देश की अदालतों में आधी आबादी को उनका हक दिलाने और न्याय प्रणाली में लैंगिक असमानता को दूर करने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और संवेदनशील कदम उठाया है। कोर्ट ने सरकारी पैनलों और विधि अधिकारी (लॉ आफिसर) के पदों पर महिला वकीलों को न्यूनतम 30 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से जवाब मांगा है।
चीफ जस्टिस (सीजेआई) सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की पीठ ने 'लाडली फाउंडेशन ट्रस्ट' द्वारा दायर इस याचिका पर गंभीरता से विचार करते हुए यह नोटिस जारी किया। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कोर्ट में दलील देते हुए कहा कि महिला वकीलों की स्थिति पर किए गए एक हालिया सर्वेक्षण के बाद यह याचिका दायर की गई है।
सरकारी पैनलों में महिलाओं को शामिल किया जाना उनके संवैधानिक अधिकारों के लिए बेहद जरूरी है। 75 वर्षों में एक भी महिला अटार्नी जनरल नहीं याचिका में देश की कानूनी प्रणाली में महिलाओं की कम भागीदारी को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े और कड़वी सच्चाई सामने रखी गई है। याचिका के अनुसार, आजादी के 75 से अधिक वर्षों के बाद भी आज तक कोई महिला भारत की अटार्नी जनरल या सालिसिटर जनरल नहीं बन सकी है।
वर्ष 1989 में जस्टिस एम. फातिमा बीवी के देश की पहली महिला जज बनने के बाद से पिछले 35 वर्षों में केवल 11 महिलाएं ही सुप्रीम कोर्ट की जज बन पाई हैं। वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में केवल 5.88 प्रतिशत और हाई कोर्ट्स में करीब 13.76 प्रतिशत महिला जज हैं। सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने भी एक वाकया साझा किया। उन्होंने बताया कि तेलंगाना के एक बार निकाय की महिला प्रतिनिधि उनसे मिली थीं, जिन्हें वहां सचिव नियुक्त किया गया है।
सीजेआई ने जब वहां की कुल संख्या पूछी, तो पता चला कि 19 हजार वकीलों में से करीब दो हजार महिला वकील हैं, लेकिन पद पर केवल एक महिला को जगह मिली है। कानूनी दुनिया में लैंगिक असमानता खत्म करने की गुहार याचिका में कहा गया है कि देश में कुल 15.4 लाख नामांकित वकीलों में से केवल 2.84 लाख (लगभग 15.31 प्रतिशत) ही महिलाएं हैं। बेटियां रिकार्ड संख्या में ला कालेजों में दाखिला तो ले रही हैं, लेकिन पेशेवर प्रगति के स्तर पर उन्हें व्यवस्थागत रुकावटों का सामना करना पड़ता है।
सरकारी पैनलों से महिलाओं का यह बहिष्कार केवल पेशेवर असमानता नहीं, बल्कि एक गंभीर संवैधानिक चूक है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट पैनल, हाई कोर्ट पैनल और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों सहित सभी कानूनी स्तरों पर महिलाओं को 30 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए एक समान दिशानिर्देश बनाए जाएं, ताकि संविधान के अनुच्छेद 14, 15(3), 19(1)(जी) और 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों की रक्षा हो सके।
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