सर्वोच्य न्यायालय ने इस साल कई ऐतिहासिक फैसले लिए हैं। जिनसे देश के नागरिकों को राहत मिली है। इन सभी फैसलों ने न केवल न्याय को सुनिश्चित किया है बल्कि उन मुद्दों पर भी फैसला सुनाया है जिसे समाज का बड़ा तबका मानने और स्वीकार करने से इंकार करता रहा है। ये फैसले देश में बेहतर बदलाव लाने के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित होंगे। आपको उन सात ऐतिहासिक फैसलों के बारे में बताते हैं

1.पैसिव यूथेनेशिया को इजाजत

इसी साल मार्च में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ ने लिविंग विल यानी इच्छा मृत्यु पर फैसला सुनाया। जिसमें कोर्ट ने लिविंग विल में पैसिव यूथेनेशिया को इजाजत दी दे। साथ ही पीठ ने इसके तहत सुरक्षा उपायों के दिशानिर्देष भी जारी किए। कोर्ट ने ऐसे मामलों में भी दिशानिर्देष जारी की जिनमें एडवांस में ही लिविंग विल नहीं है। इसके तहत परिवार का सदस्य या दोस्त हाईकोर्ट जा सकता है और हाईकोर्ट मेडिकल बोर्ड बनाएगा जो तय करेगा कि पैसिव यूथेनेशिया की जरूरत है या नहीं। कोर्ट ने कहा कि ये गाइडलान तब तक जारी रहेंगी जब तक कानून नहीं आता। कोर्ट ने कहा कि एक मनुष्य को गरीमापूर्म मृत्यु का अधिकार भी प्राप्त होना चाहिए।

क्या है पैसिव यूथेनेसिया?

एक्टिव और पैसिव यूथेनेशिया में अंतर ये होता है कि एक्टिव में मरीज की मृत्यु के लिए कुछ किया जाए जबकि पैसिव यूथेनेशिया में मरीज की जान बचाने के लिए कुछ ना किया जाए।

2.निजता का अधिकारबीते साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक व्यक्ति की गोपनीयता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद-21 के अंतर्गत आता है। जो इसे मौलिक अधिकार के दायरे में भी लाता है। 9 जजों की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि अनुच्छेद-21 के तहत निजता का अधिकार भी जीने के अधिकार और निजी स्वतंत्रता के अधिकार का ही हिस्सा है।

3.तीन तलाक अवैध घोषित

सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक पर फैसला सुनाते हुए कहा कि मुस्लिम महिलाओं को उनके पतियों द्वारा एक ही बार में तीन बार तलाक कहकर तलाक दे देना गैरकानूनी है। बीते साल अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला सुनाया। करीब तीन दशकों से अटके इस मुद्दे पर कोर्ट के फैसले को ऐतिहासिक कहा गया। सरकार हाल की में तीन तलाक विधेयक भी लेकर आई है जिसमें केंद्रीय कैबिनेट ने एक बार में तीन तलाक को दंडनीय अपराध बनाने के अध्यादेश को मंजूरी दी थी। जिस पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी मुहर लगा दी है। अब सरकार को 6 महीने में इस बिल को पास कराना होगा।

4.धारा 377 को अपराध की श्रेणी से बाहर करना

सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने 6 सितंबर को समलैंगिकता पर बने कानून धारा 377 पर बड़ा फैसला लिया और इसे अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया। यानि सहमति से दो वयस्कों के बीच बने समलैंगिक यौन संबंध को एक मत से अपराध के दायरे से बाहर किया गया। कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के एक हिस्से को, जो सहमति से अप्राकृतिक यौन संबंध को अपराध बताता है, तर्कहीन, बचाव नहीं करने वाला और मनमाना करार दिया। पांच जजों की बेंच ने अंग्रेजों के समय में बनाए गए इस 157 साल पुराने कानून को खत्म कर दिया।

5.व्यभिचार अब अपराध नहीं

ब्रिटिश काल में करीब 158 साल पहला बना व्यभिचार कानून यानि आईपीसी की धारा 497 को भी सुप्रीम कोर्ट ने अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने 27 सितंबर को अपने फैसले में व्यभिचार से संबंधित दंडात्मक प्रावधान को असंवैधानिक घोषित करते हुए कहा कि यह स्पष्ट रूप से मनमाना है और महिला की वैयक्तिकता को ठेस पहुंचाता है। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से व्यभिचार से संबंधित 158 साल पुरानी भारतीय दंड संहिता को असंवैधानिक करार देते हुए इस दंडात्मक प्रावधान को निरस्त कर दिया। इस कानून के तहत केवल पुरुषों को ही दोषी माना जाता रहा है जिससे समानता के अधिकार का उल्लंघन होता है।

6.आधार की वैधता

कुछ ही दिनों पहले सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड की कानूनी संवैधानिकता को वैध करार दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने बहुत सारी सेवाओं के लिए इसका प्रयोग बरकरार रखा है। हालांकि कोर्ट ने कई सेवाओं में आधार नंबर का प्रयोग करना अवैध करार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि राशन, पैन कार्ड, आयकर रिटर्न, वृद्धावस्था पेंशन, दिव्यांग पेंशन, नेत्रहीन पेंशन के लिए आधार कार्ड की आवश्यकता होगी। साथ ही कोर्ट ने कहा कि इससे लोगों के आम जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। आधार कार्ड अब स्कूल में दाखिले, सीबीएसई परीक्षा, बैंक खाता, मोबाइल सिम खरीदने, जेईई, कैट और नेट जैसी परीक्षाओं के लिए जरूरी नहीं होगा। साथ ही कोर्ट ने कहा कि कोई भी बैंक अपने ग्राहकों को आधार नंबर अकाउंट से लिंक कराने के बारे में नहीं कह सकता।

7.सबरीमाला पर फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर को एक और ऐतिहासिक फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने महिलाओं को एक बड़ी खुशखबरी दी। कोर्ट ने केरल के सबरीमाला मंदिर पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मंदिर में हर उम्र की महिलाओं को प्रवेश करने और पूजा करने की इजाजत दे दी।

बता दें कि यहां पिछले 800 साल से 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी थी। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस खानविल्कर ने कहा कि अयप्पा के भक्तों में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। महिलाओं को पूजा से रोकना उनके अधिकारों का हनन है और औरतों के खिलाफ धर्म का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

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