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प्रतिलिप्यधिकार अधिनियम, 1957 ( Copyright Act, 1957 )


 

प्रतिलिप्यधिकार अधिनियम, 1957

(1957 का अधिनियम संख्यांक 14)

[4 जून, 1957]

प्रतिलिप्यधिकार से संबद्ध विधि को

संशोधित और समेकित

करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के आठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) यह अधिनियम प्रतिलिप्यधिकार अधिनियम, 1957 कहा जा सकेगा ।

(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है ।

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे ।

2. निर्वचन-इस अधिनियम में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

                (क) अनुकूल" से अभिप्रेत है-

                                (i) किसी नाट्यकृति के संबंध में उस कृति का अनाट्यकृति में संपरिवर्तन, 

(ii) किसी साहित्यिक कृति या कलात्मक कृति के संबंध में उस कृति का सार्वजनिक प्रस्तुतीकरण के रूप में या अन्यथा नाट्यकृति में संपरिवर्तन,

(iii) किसी साहित्यिक या नाट्यकृति के संबंध में उस कृति का कोई संक्षेपण या उस कृति का कोई रूपांतर जिसमें कथा या घटनाक्रम को पूर्णतः या मुख्यतः ऐसे चित्रों के माध्यम से दर्शाया जाता है जो किसी पुस्तक या समाचारपत्र, पत्रिका या वैसी ही सामयिकी में पुनरुत्पादन के लिए उपयुक्त प्रकार के हों, ॥।

(iv) किसी संगीतात्मक कृति के संबंध में उस कृति का कोई विन्यास या प्रतिलेखन, 4[और]

 [(v) किसी कृति के संबंध में, उस कृति का ऐसा उपयोग, जिसमें उसका पुनर्विन्यास या क्रमांतरण अन्तर्वलित है;]

(ख) [वास्तु कृति"] से ऐसा कोई भवन या संरचना जिसका स्वरूप या जिसका डिजाइन कलात्मक हो अथवा ऐसे भवन या संरचना के लिए कोई माडल अभिप्रेत है;

(ग) कलात्मक कृति" से अभिप्रेत है-

(i) कोई रंगचित्र, मूर्ति, रेखाचित्र (जिसके अन्तर्गत आरेख, मानचित्र, चार्ट या रेखांक भी है), कोई उत्कीर्ण या फोटोग्राफ, चाहे ऐसी किसी कृति में कलात्मक गुण हो या न हो,

(ii) कोई 5[वास्तु कृति], और

(iii) कलात्मक शिल्पकारिता की कोई अन्य कृति,

                                (घ) रचयिता" से अभिप्रेत है, -

(i) किसी साहित्यिक या नाट्यकृति के संबंध में उस कृति का रचयिता,

(ii) किसी संगीतात्मक कृति के संबंध में, संगीतकार,

(iii) फोटोग्राफ से भिन्न किसी कलात्मक कृति के संबंध में, कलाकार,

(iv) किसी फोटोग्राफ के संबंध में, फोटोग्राफ खींचने वाला व्यक्ति,

 [(v) किसी चलचित्र फिल्म या ध्वन्यंकन के संबंध में, निर्माता; और

(vi) किसी ऐसी साहित्यिक, नाट्य, संगीतात्मक या कलात्मक कृति के संबंध में, जो कम्पयूटरजनित है, वह व्यक्ति जो उस कृति का सृजन कराता है;

                                 [(घघ) प्रसारण" से-

(i) बेतार विसारण के किसी माध्यम से, चाहे वह संकेत, ध्वनि या दृश्य बिम्ब के एक या अधिक रूपों में हो; या

(ii) तार से,

                सार्वजनिक रूप से संसूचित करना अभिप्रेत है और उसके अंतर्गत पुनः प्रसारण भी है;]

                                (ङ) कलैंडर वर्ष" से जनवरी के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाला वर्ष अभिप्रेत है;

 [(च) चलचित्र फिल्म" से ॥। किसी दृश्यांकन की कोई कृति अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत ऐसे दृश्यांकन के साथ कोई ध्वन्यंकन है तथा चलचित्र" का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अन्तर्गत वीडियो फिल्म सहित चलचित्रकी के सदृश्य किसी प्रक्रिया से उत्पादित कोई कृति है;]

 [(चक) वाणिज्यिक किराया" के अंतर्गत किसी लाभनिरपेक्ष पुस्तकालय या लाभनिरपेक्ष शिक्षा संस्था द्वारा लाभनिरपेक्ष प्रयोजनों के लिए किसी कंप्यूटर प्रोग्राम, ध्वन्यंकन, दृश्यांकन या चलचित्र फिल्म की विधिपूर्वक अर्जित किसी प्रति को किराए पर, पट्टे पर या उधार में देना सम्मिलित नहीं है ।

स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए किसी लाभनिरपेक्ष पुस्तकालय या लाभनिरपेक्ष शिक्षा संस्था" से ऐसा पुस्तकालय या शिक्षा संस्था अभिप्रेत है जो सरकार से अनुदान प्राप्त करती है या वह आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) के अधीन कर के संदाय से छूट प्राप्त है;]

 [(चच) सार्वजनिक रूप से संसूचित करना" से किसी कृति या प्रस्तुतीकरण की स्थूल प्रतियां उपलब्ध कराने से भिन्न रूप में संप्रदर्शन या विस्तारण करने के लिए किसी माध्यम से अथवा प्रत्यक्ष रूप से जनसाधारण द्वारा चाहे एक साथ या व्यक्तिगत रूप से चुने गए स्थानों और समयों पर, देखे जाने या सुने जाने या अन्यथा उपभोग करने के लिए, इस बात को ध्यान में लाए बिना कि जनसाधारण इस प्रकार उपलब्ध कराई गई कृति या प्रस्तुतीकरण को वास्तव में देखता है, सुनता है या अन्यथा उसका उपभोग करता है या नहीं, उपलब्ध कराना अभिप्रेत है ।

स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, उपग्रह या केबल के माध्यम से अथवा युगपद् संप्रेषण के किसी अन्य माध्यम से एक से अधिक घरों या निवास-स्थानों को, जिनके अंतर्गत किसी होटल या होस्टल के आवासीय कमरे भी हैं, संसूचना देने को सार्वजनिक रूप से संसूचित करना समझा जाएगा;]

(चचक) किसी संगीतात्मक कृति के संबंध में, संगीतकार" से अभिप्रेत है वह व्यक्ति जो संगीत की स्वररचना इस बात को ध्यान में लाए बिना करता है कि वह उसे आलेखनीय स्वरांकन के किसी रूप में अंकित करता है या नहीं;

(चचख) कम्प्यूटर" के अन्तर्गत कोई इलेक्ट्रानिक या वैसी ही युक्ति है जिसमें सूचना संसाधन सामर्थ्य हों;

(चचग) कम्प्यूटर प्रोग्राम" से ऐसा अनुदेश समुच्चय अभिप्रेत है जो शब्दों, कूट शब्दों, स्कीमों या किसी अन्य रूप में अभिव्यक्त किया जाता है और जिसके अन्तर्गत ऐसा कोई यंत्र पठनीय माध्यम है, जो कम्प्यूटर से कोई विशिष्ट कार्य कराने या कोई विशिष्ट परिणाम प्राप्त कराने के योग्य हो;

(चचघ) प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी" से धारा 33 की उपधारा (3) के अधीन रजिस्ट्रीकृत सोसाइटी अभिप्रेत है;]

(छ) किसी व्याख्यान के संबंध में वाक् प्रस्तुति" के अन्तर्गत किसी यांत्रिक उपकरण के माध्यम से अथवा [प्रसारण] से वाक् प्रस्तुति भी है;

(ज) नाट्यकृति" के अंतर्गत सुपठन के लिए रचनांश, नृत्यरचनाकृति या मूक प्रदर्शन द्वारा मनोरंजन भी है जिसका दृश्य विन्यास या अभिनय का रूप लिखित रूप में या अन्यथा नियत है किन्तु इसके अंतर्गत चलचित्र फिल्म नहीं है;

 [(जज) अनुलिपिकरण उपस्कर" से कोई ऐसी यांत्रिक प्रयुक्ति या युक्ति अभिप्रेत है जो किसी कृति की प्रतियां बनाने के लिए प्रयुक्त की जाती है या प्रयुक्त किए जाने के लिए आशयित है;]

(झ) उत्कीर्णन" के अन्तर्गत निरेखण, शिलामुद्रण, काष्ठचित्रण, प्रिंट और वैसी ही अन्य कृतियां है जो फोटोग्राफ नहीं है;

(ञ) अनन्य अनुज्ञप्ति" से ऐसी अनुज्ञप्ति अभिप्रेत है जो अनुज्ञप्तिधारी की या अनुज्ञप्तिधारी और उसके द्वारा प्राधिकृत व्यक्तियों को (प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी सहित), सभी अन्य व्यक्तियों का अपवर्जन करके ऐसा कोई अधिकार प्रदत्त करती है जो किसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार में समाविष्ट है तथा अनन्य अनुज्ञप्तिधारी" का अर्थ तदनुकूल लगाया जाएगा;

(ट) सरकारी कृति" से ऐसी कृति अभिप्रेत है जो निम्नलिखित द्वारा या उनके निदेश या नियंत्रण के अधीन बनाई या प्रकाशित की जाती है-

(i) सरकार या सरकार का कोई विभाग;

(ii) भारत में कोई विधान-मंडल;

(iii) भारत में कोई न्यायालय, अधिकरण या अन्य न्यायिक प्राधिकारी;

                                 [(ठ) भारतीय कृति" से ऐसी साहित्यिक, नाट्य या संगीतात्मक कृति अभिप्रेत है, -

(i) जिसका रचयिता भारत का नागरिक है; या

(ii) जो भारत में प्रथम बार प्रकाशित की गई है; या

(iii) जिसका रचयिता किसी अप्रकाशित कृति की दशा में, ऐसी कृति के बनाए जाने के समय भारत का नागरिक है;]

                                 [(ड) अतिलंघनकारी प्रति" से अभिप्रेत है-

(i) किसी साहित्यिक, नाट्य, संगीतात्मक या कलात्मक कृति के संबंध में उसका पुनरुत्पादन जो चलचित्र फिल्म के रूप में नहीं है;

(ii) किसी चलचित्र फिल्म के संबंध में, उस फिल्म की ऐसी प्रति जो किसी भी माध्यम से किसी संचार माध्यम द्वारा तैयार की जाती है;

(iii) किसी ध्वन्यंकन के संबंध में, उसी ध्वन्यंकन को सन्निविष्ट करने वाला कोई ऐसा अन्य ध्वन्यंकन, जो किसी भी माध्यम से तैयार किया जाता हो;

(iv) किसी प्रोग्राम या प्रस्तुतीकरण के संबंध में, जिसमें इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन कोई प्रसारण पुनरुत्पादन अधिकार या प्रस्तुतकर्ता का अधिकार अस्तित्व में है ऐसे प्रोग्राम या प्रस्तुतीकरण या ध्वन्यंकन अथवा चलचित्र फिल्म,

यदि ऐसा पुनरुत्पादन, प्रति या ध्वन्यंकन, इस अधिनियम के उपबंधों के उल्लंघन में तैयार किया जाता है या आयात किया जाता है;]

                                (ढ) व्याख्यान" के अन्तर्गत अभिभाषण, भाषण और प्रवचन भी हैं;

 [(ण) साहित्यिक कृति" के अंतर्गत कंप्यूटर प्रोग्राम, सारणियां और संकलन हैं जिनके अंतर्गत कंप्यूटर [आंकड़ा आधार] है;]

 [(त) संगीतात्मक कृति" से संगीत से संयोजित कोई कृति अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत ऐसी कृति का कोई आलेखनीय स्वरांकन है किन्तु इसके अन्तर्गत ऐसे कोई शब्द या ऐसा कोई कार्य नहीं आता है जो संगीत के साथ गाने, बोलने या प्रस्तुत करने के लिए आशयित है;]

 [(थ) प्रस्तुतकर्ता के अधिकार के संबंध में, प्रस्तुतीकरण" से कोई दृश्य या श्रव्य प्रस्तुति अभिप्रेत है जो एक या अधिक प्रस्तुतकर्ताओं द्वारा सीधे प्रस्तुत किया जाता है;]

 [(थथ) प्रस्तुतकर्ता" के अन्तर्गत कोई अभिनेता, गायक, संगीतज्ञ, नर्तक, कलाबाज, बाजीगर, जादूगर, सपेरा, व्याख्यान देने वाला व्यक्ति या कोई अन्य व्यक्ति है, जो कोई प्रस्तुतीकरण करता है;]

 [परन्तु किसी चलचित्र फिल्म में किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसका प्रस्तुतीकरण नैमित्तिक या आनुषंगिक प्रकृति का है और, उद्योग जगत की पद्धति के सामान्य अनुक्रम में, फिल्म के आकलनों सहित कहीं भी अभिस्वीकार नहीं किया जाता है, धारा 38ख के खंड (ख) के प्रयोजन के सिवाय, प्रस्तुतकर्ता के रूप में नहीं माना जाएगा;]

 ।                                             ।                                    ।                                       ।                                              ।

(ध) फोटोग्राफ" के अन्तर्गत फोटो-शिलामुद्रण और फोटोग्राफी के सदृश्य किसी प्रक्रिया द्वारा उत्पादित कोई कृति भी है किन्तु चलचित्र फिल्म का कोई भाग इसके अन्तर्गत नहीं है;

(न) प्लेट" के अन्तर्गत है कोई स्टीरियोटाइप या अन्य प्लेट, पत्थर, ब्लाक, सांचा, मैट्रिक्स, अंतरक, नेगेटिव [अनुलिपिकरण उपस्करण] या अन्य युक्ति, जो किसी कृति के मुद्रण या उसकी प्रतियां पुनरुत्पादित करने के लिए प्रयुक्त की जाती हैं या प्रयुक्त किए जाने के लिए आशयित हैं तथा कोई मैट्रिक्स या अन्य साधित्र जिससे कृति की श्रव्य प्रस्तुति के लिए [ध्वन्यंकन] बनाए जाते हैं या बनाए जाने आशयित हैं;

(प) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

2[(पप) चलचित्र फिल्म या ध्वन्यंकन के संबंध में, निर्माता" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो कृति तैयार करने में पहल करता है और ऐसा करने का उत्तरदायित्व लेता है;]

 ।                                             ।                                              ।                                              ।                             

 ।                                             ।                                              ।                                              ।                             

 [(भ) रेप्रोग्राफी" से किसी कृति की फोटो प्रतिलिपिकरण द्वारा या वैसे ही माध्यम से प्रतियां तैयार करना अभिप्रेत है;

                                3[(भक) अधिकार प्रबंधन सूचना" से निम्नलिखित अभिप्रेत है, -

(क) कृति या प्रस्तुतीकरण की पहचान कराने वाला शीर्षक या अन्य सूचना;

(ख) रचयिता या प्रस्तुतकर्ता का नाम;

(ग) अधिकारों के स्वामी का नाम और पता;

(घ) अधिकारों के उपयोग से संबंधित निबंधन और शर्तें; और

(ङ) ऐसा कोई संख्यांक या कूट शब्द जो उपखंड (क) से उपखंड (घ) में निर्दिष्ट सूचना को निरूपित करता है,

किंतु इसके अन्तर्गत उपयोक्ता की पहचान करने के लिए आशयित कोई युक्ति या प्रक्रिया नहीं है;]

(भभ) ध्वन्यंकन" से ऐसा ध्वन्यंकन अभिप्रेत है जिससे ऐसी ध्वनियां, इस बात को ध्यान में लाए बिना, उत्पादित की जा सकें कि ऐसा ध्वन्यंकन किस संचार माध्यम द्वारा किया जाता है या वह पद्धति क्या है जिससे ध्वनियां उत्पादित की जाती हैं;]

3[(भभक) दृश्यांकन" से गतिमान बिंबों या उनकी प्रतिकृतियों का, किसी संचार माध्यम में किसी पद्धति द्वारा, ऐसा अंकन, जिसके अन्तर्गत किसी इलैक्ट्रानिक माध्यम से उसका भंडारण भी है, अभिप्रेत है जिससे उनको किसी पद्धति से बोधगम्य बनाया जा सकता है, पुनरुत्पादित या संसूचित किया जा सकता है;]

(म) कृति" से निम्नलिखित कृतियों में से कोई भी अभिप्रेत है, अर्थात्: -

                                (i) साहित्यिक, नाट्य, संगीतात्मक या कलात्मक कृति;

(ii) चलचित्र फिल्म,

(iii) [ध्वन्यंकन];

(य) संयुक्त रचयिताओं की कृति" से दो या अधिक रचयिताओं के सहयोग से उत्पादित ऐसी कृति अभिप्रेत है जिसमें एक रचयिता का योगदान अन्य रचयिता या रचयिताओं के योगदान से सुभिन्न नहीं है;

(यक) मूर्ति" के अन्तर्गत कास्ट और माडल भी हैं ।

 [3. प्रकाशन का अर्थ-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, प्रकाशन" से जनता को कृति की प्रतियां देकर या जनता को कृति की संसूचना देकर कोई कृति उपलब्ध कराना अभिप्रेत है ।]

4. कृति को कब प्रकाशित या सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत नहीं समझा जाएगा-यदि कोई कृति प्रकाशित की जाती है या सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत की जाती है तो उस दशा के सिवाय जिसमें वह प्रतिलिप्यधिकार के अतिलंघन से संबद्ध हो, उसे प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी की अनुज्ञप्ति के बिना प्रकाशित या सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया गया नहीं समझा जाएगा ।

5. कृति को कब भारत में पहले प्रकाशित समझा जाएगा-भारत में प्रकाशित किसी कृति को इस बात के होते हुए भी कि वह साथ ही साथ किसी अन्य देश में भी प्रकाशित की गई है, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए भारत में पहले प्रकाशित समझा जाएगा जब तक कि ऐसा अन्य देश ऐसी कृति के लिए प्रतिलिप्यधिकार की लघुतर अवधि उपबंधित नहीं करता और कोई कृति भारत में और अन्य देश में साथ ही साथ प्रकाशित हुई समझी जाएगी यदि भारत में प्रकाशन और ऐसे अन्य देश में प्रकाशन के बीच का समय तीस दिन से या ऐसी अन्य कालावधि से अधिक नहीं है जैसी केंद्रीय सरकार, किसी विनिर्दिष्ट देश के संबंध में, अवधारित करे ।

 [6. कतिपय विवादों का प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड द्वारा विनिश्चय किया जाना-यदि कोई प्रश्न उत्पन्न होता है कि,-

(क) क्या कोई कृति प्रकाशित की गई है या वह तारीख कौन सी है जिसको कोई कृति अध्याय 5 के प्रयोजनों के लिए प्रकाशित की गई थी; या

(ख) क्या किसी कृति के लिए प्रतिलिप्यधिकार की अवधि किसी अन्य देश में उस अवधि से लघुतर है जो उस कृति के संबंध में इस अधिनियम के अधीन उपबन्धित है,

तो वह धारा 11 के अधीन गठित प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को निर्देशित किया जाएगा जिसका उस पर विनिश्चय अंतिम होगा:

परन्तु यदि प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड की राय में, धारा 3 में निर्दिष्ट प्रतियों का दिया जाना या जनता को संसूचित किया जाना महत्वपूर्ण प्रकृति का नहीं है तो उसे उस धारा के प्रयोजनों के लिए प्रकाशन नहीं समझा जाएगा ।]

7. जहां अप्रकाशित कृति का रचनाकाल काफी विस्तृत है वहां रचयिता की राष्ट्रिकता-जहां किसी अप्रकाशित कृति की दशा में उस कृति का रचनाकाल काफी विस्तृत है वहां उस कृति का रचयिता इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उस देश का नागरिक या वहां अधिवसित समझा जाएगा जिसका नागरिक या जिसमें अधिवसित वह उस काल के किसी पर्याप्त भाग के दौरान रहा था ।

8. निगमों का अधिवास-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए कोई निगमित निकाय भारत में अधिवसित समझा जाएगा यदि वह भारत में प्रवृत्त किसी विधि के अधीन निगमित है ।

अध्याय 2

प्रतिलिप्यधिकार कार्यालय और प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड

9. प्रतिलिप्यधिकार कार्यालय-(1) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए एक कार्यालय स्थापित किया जाएगा जो प्रतिलिप्यधिकार कार्यालय कहलाएगा ।

(2) प्रतिलिप्यधिकार कार्यालय, प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार के प्रत्यक्ष नियंत्रण के अधीन होगा जो केंद्रीय सरकार के अधीक्षण और निदेशन के अधीन कार्य करेगा ।

(3) प्रतिलिप्यधिकार कार्यालय के लिए एक मुद्रा होगी ।

10. प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार और उप-रजिस्ट्रार-(1) केन्द्रीय सरकार एक प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार नियुक्त करेगी और एक या अधिक प्रतिलिप्यधिकार उप-रजिस्ट्रार नियुक्त कर सकेगी ।

(2) प्रतिलिप्यधिकार उप-रजिस्ट्रार, प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार के अधीक्षण और निदेशन के अधीन इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रार के ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगा जैसे रजिस्ट्रार समय-समय पर उसे सौंपे, और इस अधिनियम में प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार के प्रति किसी निर्देश के अंतर्गत प्रतिलिप्यधिकार उप-रजिस्ट्रार के प्रति निर्देश होगा जबकि वह किन्हीं ऐसे कृत्यों का उस प्रकार निवर्हन कर रहा हो ।

11. प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड-(1) इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, केन्द्रीय सरकार प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड कहलाया जाने वाला एक बोर्ड गठित करेगी जिसमें एक अध्यक्ष तथा [दो अन्य] होंगे ।

1[(2) प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें ऐसी होंगी जो विहित की जाएं:

परंतु अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य के न तो वेतन और भत्तों में और न ही सेवा के अन्य निबंधनों और शर्तों में, उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी कोई परिवर्तन किया जाएगा ।]

(3) प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड का अध्यक्ष ऐसा व्यक्ति होगा जो ॥। किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रह चुका है अथवा उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किए जाने के लिए अर्ह है ।

1[(4) केंद्रीय सरकार, प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड के अध्यक्ष से परामर्श करने के पश्चात्, प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड के सचिव और उतने अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति कर सकेगी, जितने प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड के कृत्यों के दक्षतापूर्वक निवर्हन के लिए आवश्यक समझे जाएं ।]

12. प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड की शक्तियां और प्रक्रिया-(1) प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को, किन्हीं ऐसे नियमों के अध्यधीन जो इस अधिनियम के अधीन बनाए जाएं अपनी प्रक्रिया को स्वयं विनियमित करने की शक्ति होगी जिसके अंतर्गत उसकी बैठकों के स्थान और समय नियत करना भी है:

परन्तु प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड, इस अधिनियम के अधीन अपने समक्ष संस्थित किसी कार्यवाही को मामूली तौर पर उस अंचल में सुनेगा जिसमें कार्यवाही के संस्थित किए जाने के समय वह व्यक्ति, जो कार्यवाही संस्थित करता है, वास्तव में और स्वच्छेया निवास करता है या कारबार चलाता है, अथवा अभिलाभ के लिए वैयक्तिक रूप से काम करता है ।

स्पष्टीकरण-इस उपधारा में अंचल" से राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 (1956 का 37) की धारा 15 में विनिर्दिष्ट अंचल अभिप्रेत है ।

(2) प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड अपनी शक्तियों और कृत्यों का प्रयोग और निर्वहन ऐसी न्यायपीठों के माध्यम से कर सकेगा जो प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड के अध्यक्ष द्वारा उसके [सदस्यों में से गठित की जाएं]:

 [परंतु यदि अध्यक्ष की यह राय है कि किसी महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई बृहत्तर न्यायपीठ द्वारा की जानी अपेक्षित है तो वह उस मामले को विशेष न्यायपीठ को निर्देशित कर सकेगा जो पांच सदस्यों से मिलकर बनेगी ।]

(3) यदि प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड के या उसकी किसी न्यायपीठ के सदस्यों में किसी ऐसे मामले की बाबत जो उसके समक्ष इस अधिनियम के अधीन विनिश्चय के लिए आए, मतभेद हो तो बहुसंख्या की राय अभिभावी होगी:

 [परन्तु जहां ऐसी बहुसंख्या न हो वहां अध्यक्ष की राय अभिभावी होगी ।]

(4) [अध्यक्ष] अपने सदस्यों में से किसी को उन शक्तियों में से किन्हीं का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा जो उसे धारा 74 द्वारा प्रदत्त हैं और ऐसे प्राधिकृत सदस्य द्वारा उन शक्तियों के प्रयोग में दिया गया कोई आदेश या किया गया कोई कार्य, बोर्ड का, यथास्थिति, आदेश या कार्य समझा जाएगा ।

(5) प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड का कोई सदस्य किसी ऐसे मामले की बाबत जिसमें उसका वैयक्तिक हित है बोर्ड के समक्ष किसी कार्यवाही में भाग नहीं लेगा ।

(6) इस अधिनियम के अधीन प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड द्वारा किया गया कोई कार्य या की गई कार्यवाही केवल बोर्ड में कोई रिक्ति या उसके गठन में कोई त्रुटि होने के आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी ।

(7) प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को, [दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345 और 346ट के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा तथा बोर्ड के समक्ष सभी कार्यवाहियां भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाहियां समझी जाएंगी ।

 

अध्याय 3

प्रतिलिप्यधिकार

13. कृतियां जिनमें प्रतिलिप्यधिकार अस्तित्वशील है-(1) इस धारा के उपबंधों और इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए निम्नलिखित वर्गों की कृतियों में प्रतिलिप्यधिकार का अस्तित्व समस्त भारत में होगा, अर्थात्: -

                                (क) मौलिक, साहित्यिक, नाट्य, संगीतात्मक और कलात्मक कृतियां;

                                (ख) चलचित्र फिल्म; और

                                (ग) [ध्वन्यंकन] ।

(2) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट किसी कृति में, जो ऐसी कृति से भिन्न हो जिसको धारा 40 या धारा 41 के उपबंध लागू होते हैं, प्रतिलिप्यधिकार तब तक अस्तित्व में नहीं होगा जब तक कि, -

(i) प्रकाशित कृति की दशा में वह कृति भारत में पहले प्रकाशित नहीं की जाती या जहां कृति भारत के बाहर पहले प्रकाशित की जाती है वहां उसका रचयिता ऐसे प्रकाशन की तारीख को अथवा उस दशा में, जिसमें रचयिता उस तारीख को मर चुका है अपनी मृत्यु के समय भारत का नागरिक न रहा हो;

(ii) [वास्तु कृति] से भिन्न किसी अप्रकाशित कृति की दशा में, उसका रचयिता कृति की रचना की तारीख को भारत का नागरिक न हो या भारत में अधिवसित न हो; और

(iii) 2[वास्तु कृति] की दशा में, वह कृति भारत में स्थित न हो ।

                स्पष्टीकरण-संयुक्त रचयिताओं की कृति की दशा में, इस उपधारा में विनिर्दिष्ट प्रतिलिप्यधिकार प्रदत्त करने वाली शर्तें उस कृति के सब रचयिताओं को पूरी करनी होंगी ।

(3) प्रतिलिप्यधिकार का अस्तित्व निम्नलिखित में नहीं होगा: -

                (क) कोई चलचित्र फिल्म यदि उस फिल्म का कोई पर्याप्त भाग किसी अन्य कृति में प्रतिलिप्यधिकार का अतिलंघन हो;

                (ख) किसी साहित्यिक, नाट्य या संगीतात्मक कृति की बाबत बनाया गया कोई 1[ध्वन्यंकन] यदि उस 1[ध्वन्यंकन] के बनाने में ऐसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार का अतिलंघन हुआ हो ।

(4) किसी चलचित्र फिल्म या 1[ध्वन्यंकन] में प्रतिलिप्यधिकार, किसी ऐसी रीति में पृथक् प्रतिलिप्यधिकार को प्रभावित नहीं करेगा जिसकी या जिसके पर्याप्त भाग की बाबत, यथास्थिति, वह फिल्म या वह 1[ध्वन्यंकन] बनाया गया हो ।

(5) 2[वास्तु कृति] की दशा में, प्रतिलिप्यधिकार केवल कलात्मक स्वरूप और डिजाइन की बाबत ही अस्तित्व में होगा तथा सन्निर्माण की प्रक्रियाओं या पद्धतियों पर विस्तृत नहीं होगा ।

 [14. प्रतिलिप्यधिकार का अर्थ-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, प्रतिलिप्यधिकार" से अभिप्रेत है इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी कृति या उसके किसी पर्याप्त भाग के संबंध में निम्नलिखित कार्यों में से किसी को करने या उसका किया जाना प्राधिकृत करने का अनन्य अधिकार, अर्थात्: -

(क) कृति साहित्यिक, नाट्य या संगीतात्मक कृति की दशा में, जो कम्प्यूटर प्रोग्राम नहीं है, -

(i) कृति को किसी पर्याप्त रूप में पुनरुत्पादित करना, जिसके अन्तर्गत इलैक्ट्रानिक माध्यम से किसी भी संचार माध्यम में उसका भंडारण है;

(ii) जनता को कृति की ऐसी प्रतियां उपलब्ध कराना, जो पहले से परिचालन में नहीं हैं;

(iii) कृति को सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत करना या उसे सार्वजनिक रूप से संसूचित करना;

(iv) कृति के संबंध में कोई चलचित्र फिल्म बनाना या ध्वन्यंकन करना;

(v) कृति का कोई भाषान्तर तैयार करना;

(vi) कृति का कोई अनुकूलन करना;

(vii) कृति के भाषान्तरण या अनुकूलन के संबंध में ऐसे कार्यों में से कोई कार्य करना जो कृति के संबंध में उपखंड (i) से उपखंड (vi) में विनिर्दिष्ट है;

                (ख) किसी कम्प्यूटर प्रोग्राम की दशा में, -

(i) खंड (क) में विनिर्दिष्ट कार्यों में से कोई कार्य करना;

 [(ii) कम्प्यूटर प्रोग्राम की किसी प्रति का विक्रय करना या उसे वाणिज्यिक भाटक पर देना अथवा विक्रय या वाणिज्यिक भाट पर देने की प्रस्थापना करना:

परंतु ऐसा वाणिज्यिक भाटक उस कंप्यूटर प्रोग्राम की बाबत लागू नहीं होगा जहां स्वयं प्रोग्राम भाटक का आवश्यक उद्देश्य नहीं हैं ।]

                (ग) किसी कलात्मक कृति की दशा में, -

 [(i) कृति को किसी सारवान् रूप से पुनरुत्पादित करना, जिसके अंतर्गत निम्नलिखित हैं, -

(अ) इलैक्ट्रानिक या अन्य साधनों द्वारा किसी माध्यम में उसका भंडारण; या

(आ) दो विमा वाली कृति का तीन विमाओं में चित्रण है; या

(इ) तीन विमा वाली कृति का दो विमाओं में चित्रण है;]

                                (ii) कृति को सार्वजनिक रूप से संसूचित करना;

(iii) जनता को कृति की ऐसी प्रतियां उपलब्ध कराना, जो पहले से परिचालन में नहीं हैं;

(iv) कृति को किसी चलचित्र फिल्म में सम्मिलित करना;

(v) कृति का कोई अनुकूलन करना;

(vi) कृति के अनुकूलन के संबंध में ऐसे कार्यों में से कोई कार्य करना जो कृति के संबंध में उपखंड (i) से उपखंड (iv) में विनिर्दिष्ट है;

                (घ) किसी चलचित्र फिल्म की दशा में, -

                                2[(i) फिल्म की प्रति तैयार करना, जिसके अंतर्गत-

(अ) उसके भागरूप किसी बिंब का फोटोचित्र है; या

(आ) इलैक्ट्रानिक या अन्य साधनों द्वारा किसी माध्यम में उसका भंडारण है;]

2[(ii) फिल्म की किसी प्रति का विक्रय करना या उसके वाणिज्यिक भाटक पर देना अथवा विक्रय या ऐसे भाटक पर देने की प्रस्थापना करना;]

(iii) फिल्म को सार्वजनिक रूप से संसूचित करना;

                (ङ) किसी ध्वन्यंकन की दशा में, -

(i) उसको सीन्नविष्ट करने वाला कोई अन्य ध्वन्यंकन करना [जिसके अंतर्गत इलैट्रानिक या अन्य साधनों द्वारा किसी माध्यम में उसका भंडारण भी हैं;]

2[(ii) ध्वन्यंकन की किसी प्रति का विक्रय करना या उसे वाणिज्यिक भाटक पर देना अथवा विक्रय या ऐसे भाट पर देने की प्रस्थापना करना;]

(iii) ध्वन्यंकन को सार्वजनिक रूप से संसूचित करना ।

                स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, ऐसी प्रति के बारे में जिसका एक बार विक्रय किया गया है यह समझा जाएगा कि वह पहले से ही परिचालन में है ।]

15. डिज़ाइन अधिनियम, 2000 के अधीन रजिस्ट्रीकृत या रजिस्ट्री किए जाने योग्य डिजाइनों में प्रतिलिप्यधिकार के बारे में विशेष उपबंध-(1) इस अधिनियम के अधीन प्रतिलिप्यधिकार का अस्तित्व किसी ऐसे डिजाइन में नहीं होगा जो ॥। [डिजाइन अधिनियम, 2000 (2000 का 16)] के अधीन रजिस्ट्रीकृत है ।

(2) किसी ऐसे डिजाइन में, ॥। डिजाइन अधिनियम, 1911 (1911 का 2) के अधीन रजिस्ट्री किए जाने के योग्य है किन्तु जिसकी इस प्रकार रजिस्ट्री नहीं की गई है प्रतिलिप्यधिकार तब तुरंत समाप्त हो जाएगा जब कोई वस्तु जिस पर डिजाइन प्रयुक्त किया गया है, प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी द्वारा या उसकी अनुज्ञप्ति में किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किसी औद्योगिक प्रक्रिया से पचास से अधिक बार पुनरुत्पादित की जा चुकी है ।

16. इस अधिनियम में यथा उपबंधित के सिवाय कोई प्रतिलिप्यधिकार होना-कोई व्यक्ति किसी कृति में, चाहे वह प्रकाशित हो या अप्रकाशित हो, प्रतिलिप्यधिकार या वैसे ही किसी अधिकार का हकदार इस अधिनियम के या किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि के उपबंधों के अनुसार होने से अन्यथा नहीं होगा, किन्तु इस धारा की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह किसी न्यास या विश्वास के भंग को अवरुद्ध करने के किसी अधिकार या अधिकारिता को निराकृत करती है ।

अध्याय 4

प्रतिलिप्यधिकार का स्वामित्व और स्वामी के अधिकार

17. प्रतिलिप्यधिकार का प्रथम स्वामी-इस अधिनियम के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए किसी कृति का रचयिता उसमें प्रतिलिप्यधिकार का प्रथम स्वामी होगा:

परन्तु-

(क) किसी ऐसी साहित्यिक, नाट्य या कलात्मक कृति की दशा में, जो उसके रचयिता द्वारा किसी समाचारपत्र, पत्रिका या वैसी ही सामयिकी के स्वत्वधारी द्वारा, सेवा या शिक्षुता की संविदा के अधीन उसके नियोजन के अनुक्रम में किसी समाचारपत्र, पत्रिका या वैसी ही सामयिकी में प्रकाशन के प्रयोजनार्थ बनाई गई हो, उक्त स्वत्वधारी तत्प्रतिकूल किसी करार के अभाव में, उस कृति में प्रतिलिप्यधिकार का प्रथम स्वामी होगा जहां तक कि प्रतिलिप्यधिकार उस कृति के किसी समाचारपत्र, पत्रिका या वैसी ही सामयिकी में प्रकाशन से अथवा उसके वैसे प्रकाशन के प्रयोजनार्थ उस कृति के पुनरुत्पादन से संबद्ध है, किन्तु अन्य सब बातों के लिए रचयिता कृति में प्रतिलिप्यधिकार का प्रथम स्वामी होगा; 

(ख) खंड (क) के उपबंधों के अध्यधीन यह है कि किसी व्यक्ति के अनुरोध पर मूल्यवान प्रतिफल के लिए खींचे गए फोटोग्राफ या बनाए गए रंगचित्र या चित्र या उत्कीर्ण या चलचित्र फिल्म की दशा में ऐसा व्यक्ति, तत्प्रतिकूल किसी करार के अभाव में, उसमें प्रतिलिप्यधिकार का प्रथम स्वामी होगा;

(ग) सेवा या शिक्षुता की संविदा के अधीन रचयिता के नियोजन के दौरान बनाई गई किसी कृति की दशा में जिसको खंड (क) या खंड (ख) लागू नहीं होता नियोजक, तत्प्रतिकूल किसी करार के अभाव में, उसमें प्रतिलिप्यधिकार का प्रथम स्वामी होगा;

 [(गग) जनता में दिए गए किसी अभिभाषण या भाषण की दशा में वह व्यक्ति, जिसने ऐसा अभिभाषण या भाषण दिया है अथवा यदि ऐसे व्यक्ति ने किसी अन्य व्यक्ति की ओर से ऐसा अभिभाषण या भाषण दिया है तो ऐसा अन्य व्यक्ति, उसमें प्रतिलिप्यधिकार का प्रथम स्वामी होगा, इस बात के होते हुए भी कि, यथास्थिति, वह व्यक्ति, जो ऐसा अभिभाषण या भाषण देता है अथवा, ऐसा व्यक्ति, जिसकी ओर से ऐसा अभिभाषण या भाषण दिया जाता है ऐसे किसी अन्य व्यक्ति द्वारा नियोजित है जो ऐसे अभिभाषण या भाषण की व्यवस्था करता है या जिसकी ओर से या जिसके वचन पर ऐसा अभिभाषण या भाषण दिया जाता है;]

(घ) किसी सरकारी कृति की दशा में, सरकार, तत्प्रतिकूल किसी करार के अभाव में, उसमें प्रतिलिप्यधिकार की प्रथम स्वामी होगी;

2[(घघ) ऐसी कृति की दशा में, जो किसी लोक उपक्रम द्वारा या उसके निदेश या नियंत्रण के अधीन तैयार की गई है या प्रथम बार प्रकाशित की गई है, ऐसा लोक उपक्रम तत्प्रतिकूल किसी करार के अभाव में, उसमें प्रतिलिप्यधिकार का प्रथम स्वामी होगा ।]

स्पष्टीकरण-इस खंड तथा धारा 28क के प्रयोजनों के लिए लोक उपक्रम" से निम्नलिखित अभिप्रेत है-

(i) सरकार के स्वामिस्व वाला या उसके नियंत्रणाधीन उपक्रम; या

(ii) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में याथापरिभाषित सरकारी कंपनी; या

(iii) किसी केन्द्रीय, प्रांतीय या राज्य के अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित किया गया निगमित निकाय;]

(ङ) ऐसी कृति की दशा में जिसको धारा 41 के उपबंध लागू होते हैं, संबंधित अन्तरराष्ट्रीय संगठन उसमें प्रतिलिप्यधिकार का प्रथम स्वामी होगा:

 [परंतु किसी चलचित्र कृति में सम्मिलित की गई किसी कृति की दशा में, खंड (ख) और खंड (ग) में अन्तर्विष्ट किसी बात से धारा 13 की उपधारा (1) के खंड (क) में निर्दिष्ट कृति में रचयिता के अधिकार पर प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]

18. प्रतिलिप्यधिकार का समनुदेशन-(1) किसी विद्यमान कृति में प्रतिलिप्यधिकार का स्वामी या भावी कृति में प्रतिलिप्यधिकार का होने वाला स्वामी, प्रतिलिप्यधिकार को या तो पूर्णतः या भागतः और या तो सामान्यतया या निर्बन्धनों के अध्यधीन और या तो प्रतिलिप्यधिकार की संपूर्ण अवधि या उसके किसी भाग के लिए, किसी व्यक्ति को समनुदेशित कर सकेगा:

                परंतु किसी भावी कृति के प्रतिलिप्यधिकार के समनुदेशन की दशा में, समुनदेशन तभी प्रभावशील होगा जब कृति अस्तित्व में आ जाए:

 [परंतु यह और कि ऐसा कोई समनुदेशन तब तक ऐसी कृति के जो अस्तित्व में नहीं थी या उस समय, जब समनुदेशन किया गया था वाणिज्यिक उपयोग में नहीं थी समुपयोजन के किसी माध्यम या ढंग को लागू नहीं होगा जब तक कि ऐसे समनुदेशन में कृति के समुपयोजन के ऐसे माध्यम या ढंग के प्रति विनिर्दिष्ट रूप से निर्देश न किया गया हो:

परंतु यह भी कि किसी चलचित्र फिल्म में सम्मिलित साहित्यिक या संगीतात्मक कृति का रचयिता, रचयिताओं के विधिक वारिसों या संग्रहण और वितरण संबंधी किसी प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी के सिवाय किसी सिनेमा हाल में चलचित्र फिल्म के साथ सार्वजनिक रूप से कृति को संसूचित करने से भिन्न किसी रूप में ऐसी कृति के उपयोग के लिए प्रतिलिप्यधिकार के समनुदेशिती के साथ समान आधार पर बांटे जाने वाले स्वामिस्वों को प्राप्त करने के अधिकार का समनुदेशन या अधित्यजन नहीं करेगा और इसके तत्प्रतिकूल कोई करार शून्य होगा:

परंतु यह भी कि किसी ऐसी साहित्यिक या संगीतात्मक कृति का जिसे ध्वन्यंकन में सम्मिलित किया गया हो किन्तु वह किसी चलिचत्र फिल्म का भागरूप न हो, रचयिता, रचयिताओं के विधिक वारिसों या संग्रहण और वितरण संबंधी प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी के सिवाय ऐसी कृति के किसी उपयोग के लिए प्रतिलिप्यधिकार के समनुदेशिती के साथ समान आधार पर बांटे जाने वाले स्वामिस्वों को प्राप्त करने के अधिकार का समनुदेशन या अधित्यजन नहीं करेगा और इसके प्रतिकूल कोई समनुदेशन शून्य होगा ।]

(2) जहां किसी प्रतिलिप्यधिकार का समनुदेशिती उस प्रतिलिप्यधिकार में समाविष्ट किसी अधिकार का हकदार हो जाता है वहां ऐसे समनुदेशित अधिकारों के बारे में समनुदेशिती को और समनुदेशित न किए गए अधिकारों के बारे में समनुदेशन को इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए प्रतिलिप्यधिकार का स्वामी माना जाएगा और इस अधिनियम के उपबंध तद्नुसार प्रभावी होंगे ।

(3) इस धारा में, किसी भावी कृति में प्रतिलिप्यधिकार के बारे में समनुदेशिती" पद के अंतर्गत समनुदेशिती का विधिक प्रतिनिधि है, यदि समनुदेशिती उस कृति के अस्तित्व में आने से पहले मर जाता है ।

19. समनुदेशन का ढंग- [(1)] किसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार का कोई समनुदेशन तब तक विधिमान्य नहीं होगा जब तक वह लिखित रूप में और समनुदेशिती द्वारा या उसके सम्यक्तः प्राधिकृत अभिकर्ता द्वारा हस्ताक्षरित न हो ।

 [(2) किसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार का समनुदेशन ऐसी कृति को परिलक्षित करेगा तथा समनुदेशित अधिकारों और ऐसे समनुदेशन की कालावधि तथा राज्यक्षेत्रीय विस्तार को विनिर्दिष्ट करेगा ।

(3) किसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार के समनुदेशन में, समनुदेशन के चालू रहने के दौरान रचयिता या उसके विधिक वारिसों को [संदेय स्वामिस्व और किसी अन्य प्रतिफल की रकम भी,] विनिर्दिष्ट की जाएगी और समनुदेशन पक्षकारों द्वारा परस्पर करार पाए गए निबंधनों पर पुनरीक्षित, विस्तारित या पर्यवसित किए जाने के अधीन होगा ।

(4) जहां समनुदेशिती, समनुदेशन की तारीख से एक वर्ष की अवधि के भीतर इस धारा की किन्हीं अन्य उपधाराओं के अधीन उसे समनुदेशित अधिकारों का प्रयोग नहीं करता है वहां ऐसे अधिकारों की बाबत समनुदेशन के बारे में यह समझा जाएगा कि वह उक्त अवधि के अवसान के पश्चात् जब तक कि समनुदेशन में अन्यथा विनिर्दिष्ट नहीं किया जाता है, व्यपगत हो गया है ।

(5) यदि समनुदेशन की अवधि कथित नहीं की जाती है तो उसे समनुदेशन की तारीख से पांच वर्ष समझा जाएगा ।

(6) यदि अधिकारों के समनुदेशन का राज्यक्षेत्रीय विस्तार विनिर्दिष्ट नहीं किया जाता है तो यह उपधारणा की जाएगी कि उसका विस्तार भारत के भीतर है ।

(7) उपधारा (2) या उपधारा (3) या उपधारा (4) या उपधारा (5) या उपधारा (6) की कोई बात, प्रतिलिप्यधिकार (संशोधन) अधिनियम, 1994 के प्रवृत्त होने के पूर्व किए गए समनुदेशनों को लागू नहीं होगी ।]

 

 [(8) ऐसी किसी प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी को, जिसमें कृति का रचयिता सदस्य है, पहले से किसी समनुदिष्ट अधिकारों के निबंधनों और शर्तों के प्रतिकूल किसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार का समनुदेशन शून्य होगा ।

(9) चिलचित्र फिल्म बनाने के लिए किसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार के किसी समनुदेशन से, किसी सिनेमा हाल में चलचित्र फिल्म के साथ सार्वजनिक रूप से किसी कृति को संसूचित करने से भिन्न किसी रूप में कृति के उपयोग की दशा में संदेय स्वामिस्वों और प्रतिफल के समान अंश का दावा करने के लिए कृति के रचयिता के अधिकार पर प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

(10) ध्वन्यंकन की किसी कृति में, जो किसी चलचित्र फिल्म के भागरूप नहीं है, प्रतिलिप्यधिकार के किसी समनुदेशन से किसी रूप में ऐसी कृति के किसी उपयोग के लिए संदेय स्वामिस्वों और प्रतिफल के समान अंश का दावा करने के लिए किसी कृति के रचयिता के अधिकार पर प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]

 [19क. प्रतिलिप्यधिकार के समनुदेशन की बाबत विवाद-(1) यदि कोई समनुदेशिती, उसे समनुदेशित अधिकारों का पर्याप्त प्रयोग करने में असफल रहता है और ऐसी असफलता समनुदेशक के किसी कार्य या लोक के कारण नहीं मानी जा सकती है तो प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड, समनुदेशक से किसी परिवाद की प्राप्ति पर और ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह आवश्यक समझे, ऐसे समनुदेशन का प्रतिसंहरण कर सकेगा ।

(2) यदि किसी प्रतिलिप्यधिकार के समनुदेशन की बाबत कोई विवाद उत्पन्न होता है तो प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड, व्यथित पक्षकार से किसी परिवाद की प्राप्ति पर और ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह आवश्यक समझे, ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जो वह ठीक समझे, जिसके अन्तर्गत संदेय किसी स्वामिस्व की वसूली का आदेश है:

परन्तु प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड इस उपधारा के अधीन समनुदेशन का प्रतिसंहरण करने वाला कोई आदेश तब तक पारित नहीं करेगा जब तक, कि उसका यह समाधान नहीं हो जाता है कि समनुदेशन के निबंधन उस दशा में जिसमें समनुदेशन रचयिता भी है, उसके लिए कठोर हैं:

 [परंतु यह और कि इस उपधारा के अधीन समनुदेशन के प्रतिसंहरण संबंधी किसी आवेदन के निपटारे के लंबित रहने तक प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड समनुदेशन के निबंधनों और शर्तों के क्रियान्वयन के संबंध में, जिसके अंतर्गत समनुदेशित अधिकारों के उपभोग के लिए संदत्त किया जाने वाला कोई प्रतिफल भी है, ऐसा आदेश पारित कर सकेगा, जो वह ठीक समझे:

परंतु यह भी किट इस उपधारा के अधीन समनुदेशन के प्रतिसंहरण का कोई आदेश, ऐसे समनुदेशन की तारीख से पांच वर्ष की अवधि के भीतर नहीं किया जाएगा ।]

 [(3) उपधारा (2) के अधीन प्राप्त प्रत्येक परिवाद पर प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड द्वारा यथासंभव कार्यवाही की जाएगी और उस मामले में अंतिम आदेश परिवाद के प्राप्त होने की तारीख से छह मास की अवधि के भीतर पारित करने के प्रयास किए जाएंगे और उसके अनुपालन में किसी विलंब के लिए प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड उसके कारणों को अभिलखित करेगा ।]

20. वसीयत द्वारा पांडुलिपि में प्रतिलिप्यधिकार का अंतरण-जहां किसी वसीयत के अधीन, कोई व्यक्ति किसी साहित्यिक, नाट्य या संगीतात्मक कृति की पांडुलिपि का या किसी कलात्मक कृति का हकदार है और वह कृति वसीयतकर्ता की मृत्यु से पहले प्रकाशित नहीं हुई थी वहां उस वसीयत का, जब तक कि वसीयतकर्ता के विल या उसके किसी क्रोडपत्र से तत्प्रतिकूल आशय प्रतीत न हो अर्थ लगाया जाएगा कि उस कृति में प्रतिलिप्यधिकार वहां तक उसके अंतर्गत है जहां तक कि वसीयतकर्ता अपनी मृत्यु से ठीक पहले उस प्रतिलिप्यधिकार का स्वामी था ।

स्पष्टीकरण-इस धारा में पांडुलिपि" से कृति को सन्निविष्ट करने वाली मूल दस्तावेज अभिप्रेत है चाहे वह हाथ से लिखी हो या न हो ।

21. प्रतिलिप्यधिकार को त्याग देने का रचयिता का अधिकार-(1) किसी कृति का रचयिता, उस कृति में प्रतिलिप्यधिकार में समाविष्ट सब अधिकारों या उनमें से किन्हीं को [प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार को विहित प्ररूप में या लोक सूचना के रूप में] सूचना देकर त्याग सकेगा और तब ऐसे अधिकार, उपधारा (3) के उपबंधों के अध्यधीन, सूचना की तारीख से अस्तित्व में नहीं रहेंगे ।

(2) उपधारा (1) के अधीन सूचना मिलने पर प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार उसे शासकीय राजपत्र में और ऐसी अन्य रीति से, जैसी वह ठीक समझे, प्रकाशित कराएगा ।

 [(2क) प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार राजपत्र में सूचना के प्रकाशन से चौदह दिन के भीतर प्रतिलिप्यधिकार कार्यालय की शासकीय वेबसाइट पर सूचना प्रकाशित करेगा जिससे कि यह तीन वर्षों से अन्यून अवधि के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में बनी रहे ।]

(3) किसी कृति में प्रतिलिपधिकार में समाविष्ट सब अधिकरों या उनमें से किन्हीं का त्याग, ऐसे किन्हीं अधिकारों को प्रभावित नहीं करेगा जिनका अस्तित्व उपधारा (1) में विर्दिष्ट सूचना की तारीख को किसी व्यक्ति के पक्ष में हो ।

 

अध्याय 5

प्रतिलिप्यधिकार की अवधि

22. प्रकाशित साहित्यिक, नाट्य, संगीतात्मक और कलात्मक कृतियों में प्रतिलिप्यधिकार की अवधि-इसमें इसके पश्चात् अन्यथा उपबंधित के सिवाय यह है कि रचयिता के जीवनकाल में प्रकाशित किसी साहित्यिक, नाट्य, संगीतात्मक या कलात्मक कृति में ॥। प्रतिलिप्यधिकार उस वर्ष के जिसमें रचयिता की मृत्यु हुई हो ठीक आगामी कलैंडर वर्ष के आरंभ से 2[साठ वर्ष] तक अस्तित्व में रहेगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा में रचयिता के प्रति निर्देशों का अर्थ, संयुक्त रचयिताओं की कृति की दशा में, उस रचयिता के प्रति निर्देश लगाया जाएगा जिसकी मृत्यु सबसे अंत में होती है ।

23. बनाम और छद्मनाम वाली कृतियों में प्रतिलिप्यधिकार की अवधि-(1) अनाम या छद्मनाम से प्रकाशित किसी साहित्यिक, नाट्य, संगीतात्मक या कलात्मक कृति की दशा में (जो फोटोग्राफ से भिन्न हो), प्रतिलिप्यधिकार उस वर्ष के जिसमें कृति प्रथमम बार प्रकाशित की जाती है, ठीक आगामी कलैण्डर वर्ष के आरंभ से [साठ वर्ष] तक अस्तित्व में रहेगा :

परन्तु जहां रचयिता का वास्तविक परिचय उक्त कालावधि की समाप्ति से पहले ज्ञात हो जाता है वहां प्रतिलिप्यधिकार, उस वर्ष के जिसमें रचयिता की मृत्यु हुई हो ठीक आगामी कलैण्डर वर्ष के आरम्भ से 2[साठ वर्ष] तक अस्तित्व में रहेगा ।

(2) उपधारा (1) में रचयिता के प्रति निर्देशों का अर्थ, अनाम संयुक्त रचयिताओं की कृति की दशा में-

                (क) जहां रचयिताओं में से एक का वास्तविक परिचय ज्ञात हो जाता है वहां उस रचयिता के प्रति लगाया जाएगा;

(ख) जहां एक से अधिक रचयिताओं के वास्तविक परिचय ज्ञात हो जाते हैं वहां रचयिताओं में से उस रचयिता के प्रति लगाया जाएगा जिसकी मृत्यु सबसे अंत में होती है ।

(3) उपधारा (1) में रचयिता के प्रति निर्देशों का अर्थ, छद्मनाम वाली संयुक्त रचयिताओं की कृति की दशा में-

(क) जहां रचयिताओं में से एक या अधिक के (न कि सबके) नाम छद्मनाम है और उसका या उसके वास्तविक परिचय ज्ञात नहीं होते हैं, वहां उस रचयिता के प्रति लगाया जाएगा जिसका नाम छद्मनाम नहीं हैं या यदि रचयिताओं में से दो या अधिक के नाम छद्मनाम नहीं हैं तो उनमें से ऐसे रचयिता के प्रति लगाया जाएगा जिसकी मृत्यु सबसे अंत में होती है;

(ख) जहां रचयिताओं में से एक या अधिक के (न कि सबके) नाम छद्मनाम हैं और उनमें से एक या अधिक के वास्तविक परिचय ज्ञात हो जाते हैं वहां ऐसे रचयिताओं में से जिनके नाम छद्मनाम नहीं हैं और ऐसे रचयिताओं में से जिनके नाम छद्मनाम हैं और ज्ञात हो जाते हैं, उस रचयिता के प्रति लगाया जाएगा जिसकी मृत्यु सबसे अंत में होती है; और

(ग) जहां सभी रचयिताओं के नाम छद्मनाम हैं और उनमें से एक का वास्तविक परिचय ज्ञात हो जाता है वहां उस रचयिता के प्रति लगाया जाएगा जिसका वास्तविक परिचय ज्ञात हो जाता है या यदि ऐसे रचयिताओं में से दो या अधिक के वास्तविक परिचय ज्ञात हो जाते हैं तो उनमें से ऐसे रचयिता के प्रति लगाया जाएगा जिसकी मृत्यु सबसे अंत में होती है ।

                स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए किसी रचयिता का वास्तविक परिचय उस दशा में ज्ञात हुआ समझा जाएगा जिसमें रचयिता का वास्तविक परिचय या तो रचयिता और प्रकाशक दोनों के द्वारा सार्वजनिक रूप से ज्ञात किया जाता है या उस रचयिता द्वारा अन्यथा प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को समाधानप्रद रूप से सिद्ध कर दिया जाता है ।

24. मृत्यु उपरांत कृति में प्रतिलिप्यधिकार की अवधि-(1) किसी साहित्यिक, नाट्य या संगीतात्मक कृति या उत्कीर्णन की दशा में जिसमें प्रतिलिप्यधिकार रचयिता की मृत्यु की तारीख को या किसी ऐसे संयुक्त रचयिताओं की कृति की दशा में उस रचयिता की जिसकी मृत्यु सबसे अंत में होती है, मृत्यु की तारीख को या उससे ठीक पहले अस्तित्व में है किंतु जिसका या जिसके किसी अनुकूलन का प्रकाशन उस तारीख से पहले नहीं किया गया है, प्रतिलिप्यधिकार उस वर्ष के, जिसमें कृति प्रथम बार प्रकाशित की जाती है, ठीक आगामी कलैंडर वर्ष के आरंभ से या जहां कृति के किसी अनुकूलन का प्रकाशन किसी पूर्वतर वर्ष में होता है, उस वर्ष के ठीक आगामी कलैण्डर वर्ष के आरंभ से 2[साठ वर्ष] तक अस्तित्व में रहेगा ।

(2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए कोई साहित्यिक, नाट्य या संगीतात्मक कृति या ऐसी किसी कृति का कोई अनुकूलन प्रकाशित हुआ समझा जाएगा यदि उसे सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया गया है या यदि उस कृति के संबंध में बनाए गए कोई [ध्वन्यंकन] सार्वजनिक रूप से विक्रीत किए गए हैं या सार्वजनिक रूप से विक्रय के लिए प्रस्थापित किए गए हैं ।

 ।                                             ।                                              ।                                              ।                                              ।

26. चलचित्र फिल्मों में प्रतिलिप्यधिकार की अवधि-चलचित्र फिल्म की दशा में प्रतिलिप्यधिकार उस वर्ष के, जिसमें फिल्म प्रकाशित की जाती है, ठीक आगामी कलैंडर वर्ष के आरंभ से [साठ वर्ष] तक अस्तित्व में रहेगा ।

27. [ध्वन्यंकनों] में प्रतिलिप्यधिकार की अवधि-3[ध्वन्यंकन] की दशा में प्रतिलिप्यधिकार उस वर्ष के, जिसमें 3[ध्वन्यंकन] प्रकाशित किया जाता है, ठीक आगामी कलैंडर वर्ष के आरंभ से 2[साठ वर्ष] तक अस्तित्व में रहेगा ।

28. सरकारी कृतियों में प्रतिलिप्यधिकार की अवधि-सरकारी कृतियों की दशा में, जहां उसमें प्रतिलिप्यधिकार की प्रथम स्वामी सरकार है वहां प्रतिलिप्यधिकार उस वर्ष के, जिसमें कृति प्रथम बार प्रकाशित की जाती है, ठीक आगामी कलैंडर वर्ष के आरंभ से 2[साठ वर्ष] तक अस्तित्व में रहेगा ।

 [28क. लोक उपक्रम की कृतियों में प्रतिलिप्यधिकार की अवधि-ऐसी कृति की दशा में, जहां उसमें प्रतिलिप्यधिकार का प्रथम स्वामी कोई लोक उपक्रम है, प्रतिलिप्यधिकार उस वर्ष के, जिसमें कृति प्रथम बार प्रकाशित की जाती है, ठीक आगामी कलैंडर वर्ष के प्रारंभ से 2[साठ वर्ष] तक अस्तित्व में रहेगा ।

29. अंतरराष्ट्रीय संगठनों की कृतियों में प्रतिलिप्यधिकार की अवधि-किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन कृति की दशा में, जिसको धारा 41 के उपबंध लागू होते हैं, प्रतिलिप्यधिकार उस वर्ष के, जिसमें कृति प्रथम बार प्रकाशित की जाती है, ठीक आगामी कलैंडर वर्ष के प्रारंभ से 2[साठ वर्ष] तक अस्तित्व में रहेगा ।]

अध्याय 6

अनुज्ञप्तियां

30. प्रतिलिप्यधिकार की स्वामियों द्वारा अनुज्ञप्तियां-किसी विद्यमान कृति में प्रतिलिप्यधिकार का स्वामी या किसी भावी कृति में प्रतिलिप्यधिकार का होने वाला स्वामी अपने द्वारा या अपने सम्यक्तः प्राधिकृत अभिकर्ता [द्वारा लिखित] अनुज्ञप्ति से उस अधिकार में किसी हित का अनुदान कर सकेगा:

परंतु किसी भावी कृति में प्रतिलिप्यधिकार से संबद्ध अनुज्ञप्ति की दशा में, वह अनुज्ञप्ति तभी प्रभावशील होगी जब वह कृति अस्तित्व में आ गए ।

स्पष्टीकरण-जहां कोई व्यक्ति जिसे किसी भावी कृति में प्रतिलिप्यधिकार से संबद्ध अनुज्ञप्ति इस धारा के अधीन अनुदत्त की गई है, उस कृति के अस्तित्व में आने से पहले मर जाता है वहां उसके विधिक प्रतिनिधि, अनुज्ञप्ति में तत्प्रतिकूल किसी उपबंध के अभाव में, उस अनुज्ञप्ति के फायदे के हकदार होंगे ।

 [30क.  [धारा 19] का लागू होना-7[धारा 19] के उपबंध, किन्हीं आवश्यक अनुकूलनों और उपान्तरणों के साथ धारा 30 के अधीन अनुज्ञप्ति के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे किसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार के समनुदेशन के संबंध में लागू होते हैं ।]

31. जनता से रोक ली गई कृतियों में अनिवार्य अनुज्ञप्ति-(1) यदि [किसी कृति] में जो प्रकाशित की जा चुकी है या सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत की जा चुकी है, प्रतिलिप्यधिकार की अवधि के दौरान किसी समय प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को परिवाद किया जाता है कि उस कृति में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी ने-

(क) उस कृति का पुनः प्रकाशन करने या पुनः प्रकाशन की अनुज्ञा देने से इंकार कर दिया है या उस कृति को सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत करने की अनुज्ञा देने से इंकार कर दिया है और ऐसे इंकार के कारण वह कृति जनता से रोक ली गई है; अथवा

(ख) ऐसी कृति को या 3[ध्वन्यंकन] की दशा में ऐसे 3[ध्वन्यंकन] के ध्वन्यंकित कृति को ऐसे निबंधनों पर जिन्हें परिवादी युक्तियुक्त समता है, [प्रसारण] द्वारा सार्वजनिक रूप से संसूचित करने की अनुज्ञा देने से इंकार कर दिया है,

तो प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड, उस कृति में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् और ऐसी जांच जैसी वह आवश्यक समझे करने के पश्चात् यदि उसका समाधान हो जाता है कि ऐसे इंकार करने के आधार युक्तियुक्त नहीं हैं, प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार को निदेश दे सकेगा कि वह परिवादी,को, यथास्थिति, उस कृति को पुनः प्रकाशित करने, उस कृति को सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत करने या उस कृति को 9[प्रसारण] द्वारा सार्वजनिक रूप से संसूचित करने की अनुज्ञा प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी को ऐसे प्रतिकर का संदाय होने पर और ऐसे अन्य निबंधनों और शर्तों के अध्यधीन अनुदत्त करे जैसे प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड अवधारित करे; और तब प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार, प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड के निदेशों के अनुसार  [ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को,       जो प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड की राय में ऐसा करने के लिए अर्हित है या हैंट ऐसी फीस के लिए जाने पर, जैसी विहित की जाए,             अनुदत्त करेगा ।

।                                              ।                                              ।                                              ।                             

[31क. अप्रकाशित  [या प्रकाशित कृतियों] में अनिवार्य अनुज्ञप्ति-4[(1) किसी अप्रकाशित कृति की दशा में अथवा प्रकाशित या सार्वजनिक रूप से संसूचित किसी कृति और ऐसी कृति को भारत में जनसाधारण से विधारित कर दिए जाने की दशा में, जहां रचयिता की मृत्यु हो गई या वह अज्ञात है या उसका पता नहीं लगाया जा सकता है, या ऐसी कृति में के प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी का पता नहीं लग सकता है, वहां कोई भी व्यक्ति उस कृति को या किसी भाषा में उसके भाषांतर को प्रकाशित करने या सार्वजनिक रूप से संसूचित करने की अनुज्ञप्ति के लिए प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को आवेदन कर सकेगा ।]

                (2) उपधारा (1) के अधीन कोई आवेदन करने के पूर्व आवेदक अपना प्रस्ताव देश के बृहत् भाग में परिचालित अंग्रेजी भाषा के किसी दैनिक समाचारपत्र के एक अंक में प्रकाशित करेगा और जहां आवेदन किसी भाषा में किसी भाषान्तर के प्रकाशन के लिए वहां उस भाषा के किसी दैनिक समाचारपत्र के एक अंक में भी प्रकाशित करेगा ।  

(3) प्रत्येक ऐसा आवेदन ऐसे प्ररूप में किया जाएगा जो विहित किया जाए और उसके साथ उपधारा (2) के अधीन जारी किए गए विज्ञापन की एक प्रति और ऐसी फीस होगी जो विहित की जाए ।

(4) जहां कोई आवेदन इस धारा के अधीन प्रतिलिप्यधिकार बार्ड को किया गया है वहां वह ऐसी जांच करने के पश्चात् जो विहित की जाए ऐसी कृति या आवेदन में वर्णित भाषा में उसके अनुवाद के लिए अनुज्ञप्ति आवेदक को अनुदत्त करने के लिए प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार को, ऐसे स्वामिस्व का संदाय करने के अधीन रहते हुए और ऐसे अन्य निबन्धों और शर्तों के अधीन रहते हुए जो प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड अवधारित करे, निदेश दे सकेगा और तदुपरि प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार आवेदन को अनुज्ञप्ति का अनुदान प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड के निदेशानुसार करेगा ।

(5) जहां कोई अनुज्ञप्ति इस धारा के अधीन अनुदत्त की गई है वहां प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार, आदेश द्वारा आवेदक को प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड द्वारा अवधारित स्वामिस्व की रकम का भारत के लोक लेखे में या प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट किसी अन्य लेखे में निक्षेप करने के लिए निदेश दे सकेगा जिससे, यथास्थिति, प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी या उसके वारिसों, निष्पादकों या विधिक प्रतिनिधियों को किसी समय ऐसे स्वामिस्व का दावा करने के लिए समर्थ बनाया जा सके ।

(6) इस धारा के पूर्वगामी उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी कृति की दशा में यदि मूल रचयिता की मृत्यु हो गई है और यदि केंद्रीय सरकार यह विचार करती है कि कृति का प्रकाशन राष्ट्रीय हित में वांछनीय है तो वह रचयिता के वारिसों, निष्पादकों या विधिक प्रतिनिधियों से ऐसी कृति को ऐसी अवधि के भीतर जो वह विनिर्दिष्ट करे, प्रकाशित करने की अपेक्षा कर सकेगी ।

(7) जहां कोई कृति केंद्रीय सरकार द्वारा उपधारा (6) के अधीन विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर प्रकाशित नहीं की जाती है वहां प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड कृति के प्रकाशन की अनुज्ञा के लिए ऐसे किसी व्यक्ति द्वारा आवेदन किए जाने पर और संबंधित पक्षकारों की सुनवाई करने के पश्चात् ऐसे प्रकाशन की अनुज्ञा ऐसे स्वामिस्व का संदाय करने पर दे सकेगा जो प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड प्रत्येक मामले की परिस्थितियों में विहित रीति से अवधारित करे ।]

 [31ख. निःशक्त व्यक्तियों के फायदे के लिए अनिवार्य अनुज्ञप्ति-(1) किसी लाभ के आधार पर निःशक्त व्यक्तियों के फायदे के लिए या कारबार के लिए कार्यरत कोई व्यक्ति ऐसे प्ररूप और रीति में और ऐसी फीस के साथ, जो विहित की जाए, ऐसी किसी कृति  को, जिसमें प्रतिलिप्यधिकार ऐसे व्यक्तियों के फायदे के लिए अस्तित्व में है प्रकाशित करने के लिए, उस मामले में, जिसको धारा 52 की उपधारा (1) का खंड (यख) लागू नहीं होता है अनिवार्य अनुज्ञप्ति के लिए प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को आवेदन कर सकेगा और प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड ऐसे आवेदन का निपटारा यथासंभव शीघ्रता के साथ करेगा और उस आवेदन का निपटारा आवेदन की प्राप्ति की तारीख से दो मास की अवधि के भीतर करने का प्रयास किया जाएगा ।

(2) प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड, उपधारा (1) के अधीन आवेदन की प्राप्ति पर, आवेदक के प्रत्यय पत्रों को सिद्ध करने और अपना यह समाधान करने के लिए कि आवेदन सद्भावपूर्वक किया गया है ऐसी जांच कर सकेगा या ऐसी जांच करने का निदेश दे सकेगा जो वह आवश्यक समझे ।

(3) यदि प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड का, कृति में के अधिकारों के स्वामियों को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् और ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे, यह समाधान हो जाता है कि निःशक्त व्यक्तियों को कृति उपलब्ध कराने के लिए अनिवार्य अनुज्ञप्ति जारी किए जाने की जरूरत है, तो वह प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार को आवेदक को उस कृति को प्रकाशित करने के लिए ऐसी अनुज्ञप्ति देने का निदेश दे सकेगा ।

(4) इस धारा के अधीन जारी प्रत्येक अनिवार्य अनुज्ञप्ति में प्रकाशन के साधनों और रूपविधान को, उस अवधि को, जिसके दौरान अनिवार्य अनुज्ञप्ति का प्रयोग किया जा सकेगा और प्रतियों के जारी किए जाने की दशा में, ऐसी प्रतियों की संख्या, जो जारी की जा सकेंगी, स्वामिस्व की दर सहित, विनिर्दिष्ट किया जाएगा:

परंतु जहां प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड ने ऐसी अनिवार्य अनुज्ञप्ति जारी की है वहां वह आगे आवेदन किए जाने पर और अधिकारों के स्वामियों को युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् ऐसी अनिवार्य अनुज्ञप्ति की अवधि बढ़ा सकेगा तथा और अधिक प्रतियों के, जो वह ठीक समझे, जारी किए जाने की अनुज्ञा दे सकेगा ।

31ग. आवरण रूपांतरों के लिए कानूनी अनुज्ञप्ति-(1) ऐसा कोई व्यक्ति, जो ऐसी किसी साहित्यिक, नाट्य या संगीतात्मक कृति की बाबत, जो कोई ध्वन्यंकन हो, जहां कि उस कृति का ध्वन्यंकन अनुज्ञप्ति द्वारा या उस कृति में के अधिकार के स्वामी की सहमति से किया जा चुका है, आवरण रूपांतर बनाने की वांछा करता है, ऐसा इस धारा के उपबंधों के अधीन रहते हुए कर सकेगा:

परंतु ऐसा ध्वन्यंकन उसी माध्यम में होगा जैसा अंतिम अंकन में था यदि अंतिम अंकन का माध्यम वर्तमान वाणिज्यिक उपयोग में नहीं रहा है ।

(2) ध्वन्यंकन करने वाला व्यक्ति ध्वन्यंकन करने के अपने आशय की पूर्व सूचना ऐसी रीति में देगा जो विहित की जाए, और उन सभी आवरणों या लेबलों की प्रतियां अग्रिम रूप से उपलब्ध कराएगा जिसके साथ ध्वन्यंकन का विक्रय किया जाना होगा और इस निमित्त प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड द्वारा नियत दर पर उसके द्वारा बनाई जाने वाली सभी प्रतियों की बाबत, प्रत्येक कृति में अधिकारों के स्वामी को स्वामिस्व का, प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड द्वारा, इस निमित्त नियत दर पर, अग्रिम रूप में संदाय करेगा: 

परंतु ऐसे ध्वन्यंकन पैकेज के किसी प्ररूप में या ऐसे किसी आवरण या लेबल के साथ विक्रय या जारी नहीं किए जाएंगे जिससे जनसाधारण को उसकी पहचान के संबंध में भुलावा या भ्रम होने की संभावना है और विशिष्टतया उसी कृति के किसी पूर्व ध्वन्यंकन या किसी ऐसी चलचित्र फिल्म जिसमें ऐसा ध्वन्यंकन सम्मिलित किया गया था के किसी प्रस्तुतकर्ता का किसी रूप में नाम या चित्रण अन्तर्विष्ट नहीं होगा और इसके अतिरिक्त आवरण पर यह कथन होगा कि यह इस धारा के अधीन बनाया गया आवरण रूपांतर है ।

(3) ऐसा ध्वन्यंकन करने वाला व्यक्ति, साहित्यिक या संगीतात्मक कृति में ऐसा कोई परिवर्तन नहीं करेगा जो अधिकारों के स्वामी द्वारा या उसकी सहमति से पहले नहीं किया गया है या जो ध्वन्यंकन करने के प्रयोजन के लिए तकनीकी रूप से आवश्यक नहीं है:

परंतु ऐसे ध्वन्यंकन उस वर्ष की, जिसमें कृति का पहला ध्वन्यंकन किया गया था समाप्ति के पश्चात् पांच कलेंडर वर्ष के अवसान तक नहीं किया जाएगा ।

(4) ऐसे ध्वन्यंकनों की बाबत एक स्वामिस्व ऐसे प्रत्येक कलेण्डर वर्ष के दौरान, जिसमें प्रत्येक कृति की प्रतियां बनाई जाती हैं, उसकी न्यूनतम पाच हजार प्रतियों के लिए संदत्त किया जाएगा:

परंतु प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड, साधारण आदेश द्वारा, ऐसी कृतियों के संभावित परिचालन को ध्यान में रखते हुए किसी विशिष्ट भाषा या बोली में कृतियों की बाबत, निचला न्यूनतम नियत कर सकेगा ।

(5) ऐसे ध्वन्यंकन करने वाला व्यक्ति उसकी बाबत ऐसे रजिस्टर और लेखा बहियां, जिसमें विद्यमान स्टाक का पूरा ब्यौरा हो, रखेगा जो विहित किए जाएं और ऐसे ध्वन्यंकन से संबंधित सभी अभिलेखों और लेखा बहियों का अधिकारों के स्वामी या उसके सम्यक् रूप से प्राधिकृत अभिकर्ता या प्रतिनिधि को निरीक्षण करने की अनुज्ञा देगा:

परंतु प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड के समक्ष इस आशय का परिवाद किए जाने पर कि अधिकारों के स्वामी ने इस धारा के अनुसरण में किए जाने के लिए तात्पर्यित किन्हीं ध्वन्यंकनों के लिए पूर्ण संदाय नहीं किया है, प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड का प्रथमदृष्ट्या यह समाधान हो जाता है कि परिवाद प्रामाणिक है, तो वह ध्वन्यंकन करने वाले व्यक्ति को इस बात का निदेश देते हुए एकपक्षीय आदेश पारित कर सकेगा कि वह उसकी अतिरिक्त प्रतियां बनाने से प्रविरत रहे और ऐसी जांच करने के पश्चात्, जो वह आवश्यक समझे, ऐसा और आदेश, जो वह ठीक समझे, कर सकेगा जिसके अंतर्गत स्वामिस्व के संदाय का आदेश भी है ।  

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए आवरण रूपांतर" से इस धारा के अनुसार किया गया ध्वन्यंकन अभिप्रेत है ।

31घ. साहित्यिक और संगीतात्मक कृतियों तथा ध्वन्यंकन के प्रसारण के लिए कानूनी अनुज्ञप्ति-(1) ऐसा कोई प्रसारण संगठन, जो ऐसी किसी साहित्यिक या संगीतात्मक कृति और ध्वन्यंकन को, जिसका पहले प्रकाशन किया जा चुका है, प्रसारण के रूप में या प्रस्तुतीकरण के रूप में सार्वजनिक रूप से संसूचित करने की वांछा करता है, वह ऐसा इस धारा के उपबंधों के अधीन रहते हुए कर सकेगा ।

(2) प्रसारण संगठन कृति का प्रसारण करने के अपने आशय की पूर्व सूचना, जिसमें प्रसारण की अवधि और राज्यक्षेत्रीय सीमा क्षेत्र का उल्लेख हो, ऐसी रीति में देगा, जो विहित की जाए और प्रत्येक कृति में अधिकारों के स्वामी को प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड द्वारा नियत दर पर और रीति में स्वामिस्व का संदाय करेगा ।

(3) रेडियो प्रसारण के लिए स्वामिस्व की दरें टेलीविजन प्रसारण से भिन्न होंगी और प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड रेडियो प्रसारण तथा टेलीविजन प्रसारण के लिए पृथक्-पृथक् दरें नियत करेगा ।

(4) उपधारा (2) के अधीन स्वामिस्व की रीति और दर नियत करने में प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड प्रसारण संगठन से अधिकारों के स्वामियों को अग्रिम संदाय करने की अपेक्षा कर सकेगा ।

(5) कृति के रचयिताओं और मुख्य प्रस्तुतकर्ताओं के नाम, उस कृति को प्रस्तुतीकरण के रूप में संसूचित करने वाले प्रसारण संगठन की दशा के सिवाय, प्रसारण में घोषित किए जाएंगे ।

(6) किसी साहित्यिक या संगीतात्मक कृति में प्रसारण की सुविधा के लिए कृति को संक्षिप्त करने से भिन्न, नए सिरे से ऐसा कोई परिवर्तन, जो प्रसारण के प्रयोजन के लिए तकनीकी रूप से आवश्यक नहीं है, अधिकारों के स्वामियों की सहमति के बिना नहीं किया जाएगा ।

(7) प्रसारण संगठन-

(क) ऐसे अभिलेख और लेखाबहियां रखेगा और अधिकारों के स्वामियों को ऐसी रिपोर्टें और लेखे ऐसी रीति में देगा, जो विहित की जाए; और

(ख) अधिकारों के स्वामी को या उसके सम्यक् रूप से प्राधिकृत अभिकर्ता अथवा प्रतिनिधि को ऐसे प्रसारण से संबंधित सभी अभिलेखों और लेखाबहियों का, ऐसी रीति में, निरीक्षण करने की अनुज्ञा देगा, जो विहित की जाए ।

(8) इस धारा की किसी बात से प्रतिलिप्यधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2012 के प्रारंभ के पूर्व जारी किसी अनुज्ञप्ति या किए गए किसी करार के प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]

32. भाषांतर करने और प्रकाशित करने की अनुज्ञप्ति-(1) कोई व्यक्ति किसी साहित्यिक या नाट्य कृति का [ऐसी कृति के प्रथम प्रकाशन से सात वर्ष की अवधि के पश्चात् किसी भाषा में] कोई भाषांतर उत्पादित और प्रकाशित करने की अनुज्ञप्ति के लिए प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को आवेदन कर सकेगा ।

1[(1क) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति किसी साहित्यिक या नाट्य कृति के, जो भारतीय कृति नहीं है, प्रथम प्रकाशन से तीन वर्ष की अवधि के पश्चात् ऐसी कृति के, भारत में साधारणतः प्रयोग की जाने वाली किसी भाषा में भाषांतर को, मुद्रित या पुनरुत्पादन के सदृश्य रूपों में, उत्पादित और प्रकाशित करने की अनुज्ञप्ति के लिए प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को आवेदन कर सकेगा, यदि ऐसा भाषांतर अध्यापन, विद्यार्जन या अनुसंधान के प्रयोजनों के लिए अपेक्षित है:

परंतु जहां ऐसा भाषांतर, किसी विकसित देश में साधारणतः प्रयोग न की जाने वाली भाषा में है वहां ऐसा आवेदन ऐसे प्रकाशन से एक वर्ष की अवधि के पश्चात् किया जा सकेगा ।]  

(2) [इस धारा के अधीन] प्रत्येक आवेदन ऐसे प्ररूप में किया जाएगा जैसा विहित किया जाए और उसमें कृति के भाषांतर की प्रति की प्रस्थापित फुटकर कीमत कथित होगी ।

(3) इस धारा के अधीन अनुज्ञप्ति के लिए प्रत्येक आवेदक अपने आवेदन के साथ प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार के पास ऐसी फीस जमा करेगा जैसी विहित की जाए ।]

(4) जहां इस धारा के अधीन प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को आवेदन किया जाता है, वहां वह ऐसी जांच करने के पश्चात्, जैसी विहित की जाए, आवेदन में उल्लिखित भाषा में कृति का भाषांतर उत्पादित और प्रकाशित करने की अनुज्ञप्ति, जो अनन्य अनुज्ञप्ति न हो, [आवेदक को-

(i) इस शर्त के अधीन अनुदत्त कर सकेगा कि आवेदक, कृति के भाषांतर को ऐसी प्रतियों की बाबत जिनका सार्वजनिक विक्रय हुआ है, कृति में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी को, ऐसी दर से परिकलित स्वामिस्वों का संदाय करेगा जैसी प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड प्रत्येक मामले की परिस्थितियों में विहित रीति से अवधारित करे; और

(ii) जहां ऐसी अनुज्ञप्ति उपधारा (1क) के अधीन किए गए आवेदन पर अनुदत्त की गई है वहां इस शर्त के अधीन रहते हुए भी अनुदत्त कर सकेगा कि अनुज्ञप्ति का विस्तार कृति के भाषांतर की प्रतियों के भारत के बाहर निर्यात पर नहीं होगा और ऐसे भाषांतर की प्रत्येक प्रति में उस भाषांतर की भाषा में इस बात की सूचना होगी कि प्रति केवल भारत में वितरण के लिए उपलब्ध है:

परंतु खंड (ii) की कोई बात सरकार या सरकार के अधीन किसी प्राधिकारी द्वारा ऐसे भाषांतर की, जो अंग्रेजी, फ्रेंच या स्पेनिश से भिन्न भाषा में है, प्रतियों के किसी अन्य देश को निर्यात को लागू नहीं होगी यदि- 

(1) ऐसी प्रतियां भारत के बाहर निवास करने वाले भारत के नागरिकों को या भारत के बाहर ऐसे नागरिकों के किसी संगम को भेजी गई हैं; या

(2) ऐसी प्रतियां अध्यापन, विद्यार्जन या अनुसंधान के प्रयोजनों के लिए, न कि किसी वाणिज्यिक प्रयोजन के लिए प्रयोग की जाने के लिए अभिप्रेत हैं; और

(3) दोनों में से किसी भी दशा में ऐसे निर्यात के लिए अनुज्ञा उस देश की सरकार द्वारा दी गई है:

 [परंतु यह और कि इस धारा के अधीन ऐसी कोई अनुज्ञप्ति] उस दशा के सिवाय अनुदत्त नहीं की जाएगी जिसमें-

(क) आवेदन में उल्लिखित भाषा में कृति का भाषांतर, कृति में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी या उस द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा, [उस कृति के प्रथम प्रकाशन से, यथास्थिति, सात वर्ष या तीन वर्ष या एक वर्ष के भीतर] प्रकाशित नहीं किया गया है या यदि कोई भाषांतर ऐसे प्रकाशित किया गया है तो वह अप्राप्य हो गया है;

(ख) आवेदक ने प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को समाधानप्रद रूप में साबित कर दिया है कि उसने प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी से ऐसा भाषांतर उत्पादित और प्रकाशित करने के प्राधिकार के लिए निवेदन किया था और उसे प्राधिकार देने से इंकार कर दिया गया था या कि वह प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी का 2[अपनी ओर से सम्यक् तत्परता बरतने के पश्चात् पता लगाने में असमर्थ था];

(ग) जहां आवेदक प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी का पता लगाने में असमर्थ था, उसने 2[ऐसे प्राधिकार के लिए अपने निवेदन की एक प्रतिर रजिस्ट्रीकृत हवाई डाक द्वारा उस प्रकाशक को जिसका नाम कृति से प्रकट होता है, और उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन की दशा में] 2[ऐसे आवेदन से] कम से कम दो मास पहले भेज दी थी;

 [(गग) उपधारा (1क) के अधीन आवेदन की दशा में (जो उसके परंतुक के अधीन आवेदन नहीं है) छह मास की या उस उपधारा के परंतुक के अधीन आवेदन की दशा में इस परंतुक के खंड (ख) के अधीन निवेदन किए जाने की तारीख से या जहां इस परंतुक के खंड (ग) के अधीन निवेदन की कोई प्रति भेजी गई है वहां ऐसी प्रति के भेजे जाने की तारीख से नौ मास की अवधि बीत गई है और आवेदन में वर्णित भाषा में कृति का भाषांतर कृति में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी या उसके द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा, यथास्थिति, छह मास या नौ मास की उक्त अवधि के भीतर प्रकाशित नहीं किया गया है;

(गगग) उपधारा (1क) के अधीन किए गए किसी आवेदन की दशा में-

(i) ऐसी कृति के, जिसका भाषांतर किए जाने की प्रस्थापना है, लेखक का नाम और विशिष्ट संस्करण का नाम भाषांतरण की सभी प्रतियों पर मुद्रित किया जाता है;

(ii) यदि कृति मुख्यतः चित्रमय है तो धारा 32क के उपबंधों का भी अनुपालन किया जाता है ;]

(घ) प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड का समाधान हो जाता है कि आवेदक कृति का सही भाषांतर उत्पादित और प्रकाशित करने के लिए सक्षम है और उसके पास प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी को उन स्वामिस्वों का संदाय करने के साधन हैं जो उसे इस धारा के अधीन संदेय हैं;

(ङ) रचयिता ने कृति की प्रतियां परिचालन से वापस नहीं ले ली हैं; और

(च) कृति में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी को, जहां कहीं साध्य हो, सुनवाई का अवसर दिया जाता है ।

                3[(5) कोई भी प्रसारण प्राधिकारी प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को-

(क) उपधारा (1क) में निर्दिष्ट और पुनरुत्पादन के मुद्रित या सदृश्य रूपों में प्रकाशित कृति के; या

(ख) व्यवस्थित शिक्षण के क्रियाकलाप के एक मात्र प्रयोजन के लिए निर्मित और प्रकाशित दृश्य-श्रव्य स्थायीकरण में निबद्ध किसी पाठ के, अध्यापन के प्रयोजनों के लिए, भाषांतर के प्रसारण के लिए या किसी विशिष्ट क्षेत्र में विशेषज्ञों के लिए विशेषज्ञीय, तकनीकी या वैज्ञानिक अनुसंधान के परिणामों के प्रसार के लिए ऐसे भाषांतर के उत्पादन और प्रकाशन की अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन कर सकेगा ।

                (6) उपधारा (2) से (4) के उपबंध, जहां तक वे उपधारा (1क) के अधीन आवेदन से संबंधनीय हैं; आवश्यक उपांतरणों सहित, उपधारा (5) के अधीन अनुज्ञप्ति के अनुदत्त किए जाने को लागू होंगे और ऐसी अनुज्ञप्ति उस दशा के सिवाय अनुदत्त नहीं की जाएगी जिसमें-

                                (क) वह भाषांतर विधिपूर्वक अर्जित किसी कृति से तैयार किया गया है;

                                (ख) वह प्रसारण ध्वनि और दृश्य अंकनों के माध्यम से तैयार किया गया है;

(ग) ऐसा अंकन आवेदक द्वारा या किसी अन्य प्रसारण अभिकरण द्वारा भारत में प्रसारण के प्रयोजन के लिए विधिपूर्वक और अनन्यतः तैयार किया गया है; और

(घ) उस भाषांतर और भाषांतर के प्रसारण का प्रयोग किन्हीं वाणिज्यिक प्रयोजनों के लिए नहीं किया गया है ।

                स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -

(क) विकसित देश" से ऐसा देश अभिप्रेत है जो विकासशील देश नहीं है;

(ख) विकासशील देश" से ऐसा देश अभिप्रेत है जिसे संयुक्त राष्ट्र की महासभा की प्रथा के अनुरूप तत्समय ऐसा माना गया है;

(ग) अनुसंधान के प्रयोजन" के अंतर्गत औद्योगिक अनुसंधान के प्रयोजन, या निगमित निकायों द्वारा (जो सरकार के स्वामिस्व के या उसके द्वारा नियंत्रित निगमित निकाय नहीं हैं) या अन्य संगमों या वाणिज्यिक प्रयोजनों के लिए व्यक्तियों के निकाय द्वारा अनुसंधान के प्रयोजन नहीं हैं;

(घ) अध्यापन, अनुसंधान या विद्यार्जन के प्रयोजनों" के अंतर्गत-

(i) शिक्षा संस्थाओं में, जिनके अंतर्गत विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय और शैक्षकीय संस्थाएं हैं, सभी स्तरों पर शिक्षा कार्यकालाप के प्रयोजन हैं;

(ii) संगठित शिक्षण कार्यकलाप के अन्य सभी प्रकारों के प्रयोजन हैं ।]

 [32क. कतिपय प्रयोजनों के लिए कृतियां पुनरुत्पादित और प्रकाशित करने के लिए अनुज्ञप्ति-(1) जहां किसी साहित्यिक, वैज्ञानिक या कलात्मक कृति के संस्करण के प्रथम प्रकाशन की तारीख से सुसंगत अवधि के अवसान के पश्चात्: -

                                (क) ऐसे संस्करण की प्रतियां भारत में उपलब्ध नहीं कराई जाती हैं; या

(ख) ऐसी प्रतियां भारत में छह मास की अवधि तक जनसाधारण के लिए या व्यवस्थित शिक्षण क्रियाकलाप के संबंध में ऐसी कीमत पर विक्रय के लिए उपलब्ध नहीं कराई गई हैं, जिसका उस कीमत से युक्तियुक्त रूप से संबंध है जो पुनरुत्पादन अधिकार के स्वामी द्वारा या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा सदृश्य कृतियों के लिए सामान्यतः भारत में प्रभारित की जाती हैं,  

वहां कोई भी व्यक्ति ऐसी कृति का पुनरुत्पादन करने और ऐसी कृति के मुद्रित रूप में या पुनरुत्पादन के सदृश्य रूपों में ऐसी कीमत पर, जिस पर ऐसे संस्करण का विक्रय किया जाता है या व्यवस्थित शिक्षण क्रियाकलाप के प्रयोजनों के लिए उससे कम कीमत पर प्रकाशित करने की अनुज्ञप्ति के लिए प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को आवेदन कर सकेगा ।

(2) ऐसा प्रत्येक आवेदन ऐसे प्ररूप में किया जाएगा जो विहित किया जाए और उसमें पुनरुत्पादित की जाने वाली कृति की प्रस्थापित फुटकर कीमत कथित होगी ।

(3) इस धारा के अधीन अनुज्ञप्ति के लिए प्रत्येक आवेदक अपने आवेदन के साथ प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार के पास ऐसी फीस जमा करेगा जो विहित की जाए ।

(4) जहां इस धारा के अधीन प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को आवेदन किया जाता है वहां वह ऐसी जांच करने के पश्चात् जो विहित की जाए, आवेदन में उल्लिखित कृति के पुनरुत्पादन को उत्पादित और प्रकाशित करने की अनुज्ञप्ति, जो अनन्य अनुज्ञप्ति न हो, निम्नलिखित शर्तों के अधीन रहते हुए आवेदक को अनुदत्त कर सकेगा कि: -

(i) आवेदक, कृति के पुनरुत्पादन की ऐसी प्रतियों की बाबत, जिनका सार्वजनिक विक्रय हुआ है, कृति में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी को ऐसी दर से परिकलित स्वामिस्वों का संदाय करेगा जो प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड प्रत्येक मामले की परिस्थितियों में विहित रीति से अवधारित करे;

(ii) इस धारा के अधीन अनुदत्त अनुज्ञप्ति का विस्तार कृति के पुनरुत्पादन की प्रतियों के भारत के बाहर निर्यात पर नहीं होगा और ऐसे पुनरुत्पादन की प्रत्येक प्रति में इस बात की सूचना होगी कि प्रति केवल भारत में वितरण के लिए उपलब्ध है:

                परंतु ऐसी कोई अनुज्ञप्ति उस दशा में के सिवाय अनुदत्त नहीं की जाएगी जिसमें-

(क) आवेदक ने प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड के समाधानप्रद रूप में यह साबित कर दिया है कि उसने कृति में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी से ऐसी प्रति को पुनरुत्पादित और प्रकाशित करने के प्राधिकार के लिए निवेदन किया था और उसे प्राधिकार देने से इंकार कर दिया गया था या कि वह अपनी ओर से सम्यक् तत्परता बरतने के पश्चात् प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी का पता लगाने में असमर्थ था;

(ख) जहां आवेदक प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी का पता लगाने में असमर्थ था, उसने ऐसे प्राधिकार के लिए रजिस्ट्रीकृत हवाई डाक द्वारा अपने निवेदन की एक प्रति उस प्रकाशक को, जिसका नाम कृति से प्रकट होता है अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन से कम से कम तीन मास पहले भेज दी थी;

(ग) प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड का समाधान हो जाता है कि आवेदक कृति के यथार्थ पुनरुत्पादन को पुनरुत्पादित और प्रकाशित करने के लिए सक्षम है और उसके पास प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी को उन स्वामिस्वों का संदाय करने के साधन हैं जो उसे इस धारा के अधीन संदेय हैं;

(घ) आवेदक कृति को ऐसी कीमत पर पुनरुत्पादित और प्रकाशित करने का वचनबंध करता है जो प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड द्वारा नियत की जाए और जिसका उस कीमत से युक्तियुक्त रूप से संबंध हो, जो उन्हीं या समरूप विषयों पर वैसे ही स्तर की कृतियों के लिए सामान्यतः भारत में प्रभारित की जाती हैं;

(ङ) खंड (क) के अधीन निवेदन किए जाने की तारीख से या जहां निवेदन की प्रति खंड (ख) के अधीन भेजी गई है वहां प्रति भेजने की तारीख से प्रकृति विज्ञान, भौतिक विज्ञान, गणित या प्रौद्योगिकी की किसी कृति के पुनरुत्पादन और प्रकाशन के लिए आवेदन की दशा में छह मास की अवधि या किसी अन्य कार्य के पुनरुत्पादन और प्रकाशन के लिए आवेदन की दशा में तीन मास की अवधि बीत गई है और उस कृति के पुनरुत्पादन को कृति में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी द्वारा या, उसके द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा, यथास्थिति, छह मास या तीन मास की उक्त अवधि के भीतर प्रकाशित नहीं किया गया है;

(च) जिस कृति को पुनरुत्पादित किया जाना प्रस्थापित है उसके रचयिता का नाम और विशिष्ट संस्करण का नाम पुनरुत्पादन की सभी प्रतियों पर मुद्रित किया जाता है;

(छ) रचयिता ने कृति की प्रतियों को परिचालन से वापस नहीं लिया है; और

(ज) जहां कहीं भी व्यवहार्य हो, कृति में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी को सुनवाई का अवसर दिया गया है ।

                (5) किसी कृति का कोई भाषांतर पुनरुत्पादित और प्रकाशित करने के लिए इस धारा के अधीन कोई अनुज्ञप्ति उस दशा के सिवाय अनुदत्त नहीं की जाएगी जिसमें भाषांतर के अधिकार के स्वामी या उसके द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा ऐसा भाषांतर प्रकाशित कर दिया गया है और भाषांतर ऐसी भाषा में नहीं है जिसका भारत में साधारणतः प्रयोग किया जाता है ।

(6) इस धारा के उपबंध व्यवस्थित शिक्षण कार्यकलाप के एकमात्र प्रयोजन के लिए दृश्य-श्रव्य स्थायीकरण में निबद्ध किसी पाठ के पुनरुत्पादन और प्रकाशन या भारत में साधारणतः प्रयोग की जाने वाली भाषा में भाषांतर को भी लागू होंगे ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए किसी कृति के संबंध में सुसंगत अवधि" से निम्नलिखित अवधि अभिप्रेत है-

                (क) जहां आवेदन कथा-साहित्य, कविता, नाटक, संगीत या कला की या उससे संबंधित किसी कृति के पुनरुत्पादन और प्रकाशन के लिए है वहां उस कृति के प्रथम प्रकाशन की तारीख से सात वर्ष;

                (ख) जहां आवेदन प्रकृति विज्ञान, भौतिक विज्ञान, गणित या प्रौद्योगिकी की या उससे संबंधित किसी कृति के पुनरुत्पादन और प्रकाशन के लिए है वहां उस कृति के प्रथम प्रकाशन की तारीख से तीन वर्ष; और

                (ग) किसी अन्य दशा में, उस कृति के प्रथम प्रकाशन की तारीख से पांच वर्ष ।

32ख. इस अध्याय के अधीन जारी की गई अनुज्ञप्तियों का पर्यवसान-(1) यदि धारा 32 की उपधारा (1क) के अधीन किसी भाषा में किसी कृति का भाषांतर उत्पादित और प्रकाशित करने की अनुज्ञप्ति के अनुदत्त किए जाने के पश्चात् किसी भी समय कृति में प्रतिलिप्यधिकार का स्वामी या उसके द्वारा प्राधिकृत कोई व्यक्ति ऐसी कृति का भाषांतर उसी भाषा में और जिसकी विषय-वस्तु सारतः वैसी ही है, ऐसी कीमत पर प्रकाशित करता है जिसका उस कीमत से युक्तियुक्त रूप से संबंध है जो उसी या समरूप विषय  पर वैसे ही स्तर की कृतियों के भाषांतर के लिए सामान्यतः भारत में प्रभारित की जाती हैं तो इस प्रकार अनुदत्त अनुज्ञप्ति का पर्यवसान हो जाएगा :

परन्तु ऐसा कोई पर्यवसान यथापूर्वोक्त भाषांतर के प्रकाशन की सूचना देते हुए भाषांतर अधिकार के स्वामी द्वारा ऐसी अनुज्ञप्ति धारण करने वाले व्यक्ति पर विहित रीति में सूचना की तामील की तारीख से तीन मास की अवधि के अवसान के पश्चात् ही प्रभावी होगा:

परन्तु यह और कि ऐसी अनुज्ञप्ति धारण करने वाले व्यक्ति द्वारा, अनुज्ञप्ति के पर्यवसान के प्रभावी होने के पूर्व उत्पादित और प्रकाशित अनुज्ञप्त कृति की प्रतियों का विक्रय या वितरण तब तक जारी रखा जा सकेगा जब तक कि पहले ही उत्पादित और प्रकाशित प्रतियां निःशेष नहीं हो जाती हैं ।

(2) यदि धारा 32क के अधीन किसी कृति के पुनरुत्पादन या भाषांतर को उत्पादित और प्रकाशित करने की अनुज्ञप्ति के अनुदत्त किए जाने के पश्चात् किसी समय पुनरुत्पादन अधिकार का स्वामी या उसके द्वारा प्राधिकृत कोई व्यक्ति, यथास्थिति, कृति या उसके भाषांतर की, उसी भाषा में और जिसकी विषय-वस्तु सारतः वैसी ही है, प्रतियां ऐसी कीमत पर बेचता या वितरित करता है जिसका उस कीमत से युक्तियुक्त रूप से संबंध है, जो उसी या समरूप विषय पर वैसे ही स्तर की कृतियों के लिए सामान्यतः भारत में प्रभारित की जाती हैं तो इस प्रकार अनुदत्त अनुज्ञप्ति का पर्यवसान हो जाएगा :

परन्तु ऐसा कोई पर्यवसान यथापूर्वोक्त कृति के संस्करणों की प्रतियों के विक्रय या वितण की सूचना देते हुए पुनरुत्पादन के अधिकार के स्वामी द्वारा ऐसी अनुज्ञप्ति धारण करने वाले व्यक्ति पर विहित रीति में सूचना की तामील की तारीख से तीन मास की अवधि के अवसान के पश्चात् ही प्रभावी होगा:

परन्तु यह और कि ऐसे पर्यवसान के प्रभावी होने के पूर्व अनुज्ञप्तिधारी द्वारा पहले ही उत्पादित प्रतियों का विक्रय या वितरण तब तक जारी रखा जा सकेगा जब तक कि पहले ही उत्पादित प्रतियां निःशेष नहीं हो जाती हैं ।]

[अध्याय 7

प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटियां

33. प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी का रजिस्ट्रीकरण-(1) कोई व्यक्ति या व्यक्ति-संगम, प्रतिलिप्यधिकार (संशोधन) अधिनियम, 1994 के प्रवृत्त होने के पश्चात् किसी ऐसी कृति की बाबत जिसमें प्रतिलिप्यधिकार अस्तित्व में है, या इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त किन्हीं अन्य अधिकारों की बाबत अनुज्ञप्ति जारी करने या अनुदत्त करने का कोई कारबार, उपधारा (3) के अधीन अनुदत्त रजिस्ट्रीकरण के अधीन या उसके अनुसार ही प्रारंभ करेगा या चलाएगा, अन्यथा नहीं:

परन्तु प्रतिलिप्यधिकार का कोई स्वामी, अपनी व्यष्टिक हैसियत में, अपनी स्वयं की कृतियों के बारे में अनुज्ञप्तियां अनुदत्त करने का अधिकार, जो रजिस्ट्रीकृत प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी के सदस्य के रूप में उसकी बाध्यताओं से संगत हो, बनाए रखेगा:

 [परंतु यह और कि किसी चलचित्र फिल्म या ध्वन्यंकन में सम्मिलित साहित्यिक, नाट्य, संगीतात्मक और कलात्मक कृतियों की बाबत अनुज्ञप्ति जारी या अनुदत्त करने का कारबार केवल इस अधिनियम के अधीन सम्यक् रूप से रजिस्ट्रीकृत किसी प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी के माध्यम से चलाया जाएगा:

परंतु यह भी कि] प्रतिलिप्यधिकार (संशोधन) अधिनियम, 1994 के प्रवृत्त होने के ठीक पूर्व की तारीख को धारा 33 के उपबंधों के अनुसार कार्य करने वाली प्रस्तुतीकरण अधिकार सोसाइटी के बारे में यह समझा जाएगा कि वह इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी है और ऐसी प्रत्येक सोसाइटी, प्रतिलिप्यधिकार (संशोधन) अधिनियम, 1994 के प्रारंभ की तारीख से एक वर्ष की अवधि के भीतर अपने को रजिस्ट्रीकृत कराएगी ।

(2) कोई व्यक्ति-संगम, जो ऐसी शर्तों को पूरा करता है, जो विहित की जाएं, उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट कारबार को करने की अनुज्ञा के लिए प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार को आवेदन कर सकेगा जो उस आवेदन को केन्द्रीय सरकार को प्रस्तुत करेगा ।

(3) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के अधीन रचयिताओं और अधिकारों के अन्य स्वामियों के हितों का, जनसाधारण के और विशिष्टतया ऐसे व्यक्तियों के समूहों के, जिनके बारे में इस बात की बहुत संभावना है कि वे सुसंगत अधिकारों के बारे में अनुज्ञप्तियां चाहेंगे, हित और सुविधा का तथा आवेदकों की योग्यता और वृत्तिक सक्षमता का ध्यान रखते हुए, ऐसे व्यक्तियों के संगम को, ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो विहित की जाएं, प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी के रूप में रजिस्ट्रीकृत कर सकेगी:

परन्तु केन्द्रीय सरकार, साधारणतया, एक ही वर्ग की कृतियों की बाबत कारबार करने के लिए एक से अधिक प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी रजिस्ट्रीकृत नहीं करेगी ।

 [(3क) उपधारा (3) के अधीन किसी प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी को अनुदत्त किया गया रजिस्ट्रीकरण पांच वर्ष की अवधि के लिए होगा और उसका प्रत्येक पांच वर्ष की अवधि की समाप्ति के पूर्व, विहित प्ररूप में अनुरोध किए जाने पर, समय-समय पर नवीकरण किया जा सकेगा तथा केंद्रीय सरकार धारा 36 के अधीन प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी के कार्यकरण पर प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार की रिपोर्ट पर विचार करने के पश्चात् रजिस्ट्रीकरण का नवीकरण कर सकेगी:

                परंतु किसी प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी के रजिस्ट्रीकरण का नवीकरण प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी के सतत् सामूहिक नियंत्रण के अध्यधीन होगा जो कृतियों के रचयिताओं के साथ प्रतिलिप्यधिकार या स्वामिस्व प्राप्त करने के अधिकार के स्वामियों के रूप में उनकी हैसियत में बांटा जा रहा हो:

                परंतु यह और कि प्रत्येक प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी, जो प्रतिलिप्यधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2012 के प्रवृत्त होने के पूर्व रजिस्ट्रीकृत है, प्रतिलिप्यधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2012 के प्रारंभ की तारीख से एक वर्ष की अवधि के भीतर इस अध्याय के अधीन अपने को रजिस्ट्रीकृत कराएगी ।]

(4) यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि किसी प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी का प्रबंध ऐसी रीति से किया जा रहा है जो संबंधित [रचयिताओं और अधिकार के अन्य स्वामियों] के हितों के प्रतिकूल है तो वह ऐसी जांच करने के पश्चात् जो विहित की जाए, ऐसी सोसाइटी के रजिस्ट्रीकरण को रद्द कर सकेगी ।

(5) यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि संबंधित 1[रचयिताओं और अधिकार के अन्य स्वामियों] के हित में  [अथवा धारा 33क, धारा 35 की उपधारा (3) और धारा 36 के अननुपालन या ऐसी लिखत में, जिसके द्वारा प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी केंद्रीय सरकार द्वारा स्थापित या निगमित और रजिस्ट्रीकृत की गई है, उसे पूर्व सूचना दिए बिना किए गए ऐसे किसी परिवर्तन के कारण] ऐसा करना आवश्यक है तो वह, आदेश द्वारा, ऐसी सोसाइटी के रजिस्ट्रीकरण को, जांच के लंबित रहने के दौरान, एक वर्ष से अनधिक ऐसी अवधि के लिए जो उपधारा (4) के अधीन ऐसे आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, निलंबित कर सकेगी और वह सरकार, प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी के कृत्यों का निर्वहन करने के लिए एक प्रशासक की नियुक्ति करेगी ।

 [33क. प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटियों द्वारा टैरिफ स्कीम-(1) प्रत्येक प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी अपनी टैरिफ स्कीम ऐसी रीति में प्रकाशित करेगी, जो विहित की जाए ।

(2) कोई ऐसा व्यक्ति, जो टैरिफ स्कीम से व्यथित है, प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को अपील कर सकेगा, और यदि बोर्ड का ऐसी जांच करने के पश्चात्, जो वह आवश्यक समझे, समाधान हो जाता है, तो वह ऐसे आदेश कर सकेगा जो उसमें किसी अयुक्तियुक्त तत्व, विषमता या असंगतता को दूर करने के लिए अपेक्षित हों:

परन्तु व्यथित व्यक्ति, प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी को ऐसी किसी फीस का, जो विहित की जाए और जो प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को अपील करने के पूर्व देय हो गई हो, संदाय करेगा, और वह तब तक ऐसी फीस का संदाय करता रहेगा, जब तक अपील का विनिश्चय नहीं हो जाता है और बोर्ड, अपील का निपटारा होने तक ऐसी फीस के संग्रहण पर रोक लगाने का कोई आदेश जारी नहीं करेगा:

परन्तु यह और कि प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड पक्षकारों को सुनने के पश्चात् अंतरिम टैरिफ नियत कर सकेगा और अपील का निपटारा होने तक व्यथित पक्षकारों को तदनुसार संदाय करने का निदेश दे सकेगा ।]

34. प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी द्वारा स्वामी के अधिकारों का प्रशासन-(1) ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो विहित की जाएं, -

(क) प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी, अनुज्ञप्ति जारी करके या अनुज्ञप्ति फीस संगृहीत करके या दोनों प्रकार से, किसी कृति में किसी अधिकार को प्रशासित करने के लिए अनन्य प्राधिकार, [किसी रचयिता और अधिकार के अन्य स्वामियों] से स्वीकार कर सकेगी; और

(ख) 4[किसी रचयिता और अधिकार के अन्य स्वामियों] को ऐसा प्राधिकार, किसी संविदा के अधीन प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, वापस लेने का अधिकार होगा ।

                (2) कोई प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी इस बात के लिए सक्षम होगी कि वह किसी ऐसी विदेशी सोसाइटी या संगठन के साथ, जो इस अधिनियम के अधीन अधिकारों के समरूपी अधिकारों का प्रशासन कर रहा है, ऐसी विदेशी सोसाइटी या संगठन को भारत में उक्त प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी द्वारा प्रशासित अधिकारों का प्रशासन किसी विदेश में सौंपने के लिए अथवा ऐसी विदेशी सोसाइटी या संगठन द्वारा किसी विदेश में प्रशासित अधिकारों का भारत में प्रशासन करने के लिए करार करे:

परंतु कोई ऐसी सोसाइटी या संगठन, भारतीय और अन्य कृतियों में अधिकारों के बीच अनुज्ञप्ति के निर्बन्धनों या संगृहीत फीस के वितरण के बारे में किसी भेदभाव की अनुज्ञा नहीं देगा ।

(3) ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो विहित की जाएं, कोई प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी, -

(i) इस अधिनियम के अधीन किन्हीं अधिकारों की बाबत धारा 30 के अधीन अनुज्ञप्ति जारी कर सकेगी;

(ii) ऐसी अनुज्ञप्तियों के अनुसरण में फीस संगृहीत कर सकेगी;

(iii) अपने स्वयं के व्ययों के लिए कटौती करने के पश्चात् 4[रचयिता और अधिकार के अन्य स्वामियों] में ऐसी फीस का वितरण कर सकेगी;

(iv) धारा 35 के उपबंधों से संगत कोई अन्य कृत्य कर सकेगी ।

                 ।                                             ।                                              ।                                              ।                                              ।

35. प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी पर [रचयिता और अधिकार के अन्य स्वामियों] द्वारा नियंत्रण-(1) प्रत्येक प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी, इस अधिनियम के अधीन उन 1[रचयिता और अधिकार के अन्य स्वामियों] के सामूहिक नियंत्रण के अधीन होगी, जिनके अधिकार वह प्रशासित करती है [जो इस अधिनियम के अधीन ऐसे 1[रचयिता और अधिकार के अन्य स्वामी] नहीं हैं जो धारा 34 की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट किसी विदेशी सोसाइटी या संगठन द्वारा प्रशासित किए जाते हैंट और ऐसी रीति से जो विहित की जाए, -

(क) फीस के संग्रहण और वितरण की अपनी प्रक्रिया के लिए ऐसे 1[रचयिता और अधिकार के अन्य स्वामियों] का अनुमोदन प्राप्त करेगी;

(ख) फीस के रूप में संगृहीत किन्हीं रकमों का, 1[रचयिता और अधिकार के अन्य स्वामियों] को वितरण करने से भिन्न किसी प्रयोजन के लिए, उपयोजन करने के बारे में उनका अनुमोदन प्राप्त करेगी; और

(ग) ऐसे स्वामियों को उनके अधिकारों के प्रशासन के संबंध में अपने सभी क्रियाकलापों से संबंधित नियमित, पूर्ण और विस्तृत जानकारी देगा ।

                (2) 1[रचयिता और अधिकार के अन्य स्वामियों] में वितरित सभी फीसें, जहां तक हो सके, उनकी कृतियों के वास्तविक उपयोग के अनुपात में वितरित की जाएंगी ।

                 [(3) प्रत्येक प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी का एक शासी निकाय होगा जिसमें सोसाइटी के प्रशासन के प्रयोजन के लिए कृति रचयिताओं और स्वामियों की बराबर संख्या से मिलकर बनी सोसाइटी के सदस्यों में से चुने गए उतने व्यक्ति होंगे, जितने विनिर्दिष्ट किए जाएं ।

(4) प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी के सभी सदस्यों को बराबर सदस्यता अधिकार प्राप्त होंगे और स्वामिस्वों के वितरण में रचयिताओं और अधिकारों के स्वामियों के बीच कोई भेदभाव नहीं होगा ।]

36. विवरणियों और रिपोर्टों का प्रस्तुत किया जाना-(1) प्रत्येक प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी, प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार के समक्ष ऐसी विवरणियां प्रस्तुत करेगी जो विहित की जाएं ।

(2) केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त सम्यक् रूप से प्राधिकृत कोई अधिकारी, अपना यह समाधान करने के प्रयोजन के लिए कि सोसाइटी द्वारा प्रशासित अधिकारों के संबंध में उसके द्वारा संगृहीत फीसों का, अधिनियम के उपबंधों के अनुसार उपयोग या वितरण किया जा रहा है, किसी प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी से कोई रिपोर्ट मंगा सकेगा और कोई अभिलेख भी मंगा सकेगा ।

36क.  [प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी] के अधिकार और दायित्व-इस अध्याय की कोई बात, किसी कृति में 3[प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी] के संबंध में किन्हीं अधिकारों या दायित्वों को, जो 3[प्रतिलिप्यधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2012] के प्रारंभ के पूर्व दिन को या उसके पहले प्रोद्भूत या उपगत हुए हों, या उस दिन लंबित किन्हीं ऐसे अधिकारों या दायित्वों के संबंध में किसी विधिक कार्यवाही को, प्रभावित नहीं करेगी ।

अध्याय 8

[प्रसारण संगठन के और प्रस्तुतकर्ताओं के अधिकार]

 [37. प्रसारण पुनरुत्पादन अधिकार-(1) प्रत्येक प्रसारण संगठन को उसके प्रसारणों के संबंध में प्रसारण पुनरुत्पादन अधिकार" नाम से ज्ञात विशेष अधिकार होगा ।

(2) प्रसारण पुनरुत्पादन अधिकार उस वर्ग के, जिसमें प्रसारण किया जाता है, ठीक आगामी कलैंडर वर्ष के आरम्भ से पच्चीस वर्ष तक अस्तित्व में रहेगा ।

(3) किसी प्रसारण के संबंध में प्रसारण पुनरुत्पादन अधिकार के बने रहने के दौरान, किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में जो अधिकार के स्वामी की अनुज्ञप्ति के बिना, प्रसारण या उसके किसी पर्याप्त भाग के संबंध में निम्नलिखित कोई कार्य करता है, अर्थात्: -

                (क) प्रसारण का पुनः प्रसारण करता है; या

                (ख) प्रसारण को सार्वजनिक रूप से किसी प्रभार का संदाय करने पर सुनवाता है या दिखाता है; या

(ग) प्रसारण का कोई ध्वन्यंकन या दृश्यांकन करता है; या

(घ) ऐसे ध्वन्यंकन या दृश्यांकन का कोई पुनरुत्पादन करता है जहां ऐसे आरम्भिक ध्वन्यंकन अनुज्ञप्ति के बिना किया गया था या जहां वह अनुज्ञप्ति के अधीन किसी ऐसे प्रयोजन के लिए अनुदत्त किया गया था जो उस अनुज्ञप्ति द्वारा परिकल्पित नहीं है; या

 [(ङ) खंड (ग) या खंड (घ) में निर्दिष्ट किसी ऐसे ध्वन्यंकन या दृश्यांकन का विक्रय करता है या उसे वाणिज्यिक भाटक पर देता है या विक्रय के लिए या ऐसे भाटक पर देने की प्रस्थापना करता है,]

तो यह समझा जाएगा कि उसने धारा 39 के उपबंधों के अधीन रहते हुए उस प्रसारण पुनरुत्पादन अधिकार का अतिलंघन किया है ।]

 [38. प्रस्तुतकर्ता का अधिकार-(1) जहां कोई प्रस्तुतकर्ता, किसी प्रस्तुतीकरण में उपस्थित होता है या उसमें लगता है वहां उसे ऐसे प्रस्तुतीकरण के संबंध में, प्रस्तुतकर्ता का अधिकार" नाम से ज्ञात विशेष अधिकार होगा ।

(2) प्रस्तुतकर्ता का अधिकार, उस वर्ष के, जिसमें ऐसा प्रस्तुतीकरण किया जाता है, ठीक आगामी कलैंडर वर्ष के आरंभ से [पचास वर्ष] तक अस्तित्व में रहेगा ।

 ।                                             ।                                              ।                                              ।                                              ।

 [38क. प्रस्तुतकर्ताओं का अनन्य अधिकार-(1) रचयिताओं को प्रदत्त अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्रस्तुतकर्ता का अधिकार, जो प्रस्तुतीकरण या उसके किसी सारवान् भाग की बाबत निम्नलिखित कृत्यों में से किसी कृत्य को करने या करने के लिए प्राधिकृत करने के लिए इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए एक अनन्य अधिकार है, अर्थात्: -

                (क) प्रस्तुतीकरण का ध्वन्यंकन या दृश्यांकन करने का होगा, जिसके अन्तर्गत निम्नलिखित भी हैं,-

(i) पर्याप्त रूप में उसका पुनरुत्पादन करना, जिसके अन्तर्गत इलैक्ट्रानिक या किसी अन्य साधन द्वारा किसी माध्यम से उसका भंडारण भी है;

(ii) जनसाधारण को उसकी ऐसी प्रतियां उपलब्ध कराना, जो पहले से परिचालन में प्रतियां नहीं हैं;

(iii) सार्वजनिक रूप से उसे संसूचित करना;

(iv) अंकन की किसी प्रति का विक्रय करना या उसे वाणिज्यिक भाटक पर देना या विक्रय करने या वाणिज्यिक भाटक पर देने की प्रस्थापना करना;

(ख) जहां प्रस्तुतीकरण का प्रसारण पहले कर दिया गया है वहां के सिवाय सार्वजनिक रूप से प्रस्तुतीकरण का प्रसारण करने या उसे संसूचित कराने का होगा ।

(2) जब किसी प्रस्तुतकर्ता ने, लिखित करार द्वारा, किसी चलचित्र फिल्म में अपने प्रस्तुतीकरण को सम्मिलित किए जाने की सहमति दे दी है तो वह किसी प्रतिकूल संविदा के न होने पर, उसी फिल्म में फिल्म के निर्माता द्वारा प्रस्तुतकर्ता के अधिकार का उपभोग किए जाने के प्रति आक्षेप नहीं करेगा:

परन्तु, इस उपधारा में किसी बात के होते हुए भी प्रस्तुतकर्ता प्रस्तुतीकरणों को वाणिज्यिक उपयोग के लिए बनाए जाने की दशा में स्वामिस्वों के लिए हकदार होगा ।

38ख. प्रस्तुतकर्ता के नैतिक अधिकार-किसी प्रस्तुतीकरण के प्रस्तुतकर्ता को अपने अधिकार के पूर्णतः या भागतः समनुदेशन के पश्चात् अपने अधिकार पर निरपेक्ष रूप से निम्नलिखित का अधिकार होगा-

(क) उस दशा के सिवाय जहां कि लोप प्रस्तुतीकरण के उपयोग की रीति द्वारा अभिप्रेरित किया गया है, अपने प्रस्तुतीकरण के प्रस्तुतकर्ता के रूप में पहचाने जाने का दावा करना; और

(ख) उसके प्रस्तुतीकरण में ऐसी कोई विकृति, विच्छेदन या अन्य उपांतरण जिससे उसकी ख्याति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो, करने से अवरुद्ध करना या उसके संबंध में नुकसानी का दावा करना ।

स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, इसके द्वारा यह स्पष्ट किया जाता है कि संपादन करने या ध्वन्यंकन को एक सीमित अवधि के भीतर ठीक जोड़ने के प्रयोजन के लिए प्रस्तुतीकरण के किसी भाग को हटाने मात्र को या पूर्णतः तकनीकी कारणों के लिए अपेक्षित किसी अन्य उपांतरण को प्रस्तुतकर्ता की ख्याति पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला नहीं समझा जाएगा ।]

 [39. प्रसारण पुनरुत्पादन अधिकार या प्रस्तुतकर्ता के अधिकार का अतिलंघन करने वाले कार्य-किसी प्रसारण पुनरुत्पादन अधिकार या प्रस्तुतकर्ता के अधिकार के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि उसका निम्नलिखित द्वारा अतिलंघन हुआ है, अर्थात्: -

(क) ध्वन्यंकन या दृश्यांकन करने वाले किसी व्यक्ति के निजी उपयोग के लिए या पूर्णतः सद्भाविक शिक्षण या अनुसंधान के प्रयोजनों के लिए, कोई ध्वन्यंकन या दृश्यांकन करना; या

(ख) सामयिक घटनाओं की या सद्भाविक पुनर्विलोकन, शिक्षण या अनुसंधान की रिपोर्टिंग में किसी प्रस्तुतीकरण या किसी प्रसारण की झलकियों का प्रयोग, जो उचित प्रयोग से सुसंगत हो; या

(ग) किन्हीं आवश्यक अनुकूलनों और उपांतरणों के साथ ऐसे अन्य कार्य, जिनसे धारा 52 के अधीन प्रतिलिप्यधिकार का अतिलंघन नहीं होता है ।

[39क. प्रसारण पुनरुत्पादन अधिकार और प्रस्तुतकर्ता के अधिकारों की दशा में कतिपय उपबंधों का लागू होना-(1) धारा 18, धारा 19, धारा 30, धारा 30क, धारा 33, धारा 33क, धारा 34, धारा 35, धारा 36, धारा 53, धारा 55, धारा 58, धारा 63, धारा 64, धारा 65, धारा 65क, धारा 65ख, और धारा 66, आवश्यक अनुकूलनों और उपांतरणों के साथ, किसी प्रसारण में प्रसारण पुनरुत्पादन अधिकार और किसी प्रस्तुतीकरण में प्रस्तुतकर्ता के अधिकार के संबंध में वैसे ही लागू होंगी जैसे वे किसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार के संबंध में लागू होती हैं :

परन्तु जहां प्रतिलिप्यधिकार या प्रस्तुतकर्ता का अधिकार ऐसी किसी कृति या प्रस्तुतीकरण की बाबत अस्तित्व में है जिसका प्रसारण किया जा चुका है, वहां ऐसे प्रसारण का पुनरुत्पादन करने की कोई अनुज्ञप्ति, यथास्थिति, अधिकार के स्वामी या प्रस्तुतकर्ता अथवा उन दोनों की सहमति के बिना नहीं दी जाएगी:

परन्तु यह और कि यदि वह प्रसारण या प्रस्तुतीकरण किसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार के अतिलंघन में है तो प्रसारण पुनरुत्पादन अधिकार या प्रस्तुतकर्ता का अधिकार किसी प्रसारण या प्रस्तुतीकरण में अस्तित्व में नहीं रहेगा ।

(2) प्रसारण पुनरुत्पादन अधिकार या प्रस्तुतकर्ता का अधिकार ऐसी किसी कृति में पृथक् प्रतिलिप्यधिकार को प्रभावित नहीं करेगा, जिसके संबंध में, यथास्थिति, प्रसारण या प्रस्तुतीकरण किया जाता है ।]

अध्याय 9

अंतरराष्ट्रीय प्रतिलिप्यधिकार

40. प्रतिलिप्यधिकार को विदेशी कृतियों पर विस्तारित करने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के सब या कोई उपबंध-

(क) भारत के बाहर किसी राज्यक्षेत्र में, जिससे आदेश संबद्ध है प्रथम बार प्रकाशित कृतियों को उसी प्रकार लागू होंगे मानो वे भारत के अंदर प्रथम बार प्रकाशित की गई हों;

(ख) ऐसी अप्रकाशित कृतियों या उनके किसी वर्ग को, जिनके रचयिता कृति के बनाए जाने के समय किसी ऐसे विदेश के प्रजाजन या नागरिक थे जिससे आदेश संबद्ध है, उसी प्रकार लागू होंगे मानो वे रचयिता भारत के नागरिक रहे हों;

(ग) भारत के बाहर किसी राज्यक्षेत्र में, जिससे आदेश संबद्ध है, अधिवास की बाबत उसी प्रकार लागू होंगे मानो वह अधिवास भारत में हो;

(घ) किसी ऐसी कृति को, जिसका रचयिता उसके प्रथम बार प्रकाशन की तारीख को, या उस दशा में जिसमें रचयिता उस तारीख को मर चुका था, अपनी मृत्यु के समय ऐसे विदेश का प्रजाजन या नागरिक था, जिससे आदेश संबद्ध है, उसी प्रकार लागू होंगे मानो वह रचयिता उस तारीख को या उस समय भारत का नागरिक रहा हो,

और तब इस अध्याय के और आदेश के उपबंधों के अध्यधीन, यह अधिनियम तद्नुसार लागू होगा:

                परंतु यह कि-

(i) किसी विदेश के संबंध में (जो ऐसे देश से भिन्न हो जिसके साथ भारत ने कोई संधि की है या जो प्रतिलिप्यधिकार से संबद्ध ऐसे अभिसमय का पक्षकार है जिसका भारत भी पक्षकार है) इस धारा के अधीन कोई आदेश करने से पूर्व केन्द्रीय सरकार अपना समाधान कर लेगी कि उस विदेश ने ऐसे उपबंध, यदि कोई हों, जैसे इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन प्रतिलिप्यधिकार की हकदार कृतियों के उस देश में संरक्षण के लिए अपेक्षित करना केन्द्रीय सरकार की राय में समीचीन प्रतीत हो, कर लिए हैं या करने का वचनबंध किया है;

(ii) आदेश में यह उपबंध हो सकेगा कि इस अधिनियम के उपबंध या तो साधारणतया या कृतियों के ऐसे वर्गों या मामलों के ऐसे वर्गों के संबंध में जैसे आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं, लागू होंगे;

(iii) आदेश में यह उपबंध हो सकेगा कि भारत में प्रतिलिप्यधिकार की अवधि उस देश की, जिससे आदेश संबद्ध विधि द्वारा प्रदत्त अवधि से अधिक नहीं होगी [किन्तु प्रतिलिप्यधिकार की ऐसी कोई अवधि इस अधिनियम के अधीन उपबंधित प्रतिलिप्यधिकार की अवधि से अधिक नहीं होगी];

(iv) आदेश में यह उपबंध हो सकेगा कि इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त अधिकारों का उपभोग ऐसी शर्तों और औपचारिकताओं की, यदि कोई हों, पूर्ति के अध्यधीन होगा जैसी आदेश द्वारा विहित की जाएं;

(v) प्रतिलिप्यधिकार के स्वामिस्व के बारे में इस अधिनियम के उपबंधों को लागू करने में आदेश द्वारा ऐसे अपवाद और उपांतर किए जा सकेंगे जैसा उस विदेश की विधि को ध्यान में रखते हुए आवश्यक प्रतीत हों;

(vi) आदेश में यह उपबंध हो सकेगा कि यह अधिनियम या इसका कोई भाग आदेश के प्रारंभ से पूर्व बनाई गई कृतियों को लागू नहीं होगा या कि वह अधिनियम या उसका कोई भाग आदेश के प्रारंभ से पूर्व प्रथम बार प्रकाशित कृतियों को लागू नहीं होगा ।

 [40क. कतिपय अन्य देशों में प्रसारण संगठनों और प्रस्तुतकर्ताओं को अध्याय 8 को लागू करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि किसी विदेश ने (जो उस देश से भिन्न है जिसके साथ भारत ने कोई संधि की है या जो प्रसारण संगठनों और प्रस्तुतकर्ताओं के अधिकारों से संबद्ध ऐसे अभिसमय का पक्षकार है जिसका भारत भी एक पक्षकार है) ऐसे उपबंध, यदि कोई हों, जो केन्द्रीय सरकार को उस विदेश में प्रसारण संगठनों और प्रस्तुतकर्ताओं के इस अधिनियम के अधीन उपलब्ध अधिकारों के संरक्षण के लिए अपेक्षा करना समीचीन प्रतीत होते हैं, कर लिए हैं या करने का वचनबंध किया है, तो वह राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि अध्याय 8 के उपबंध निम्नलिखित को लागू होंगे-

(क) ऐसे प्रसारण संगठन, जिनके मुख्यालय उस देश में स्थित हैं जिससे आदेश संबद्ध है या, उस देश में, जिससे आदेश संबद्ध है, स्थित ट्रांसमीटर से प्रसारण ऐसे पारेषित किया गया था मानो ऐसे संगठनों के मुख्यालय भारत में स्थित हों या ऐसा प्रसारण भारत से किया गया हो;

(ख) भारत से बाहर किए गए उस रीति से प्रस्तुतीकरण, जिससे आदेश संबद्ध है, मानो वे भारत में किए गए हों;

(ग) ऐसे प्रस्तुतीकरण, जिनका ध्वन्यंकन किया गया है और उस देश में प्रकाशित किया गया है जिससे यह आदेश संबद्ध है मानो वह भारत में प्रकाशित किया गया हो;

(घ) ऐसे प्रस्तुतीकरण, जिनका किसी ऐसे प्रसारण संगठन द्वारा, जिसका मुख्यालय किसी ऐसे देश में अवस्थित है, जिससे आदेश संबद्ध है या जहां प्रसारण ऐसे ट्रांसमीटर द्वारा पारेषित किया गया है जो उस देश में स्थित है जिससे यह आदेश संबद्ध है, ध्वन्यंकन प्रसारण नियत नहीं किया गया है मानो ऐसे संगठन का मुख्यालय भारत में स्थित हो या ऐसा प्रसारण भारत से किया गया हो ।

(2) उपधारा (1) के अधीन किए गए किसी आदेश में यह उपबंध हो सकेगा कि-

(i) अध्याय 8 के उपबंध या तो साधारणतया या, प्रसारणों या प्रस्तुतीकरणों के ऐसे वर्ग या वर्गों या मामलों के ऐसे अन्य वर्ग या वर्गों के संबंध में, जो आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं, लागू होंगे;

(ii) भारत में प्रसारण संगठनों और प्रस्तुतकर्ताओं के अधिकारों की अवधि उस अवधि से अधिक नहीं होगी, जो उस देश की जिससे आदेश संबद्ध है, विधि द्वारा प्रदत्त है:

                 [परन्तु यह इस अधिनियम के अधीन उपबंधित अवधि से अधिक नहीं होगी;]

(iii) अध्याय 8 द्वारा प्रदत्त अधिकारों का उपभोग ऐसी शर्तों और औपचारिकताओं की, यदि कोई हों, पूर्ति के अध्यधीन होगा, जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं; 

(iv) अध्याय 8 या उसका कोई भाग आदेश के प्रारंभ से पूर्व बनाए गए प्रसारण और प्रस्तुतीकरणों को लागू नहीं होगा अथवा वह अध्याय 8 या उसका कोई भाग इस आदेश के प्रारंभ से पूर्व प्रसारित या प्रस्तुत किए गए प्रसारण और प्रस्तुतीकरणों को लागू नहीं होगा;

(v) प्रसारण संगठनों और प्रस्तुतकर्ताओं के अधिकारों के स्वामिस्व की दशा में, अध्याय 8 के उपबंध, ऐसे अपवादों और उपांतरणों सहित, लागू होंगे, जो केन्द्रीय सरकार, विदेश की विधि को ध्यान में रखते हुए, आवश्य समझे ।]

41. कतिपय अन्तरराष्ट्रीय संगठनों की कृतियों के बारे में उपबन्ध-(1) जहां-

(क) कोई कृति किसी ऐसे संगठन के द्वारा जिसको यह धारा लागू होती है या उसके निर्देश या नियंत्रण के अधीन बनाई जाती है या प्रथम बार प्रकाशित की जाती है, और

(ख) उस कृति के, यथास्थिति, बनाए जाने या प्रथम बार प्रकाशन के समय भारत में कोई प्रतिलिप्यधिकार इस धारा से पृथक् रूप में नहीं होगा, और

(ग) या तो-

(i) कृति का यथापूर्वोक्त प्रकाशन रचयिता के साथ उस निमित्त किए गए किसी ऐसे करार के अनुसरण में किया जाता है, जो कृति में किसी प्रतिलिप्यधिकार को, यदि कोई हो, रचयिता के लिए आरक्षित नहीं करता है, या

(ii) धारा 17 के अधीन कृति में कोई प्रतिलिप्यधिकार उस संगठन को होगा,

                वहां इस धारा के आधार पर उसे उस कृति में प्रतिलिप्यधिकार समस्त भारत में होगा ।

(2) किसी संगठन को जिसको यह धारा लागू होती है और जिससे संबद्ध समय पर निगमित निकाय का विधिक सामर्थ्य नहीं था, प्रतिलिप्यधिकार को धारण, व्यवहृत और प्रवर्तित करने के प्रयोजनों के लिए, तथा प्रतिलिप्यधिकार के संबंध में सब विधिक कार्यवाहियों की बाबत निगमित निकाय का विधिक सामर्थ्य होगा और सब संबद्ध समयों पर हुआ समझा जाएगा ।

(3) जिन संगठनों को यह धारा लागू होती है, वे संगठन हैं जिन्हें केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा ऐसे संगठन घोषित करे जिनके एक या अधिक प्रभुत्व सम्पन्न राज्य या उनकी सरकारें सदस्य हैं और जिनके बारे में यह समीचीन है कि यह धारा लागू हो ।

42. भारत में प्रथम बार प्रकाशित विदेशी रचयिताओं की कृतियों में अधिकारों को निर्बन्धित करने की शक्ति-यदि केन्द्रीय सरकार को प्रतीत होता है कि कोई विदेश भारतीय रचयिताओं की कृति को यथोचित संरक्षा नहीं देता है या उसने वैसा करने का वचनबंध नहीं किया तो केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के ऐसे उपबंध जो भारत में प्रथम बार प्रकाशित कृतियों को प्रतिलिप्यधिकार प्रदत्त करते हैं, आदेश में विनिर्दिष्ट तारीख के पश्चात् प्रकाशित ऐसी कृतियों को लागू नहीं होंगे जिनके रचयिता तब वे ऐसे विदेश के प्रजाजन या नागरिक हैं और भारत में अधिवसित नहीं हैं और उपबंध ऐसी कृतियों को लागू नहीं होंगे ।

 [42क. विदेशी प्रसारण संगठनों और प्रस्तुतकर्ताओं के अधिकारों को निर्बन्धित करने की शक्ति-यदि केन्द्रीय सरकार को प्रतीत होता है कि कोई विदेश, प्रसारण संगठनों या प्रस्तुतकर्ता के अधिकारों को यथोचित संरक्षा नहीं देता है या उसने वैसा करने का वचनबंध नहीं किया है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के ऐसे उपबंध, जो यथास्थिति, प्रसारण संगठनों या प्रस्तुतकर्ताओं को अधिकार प्रदत्त करते हैं, ऐसे प्रसारण संगठनों या प्रस्तुतकर्ताओं को, जिनका आधार ऐसे विदेश में हैं, या जो ऐसे विदेश में निगमित है या विदेश के प्रजाजन या नगरिक हैं और भारत में निगमित या अधिवसित नहीं हैं, लागू नहीं होंगे और तदुपरि वे उपबंध ऐसे प्रसारण संगठनों या प्रस्तुतकर्ताओं को लागू नहीं होंगे ।]

43. इस अध्याय के अधीन आदेशों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अध्याय के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाएगा और ऐसे उपांतरों के अध्यधीन होगा जैसे संसद् उस सत्र के जिसमें वह ऐसे रखा जाता है या उसके ठीक पश्चात्वर्ती सत्र के दौरान करे ।

अध्याय 10

प्रतिलिप्यधिकार का रजिस्ट्रीकरण

44. प्रतिलिप्यधिकारों का रजिस्टर-प्रतिलिप्यधिकार कार्यालय में विहित प्ररूप में एह रजिस्टर रखा जाएगा जो प्रतिलिप्यधिकारों का रजिस्टर कहलाएगा और जिसमें कृतियों के नाम या शीर्षक और रचयिताओं, प्रकाशकों तथा प्रतिलिप्यधिकार के स्वामियों के नाम और पते तथा ऐसी अन्य विशिष्टियां, जैसी विहित की जाएं, दर्ज की जा सकेंगी ।

45. प्रतिलिप्यधिकारों के रजिस्टर में प्रविष्टियां-(1) किसी कृति का रचयिता या प्रकाशक, अथवा उसमें प्रतिलिप्यधिकार का स्वामी या अन्य हितबद्ध व्यक्ति, प्रतिलिप्यधिकारों के रजिस्टर में उस कृति की विशिष्टियों को दर्ज करने के लिए, विहित प्ररूप में और विहित फीस के साथ आवेदन प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार को कर सकेगा:

 [परंतु किसी ऐसी कलात्मक कृति की बाबत जिसका  [किसी माल या सेवाओं के संबंध में] उपयोग किया जाता है या उपयोग कियाजा सकता है, आवेदन में उस प्रभाव का कथन सम्मिलित होगा और उसके साथ 4[व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 (1998 का 47) की धारा 3] में निर्दिष्ट व्यापार चिह्न के रजिस्ट्रार द्वारा दिया गया प्रमाणपत्र होगा कि कोई ऐसा व्यापार चिह्न, जो ऐसी कलात्मक कृति के तद्रूप या इतना समरूप है कि धोखा हो जाए, आवेदक से भिन्न किसी अन्य व्यक्ति के नाम में उस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत नहीं किया गया है या उसके द्वारा ऐसे रजिस्ट्रीकरण के लिए उस अधिनियम के अधीन कोई आवेदन नहीं किया गया है ।]

(2) उपधारा (1) के अधीन किसी कृति की बाबत आवेदन की प्राप्ति पर प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार ऐसी जांच करने के पश्चात् जैसी वह ठीक समझे कृति की विशिष्टियों को प्रतिलिप्यधिकारों के रजिस्टरों में दर्ज कर सकेगा ।

46. अनुक्रमणिकाएं-प्रतिलिप्यधिकार कार्यालय में प्रतिलिप्यधिकारों के रजिस्टर की ऐसी अनुक्रमणिकांए भी, जैसी विहित की जाएं, रखी जाएंगी ।

47. रजिस्टर का प्ररूप और निरीक्षण-इस अधिनियम के अधीन रखा गया प्रतिलिप्यधिकार का रजिस्टर और उसकी अनुक्रमणिकाएं सभी उचित समयों पर निरीक्षण के लिए खुली रहेंगी और कोई व्यक्ति ऐसे रजिस्टर या अनुक्रमणिकाओं की नकलें लेने या उनसे उद्धरण लेने के लिए ऐसी फीस देकर और ऐसी शर्तों के अध्यधीन, जैसी विहित की जाएं, हकदार होगा ।

48. प्रतिलिप्यधिकारों के रजिस्टर का उसमें दर्ज विशिष्टियों का प्रथमदृष्ट्या साक्ष्य होना-प्रतिलिप्यधिकार का रजिस्टर उसमें दर्ज विशिष्टियों का प्रथमदृष्ट्या साक्ष्य होगा और उसमें की किन्हीं प्रविष्टियों की नकलें या उसमें से उद्धरण होनी तात्पर्यित दस्तावेजें, जो प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार द्वारा प्रमाणित और प्रतिलिप्यधिकार कार्यालय की मुद्रा से मुद्रांकित हों, सब न्यायालयों में, अतिरिक्त सबूत या मूल की पेशी के बिना, साक्ष्य में ग्राह्य होंगी ।

49. प्रतिलिप्यधिकारों के रजिस्टर में प्रविष्टियों को ठीक करना-प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार विहित मामलों में और विहित शर्तों के अध्यधीन, प्रतिलिप्यधिकारों के रजिस्टर में-

                (क) किसी नाम, पते या विशिष्टि में किसी गलती को ठीक करके, या

(ख) किसी ऐसी अन्य गलती को जो उसमें आकस्मिक भूल या लोप से हो गई है, ठीक करके,

संशोधन या परिवर्तन कर सकेगा ।

50. प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड द्वारा रजिस्टर का परिशोधन-प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड, प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार के या किसी व्यथित व्यक्ति के आवेदन पर प्रतिलिप्यधिकारों के रजिस्टर में-

                (क) कोई ऐसी प्रविष्टि करके जो रजिस्टर में करनी गलती से रह गई हो, या

                (ख) रजिस्टर में गलती से की गई या रह गई किसी प्रविष्टि को निकाल कर, या

                (ग) रजिस्टर में किसी गलती या त्रुटि को ठीक करके,

परिशोधन का आदेश दे सकेगा ।

 [50क. प्रतिलिप्यधिकारों के रजिस्टर में की गई प्रविष्टियों, आदि का प्रकाशित किया जाना-प्रतिलिप्यधिकारों के रजिस्टर में की गई प्रत्येक प्रविष्टि या धारा 45 के अधीन प्रविष्ट किसी कृति की विशिष्टियां, ऐसे रजिस्टर में धारा 49 के अधीन की गई प्रत्येक प्रविष्टि की शुद्धि और धारा 50 के अधीन आदिष्ट प्रत्येक परिशोधन, प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार द्वारा राजपत्र में या ऐसी अन्य रीति से जैसी वह ठीक समझे, प्रकाशित किया जाएगा ।]

अध्याय 11

प्रतिलिप्यधिकार का अतिलंघन

51. प्रतिलिप्यधिकार का अतिलंघन कब होगा-किसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार का अतिलंघन हुआ समझा जाएगा-

(क) जब कोई व्यक्ति प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी या प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार द्वारा इस अधिनियम के अधीन अनुदत्त अनुज्ञप्ति के बिना या ऐसे अनुदत्त अनुज्ञप्ति की शर्तों का अथवा इस अधिनियम के अधीन सक्षम प्राधिकारी द्वारा अधिरोपित किसी शर्त का उल्लंघन करके-

(i) कोई ऐसी बात करता है जिसे करने का अनन्य अधिकार इस अधिनियम द्वारा प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी को प्रदत्त है, या

 [(ii) किसी स्थान का उपयोग, उस कृति को सार्वजनिक रूप से संसूचित किए जाने के लिए, जब ऐसे संसूचित किए जाने से उस कृति में प्रतिलिप्यधिकार का अतिलंघन होता है, लाभ के लिए अनुज्ञात करता है, उस दशा के सिवाय जिसमें वह यह नहीं जानता था और उसके पास यह विश्वास करने का समुचित आधार नहीं था कि सार्वजनिक रूप से ऐसा संसूचित किया जाना प्रतिलिप्यधिकार का अतिलंघन होगा, अथवाट

                                (ख) जब कोई व्यक्ति उस कृति की अतिलंघनकारी प्रतियां-

(i) विक्रय या भाड़े के लिए बनाता है या विक्रीत करता है या भाड़े पर देता है, या व्यापार के तौर पर संप्रदर्शित करता है या विक्रय या भाड़े के लिए प्रतिस्थापित करता है, या

(ii) व्यापार के प्रयोजन के लिए इतने परिमाण में वितरित करता है जिससे प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, या

(iii) व्यापार के तौर पर सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करता है, या

(iv) भारत में आयात करता है ॥।

 [परंतु उपखंड (iv) की कोई बात, आयातकर्ता के निजी और घरेलू उपयोग के लिए, किसी कृति की एक प्रति के आयात को लागू नहीं होगी ।]

                स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए किसी साहित्यिक, नाट्य, संगीतात्मक या कलात्मक कृति से चलचित्र फिल्म के रूप में पुनरुत्पादन को अतिलंघनकारी प्रति" समझा जाएगा ।

52. कतिपय कार्यों का प्रतिलिप्यधिकार का अतिलंघन होना-(1) निम्नलिखित कार्यों से प्रतिलिप्यधिकार का अतिलंघन नहीं होगा, अर्थात्: -

 [(क) किसी कृति का, जो कम्प्यूटर प्रोग्राम नहीं है-

(i) प्राइवेट या निजी उपयोग, जिसके अंतर्गत अनुसंधान भी है;

(ii) उस कृति की या किसी अन्य कृति की समालोचना या समीक्षा;

(iii) सामयिक घटनाओं और सामयिक क्रियाकलापों की रिपोर्ट, जिसके अंतर्गत सार्वजनिक रूप से दिए गए किसी व्याख्यान की रिपोर्ट करना भी है,

के प्रयोजनों के लिए उचित प्रयोग ।

स्पष्टीकरण-इस खंड में वर्णित प्रयोजनों के लिए किसी इलैक्ट्रानिक माध्यम में किसी कृति के भंडारण जिसके अन्तर्गत किसी कम्प्यूटर प्रोग्राम का ऐसा आनुषंगिक भंडारण भी है, जो स्वतः उक्त प्रयोजनों के लिए अतिलंघनकारी प्रति नहीं है, से प्रतिलिप्यधिकार का अतिलंघन गठित नहीं होगा ।]

 [(कक) प्रतियां तैयार करना या किसी कम्प्यूटर प्रोग्राम का ऐसे कम्प्यूटर प्रोग्राम की किसी प्रति का विधिपूर्ण कब्जा रखने वाले व्यक्ति द्वारा, ऐसी प्रति से अनुकूलन-

(i) जिससे की कम्प्यूटर प्रोग्राम का उस प्रयोजन के लिए उपयोग किया जा सके जिसके लिए उसका प्रदाय किया गया था; या

(ii) जिससे कि कम्प्यूटर प्रोग्राम का केवल उस प्रयोजन के लिए, जिसके लिए उसका प्रदाय किया गया था, उपयोग किया जा सके, हानि, नुकसान या क्षति की बाबत एकमात्र अस्थायी संरक्षण के रूप में पूर्तिकर प्रति तैयार करना;]

 [(कख) किसी ऐसे कार्य का किया जाना, जो किसी कंप्यूटर प्रोग्राम का विधिपूर्ण कब्जा रखने वाले व्यक्ति द्वारा अन्य प्रोग्रामों के साथ स्वतंत्र रूप से सृजित कंप्यूटर प्रोग्राम की अंतः व्यवहार्यता का प्रचालन करने के लिए आवश्यक सूचना अभिप्राप्त करने के लिए आवश्यक है, परंतु यह तब जब कि ऐसी सूचना अन्यथा सुगमता से उपलब्ध नहीं है;

(कग) उन विचारों और सिद्धांतों को, जो ऐसे कृत्यों के लिए जिनके लिए कंप्यूटर प्रोग्राम का प्रदाय किया गया था, आवश्यक ऐसे कार्यों का निष्पादन करते समय, प्रोग्राम के किन्हीं तत्त्तवों पर बल दते हैं, अवधारित करने के लिए कंप्यूटर प्रोग्राम के कार्यकरण का संप्रेक्षण, अध्ययन या परीक्षण;

(कघ) गैर-वाणिज्यिक व्यक्तिगत उपयोग के लिए बैध रूप से वैयक्तिक तौर पर अभिप्राप्त प्रति से कंप्यूटर प्रोग्राम की प्रतियां तैयार करना या अनुकूलन];

3[(ख) सार्वजनिक रूप से इलैक्ट्रानिक पारेषण या संसूचित किए जाने की पूर्णतया तकनीकी प्रक्रिया के रूप में किसी कृति या प्रस्तुतीकरण का अस्थायी या आनुषंगिक भंडारण;

(ग) उन स्थानों पर जहां अधिकार धारक द्वारा इलैक्ट्रानिक लिंकों, पहुंच या एकीकरण को अभिव्यक्त रूप से प्रतिषिद्ध नहीं किया गया है, वहां जब तक उत्तरदायी व्यक्ति इस बात से अवगत नहीं है या उसके पास यह विश्वास करने के युक्तियुक्त आधार नहीं हैं कि ऐसा भंडारण किसी अतिलंघनकारी प्रति का है तब तक ऐसे लिंक, पहुंच या एकीकरण उपलब्ध कराने के प्रयोजन के लिए किसी कृति या प्रस्तुतीकरण का अस्थायी या आनुषंगिक भंडारण है:

परंतु यदि प्रति के भंडारण के लिए उत्तरदायी व्यक्ति को कृति में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी से लिखित शिकायत प्राप्त होती है, जिसमें इस बात की शिकायत हो कि ऐसा अस्थायी या आनुषंगिक भंडारण अतिलंघनकारी है, तो भंडारण के लिए उत्तरदायी ऐसा व्यक्ति इक्कीस दिन की अवधि तक अथवा तब तक ऐसी पहुंच को सुकर बनाने से विरत रहेगा जब तक कि उसे सक्षम न्यायालय से पहुंच को सुकर बनाने से विरत रहने संबंधी आदेश प्राप्त नहीं हो जाता और यदि कोई ऐसा आदेश इक्कीस दिन की ऐसी अवधि के अवसान के पूर्व प्राप्त नहीं होता है तो वह ऐसी पहुंच की सुविधा उपलब्ध कराना जारी रख सकेगा;

(घ) किसी न्यायिक कार्यवाही के प्रयोजन के लिए या न्यायिक कार्यवाही की रिपोर्ट के प्रयोजन के लिए किसी कृति का पुनरुत्पादन;

(ङ) किसी विधान-मंडल के सचिवालय द्वारा या जहां विधान-मंडल के दो सदन हों, वहां विधान-मंडल के किसी भी सदन के सचिवालय द्वारा तैयार की गई किसी कृति का अनन्य रूप से उस विधान-मंडल के सदस्यों के उपयोग के लिए पुनरुत्पादन या प्रकाशन;

(च) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अनुसार तैयार की गई या प्रदाय की गई किसी प्रमाणित प्रति में किसी कृति का पुनरुत्पादन;

(छ) किसी प्रकाशित साहित्यिक या नाट्य कृति से यथोचित उद्धारणों का जनता में पठन या सुपठन;

(ज) मुख्यतः प्रतिलिप्यधिकार रहित सामग्री के संकलन में, जो शिक्षा के उपयोग के लिए सद्भावपूर्वक आशयित हैं और जिसे शीर्षक में तथा प्रकाशक द्वारा या उसकी ओर से निकाले गए किसी विज्ञापन में इस प्रकार वर्णित किया गया है, प्रकाशित साहित्यिक या नाट्य कृतियों में, जो स्वयं में ऐसे उपयोग के लिए प्रकाशित नहीं हैं, जिनमें प्रतिलिप्यधिकार अस्तित्व में है लघु लेखांशों का प्रकाशन:

परंतु तब जब कि उसी रचियता की कृतियों में से उसी प्रकाशक द्वारा पांच वर्ष की किसी कालावधि के दौरान दो से अधिक ऐसे लेखांश प्रकाशित नहीं किए जाते हैं ।

स्पष्टीकरण-संयुक्त रचयिताओं की किसी कृति की दशा में, इस खंड में कृतियों से लेखांशों के प्रति निर्देशों के अंतर्गत उन लेखांशों के किसी एक या अधिक रचयिताओं की अथवा किसी अन्य व्यक्ति के सहयोग से उन रचयिताओं में से एक या अधिक रचयिताओं की कृतियों से लेखांशों के प्रति निर्देश आएंगे;

(झ) किसी कृति का-

                                (i) किसी शिक्षक या विद्यार्थी द्वारा प्रशिक्षण के अनुक्रम में पुनरुत्पादन; या

(ii) किसी परीक्षा में उत्तर दिए जाने वाले प्रश्नों के भागरूप पुनरुत्पादन; या

(iii) ऐसे प्रश्नों के उत्तरों में पुनरुत्पादन;

(ञ) किसी शिक्षा संस्था के क्रियाकलापों के अनुक्रम में, उस संस्था के कर्मचारिवृंद और छात्रों द्वारा किसी साहित्यिक, नाट्य या संगीतात्मक कृति का या किसी चलचित्र फिल्म या किसी ध्वन्यंकन का प्रस्तुतीकरण यदि दर्शक समूह ऐसे कर्मचारिवृंद और छात्रों, छात्रों के माता-पिता और संरक्षकों तथा उस संस्था के क्रियाकलापों से सम्बद्ध व्यक्तियों तक सीमित है अथवा किसी चलचित्र फिल्म या ध्वन्यंकन के ऐसे दर्शक समूह को संसूचित किया जाना;]

                                (ट) ध्वन्यंकन का, उसके उपयोग द्वारा, -

(i) ऐसे आवासिक परिसर में, निवासियों के सामान्य उपयोग के लिए तात्पर्यित किसी संलग्न कमरे या हॉल में (जो होटल या वैसा ही वाणिज्यिक स्थापन नहीं है) अनन्यतः या मुख्यतः वहां के निवासियों के लिए उपलब्ध कराई गई सुख-सुविधाओं के भाग के रूप में सार्वजनिक रूप से सुनवाना, या

(ii) किसी क्लब या वैसे ही संगठन के, जो लाभ के लिए स्थापित या संचालित नहीं है, क्रियाकलाप के भाग के रूप मं सार्वजनिक रूप से सुनवाना;]

(ठ) किसी अव्यवसायी क्लब या सोसाइटी द्वारा किसी साहित्यिक, नाट्य या संगीतात्मक कृति का प्रस्तुतीकरण, यदि ऐसा प्रस्तुतीकरण ऐसे दर्शकगण के समक्ष किया जाता है जो उसके लिए कोई संदाय नहीं करता या किसी धार्मिक संस्था के फायदे के लिए किया जाता है;

(ड) सामयिक, आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक या धार्मिक विषयों पर किसी लेख का किसी समाचारपत्र, पत्रिका या अन्य सामयिकी में पुनरुत्पादन, जब तक कि ऐसे लेख के रचयिता ने ऐसे पुनरुत्पादन का अधिकार अपने लिए अभिव्यक्त रूप से आरक्षित न कर लिया हो;

 [(ढ) परिरक्षण के लिए किसी गैर-वाणिज्यिक सार्वजनिक पुस्तकालय द्वारा इलैक्ट्रानिक साधनों द्वारा किसी माध्यम में किसी कृति का भंडारण यदि पुस्तकालय के पास पहले से ही कृति की गैर अंकीय प्रति है;]

(ण) किसी पुस्तक की (जिसके अन्तर्गत पुस्तिका, संगीतपत्रक, मानचित्र, चार्ट या रेखांक भी है), किसी 1[गैर-वाणिज्यिक सार्वजनिक पुस्तकालय] के भारसाधक व्यक्ति द्वारा या उसके निदेश के अधीन तीन से अनधिक प्रतियां उस पुस्तकालय के प्रयोग के लिए बनाना यदि ऐसी पुस्तक भारत में विक्रय के लिए उपलब्ध नहीं है;

(त) किसी ऐसे पुस्तकालय, संग्रहालय या अन्य संस्था में, जिसमें जनता की पहुंच है, रखी हुई किसी अप्रकाशित साहित्यिक, नाट्य या संगीतात्मक कृति का, अनुसंधान, या निजी अध्ययन के प्रयोजन के लिए अथवा प्रकाशन की दृष्टि से पुरुत्पादन:

परन्तु जहां किसी ऐसी कृति के रचयिता का या संयुक्त रचयिताओं की कृति की दशा में रचयिताओं में से किसी का वास्तविक परिचय, यथास्थिति, पुस्तकालय, संग्रहालय या अन्य संस्था को ज्ञात है वहां इस खंड के उपबंध केवल तभी लागू होंगे जब कि ऐसा पुनरुत्पादन, रचयिता की मृत्यु की तारीख से या संयुक्त रचयिताओं की कृति की दशा में उस रचयिता की, जिसका वास्तविक परिचय ज्ञात है मृत्यु से या यदि एक से अधिक रचयिताओं का वास्तविक परिचय ज्ञात है तो उनमें से ऐसे रचयिता की जिसकी मृत्यु सबसे अन्त में होती है, मृत्यु के  [60 वर्ष] से आगे किसी समय किया जाता है ;

(थ) निम्नलिखित का पुनरुत्पादन या प्रकाशन-

(i) किसी विधान-मंडल के अधिनियम से भिन्न कोई विषय जो किसी शासकीय राजपत्र में प्रकाशित किया गया है;

(ii) किसी विधान-मंडल का कोई अधिनियम इस शर्त के अध्यधीन कि ऐसे अधिनियम का पुनरुत्पादन या प्रकाशन उस पर किसी टीका-टिप्पणी या किसी अन्य मौलिक विषय के सहित किया जाता है;

(iii) सरकार द्वारा नियुक्त किसी समिति, आयोग, परिषद्, बोर्ड या वैसे ही किसी अन्य निकाय की रिपोर्ट यदि ऐसी रिपोर्ट विधान-मंडल के पटल पर रख दी गई है तब के सिवाय जब कि ऐसी रिपोर्ट का पुनरुत्पादन या प्रकाशन सरकार द्वारा प्रतिषिद्ध किया गया है;

(iv) किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य न्यायिक प्राधिकारी का कोई निर्णय या आदेश तब के सिवाय जबकि ऐसे निर्णय या आदेश का पुनरुत्पादन या प्रकाशन, यथास्थिति, ऐसे न्यायालय, अधिकरण या अन्य न्यायिक प्राधिकारी द्वारा प्रतिषिद्ध कर दिया गया है;

(द) किसी विधान-मंडल के अधिनियम और तद्धीन बनाए गए किन्हीं नियमों या आदेशों के किसी भारतीय भाषा में भाषान्तर का उत्पादन या प्रकाशन-

(i) यदि ऐसे अधिनियम या नियमों या आदेशों या उस भाषा में कोई भाषान्तर सरकार द्वारा पहले उत्पादित या प्रकाशित नहीं किया गया है; या

(ii) जहां ऐसे अधिनियम या नियमों या आदेशों का उस भाषा में कोई भाषान्तर सरकार द्वारा उत्पादित या प्रकाशित किया गया है, यदि वह भाषान्तर जनता में विक्रय के लिए उपलब्ध नहीं है;

परन्तु यह तब जबकि कि ऐसे भाषान्तर में किसी प्रमुख स्थान पर इस बात का कथन अन्तर्विष्ट है कि वह भाषान्तर सरकार द्वारा प्राधिकृत नहीं है या अधिप्रमाणित रूप में स्वीकृत नहीं है;

 [(ध) किसी वास्तुकृति का रंगचित्र, रेखाचित्र, उत्कीर्णन या फोटोग्राफ बनान या प्रकाशित करना अथवा किसी वास्तुकृति का संप्रदर्शन करना;

                (न) किसी मूर्ति या धारा 2 के खंड (ग) के उपखंड (iii) के अधीन आने वाली अन्य कलात्मक कृति का रंगचित्र, रेखाचित्र, उत्कीर्णन या फोटोग्राफ बनाना या प्रकाशित करना, यदि वह कृति किसी सार्वजनिक स्थान या किसी परिसर में, जिसमें जनता की पहुंच है, स्थायी रूप से स्थित है;

                                (प) किसी चलचित्र फिल्म में-

(i) किसी ऐसी कलात्मक कृति को सम्मिलित करना जो किसी सार्वजनिक स्थान या किसी अन्य परिसर में, जिसमें जनता की पहुंच है, स्थायी रूप से स्थित है; या

(ii) किसी अन्य कलात्मक कृति को सम्मिलित करना यदि ऐसे सम्मिलित किया जाना केवल पृष्ठभूमि के तौर पर है या उस फिल्म में प्रतिदर्शित मुख्य विषयों से अन्यथा प्रासंगिक है;

(फ) किसी कलात्मक कृति के रचयिता द्वारा, उस दशा में जिसमें ऐसी कृति का रचयिता उसमें प्रतिलिप्यधिकार का स्वामी नहीं है, किसी ऐसे सांचे, कास्ट, स्केच, रेखांक, माडल या अभ्यास रचना का प्रयोग, जो उसने उस कृति के प्रयोजन के लिए बनाए हों:

                                परन्तु यह तब जब कि वह उसके द्वारा उस कृति के मुख्य डिजाइन की पुनरावृत्ति या अनुकृति नहीं करता;

 [(ब) किसी उपयोगी युक्ति के किसी पूर्णरूप से क्रियाशील भाग के औद्योगिक उपयोजन के प्रयोजनों के लिए किसी तकनीकी रेखाचित्र जैसी किसी द्विआयामी कलात्मक कृति से त्रिआयामी वस्तु का बनाया जाना;]

                                 ।                                             ।                                              ।                                              ।                              ।

(भ) किसी भवन या संरचना का उन वस्तु रेखाचित्रों या रेखांकों के अनुसार पुनः सन्निर्माण जिसके अनुसार उस भवन या संरचना का मूलतः सन्निर्माण किया गया था:

परन्तु यह तब जब कि मूल सन्निर्माण ऐसे रेखाचित्रों और रेखांकों में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी की सम्मति या अनुज्ञा से बनाया गया था;

(म) किसी चलचित्र फिल्म में ध्वन्यंकित या पुनरुत्पादित किसी साहित्यिक [नाट्य, कलात्मक या] संगीतात्मक कृति के संबंध में, उसमें प्रतिलिप्यधिकार की अवधि की समाप्ति के पश्चात्, ऐसी फिल्म का प्रदर्शन:

परन्तु खंड (क) के उपखंड (ii), खंड (ख) के उपखंड (i) और खंड (घ), (च), (छ), (ड) और (त) के उपबंध किसी कार्य के संबंध में लागू नहीं होंगे जब तक कि उस कार्य के साथ ऐसी अभिस्वीकृति न हो जो-

(i) उस कृति की पहचान उसके शीर्षक या अन्य वर्णन से करती हो; और

(ii) उस दशा के सिवाय जिसमें वह कृति अनाम है या उस कृति का रचयिता इस बात के लिए पहले ही सहमत हो चुका है या उस बात की अपेक्षा कर चुका है कि उसका नाम अभिस्वीकार न किया जाए, उस रचयिता का परिचय भी देती हो;

 [(य) किसी प्रसारण संगठन द्वारा किसी ऐसी कृति का जिसके प्रसारण का उसे अधिकार है, अपने प्रसारण के लिए अपनी सुविधाओं का उपयोग करते हुए किसी प्रसारण संगठन द्वारा क्षणिक ध्वन्यंकन किया जाना, और उसके असाधारण दस्तावेजी स्वरूप के आधार पर पुरातत्वीय प्रयोजन के लिए ऐसे ध्वन्यंकन को प्रतिधारित रखना;

(यक) किसी वास्तविक धार्मिक संस्कार के अथवा केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा आयोजित किसी सरकारी समारोह के दौरान साहित्यिक, नाट्य या संगीतात्मक कृति का प्रस्तुतीकरण अथवा ऐसी कृति को या किसी ध्वन्यंकन को सार्वजनिक रूप से संसूचित करना;

स्पष्टीकरण-इस खण्ड के प्रयोजनों के लिए धार्मिक संस्कार के अन्तर्गत बारात और विवाह से संबंधित अन्य सामाजिक उत्सव है;]

1[(यख) (i) निःशक्त व्यक्तियों की कृतियों तक पहुच बनाने की सुकर बनाने के लिए, जिसके अंतर्गत किसी निःशक्त व्यक्ति की प्राइवेट या व्यक्तिगत प्रयोग, शैक्षणिक प्रयोजन या अनुसंधान के लिए ऐसे पहुंच योग्य रूपविधान में सहभागिता भी है, किसी व्यक्ति द्वारा; या

(ii) यदि सामान्य रूपविधान ऐसे व्यक्तियों द्वारा ऐसी कृतियों का उपयोग किए जाने को निवारित करता है, तो निःशक्त व्यक्तियों के फायदे के लिए कार्य कर रहे किसी संगठन द्वारा,

किसी कृति का किसी पहुंच योग्य रूपविधान में अनुकूलन, पुरुत्पादन करना, उसकी प्रतियों को उपलब्ध कराना या उसे सार्वजनिक रूप से संसूचित करना:

परन्तु यह और कि संगठन यह सुनिश्चित करेगा कि कृतियों की प्रतियों का प्रयोग ऐसे पहुंच योग्य रूपविधान में केवल निःशक्य व्यक्तियों द्वारा किया जाए और इसकी प्रविष्टि का कारबार के साधारण माध्यमों में निवारण करने के लिए युक्तियुक्त उपाय किए जाएं:

परन्तु तब जब कि निःशक्त व्यक्तियों को कृतियों की प्रतियां ऐसे पहुंच योग्य रूप विधान में लाभ निरपेक्ष आधार पर उपलब्ध करवाई जाए, किन्तु उनसे उत्पादन का कर्ज वसूल किया जाएं ।

स्पष्टीकरण-इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए किसी संगठन" के अंतर्गत आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 45) की धारा 12क के अधीन रजिस्ट्रीकृत और निःशक्त व्यक्तियों के फायदे के लिए कार्यरत या निःशक्त व्यक्तियों (समान अवसर, अधिकार संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 (1956 का 1) के अध्याय 10 के अधीन मान्यताप्राप्त अथवा निःशक्त व्यक्तियों तक पहुंच को सुकर बनाने के लिए सरकार से अनुदान प्राप्त करने वाला कोई संगठन या सरकार द्वारा मान्यताप्राप्त कोई शिक्षा संस्था या पुस्तकालय या अभिलेखागार भी है;

(यग) लेबल, कंपनी लोगो या संवर्धनकारी या स्पष्टीकारक सामग्री जैसी ऐसी किसी साहित्यिक या कलाकृति की प्रतियों का आयात किया जाना, जो पूर्णतया विधिपूर्वक आयात किए जा रहे अन्य माल या उत्पादों के आनुषंगिक है ।]

(2) उपधारा (1) के उपबन्ध किसी साहित्यिक, नाट्य या संगीतात्मक कृति के भाषान्तर के या किसी साहित्यिक, नाट्य, संगीतात्मक या कलात्मक कृति के अनुकूलन के सम्बन्ध में किसी कार्य के लिए किए जाने को ऐसे ही लागू होंगे जैसे वे स्वयं उस कृति के सम्बन्ध में लागू होते हैं ।

 [52क.  [ध्वन्यंकन] और वीडियो फिल्मों में सम्मिलित की जाने वाली विशिष्टियां-(1) कोई व्यक्ति, किसी कृति की बाबत किसी 2[ध्वन्यंकन] को तभी प्रकाशित करेगा जब 2[ध्वन्यंकन] में और उसके आधान में निम्नलिखित विशिष्टियां संप्रदर्शित की जाती हैं, अर्थात्: -

(क) उस व्यक्ति का नाम और पता जिसने 2[ध्वन्यंकन] बनाया है;

(ख) ऐसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी का नाम और पता; और

(ग) उसके प्रथम प्रकाशन का वर्ष ।

(2) कोई व्यक्ति, किसी कृति की बाबत किसी वीडियो फिल्म को तभी प्रकाशित करेगा जब वीडियो फिल्म में, जब वह प्रदर्शित की जाए, और वीडियो कैसेट में या उसके आधान में निम्नलिखित विशिष्टियां संप्रदर्शित की जाती हैं, अर्थात्: -

(क) यदि ऐसी कृति कोई ऐसी चलचित्र फिल्म है जो प्रदर्शन के लिए चलचित्र अधिनियम, 1952 (1952 का 37) के उपबन्धों के अधीन प्रमाणित की जानी अपेक्षित है, तो ऐसी कृति की बाबत उस अधिनियम की धारा 5क के अधीन फिल्म प्रमाणीकरण बोर्ड द्वारा अनुदत्त प्रमाणपत्र की प्रति;

(ख) ऐसे व्यक्ति का नाम और पता जिसने वीडियो फिल्म बनाई है और उसके द्वारा यह घोषणा कि उसने ऐसी वीडियो फिल्म बनाने के लिए ऐसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी से आवश्यक अनुज्ञप्ति या उसकी सहमति प्राप्त कर ली है; और

(ग) ऐसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी का नाम और पता ।]

                 ।                                             ।                                              ।                                              ।                                              ।

[53. अतिलंघनकारी प्रतियों का आयात-(1) इस अधिनियम द्वारा किसी कृति या ऐसी कृति में सन्निविष्ट किसी प्रस्तुतीकरण की बाबत प्रदत्त किसी अधिकार का स्वामी या उसका सम्यक् रूप से प्राधिकृत अभिकर्ता सीमाशुल्क आयुक्त या केन्द्रीय उत्पाद-शुल्क और सीमाशुल्क बोर्ड द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी को लिखित में यह सूचना दे सकेगा कि, -

                                (क) वह उक्त अधिकार का, उसके सबूत सहित स्वामी है; और

(ख) वह आयुक्त से यह अनुरोध करता है कि सूचना में विनिर्दिष्ट अवधि के लिए, जो एक वर्ष से अधिक की नहीं होगी, कृति की अतिलंघनकारी प्रतियों को प्रतिषिद्ध माल के रूप में माना जाए और यह कि कृति की ऐसी अतिलंघनकारी प्रतियां सूचना में विनिर्दिष्ट समय और स्थान पर भारत में आने की प्रत्याशा है ।

                (2) आयुक्त, अधिकार के स्वामी द्वारा दिए गए साक्ष्य की संवीक्षा करने और इस बात का समाधान किए जाने के पश्चात्, उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, कृति की उन अतिलंघनकारी प्रतियों को प्रतिषिद्ध माल मान सकेगा, जो अभिवहन में के माल को छोड़कर, भारत में, आयात किया जा चुका है:

                परंतु यह तब जबकि कृति का स्वामी डेमरेज, भंडारण की लागत और कृतियों के अतिलंघनकारी न पाए जाने की दशा में आयातकर्ता को प्रतिकर दिए जाने संबंधी सम्भावित व्ययों को ध्यान में रखते हुए, प्रतिभूति के रूप में ऐसी राशि, जिसकी आयुक्त अपेक्षा करे, जमा करा देता है ।

(3) जब ऐसे किसी माल को, जिसे उपधारा (2) के अधीन प्रतिषिद्ध माल माना गया है, निरुद्ध कर लिया गया है तो उसे निरुद्ध करने वाला सीमाशुल्क अधिकारी आयातकर्ता को और उस व्यक्ति को, जिसने उपधारा (1) के अधीन सूचना दी है, ऐसे माल के निरुद्ध किए जाने की, उसके निरुद्ध किए जाने के अड़तालीस घंटें के भीतर जानकारी देगा ।

(4) यदि वह व्यक्ति, जिसने उपधारा (1) के अधीन सूचना दी है, अधिकारिता रखने वाले किसी न्यायालय का, ऐसे माल के अस्थायी या स्थायी व्ययन के बारे में उसको निरुद्ध किए जाने की तारीख से चौदह दिन के भीतर, कोई आदेश प्रस्तुत नहीं करता है, तो सीमाशुल्क अधिकारी उस माल का छोड़ देगा और उस माल को आगे प्रतिषिद्ध माल नहीं माना जाएगा ।]

 [53क. मूल प्रतियों के पुनः विक्रय अंश का अधिकार-(1) किसी रंगचित्र, मूर्ति या रेखाचित्र की मूल प्रति के अथवा किसी साहित्यिक या नाट्यकृति या संगीतात्मक कृति की मूल पांडुलिपि के दस हजार रुपए से अधिक कीमत पर पुनः विक्रय की दशा में, ऐसयी कृति का रचयिता, यदि वह धारा 17 के अधीन प्रतिलिप्यधिकार का प्रथम स्वामी था या उसके विधिक वारिस, ऐसी कृति में, प्रतिलिप्यधिकार के किसी समनुदेशन के होते हुए भी, इस धारा के उपबन्धों के अनुसार, ऐसी मूल प्रति या पांडुलिपि के पुनः विक्रय की कीमत में अंश प्राप्त करने के अधिकारी होंगे :

परन्तु ऐसा अधिकार, कृति में प्रतिलिप्यधिकार, की अवधि की समाप्ति पर अस्तित्व में नहीं रहेगा ।

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट अंश ऐसा होगा जो प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड नियत करे और इस निमित्त प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड का विनिश्चय अन्तिम होगा:

परन्तु प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड, कृति के भिन्न-भिन्न वर्गों के लिए भिन्न-भिन्न अंश नियत कर सकेगा:

परन्तु यह और कि किसी भी दशा में ऐसा अंश पुनः विक्रय की कीमत के दस प्रतिशत से अधिक नहीं होगा ।

(3) यदि इस धारा द्वारा प्रदत्त अधिकार के सम्बन्ध में कोई विवाद उत्पन्न होता है तो वह प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को निर्देशित किया जाएगा और जिसका विनिश्चय अन्तिम होगा ।]

अध्याय 12

सिविल उपचार

54. परिभाषा-इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए, जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो प्रतिलिप्यधिकार का स्वामी" पद के अन्तर्गत निम्नलिखित भी होंगे-

                (क) कोई अनन्य अनुज्ञप्तिधारी;

(ख) किसी अनाम या छद्मनाम वाली साहित्यिक, नाट्य, संगीतात्मक या कलात्मक कृति की दशा में उस कृति का प्रकाशक जब तक कि रचयिता का वास्तविक परिचय अथवा ऐसी किसी अनाम संयुक्त रचयिताओं की कृति या ऐसे नामों से प्रकाशित जो सब छद्मनाम हों संयुक्त रचयिताओं की कृति की दशा में रचयिताओं में से किसी का वास्तविक परिचय रचयिता और प्रकाशक द्वारा सार्वजनिक रूप से ज्ञात नहीं कर दिया जाता या अन्यथा उस रचयिता या उसके विधिक प्रतिनिधियों द्वारा प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को समाधानप्रद रूप में सिद्ध नहीं कर दिया जाता ।

55. प्रतिलिप्यधिकार के अतिलंघन के लिए सिविल उपचार-(1) जहां किसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार का अतिलंघन किया गया हो वहां प्रतिलिप्यधिकार का स्वामी, इस अधिनियम द्वारा अन्यथा उपबंधित के सिवाय व्यादेश, नुकसानी हिसाब पाने या अन्यथा सब ऐसे उपचारों का हकदार होगा जैसे अधिकार के अतिलंघन के लिए विधि द्वारा प्रदत्त हों या किए जाए ंः

परन्तु यदि प्रतिवादी साबित कर दे कि अतिलंघन की तारीख को उसे यह ज्ञात नहीं था और उसके पास यह विश्वास करने का कोई युक्तियुक्त आधार नहीं था कि उस कृति में प्रतिलिप्यधिकार अस्तित्व में है तो वादी अतिलंघन की बाबत व्यादेश और अतिलंघनकारी प्रतियों के विक्रय से प्रतिवादी को प्राप्त सम्पूर्ण लाभों की या उनके किसी भाग की जैसा कि न्यायालय उन परिस्थितियों में उचित समझे, डिक्री से भिन्न किसी उपचार का हकदार नहीं होगा ।

(2) जहां किसी साहित्यिक, नाट्य, संगीतात्मक या कलात्मक कृति  [या, धारा 13 की उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, चलचित्र फिल्म या ध्वन्यंकन की दशा में, कोई नाम, जो, यथास्थिति, उस कृति के रचयिता या प्रकाशक का नाम होना तात्पर्यित है] यथा प्रकाशित कृति की प्रतियों में दर्शित है अथवा किसी कलात्मक कृति की दशा में, जब वह बनाई गई थी उसमें दर्शित था वहां उस व्यक्ति के बारे में, जिसका नाम ऐसे दर्शित है या था, ऐसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार के अतिलंघन से सम्बन्धित किसी कार्यवाही में, जब तक तत्प्रतिकूल साबित नहीं कर दिया जाता, यह उपधारित किया जाएगा कि वह, यथास्थिति, उस कृति का रचयिता या प्रकाशक है ।

(3) प्रतिलिप्यधिकार के अतिलंघन की बाबत किन्हीं कार्यवाहियों में सब पक्षकारों के खर्चे न्यायालय के विवेकानुसार निर्णीत होंगे ।

56. पृथक् अधिकारों का संरक्षण-इस अधिनियम के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए जहां किसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार समाविष्ट करने वाले विभिन्न अधिकारों के स्वामी विभिन्न व्यक्ति हों वहां ऐसे किसी अधिकार का स्वामी उस अधिकार के विस्तार तक उन उपचारों का हकदार होगा जो इस अधिनियम द्वारा उपबन्धित है और ऐसे अधिकार को व्यक्तिगत रूप से, किसी वाद, अनुयोजन या अन्य कार्यवाही द्वारा, किसी अन्य अधिकार के स्वामी को उस वाद, अनुयोजन या कार्यवाही में पक्षकार बनाए बिना, प्रवर्तित करा सकेगा ।

57. रचयिता के विशेष अधिकार- [(1) रचयिता के प्रतिलिप्यधिकार से पृथक् रूप में और उक्त प्रतिलिप्यधिकार के पूर्णतः या भागतः समनुदेशन के पश्चात् भी, किसी कृति के रचयिता को, -

                (क) उस कृति का रचयिता होने का दावा करने का; और

(ख) उक्त कृति के किसी विरूपण, विकृत किए जाने और उपांतरण या उक्त कृति के सम्बन्ध में किसी अन्य कार्य को, ॥। यदि ऐसे विरूपण, विकृत किए जाने उपांतरण या अन्य कार्य से उसकी प्रतिष्ठा या ख्याति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, अवरुद्ध करने या उनके बारे में, नुकसानी का दावा करने का, अधिकार होगा:

                परन्तु रचयिता को ऐसे कम्प्यूटर कार्यक्रम के किसी अनुकूलन को, जिसे धारा 52 की उपधारा (1) का खंड (कक) लागू होता है, अवरुद्ध करने या उसके बारे में नुकसानी का दावा करने का कोई अधिकार नहीं होगा ।

स्पष्टीकरण-किसी कृति के संप्रदर्शन करने में या रचयिता के समाधानप्रद रूप में उसका संप्रदर्शन करने में असफलता, इस धारा द्वारा प्रदत्त अधिकारों का अतिलंघन नहीं माना जाएगा ।]

(2) उपधारा (1) द्वारा किसी कृति के रचयिता को प्रदत्त कोई अधिकार, 2॥। उस रचयिता के विधिक प्रतिनिधियों द्वारा भी प्रयुक्त किया जा सकेगा ।

58. अतिलंघनकारी प्रतियों पर कब्जा रखने वाले या उनका व्यौहार करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध स्वामी के अधिकार-किसी कृति की, जिसमें प्रतिलिप्यधिकार अस्तित्व में है, अतिलंघनकारी सब प्रतियां और ऐसी अतिलंघनकारी प्रतियों को बनाने में प्रयुक्त किए जाने के लिए आशयित सब प्लेटें, प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी की सम्पत्ति समझी जाएंगी, जो उनका कब्जा पाने के लिए या उनके संपरिवर्तन के सम्बन्ध में तद्नुसार कार्यवाही कर सकेगा:

परन्तु प्रतिलिप्यधिकार का स्वामी किन्हीं अतिलंघनकारी प्रतियों के संपरिवर्तन के सम्बन्ध में किसी उपचार का हकदार नहीं होगा, यदि विपक्षी साबित कर दे कि-

(क) उसे यह ज्ञात नहीं था और उसके पास यह विश्वास करने का युक्तियुक्त आधार नहीं था कि उस कृति में जिसकी ऐसी प्रतियां अतिलंघनकारी प्रतियां होनी अभिकथित हैं, प्रतिलिप्यधिकार अस्तित्व में था; अथवा

(ख) उसके पास यह विश्वास करने के युक्तियुक्त आधार थे कि ऐसी प्रतियों या प्लेटों से किसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार का अतिलंघन नहीं होता ।

59. वास्तु कलाकृतियों की दशा में उपचारों पर निर्बंधन-(1) [विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 (1963 का 47)] में किसी बात के होते हुए भी जहां किसी ऐसे भवन या अन्य संरचना का सन्निर्माण, जिससे किसी अन्य कृति में प्रतिलिप्यधिकार का अतिलंघन होता है या यदि सन्निर्माण पूरा हो गया तो अतिलंघन होगा, आरंभ कर दिया गया है वहां प्रतिलिप्यधिकार का स्वामी ऐसे भवन या संरचना के सन्निर्माण को अवरुद्ध करने के लिए अथवा उसे गिराने के आदेश के लिए व्यादेश प्राप्त करने का हकदार नही होगा ।

(2) धारा 58 की कोई बात किसी ऐसे भवन या अन्य संरचना के सन्निर्माण की बाबत लागू नहीं होगी जो किसी अन्य कृति में प्रतिलिप्यधिकार का अतिलंघन करता है या यदि सन्निर्माण पूरा कर लिया गया तो अतिलंघन करेगा ।

60. विधिक कार्यवाहियों की निराधार धमकी की दशा में उपचार-जहां किसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार का स्वामी होने का दावा करने वाला कोई व्यक्ति, किसी अन्य व्यक्ति को प्रतिलिप्यधिकार के अभिकथित अतिलंघन की बाबत किन्हीं विधिक कार्यवाहियों या उनकी बाबत दायित्व की धमकी परिपत्रों, विज्ञापनों द्वारा या अन्यथा देता है वहां उस द्वारा व्यथित कोई व्यक्ति  [विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 (1963 का 47) की धारा 34 में] किसी बात के होते हुए भी ऐसा घोषणात्मक वाद ला सकेगा कि अभिकथित अतिलंघन जिससे धमियां सम्बन्धित हैं, वास्तव में ऐसी धमकियां देने वाले व्यक्ति के किन्हीं विधिक अधिकारों का अतिलंघन नहीं था और ऐसे किसी वाद में-

                (क) ऐसी धमकियों के जारी रहने के विरुद्ध व्यादेश प्राप्त कर सकेगा; और

(ख) ऐसी नुकसानी, यदि कोई हो, जो उसने ऐसी धमकियों के कारण उठाई हो, वसूल कर सकेगा:

                परन्तु यह धारा लागू नहीं होगी यदि ऐसी धमकियां देने वाला व्यक्ति अपने द्वारा, दावाकृत प्रतिलिप्यधिकार के अतिलंघन के लिए कार्यवाही सम्यक् तत्परता से प्रारम्भ कर देता है और चलाता है ।

61. प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी का कार्यवाहियों में पक्षकार होना-(1) प्रतिलिप्यधिकार के अतिलंघन की बाबत किसी अनन्य अनुज्ञप्तिधारी द्वारा संस्थित प्रत्येक सिविल वाद या अन्य कार्यवाही में, प्रतिलिप्यधिकार का स्वामी, जब तक कि न्यायालय अन्यथा निदेश न दे, एक प्रतिवादी बनाया जाएगा और जहां ऐसा स्वामी प्रतिवादी बनाया जाता है वहां उसे अनन्य अनुज्ञप्तिधारी के दावे का विरोध करने का अधिकार होगा ।

(2) जहां प्रतिलिप्यधिकार के अतिलंघन की बाबत किसी अनन्य अनुज्ञप्तिधारी द्वारा संस्थित कोई सिविल वाद या अन्य कार्यवाही सफल हो जाती है वहां उसी वाद हेतुक की बाबत कोई नया वाद या अन्य कार्यवाही प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी की ओर से नहीं होगी ।

62. इस अध्याय के अधीन उत्पन्न होने वाले विषयों पर न्यायालय की अधिकारिता-(1) किसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार के अतिलंघन या इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त किसी अन्य अधिकार के अतिलंघन की बाबत इस अध्याय के अधीन उत्पन्न होने वाला प्रत्येक वाद या अन्य सिविल कार्यवाही, अधिकारिता रखने वाले जिला न्यायालय में लाई जाएगी ।

(2) सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में  किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए अधिकारिता रखने वाले जिला न्यायालय" के अन्तर्गत, ऐसा जिला न्यायालय होगा जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अन्दर, उस वाद या अन्य कार्यवाही के लाए जाने के समय वह व्यक्ति जो वह वाद या अन्य कार्यवाही लाया था अथवा जहां एक से अधिक ऐसे व्यक्ति हों वहां उसमें से कोई वास्तव में और स्वेच्छया निवास करता है या कारबार चलाता है अथवा अभिलाभ के लिए वैयक्तिक रूप से काम करता है ।

अध्याय 13

अपराध

63. प्रतिलिप्यधिकार या इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त अन्य अधिकारों के अतिलंघन का अपराध-कोई व्यक्ति जो-

                (क) किसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार का, या

                (ख) [धारा 53क द्वारा प्रदत्त अधिकार को छोड़कर] इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त किसी अन्य अधिकार का,

जानबूझकर अतिलंघन करेगा या अतिलंघन दुष्प्रेरित करेगा, [वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास से कम की नहीं होगी किन्तु तीन वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से, जो पचास हजार रुपए से कम का नहीं होगा किन्तु दो लाख रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा:

                परन्तु 1[जहां ऐसा अतिलंघन, व्यापार या कारबार के अनुक्रम में अभिलाभ के लिए नहीं किया जाता है वहां] न्यायालय, ऐसे पर्याप्त और विशेष कारणों से जो निर्णय में उल्लिखित किए जाएंगे, छह मास से कम की किसी अवधि के कारावास का दंडादेश दे सकेगा या पचास हजार रुपए से कम का जुर्माना अधिरोपित कर सकेगा ।]            

                स्पष्टीकरण-किसी भवन या अन्य संरचना का सन्निर्माण, जो किसी अन्य कृति में प्रतिलिप्यधिकार का अतिलंघन करता है या यदि पूरा कर लिया जाए तो अतिलंघन करेगा, इस धारा के अधीन अपराध नहीं होगा ।

 [63क. द्वितीय और पश्चात्वर्ती दोषसिद्धियों के संबंध में वर्धित शास्ति-जो कोई धारा 63 के अधीन किसी अपराध का सिद्धदोष ठहराया जाने पर ऐसे अपराध का पुनः सिद्धदोष ठहराया जाएगा वह द्वितीय और प्रत्येक पश्चात्वर्ती अपराध के लिए कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु तीन वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से, जो एक लाख रुपए से कम का नहीं होगा किन्तु दो लाख रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा:

परन्तु [जहां ऐसा अतिलंघन व्यापार या कारबार के अनुक्रम में अभिलाभ के लिए नहीं किया जाता है, वहां] न्यायालय, ऐसे पर्याप्त और विशेष कारणों से जो निर्णय में उल्लिखित किए जाएंगे, एक वर्ष से कम की अवधि के कारावास का दंडादेश दे सकेगा या एक लाख रुपए से कम का जुर्माना अधिरोपित कर सकेगा:

परन्तु यह और कि इस खण्ड के प्रयोजनों के लिए, प्रतिलिप्यधिकार (संशोधन) अधिनियम, 1984 के प्रारम्भ से पहले की किसी दोषसिद्धि का कोई संज्ञान नहीं लिया जाएगा ।]

 [63ख. कम्प्यूटर प्रोग्राम की अतिलंघनकारी प्रति के जानबूझकर किए गए उपयोग का अपराध होना-जो कोई व्यक्ति, किसी कम्प्यूटर प्रोग्राम की अतिलंघनकारी प्रति का कम्प्यूटर पर जानबूझकर उपयोग करेगा वह कारावास से, जिसकी अवधि सात दिन से कम की नहीं होगी किन्तु तीन वर्ष तक हो सकेगी, और जुर्माने से, जो पचास हजार रुपए से कम का नहीं होगा किन्तु दो लाख रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा:

परन्तु जहां कम्प्यूटर प्रोग्राम का उपयोग किसी अभिलाभ के लिए अथवा व्यापार या कारबार के अनुक्रम में नहीं किया है वहां न्यायालय, ऐसे पर्याप्त और विशेष कारणों से, जो निर्णय में उल्लिखित किए जाएंगे कारावास का कोई दण्डादेश अधिरोपित नहीं कर सकेगा और ऐसा जुर्माना, जो पचास हजार रुपए तक का हो सकेगा, अधिरोपित कर सकेगा ।]

64. अतिलंघनकारी कृतियां अभिगृहीत करने की पुलिस की शक्ति- [(1) यदि किसी पुलिस अधिकारी का जो उप-निरीक्षक की पंक्ति से नीचे का न हो, यह समाधान हो जाता है कि किसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार के अतिलंघन की बाबत धारा 63 के अधीन कोई अपराध किया गया है, किया जा रहा है या किया जाना संभाव्य है तो वह उस कृति की उन सभी प्रतियों को और उन सभी प्लेटों को, जो कृति की अतिलंघनकारी प्रतियां बनाने के प्रयोजन के लिए प्रयुक्त की जाती हैं, जहां भी वे पाई जाएं, वारंट के बिना अभिगृहीत कर सकेगा और इस प्रकार अभिगृहीत सभी प्रतियां और प्लेटें, यथासाध्य शीघ्रता से, मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश की जाएंगी ।]

(2) उपधारा (1) के अधीन अभिगृहीत किसी कृति की किन्हीं प्रतियों [या प्लेटों] में हित रखने वाला कोई व्यक्ति, ऐसे अभिग्रहण से पन्द्रह दिन के अन्दर, ऐसी प्रतियों 2[या प्लेटों] के उसको लौटाए जाने के लिए मजिस्ट्रेट से आवेदन कर सकेगा और मजिस्ट्रेट, आवेदक और परिवादी को सुनने तथा ऐसी अतिरिक्त जांच जैसी आवश्यक हो, करने के पश्चात् आवेदन पर ऐसा आदेश देगा जैसा वह ठीक समझे ।

65. अतिलंघनकारी प्रतियां बनाने के प्रयोजन के लिए प्लेटों पर कब्जा-कोई व्यक्ति जो किसी ऐसी कृति की, जिसमें प्रतिलिप्यधिकार अस्तित्व में है अतिलंघनकारी प्रतियां बनाने के प्रयोजन के लिए जानबूझकर कोई प्लेट बनाएगा या अपने कब्जे में रखेगा, वह कारावास से, [जो दो वर्ष तक का हो सकेगा, और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा] ।

 [65क. प्रौद्योगिक उपायों का संरक्षण-(1) ऐसा कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त अधिकारों में से किसी अधिकार के संरक्षण के प्रयोजन के लिए, उपयोजित प्रभावी प्रौद्योगिक उपायों की, ऐसे अधिकारों का अतिलंघन करने के आशय से, परिवंचना करेगा, कारावास से, जो दो वर्ष तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा और जुर्माना के लिए भी दंडनीय होगा ।

(2) उपधारा (1) की कोई बात किसी व्यक्ति को, -

(क) ऐसे किसी प्रयोजन के लिए, जो इस अधिनियम द्वारा अभिव्यक्त रूप से प्रतिषिद्ध नहीं है उसमें निर्दिष्ट किसी बात को करने से निवारित नहीं करेगी:

परंतु ऐसा कोई व्यक्ति, जो ऐसे किसी प्रयोजन के लिए किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किसी प्रौद्योगिक उपाय की परिवंचना को सुकर बनाता है, ऐसे अन्य व्यक्ति का सम्पूर्ण अभिलेख रखेगा, जिसके अंतर्गत उसका नाम, पता और वे सभी सुसंगत विशिष्टियां, जो उसकी पहचान के लिए आवश्यक हों और वह प्रयोजन, जिसके लिए उसे सुकर बनाया गया है, हो; या

(ख) ऐसी कोई बात करने से निवारित नहीं करेगी जो विधिमान्य रूप से अभिप्राप्त किसी कूटकृत प्रति का प्रयोग करते हुए कूटकरण अनुसंधान करने के लिए आवश्यक हों; या

(ग) कोई विधिपूर्ण अन्वेषण करने से निवारित नहीं करेगी; या

(घ) ऐसी कोई बात करने से निवारित नहीं करेगी, जो किसी कम्प्यूटर प्रणाली या किसी कम्प्यूटर नेटवर्क की, उसके स्वामी के प्राधिकार से सुरक्षा की जांच करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक हो; या

(ङ) प्रचालन से निवारित नहीं करेगी; या

(च) ऐसी कोई बात करने से निवारित नहीं करेगी, जो किसी उपयोक्ता की पहचान या निगरानी के लिए आशयित प्रौद्योगिक उपायों की परिवंचना करने के लिए आवश्यक हो; या

(छ) राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में आवश्यक उपाय करने से निवारित नहीं करेगी ।

65ख. अधिकारप्रबन्धन सूचना का संरक्षण-ऐसा कोई व्यक्ति, जो जानबूझकर, -

(i) प्राधिकार के बिना, किसी अधिकार प्रबंधन सूचना को हटाता या परिवर्तित करता है; या

(ii) प्राधिकार के बिना, किसी कृति या प्रस्तुतीकरण की प्रतियां, यह जानते हुए कि इलैक्ट्रानिक अधिकार प्रबंधन सूचना को प्राधिकार के बिना हटा दिया गया है या परिवर्तित कर दिया गया है, वितरित करेगा, वितरित किए जाने के लिए आयात करेगा, सार्वजनिक रूप से प्रसारित या संसूचित करेगा,

वह कारावास से, जो दो वर्ष तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा:

                परंतु यदि अधिकार प्रबंधन सूचना से किसी कृति में छेड़छाड की गई है, तो ऐसी कृति के प्रतिलिप्यधिकार का स्वामी भी ऐसे कृत्यों में लिप्त व्यक्तियों के विरुद्ध अध्याय 12 के अधीन उपबंधित सिविल उपचारों का लाभ उठा सकेगा ।]

66. अतिलंघनकारी प्रतियों का या अतिलंघनकारी प्रतियां बनाने के प्रयोजन के लिए प्लेटों का व्ययन-इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का विचारण करने वाला न्यायालय, चाहे अभिकथित अपराधी सिद्धदोष हुआ हो या न हुआ हो, यह आदेश दे सकेगा कि अभिकथित अपराधी के कब्जे में की कृति की सब प्रतियां या सब प्लेटें जो उसे अतिलंघनकारी प्रतियां या अतिलंघनकारी प्रतियां बनाने के प्रयोजन के लिए प्लेटें प्रतीत हों प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी को दे दी जाएं  [या ऐसी प्रतियों या प्लेटों के व्ययन के संबंध में ऐसा आदेश दे सकेगा जो वह उचित समझे] ।

67. रजिस्टर आदि में मिथ्या प्रविष्टियां करने, मिथ्या प्रविष्टियां पेश करने या देने के लिए शास्ति-कोई व्यक्ति जो-

(क) इस अधिनियम के अधीन रखे गए प्रतिलिप्यधिकारों के रजिस्टर में कोई मिथ्या प्रविष्टि करेगा या कराएगा, या

(ख) ऐसा लेख बनाएगा या बनवाएगा जिसका ऐसे रजिस्टर में किसी प्रविष्टि का नकल होना मिथ्या रूप से तात्पर्यित हो, या

(ग) किसी ऐसी प्रविष्टि या लेख को, उसका मिथ्या होना जानते हुए, साक्ष्य के रूप में पेश करेगा या पेश कराएगा अथवा देगा या दिलवाएगा,

वह कारावास से, जो एक वर्ष तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, अथवा दोनों से, दंडनीय होगा ।

68. किसी प्राधिकारी या अधिकारी को प्रवंचित करने या उस पर असर डालने के प्रयोजन में मिथ्या कथन करने के लिए शास्ति-कोई व्यक्ति जो-

                                (क) इस अधिनियम के उपबन्धों के निष्पादन में किसी प्राधिकारी या अधिकारी को प्रवंचित करने की दृष्टि से, या

(ख) इस अधिनियम या तद्धीन किसी विषय के सम्बन्ध में किसी बात के किए जाने या उसके लोप का उपापन करने या उस पर असर डालने की दृष्टि से,

कोई मिथ्या कथन या व्यपदेशन यह जानते हुए करेगा कि वह मिथ्या है, वह कारावास से, जो एक वर्ष तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, अथवा दोनों से, दंडनीय होगा ।

[68क. धारा 52के उल्लंघन के लिए शास्ति-कोई व्यक्ति जो धारा 52क के उपबन्धों के उल्लंघन में कोई ध्वन्यंकन या वीडियो फिल्म प्रकाशित करेगा, कारावास से, जो तीन वर्ष तक का हो सकेगा, और जुर्माने से भी, दण्डनीय होगा ।]

69. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया हो वहां हर व्यक्ति, जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था, और साथ ही वह कम्पनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे तथा तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे:

परन्तु इस उपधारा की कोई बात ऐसे किसी व्यक्ति को दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर दे कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था, या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया हो तथा यह साबित हो कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सम्मति या मौनानुकूलता से किया गया है, या उसकी किसी उपेक्षा के कारण हुआ माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा तथा तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-

(क) कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यक्तियों का अन्य संगम भी है; तथा

(ख) फर्म के सम्बन्ध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।

 

 

70. अपराधों का संज्ञान-इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का विचारण [महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेटट से अवर न्यायालय नहीं करेगा ।

अध्याय 14

अपीलें

71. मजिस्ट्रेट के कतिपय आदेशों के विरुद्ध अपीलें-धारा 64 की उपधारा (2) या धारा 66 के अधीन किए गए किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति ऐसे आदेश की तारीख से तीस दिन के अन्दर उस न्यायालय को अपील कर सकेगा जिसको कि आदेश देने वाले न्यायालय से अपीलें मामूली तौर से की जाती हैं, और ऐसा अपील न्यायालय निदेश दे सकेगा कि अपील के निपटारे के लम्बित रहने तक आदेश का निष्पादन रोक रखा जाए ।

72. प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार और प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड के आदेशों के विरुद्ध अपीलें-(1) प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार के किसी अन्तिम विनिश्चय या आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति ऐसे आदेश या विनिश्चय की तारीख से तीन मास के अन्दर प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को अपील कर सकेगा ।

(2) प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड के किसी ऐसे अन्तिम विनिश्चय या आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति जो उपधारा (1) के अधीन अपील में दिया गया विनिश्चय या आदेश न हो, ऐसे विनिश्चय या आदेश की तारीख से तीन मास के अन्दर उस उच्च न्यायालय को अपील कर सकेगा जिसकी अधिकारिता के अन्दर अपीलार्थी वास्तव में और स्वेच्छया निवास करता है या कारबार चलाता है अथवा अभिलाभ के लिए वैयक्तिक रूप से कार्य करता है :

परन्तु धारा 6 के अधीन प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड के विनिश्चय के विरुद्ध कोई ऐसी अपील नहीं होगी ।

(3) इस धारा के अधीन अपील के लिए उपबन्धित तीन मास की कालावधि परिकलित करने में वह समय अपवर्जित कर दिया जाएगा, जो उस आदेश की प्रमाणित प्रति या उस विनिश्चय का अभिलेख जिसके विरुद्ध अपील की गई है, अनुदत्त करने में लगा हो ।

73. अपीलों के लिए प्रक्रिया-उच्च न्यायालय धारा 72 के अधीन उसको की गई अपीलों के सम्बन्ध में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया के बारे में ऐसे नियम बना सकेगा जो इस अधिनियम से संगत हो ।

अध्याय 15

प्रकीर्ण

74. प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार और प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को सिविल न्यायालय की कतिपय शक्तियां प्राप्त होना-निम्नलिखित बातों के बारे में प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार और प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को वे शक्तियां प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय को होती हैं, अर्थात्: -

                (क) किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना तथा उसकी शपथ पर परीक्षा करना;

                (ख) किसी दस्तावेज के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;

                (ग) शपथपत्र पर साक्ष्य लेना;

(घ) साक्षियों और दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना;

(ङ) किसी न्यायालय या कार्यालय से कोई लोक अभिलेख या उसकी नकल की अपेक्षा करना;

(च) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए ।

                स्पष्टीकरण-साक्षियों को हाजिर कराने के प्रयोजन के लिए, यथास्थिति, प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार या प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड की अधिकारिता की स्थानीय सीमाएं भारत के राज्यक्षेत्र की सीमाएं होंगी ।

75. प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार और प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड द्वारा पारित धन के संदाय के आदेशों का डिक्री के रूप में निष्पादित किया जाना-प्रत्येक आदेश जो किसी धन के संदाय के लिए इस अधिनियम के अधीन प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार या प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड द्वारा दिया गया हो या जो प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड के ऐसे किसी आदेश के खिलाफ किसी अपील में उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया हो, यथास्थिति, प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार, प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड या उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार द्वारा जारी किए गए प्रमाणपत्र पर सिविल न्यायालय की डिक्री समझा जाएगा और उसी रीति से निष्पादनीय होगा जैसे ऐसे न्यायालय की डिक्री ।

76. सद्भावपूर्वक किए गए कार्य के लिए परित्राण-कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किसी भी ऐसी बात के बारे में जो इस अधिनियम के अनुसरण में सद्भावूर्पक की गई हो या की जाने के लिए आशयित हो किसी व्यक्ति के विरुद्ध न होगी ।

77. कतिपय व्यक्तियों का लोक सेवक होना-इस अधिनियम के अधीन नियुक्त प्रत्येक अधिकारी और प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड का प्रत्येक सदस्य भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझा जाएगा ।

78. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजन को कार्यान्वित करने के लिए नियम शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना केन्द्रीय सरकार निम्नलिखित सब विषयों या उनमें से किसी का उपबन्ध करने के लिए नियम बना सकेगी, अर्थात्: -

 [(क) धारा 11 की उपधारा (2) के अधीन प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;]

(ख) इस अधिनियम के अधीन किए जाने वाले परिवादों और वादों का तथा अनुदत्त की जाने वाली अनुज्ञप्तियों का प्ररूप;

(ग) प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार के समक्ष किसी कार्यवाही के सम्बन्ध में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया;

 [(गअ) वह प्ररूप और रीति जिसमें कोई संगठन निःशक्त व्यक्तियों के लिए अनिवार्य अनुज्ञप्ति के लिए प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को आवेदन कर सकेगा और वह फीस जो धारा 31ख की उपधारा (1) के अधीन ऐसे आवेदन के साथ संलग्न की जा सकेगी;

(गआ) वह रीति, जिसमें ध्वन्यंकन करने वाला कोई व्यक्ति धारा 31ग की उपधारा (2) के अधीन ध्वन्यंकन करने के अपने आशय की पूर्व सूचना दे सकेगा;

(गइ) ऐसे रजिस्टर और लेखा बहियां तथा विद्यमान स्टाक के ब्यौरे, जो ध्वन्यंकन करने वाले व्यक्ति द्वारा धारा 31ग की उपधारा (5) के अधीन रखे जा सकेंगे;

(गई) वह रीति, जिसमें किसी प्रसारण संगठन द्वारा धारा 31घ की उपधारा (2) के अधीन पूर्व सूचना दी जा सकेगी;

(गउ) ऐसी रिपोर्टें और लेखे जो धारा 31घ की उपधारा (7) के खंड (क) के अधीन बनाए रखे जा सकेंगे और अभिलेखों और लेखाबहियों का निरीक्षण जो धारा 31घ की उपधारा (7) के खंड (ख) के अधीन किया जा सकेगा ;]

 [(गक) धारा 33 की उपधारा (2) के अधीन आवेदन प्रस्तुत करने के लिए शर्तें;

(गख) वे शर्तें, जिनके अधीन रहते हुए, कोई प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी, धारा 33 की उपधारा (3) के अधीन रजिस्ट्रीकृत की जा सकेगी;

(गग) धारा 33 की उपधारा (4) के अधीन रजिस्ट्रीरण के रद्दकरण के लिए जांच;

3[(गगअ) वह रीति, जिसमें कोई प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी धारा 33क की उपधारा (1) के अधीन अपनी टैरिफ स्कीम प्रकाशित कर सकेगी;

(गगआ) वह फीस, जो धारा 33क की उपधारा (2) के अधीन प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को अपील फाइल करने के पूर्व संदत्त की जानी होगी;

(गगइ) किसी प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी के रजिस्ट्रीकरण के नवीकरण के लिए आवेदन का प्ररूप तथा ऐसी फीस, जो धारा 33 की उपधारा (3क) के अधीन ऐसे आवेदन के साथ संलग्न की जा सकेगी;]

(गघ) वे शर्तें, जिनके अधीन रहते हुए, प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी, धारा 34 की उपधारा (1) के खंड (क) के अधीन प्राधिकार स्वीकार कर सकेगी और वे शर्तें, जिनके अधीन रहते हुए, अधिकारों के स्वामियों को उस उपधारा के खंड (घ) के अधीन ऐसे प्राधिकार वापस लेने का अधिकार होगा;

(गङ) वे शर्तें, जिनके अधीन रहते हुए, प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटी अनुज्ञप्तियां जारी कर सकेगी, फीस का संग्रहण कर सकेगी और ऐसी फीस को अधिकारों के स्वामियों में धारा 34 की उपधारा (3) के अधीन वितरित कर सकेगी;

(गच) वह रीति जिससे अधिकारों के स्वामियों का फीस के संग्रहण और वितरण की बाबत अनुमोदन और फीस के रूप में संगृहीत की गई किसी रकम का उपयोग करने के लिए अनुमोदन प्राप्त किया जाएगा तथा धारा 35 की उपधारा (1) के अधीन ऐसे स्वामियों को उनके अधिकारों के प्रशासन के सम्बन्ध में क्रियाकलापों से सम्बन्धित जानकारी दी जाएगी;

(गछ) वे विवरणियां जो प्रतिलिप्यधिकार के रजिस्ट्रार के समक्ष प्रतिलिप्यधिकार सोसाइटियों द्वारा धारा 36 की उपधारा (1) के अधीन दाखिल की जाएंगी;]

(घ) इस अधिनियम के अधीन संदेय किन्हीं स्वामिस्वों का अवधारण करने की रीति और ऐसे स्वामिस्वों के संदाय के लिए ली जाने वाली प्रतिभूति;

 [(घक) धारा 52 की उपधारा (1) के खंड (ञ) के अधीन स्वामिस्व के संदाय की रीति;]

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।

(ङ) इस अधिनियम के अधीन रखे जाने वाले प्रतिलिप्यधिकारों के रजिस्टर का प्ररूप और उसमें दर्ज की जाने वाली विशिष्टियां;

(च) वे बातें जिनके सम्बन्ध में प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार और प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को सिविल न्यायालय की शक्तियां प्राप्त होंगी;

(छ) फीसें, जो इस अधिनियम के अधीन संदेय हों;

(ज) प्रतिलिप्यधिकार कार्यालय के कारबार का और इस अधिनियम द्वारा प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार के निदेशन या नियन्त्रण के अधीन रखी गई सब बातों का विनियमन ।

 [(3) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडे़गा ।]

79. निरसन, व्यावृत्तियां और अंतःकालीन उपबंध-(1) भारतीय प्रतिलिप्यधिकार अधिनियम, 1914 (1914 का 3) और यूनाइटेड किंगडम की पार्लियामें] द्वारा पारित तथा भारतीय प्रतिलिप्यधिकार अधिनियम, 1914 द्वारा भारत में उसके लागू होने में यथा उपांतरित कापीराइट ऐक्ट, 1911 एतद्द्वारा निरसित किए जाते हैं ।

(2) जहां किसी व्यक्ति ने इस अधिनियम के प्रारम्भ से पूर्व कोई ऐसा कार्य किया है जिससे उसने किसी कृति के ऐसी रीति से जो उस समय विधिपूर्ण थी, पुनरुत्पादन या प्रस्तुतीकरण के सम्बन्ध में अथवा किसी कृति के पुनरुत्पादन या प्रस्तुतीकरण के प्रयोजन के लिए या उस दृष्टि से उस समय जबकि ऐसा पुनरुत्पादन या प्रस्तुतीकरण विधिपूर्ण होता, यदि यह अधिनियम प्रवृत्त न हुआ होता, कोई व्यय या दायित्व उपगत किए हैं, वहां इस धारा की कोई बात ऐसे कार्य के सम्बन्ध में या उससे उत्पन्न किन्हीं अधिकारों या हितों को जो उक्त तारीख को अस्तित्व में और मूल्यवान हों तब के सिवाय न तो घटाएगी और न उन्हें हानि पहुंचाएगी जबकि वह व्यक्ति जो इस अधिनियम के आधार से ऐसे पुनरुत्पादन या प्रस्तुतीकरण को निर्बंधित करने का हकदार हो जाता है ऐसा प्रतिकर, जैसा करार के अभाव में प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड द्वारा अवधारित किया जाए, संदत्त करने के लिए, सहमत हो जाता है ।

(3) इस अधिनियम के आधार पर कोई प्रतिलिप्यधिकार किसी ऐसी कृति में अस्तित्व में नहीं आएगा जिसमें प्रतिलिप्यधिकार उपधारा (1) द्वारा निरसित किसी अधिनियम के अधीन इस अधिनियम के प्रारम्भ से ठीक पूर्व अस्तित्व में नहीं था ।

(4) जहां इस अधिनियम के प्रारम्भ से ठीक पहले किसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार अस्तित्व में था, वहां ऐसे प्रतिलिप्यधिकार को समाविष्ट करने वाले अधिकार, ऐसे प्रारम्भ की तारीख से वे अधिकार होंगे जो कृतियों के उन वर्गों के सम्बन्ध में, जिनमें ऐसी कृति आती है, धारा 14 में विनिर्दिष्ट है, और जहां उस धारा द्वारा कोई नए अधिकार प्रदत्त किए गए हैं वहां ऐसे अधिकारों का स्वामी, -

(क) किसी ऐसी दशा में जिसमें कृति में प्रतिलिप्यधिकार इस अधिनियम के प्रारम्भ से पूर्व पूर्णतः समनुदिष्ट था, समनुदेशिती या उसका हित में उत्तराधिकारी होगा;

(ख) किसी अन्य दशा में, वह व्यक्ति होगा जो उपधारा (1) द्वारा निरसित किसी अधिनियम के अधीन उस कृति में प्रतिलिप्यधिकार का प्रथम स्वामी था या उसके विधिक प्रतिनिधि होंगे ।

(5) इस अधिनियम में अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, जहां कोई व्यक्ति इस अधिनियम के प्रारम्भ से ठीक पूर्व किसी कृति में प्रतिलिप्यधिकार का या ऐसे प्रतिलिप्यधिकार में किसी अधिकार का या ऐसे किसी अधिकार में किसी हित का हकदार है वहां वह ऐसे अधिकार या हित का हकदार उस कालावधि तक बना रहेगा जिस तक कि वह उसका हकदार होता यदि यह अधिनियम प्रवृत्त न हुआ होता ।

(6) इस अधिनियम की किसी बात से यह नहीं समझा जाएगा कि वह इसके प्रारम्भ से पूर्व किए गए किसी कार्य को प्रतिलिप्यधिकार का अतिलंघन बनाती है यदि ऐसा कार्य अन्यथा ऐसा अतिलंघन न हुआ होता ।

(7) इस धारा में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, इस धारा की किसी बात से यह नहीं समझा जाएगा कि वह निरसनों के प्रभावों की बाबत साधारण खंड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) के लागू होने को प्रभावित करती है ।

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