किसी फिल्म या सांस्कृतिक कार्यक्रम के विरोध में हिंसक भीड़ से सरकारी या निजी संपत्ति को होने वाले नुकसान पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति या समूह के उकसाने, पहल या किसी अन्य कारणों की वजह से सांस्कृतिक कार्यक्रमों के खिलाफ हिंसा हो। और उस हिंसा की वजह से किसी की जान चली जाए या प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से संपत्तियों का नुकसान हो तो उन्हें हिंसा पीड़ित को मुआवजा देना होगा।
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने राज्य सरकारों को जिलावार रैपिड रिस्पांस टीम का गठन करने के लिए कहा है। ताकि बिना विलंब के इस तरह की घटनाओं पर काबू पाया जा सके। साथ ही विशेष हेल्पलाइन शुरू करने और पुलिस को साइबर पोर्टल के जरिये घटनाओं का रिकॉर्ड रखने के लिए कहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है। कि किसी समूह या संगठन द्वारा आयोजित धरना या प्रदर्शन से हिंसा हो या संपत्तियों का नुकसान हो तो उस समूह या संगठन के नेताओं से घटना के 24 घंटे के भीतर थाने में पूछताछ होनी चाहिए। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने कई अन्य निर्देश जारी करते हुए केंद्र व राज्यों सरकारों को आठ हफ्ते के भीतर इन निर्देशों का पालन करने के लिए कहा है। पीठ ने यह फैसला कोडुंगल्लूर फिल्म सोसायटी की याचिका पर दिया है, जिसमें विवादास्पद फिल्म पद्मावत फिल्म की रिलीज से पहले कई राज्यों में हुई हिंसा और तोड़फोड़ का जिक्र किया गया था। पीठ ने कहा कि राज्यों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसी घटनाओं को होने से पहले ही रोका जाना चाहिए। साथ ही हिंसा के कारण संपत्तियों का नुकसान होने पर पुलिस को एफआईआर दर्ज करनी चाहिए। और तय समय के भीतर जांच पूरी कर रिपोर्ट देनी होगी। इसमें कोताही बरतने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि जमानत देते वक्त निचली अदालतें मुआवजे की राशि को ध्यान में रखते हुए आरोपियों से उतनी राशि का बॉन्ड ले सकते हैं जितने का नुकसान हुआ है। बता दें कि ये चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा का आखिरी कार्यदिवस था और आखिरी बड़ा फैसला भी। बेंच में चीफ जस्टिस के अलावा जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड शामिल थे।
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