जीदार द्वारा हस्ताक्षरित किया जाएगा और उसी रीति में सत्यापित किया जाएगा जिस रीति में अर्जी सत्यापित की जाती है ।]
[84. वह अनुतोष जिसका दावा अर्जीदार कर सकेगा-अर्जीदार इस घोषणा का कि सब निर्वाचित अभ्यर्थियों या उनमें से किसी का निर्वाचन शून्य है, दावा करने के अतिरिक्त इस अतिरिक्त घोषणा का भी दावा कर सकेगा कि वह स्वयं या कोई अन्य अभ्यर्थी सम्यक् रूप से निर्वाचित हो गया है ।]
85. [याचिका प्राप्त होने पर प्रक्रिया ।]-लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1966 (1966 का 47) की धारा 40 द्वारा निरसित ।
अध्याय 3-निर्वाचन अर्जियों का विचारण
[86. निर्वाचन अर्जियों का विचारण-(1) उच्च न्यायालय किसी निर्वाचन अर्जी को खारिज कर देगा जो धारा 81 या धारा 82 या धारा 117 के उपबन्धों का अनुपालन नहीं करती है ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के अधीन निर्वाचन अर्जी को खारिज करने वाला उच्च न्यायालय का आदेश धारा 98 के खंड (क) के अधीन किया गया आदेश समझा जाएगा ।
(2) उच्च न्यायालय को निर्वाचन अर्जी उपस्थापित किए जाने के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र उसे उस न्यायाधीश को या उन न्यायाधीशों में से एक को निर्दिष्ट किया जाएगा जो निर्वाचन अर्जियों के विचारण के लिए मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा धारा 80क की उपधारा (2) के अधीन समनुदिष्ट किया गया है या किए गए हैं ।
(3) जहां कि उसी निर्वाचन की बाबत एक से अधिक निर्वाचन अर्जियां उच्च न्यायालय को उपस्थापित की जाती हैं, वहां उनमें से सब उसी न्यायाधीश को विचारण के लिए निर्दिष्ट की जाएंगी जो अपने विवेकानुसार उनको पृथक्तः या एक या अधिक समूहों में विचारित कर सकेगा ।
(4) कोई अभ्यर्थी, जो पहले से ही प्रत्यर्थी न हों, विचारण के प्रारम्भ की तारीख से चौदह दिन के भीतर उच्च न्यायालय से उसके द्वारा आवेदन किए जाने पर और खर्चों के लिए प्रतिभूति के बारे में किसी ऐसे आदेश के अध्यधीन, जो उच्च न्यायालय द्वारा किया जाए, प्रत्यर्थी के रूप में संयोजित किए जाने का हकदार होगा ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा और धारा 97 के प्रयोजनों के लिए किसी अर्जी का विचारण उस तारीख को प्रारम्भ हुआ समझा जाएगा जो प्रत्यर्थियों के उच्च न्यायालय के समक्ष उपसंजात होने और अर्जी में किए गए दावे या दावों का उत्तर देने के लिए नियत की गई है ।
(5) उच्च न्यायालय खर्चों के बारे में और अन्यथा ऐसे निबंधनों पर, जिन्हें वह ठीक समझे, अर्जी में अभिकथित किसी भ्रष्ट आचरण की विशिष्टियों के ऐसी रीति में संशोधन किए जाने या परिवर्धित किए जाने की अनुज्ञा दे सकेगा जैसी अर्जी के ऋजु या प्रभावी विचारण को सुनिश्चित करने के लिए उसकी राय में आवश्यक हों, किन्तु अर्जी का कोई ऐसा संशोधन अनुज्ञात नहीं करेगा जिसका प्रभाव भ्रष्ट आचरण की ऐसी विशिष्टियों को, जो अर्जी में पहले से अभिकथित न हों, प्रविष्ट करने का हो ।
(6) निर्वाचन अर्जी का विचारण, जहां तक कि वह विचारण के बारे में न्याय के हितों से संगत रहते हुए साध्य हो उसकी समाप्ति तक दिन प्रतिदिन चालू रहेगा जब तक उच्च न्यायालय उन कारणों से जो अभिलिखित किए जाएंगे यह निष्कर्ष न निकाले कि विचारण को आगामी दिन से परे स्थगित करना आवश्यक है ।
(7) हर निर्वाचन अर्जी यथासंभव शीघ्रता से विचारित की जाएगी और उस तारीख से, जिसको निर्वाचन अर्जी उच्च न्यायालय को विचारण के लिए उपस्थापित की गई है, छह मास के भीतर विचारण को समाप्त करने का प्रयत्न किया जाएगा ।
87. उच्च न्यायालय के समक्ष प्रक्रिया-(1) इस अधिनियम के और तद्धीन बनाए गए किन्हीं भी नियमों के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, हर निर्वाचन अर्जी उच्च न्यायालय द्वारा यथाशक्य निकटतम उस प्रक्रिया के अनुसार विचारित की जाएगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन वादों के विचारण को लागू है:
परंतु उच्च न्यायालय को यह विवेकाधिकार होगा कि वह उन कारणों से जो लेखन द्वारा अभिलिखित किए जाएंगे किसी साक्षी या साक्षियों की परीक्षा करने से इन्कार कर दे, यदि उसकी यह राय हो कि ऐसे साक्षी या साक्षियों का साक्ष्य अर्जी के विनिश्चय के लिए तात्त्विक नहीं है या यह कि ऐसे साक्षी या साक्षियों को पेश करने वाला पक्षकार तुच्छ आधारों पर या कार्यवाहियों को निलंबित करने की दृष्टि से ऐसा कर रहा है ।
(2) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) के उपबन्ध इस अधिनियम के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए सब प्रकार निर्वाचन अर्जी के विचारण को लागू होंगे, यह समझा जाएगा ।]
93. दस्तावेजी साक्ष्य-किसी अधिनियमिति में कोई प्रतिकूल बात होते हुए भी, कोई भी दस्तावेज निर्वाचन अर्जी के विचारण में साक्ष्य के रूप में इस आधार पर कि वह सम्यक् रूप से स्टाम्पित या रजिस्ट्रीकृत नहीं है अग्राह्य न होगी ।
94. मतदान की गोपनीयता का अतिलंघन न किया जाना-किसी साक्ष्य या अन्य व्यक्ति से यह कथित करने की अपेक्षा न की जाएगी कि उसने निर्वाचन में किसके लिए मत दिया है:
[परन्तु यह धारा ऐसे साक्षी या अन्य व्यक्ति को लागू नहीं होगी जिसने खुले मतपत्र द्वारा मत दिया हो ।]
95. अपराध में फंसाने वाले प्रश्नों का उत्तर देना और परित्राण का प्रमाणपत्र-(1) कोई साक्षी, निर्वाचन अर्जी के विचारण में विवाद्यक विषय से सुसंगत किसी विषय के बारे में किए गए किसी प्रश्न का उत्तर देने से, इस आधार पर क्षम्य न होगा कि ऐसे प्रश्न का उत्तर ऐसे साक्षी को अपराध में फंसा सकेगा या उसकी प्रवृत्ति अपराध में फंसाने की होगी अथवा वह ऐसे साक्षी को किसी शास्ति या समपहरण के लिए उच्छन्न कर सकेगा या उसकी प्रवृत्ति उच्छन्न करने की हो सकेगी:
परंतु-
(क) वह साक्षी जो उन सब प्रश्नों का सही उत्तर देता है जिनका उत्तर देने की उससे अपेक्षा की गई है [उच्च न्यायालय] से परित्राण प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए हकदार होगा, तथा
(ख) 2[उच्च न्यायालय] के द्वारा या समक्ष किए गए प्रश्न का जो उत्तर साक्षी द्वारा दिया गया है, वह उस साक्ष्य संबंधी शपथ-भंग के लिए दाण्डिक कार्यवाही की दशा में ग्राह्य होने के सिवाय, उसके विरुद्ध किसी सिविल या दाण्डिक कार्यवाही में साक्ष्य में ग्राह्य न होगा ।
(2) जबकि किसी साक्षी को परित्राण प्रमाणपत्र अनुदत्त कर दिया गया है तब उसका अभिवचन वह किसी न्यायालय में कर सकेगा और ऐसे किसी विषय से उद्भूत होने वाले, जिसके संबंध में ऐसा प्रमाणपत्र है, भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 9क के अधीन या इस अधिनियम के भाग 7 के अधीन किसी आरोप के विरुद्ध या बाबत सम्पूर्ण प्रतिरक्षा होगी, किन्तु उसकी बाबत यह न समझा जाएगा कि वह निर्वाचन से संसक्त किसी ऐसी निरर्हता से, जो इस अधिनियम या किसी अन्य विधि द्वारा अधिरोपित है, उससे अवमुक्त कर देता है ।
96. साक्षियों के व्यय-साक्ष्य देने के लिए हाजिर होने में किसी व्यक्ति द्वारा उपगत युक्तियुक्त व्यय 2[उच्च न्यायालय] ऐसे व्यक्ति को अनुज्ञात कर सकेगा और जब तक कि उच्च न्यायालय अन्यथा निर्दिष्ट न करे वे युक्तियुक्त व्यय खर्च के भाग समझे जाएंगे ।
97. स्थान के लिए दावा किए जाने पर प्रत्यारोप-(1) जबकि निर्वाचन अर्जी में इस घोषणा का दावा किया गया है कि निर्वाचित अभ्यर्थी से भिन्न कोई अभ्यर्थी सम्यक् रूप से निर्वाचित हो गया है तब निर्वाचित अभ्यर्थी या कोई अन्य पक्षकार यह साबित करने के लिए साक्ष्य दे सकेगा कि यदि ऐसा अभ्यर्थी निर्वाचित अभ्यर्थी होता और उसके निर्वाचन को प्रश्नगत करने के लिए अर्जी दी गई होती, तो ऐसे अभ्यर्थी का निर्वाचन शून्य होता:
परंतु जब तक कि निर्वाचित अभ्यर्थी या यथापूर्वोक्त जैसे अन्य पक्षकार ने अपने ऐसा करने के आशय की सूचना 2[उच्च न्यायालय] को [विचारण प्रारम्भ होने की] तारीख से चौदह दिन के भीतर न दे दी हो और क्रमशः धाराओं 117 और 118 में निर्दिष्ट प्रतिभूति और अतिरिक्त प्रतिभूति भी न दे दी हो, वह ऐसा साक्ष्य देने के लिए हकदार न होगा ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट हर सूचना के साथ वह कथन और ॥। विशिष्टियां होंगी जो निर्वाचन अर्जी की दशा में धारा 83 द्वारा अपेक्षित हैं और वह ऐसी ही रीति में हस्ताक्षरित और सत्यापित होंगी ।
98. उच्च न्यायालय का विनिश्चय-निर्वाचन अर्जी के विचारण की समाप्ति पर 2[उच्च न्यायालय]-
(क) निर्वाचन अर्जी को खारिज करने का, अथवा
(ख) यह घोषणा करने वाला कि [सब निर्वाचित अभ्यर्थियों का या उनमें से किसी] का निर्वाचन शून्य है, अथवा
(ग) यह घोषणा करने वाला कि 5[सब निर्वाचित अभ्यर्थियों का या उनमें से किसी] का निर्वाचन शून्य है और अर्जीदार या कोई अन्य अभ्यर्थी सम्यक् रूप से निर्वाचित हो गया है । ॥।
6। । । । । । ।
आदेश करेगा ।
99. उच्च न्यायालय द्वारा किए जाने वाले अन्य आदेश-(1) धारा 98 के अधीन आदेश करते समय [उच्च न्यायालय]-
[(क) उस दशा में, जिसमें अर्जी में यह आरोप किया गया है कि निर्वाचन में कोई भ्रष्ट आचरण किया गया है -
(i) यह निष्कर्ष अभिलिखित करते हुए कि निर्वाचन में ॥। किसी भ्रष्ट आचरण का किया जाना साबित हुआ है या साबित नहीं हुआ है और उस भ्रष्ट आचरण की प्रकृति अभिलिखित करते हुए, तथा
(ii) उन सब व्यक्तियों के नाम, यदि कोई हों, जिनकी बाबत विचारण में यह साबित हुआ है कि वे किसी भ्रष्ट आचरण के दोषी हैं और उस आचरण की प्रकृति अभिलिखित करते हुए, तथा]
(ख) संदेय खर्चों की कुल रकम को नियत करते हुए उन व्यक्तियों को विनिर्दिष्ट करते हुए जिनके द्वारा और जिनको खर्च दिए जाएंगे,
आदेश भी करेगाः
परंतु जब तक [उस व्यक्ति को, जो अर्जी का पक्षकार नही हैं-]
(क) 1[उच्च न्यायालय] के समक्ष उपसंजात होने के लिए और यह हेतुक दर्शित करने की कि उसे क्यों न ऐसे नामित किया जाए, सूचना न दे दी गई हो, तथा
(ख) यदि वह सूचना के अनुसरण में उपसंजात होता है, तो उस 1[उच्च न्यायालय] द्वारा पहले ही जिस साक्षी की परीक्षा की जा चुकी है और जिसने उसके विरुद्ध साक्ष्य दिया है उसकी प्रतिपरीक्षा करने का, अपनी प्रतिरक्षा में साक्ष्य पेश करने या कराने का और अपनी सुनवाई का अवसर न दे दिया गया हो, उसे खण्ड (क) के उपखंड (ii) के अधीन आदेश में 4[नामित न किया जाएगा] ।
[(2) इस धारा में और धारा 100 में अभिकर्ता" पद का वही अर्थ है जो उसका धारा 123 में है ।]
100. निर्वाचन को शून्य घोषित करने के आधार- [(1) उपधारा (2) के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए, यह कि यदि 1[उच्च न्यायालय] की यह राय है कि -
(क) निर्वाचित अभ्यर्थी अपने निर्वाचन की तारीख को स्थान भरने के लिए चुने जाने के लिए संविधान या इस अधिनियम के [या संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 (1963 का 20)] के अधीन अर्हित नहीं था या निरर्हित कर दिया गया था, अथवा
(ख) निर्वाचित अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता द्वारा या निर्वाचित अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता की सम्मति से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा कोई भ्रष्ट आचरण किया गया है, अथवा
(ग) कोई नामनिर्देशन अनुचित रूप से प्रतिक्षेपित किया गया है; अथवा
(घ) जहां तक कि निर्वाचन का परिणाम निर्वाचित अभ्यर्थी से सम्पृक्त है, वहां तक निर्वाचन परिणाम-
(i) किसी नामनिर्देशन के अनुचित प्रतिग्रहण से, अथवा
(ii) ऐसे किसी भ्रष्ट आचरण से, जो निर्वाचित अभ्यर्थी के हित में [उसके निर्वाचन अभिकर्ता से भिन्न अभिकर्ता द्वारा] किया गया है; अथवा
(iii) किसी मत के अनुचित तौर पर लिए जाने के इन्कार करने या प्रतिक्षेपित किए जाने के या ऐसे किसी मत के लिए जाने के, जो शून्य हो, कारण से, अथवा
(iv) संविधान के या अधिनियम के या इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों या आदेशों के उपबंधों के किसी अनुपालन से, तात्त्विक रूप से प्रभावित हुआ है,
तो 1[उच्च न्यायालय] निर्वाचित अभ्यर्थी के निर्वाचन की बाबत यह घोषणा करेगा कि वह शून्य है ।]
[(2)] यदि [उच्च न्यायालय] की यह राय है कि निर्वाचित अभ्यर्थी अपने निर्वाचन अभिकर्ता से भिन्न अभिकर्ता द्वारा ॥। किसी भ्रष्ट आचरण का दोषी रहा है किन्तु 2[उच्च न्यायालय] का यह समाधान हो गया है कि-
(क) अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता ने निर्वाचन में ऐसा कोई भ्रष्ट आचरण नहीं किया था और हर ऐसा भ्रष्ट आचरण अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता के आदेशों के प्रतिकूल था और उसका [सम्मति के बिना] किया गया था,
। । । । ।
(ग) अभ्यर्थी और उसके निर्वाचन अभिकर्ता ने निर्वाचन में भ्रष्ट ॥। आचरण किए जाने का निवारण करने के लिए सब युक्तियुक्त उपाय किए थे, तथा
(घ) निर्वाचन अन्य सब बातों में अभ्यर्थी या उसके अभिकर्ताओं में से किसी की तरफ से किसी भी भ्रष्ट 7॥। आचरण से मुक्त था,
तो 2[उच्च न्यायालय] यह विनिश्चय कर सकेगा कि निर्वाचित अभ्यर्थी का निर्वाचन शून्य नहीं है ।
101. निर्वाचित अभ्यर्थी से भिन्न अभ्यर्थी जिन आधारों पर निर्वाचित घोषित किया जा सकेगा वे आधार-यदि ऐसे किसी व्यक्ति ने, जिसने अर्जी दाखिल की है निर्वाचित अभ्यर्थी के निर्वाचन को प्रश्नगत करने के अतिरिक्त इस घोषणा के लिए दावा किया है कि वह स्वयं या कोई अन्य अभ्यर्थी सम्यक् रूप से निर्वाचित हो गया है और 2[उच्च न्यायालय] की यह राय है कि -
(क) अर्जीदार को या ऐसे अन्य अभ्यर्थी को विधिमान्य मतों की बहुसंख्या वास्तव में प्राप्त हुई है, अथवा
(ख) निर्वाचित अभ्यर्थी को भ्रष्ट ॥। आचरण द्वारा अभिप्राप्त मतों के अभाव में अर्जीदार या ऐसे अन्य अभ्यर्थी को विधिमान्य मतों की बहुसंख्या अभिप्राप्त हुई होती,
तो 2[उच्च न्यायालय] निर्वाचित अभ्यर्थी के निर्वाचन को शून्य घोषित करने के पश्चात् यह घोषणा करेगा कि, यथास्थिति, अर्जीदार या ऐसा अन्य अभ्यर्थी सम्यक् रूप से निर्वाचित हो गया है ।
102. मतों के बराबर होने की दशा में प्रक्रिया-यदि निर्वाचित अर्जी के विचारण के दौरान यह प्रतीत होता है कि निर्वाचन में किन्हीं अभ्यर्थियों के बीच मत बराबर हैं और मतों में एक मत के जोड़ देने से उन अभ्यर्थियों में से कोई निर्वाचित घोषित किए जाने का हकदार हो जाएगा, तो-
(क) रिटर्निंग आफिसर द्वारा इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन किया गया कोई विनिश्चय वहां तक, जहां तक कि उन अभ्यर्थियों के बीच प्रश्न का अवधारण करता है, उस अर्जी के प्रयोजनों के लिए भी प्रभावी होगा, तथा
(ख) जहां तक कि वह प्रश्न ऐसे विनिश्चय द्वारा अवधारित नहीं हुआ है, वहां तक 2[उच्च न्यायालय] उनके बीच लाट द्वारा विनिश्चय करेगा और ऐसे अग्रसर होगा मानो जिस किसी के पक्ष में लाट निकल आए उसे एक अतिरिक्त मत प्राप्त हुआ था ।
[103. उच्च न्यायालय के आदेशों की संसूचना-उच्च न्यायालय निर्वाचन अर्जी के विचारण की समाप्ति के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र विनिश्चय के सारांश की प्रज्ञापना निर्वाचन आयोग और, यथास्थिति, संसद् के या सम्पृक्त राज्य विधान-मंडल के सदन के अध्यक्ष या सभापति को देगा और तत्पश्चात् यथाशक्य शीघ्र विनिश्चय की अधिप्रमाणिकृत प्रति निर्वाचन आयोग को भेजेगा ।]
104. [न्यायाधिकरण के सदस्यों की राय में भिन्नता ।]-लोक प्रतिनिधित्व (द्वितीय संशोधन) अधिनियम, 1956 (1956 का 27) की धारा 57 द्वारा निरसित ।
105. [न्यायाधिकरण के आदेश अन्तिम और विनिश्चायक होंगे ।]-लोक प्रतिनिधित्व (द्वितीय संशोधन) अधिनियम, 1956 (1956 का 27) की धारा 58 द्वारा निरसित ।
106. आदेश का समुचित प्राधिकारी आदि को पारेषण और उसका प्रकाशन-निर्वाचन आयोग, 2[उच्च न्यायालय] द्वारा धारा 98 या धारा 99 के अधीन किए गए किसी आदेश की प्राप्ति के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र आदेश की प्रतियां समुचित प्राधिकारी को भेजेगा, और जहां कि ऐसा आदेश ॥। संसद् के किसी सदन के लिए निर्वाचन से या किसी राज्य के विधान-मंडल के सदन या सदनों में से किसी सदन के लिए निर्वाचन से संबद्ध है, वहां, यथास्थिति, सम्पृक्त सदन के अध्यक्ष या सभापति को भी भेजेगा, और [आदेश को-
(क) जहां कि आदेश संसद् के किसी सदन के लिए निर्वाचन से संबद्ध है, वहां भारत के राजपत्र में और साथ ही सम्पृक्त राज्य के शासकीय राजपत्र में, तथा
(ख) जहां कि आदेश के राज्य विधान-मंडल के सदन या सदनों में से किसी सदन के लिए निर्वाचन से संबद्ध है वहां राज्य के शासकीय राजपत्र में,
प्रकाशित कराएगा ।]
[107. उच्च न्यायालय के आदेशों का प्रभाव - [(1) अध्याय 4क में अन्तर्विष्ट उन उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए जो उच्च न्यायालय द्वारा धारा 98 या धारा 99 के अधीन किसी आदेश के प्रवर्तन को रोक देने से संबंधित है, यह है कि हर ऐसा आदेश ज्यों ही उच्च न्यायालय द्वारा प्रख्यापित किया जाए त्यों ही प्रभावी हो जाएगा ।]
(2) जहां कि निर्वाचित अभ्यर्थी का निर्वाचन धारा 98 के अधीन आदेश द्वारा शून्य घोषित कर दिया जाता है । जहां वे कार्य और कार्यवाही जिनमें उस निर्वाचित अभ्यर्थी ने उसकी तारीख के पूर्व संसद् के सदस्य के रूप में या राज्य विधान-मंडल के सदस्य के रूप में भाग लिया है, उस आदेश के कारण ही अविधिमान्य न हो जाएगी और न ऐसा अभ्यर्थी ऐसे भाग लेने के आधार पर ही किसी दायित्व या शास्ति के अध्यधीन किया जाएगा ।]
अध्याय 4-निर्वाचन अर्जियों का प्रत्याहरण और उपशमन
108. [न्यायाधिकरण की नियुक्ति से याचिकाओं का प्रत्याहरण ।]-लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1966 (1966 का 47) की धारा 45 द्वारा निरसित ।
[109. निर्वाचन अर्जियों का प्रत्याहरण-(1) निर्वाचन अर्जियों का प्रत्याहरण केवल उच्च न्यायालय की इजाजत से ही किया जा सकेगा ।
(2) जहां कि उपधारा (1) के अधीन प्रत्याहरण का आवेदन किया गया है, वहां उसकी सूचना जिसमें आवेदन की सुनवाई के लिए तारीख नियत हो अर्जी के अन्य सब पक्षकारों को दी जाएगी और शासकीय राजपत्र में प्रकाशित की जाएगी ।
110. निर्वाचन अर्जियों के प्रत्याहरण के लिए प्रक्रिया-(1) यदि एक से अधिक अर्जीदार हों, तो निर्वाचन अर्जी के प्रत्याहरण का कोई भी आवेदन सब अर्जीदारों की सम्मति के बिना नहीं किया जाएगा ।
(2) प्रत्याहरण का कोई आवेदन मंजूर नहीं किया जाएगा, यदि उच्च न्यायालय की राय में ऐसा आवेदन किसी ऐसे सौदे या प्रतिफल के द्वारा उत्प्रेरित किया गया है जो अनुज्ञात नहीं किया जाना चाहिए ।
(3) यदि आवेदन मंजूर किया जाता है तो -
(क) अर्जीदार को आदेश दिया जाएगा कि वह प्रत्यर्थियों को तब तक उपगत खर्चों का या उनके ऐसे प्रभाग का, जैसा उच्च न्यायालय ठीक समझे, संदाय करे;
(ख) उच्च न्यायालय निदेश देगा कि प्रत्याहरण की सूचना शासकीय राजपत्र में और ऐसी अन्य रीति में, जैसी वह विनिर्दिष्ट करे, प्रकाशित की जाएगी और तदुपरि सूचना तद्नुसार प्रकाशित की जाएगी;
(ग) कोई व्यक्ति जो स्वयं अर्जीदार हो सकता था, ऐसे प्रकाशन के चौदह दिन के भीतर प्रत्याहरण करने वाले पक्षकार के स्थान में अर्जीदार के रूप में प्रतिस्थापित किए जाने के लिए आवेदन कर सकेगा और प्रतिभूति के बारे में शर्तों का यदि कोई हों, अनुपालन करने पर ऐसे प्रतिस्थापित किए जाने का और कार्यवाहियों को ऐसे निबन्धनों पर चालू रखने का, जिसे उच्च न्यायालय ठीक समझे, हकदार होगा ।]
111. उच्च न्यायालय द्वारा निर्वाचन आयोग को प्रत्याहरण की रिपोर्ट-जबकि प्रत्याहरण का आवेदन [उच्च न्यायालय] द्वारा मंजूर कर लिया गया है और धारा 110 की उपधारा (3) के खंड (ग) के अधीन कोई व्यक्ति प्रत्याहरण करने वाले पक्षकार के स्थान में अर्जीदार के रूप में प्रतिस्थापित नहीं किया गया है, 4[उच्च न्यायालय] इस तथ्य की रिपोर्ट निर्वाचन आयोग को देगा [और तदुपरि निर्वाचन आयोग रिपोर्ट को शासकीय राजपत्र में प्रकाशित करेगा] ।
[112. निर्वाचन अर्जियों का उपशमन-(1) निर्वाचन अर्जी का उपशमन एकमात्र अर्जीदार की या कई अर्जीदारों में से उत्तरजीवी की मृत्यु पर होगा ।
(2) जहां कि किसी निर्वाचन अर्जी का उपधारा (1) के अधीन उपशमन हो जाता है वहां उच्च न्यायालय उस तथ्य का ऐसी रीति में, जैसी वह ठीक समझे, प्रकाशन करवाएगा ।
(3) कोई व्यक्ति जो स्वयं अर्जीदार हो सकता था, ऐसे प्रकाशन के चौदह दिन के भीतर अर्जीदार के रूप में प्रतिस्थापित किए जाने के लिए आवेदन कर सकेगा और प्रतिभूति के बारे में शर्तों का, यदि कोई हों, अनुपालन करने पर ऐसे प्रतिस्थापित किए जाने का और कार्यवाहियों को ऐसे निबन्धनों पर चालू रखने का, जैसे उच्च न्यायालय ठीक समझे, हकदार होगा ।]
116. प्रत्यर्थी की मृत्यु पर उपशमन या प्रतिस्थापन-निर्वाचन अर्जी के परीक्षण की समाप्ति से पूर्व यदि एक मात्र प्रत्यर्थी मर जाता है या यह सूचना देता है कि वह अर्जी का विरोध करने का आशय नहीं रखता या प्रत्यर्थियों में से कोई मर जाता है या ऐसी सूचना देता है और अर्जी के विरोध करने वाला कोई अन्य प्रत्यर्थी नहीं है तो [उच्च न्यायालय] ऐसी घटना की सूचना शासकीय राजपत्र में प्रकाशित कराएगा और तदुपरि कोई व्यक्ति, जो अर्जीदार हो सकता था, ऐसे प्रत्यर्थी के स्थान में अर्जी का विरोध करने के लिए प्रतिस्थापित किए जाने के लिए आवेदन ऐसे प्रकाशन के चौदह दिन के भीतर कर सकेगा और ऐसे निबन्धनों पर, जैसे 1[उच्च न्यायालय] ठीक समझता हो, कार्यवाही को चालू रखने का हकदार होगा ।
[अध्याय 4क-अपीलें
[116क. उच्चतम न्यायालय में अपीलें-(1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी किसी उच्च न्यायालय द्वारा धारा 98 या धारा 99 के अधीन किए गए हर आदेश से किसी भी प्रश्न पर (चाहे वह विधि का हो या तथ्य का) अपील उच्चतम न्यायालय में होगी ।
(2) इस अध्याय के अधीन हर अपील उच्च न्यायालय के धारा 98 या धारा 99 के अधीन के आदेश की तारीख से तीस दिन की कालावधि के भीतर की जाएगी:
परन्तु यदि उच्चतम न्यायालय का समाधान हो जाता है कि ऐसी कालावधि के भीतर अपील प्रस्तुत न करने के लिए अपीलार्थी के पास पर्याप्त हेतुक था तो वह तीस दिन की उक्त कालावधि के अवसान के पश्चात् अपील ग्रहण कर सकेगा ।
116ख. उच्च न्यायालय के आदेश के प्रवर्तन का रोका जाना-(1) उच्च न्यायालय द्वारा धारा 98 या धारा 99 के अधीन किए गए किसी आदेश के प्रवर्तन को रोकने के लिए आवेदन, उस आदेश से अपील करने के लिए अनुज्ञात समय के अवसान के पूर्व उच्च न्यायालय को किया जा सकेगा और उच्च न्यायालय, पर्याप्त हेतुक के दर्शित किए जाने पर और ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर, जैसी वह ठीक समझे, उस आदेश के प्रवर्तन को रोक सकेगा ; किन्तु उच्चतम न्यायालय को अपील कर देने के पश्चात्, रोकने के लिए कोई भी आवेदन, उच्च न्यायालय को नहीं किया जाएगा ।
(2) जहां कि धारा 98 या धारा 99 के अधीन किए गए आदेश के विरुद्ध अपील की गई है, वहां उच्चतम न्यायालय, पर्याप्त हेतुक दर्शित किए जाने पर और ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर, जैसी वह ठीक समझे, उस आदेश के प्रवर्तन को, जिसकी अपील की गई है, रोक सकेगा ।
(3) जहां किसी आदेश का प्रवर्तन, यथास्थिति, उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय द्वारा रोका जाता है, वहां उस आदेश के बारे में यह समझा जाएगा कि वह आदेश धारा 107 की उपधारा (1) के अधीन कभी भी प्रभावी नहीं हुआ; और उस रोक आदेश की एक प्रति, यथास्थिति, उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्वाचन आयोग को और, यथास्थिति, संसद् के या सम्पृक्त राज्य विधान-मंडल के सदन के अध्यक्ष या सभापति को तुंरन्त भेजी जाएगी ।
116ग. अपील में प्रक्रिया-(1) इस अधिनियम के और तद्धीन बनाए गए नियमों के, यदि कोई हों, उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए हर अपील उच्चतम न्यायालय द्वारा उस प्रक्रिया के यथाशक्य निकटतम अनुसार सुनी और अवधारित की जाएगी जो ऐसी अपील की सुनवाई और अवधारण को लागू होती है जो उच्च न्यायालय द्वारा उसकी मूल सिविल अधिकारिता के प्रयोग में पारित किसी अन्तिम आदेश से की जाए और सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के और उस न्यायालय के नियमों के सभी उपबन्ध (जिनके अन्तर्गत प्रतिभूति देने और न्यायालय के किसी आदेश के निष्पादन से सम्बद्ध उपबन्ध आते हैं) ऐसी अपील के संबंध में यावत्शक्य लागू होंगे ।
(2) ज्यों ही अपील विनिश्चित की जाए त्यों ही उच्चतम न्यायालय, विनिश्चय का सार, निर्वाचन आयोग को और, यथास्थिति, संसद् के या संपृक्त राज्य विधान-मंडल के सदन के अध्यक्ष या सभापति को प्रज्ञापित करेगा और तत्पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, विनिश्चय की एक अधिप्रमाणीकृत प्रति निर्वाचन आयोग को भेजेगा, और उसकी प्राप्ति पर निर्वाचन आयोग-
(क) उसकी प्रतियां उन प्राधिकारियों को भेजेगा जिनको उच्च न्यायालय के आदेश की प्रतियां धारा 106 के अधीन भेजी गई थीं; तथा
(ख) उस विनिश्चय को उस राजपत्र में या उन राजपत्रों में प्रकाशित करवाएगा जिसमें या जिनमें वह आदेश उक्त धारा के अधीन प्रकाशित किया गया था ।]]
अध्याय 5-खर्चे और खर्चों के लिए प्रतिभूति
[117. खर्चों के लिए प्रतिभूति-(1) निर्वाचन अर्जी के उपस्थापन के समय अर्जीदार उच्च न्यायालय के नियमों के अनुसार अर्जी के खर्चों के लिए प्रतिभूति के रूप में दो हजार रुपए की राशि का निक्षेप उच्च न्यायालय में करेगा ।
(2) निर्वाचन अर्जी के विचारण के दौरान उच्च न्यायालय किसी भी समय अर्जीदार से खर्चों के लिए ऐसी अतिरिक्त प्रतिभूति देने की अपेक्षा कर सकेगा, जैसी वह निर्दिष्ट करे ।
118. प्रत्यर्थी से खर्चों के लिए प्रतिभूति-जब तक किसी व्यक्ति ने खर्चों के लिए ऐसी प्रतिभूति न दे दी हो, जैसी उच्च न्यायालय द्वारा निर्दिष्ट की जाए, तब तक वह व्यक्ति धारा 86 की उपधारा (4) के अधीन प्रत्यर्थी के रूप में संयोजित किए जाने का हकदार नहीं होगा ।
119. खर्चे-खर्चों का अधिनिर्णय उच्च न्यायालय के विवेकाधीन होगा:
परन्तु जहां कि अर्जी धारा 98 के खण्ड (क) के अधीन खारिज की जाती है, वहां निर्वाचित अभ्यर्थी ने अर्जी का प्रतिविरोध करने में जो खर्च उपगत किए हैं उन्हें पाने का वह हकदार होगा और उच्च न्यायालय खर्चे का आदेश निर्वाचित अभ्यर्थी के पक्ष में तद्नुसार करेगा ।]
121. प्रतिभूति निक्षेपों में से खर्चों का संदाय और ऐसे निक्षेपों की वापसी-(1) यदि इस भाग के उपबन्धों के अधीन खर्चों की बाबत किसी आदेश में किसी व्यक्ति को किसी पक्षकार द्वारा खर्चों का संदाय किए जाने के लिए निदेश है तो यदि ऐसे खर्चे पहले ही संदत्त नहीं कर दिए गए हों तो ऐसे खर्चे ऐसे पक्षकार के द्वारा इस भाग के अधीन किए गए प्रतिभूति निक्षेप में से और यदि अतिरिक्त प्रतिभूति निक्षेप हो तो उनमें से भी तन्निमित्त उस लिखित आवेदन पर पूर्णतः या यावत्साध्य दिए जाएंगे जो उस व्यक्ति ने, जिसके पक्ष में खर्चे अधिनिर्णीत किए गए हैं, [ऐसे आदेश की तारीख से एक वर्ष की कालावधि के भीतरट [उच्च न्यायालय] से किया है ।
(2) यदि उक्त प्रतिभूति निक्षेपों में से किसी में से अतिशेष उपधारा (1) में निर्दिष्ट खर्चों का उस उपधारा के अधीन संदाय करने के पश्चात् बच जाता है, तो ऐसा अतिशेष, या जहां कि खर्चे अधिनिर्णीत नहीं किए गए हैं या यथापूर्वोक्त आवेदन [एक वर्ष] की उक्त कालावधि के भीतर नहीं किया गया है वहां उक्त प्रतिभूति निक्षेप पूर्णतः ऐसे आवेदन पर जो उस व्यक्ति द्वारा, जिसने निक्षेप किए हैं, या यदि ऐसा व्यक्ति ऐसे निक्षेप करने के पश्चात् मर गया है, तो ऐसे व्यक्ति के विधिक प्रतिनिधि द्वारा तन्निमित्त 3[उच्च न्यायालय] से लिखित रूप में किया गया है, यथास्थिति, उक्त व्यक्ति को या उसके विधिक प्रतिनिधि को वापस कर दिए जाएंगे ।
122. खर्चों संबंधी आदेशों का निष्पादन-इस भाग के उपबन्धों के अधीन खर्चों की बाबत कोई आदेश उस आरम्भिक अधिकारिता वाले प्रधान सिविल न्यायालय के समक्ष, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर उस व्यक्ति के निवास-स्थान पर कारबार का स्थान है, जिससे धन की कोई राशि संदत्त करने के लिए ऐसे आदेश द्वारा निर्दिष्ट किया गया है, या जहां कि ऐसा स्थान प्रेसिडेंसी नगर के भीतर है वहां उस नगर में अधिकारिता रखने वाले लघुवाद न्यायालय के समक्ष पेश किया जा सकेगा और ऐसा न्यायालय ऐसी रीति में और ऐसी प्रक्रिया द्वारा उस आदेश का निष्पादन करेगा या कराएगा मानो वह वाद में धन के संदाय के लिए उसके द्वारा दी गई डिक्री हो :
परन्तु जहां कि कोई ऐसे खर्चे या उसका कोई प्रभाग धारा 121 की उपधारा (1) के अधीन किए गए आवेदन पर वसूल किया जा सकता है, वहां जब तक कि कोई आवेदन किन्हीं खर्चों के उस अतिशेष की वसूली के लिए न हों जो उस उपधारा के अधीन किए गए आवेदन के पश्चात् इस कारण अनाप्त रह गया है कि उस उपधारा में निर्दिष्ट प्रतिभूति निक्षेपों की रकम अपर्याप्त है, इस धारा के अधीन कोई आवेदन [ऐसे आदेश की तारीख से एक वर्ष की कालावधि के भीतर] न होगा ।
भाग 7
[भ्रष्ट आचरण और निर्वाचन अपराध]
[अध्याय 1- भ्रष्ट आचरण
123. भ्रष्ट आचरण-निम्नलिखित इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए भ्रष्ट आचरण समझे जाएंगे -
[(1) रिश्वत" अर्थात्: -
(अ) किसी अभ्यर्थी या उसके अभिकर्ता द्वारा अथवा किसी अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता की सम्मति से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किसी भी व्यक्ति को, वह चाहे जो कोई भी हो, किसी परितोषण का ऐसा दान, प्रस्थापना या वचन, जिसका प्रत्यक्षतः या परतः यह उद्देश्य हो कि-
(क) किसी व्यक्ति को निर्वाचन में अभ्यर्थी के रूप में खड़े होने या न होने के लिए या अभ्यर्थिता [वापस लेने या न लेने के लिए], अथवा
(ख) किसी निर्वाचक को किसी निर्वाचन में मत देने के या मत देने से विरत रहने के लिए, उत्प्रेरित किया जाए,
अथवा जो-
(i) किसी व्यक्ति के लिए इस बात से वह इस प्रकार खड़ा हुआ या नहीं हुआ या उसने अपनी अभ्यर्थिता [वापस ले ली या नहीं ली], अथवा
(ii) किसी निर्वाचक के लिए इस बात के कि उसने मत दिया या मत देने से विरत रहा,
इनाम के रूप में हो;
(आ) (क) व्यक्ति द्वारा अभ्यर्थी के रूप में खड़े होने या खड़े न होने या अभ्यर्थिता [वापस लेने या न लेने के लिए]; या
(ख) किसी व्यक्ति द्वारा, वह चाहे जो कोई हो; स्वयं अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए, मतदान करने या मतदान करने से विरत रहने या किसी अभ्यर्थी को अभ्यर्थिता 3[वापस लेने या न लेने के लिए] उत्प्रेरित करने या उत्प्रेरित करने का प्रयत्न करने के लिए,
चाहे हेतुक के रूप में या इनामवत् कोई परितोषण प्राप्त करना या प्राप्त करने के लिए करार करना ।
स्पष्टीकरण-इस खण्ड के प्रयोजनों के लिए परितोषण" पद धन रूपी परितोषणों या धन में प्राक्कलनीय परितोषणों तक ही निर्बन्धित नहीं है और इसके अन्तर्गत सब रूप के मनोरंजन और इनाम के लिए सब रूप के नियोजन आते हैं किन्तु किसी निर्वाचन में या निर्वाचन के प्रयोजन के लिए सद्भावपूर्वक उपगत और धारा 78 में निर्दिष्ट निर्वाचन व्ययों के लेखे में सम्यक् रूप से प्रविष्ट किन्हीं व्ययों के संदाय इसके अन्तर्गत नहीं आते हैं ।]
(2) असम्यक् असर डालना, अर्थात् किसी निर्वाचन अधिकार के स्वतंत्र प्रयोग में अभ्यर्थी या उसके अभिकर्ता की या [अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता की सम्मति सेट किसी अन्य व्यक्ति की ओर से किया गया कोई प्रत्यक्षतः या परतः हस्तक्षेप या हस्तक्षेप का प्रयत्न:
परन्तु -
(क) इस खण्ड के उपबन्धों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना उसमें यथानिर्दिष्ट ऐसे किसी व्यक्ति की बाबत जो-
(i) किसी अभ्यर्थी या किसी निर्वाचक या ऐसे किसी व्यक्ति को, जिससे अभ्यर्थी या निर्वाचक हितबद्ध है, किसी प्रकार की क्षति, जिसके अन्तर्गत सामाजिक बहिष्कार और किसी जाति या समुदाय से बाहर करना या निष्कासन आता है, पहुंचाने की धमकी देता है, अथवा
(ii) किसी अभ्यर्थी या निर्वाचक को यह विश्वास करने के लिए उत्प्रेरित करता है या उत्प्रेरित करने का प्रयत्न करता है कि वह या कोई ऐसा व्यक्ति, जिससे वह हितबद्ध है, दैवी अप्रसाद या आध्यात्मिक परिनिन्दा का भाजन हो जाएगा या बना दिया जाएगा,
यह समझा जाएगा कि वह ऐसे अभ्यर्थी या निर्वाचक के निर्वाचन अधिकार के स्वतंत्र प्रयोग में इस खण्ड के अर्थ के अन्दर हस्तक्षेप करता है;
(ख) लोकनीति की घोषणा या लोक कार्रवाई का वचन या किसी वैध अधिकार या प्रयोगमात्र, जो किसी निर्वाचन अधिकार में हस्तक्षेप करने के आशय के बिना है, इस खंड के अर्थ के अन्दर हस्तक्षेप करना नहीं समझा जाएगा ।
[(3) किसी व्यक्ति के धर्म, मूलवंश, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर किसी व्यक्ति के लिए मत देने या मत देने से विरत रहने की अभ्यर्थी या उसके अभिकर्ता द्वारा या अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता की सम्मति से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा अपील या उस अभ्यर्थी के निर्वाचन की सम्भाव्यताओं को अग्रसर करने के लिए या किसी अभ्यर्थी के निर्वाचन पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के लिए धार्मिक प्रतीकों का उपयोग या उनकी दुहाई या राष्ट्रीय प्रतीक तथा राष्ट्रध्वज या राष्ट्रीय संप्रतीक का उपयोग या दुहाई:
[परन्तु इस अधिनियम के अधीन किसी अभ्यर्थी को आबंटित कोई प्रतीक इस खंड के प्रयोजनों के लिए धार्मिक प्रतीक या राष्ट्रीय प्रतीक नहीं समझा जाएगा ।]
(3क) किसी अभ्यर्थी या उसके अभिकर्ता या अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता की सहमति से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उस अभ्यर्थी के निर्वाचन की सम्भाव्यताओं को अग्रसर करने के लिए या किसी अभ्यर्थी के निर्वाचन पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के लिए शत्रुता या घृणा की भावनाएं भारत के नागरिकों के विभिन्न वर्गों के बीच धर्म, मूलवंश, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर संप्रवर्तन या संप्रवर्तन का प्रयत्न करना ।]
[(3ख) किसी अभ्यर्थी या उसके अभिकर्ता या अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता की सहमति से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उस अभ्यर्थी के निर्वाचन की सम्भाव्यताओं को अग्रसर करने के लिए या किसी अभ्यर्थी के निर्वाचन पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के लिए सती की प्रथा या उसके कर्म का प्रचार या उसका गौरवान्वयन ।
स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, सती कर्म" और सती कर्म के संबंध में गौरवान्वयन" के क्रमशः वही अर्थ होंगे, जो सती (निवारण) अधिनियम, 1987 (1988 का 3) में हैं ।]
(4) किसी अभ्यर्थी के वैयक्तिक शील या आचरण के सम्बन्ध में या किसी अभ्यर्थी की अभ्यर्थिता या अभ्यर्थिता वापस लेने के सम्बन्ध में या अभ्यर्थी या उसके अभिकर्ता द्वारा या [अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता की सम्मति सेट किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किसी ऐसे तथ्य के कथन का प्रकाशन जो मिथ्या है और या तो जिसके मिथ्या होने का उसको विश्वास है या जिसके सत्य होने का वह विश्वास नहीं करता है और जो उस अभ्यर्थी के ॥। निर्वाचन की सम्भाव्यताओं पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के लिए युक्तियुक्त रूप से प्रकल्पित कथन है ।
(5) धारा 25 के अधीन उपबन्धित किसी मतदान केन्द्र या मतदान के लिए धारा 29 की उपधारा (1) के अधीन नियत स्थान को या से (स्वयं अभ्यर्थी, उसके कुटुम्ब के सदस्य या उसके अभिकर्ता से भिन्न) किसी निर्वाचक के [मुक्त प्रवहण के लिए किसी यान या जलयान को अभ्यर्थी या उसके अभिकर्ता द्वाराट या 3[अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता की सम्मति सेट किसी अन्य व्यक्ति द्वारा संदाय करके या अन्यथा, भाड़े पर लेना या उपाप्त करना अथवा 5[ऐसे यान या जलयान का उपयोग करनाटः
परन्तु यदि निर्वाचक या कई निर्वाचकों द्वारा अपने संयुक्त खर्चे पर अपने को किसी ऐसे मतदान केन्द्र या मतदान के लिए नियत स्थान को या से प्रवाहित किए जाने के प्रयोजन के लिए यान या जलयान भाड़े पर लिया गया है, तो यदि यान या जलयान यांत्रिक शक्ति से प्रचालित न होने वाला है, तो ऐसे यान या जलयान के भाड़े पर लिए जाने की बाबत यह न समझा जाएगा कि वह भ्रष्ट आचरण है:
परन्तु यह और भी कि किसी ऐसे मतदान केन्द्र या मतदान के लिए नियत स्थान को जाने या वहां से आने के प्रयोजन के लिए अपने ही खर्चे पर किसी निर्वाचक द्वारा किसी लोक परिवहन यान या जलयान या किसी ट्राम या रेलगाड़ी के उपयोग की बाबत यह न समझा जाएगा कि वह इस खंड के अधीन भ्रष्ट आचरण है ।
स्पष्टीकरण-इस खण्ड में यान" से ऐसा कोई यान अभिप्रेत है, जो सड़क परिवहन के लिए उपयोग में लाया जाता है या उपयोग में लाए जाने के योग्य है, चाहे वह यांत्रिक शक्ति से या अन्यथा प्रचालित हो और चाहे अन्य यानों को खींचने के लिए या अन्यथा उपयोग में लाया जाता हो ।
(6) धारा 77 के उल्लंघन में व्यय उपगत करना या प्राधिकृत करना ।
(7) [किसी व्यक्ति से, चाहे वह सरकार की सेवा में हो या नहींट और निम्नलिखित वर्गों में से, अर्थात्: -
(क) राजपत्रित आफिसरों,
(ख) साम्बलिक न्यायाधीशों और मजिस्ट्रेटों,
(ग) संघ के सशस्त्र बलों के सदस्यों,
(घ) पुलिस बलों के सदस्यों,
(ङ) उत्पाद-शुल्क आफिसरों,
[(च) राजस्व आफिसर, जो लंबरदार, मालगुजार, पटेल, देशमुख के रूप में या किसी अन्य नाम से ज्ञात ग्राम राजस्व आफिसरों से भिन्न है, जिसका कर्तव्य भू-राजस्व संगृहीत करना है और जिनको पारिश्रमिक अपने द्वारा संगृहीत भू-राजस्व की रकम के अंश या उस पर कमीशन द्वारा मिलना है किंतु जो किन्हीं पुलिस कृत्यों का निर्वहन नहीं करते, और]
(छ) सरकार की सेवा में के ऐसे अन्य व्यक्ति वर्ग जैसे विहित किए जाएं,
[(ज) निर्वाचनों के संचालन के संबंध में निर्वाचन आयोग द्वारा स्थानीय प्राधिकारी, विश्वविद्यालय, सरकारी कंपनी या संस्था या समुत्थान या उपक्रम की सेवा में नियुक्त या प्रतिनियुक्त व्यक्तियों के वर्ग,]
में से किसी वर्ग में के किसी व्यक्ति से अभ्यर्थी के निर्वाचन की संभाव्यताओं को अग्रसर करने के लिए (मत देने से अन्यथा) कोई सहायता अभ्यर्थी या उसके अभिकर्ता द्वारा या [अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता की सम्मति से] किसी अन्य व्यक्ति द्वारा अभिप्राप्त या उपाप्त किया जाना या अभिप्राप्त या उपाप्त करने का दुष्प्रेरण या प्रयत्न करना:
[परंतु सरकार की सेवा में का और पूर्वोक्त वर्गों में से किसी वर्ग में का कोई व्यक्ति किसी अभ्यर्थी या उसके अभिकर्ता, या उस अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता की सम्मति से कार्य करने वाले किसी अन्य व्यक्ति के लिए या उसके संबंध में अपने पदीय कर्तव्य के निर्वहन या तात्पर्यित निर्वहन में (चाहे अभ्यर्थी द्वारा धारित पद के कारण या किसी अन्य कारणवश) कोई इंतजाम करता है या कोई सुविधा देता है या कोई अन्य कार्य या बात करता है, तो ऐसा इंतजाम, सुविधा या कार्य या बात उस अभ्यर्थी के निर्वाचन की संभाव्यताओं को अग्रसर करने के लिए सहायता नहीं समझी जाएगी ।]
[(8) अभ्यर्थी या उसके अभिकर्ता या अन्य व्यक्ति द्वारा बूथ का बलात् ग्रहण ।]
स्पष्टीकरण-(1) निर्वाचन अभिकर्ता, मतदान अभिकर्ता और ऐसा कोई व्यक्ति, जिसकी बाबत यह ठहराया जाए कि उसने अभ्यर्थी की सम्मति से निर्वाचन के संबंध में अभिकर्ता के रूप में कार्य किया है, इस धारा में के अभिकर्ता" पद के अन्तर्गत आते हैं ।
(2) यदि किसी व्यक्ति ने अभ्यर्थी के निर्वाचन अभिकर्ता ॥। के रूप में कार्य किया है, तो खण्ड (7) के प्रयोजनों के लिए उस व्यक्ति की बाबत यह समझा जाएगा कि उसने उस अभ्यर्थी के निर्वाचन की सम्भाव्यताओं को अग्रसर करने में सहायता दी है ।]
[(3) खण्ड (7) के प्रयोजनों के लिए, किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी केन्द्रीय सरकार की सेवा में के किसी व्यक्ति को (जिसके अन्तर्गत किसी संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासन के सम्बन्ध में सेवा करने वाला व्यक्ति भी है) या किसी राज्य सरकार की सेवा में के किसी व्यक्ति की नियुक्ति, पदत्याग, सेवा के पर्यवसान, पदच्युति या सेवा से हटाए जाने का शासकीय राजपत्र में प्रकाशन-
(i) यथास्थिति, ऐसी नियुक्ति, पदत्याग, सेवा के पर्यवसान, पदच्युति या सेवा से हटाए जाने का निश्चायक सबूत होगा, और
(ii) जहां, यथास्थिति, ऐसी नियुक्ति, पदत्याग, सेवा के पर्यवसान, पदच्युति या सेवा से हटाए जाने के प्रभावशील होने की तारीख ऐसे प्रकाशन में कथित है वहां इस तथ्य का भी निश्चायक सबूत होगा कि ऐसा व्यक्ति उक्त तारीख से नियुक्त किया गया था या पदत्याग, सेवा के पर्यवसान, पदच्युति या सेवा से हटाए जाने की दशा में ऐसा व्यक्ति उक्त तारीख से ऐसी सेवा में नहीं रहा था ।]
[(4) खंड (8) के प्रयोजनों के लिए बूथ का बलात् ग्रहण" का वही अर्थ है जो धारा 135क में है ।
अध्याय 3 -निर्वाचन अपराध
[125. निर्वाचन के संबंध में वर्गों के बीच शत्रुता संप्रवर्तित करना-जो कोई व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन होने वाले निर्वाचन के संबंध में शत्रुता या घृणा की भावनाएं भारत के नागरिकों के विभिन्न वर्गों के बीच धर्म, मूलवंश, जाति, समुदाय या भाषा के आधारों पर संप्रवर्तित करेगा या संप्रवर्तित करने का प्रयत्न करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।]
[125क. मिथ्या शपथपत्र, आदि फाइल करने के लिए शास्ति-कोई अभ्यर्थी, जो स्वयं या अपने प्रस्थापक के माध्यम से, किसी निर्वाचन में निर्वाचित होने के आशय से, यथास्थिति, धारा 33 की उपधारा (1) के अधीन परिदत्त अपने नामनिर्देशन पत्र में या धारा 33क की उपधारा (2) के अधीन परिदत्त किए जाने के लिए अपेक्षित अपने शपथ पत्र में, -
(i) धारा 33क की उपधारा (1) से संबंधित सूचना देने में असफल रहेगा; या
(ii) ऐसी मिथ्या सूचना देगा जिसके बारे में वह जानता है या उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि वह मिथ्या है; या
(iii) कोई सूचना छिपाएगा,
तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी या जुर्माने से अथवा दोनों से, दंडनीय होगा ।]
[126. मतदान की समाप्ति के लिए नियत किए गए समय के साथ समाप्त होने वाले अड़तालीस घंटों की कालावधि के दौरान सार्वजनिक सभाओं का प्रतिषेध-(1) कोई भी व्यक्ति, किसी मतदान क्षेत्र में, उस मतदान क्षेत्र में किसी निर्वाचन के लिए मतदान की समाप्ति के लिए नियत किए गए समय के साथ समाप्त होने वाले अड़तालीस घंटों की कालावधि के दौरान, -
(क) निर्वाचन के संबंध में कोई सार्वजनिक सभा या जुलूस न बुलाएगा, न आयोजित करेगा, न उसमें उपस्थित होगा, न उसमें सम्मिलित होगा और न उसे संबोधित करेगा; या
(ख) चलचित्र, टेलीविजन या वैसे ही अन्य साधित्रों द्वारा जनता के समक्ष किसी निर्वाचन संबंधी बात का संप्रदर्शन नहीं करेगा; या
(ग) कोई संगीत समारोह या कोई नाट्य अभिनय या कोई अन्य मनोरंजन या आमोद-प्रमोद जनता के सदस्यों को उसके प्रति आकर्षित करने की दृष्टि से, आयोजित करके या उसके आयोजन की व्यवस्था करके, जनता के समक्ष किसी निर्वाचन संबंधी बात का प्रचार नहीं करेगा ।
(2) वह व्यक्ति, जो उपधारा (1) के उपबंधों का उल्लंघन करेगा; कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
(3) इस धारा में, निर्वाचन संबंधी बात" पद से अभिप्रेत है कोई ऐसी बात जो किसी निर्वाचन के परिणाम पर असर डालने या उसे प्रभावित करने के लिए आशयित या प्रकल्पित है ।]
[126क. निर्गम मत सर्वेक्षण के परिणाम आदि के प्रकाशन और प्रसारण पर निर्बंधन-(1) कोई भी व्यक्ति कोई निर्गम मत सर्वेक्षण नहीं करेगा और किसी निर्गम मत सर्वेक्षण के परिणाम का, ऐसी अवधि के दौरान जो निर्वाचन आयोग द्वारा इस संबंध में अधिसूचित की जाए, प्रिंट या इलैक्ट्रानिक मीडिया के माध्यम से प्रकाशन या प्रचार या किसी भी प्रकार की अन्य रीति में प्रसार नहीं करेगा ।
(2) निर्वाचन आयोग, उपधारा (1) के प्रयोजन के लिए, निम्नलिखित को ध्यान में रखते हुए साधारण आदेश द्वारा तारीख और समय अधिसूचित करेगा, अर्थात्: -
(क) साधारण निर्वाचन की दशा में, वह अवधि मतदान के पहले दिन को मतदान के लिए नियत समय के आरंभ होने से प्रारंभ हो सकेगी और सभी राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों में, मतदान समाप्त होने के पश्चात् आधे घंटे तक जारी रह सकेगी;
(ख) किसी उप-निर्वाचन या एक साथ कराए जाने वाले अनेक उप-निर्वाचनों की दशा में वह अवधि मतदान के पहले दिन से ही मतदान के लिए नियत समय के आरंभ होने से प्रारंभ हो सकेगी और मतदान समाप्त होने के पश्चात् आधे घंटे तक जारी रह सकेगी:
परंतु भिन्न-भिन्न दिनों पर एक साथ कराए जाने वाले अनेक उप-निर्वाचनों की दशा में, वह अवधि मतदान के पहले दिन को मतदान के लिए नियत समय के आरंभ होने से प्रारंभ हो सकेगी और अंतिम मतदान समाप्त होने के पश्चात् आधे घंटे तक जारी रह सकेगी ।
(3) ऐसा कोई व्यक्ति, जो इस धारा के उपबंधों का उल्लंघन करेगा ऐसी अवधि के कारावास से, जो दो वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से या दोनों से, दंडनीय होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए: -
(क) निर्गम मत सर्वेक्षण" से वह राय सर्वेक्षण अभिप्रेत है जो इस संबंध में है कि निर्वाचकों ने कैसे किसी निर्वाचन में मतदान किया या इस संबंध में है कि किसी निर्वाचन में किसी राजनीतिक दल या अभ्यर्थी की पहचान सभी मतदाताओं ने कैसे की है;
(ख) इलैक्ट्रानिक मीडिया" के अन्तर्गत इंटरनेट, रेडियो और टेलीविजन भी हैं, जिसमें इंटरनेट प्रोटोकाल टेलीविजन, सेटेलाइट, क्षेत्रीय या केबल चैनल, मोबाइल और ऐसा अन्य मीडिया सम्मिलित है जो सरकार के या निजी व्यक्ति अथवा दोनों के स्वामित्वाधीन है;
(ग) प्रिंट मीडिया" के अन्तर्गत कोई समाचारपत्र, पत्रिका या नियतकालिक पत्रिका, पोस्टर, प्लेकार्ड, हैंडबिल या कोई अन्य दस्तावेज भी है;
(घ) प्रसार" के अन्तर्गत किसी प्रिंट मीडिया" में प्रकाशन या किसी इलैक्ट्रानिक मीडिया पर प्रसारण या प्रदर्शन भी है ।
126ख. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां धारा 126क की उपधारा (2) के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी, ऐसे अपराध के लिए दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे:
परंतु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को इस अधिनियम में उपबंधित किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी, यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध, किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -
(क) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत कोई फर्म या अन्य व्यष्टि संगम भी है; और
(ख) निदेशक" से किसी फर्म के संबंध में फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।]
127. निर्वाचन सभाओं में उपद्रव-(1) जो कोई व्यक्ति ऐसी सार्वजनिक सभा में, जिसके संबंध में यह धारा लागू है, उस कारबार के संव्यवहार को निवारित करने के प्रयोजन के लिए, जिसके लिए वह सभा बुलाई गई है, विच्छृखलता से कार्य करेगा या दूसरों को कार्य करने के लिए उद्दीप्त करेगा [वह कारावास से, जिसकी अवधि [छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा,] या दोनों से, दण्डनीय होगा ।]
[(1क) उपधारा (1) के अधीन दंडनीय अपराध संज्ञेय होगा ।]
(2) यह धारा राजनीतिक प्रकृति की किसी ऐसी सार्वजनिक सभा को लागू है, जो सदस्य या सदस्यों को निर्वाचित करने के लिए निर्वाचन-क्षेत्र से अपेक्षा करने वाली इस अधिनियम के अधीन निकाली गई अधिसूचना की तारीख के और उस तारीख के बीच, जिस तारीख को ऐसा निर्वाचन होता है, उस निर्वाचन-क्षेत्र में की गई है ।
(3) यदि कोई पुलिस आफिसर किसी व्यक्ति की बाबत युक्तियुक्त रूप से संदेह करता है कि उसने उपधारा (1) के अधीन अपराध किया है और तो यदि सभा के सभापति द्वारा उससे ऐसा करने की प्रार्थना की जाए, तो वह उस व्यक्ति से अपेक्षा कर सकेगा कि वह तुरन्त अपना नाम और पता बताए और यदि वह व्यक्ति अपना नाम और पता बताने से इंकार करता है या बताने में असफल रहता है या यदि पुलिस आफिसर उसकी बाबत युक्तियुक्त रूप से संदेह करता है कि उसने मिथ्या नाम या पता दिया है, तो पुलिस आफिसर उसे वारंटट के बिना गिरफ्तार कर सकेगा ।
[127क. पुस्तिकाओं, पोस्टरों आदि के मुद्रण पर निर्बन्धन-(1) कोई भी व्यक्ति कोई ऐसी निर्वाचन पुस्तिका या पोस्टर जिसके मुख्य पृष्ठ पर उसके मुद्रक और प्रकाशक के नाम और पते न हों मुद्रित या प्रकाशित न करेगा और न मुद्रित या प्रकाशित कराएगा ।
(2) कोई भी व्यक्ति किसी निर्वाचन पुस्तिका या पोस्टर को-
(क) उस दशा में के सिवाय न तो मुद्रित करेगा, और न मुद्रित कराएगा जिसमें वह उसके प्रकाशक की अनन्यता के बारे में अपने द्वारा हस्ताक्षरित और ऐसे दो व्यक्तियों द्वारा जो उसे स्वयं जानते हैं अनुप्रमाणित द्विप्रतीक घोषणा मुद्रक को परिदत्त कर देता है; तथा
(ख) उस दशा में के सिवाय न तो मुद्रित करेगा, और न मुद्रित कराएगा, जिसमें कि मुद्रक घोषणा की एक प्रति दस्तावेज की एक प्रति के सहित-
(i) उस दशा में जिसमें कि वह राज्य की राजधानी में मुद्रित की जाती है, मुख्य निर्वाचन आफिसर को, तथा
(ii) किसी अन्य दशा में उस जिले के, जिसमें कि वह मुद्रित की जाती है, जिला मजिस्ट्रेट को दस्तावेज के मुद्रण के पश्चात् युक्तियुक्त समय के भीतर भेज देता है ।
(3) इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(क) दस्तावेज की अनेकानेक प्रतियां बनाने की किसी ऐसी प्रक्रिया की बाबत जो हाथ से नकल करके ऐसी प्रतियां बनाने से भिन्न है, यह समझा जाएगा कि वह मुद्रण है, और मुद्रक" पद का अर्थ तदनुसार लगाया जाएगा; तथा
(ख) निर्वाचन पुस्तिका या पोस्टर" से किसी अभ्यर्थी या अभ्यर्थियों के समूह के निर्वाचन को संप्रवर्तित या प्रतिकूलतः प्रभावित करने के प्रयोजन के लिए वितरित कोई मुद्रित पुस्तिका, पर्चा या अन्य दस्तावेज या निर्वाचन के प्रति निर्देश करने वाला कोई प्लेकार्ड या पोस्टर अभिप्रेत है, किन्तु किसी निर्वाचन सभा की तारीख, समय, स्थान और अन्य विशिष्टियों को केवल आख्यापित करने वाला या निर्वाचन अभिकर्ताओं या कार्यकर्ताओं को चर्या संबंधी अनुदेश देने वाला कोई पर्चा, प्लेकार्ड या पोस्टर इसके अन्तर्गत नहीं आता ।
(4) जो कोई व्यक्ति उपधारा (1) या उपधारा (2) के उपबंधों में से किसी का उल्लंघन करेगा वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।]
128. मतदान की गोपनीयता को बनाए रखना-(1) ऐसा हर आफिसर, लिपिक, अभिकर्ता या अन्य व्यक्ति जो निर्वाचन में मतों को अभिलिखित करने या उनकी गणना करने से संसक्त किसी कर्तव्य का पालन करता है, मतदान की गोपनीयता को बनाए रखेगा और बनाए रखने में सहायता करेगा और ऐसी गोपनीयता का अतिक्रमण करने के लिए प्रकल्पित कोई जानकारी किसी व्यक्ति को (किसी विधि के द्वारा या अधीन प्राधिकृत किसी प्रयोजन के लिए संसूचित करने के सिवाय) संसूचित न करेगा:
[परन्तु इस उपधारा के उपबंध ऐसे आफिसर, लिपिक, अभिकर्ता या अन्य व्यक्ति को, जो राज्य सभा में किसी स्थान या स्थानों को भरने के लिए किसी निर्वाचन में ऐसे किसी कर्तव्य का पालन करता है, लागू नहीं होंगे ।]
(2) जो कोई व्यक्ति उपधारा (1) के उपबंधों का उल्लंघन करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
129. निर्वाचनों में आफिसर आदि अभ्यर्थियों के लिए कार्य न करेंगे और न मत दिए जाने में कोई असर डालेंगे-(1) जो [कोई जिला निर्वाचन आफिसर या रिटर्निंग आफिसर] या सहायक रिटर्निंग आफिसर है या निर्वाचन में पीठासीन या मतदान आफिसर है या ऐसा आफिसर है या लिपिक है जिसे रिटर्निंग आफिसर या पीठासीन आफिसर ने निर्वाचन से संसक्त किसी कर्तव्य के पालन के लिए नियुक्त किया है वह निर्वाचन के संचालन या प्रबंध में (मत देने से भिन्न) कोई कार्य अभ्यर्थी के निर्वाचन की सम्भाव्यताओं को अग्रसर करने के लिए न करेगा ।
(2) यथापूर्वोक्त कोई भी व्यक्ति और पुलिस बल का कोई भी सदस्य-
(क) न तो किसी व्यक्ति को निर्वाचन में अपना मत देने के लिए मनाने का; और न
(ख) किसी व्यक्ति को निर्वाचन में अपना मत न देने के लिए मनाने का; और न
(ग) निर्वाचन में किसी व्यक्ति के मत देने में किसी रीति के असर डालने का,
प्रयास करेगा ।
(3) जो कोई व्यक्ति उपधारा (1) या उपधारा (2) के उपबंधों का उल्लंघन करेगा, वह कारावास से, जो छह मास तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
[(4) उपधारा (3) के अधीन दण्डनीय अपराध संज्ञेय होगा ।]
130. मतदान केन्द्रों में या उनके निकट मत संयाचना का प्रतिषेध-(1) कोई भी व्यक्ति उस तारीख को या उन तारीखों को, जिसको या जिनको किसी मतदान केन्द्र में मतदान होता है, मतदान केन्द्र के भीतर या मतदान केन्द्र से [एक सौ मीटर] की दूरी के भीतर किसी लोक स्थान या प्राइवेट स्थान में निम्नलिखित कार्यों में से कोई कार्य न करेगा, अर्थात्: -
(क) मतों के लिए संयाचना;
(ख) किसी निर्वाचक से उनके मत को याचना करना;
(ग) किसी विशिष्ट अभ्यर्थी के लिए मत न देने को किसी निर्वाचक को मनाना;
(घ) निर्वाचन में मत न देने के लिए निर्वाचक को मनाना; और
(ङ) निर्वाचन के संबंध में (शासकीय सूचना से भिन्न) कोई सूचना संकेत प्रदर्शित करना ।
(2) जो कोई व्यक्ति उपधारा (1) के उपबंधों का उल्लंघन करेगा वह जुर्माने से, जो ढाई सौ रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।
(3) इस धारा के अधीन दण्डनीय अपराध संज्ञेय होगा ।
131. मतदान केन्द्रों में या उनके निकट विच्छृंखल आचरण के लिए शास्ति-(1) कोई भी व्यक्ति उस तारीख या उन तारीखों को जिनको किसी मतदान केन्द्र में मतदान होता है -
(क) मानव ध्वनि के प्रवर्धन या प्रत्युत्पादन के लिए कोई मेगाफोन या ध्वनि विस्तारक जैसा साधित्र मतदान केन्द्र के भीतर या प्रवेश द्वार पर या उसके पड़ोस में किसी लोक स्थान या प्राइवेट स्थान में ऐसे न तो उपयोग में लाएगा और न चलाएगा; और न
(ख) मतदान केन्द्र के भीतर या प्रवेश द्वार पर या उसके पड़ोस में के किसी लोक स्थान या प्राइवेट स्थान में ऐसे चिल्लाएगा या विच्छृखलता से ऐसा कोई अन्य कार्य करेगा,
कि मतदान के लिए मतदान केन्द्र में आने वाले किसी व्यक्ति को क्षोभ हो या मतदान केन्द्र में कर्तव्यारूढ़ आफिसरों या अन्य व्यक्तियों के काम में हस्तक्षेप हो ।
(2) जो कोई व्यक्ति उपधारा (1) के उपबंधों का उल्लंघन करेगा या उल्लंघन में जानबूझकर सहायता देगा या उसका दुष्प्रेरण करेगा वह कारावास से, जो तीन मास तक का हो सकेगा या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
(3) यदि मतदान केन्द्र के पीठासीन आफिसर के पास यह विश्वास करने का कारण है कि कोई व्यक्ति इस धारा के अधीन दण्डनीय अपराध कर रहा है या कर चुका है, तो वह किसी पुलिस आफिसर को निदेश दे सकेगा कि वह ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार करे और पुलिस आफिसर उस पर उसे गिरफ्तार करेगा ।
(4) कोई पुलिस आफिसर ऐसे कदम उठा सकेगा और ऐसा बल प्रयोग कर सकेगा जैसे या जैसा उपधारा (1) के उपबंधों में किसी उल्लंघन का निवारण करने के लिए युक्तियुक्त रूप से आवश्यक है और ऐसे उल्लंघन के लिए उपयोग में लाए गए किसी साधित्र को अभिगृहीत कर सकेगा ।
132. मतदान केन्द्र के अवचार के लिए शास्ति-(1) जो कोई व्यक्ति किसी मतदान केन्द्र में मतदान के लिए नियत घंटों के दौरान स्वयं अवचार करता है या पीठासीन आफिसर के विधिपूर्ण निदेशों के अनुपालन में असफल रहता है, उसे पीठासीन आफिसर या कर्तव्यारूढ़ कोई पुलिस आफिसर या ऐसे पीठासीन आफिसर द्वारा एतन्निमित्त प्राधिकृत कोई व्यक्ति मतदान केन्द्र से हटा सकेगा ।
(2) उपधारा (1) द्वारा प्रदत्त शक्तियां ऐसे प्रयुक्त न की जाएंगी जिससे कोई ऐसा निर्वाचक, जो मतदान केन्द्र में मत देने के लिए अन्यथा हकदार है, उस केन्द्र में मतदान करने का अवसर पाने से निवारित हो जाए ।
(3) यदि कोई व्यक्ति, जो मतदान केन्द्र से ऐसे हटा दिया गया है, पीठासीन आफिसर की अनुज्ञा के बिना मतदान केन्द्र में पुनः प्रवेश करेगा, तो वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
(4) उपधारा (3) के अधीन दंडनीय अपराध संज्ञेय होगा ।
[132क. मतदान करने के लिए प्रक्रिया का अनुपालन करने में असफलता के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति जिसे कोई मतपत्र जारी किया गया है, मतदान करने के लिए विहित प्रक्रिया का अनुपालन करने से इंकार करता है तो, उसको जारी किया गया मतपत्र रद्द किया जा सकेगा ।]
[133. निर्वाचनों में प्रवहण के अवैध रूप से भाड़े पर लेने या उपाप्त करने के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति, निर्वाचन में या निर्वाचन के संबंध में किसी ऐसे भ्रष्ट आचरण का दोषी है जो धारा 123 के खंड (5) में विनिर्दिष्ट है तो वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी, और जुर्माने से, दंडनीय होगा ।]
134. निर्वाचनों से संसक्त पदीय कर्तव्य के भंग-(1) यदि कोई व्यक्ति, जिसे यह धारा लागू है, अपने पदीय कर्तव्य के भंग में किसी कार्य या लोप का युक्तियुक्त हेतुक के बिना दोषी होगा तो वह जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
[(1क) उपधारा (1) के अधीन दंडनीय अपराध संज्ञेय होगा ।]
(2) यथापूर्वोक्त किसी कार्य या लोप की बाबत नुकसानी के लिए कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही ऐसे किसी व्यक्ति के खिलाफ न होगी ।
(3) वे व्यक्ति, जिन्हें यह धारा लागू है या हैं, ॥। [जिला निर्वाचन आफिसर, रिटर्निंग आफिसरट, सहायक रिटर्निंग आफिसर, पीठासीन आफिसर, मतदान आफिसर और अभ्यर्थियों के नामनिर्देशन प्राप्त करने या अभ्यर्थिताएं वापस लेने या निर्वाचन में मतों का अभिलेख करने या गणना करने से संसक्त ॥। किसी कर्तव्य के पालन के लिए नियुक्त कोई अन्य व्यक्ति, तथा पदीय कर्तव्य" पदावली का अर्थ इस धारा के प्रयोजनों के लिए तदनुसार लगाया जाएगा किन्तु इसके अन्तर्गत वे कर्तव्य न होंगे जो इस अधिनियम के द्वारा या अधीन 3॥। अधिरोपित होने से अन्यथा अधिरोपित है ।
[134क. निर्वाचन अभिकर्ता, मतदान अभिकर्ता या गणन अभिकर्ता के रूप में कार्य करने वाले सरकारी सेवकों के लिए शास्ति-यदि सरकार की सेवा में का कोई व्यक्ति किसी निर्वाचन में अभ्यर्थी के निर्वाचन अभिकर्ता या मतदान अभिकर्ता या गणन अभिकर्ता के रूप में कार्य करेगा, तो वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।]
[134ख. मतदान केन्द्र में या उसके निकट आयुध लेकर जाने का प्रतिषेध-(1) रिटर्निंग आफिसर, पीठासीन आफिसर और किसी पुलिस आफिसर से तथा मतदान केन्द्र पर शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति से, जो मतदान केन्द्र पर कर्तव्यारूढ़ है, भिन्न कोई व्यक्ति, मतदान के दिन मतदान केन्द्र के आस-पास आयुध अधिनियम, 1959 (1959 का 54) में परिभाषित किसी प्रकार के आयुधों से सज्जित होकर नहीं जाएगा ।
(2) यदि कोई व्यक्ति, उपधारा (1) के उपबंधों का उल्लंघन करेगा तो वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
(3) आयुध अधिनियम, 1959 (1959 का 54) में किसी बात के होते हुए भी, जहां कोई व्यक्ति इस धारा के अधीन किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया जाता है वहां उक्त अधिनियम में परिभाषित ऐसे आयुध, जो उसके कब्जे में पाए जाएं, अधिहरण के दायी होंगे और ऐसे आयुधों के संबंध में दी गई अनुज्ञप्ति उस अधिनियम की धारा 17 के अधीन प्रतिसंहृत की गई समझी जाएगी ।
(4) उपधारा (2) के अधीन दंडनीय अपराध संज्ञेय होगा ।]
135. मतदान केन्द्र से मतपत्रों को हटाना अपराध होगा-(1) जो कोई व्यक्ति निर्वाचन में मतदान केन्द्र से मतपत्र [अप्राधिकृत रूप से] बाहर ले जाएगा या बाहर ले जाने का प्रयत्न करेगा या ऐसे किसी कार्य के करने में जानबूझकर सहायता देगा या उसका दुष्प्रेरण करेगा वह कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
(2) यदि मतदान केन्द्र के पीठासीन आफिसर के पास यह विश्वास करने का कारण है कि कोई व्यक्ति उपधारा (1) के अधीन दंडनीय अपराध कर रहा है या कर चुका है तो ऐसा आफिसर ऐसे व्यक्ति द्वारा मतदान केन्द्र छोड़े जाने से पूर्व ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकेगा या ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस आफिसर को निदेश दे सकेगा और ऐसे व्यक्ति की तलाशी ले सकेगा या पुलिस आफिसर द्वारा उसकी तलाशी करवा सकेगा:
परन्तु जब कभी किसी स्त्री की तलाशी कराई जानी आवश्यक हो, तब वह अन्य स्त्री द्वारा शिष्टता का पूरा ध्यान रखते हुए, ली जाएगी ।
(3) गिरफ्तार व्यक्ति की तलाशी लेने पर उसके पास कोई मिला मतपत्र सुरक्षित अभिरक्षा में रखे जाने के लिए पीठासीन आफिसर द्वारा पुलिस आफिसर के हवाले कर दिया जाएगा या जब तलाशी पुलिस आफिसर द्वारा ली गई हो तब उसे ऐसा आफिसर सुरक्षित अभिरक्षा में रखेगा ।
(4) उपधारा (1) के अधीन दंडनीय अपराध संज्ञेय होगा ।
[135क. बूथ के बलात् ग्रहण का अपराध- [(1)] जो कोई बूथ के बलात् ग्रहण का अपराध करेगा वह कारावास से, जिसकी अवधि [एक वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु तीन वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से, दंडनीय होगा और जहां ऐसा अपराध सरकार की सेवा में के किसी व्यक्ति द्वारा किया जाता है वहां वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु पांच वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से, दंडनीय होगा] ।
स्पष्टीकरण- [इस उपधारा और धारा 20ख] के प्रयोजनों के लिए बूथ का बलात् ग्रहण" के अन्तर्गत अन्य बातों के साथ-साथ निम्नलिखित सभी या उनमें से कोई क्रियाकलाप है, अर्थात्: -
(क) किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों द्वारा मतदान केन्द्र या मतदान के लिए नियत स्थान का अभिग्रहण करना, मतदान प्राधिकारियों से मतपत्रों या मतदान मशीनों को अभ्यर्पित कराना और ऐसा कोई अन्य कार्य करना जो निर्वाचनों के व्यवस्थित संचालन को प्रभावित करता है;
(ख) किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों द्वारा किसी मतदान केन्द्र या मतदान के लिए नियत किसी स्थान को कब्जे में लेना और केवल उसके या उनके अपने समर्थकों को ही मत देने के अपने अधिकार का प्रयोग करने देना और अन्यों को 3[उसके मतदान करने के अधिकार का स्वतंत्र रूप से प्रयोग करने से निवारित करना];
(ग) किसी निर्वाचक को [प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः प्रपीड़ित करना या अभित्रस्त करना या धमकी देना] और उसे अपना मत देने के लिए मतदान केन्द्र या मतदान के लिए नियत स्थान पर जाने से निवारित करना;
(घ) किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों द्वारा मतगणना करने के स्थान का अभिग्रहण करना, मतगणना प्राधिकारियों को मतपत्रों या मतदान मशीनों को अभ्यर्पित कराना और ऐसा कोई अन्य कार्य करना, जो मतों की व्यवस्थित गणना को प्रभावित करता है;
(ङ) सरकार की सेवा में के किसी व्यक्ति द्वारा किसी अभ्यर्थी के निर्वाचन की संभाव्यताओं को अग्रसर करने के लिए पूर्वोक्त सभी या किसी क्रियाकलाप का किया जाना या किसी ऐसे क्रियाकलाप में सहायता करना या मौनानुमति देना ।]
[(2) उपधारा (1) के अधीन दंडनीय अपराध संज्ञेय होगा ।]
[135ख. मतदान के दिन कर्मचारियों को सवेतन अवकाश की मंजूरी-(1) किसी कारबार, व्यवसाय, औद्योगिक उपक्रम या किसी अन्य स्थापन में नियोजित प्रत्येक व्यक्ति को, जो लोक सभा या किसी राज्य की विधान सभा के लिए निर्वाचन में मतदान करने का हकदार है, मतदान के दिन अवकाश मंजूर किया जाएगा ।
(2) उपधारा (1) के अनुसार अवकाश मंजूर किए जाने के कारण किसी ऐसे व्यक्ति की मजदूरी से कोई कटौती या उसमें कोई कमी नहीं की जाएगी और यदि ऐसा व्यक्ति इस आधार पर नियोजित किया जाता है कि उसे सामान्यतया किसी ऐसे दिन के लिए मजदूरी प्राप्त नहीं होगी तो इस बात के होते हुए भी, उसे ऐसे दिन के लिए वह मजदूरी संदत्त की जाएगी, जो उस दिन उसे अवकाश मंजूर न किए जाने की दशा में दी गई होती ।
(3) यदि कोई नियोजक उपधारा (1) या उपधारा (2) के उपबंधों का उल्लंघन करेगा, तो ऐसा नियोजक जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
(4) यह धारा किसी ऐसे निर्वाचक को लागू नहीं होगी जिसकी अनुपस्थिति से उस नियोजन के संबंध में जिसमें वह लगा हुआ है, कोई खतरा या सारवान् हानि हो सकती है ।
135ग. मतदान के दिन लिकर का न तो विक्रय किया जाना, न दिया जाना और न वितरण किया जाना-(1) मतदान क्षेत्र में किसी निर्वाचन के लिए मतदान समाप्त होने के लिए नियत समय के साथ समाप्त होने वाली अड़तालीस घंटे की अवधि के दौरान उस मतदान क्षेत्र के भीतर, किसी होटल, भोजन, पाठशाला, दुकान में अथवा किसी अन्य लोक या प्राइवेट स्थान में कोई भी स्पिरिटयुक्त, किण्वित या मादक लिकर या वैसी ही प्रकृति का अन्य पदार्थ न तो विक्रय किया जाएगा, न दिया जाएगा और न वितरित किया जाएगा ।
(2) कोई भी व्यक्ति, जो उपधारा (1) के उपबंधों का उल्लंघन करेगा वह कारावास से जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
(3) जहां कोई व्यक्ति इस धारा के अधीन किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया जाता है, वहां स्पिरिटयुक्त, किण्वित या मादक लिकर या वैसी ही प्रकृति के अन्य पदार्थ, जो उसके कब्जे में पाए जाएं, अधिहरण के दायी होंगे और उनका व्ययन ऐसी रीति से किया जाएगा जो विहित की जाए ।]
136. अन्य अपराध और उनके लिए शास्तियां-(1) यदि किसी निर्वाचन में कोई व्यक्ति-
(क) कोई नामनिर्देशन-पत्र कपटपूर्वक विरूपित करेगा या कपटपूर्वक नष्ट करेगा; अथवा
(ख) रिटर्निंग आफिसर के प्राधिकार के द्वारा या अधीन लगाई गई किसी सूची, सूचना या अन्य दस्तावेज को कपटपूर्वक विरूपित करेगा, या नष्ट करेगा या हटाएगा, अथवा
(ग) किसी मतपत्र या किसी मतपत्र पर के शासकीय चिह्न या अनन्यता की किसी घोषणा या शासकीय लिफाफे को, जो डाक-मतपत्र द्वारा मत देने के संबंध में उपयोग में लाया गया है, कपटपूर्वक विरूपित करेगा या कपटपूर्वक नष्ट करेगा; अथवा
(घ) सम्यक् प्राधिकार के बिना किसी व्यक्ति को कोई मतपत्र देगा [या किसी व्यक्ति से कोई मतपत्र प्राप्त करेगा या सम्यक् प्राधिकार के बिना उसके कब्जे में कोई मतपत्र होगा;] अथवा
(ङ) किसी मतपेटी में उस मतपत्र से भिन्न, जिसे वह उसमें डालने के लिए विधि द्वारा प्राधिकृत है, कोई चीज कपटपूर्वक डालेगा; अथवा
(च) सम्यक् प्राधिकार के बिना किसी मतपेटी या मतपत्रों को, जो निर्वाचन के प्रयोजनों के लिए तब उपयोग में है, नष्ट करेगा, लेगा, खोलेगा या अन्यथा उसमें हस्तक्षेप करेगा; अथवा
(छ) यथास्थिति, कपटपूर्वक या सम्यक् प्राधिकार के बिना पूर्ववर्ती कार्यों में से कोई कार्य करने का प्रयत्न करेगा या किन्हीं ऐसे कार्यों के करने में जानबूझकर सहायता देगा या उन कार्यों का दुष्प्रेरण करेगा,
तो वह व्यक्ति निर्वाचन अपराध का दोषी होगा ।
(2) इस धारा के अधीन निर्वाचन अपराध का दोषी कोई व्यक्ति: -
(क) यदि वह रिटर्निंग आफिसर या सहायक रिटर्निंग आफिसर या मतदान केन्द्र में पीठासीन आफिसर या निर्वाचन से संसक्त पदीय कर्तव्य पर नियोजित कोई अन्य आफिसर या लिपिक है तो, कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडनीय होगा;
(ख) यदि वह कोई अन्य व्यक्ति है तो, कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
(3) इस धारा के प्रयोजनों के लिए वह व्यक्ति पदीय कर्तव्य पर समझा जाएगा जिसका यह कर्तव्य है कि वह निर्वाचन के जिसके अन्तर्गत मतों की गणना आती है, या निर्वाचन के भाग के संचालन में भाग ले या ऐसे निर्वाचन के सम्बन्ध में उपयोग में लाए गए मतपत्रों और अन्य दस्तावेजों के लिए निर्वाचन के पश्चात् उत्तरदायी रहे किन्तु पदीय कर्तव्य" पद के अन्तर्गत ऐसा कोई कर्तव्य न होगा जो इस अधिनियम के द्वारा या अधीन ॥। अधिरोपित किए जाने से अन्यथा अधिरोपित होगा ।
[(4) उपधारा (2) के अधीन दण्डनीय अपराध संज्ञेय होगा ।]
137. [कुछ अपराधों के लिए अभियोजन ।]-लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1966 (1966 का 47) की धारा 61 द्वारा निरसित ।
138. [1898 के अधिनियम 5 का संशोधन।]-निरसन और संशोधन अधिनियम, 1957 (1957 का 36) की धारा 2 और अनुसूची द्वारा निरसित ।
भाग 8
निरर्हताएं
139.-145. [अध्याय 1 से 3 तक ।]-लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1966 (1966 का 47) की धारा 62 द्वारा निरसित ।
[अध्याय 4-सदस्यों की निरर्हताओं की जांच के संबंध में निर्वाचन आयोग की शक्तियां
146. निर्वाचन आयोग की शक्तियां-(1) जहां कि, यथास्थिति, अनुच्छेद 103 के अधीन या संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 (1963 का 20) की धारा 14 की उपधारा (4) के अधीन राष्ट्रपति को या अनुच्छेद 192 के अधीन राज्यपाल को कोई राय निविदत्त करने के संबंध में निर्वाचन आयोग जांच करना आवश्यक या उचित समझता है, और आयोग का समाधान हो जाता है कि ऐसी जांच में सम्पृक्त पक्षकारों द्वारा स्वयं फाइल किए गए शपथ-पत्र और पेश की गई दस्तावेजों के आधार पर वह उस मामले की, जिसकी जांच की जा रही है, विनिश्चायक राय नहीं बना सकता, वहां आयोग को ऐसी जांच के प्रयोजनों के लिए, निम्नलिखित मामलों के बारे में, अर्थात् :-
(क) किसी व्यक्ति को समन करने, हाजिर कराने और उसकी शपथ पर परीक्षा करने;
(ख) किसी दस्तावेज या साक्ष्य के रूप में पेश किए जाने योग्य किसी भौतिक पदार्थ को प्रकट और पेश करने की अपेक्षा करने;
(ग) शपथ-पत्रों पर साक्ष्य प्राप्त करने;
(घ) किसी न्यायालय या कार्यालय से कोई लोक अभिलेख या उसकी प्रति अध्यपेक्षित करने;
(ङ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालने,
के बारे में, वे शक्तियां होंगी जो सिविल न्यायालय की सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन वाद का विचारण करते समय होती हैं ।
(2) आयोग को यह शक्ति भी होगी कि वह किसी व्यक्ति से किसी ऐसे विशेषाधिकार के अध्यधीन रहते हुए जिसका दावा उस व्यक्ति द्वारा किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन किया जा सके, ऐसी बातों या मामलों पर, जो आयोग की राय में जांच की विषयवस्तु के लिए उपयोगी या सुसंगत हो, जानकारी लेने की अपेक्षा करे ।
(3) आयोग सिविल न्यायालय समझा जाएगा और जबकि कोई ऐसा अपराध, जो भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 175, धारा 178, धारा 179, धारा 180 या धारा 228 में वर्णित है, आयोग के सामने या उपस्थिति में किया जाता है, तब आयोग अपराध को गठित करने वाले तथ्यों को और अभियुक्त के कथन को अभिलिखित करने के पश्चात्, जैसा दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) में उपबन्धित है, मामले को उसका विचारण करने की अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट को भेज देगा और मजिस्ट्रेट, जिसके पास ऐसा मामला भेजा गया हो, अभियुक्त के विरुद्ध परिवाद सुनने के लिए ऐसे अग्रसर होगा मानो मामला उसके पास दण्ड प्रक्रिया संहिता, 18981 की धारा 482 के अधीन भेजा गया था ।
(4) आयोग के समक्ष कोई भी कार्यवाही भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ के भीतर न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी ।
146क. निर्वाचन आयोग के समक्ष व्यक्तियों द्वारा किए गए कथन-निर्वाचन आयोग के समक्ष साक्ष्य देने के अनुक्रम में किसी व्यक्ति द्वारा किया गया कोई कथन ऐसे कथन द्वारा, मिथ्या साक्ष्य देने के अभियोजन के सिवाय उसे किसी सिविल या दाण्डिक कार्यवाही के अध्यधीन नहीं करेगा और न उसमें उसके विरुद्ध उपयोग में लाया जाएगा:
परन्तु यह तब जबकि कथन-
(क) ऐसे प्रश्न के उत्तर में दिया गया है जिसका उत्तर देने के लिए वह आयोग द्वारा अपेक्षित है; या
(ख) जांच की विषयवस्तु से सुसंगत है ।
146ख. निर्वाचन आयोग द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया-निर्वाचन आयोग को अपनी प्रक्रिया (जिसके अन्तर्गत उसकी अपनी बैठकों के स्थान और समय नियत करना और यह विनिश्चय करना आते हैं कि बैठक लोक हो या प्राइवेट) विनियमित करने की शक्ति होगी ।
146ग. सद्भावपूर्वक किए गए अभिकार्य का परित्राण-कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही किसी ऐसी बात के बारे में जो इस अध्याय के पूर्वगामी उपबंधों के या तद्धीन बनाए गए किसी आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित है अथवा, यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल को आयोग द्वारा कोई राय निविदत्त करने के बारे में अथवा किसी ऐसी राय, कागजपत्र या कार्यवाही के आयोग के प्राधिकार के द्वारा या अधीन प्रकाशन के बारे में है, आयोग के या आयोग के निदेश के अधीन कार्य करने वाले किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं की जाएगी ।]
भाग 9
उपनिर्वाचन
147. राज्य सभा में हुई आकस्मिक रिक्तियां- [(1)] जब कि राज्य सभा के लिए निर्वाचित सदस्य की पदावधि के अवसान से पूर्व उसका स्थान रिक्त हो जाता है या रिक्त घोषित कर दिया जाता है या राज्य सभा के लिए उसका निर्वाचन शून्य घोषित कर दिया जाता है तब निर्वाचन आयोग, यथास्थिति, संपृक्त विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों से या निर्वाचकगण के सदस्यों ॥। से भारत के राजपत्र में अधिसूचना द्वारा अपेक्षा करेगा कि वे ऐसे हुई रिक्ति को भरने के प्रयोजन के लिए ऐसी तारीख से पूर्व, जैसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, एक व्यक्ति निर्वाचित कर दे और इस अधिनियम के और तद्धीन बनाए गए नियमों और आदेशों के उपबंध ऐसी रिक्ति को भरने के लिए सदस्य के निर्वाचन के संबंध में यावत्शक्य लागू होंगे ।
[(2) संविधान (सप्तम संशोधन) अधिनियम, 1956 के प्रारंभ की तारीख के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र उन रिक्तियों को भरने के लिए उप-निर्वाचन किए जाएंगे जो असम, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश राज्यों, और दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और मणिपुर। के संघ राज्यक्षेत्रों को आबंटित स्थानों में उस तारीख को विद्यमान हों ।]
148. [कुछ संघ राज्यक्षेत्रों के लिए निर्वाचकगणों में आकस्मिक रिक्तियां।]-क्षेत्रीय परिषद् अधिनियम, 1956 (1956 का 103) की धारा 64 द्वारा निरसित ।
149. लोक सभा में हुई आकस्मिक रिक्तियां-(1) जब कि लोक सभा के लिए निर्वाचित सदस्य का स्थान रिक्त हो जाता है या रिक्त घोषित कर दिया जाता है या लोक सभा के लिए उसका निर्वाचन शून्य घोषित कर दिया जाता है तब निर्वाचन आयोग उपधारा (2) के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए संपृक्त संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र से भारत के राजपत्र में अधिसूचना द्वारा अपेक्षा करेगा कि वह ऐसे हुई रिक्ति को भरने के प्रयोजन के लिए ऐसी तारीख से पूर्व, जैसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, एक व्यक्ति निर्वाचित कर दे और इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों और आदेशों के उपबंध ऐसी रिक्ति को भरने के लिए सदस्य के निर्वाचन के संबंध में यावत्शक्य लागू होंगे ।
(2) यदि ऐसे हुई रिक्ति ऐसे स्थान की रिक्ति हो, जो किसी ऐसे निर्वाचन-क्षेत्र में अनुसूचित जातियों के लिए या किन्हीं अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित है, तो उपधारा (1) के अधीन निकाली गई अधिसूचना में यह विनिर्दिष्ट होगा कि उस स्थान को भरने के लिए व्यक्ति, यथास्थिति, अनुसूचित जातियों या ऐसी अनूसूचित जनजातियों का ही होगा ।
150. राज्य विधान सभाओं में हुई आकस्मिक रिक्तियां-(1) जबकि किसी राज्य की विधान सभा के लिए निर्वाचित सदस्य का स्थान रिक्त हो जाता है या रिक्त घोषित कर दिया जाता है या विधान सभा के लिए उसका निर्वाचन शून्य घोषित कर दिया जाता है, तब निर्वाचन आयोग उपधारा (2) के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए संपृक्त सभा निर्वाचन-क्षेत्र से शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा अपेक्षा करेगा कि वह ऐसे हुई रिक्ति को भरने के प्रयोजन के लिए ऐसी तारीख से पूर्व, जैसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, एक व्यक्ति निर्वाचित कर दे और इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों और आदेशों के उपबंध ऐसी रिक्ति को भरने के लिए सदस्य के निर्वाचन के संबंध में यावत्शक्य लागू होंगे ।
(2) यदि ऐसे हुई रिक्ति ऐसे स्थान की रिक्ति हो, जो किसी ऐसे निर्वाचन-क्षेत्र में अनुसूचित जातियों के लिए या किन्हीं अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित है, तो उपधारा (1) के अधीन निकाली गई अधिसूचना में यह विनिर्दिष्ट होगा कि उस स्थान को भरने के लिए व्यक्ति, यथास्थिति, अनुसूचित जातियों या ऐसी अनुसूचित जनजातियों का ही होगा ।
151. राज्य विधान परिषदों में हुई आकस्मिक रिक्तियां-जबकि राज्य की विधान परिषद् के लिए निर्वाचित सदस्य की पदावधि के अवसान से पूर्व उसका स्थान रिक्त हो जाता है या रिक्त घोषित कर दिया जाता है या विधान परिषद् के लिए उसका निर्वाचन शून्य घोषित कर दिया जाता है, तब निर्वाचन आयोग, यथास्थिति, सम्पृक्त परिषद् निर्वाचन-क्षेत्र या उस राज्य की विधान सभा के सदस्यों से शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा अपेक्षा करेगा कि वे ऐसे हुई रिक्ति को भरने के प्रयोजन के लिए ऐसी तारीख से पूर्व, जैसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, एक व्यक्ति निर्वाचित कर दे और इस अधिनियम के और तद्धीन बनाए गए नियमों और आदेशों के उपबंध ऐसी रिक्ति को भरने के लिए सदस्य के निर्वाचन के संबंध में यावत्शक्य लागू होंगे ।
[151क. धारा 147, धारा 149, धारा 150 और धारा 151 में निर्दिष्ट रिक्तियों को भरने के लिए समय की परिसीमा-धारा 147, धारा 149, धारा 150 और धारा 151 में किसी बात के होते हुए भी, उक्त धाराओं में से किसी में निर्दिष्ट किसी रिक्ति को भरने के लिए उप-निर्वाचन, रिक्ति होने की तारीख से छह मास की अवधि के भीतर कराया जाएगा:
परन्तु इस धारा की कोई बात उस दशा में लागू नहीं होगी, जिसमें-
(क) किसी रिक्ति से संबंधित सदस्य की पदावधि का शेष भाग एक वर्ष से कम है; या
(ख) निर्वाचन आयोग, केन्द्रीय सरकार से परामर्श करके, यह प्रमाणित करता है कि उक्त अवधि के भीतर ऐसा उप-निर्वाचन कराना कठिन है ।]
भाग 10
प्रकीर्ण
152. राज्य विधान सभाओं में और निर्वाचकगणों के सदस्यों की सूची संयुक्त रिटर्निंग आफिसर रखेंगे-(1) राज्य सभा में के स्थान या स्थानों को भरने के लिए राज्य की विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा निर्वाचन के लिए या राज्य की विधान परिषद् में के स्थान या स्थानों को भरने के लिए राज्य की विधान सभा के सदस्यों द्वारा निर्वाचन के लिए रिटर्निंग आफिसर, यथास्थिति, उस विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों की सूची या सदस्यों की सूची ऐसे निर्वाचन के प्रयोजनों के लिए अपने कार्यालय में विहित रीति और प्ररूप में रखेगा ।
(2) राज्य सभा में के स्थान या स्थानों को भरने के लिए [संघ राज्यक्षेत्र] ॥। के लिए निर्वाचकगण के सदस्य द्वारा ॥। निर्वाचन के लिए रिटर्निंग आफिसर उस निर्वाचकगण के सदस्यों की सूची ऐसे निर्वाचन के प्रयोजनों के लिए अपने कार्यालय में विहित रीति और प्ररूप में रखेगा ।
(3) उपधाराओं (1) और (2) में निर्दिष्ट सूचियों की प्रतियां विक्रय के लिए उपलब्ध की जाएंगी ।
[153 निर्वाचन को पूरा करने के लिए समय का विस्तारण-निर्वाचन आयोग धारा 30 या धारा 39 की उपधारा (1) के अधीन अपने द्वारा निकाली गई अधिसूचना में आवश्यक संशोधन करके किसी निर्वाचन को पूरा करने के लिए समय का विस्तार उन कारणों के लिए, जिन्हें वह पर्याप्त समझे, करने के लिए सक्षम होगा ।]
154. राज्य सभा के सदस्यों की पदावधि- [(1) उपधाराओं (2) और (2क) के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए, आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए चुने गए सदस्य से भिन्न राज्य सभा के सदस्य की पदावधि छह वर्ष की होगी ।]
(2) ॥। राज्य सभा के प्रथम गठन पर राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग से परामर्श करने के पश्चात् उस समय चुने गए सदस्यों में से कुछ की पदावधि को इस प्रकार कम कर देने के लिए ऐसा उपबंध, जिसे वह ठीक समझता हो आदेश द्वारा करेगा कि हर एक वर्ग के स्थानों को धारण करने वाले सदस्यों में से यथाशक्य निकटतम एक तिहाई तत्पश्चात् हर दूसरे वर्ष के अवसान पर निवृत्त हो जाएंगे ।
[(2क) इसलिए कि सदस्यों में से यथाशक्य निकटतम एक तिहाई 1958 की अप्रैल के द्वितीय दिन और तत्पश्चात् हर दूसरे वर्ष के अवसान पर निवृत्त हो जाएं, राष्ट्रपति, संविधान (सप्तम संशोधन) अधिनियम, 1956 के प्रारभ्भ के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र निर्वाचन आयोग से परामर्श करने के पश्चात् ऐसे उपबंध, जैसे वह ठीक समझता हो, धारा 147 की उपधारा (2) के अधीन निर्वाचित सदस्यों की पदावधि के बारे में, आदेश द्वारा करेगा ।]
(3) आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए चुना गया सदस्य अपने पूर्ववर्ती के शेष भाग के लिए सेवा करने के लिए चुना जाएगा ।
155. राज्य सभा के सदस्यों की पदावधि का प्रारम्भ-(1) राज्य सभा के ऐसे सदस्य की पदावधि जिसके नाम का शासकीय राजपत्र में धारा 71 के अधीन अधिसूचित किया जाना अपेक्षित है, ऐसी अधिसूचना की तारीख से आरम्भ होगी ।
(2) राज्य सभा के ऐसे सदस्य की पदावधि, जिसके नाम का धारा 71 के अधीन अधिसूचित किया जाना अपेक्षित नहीं है, यथास्थिति, निर्वाचित के रूप में ऐसे व्यक्ति के नाम को अन्तर्विष्ट रखने वाली घोषणा के धारा 67 के अधीन शासकीय राजपत्र में प्रकाशन की तारीख से या ऐसे व्यक्ति के राज्य सभा के लिए नामनिर्देशन का आख्यापन करने वाली अनुच्छेद 80 के खंड (1) के उपखंड (क) के अधीन या किसी अन्य उपबंध के अधीन निकाली गई अधिसूचना की तारीख से आरम्भ होगी ।
156. राज्य विधान परिषदों के सदस्यों की पदावधि-(1) राज्य की विधान परिषद् में आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए चुने गए सदस्य से भिन्न उस परिषद् के सदस्य की पदावधि छह वर्ष की होगी किन्तु परिषद् के प्रथम गठन पर राज्यपाल ॥। निर्वाचन आयोग से परामर्श करने के पश्चात् उस समय चुने गए सदस्यों में से कुछ की पदावधि को इस प्रकार कम कर देने के लिए ऐसा उपबंध, जैसा वह ठीक समझे, आदेश द्वारा करेगा कि हर एक वर्ग के स्थानों को धारण करने वाले सदस्यों में से यथाशक्य निकटतम एक तिहाई तत्पश्चात् हर दूसरे वर्ष के अवसान पर निवृत्त हो जाएं ।
(2) आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए चुना गया सदस्य अपने पूर्ववर्ती की पदावधि के शेष भाग के लिए सेवा करने के लिए चुना जाएगा ।
157. विधान परिषदों के सदस्यों की पदावधि का प्रारम्भ-(1) राज्य की विधान परिषद् के ऐसे सदस्य की पदावधि, जिसके नाम का शासकीय राजपत्र में [धारा 74] के अधीन अधिसूचित किया जाना अपेक्षित है, ऐसी अधिसूचना की तारीख से आरम्भ होगी ।
(2) राज्य की विधान परिषद् के ऐसे सदस्य की पदावधि, जिसके नाम का 9[धारा 74] के अधीन अधिसूचित किया जाना अपेक्षित नहीं है, यथास्थिति, निर्वाचित के रूप में ऐसे व्यक्ति के नाम को अन्तर्विष्ट रखने वाली घोषणा के धारा 67 के अधीन शासकीय राजपत्र में प्रकाशन की तारीख से या ऐसे व्यक्ति के परिषद् के लिए नामनिर्देशन का आख्यापन करने वाली अनुच्छेद 171 के खण्ड (3) के उपखंड (ङ) के अधीन निकाली गई अधिसूचना की तारीख से आरम्भ होगी ।
[158. अभ्यर्थी के निक्षेप की वापसी का समपहरण-(1) धारा 34 के अधीन या धारा 39 की उपधारा (2) के साथ पठित उस धारा के अधीन किया गया निक्षेप या तो निक्षेप करने वाले व्यक्ति अथवा उसके विधिक प्रतिनिधि को वापस कर दिया जाएगा या इस धारा के उपबंधों के अनुसार समुचित प्राधिकारी को समपहृत हो जाएगा ।
(2) इस धारा में एतत्पश्चात् वर्णित दशाओं के सिवाय निक्षेप निर्वाचन परिणाम की घोषणा के पश्चात् यथासाध्य शीघ्रता से वापस कर दिया जाएगा ।
(3) यदि अभ्यर्थी निर्वाचन लड़ने वाले अभ्यर्थियों की सूची में दर्शित नहीं किया गया है या यदि मतदान के प्रारम्भ से पूर्व उसकी मृत्यु हो जाती है तो निक्षेप, यथास्थिति, सूची के प्रकाशन के पश्चात् या उसकी मृत्यु के पश्चात् यथासाध्य शीघ्रता से वापस कर दिया जाएगा ।
(4) यदि ऐसे निर्वाचन में, जिसमें मतदान हुआ है, अभ्यर्थी निर्वाचित नहीं होता और उसे प्राप्त विधिमान्य मतों की संख्या सब अभ्यर्थियों को प्राप्त विधिमान्य मतों की कुल संख्या के छठे भाग से, या निर्वाचन में एक से अधिक सदस्यों के निर्वाचन की दशा में उस संख्या के छठे भाग से, जो ऐसे पड़े हुए विधिमान्य मतों की कुल संख्या को, निर्वाचित किए जाने वाले सदस्यों की संख्या से, भाग देने पर आए, अधिक नहीं है, तो निक्षेप उपधारा (3) के उपबंधों के अध्यधीन समपहृत हो जाएगा:
परन्तु आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा किए गए निर्वाचन में जहां कि अभ्यर्थी निर्वाचित नहीं होता वहां उसके द्वारा किया गया निक्षेप समपहृत हो जाएगा यदि उसे मतों की उस संख्या के छठे भाग से अधिक मत प्राप्त नहीं होते जो अभ्यर्थी हो जाने के लिए पर्याप्त रूप में इस निमित्त विहित हैं ।
(5) उपधाराओं (2), (3) और (4) में किसी बात के होते हुए भी-
(क) यदि साधारण निर्वाचन में अभ्यर्थी एक से अधिक संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र में या एक से अधिक सभा निर्वाचन-क्षेत्र में निर्वाचन लड़ने वाला अभ्यर्थी है तो एक ही निक्षेप वापस किया जाएगा और अन्य निक्षेप समपहृत हो जाएंगे;
(ख) यदि अभ्यर्थी निर्वाचन में एक से अधिक परिषद् निर्वाचन-क्षेत्रों में, या निर्वाचन में एक परिषद् निर्वाचन-क्षेत्र में और विधान परिषद् में स्थानों को भरने के लिए राज्य विधान सभा के सदस्यों द्वारा निर्वाचन में, निर्वाचन लड़ने वाला अभ्यर्थी है तो एक ही निक्षेप वापस किया जाएगा और अन्य निक्षेप समपहृत हो जाएंगे ।
[159. कतिपय प्राधिकारियों के कर्मचारिवृन्द निर्वाचन के काम के लिए उपलब्घ किए जाएंगे-(1) जब अनुच्छेद 324 के खंड (4) के अधीन नियुक्त प्रादेशिक आयुक्त या राज्य का मुख्य निर्वाचन आफिसर, ऐसा अनुरोध करे तब, उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी किसी रिटर्निंग आफिसर को उतने कर्मचारिवृन्द उपलब्ध कराएंगे जितने निर्वाचन के संबंध में किन्हीं कर्तव्यों के पालन के लिए आवश्यक हों ।
(2) उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए निम्नलिखित प्राधिकारी होंगे, अर्थात्: -
(i) हर स्थानीय प्राधिकारी;
(ii) केन्द्रीय, प्रान्तीय या राज्य अधिनियम द्वारा स्थापित या निगमित हर विश्वविद्यालय;
(iii) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में परिभाषित कोई सरकारी कंपनी;
(iv) ऐसी कोई अन्य संस्था, समुत्थान या उपक्रम, जो केन्द्रीय, प्रान्तीय या राज्य अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित किया गया है या जो केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः उपलब्ध कराई गई निधियों द्वारा पूर्णतः या सारतः नियंत्रित या वित्तपोषित है ।]
160. परिसर, यानों आदि का निर्वाचन के प्रयोजन के लिए अधिग्रहण-(1) यदि राज्य सरकार को यह प्रतीत होता है कि राज्य के भीतर होने वाले निर्वाचन के संबंध में-
(क) इस प्रयोजन के लिए कि उसका मतदान केन्द्र के रूप में या मतदान होने के पश्चात् मतपेटियों के रखने के लिए उपयोग किया जाए, किसी परिसर की आवश्यकता है या आवश्यकता होनी संभाव्य है; अथवा
(ख) किसी मतदान केन्द्र से या को मतपेटियों के परिवहन के प्रयोजन के लिए या ऐसे निर्वाचन के संचालन के दौरान व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल के सदस्यों के परिवहन के या ऐसे निर्वाचन के संबंध में किन्हीं कर्तव्यों के पालन के लिए किसी आफिसर या अन्य व्यक्ति के परिवहन के लिए किसी यान, जलयान या जीवजन्तु की आवश्यकता है या आवश्यकता होनी संभाव्य है,
तो वह सरकार ऐसे परिसर या, यथास्थिति, ऐसे यान, जलयान या जीवजन्तु का अधिग्रहण लिखित आदेश द्वारा कर सकेगी, और ऐसे अतिरिक्ति आदेश दे सकेगी जैसे कि अधिग्रहण के संबंध में उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों:
परन्तु ऐसा कोई यान, जलयान या जीवजन्तु, जिसे अभ्यर्थी या उसका अभिकर्ता ऐसे अभ्यर्थी के निर्वाचन से संसक्त किसी प्रयोजन के लिए विधिपूर्णतः उपयोग में ला रहा है, इस उपधारा के अधीन तब तक अधिगृहीत न किया जाएगा जब तक ऐसे निर्वाचन में मतदान समाप्त न हो जाए ।
(2) अधिग्रहण उस व्यक्ति को संबोधित लिखित आदेश द्वारा किया जाएगा जिसकी बाबत राज्य सरकार यह समझती है कि वह उस सम्पत्ति का स्वामी है या उस पर कब्जा रखने वाला व्यक्ति है और ऐसे आदेश की उस व्यक्ति पर तामील, जिसे वह संबोधित है, विहित रीति में की जाएगी ।
(3) जब कभी कोई सम्पत्ति उपधारा (1) के अधीन अधिगृहीत की जाए तब ऐसे अधिग्रहण की कालावधि उस कालावधि के परे विस्तृत न होगी जिसके लिए ऐसी सम्पत्ति उस उपधारा में वर्णित प्रयोजनों में से किसी के लिए अपेक्षित है ।
(4) इस धारा में-
(क) परिसर" से कोई भूमि, भवन या भवन का भाग अभिप्रेत है और झोंपड़ी, शेड या अन्य संरचना या उसका कोई भाग इसके अन्तर्गत आता है;
(ख) यान" से ऐसा कोई यान अभिप्रेत है जो सड़क परिवहन के प्रयोजन के लिए उपयोग में आता है या उपयोग में लाए जाने योग्य है भले ही वह यांत्रिक शक्ति से नोदित हो या न हो ।
161. प्रतिकर का संदाय-(1) जब कभी राज्य सरकार किसी परिसर को धारा 160 के अनुसरण में अधिगृहीत करे तब हितबद्ध व्यक्तियों को प्रतिकर संदत्त किया जाएगा जिसकी रकम का अवधारण निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखकर किया जाएगा, अर्थात्: -
(i) परिसर की बाबत देय भाटक या यदि कोई भाटक ऐसे देय न हो तो उस परिक्षेत्र में वैसे ही परिसर के लिए देय भाटक;
(ii) यदि हितबद्ध व्यक्ति परिसर के अधिग्रहण के परिणामस्वरूप अपने निवास-स्थान या कारबार के स्थान को बदलने के लिए विवश हुआ हो तो ऐसे बदलने से आनुषंगिक युक्तियुक्त व्यय (यदि कोई हो):
परन्तु जहां कि कोई हितबद्ध व्यक्ति ऐसे अवधारित प्रतिकर की रकम से व्यथित होते हुए राज्य सरकार से विहित समय के अन्दर यह आवेदन करता है कि वह मामला मध्यस्थ को निर्देशित कर दिया जाए वहां दिए जाने वाले प्रतिकर की रकम ऐसी रकम होगी जैसी राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त नियुक्त मध्यस्थ अवधारित करें:
परन्तु यह और भी जहां प्रतिकर पाने के हक की बाबत या प्रतिकर की रकम के प्रभाजन की बाबत कोई विवाद है वहां अवधारण के लिए उसे राज्य सरकार अपने द्वारा इस निमित्त नियुक्त मध्यस्थ को निर्दिष्ट करेगी और वह विवाद ऐसे मध्यस्थ के विनिश्चय के अनुसार अवधारित किया जाएगा ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा में हितबद्ध व्यक्ति" पदावलि से वह व्यक्ति, जो धारा 160 के अधीन अधिगृहीत परिसर पर अधिग्रहण के अव्यवहित पूर्व वास्तविक कब्जा रखता था या जहां कि कोई व्यक्ति ऐसा वास्तविक कब्जा नहीं रखता था वहां ऐसे परिसर का स्वामी अभिप्रेत है ।
(2) जब कभी राज्य सरकार कोई यान, जलयान या जीवजन्तु धारा 160 के अनुसरण में अधिगृहीत करे तब उसके स्वामी को प्रतिकर संदत्त किया जाएगा जिसकी रकम का अवधारण राज्य सरकार ऐसे यान, जलयान या जीवजन्तु को भाड़े पर लेने के लिए उस परिक्षेत्र में प्रचलित भाड़े या दरों के आधार पर करेगी:
परन्तु जहां कि ऐसे यान, जलयान या जीवजन्तु का स्वामी ऐसे अवधारित प्रतिकर की रकम से व्यथित होते हुए राज्य सरकार से विहित समय के भीतर यह आवेदन करता है कि वह मामला मध्यस्थ को निर्दिष्ट कर दिया जाए वहां दिए जाने वाले प्रतिकर की रकम ऐसी रकम होगी जैसी राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त नियुक्त मध्यस्थ अवधारित करे:
परन्तु यह और भी कि जहां अधिगृहीत किए जाने से अव्यवहित पूर्व यान या जलयान स्वामी से भिन्न व्यक्ति के कब्जे में अवक्रय करार के आधार पर था वहां अधिग्रहण के बारे में संदेय कुल प्रतिकर के रूप में इस उपधारा के अधीन अवधारित रकम उस व्यक्ति और स्वामी के बीच में ऐसी रीति में, जिसके लिए वे सहमत हो जाएं, और ऐसी सहमति के अभाव में, ऐसी रीति में, जैसी राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त नियुक्त मध्यस्थ विनिश्चित करे, प्रभाजित की जाएगी ।
162. जानकारी अभिप्राप्त करने की शक्ति-राज्य सरकार किसी सम्पत्ति को धारा 160 के अधीन अधिगृहीत करने की या धारा 181 के अधीन संदेय प्रतिकर को अवधारित करने की दृष्टि से किसी व्यक्ति से आदेश द्वारा अपेक्षा कर सकेगी कि वह ऐसी सम्पत्ति संबंधी अपने कब्जे की ऐसी जानकारी, जैसी आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, ऐसे प्राधिकारी को दे जो ऐसे विनिर्दिष्ट किया जाए ।
163. किसी परिसर आदि में प्रवेश करने और उनके निरीक्षण की शक्तियां-(1) यह अवधारण करने के प्रयोजन के लिए कि क्या किसी परिसर, किसी यान, जलयान या जीवजन्तु के संबंध में धारा 160 के अधीन आदेश किया जाए और यदि किय़ा जाए तो किस रीति में किया जाए या इस दृष्टि से कि उस धारा के अधीन किए गए किसी आदेश का अनुपालन सुनिश्चित किया जाए कोई व्यक्ति, जो राज्य सरकार द्वारा या इस निमित्त प्राधिकृत किया गया है, ऐसे परिसर में प्रवेश कर सकेगा और ऐसे परिसर और उनमें के किसी यान, जलयान या जीवजन्तु का निरीक्षण कर सकेगा ।
(2) इस धारा में परिसर" तथा यान" पदों के वही अर्थ हैं जो धारा 160 में हैं ।
164. अधिगृहीत परिसर से बेदखली-(1) जो कोई व्यक्ति किसी अधिगृहीत परिसर पर धारा 160 के अधीन किए गए किसी आदेश के उल्लंघन में कब्जा किए रहता है, उसे राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त सशक्त कोई आफिसर उस परिसर में से संक्षेपतः बेदखल कर सकेगा ।
(2) ऐसे सशक्त कोई आफिसर ऐसी किसी स्त्री को, जो लोक समक्ष नहीं आती, युक्तियुक्त चेतावनी और हट जाने के लिए सुविधा देकर किसी भवन के किसी ताले या चटखनी को हटा या खोल सकेगा और किसी द्वार को तोड़ सकेगा या ऐसी बेदखली के प्रयोजन के लिए कोई अन्य आवश्यक कार्य कर सकेगा ।
165. अधिग्रहण से परिसर की निर्मुक्ति-(1) जब कि धारा 160 के अधीन अधिगृहीत कोई परिसर अधिग्रहण से निर्मुक्त किए जाने हों, तब उनका कब्जा उस व्यक्ति को, जिससे परिसर के अधिगृहीत किए जाने के समय कब्जा लिया गया था, या यदि कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था तो उस व्यक्ति को, जिसकी बाबत राज्य सरकार यह समझती है कि वह ऐसे परिसर का स्वामी है परिदत्त किया जाएगा, और कब्जे का ऐसे परिदान राज्य सरकार को उन सब दायित्वों से, जो ऐसे परिदान के बारे में हैं, पूर्णतः उन्मोचित कर देगा, किन्तु उससे परिसर की बाबत ऐसे किन्हीं अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़ेगा जिन्हें कोई अन्य व्यक्ति उस व्यक्ति के खिलाफ, जिसे परिसर का कब्जा ऐसे परिदत्त किया गया है, विधि की सम्यक् प्रक्रिया प्रवर्तित कराने के लिए हकदार हो ।
(2) जहां कि वह व्यक्ति, जिसे धारा 160 के अधीन अधिगृहीत किसी परिसर का कब्जा उपधारा (1) के अधीन दिया जाना है, पाया नहीं जा सकता या जिसका आसानी से अभिनिश्चय नहीं हो पाता या उसकी ओर से परिदान प्रतिगृहीत करने के लिए सशक्त कोई अभिकर्ता या कोई अन्य व्यक्ति नहीं है वहां राज्य सरकार यह घोषणा करने वाली सूचना कि ऐसे परिसर अधिग्रहण से निर्मुक्त कर दिए गए हैं ऐसे परिसर के किसी सहजदृश्य भाग में लगवाएगी और सूचना को शासकीय राजपत्र में प्रकाशित करेगी ।
(3) जब कि उपधारा (2) में निर्दिष्ट सूचना शासकीय राजपत्र में प्रकाशित कर दी गई है तब ऐसी सूचना में विनिर्दिष्ट परिसर ऐसे अधिग्रहण के अध्यधीन ऐसे प्रकाशन की तारीख को और से न रहेंगे और उनकी बाबत यह समझा जाएगा कि वे उस व्यक्ति को परिदत्त कर दिए गए हैं, जो उन पर कब्जा रखने का हकदार है, और राज्य सरकार उक्त तारीख के पश्चात् किसी कालावधि के लिए ऐसे परिसर के संबंध में किसी प्रतिकर या अन्य दावे के लिए दायित्वाधीन न होगी ।
166. अधिग्रहण की बाबत राज्य सरकार के कृत्यों का प्रत्यायोजन-राज्य सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगी कि उस सरकार पर धारा 160 से लेकर धारा 165 तक के उपबन्धों में से किसी द्वारा प्रदत्त कोई शक्तियां या अधिरोपित कोई कर्तव्य ऐसी शर्तों के अधीन, यदि कोई हों, जैसी उस निदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं ऐसे आफिसर या ऐसे वर्ग के आफिसरों द्वारा प्रयुक्त या निर्वाहित किए जाएंगे जैसे विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
167. अधिग्रहण संबंधी किसी आदेश के उल्लंघन के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति धारा 160 या धारा 162 के अधीन किए गए आदेश का उल्लंघन करेगा, तो वह कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
168. [भूतपूर्व देशी राज्यों के शासकों की बाबत विशेष उपबंध ।]-देशी राज्य शासक (विशेषाधिकार समाप्ति) अधिनियम, 1972 (1972 का 54) की धारा 4 द्वारा (9-9-1972) से निरसित ।
भाग 11
साधारण
169. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, निर्वाचन आयोग से परामर्श करने के पश्चात् शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतः और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम सब निम्नलिखित बातों का, या उनमें से किसी के लिए, उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -
[(क) धारा 33क की उपधारा (2) के अधीन शपथपत्र का प्ररूप;]
[(कक) मतदान केन्द्रों में पीठासीन आफिसरों और मतदान आफिसरों के कर्तव्य;]
[(ककक) अभिदाय रिपोर्ट का प्ररूप;]
(ख) निर्वाचक नामावलियों के प्रति निर्देश से मतदाताओं की जांच-पड़ताल करना;
1[(खख) केबल टेलीविजन नेटवर्क और अन्य इलैक्ट्रानिक मीडिया पर समय की साम्यापूर्ण भागीदारी के आबंटन की रीति;]
(ग) वह रीति जिसमें मत इन दोनों दशाओं में, अर्थात् साधारणतः और निरक्षर मतदाताओं या शारीरिक या अन्य निर्योग्यता से ग्रस्त मतदाताओं की दशाओं में, दिए जाने हैं;
(घ) वह रीति जिसमें पीठासीन आफिसर, मतदान आफिसर, मतदान अभिकर्ता या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा, जो एक निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक होते हुए ऐसे मतदान केन्द्र में कर्तव्य के लिए अप्राधिकृत या नियुक्त किया गया है, जिसमें वह मत देने का हकदार नहीं है, मत दिए जाने हैं;
(ङ) उस व्यक्ति द्वारा मत के निविदान की बाबत, अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया, जो यह व्यपदेश कि मैं निर्वाचक हूं, किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा ऐसे निर्वाचक के रूप में मत दिए जाने के पश्चात् करता है;
[(ङङ) मतदान मशीनों के द्वारा मत देने और अभिलिखित करने की रीति और ऐसे मतदान केन्द्रों पर, जहां ऐसी मशीनों का प्रयोग किया जाता है, अनुसरण की जाने वाली मतदान प्रक्रिया;]
(च) वह प्रक्रिया जिसका अनुसरण आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होने वाले निर्वाचनों में मत देने के लिए किया जाना है;
(छ) मतों की संवीक्षा और गणना, जिसके अन्तर्गत वे मामले आते हैं, जिनमें निर्वाचन परिणाम की घोषणा के पूर्व मतों की पुनर्गणना की जानी है;
2[(छछ) मतदान मशीनों द्वारा अभिलिखित मतों की गणना की प्रक्रिया;]
(ज) [मत पेटियों, मतदान मशीनों,] मतपत्रों की और निर्वाचन के अन्य कागजपत्रों की सुरक्षित अभिरक्षा, वह कालावधि जिस तक ऐसे कागजपत्र परिरक्षित किए जाएंगे और ऐसे कागजपत्रों का निरीक्षण और पेश किया जाना;
1[(जज) सरकार द्वारा, लोक सभा या किसी राज्य की विधान सभा का गठन करने के प्रयोजनों के लिए होने वाले किसी निर्वाचन में मान्यताप्राप्त राजनैतिक दलों के अभ्यर्थियों को प्रदाय की जाने वाली सामग्री;]
(झ) ऐसी कोई अन्य बात जो इस अधिनियम द्वारा विहित किए जाने के लिए अपेक्षित है ।
[(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निप्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निप्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
170. सिविल न्यायालयों की अधिकारिता वर्जित-किसी भी सिविल न्यायालय को यह अधिकारिता न होगी कि वह रिटर्निंग आफिसर या किसी ऐसे अन्य व्यक्ति द्वारा, जो इस अधिनियम के अधीन नियुक्त है, निर्वाचन के संबंध में की गई किसी कार्यवाही या किसी विनिश्चय की वैधता को प्रश्नगत करे ।
171. [1920 के अधिनियम 39 का निरसन ।]-निरसन और संशोधन अधिनियम, 1957 (1957 का 36) की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा निरसित ।
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