इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर मध्य रेलवे की ओर एटीवीएम फैसिलिटेटर रोहित सोनी का चयन बिना सुनवाई के निरस्त किए जाने के मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि यदि किसी प्रशासनिक आदेश से संबंधित व्यक्ति की छवि प्रभावित होती है या उस पर कलंक लगता है, तो आदेश पारित करने से पहले उसे सुनवाई का अवसर देना आवश्यक है। न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने रोहित सोनी की याचिका का निस्तारण करते हुए यह आदेश दिया।
याची अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि 27 अप्रैल 2026 को सहायक वाणिज्य प्रबंधक/कोचिंग, नॉर्थ सेंट्रल रेलवे ने बिना कारण बताओ नोटिस जारी किए और बिना पक्ष सुने उनका अनुबंध तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया तथा 50 हजार रुपये की सुरक्षा धनराशि भी जब्त कर ली। याचिका में रेलवे प्रशासन की कार्रवाई को एकतरफा, दुर्भावनापूर्ण और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत बताया गया। हाईकोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर टिप्पणी किए बिना याची को एक माह के भीतर नया प्रत्यावेदन देने की अनुमति दी और रेलवे प्रशासन को व्यक्तिगत सुनवाई कर एक माह में कानून के अनुसार निर्णय लेने का निर्देश दिया।
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