मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों की पेंशन नीति को लेकर एक बेहद संवेदनशील और बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी दिवंगत सरकारी कर्मचारी की तलाकशुदा बेटी को परिवार का सदस्य मानने से इनकार करना पूरी तरह गलत है। यह कदम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मिले समानता के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
जस्टिस विशाल धगत की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए होमगार्ड महानिदेशक के उस पुराने आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें एक रिटायर्ड जिला कमांडेंट की तलाकशुदा बेटी को पेंशन का नामांकित सदस्य मानने से मना कर दिया गया था।
नियमों की विसंगति पर अदालत की तल्ख टिप्पणी
हाई कोर्ट ने सिविल सेवा पेंशन नियम 1976 की विसंगतियों पर बात करते हुए कहा कि जब इस नियम के तहत शादीशुदा बेटियों को परिवार की परिभाषा में शामिल किया गया है, तो तलाकशुदा बेटियों को इससे बाहर रखने की कोई ठोस वजह नजर नहीं आती। अदालत के मुताबिक, अविवाहित, विवाहित और तलाकशुदा बेटियों के बीच इस तरह का अंतर नहीं किया जा सकता।
पेंशन नियम 1976 के प्रावधानों को देखने पर पता चलता है कि तलाकशुदा बेटी परिवार की परिभाषा में शामिल नहीं है, जबकि नियम 44(5) के तहत शादीशुदा बेटी को इसमें जगह दी गई है। यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। अगर शादीशुदा बेटी को परिवार का सदस्य माना जा सकता है, तो तलाकशुदा बेटी को अलग रखने का कोई कारण नहीं है।
90 दिनों के भीतर फैसला लेने का निर्देश
यह पूरा मामला भोपाल-जबलपुर क्षेत्र के शंकरलाल श्रीवास्तव से जुड़ा है, जिनका साल 2017 में निधन हो गया था। उन्होंने अपनी मौत से पहले अपनी तलाकशुदा बेटी ज्योति श्रीवास्तव को पेंशन के लिए नामांकित करने की अर्जी दी थी। दिसंबर 2021 में होमगार्ड डीजी ने इस अर्जी को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि तलाकशुदा बेटी नियमों के मुताबिक निर्भर नहीं मानी जाती।
अब हाई कोर्ट ने इस आदेश को पलटते हुए विभाग को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता की स्थिति की दोबारा समीक्षा की जाए। अगर वह अपने दिवंगत पिता पर आश्रित पाई जाती हैं, तो उन्हें तुरंत फैमिली पेंशन का लाभ दिया जाए। कोर्ट ने होमगार्ड डीजी को इस पूरी प्रक्रिया को 90 दिनों के भीतर पूरा कर अंतिम आदेश जारी करने को कहा है।
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