Citation : 2022 Latest Caselaw 514 ALL
Judgement Date : 6 April, 2022
HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD Reserved on 01.04.2022 Delivered on 06.04.2022 Court No. - 34 Case :- TRANSFER APPLICATION (CRIMINAL) No. - 309 of 2021 Applicant :- Chandrawati Opposite Party :- State Of U.P. And 2 Others Counsel for Applicant :- Ashish Singh Counsel for Opposite Party :- G.A. Hon'ble Saurabh Shyam Shamshery,J.
1. This transfer application under Section 407 Cr.P.C. has been filed seeking transfer of Complaint Case No. 1509 of 2020, under Section 306 IPC, Police Station Civil Line, District Moradabad from District Court Moradabad to District Court Meerut.
2. Sri Ashish Singh, learned counsel for applicant, submits that applicant, a 69 years old lady, has filed the aforesaid complaint case at District Moradabad against Opposite Parties No. 2 and 3 since her son committed suicide at Moradabad where he was working in Railway Department. Her statement has already been recorded under Section 200 Cr.P.C. and presently the case is at the stage of recording of statements of witnesses under Section 202 Cr.P.C. The applicant is presently residing at District Meerut with her daughter and it is very difficult for her, being an old lady, to travel about 80 Kms. from Meerut to Moradabad to attend the proceedings of complaint case and for the sake of convenience the case be transferred from Moradabad District Court to Meerut District Court.
3. None appeared on behalf of Opposite Parties No. 2 and 3 though served.
4. The above submissions are opposed by learned A.G.A. appearing for State. He submits that applicant at her own wishes chooses the jurisdiction at Moradabad and convenience of complainant cannot be considered to be a sole ground to transfer a criminal case.
5. Heard learned counsel for parties and perused the material available on record.
6. This Court has recently discussed in detail about the law with regard to transfer of criminal cases in its judgment dated 01.04.2022 passed in Transfer Application (Criminal) No. 285 of 2021 (Shailendra Kumar Prajapati vs. State of U.P. and another) and the relevant part of the judgment is reproduced hereunder:
"8. भारतीय दण्ड प्रक्रिया संहिता के अध्याय 31 में आपराधिक मामलों के अन्तरण की प्रक्रिया उल्लेखित की गई है। धारा 408 के अन्तर्गत मामलों और अपीलों को अन्तरित करने की सत्र न्यायधीश की शक्ति का उल्लेख है, जबकि धारा 407 के अंतर्गत मामलों और अपीलों को अन्तरित करने की उच्च न्यायालय की शक्ति का उल्लेख किया गया है। संदर्भ के लिये दोनों धारा निम्न उल्लेखित की जा रही है-
"407. मामलों और अपीलों को अन्तरित करने की उच्च न्यायालय की शक्ति- (1) जब कभी उच्च न्यायालय को यह प्रतीत कराया जाता है कि-
(क) उसके अधीनस्थ किसी दंड न्यायालय में ऋजु और पक्षपातरहित जांच या विचारण न हो सकेगा ; अथवा
(ख) किसी असाधारणतः कठिन विधि प्रश्न के उठने की संभाव्यता है ; अथवा
(ग) इस धारा के अधीन आदेश इस संहिता के किसी उपबंध द्वारा अपेक्षित है, या पक्षकारों या साक्षियों के लिए साधारण सुविधाप्रद होगा, या न्याय के उद्देश्यों के लिए समीचीन है,
तब वह आदेश दे सकेगा कि-
(I) किसी अपराध की जांच या विचारण ऐसे किसी न्यायालय द्वारा किया जाए जो धारा 177 से 185 तक के (जिनके अन्तर्गत ये दोनों धाराएं भी हैं) अधीन तो अर्हित नहीं है, किन्तु ऐसे अपराध की जांच या विचारण करने के लिए अन्यथा सक्षम है ;
(ii) कोई विशिष्ट मामला या अपील या मामलों या अपीलों का वर्ग उसके प्राधिकार के अधीनस्थ किसी दंड न्यायालय से ऐसे समान वरिष्ठ अधिकारिता वाले किसी अन्य दंड न्यायालय को अंतरित कर दिया जाए ;
(iii) कोई विशिष्ट मामला सेशन न्यायालय को विचारणार्थ सुपुर्द कर दिया जाए ; अथवा
(iv) कोई विशिष्ट मामला या अपील स्वयं उसको अन्तरित कर दी जाए, और उसका विचारण उसके समक्ष किया जाए।
(2) उच्च न्यायालय निचले न्यायालय की रिपोर्ट पर, या हितबद्ध पक्षकार के आवेदन पर या स्वप्रेरणा पर कार्यवाही कर सकता है :
परन्तु किसी मामले को एक ही सेशन खंड के एक दंड न्यायालय से दूसरे दंड न्यायालय को अन्तरित करने के लिए आवेदन उच्च न्यायालय से तभी किया जाएगा जब ऐसा अन्तरण करने के लिए आवेदन सेशन न्यायाधीश को कर दिया गया है और उसके द्वारा नामंजूर कर दिया गया है।
(3) उपधारा (1) के अधीन आदेश के लिए प्रत्येक आवेदन समावेदन द्वारा किया जाएगा, जो उस दशा के सिवाय जब आवेदक राज्य का महाधिवक्ता हो, शपथपत्र या प्रतिज्ञान द्वारा समर्थित होगा।
(4) जब ऐसा आवेदन कोई अभियुक्त व्यक्ति करता है, तब उच्च न्यायालय उसे निदेश दे सकता है कि वह किसी प्रतिकर के संदाय के लिए, जो उच्च न्यायालय उपधारा (7) के अधीन अधिनिर्णीत करे, प्रतिभुओं सहित या रहित बंधपत्र निष्पादित करे।
(5) ऐसा आवेदन करने वाला प्रत्येक अभियुक्त व्यक्ति लोक अभियोजक को आवेदन की लिखित सूचना उन आधारों की प्रतिलिपि के सहित देगा जिन पर वह किया गया है, और आवेदन के गुणावगुण पर तब तक कोई आदेश न किया जाएगा जब तक ऐसी सूचना के दिए जाने और आवेदन की सुनवाई के बीच कम से कम चौबीस घंटे न बीत गए हों।
(6) जहां आवेदन किसी अधीनस्थ न्यायालय से कोई मामला या अपील अंतरित करने के लिए है, वहां यदि उच्च न्यायालय का समाधान हो जाता है कि ऐसा करना न्याय के हित में आवश्यक है, तो वह आदेश दे सकता है कि जब तक आवेदन का निपटारा न हो जाए तब तक के लिए अधीनस्थ न्यायालय की कार्यवाहियां, ऐसे निबंधनों पर, जिन्हें अधिरोपित करना उच्च न्यायालय ठीक समझे, रोक दी जाएंगी:
परन्तु ऐसी रोक धारा 309 के अधीन प्रतिप्रेषण की अधीनस्थ न्यायालयों की शक्ति पर प्रभाव न डालेगी।
(7) जहां उपधारा (1) के अधीन आदेश देने के लिए आवेदन खारिज कर दिया जाता है वहां, यदि उच्च न्यायालय की यह राय है कि आवेदन तुच्छ या तंग करने वाला था तो वह आवेदक को आदेश दे सकता है कि वह एक हजार रुपए से अनधिक इतनी राशि, जितनी वह न्यायालय उस मामले की परिस्थितियों में समुचित समझे, प्रतिकर के तौर पर उस व्यक्ति को दे जिसने आवेदन का विरोध किया था।
(8) जब उच्च न्यायालय किसी न्यायालय से किसी मामले का अन्तरण अपने समक्ष विचारण करने के लिए उपधारा (1) के अधीन आदेश देता है तब वह ऐसे विचारण में उसी प्रक्रिया का अनुपालन करेगा जिस मामले का ऐसा अन्तरण न किए जाने की दशा में वह न्यायालय करता।
(9) इस धारा की कोई बात धारा 197 के अधीन सरकार के किसी आदेश पर प्रभाव डालने वाली न समझी जाएगी।
408. मामलों और अपीलों को अन्तरित करने की सेशन न्यायाधीश की शक्ति- (1) जब कभी सेशन न्यायाधीश को यह प्रतीत कराया जाता है कि न्याय के उद्देश्यों के लिए यह समीचीन है कि इस उपधारा के अधीन आदेश दिया जाए, तब वह आदेश दे सकता है कि कोई विशिष्ट मामला उसके सेशन खंड में एक दंड न्यायालय से दूसरे दंड न्यायालय को अन्तरित कर दिया जाए।
(2) सेशन न्यायाधीश निचले न्यायालय की रिपोर्ट पर या किसी हितबद्ध पक्षकार के आवेदन पर या स्वप्रेरणा पर कार्यवाही कर सकता है।
(3) धारा 407 की उपधारा (4), (5), (6), (7) और (9) के उपबंध इस धारा की उपधारा (1) के अधीन आदेश के लिए सेशन न्यायाधीश को आवेदन के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे धारा 407 की उपधारा (1) के अधीन आदेश के लिए उच्च न्यायालय को आवेदन के संबंध में लागू होते हैं, सिवाय इसके कि उस धारा की उपधारा (7) इस प्रकार लागू होगी मानो उसमें आने वाले "एक हजार रुपए" शब्दों के स्थान पर "दो सौ पचास रुपए" शब्द रख दिए गए हैं।"
9. उच्चतम न्यायालय ने कई निर्णयों में स्थानान्तरण के कारणों की व्याख्या की है। न्याय न केवल होना चाहिये परन्तु हुआ है ऐसा दर्शित भी होना चाहिये। अन्तरण की विधि सुस्थापित है कि अगर किसी पक्षकार को यह यथोचित आशंका है कि उसे न्याय की प्राप्ति नहीं हो पायेगी तो मामला या अपील का अन्तरण कर देना चाहिए। इस नाते पक्षकार को यह दर्शाने की आवश्यकता नहीं है कि न्याय अनिवार्य रुप से विफल हो जायेगा, अगर वो ऐसे परिस्थितियां दिखाने में सफल होता जाता है, जिनसे यह अनुमान लगाया जा सकता है, कि उसको आशंका है, जो परिस्थितियों के मद्देनजर यथोचित भी है तो स्थान्तरण का मामला हो जायेगा। परन्तु मात्र अभिकथन की किसी मामले में न्याय न होने की आशंका है, स्थान्तरण का पर्याप्त कारण नहीं होगा तथा न्याय के उद्देश्यों के लिये समीचीन भी नहीं होगा। न्यायालय को यह निर्धारित करना होगा कि उक्त आशंका यथोचित है न कि काल्पनिक जो मात्र अनुमान और अटकलों पर आधारित है।
10. स्थान्तरण के आवेदन को निस्तारित करने के कोई नियमित या सख्त नियम विहित नहीं किये जा सकते है तथा मामले की परिस्थितियों के संदर्भ में ही आवेदन निस्तारित किये जाने चाहिये। पक्षकारों व साक्षियों की सुविधा का अर्थ अनिवार्य रुप से आवेदक की ही सुविधा नहीं है, जो न्यायालय के समक्ष आशंका की मिथ्य धारणा के आधार पर आवेदन करता है। स्थान्तरण के संदर्भ में सुविधा का तात्पर्य अभियोजन, अन्य अभियोगी, साक्षियों व वृहत रुप से समाज की सुविधा से है। निष्पक्ष सुनवाई का आश्वासन, न्याय व्यवस्था की प्रथम अनिवार्यता है। आपराधिक विचारण का उद्देश्य, ऐसा उचित व निष्पक्ष न्याय प्रदान करना है, जो किसी भी प्रकार के वाह्य प्रतिफल से अप्रभावित हो।
11. प्रकरण में अगर यह विदित हो जाये कि समाज का विचारण के निष्पक्षता पर विश्वास गंभीर रुप से दुर्बल हो गया है, पीड़ित पक्ष स्थानान्तरण के लिये आवेदन कर सकता है। अगर आपराधिक विचारण निष्पक्ष व स्वतंत्र नहीं है और अगर वो पक्षपात पूर्ण हो तो आपराधिक न्याय व्यवस्था दाँव पर लग जायेगी और जन सामान्य का व्यवस्था के प्रति विश्वास अस्थिर हो जायेगा।
12. न्याय की निष्पक्षता, संविधान का मूल भूत विशिष्टता है, जो यह अपेक्षा करता है कि न्यायधीश, शासकीय अभियोजक, अपराधी का अधिवक्ता या न्यायालय मित्र का सामाजिक हितों में ताल मेल रखते हुए तथा अपराधी के हैसियत व शासन के प्रभाव से अप्रभावित होकर कार्य करेंगे।
(देखें : गुरुचरन दास चड्ढा प्रति राजस्थान राज्य ए आई आर : (1966) एस सी 1418, अमरिन्दर सिंह प्रति प्रकाश सिंह बादल : (2009) 6 एस सी सी 260, लालू प्रसाद यादव प्रति झारखण्ड राज्य : (2013) 8 एस सी सी 593, नाहर सिंह यादव प्रति भारत संघ (2011) 1 एस सी सी 307 व उसमान गनी आदम भाई वोहरा प्रति गुजरात राज्य व एक अन्य : (2016) 3 एस सी सी 370, राजकुमार साबू प्रति मे. साबू ट्रेड प्राइवेट लिमिटेड : 2021 एस सी सी ऑनलाइन एस सी 378)"
7. In the present case, the applicant is presently aged about 69 years old and she is pursuing the complaint case against Opposite Parties No. 2 and 3 for abatement of suicide of her son. Earlier she was residing alongwith her son at Moradabad where he was working in Northern Railway, Moradabad. However, after her son committed suicide, she is presently residing at Moradabad with her daughter. Supreme Court in Rajkumar Sabu vs M/S Sabu Trade Private Limited, 2021 SCC Online SC 378 has held that the convenience of parties may also be a relevant factor for transfer if the convenience is based on a reasonable apprehension and valid ground. In the present case, applicant, an old lady and has to travel about 80 Kms. from Meerut to Moradabad and also taking note that presently complaint case is at the stage of recording of statement of witnesses under Section 202 Cr.P.C., I am of the view that a case of transfer is made out.
8. In the result, the application is allowed. Complaint Case No. 1509 of 2020, under Section 306 IPC, Police Station Civil Line, District Moradabad, pending in the Court of Judicial Magistrate, Moradabad is transferred to the Competent Court at District Meerut.
Order Date :- 06.04.2022
AK
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