केन्द्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003
(2003 का अधिनियम संख्यांक 45)
[11 सितंबर, 2003]
केन्द्रीय सरकार के, किसी केन्द्रीय अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित निगमों,
केन्द्रीय सरकार के स्वामित्वाधीन या उसके नियंत्रणाधीन सरकारी कम्पनियों,
सोसाइटियों और स्थानीय प्राधिकरणों के कतिपय प्रवर्गों के लोक
सेवकों द्वारा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अधीन
किए गए अभिकथित अपराधों की जांच करने या जांच
कराने के लिए एक केन्द्रीय सतर्कता आयोग का
गठन करने और उससे संबंधित
या उसके आनुषंगिक
विषयों का उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के चौवनवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम केन्द्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003 है ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त" से धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त अभिप्रेत है;
(ख) आयोग" से धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन गठित केन्द्रीय सतर्कता आयोग अभिप्रेत है;
(ग) दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन" से दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन अधिनियम, 1946 की धारा 2 की उपधारा (1) के अधीन गठित दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन अभिप्रेत है;
(घ) सरकारी कंपनी" से कंपनी अधिनियम, 1956 के अर्थान्तर्गत कोई सरकारी कंपनी अभिप्रेत है;
[(घक) लोकपाल" से लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 (2014 का 1) की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित लोकपाल अभिप्रेत है;
(ङ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(च) सतर्कता आयुक्त" से धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त सतर्कता आयुक्त अभिप्रेत है ।
अध्याय 2
केन्द्रीय सतर्कता आयोग
3. केन्द्रीय सतर्कता आयोग का गठन-(1) केन्द्रीय सतर्कता आयोग के नाम से ज्ञात, एक निकाय का, इस अधिनियम के अधीन उसे प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने और उसे सौंपे गए कृत्यों का पालन करने के लिए, गठन किया जाएगा और केन्द्रीय सतर्कता आयोग अध्यादेश, 1999 (1999 का अध्यादेश सं० 4), जो प्रवर्तन में नहीं रहा है, की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन गठित केन्द्रीय सतर्कता आयोग, जो भारत सरकार के कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय (कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग) के तारीख 4 अप्रैल, 1999 के संकल्प सं० 371/20/99-एवीडी-ख्र्ख्र्ख्र् जो तारीख 13 अगस्त, 2002 के सम-संख्यांक संकल्प द्वारा संशोधित किया गया था, के अधीन बना रहा है, इस अधिनिमय के अधीन गठित किया गया आयोग समझा जाएगा ।
(2) आयोग निम्नलिखित से मिलकर बनेगा-
(क) एक केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त-अध्यक्ष;
(ख) दो से अनधिक सतर्कता आयुक्त-सदस्य ।
(3) केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त और सतर्कता आयुक्त ऐसे व्यक्तियों में से नियुक्त किए जाएंगे जो-
(क) अखिल भारतीय सेवा में या संघ की किसी सिविल सेवा में या संघ के अधीन किसी सिविल पद पर रह चुके हैं या हैं और जिनके पास सतर्कता, नीति बनाने और प्रशासन, जिसके अन्तर्गत पुलिस प्रशासन भी है, से संबंधित विषयों का ज्ञान और अनुभव है; या
(ख) किसी केन्द्रीय अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित किसी निगम या केन्द्रीय सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन किसी सरकारी कंपनी में कोई पद धारण कर चुके हैं या पद धारण कर रहे हैं और ऐसे व्यक्ति जिनके पास वित्त, जिसके अन्तर्गत बीमा तथा बैंककारी भी है, विधि, सतर्कता और अन्वेषणों में विशेषज्ञता और अनुभव है:
परंतु यह कि केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त और सतर्कता आयुक्तों में से, दो से अधिक व्यक्ति खंड (क) या खंड (ख) में निर्दिष्ट व्यक्तियों के प्रवर्ग के नहीं होंगे ।
(4) केन्द्रीय सरकार, आयोग में ऐसे निबंधनों और शर्तों पर जिन्हें वह उचित समझे, ऐसी शक्तियों का प्रयोग करने और ऐसे कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए जिन्हें आयोग विनियमों द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, एक सचिव नियुक्त करेगी ।
(5) केन्द्रीय सतर्कता आयोग अध्यादेश, 1999 (1999 का अध्यादेश सं० 4) या भारत सरकार के कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय (कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग) तारीख 4 अप्रैल, 1999 के संकल्प संख्या 371/20/99-एवीडी-ख्र्ख्र्ख्र् जो तारीख 13 अगस्त, 2002 के समसंख्यांक संकल्प द्वारा संशोधित किया गया था, के अधीन नियुक्त केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त, अन्य सतर्कता आयुक्त और आयोग का सचिव इस अधिनियम के अधीन उन्हीं निबन्धनों और शर्तों के जिसके अन्तर्गत पदावधि भी है, जिनके अधीन रहते हुए वे, यथास्थिति, उक्त अध्यादेश या संकल्प के अधीन इस प्रकार नियुक्त किए गए थे, नियुक्त किए गए समझे जाएंगे ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए पदावधि" पद का केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त या किसी अन्य सतर्कता आयुक्त द्वारा अपना पद ग्रहण किए जाने की तारीख से और इस अधिनियम के अधीन उस रूप में बने रहने की अवधि के रूप में अर्थ लगाया जाएगा ।
(6) आयोग का मुख्यालय नई दिल्ली में होगा ।
4. केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त और सतर्कता आयुक्तों की नियुक्ति-(1) केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त और सतर्कता आयुक्त राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा नियुक्त किए जाएंगे:
परन्तु इस उपधारा के अधीन प्रत्येक नियुक्ति एक समिति की सिफारिश अभिप्राप्त करने के पश्चात् की जाएगी, जो निम्नलिखित से मिलकर बनेगी-
(क) प्रधान मंत्री-अध्यक्ष;
(ख) गृह मंत्री-सदस्य;
(ग) लोक सभा में विपक्ष का नेता-सदस्य ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए लोक सभा में विपक्ष का नेता" के अंतर्गत, जब किसी नेता को इस प्रकार मान्यता न प्रदान की गई हो, तब लोक सभा में सरकार के विपक्ष में एकल सबसे बड़े समूह का नेता होगा ।
(2) केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त या सतर्कता आयुक्त की कोई नियुक्ति समिति में किसी रिक्ति के कारण ही अविधिमान्य नहीं होगी ।
5. केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त की सेवा के निबंधन और अन्य शर्तें-(1) उपधारा (3) और उपधारा (4) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त उस तारीख से जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है, चार वर्ष की अवधि के लिए, या पैंसठ वर्ष की आयु पूरी करने तक, इनमें से जो पहले हो, पद धारण करेगा । केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त, पद पर न रहने पर, आयोग में पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होगा ।
(2) उपधारा (3) और उपधारा (4) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक सतर्कता आयुक्त उस तारीख से जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है, चार वर्ष की अवधि के लिए, या पैंसठ वर्ष की आयु पूरी करने तक, इनमें से जो पहले जो, पद धारण करेगा:
परन्तु प्रत्येक सतर्कता आयुक्त पद पर न रहने पर, धारा 4 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट रीति से केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त के रूप में नियुक्ति के लिए पात्र होगा:
परंतु यह और कि सतर्कता आयुक्त, यदि केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त के रूप में नियुक्त किया जाता है, तो उसकी पदावधि, सतर्कता आयुक्त और केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त के रूप में कुल मिलाकर चार वर्ष से अधिक की नहीं होगी ।
(3) केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त या कोई सतर्कता आयुक्त अपना पद ग्रहण करने से पहले राष्ट्रपति या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति के समक्ष इस अधिनियम की अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए हुए प्ररूप के अनुसार शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर हस्ताक्षर करेगा ।
(4) केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त या कोई सतर्कता आयुक्त राष्ट्रपति को संबोधित स्वहस्ताक्षरित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा ।
(5) केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त या किसी सतर्कता आयुक्त को धारा 6 में उपबंधित रीति से उसके पद से हटाया जा सकेगा ।
(6) केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त और प्रत्येक अन्य सतर्कता आयुक्त, पद पर न रहने पर-
(क) किसी राजनयिक समनुदेशन, किसी संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक के रूप में नियुक्ति और किसी अन्य ऐसे समनुदेशन अथवा नियुक्ति के लिए, जो विधि के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुद्रा से, अधिपत्र द्वारा की जानी अपेक्षित है;
(ख) भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन लाभ के किसी पद पर आगे नियोजन के लिए,
पात्र नहीं होगा ।
(7) संदेय वेतन और भत्ते तथा सेवा की अन्य शर्तें-
(क) केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त के लिए वही होंगी जो संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष की है;
(ख) सतर्कता आयुक्त के लिए वहीं होंगी जो संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य की हैं :
परन्तु यदि केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त या कोई सतर्कता आयुक्त अपनी नियुक्ति के समय भारत सरकार के अधीन या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी पूर्व सेवा के संबंध में कोई पेंशन (निःशक्तता या क्षति पेंशन से भिन्न) प्राप्त कर रहा है तो केंद्रीय सतर्कता आयुक्त या किसी सतर्कता आयुक्त के रूप में सेवा के संबंध में उसके वेतन में से उस पेंशन की रकम, जिसके अंतर्गत पेंशन का वह भाग भी है जो संराशिकृत किया गया था और सेवानिवृत्ति फायदों के अन्य रूपों के समतुल्य पेंशन, सेवानिवृत्ति उपदान के समतुल्य पेंशन को अपवर्जित करते हुए, घटा दी जाएगी :
परन्तु यह और कि यदि केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त या कोई सतर्कता आयुक्त अपनी नियुक्ति के समय, किसी केन्द्रीय अधिनियम द्वारा अथवा उसके अधीन स्थापित किसी निगम में अथवा केन्द्रीय सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन किसी सरकारी कंपनी में पहले की गई सेवा के संबंध में सेवानिवृत्ति प्रसुविधाएं ले रहा हो तो, यथास्थिति, केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त अथवा सतर्कता आयुक्त के रूप में उसकी सेवा के संबंध में, उसके वेतन में से, उसके द्वारा ली जा रही सेवानिवृत्ति प्रसुविधाओं के समतुल्य पेंशन की रकम घटा दी जाएगी :
परन्तु यह भी कि केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त या किसी सतर्कता आयुक्त को संदेय वेतन, भत्ते और पेंशन तथा सेवा की अन्य शर्तों में उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।
6. केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त और सतर्कता आयुक्त का हटाया जाना-(1) उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त या किसी सतर्कता आयुक्त को राष्ट्रपति के आदेश द्वारा, केवल साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर उसके पद से, राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय को निर्देश किए जाने पर, उसके द्वारा की गई जांच के पश्चात्, यह रिपोर्ट किए जाने पर कि, यथास्थिति, केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त या किसी सतर्कता आयुक्त को ऐसे किसी आधार पर हटा दिया जाना चाहिए, हटाया जाएगा ।
(2) राष्ट्रपति, केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त या किसी सतर्कता आयुक्त को, जिसके संबंध में उपधारा (1) के अधीन उच्चतम न्यायालय को निर्देश किया गया है, ऐसे निर्देश पर उच्चतम न्यायालय की रिपोर्ट की प्राप्ति पर राष्ट्रपति द्वारा आदेश पारित किए जाने तक, निलंबित और यदि आवययक समझे तो जांच के दौरान कार्यालय में उपस्थित होने से भी प्रतिषिद्ध कर सकेगा ।
(3) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी राष्ट्रपति, आदेश द्वारा, यथास्थिति, केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त या किसी अन्य सतर्कता आयुक्त को पद से हटा सकेगा, यदि-
(क) उसे दिवालिया न्यायनिर्णीत किया गया है; या
(ख) उसे किसी ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है जिसमें केन्द्रीय सरकार की राय में उसकी नैतिक अधमता अन्तर्वलित है; या
(ग) वह अपनी पदावधि के दौरान अपने पद के कर्तव्यों से बाहर किसी वेतन पाने वाले नियोजन में लगा हुआ है; या
(घ) वह राष्ट्रपति की राय में मानसिक या शारीरिक शैथिल्य के कारण पद पर बने रहने के अयोग्य है; या
(ङ) उसने ऐसे वित्तीय या अन्य हित अर्जित किए हैं जिससे उसके, केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त या सतर्कता आयुक्त के रूप में कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है ।
(4) यदि केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त या कोई सतर्कता आयुक्त भारत सरकार द्वारा या उसकी ओर से की गई किसी संविदा या करार में किसी रूप में सम्बद्ध या हितबद्ध है या हो जाता है या सदस्य के रूप में से अन्यथा किसी भी प्रकार से उसके लाभ में या उससे उद्भूत किसी फायदे या उपलब्धि में किसी निगमित कम्पनी के अन्य सदस्यों के साथ सामान्य रूप में, भागीदार है तो वह उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए कदाचार का दोषी समझा जाएगा ।
7. केन्द्रीय सरकार द्वारा कर्मचारिवृंद के लिए नियम बनाने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, आयोग के परामर्श से, आयोग के कर्मचारिवृन्द के सदस्यों की संख्या और उनकी सेवा की शर्तों के संबंध में नियम बना सकेगी ।
अध्याय 3
केन्द्रीय सतर्कता आयोग के कृत्य और शक्तियां
8. केन्द्रीय सतर्कता आयोग के कृत्य और शक्तियां-(1) आयोग के निम्नलिखित कृत्य और शक्तियां होंगी-
(क) दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन के कार्यकरण का अधीक्षण करना जहां तक वह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (1988 का 49) के अधीन किए गए अभिकथित अपराधों अथवा किसी ऐसे अपराध के, जिससे उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट किसी लोक सेवक को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अधीन उसी विचारण में आरोपित किया जा सकेगा, अन्वेषण से संबंधित है;
(ख) दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन को, दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन अधिनियम, 1946 (1946 का 25) की धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन उसे सौंपे गए उत्तरदायित्व के निर्वहन के प्रयोजन के लिए निदेश देना:
परंतु आयोग, खंड (क) के अधीन अधीक्षण की या इस खंड के अधीन निदेश देने की शक्तियों का प्रयोग करते समय, ऐसी रीति से शक्ति का प्रयोग नहीं करेगा जिससे दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन से किसी मामले का किसी विशिष्ट रीति में ही अन्वेषण करने या उसका निपटारा करने की अपेक्षा की जाए;
(ग) केन्द्रीय सरकार द्वारा किए गए किसी ऐसे निर्देश पर जांच करना जांच अथवा अन्वेषण कराना जिसमें यह अभिकथन किया गया है कि किसी लोक सेवक ने, केन्द्रीय सरकार या किसी केन्द्रीय अधिनियम के द्वारा या उसके अधीन स्थापित किसी निगम, उस सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन सरकारी कम्पनी, सोसाइटी और किसी स्थानीय प्राधिकरण का कर्मचारी होते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (1988 का 49) के अधीन कोई अपराध अथवा कोई ऐसा अपराध, जिससे किसी लोक सेवक को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अधीन उसी विचारण में आरोपित किया जा सकेगा, किया है ;
(घ) उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट पदाधिकारियों के ऐसे प्रवर्ग से संबंधित किसी पदधारी के विरुद्ध किसी परिवाद, जिसमें यह अभिकथन किया गया है कि उसने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (1988 का 49) के अधीन कोई अपराध अथवा कोई ऐसा अपराध जिससे किसी लोक सेवक को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अधीन उसी विचारण में आरोपित किया जा सकेगा, किया है, जांच करना या जांच अथवा अन्वेषण कराना;
(ङ) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (1988 का 49) के अधीन अभिकथित रूप से किए गए अपराधों का दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन द्वारा किए गए अन्वेषणों की प्रगति का अथवा किसी ऐसे अपराध का जिससे किसी लोक सेवक को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अंतर्गत उसी विचारण में आरोपित किया जा सकेगा, पुनर्विलोकन करना;
(च) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (1988 का 49) के अधीन अभियोजन की मंजूरी के लिए सक्षम प्राधिकारियों के पास लम्बित आवेदनों की प्रगति का पुनर्विलोकन करना;
(छ) केन्द्रीय सरकार, किसी केन्द्रीय अधिनियम के द्वारा या उसके अधीन स्थापित निगमों, केन्द्रीय सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन सरकारी कम्पनियों, सोसाइटियों और स्थानीय प्राधिकरणों को ऐसे विषयों पर सलाह देना जो इसे उस सरकार, उक्त सरकारी कम्पनियों, सोसाइटियों और केन्द्रीय सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन स्थानीय प्राधिकरणों द्वारा या अन्यथा निर्दिष्ट किए जाएं;
(ज) केन्द्रीय सराकर के विभिन्न मंत्रालयों या किसी केन्द्रीय अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित निगमों, उस सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन सरकारी कम्पनियों, सोसाइटियों और स्थानीय प्राधिकरणों के सतर्कता प्रशासन के ऊपर अधीक्षण रखना:
परंतु इस खंड में अंतर्विष्ट किसी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह आयोग को सतर्कता प्रशासन के ऊपर अधीक्षण का ऐसी रीति से प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत करती है जो सरकार द्वारा जारी किए गए सतर्कता संबंधी विषयों से संबंधित निदेशों से संगत नहीं है और आयोग को किसी नीति विषयक मामले के संबंध में निदेश जारी करने की शक्ति प्रदान करती है ।
(2) उपधारा (1) के खंड (ग) में निर्दिष्ट व्यक्ति निम्न प्रकार हैं: -
(क) संघ के मामलों के संबंध में सेवारत अखिल भारतीय सेवाओं के सदस्य और केन्द्रीय सरकार के समूह क" अधिकारी;
(ख) किसी केन्द्रीय अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित निगमों, केन्द्रीय सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन सरकारी कम्पनियों, सोसाइटियों और अन्य स्थानीय प्राधिकरणों के ऐसे स्तर के अधिकारी जिन्हें वह सरकार इस निमित्त राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे:
परन्तु उस समय तक, जब तक कि इस खंड के अधीन कोई अधिसूचना जारी नहीं कर दी जाती है, उक्त निगमों, कम्पनियों, सोसाइटियों और स्थानीय प्राधिकरणों के सभी अधिकारी उपधारा (1) के खंड (घ) में निर्दिष्ट व्यक्ति समझे जाएंगे;
[(ग) लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 (2014 का 1) की धारा 20 की उपधारा (1) के परंतुक के अधीन लोकपाल द्वारा किए गए निर्देश पर, उपधारा (1) के खंड (घ) में निर्दिष्ट व्यक्तियों के अंतर्गत निम्नलिखित भी होंगे :-
(i) केन्द्रीय सरकार की समूह ख, समूह ग और समूह घ सेवाओं के सदस्य;
(ii) किसी केन्द्रीय अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित निगमों, केन्द्रीय सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन सरकारी कंपनियों, सोसाइटियों और अन्य स्थानीय प्राधिकरणों के ऐसे स्तर के पदधारी या कर्मचारिवृंद जिनको वह सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे :
परंतु उस समय तक, जब तक इस खंड के अधीन कोई अधिसूचना जारी की जाती है, उक्त निगमों, कंपनियों, सोसाइटियों और स्थानीय प्राधिकरणों के सभी पदधारी या कर्मचारिवृंद को, उपधारा (1) के खंड (घ) में निर्दिष्ट व्यक्ति होना समझा जाएगा ।]
1[8क. लोक सेवकों के संबंध में प्रारंभिक जांच पर कार्रवाई-(1) जहां केन्द्रीय सरकार के समूह ग और समूह घ पदधारियों से संबंधित लोक सेवकों के भ्रष्टाचार से संबंधित प्रारंभिक जांच की समाप्ति के पश्चात् आयोग के निष्कर्षों से, लोक सेवक को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् ऐसे लोक सेवक द्वारा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (1988 का 49) के अधीन भ्रष्टाचार से संबंधित आचरण नियमों के प्रथमदृष्ट्या उल्लंघन का प्रकटन होता हैं, वहां आयोग, निम्नलिखित में से कोई एक या अधिक कार्रवाइयां किए जाने के लिए कार्यवाही करेगा, अर्थात् :-
(क) यथास्थिति, किसी अभिकरण या दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन द्वारा अन्वेषण कराया जाना;
(ख) सक्षम प्राधिकारी द्वारा संबंधित लोक सेवक के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाहियां या कोई अन्य समुचित कार्रवाई आरंभ कराया जाना;
(ग) लोक सेवक के विरुद्ध कार्यवाहियों को बंद कराया जाना तथा लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 की धारा 46 के अधीन शिकायतकर्ता के विरुद्ध कार्यवाही का किया जाना ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रत्येक प्रारंभिक जांच, साधारणतया, शिकायत की प्राप्ति की तारीख से नब्बे दिन के भीतर और ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, नब्बे दिन की अतिरिक्त अवधि के भीतर पूरी की जाएगी ।
8ख. लोक सेवकों के संबंध में अन्वेषण पर कार्रवाई-(1) यदि, आयोग, धारा 8क की उपधारा (1) के खंड (क) के अधीन शिकायत का अन्वेषण करने के लिए कार्यवाही किए जाने का विनिश्चय करता है तो वह किसी अभिकरण को (जिसके अंतर्गत दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन भी है) यथासंभव शीघ्रता के साथ अन्वेषण करने और उसके आदेश की तारीख से छह मास की अवधि के भीतर अन्वेषण पूरा करने तथा आयोग को अपने निष्कर्षों के साथ अन्वेषण रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निदेश देगा:
परंतु आयोग उक्त अवधि को ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, छह मास की अतिरिक्त अवधि के लिए बढ़ा सकेगा ।
(2) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 173 में किसी बात के होते हुए भी, कोई अभिकरण (जिसके अंतर्गत दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन भी है) आयोग द्वारा उसको निर्दिष्ट किए गए मामलों के संबंध में आयोग को अन्वेषण रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा ।
(3) आयोग, उपधारा (2) के अधीन किसी अभिकरण से (जिसके अंतर्गत दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन भी है) उसको प्राप्त प्रत्येक रिपोर्ट पर विचार करेगा और निम्नलिखित के बारे में विनिश्चय कर सकेगा: -
(क) लोक सेवक के विरुद्ध विशेष न्यायालय के समक्ष आरोपपत्र या मामला बंद किए जाने की रिपोर्ट फाइल करना;
(ख) सक्षम प्राधिकारी द्वारा संबंधित लोक सेवक के विरुद्ध विभागीय कार्यवाहियां या कोई अन्य समुचित कार्रवाई आरंभ करना ।]
9. आयोग की कार्यवाहियां-(1) आयोग की कार्यवाहियां उसके मुख्यालय में संचालित की जाएंगी ।
(2) आयोग, सर्वसम्मत विनिश्चय से, अपने कारबार के संव्यवहार के लिए प्रक्रिया तथा केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त और अन्य सतर्कता आयुक्तों के बीच अपने कारबार के आबंटन को भी विनियमित कर सकेगा ।
(3) उपधारा (2) में जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, आयोग के सभी कारबार, यथासंभव, सर्वसम्मति से संव्यवहृत किए जाएंगे ।
(4) उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, यदि केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त और अन्य सतर्कता आयुक्तों की किसी विषय पर राय में भिन्नता है तो ऐसा विषय बहुमत की राय के अनुसार विनिश्चित किया जाएगा ।
(5) केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त या यदि वह किसी कारण आयोग की किसी बैठक में उपस्थित होने में असमर्थ हो तो बैठक में उपस्थित ज्येष्ठतम सतर्कता आयुक्त, बैठक की अध्यक्षता करेगा ।
(6) आयोग का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस कारण से ही अविधिमान्य नहीं होगी कि-
(क) आयोग में कोई रिक्ति या उसके गठन में कोई त्रुटि है; या
(ख) केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त या सतर्कता आयुक्त के रूप में कार्यरत किसी व्यक्ति की नियुक्ति में कोई त्रुटि है; या
(ग) आयोग की प्रक्रिया में ऐसी कोई अनियमितता है, जो मामले के गुणागुण को प्रभावित नहीं करती है ।
10. कतिपय परिस्थितियों में सतर्कता आयुक्त का केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त के रूप में कार्य करना-(1) केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त के पद पर उसकी मृत्यु, त्यागपत्र या किसी अन्य कारण से हुई किसी रिक्ति की दशा में राष्ट्रपति अधिसूचना द्वारा सतर्कता आयुक्तों में से एक को केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त के रूप में कार्य करने के लिए, जब तक कि ऐसी रिक्ति को भरने के लिए नए केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति नहीं हो जाती, प्राधिकृत कर सकेगा ।
(2) यदि केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त, छुट्टी पर अनुपस्थित होने के कारण या अन्यथा अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ है तो सतर्कता आयुक्तों में से ऐसा एक सतर्कता आयुक्त, जिसे राष्ट्रपति इस निमित्त अधिसूचना द्वारा प्राधिकृत करे, उस तारीख तक जब तक कि केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त फिर से अपने कर्तव्यों को ग्रहण नहीं कर लेता है, केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त के कर्तव्यों का निर्वहन करेगा ।
11. जांच से संबंधित शक्तियां-आयोग को, धारा 8 की उपधारा (1) के खंड (ख) और खंड (ग) में निर्दिष्ट कोई जांच करते समय और विशिष्टतया निम्नलिखित विषयों के संबंध में वे सभी शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय को हैं, अर्थात्: -
(क) भारत के किसी भी भाग से किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना;
(ख) किसी दस्तावेज को प्रकट और पेश करने की अपेक्षा करना;
(ग) शपथ पत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;
(घ) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रतिलिपि की अध्यपेक्षा करना;
(ङ) साक्षियों या अन्य दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना; और
(च) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाए ।
[11क. प्रारंभिक जांच करने के लिए जांच निदेशक-(1) एक जांच निदेशक होगा, जो भारत सरकार के संयुक्त सचिव की पंक्ति से नीचे का न हो, जिसको लोकपाल द्वारा आयोग को निर्दिष्ट प्रारंभिक जांच करने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा ।
(2) केन्द्रीय सरकार, जांच निदेशक को उतने अधिकारी तथा कर्मचारी उपलब्ध कराएगी जो इस अधिनियम के अधीन उसके कृत्यों का निर्वहन करने के लिए अपेक्षित हों ।]
12. आयोग के समक्ष कार्यवाहियों का विधिक कार्यवाहियां होना-आयोग, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए एक सिविल न्यायालय समझा जाएगा और आयोग के समक्ष प्रत्येक कार्यवाही भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थान्तर्गत और धारा 196 के प्रयोजनों के लिए विधिक कार्यवाही समझी जाएगी ।
अध्याय 4
व्यय और वार्षिक रिपोर्ट
13. आयोग के व्ययों का भारत की संचित निधि पर भारित होना-आयोग के व्यय, जिनके अन्तर्गत केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त, सतर्कता आयुक्त, आयोग के सचिव और कर्मचारिवृन्द को या उनके संबंध में संदेय कोई वेतन, भत्ते और पेंशन भी हैं, भारत की संचित निधि पर भारित होंगे ।
14. वार्षिक रिपोर्ट-(1) आयोग का यह कर्तव्य होगा कि वह आयोग द्वारा किए गए कार्य के बारे में एक रिपोर्ट प्रतिवर्ष रिपोर्ट से संबंधित वर्ष की समाप्ति के छह मास के भीतर राष्ट्रपति को प्रस्तुत करे ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट रिपोर्ट में दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन के कार्यकरण पर जहां तक उसका संबंध दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन अधिनियम, 1946 (1946 का 25) की धारा 4 की उपधारा (1) से है, एक पृथक् भाग होगा ।
(3) ऐसी रिपोर्ट की प्राप्ति पर राष्ट्रपति उसे संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगा ।
अध्याय 5
प्रकीर्ण
15. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-आयोग, केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त, किसी सतर्कता आयुक्त, आयोग के सचिव या किसी कर्मचारी के विरुद्ध इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या किए जाने के लिए आशयित किसी बात के संबंध में कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं होगी ।
16. केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त, सतर्कता आयुक्त और कर्मचारिवृन्द का लोक सेवक होना-केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त, प्रत्येक सतर्कता आयुक्त, आयोग का सचिव और प्रत्येक कर्मचारी भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थान्तर्गत लोक सेवक समझा जाएगा ।
17. आयोग द्वारा किए गए निर्देश पर की गई किसी जांच की रिपोर्ट का उस आयोग को भेजा जाना-(1) आयोग द्वारा किए गए निर्देश पर किसी अभिकरण द्वारा की गई जांच की रिपोर्ट आयोग को भेजी जाएगी ।
(2) आयोग ऐसी रिपोर्ट की प्राप्ति पर और उससे सुसंगत अन्य बातों पर विचार करने के पश्चात् यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार और किसी केन्द्रीय अधिनियम के द्वारा या उसके अधीन स्थापित निगमों, उस सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन सरकारी कम्पनियों, सोसाइटियों और स्थानीय प्राधिकरणों को आगे की कार्रवाई के लिए सलाह देगा ।
(3) केन्द्रीय सरकार और, यथास्थिति, किसी केन्द्रीय अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित निगम, उस सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन सरकारी कम्पनियां, सोसाइटियां और स्थानीय प्राधिकरण, आयोग की सलाह पर विचार करेंगे और समुचित कार्रवाई करेंगे:
परन्तु जहां, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार, किसी केन्द्रीय अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित निगम, केन्द्रीय सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन सरकारी कम्पनी, सोसाइटी या स्थानीय प्राधिकरण, आयोग की सलाह से सहमत नहीं हैं, वहां वह उन कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, उसे आयोग को संसूचित करेगा ।
18. जानकारी मांगने की शक्ति-आयोग, केन्द्रीय सरकार या किसी केन्द्रीय अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित निगमों, उस सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन सरकारी कम्पनियों, सोसाइटियों और स्थानीय प्राधिकरणों से, उस सरकार में और उक्त निगमों, सरकारी कम्पनियों, सोसाइटियों और स्थानीय प्राधिकरणों में सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक कार्य के ऊपर सामान्य पर्यवेक्षण करने में उसे समर्थ बनाने के लिए रिपोर्ट, विवरणी और विवरण की मांग कर सकेगा ।
19. कतिपय मामलों में आयोग से परामर्श किया जाना-केन्द्रीय सरकार, संघ के मामलों के संबंध में लोक सेवाओं तथा पदों पर नियुक्त व्यक्तियों अथवा अखिल भारतीय सेवाओं के सदस्यों के संबंध में सतर्कता या अनुशासनिक मामलों को शासित करने वाले कोई नियम अथवा विनियम बनाने समय आयोग से, परामर्श करेगी ।
20. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतता और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किसी विषय के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -
(क) धारा 7 के अधीन कर्मचारिवृन्द के सदस्यों की संख्या और उनकी सेवा की शर्तें;
(ख) धारा 11 के खंड (च) के अधीन विहित की जाने वाली सिविल न्यायालय की कोई अन्य शक्ति; और
(ग) कोई अन्य विषय जिसे विहित किया जाना अपेक्षित है या विहित किया जाए ।
21. विनियम बनाने की शक्ति-(1) आयोग, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे विनियम बना सकेगा जो इस अधिनियम से अंसगत नहीं है और उसके अधीन बनाए गए नियम ऐसे सभी विषयों का उपबंध कर सकेंगे जिनके लिए इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी बनाने के प्रयोजनों के लिए उपबंध करना समीचीन है ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे विनियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -
(क) धारा 3 की उपधारा (4) के अधीन सचिव के कर्तव्य और शक्तियां; और
(ख) धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन आयोग द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया ।
22. अधिसूचना, नियम आदि का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा धारा 8 की उपधारा (2) के खंड (ख) के अधीन जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना और बनाया गया प्रत्येक नियम और आयोग द्वारा बनाया गया प्रत्येक विनियम जारी किए जाने या बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह ऐसी कुल तीस दिन की अवधि के लिए सत्र में हो जो एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकती है, रखा जाएगा और यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्र के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस अधिसूचना या नियम या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं या दोनों सदन इस बात के लिए सहमत हो जाएं कि वह अधिसूचना जारी नहीं की जानी चाहिए या नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो ऐसी अधिसूचना या ऐसा नियम या विनियम, यथास्थिति, तत्पश्चात् ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगी/होगा या उसका कोई प्रभाव नहीं होगा, तथापि उस अधिसूचना या नियम या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से पहले उसके अधीन की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
23. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी बनाने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो, उस कठिनाई को दूर कर सकेगी:
परन्तु ऐसा कोई भी आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
24. विद्यमान सतर्कता आयोग से संबंधित उपबंध-धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन आयोग के गठन से ही, भारत सरकार के गृह मंत्रालय के संकल्प संख्यांक 24/7/64-एवीडी, तारीख 11 फरवरी, 1964 द्वारा स्थापित केन्द्रीय सतर्कता आयोग (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् विद्यमान सतर्कता आयोग कहा गया है) जहां तक इसके कृत्य इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं हैं, उक्त कृत्यों का निर्वहन करता रहेगा, और-
(क) सतर्कता आयोग द्वारा की गई सभी कार्रवाइयां और किए गए विनिश्चय जहां तक ऐसी कार्रवाइयां और विनिश्चय इस अधिनियम के अधीन गठित आयोग के कृत्यों से संबंधित हैं, आयोग द्वारा किए गए समझे जाएंगे;
(ख) सतर्कता आयोग के समक्ष लंबित सभी कार्यवाहियां जहां तक ऐसी कार्यवाहियां आयोग के कृत्यों से संबंधित हैं आयोग को अंतरित की गई समझी जाएंगी और वे इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार बरती जाएंगी;
(ग) सतर्कता आयोग के कर्मचारी उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर आयोग के कर्मचारी हो गए समझे जाएंगे;
(घ) सतर्कता आयोग की सभी आस्तियां और दायित्व आयोग को अंतरित हो जाएंगे ।
25. प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों की नियुक्ति, आदि-विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 (1999 का 42) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, -
(क) केन्द्रीय सरकार, निम्नलिखित से मिलकर बनने वाली समिति की सिफारिश पर वित्त मंत्रालय के प्रवर्तन निदेशालय में एक प्रवर्तन निदेशक की नियुक्ति करेगी: -
(i) केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त -अध्यक्ष;
(ii) सभी सतर्कता आयुक्त -सदस्य;
(iii) केन्द्रीय सरकार में गृह मंत्रालय का भारसाधक -सदस्य;
भारत सरकार का सचिव
(iv) केन्द्रीय सरकार में कार्मिक मंत्रालय का भारसाधक -सदस्य;
भारत सकार का सचिव
(v) केन्द्रीय सरकार के वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग का -सदस्य; भारसाधक भारत सरकार का सचिव
(ख) समिति, सिफारिश करते समय, नियुक्ति के लिए पात्र अधिकारियों की सत्यनिष्ठा और उनके अनुभव पर विचार करेगी;
(ग) भारत सरकार के अपर सचिव की पंक्ति से नीचे का कोई व्यक्ति प्रवर्तन निदेशक के रूप में नियुक्ति का पात्र नहीं होंगा;
(घ) प्रवर्तन निदेशक उस तारीख से जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है, दो वर्ष से अन्यून अवधि के लिए पद धारण करेगा;
(ङ) प्रवर्तन निदेश को खंड (क) में निर्दिष्ट समिति की पूर्व सहमति के सिवाय स्थानांतरित नहीं किया जाएगा;
(च) खंड (क) में निर्दिष्ट समिति, प्रवर्तन निदेशक के परामर्श से, प्रवर्तन उपनिदेशक के स्तर से ऊपर के पदों पर नियुक्ति के लिए अधिकारियों की सिफारिश करेगी और प्रवर्तन निदेशालय में ऐसे अधिकारियों की पदावधि में विस्तारण या लघुकरण की भी सिफारिश करेगी;
(छ) खंड (ङ) के अधीन की गई सिफारिश की प्राप्ति पर केन्द्रीय सरकार उक्त सिफारिश को प्रभावी करने के लिए ऐसे आदेश पारित करेगी, जो वह ठीक समझे ।
26. 1946 के अधिनियम संख्यांक 25 का संशोधन-दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन अधिनियम, 1946 में, -
(क) धारा 1 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्: -
1क. उन शब्दों और पदों के, जो इसमें प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं है किन्तु केन्द्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003 में परिभाषित हैं वही अर्थ होंगे जो उस अधिनियम में है;"
(ख) धारा 4 के स्थान पर निम्नलिखित धाराएं रखी जाएंगी, अर्थात्: -
4. विशेष पुलिस स्थापन का अधीक्षण और प्रशासन-(1) दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन का अधीक्षण, जहां तक इसका संबंध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (1988 का 49) के अधीन किए गए अभिकथित अपराधों के अन्वेषण से है, आयोग में निहित होगा ।
(2) जैसा उपधारा (1) में अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, अन्य सभी मामलों में उक्त पुलिस स्थापन का अधीक्षण केन्द्रीय सरकार में निहित होगा ।
(3) उक्त पुलिस स्थापन का प्रशासन केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त नियुक्त किए गए किसी अधिकारी में (जिसे इसमें इसके पश्चात् निदेशक कहा गया है) निहित होगा जो उस पुलिस स्थापन के संबंध में ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा, जो किसी राज्य में पुलिस बल के संबंध में पुलिस महानिरीक्षक द्वारा प्रयोक्तव्य हैं, जो इस निमित्त केन्द्रीय सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं ।
4क. निदेशक की नियुक्त के लिए समिति-(1) केन्द्रीय सरकार, निम्नलिखित से मिलकर बनने वाली समिति की सिफारिश पर निदेशक की नियुक्ति करेगी: -
(क) केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त -अध्यक्ष;
(ख) सभी सतर्कता आयुक्त -सदस्य;
(ग) केन्द्रीय सरकार में गृह मंत्रालय का भारसाधक भारत सरकार का सचिव -सदस्य;
(घ) मंत्रिमंडल सचिवालय में सचिव (समन्वय और लोक शिकायत) -सदस्य;
(2) समिति उपधारा (1) के अधीन कोई सिफारिश करते समय पदावरोही निदेशक के विचारों को ध्यान में रखेगी ।
(3) समिति, -
(क) ज्येष्ठता, सत्यनिष्ठा और भ्रष्टाचार निरोधक मामलों के अन्वेषण के अनुभव के आधार पर; और
(ख) अखिल भारतीय सेवा अधिनियम, 1951 (1951 का 61) के अधीन गठित भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों में से चुनकर, निदेशक के रूप में नियुक्ति के लिए विचार किए जाने वाले अधिकारियों के एक पैनल की सिफारिश करेगी ।
4ख. निदेशक की सेवा के निबंधन और शर्तें-(1) निदेशक, उसकी सेवा की शर्तों से संबंधित नियमों में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, उस तारीख से जिसको वह पद ग्रहण करता है, दो वर्ष से अन्यून अवधि के लिए पद धारण किए रहेगा ।
(2) निदेशक को धारा 4क की उपधारा (1) में निर्दिष्ट समिति की पूर्व सहमति के सिवाय स्थानांतरित नहीं किया जाएगा ।
4ग. पुलिस अधीक्षक और उससे ऊपर के पदों के लिए नियुक्ति, उनकी पदावधि का विस्तारण और लघुकरण, आदि-(1) धारा 4क में निर्दिष्ट समिति, निदेशक से परामर्श करने के पश्चात्, पुलिस अधीक्षक और उससे ऊपर के स्तर के पदों पर नियुक्ति के लिए अधिकारियों की सिफारिश करेगी और दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन में ऐसे अधिकारियों की पदावधि के विस्तारण या लघुकरण की भी सिफारिश करेगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन की गई सिफारिश की प्राप्ति पर केन्द्रीय सरकार उक्त सिफारिश को कार्यान्वित करने के लिए ऐसा आदेश पारित करेगी जो वह उचित समझे" ।
(ग) धारा 6 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्: -
6क. जांच या अन्वेषण करने के लिए केन्द्रीय सरकार का अनुमोदन-(1) दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन ऐसे किसी अपराध की, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के सिवाय, कोई जांच या अन्वेषण नहीं करेगा जो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (1988 का 49) के अधीन किया गया अभिकथित है, जहां उसका अभिकथन, -
(क) केन्द्रीय सरकार के संयुक्त सचिव या उससे ऊपर के स्तर के कर्मचारियों के संबंध में है; और
(ख) ऐसे अधिकारियों के संबंध में है जो केन्द्रीय सरकार द्वारा, किसी केन्द्रीय अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित निगमों, सरकारी कंपनियों, सोसाइटियों और उस सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन स्थानीय प्राधिकारणों में नियुक्त किए गए हैं ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, ऐसा अनुमोदन ऐसे मामलों के लिए आवश्यक नहीं होगा जिनमें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (1988 का 49) की धारा 7 के स्पष्टीकरण के खंड (ग) में निर्दिष्ट विधिक पारिश्रमिक से भिन्न कोई परितोषण स्वीकार करने या स्वीकार करने का प्रयास करने के आरोप पर घटना स्थल पर ही उस व्यक्ति की गिरफ्तारी अंतर्वलित है ।"।
27. निरसन और व्यावृत्ति-(1) भारत सरकार के कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय (कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग) तारीख 4 अप्रैल, 1999 के संकल्प संख्या 371/20/99-एवीडी-ख्र्ख्र्ख्र् के अधीन, जो तारीख 13 अगस्त, 2002 के सम-संख्यांक संकल्प द्वारा संशोधित किया गया था, इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) केन्द्रीय सतर्कता आयोग अध्यादेश, 1999 (1999 का अध्यादेश सं० 4) के ऐसे निरसन और प्रवर्तन की समाप्ति के होते हुए भी, उक्त संकल्प और उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई जिसके अन्तर्गत की गई नियुक्तियां और अन्य कार्रवाइयां भी या उक्त अध्यादेश द्वारा यथासंशोधित दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन अधिनियम, 1946 (1946 का 25) और विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46) के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई या कोई नियुक्ति भी है, इस अधिनियम या दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन अधिनियम, 1946 और विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 के अधीन ऐसे की गई समझी जाएगी मानो इस अधिनियम द्वारा उन अधिनियमों में किए गए संशोधन सभी तात्त्विक समयों पर प्रवर्तन में थे ।
अनुसूची
[धारा 5 (3) देखिए]
केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त या सतर्कता आयुक्त द्वारा ली जाने वाली शपथ या किए जाने वाले प्रतिज्ञान का प्ररूप-
मैं, अमुक, जो केन्द्रीय सतर्कता आयोग का केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त (या सतर्कता आयुक्त) नियुक्त हुआ हूं ईश्वर की शपथ लेता हूं/सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा, मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूंगा तथा मैं सम्यक् प्रकार से और श्रद्धापूर्वक तथा अपनी पूरी योग्यता, ज्ञान और विवेक से अपने पद के कर्तव्यों का भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना पालन करूंगा तथा मैं संविधान और विधियों की मर्यादा बनाए रखूंगा ।"
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