हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग में अनुबंध चिकित्सा अधिकारियों की सेवाएं समाप्त करने और उन्हें दिए गए वित्तीय लाभों को वसूलने के राज्य सरकार के आदेश को सही ठहराया है। न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की अदालत ने याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि नियमों और प्रॉस्पेक्टस की शर्तों का उल्लंघन कर प्राप्त किए गए किसी भी लाभ को जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चयन डायरेक्ट कोटे से हुआ था और एनेस्थिसियोलॉजी विभाग में इन-सर्विस उम्मीदवारों के लिए कोई सीट ही नहीं थी, इसलिए डॉक्टरों को एडमिशन से पहले इस्तीफा देना चाहिए था।

डॉक्टरों की इस दलील पर कि विभाग ने कुछ अन्य डॉक्टरों को भी ऐसा लाभ दिया है। कोर्ट ने कहा कि यदि अतीत में राज्य सरकार की ओर से कोई अवैध काम या गलती हुई है, तो उसी गलती को दोहराने की मांग अधिकार के रूप में नहीं की जा सकती। जब नोटिस में डॉक्टरों ने खुद स्वीकार किया कि वे शर्तें पूरी नहीं करते थे और तथ्य स्पष्ट थे, तो अलग से लंबी जांच की आवश्यकता नहीं थी। अदालत ने साफ किया कि सरकार डॉक्टरों की एमडी की डिग्री को रद्द नहीं कर रही है, बल्कि केवल चिकित्सा अधिकारी के रूप में उनकी सरकारी सेवा को समाप्त कर रही है। कोर्ट ने सरकार की ओर से की जाने वाली रिकवरी और टर्मिनेशन की कार्रवाई को पूरी तरह वैध बताया है।

उल्लेखनीय है कि याचिकाकर्ता डॉक्टर को साल 2004 में अनुबंध के आधार पर चिकित्सा अधिकारी नियुक्त किया गया। जनवरी 2007 में उन्होंने पोस्ट ग्रेजुएट प्रवेश परीक्षा के लिए आवेदन किया। प्रॉस्पेक्टस के नियमों के अनुसार इन-सर्विस (सरकारी सेवा में रहते हुए) कोटा का लाभ उठाने के लिए ग्रामीण या जनजातीय क्षेत्रों में नियमित सेवा की एक निश्चित अवधि पूरी करना अनिवार्य था। चूंकि, डॉक्टर उस समय अनुबंध पर थे और उन्होंने अनिवार्य अवधि पूरी नहीं की थी, इसलिए उन्होंने डायरेक्ट कैंडिडेट के रूप में आवेदन किया और अनुसूचित जनजाति कोटे के तहत एमडी एनेस्थिसियोलॉजी की सीट हासिल की। नियमों और खुद के की ओर से दिए गए हलफनामे के अनुसार डायरेक्ट कोटे से चयन होने पर डॉक्टर को अपने पिछले पद से इस्तीफा देना था।,लेकिन याचिकाकर्ता ने इस्तीफा देने के बजाय चालाकी से विभाग में अपनी डिपार्चर रिपोर्ट सौंप दी।

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