राजस्थान उच्च न्यायालय ने कहा,कि यौन अपराधों से संबंधित सभी मामलों से संबंधित सभी मामलों में पीड़ित की निजी,अश्लील फोटो,वीडियो केवल सीलबंद लिफोफे अथवा पासकोर्ड लॉक इलेक्ट्रॉनिक फोल्डर में ही पेश की जाए। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश अनूपचंद ढंढ ने एक आपराधिक मामले की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है।
न्यायालय ने कहा कि आजकल जमानत याचिकाओं,आपराधिक रिवीजन,अपील सहित अन्य मामलों में आरोपित अथवा पुलिस पीड़ित की फोटो अथवा सीडी अथवा पेन ड्राइव में याचिका के साथ संलग्न कर रही है। पीड़ित के फोटो,वीडियो वायरल होने की आशंका रहती है,जो किसी महिला के वर्तमान,भविष्य एवं वैवाहिक जीवन को पूरी तरह से तबाह कर सकती है।
न्यायालय ने कहा,ऐसा करना महिलाओं की गरिमा एवं गोपनीयता का उल्लंघन है। न्यायालय ने कहा,भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन जीने का सैंवधानिक अधिकार प्राप्त है। लेकिन जब जांच ही अपमान में बदल जाए तो कानूनी प्रक्रिया स्वयं एक सजा बन जाती है। अब अदालती ट्रायल सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करने का जरिया बन जाए तो यह व्यक्ति के सैंवधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।
न्यायालय ने कहा,यह देखने में आया है कि अक्सर आरोपित अथवा उनके वकील खुद के बचाव में यह दिखाने के लिए कि दोनों पक्षों के बीच संबंध आपसी सहमति से थे,ऐसी निजी फोटो और वीडियो जांच अधिकारी एवं न्यायालय के समक्ष खुले में पेश करते हैं। यह न केवल महिला की निजता पर हमला है, बल्कि खुली फाइलों के जरिए पीड़ित की पहचान को सार्वजनिक करना भी है।
न्यायाधीश ने उच्च न्यायालय के पंजीयक को यौन अपराधों से संबंधित सभी याचिकाओं की सख्त जांच करने के निर्देश दिए हैं,जिससे नाम,पता,फोटो अथा इंटरनेट मीडिया विवरण सार्वजनिक नहीं हो। पंजीयक को सभी न्यायिक अधिकारियों को यह आदेश भेजने के साथ ही गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव,पुलिस महानिदेशक एवं विधि सचिव को भी भेजने के निर्देश दिए गए हैं।
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