हिंदू संगठनों से जुड़े कुछ लोगों ने मांग की है कि अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों और मदरसों को भी शिक्षा के अधिकार (RTE) कानून के दायरे में लाया जाए। इसी मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई की, लेकिन फिलहाल कोई सीधा आदेश देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अपनी मांगों को लेकर केंद्र सरकार से संपर्क करने की सलाह दी और सरकार को याचिका पर उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय ने यह जनहित याचिका दायर की थी। याचिका में मांग की गई थी कि अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों और मदरसों को भी शिक्षा के अधिकार कानून और मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के तहत लाया जाए। मामले की सुनवाई जस्टिस वी. पंकरदा और जस्टिस सीतेश चंद्र शर्मा की डिवीजन बेंच ने की। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने अदालत से सीधा हस्तक्षेप करने और केंद्र सरकार को निर्देश जारी करने की मांग की।
सुप्रीम कोर्ट ने दी नसीहत
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के संवेदनशील और व्यापक प्रभाव वाले मामलों में जल्दबाजी में फैसला नहीं लिया जा सकता। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा, “आप ऐसे लोगों का सामना कर रहे हैं जो अपनी सोच में काफी पारंपरिक और सतर्क हैं, इसलिए अदालत भी जल्दबाजी में कोई आदेश नहीं दे सकती।” बेंच ने यह भी कहा कि न्याय सिर्फ अदालतों के जरिए नहीं होता, बल्कि प्रशासन की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अदालत ने अपने संक्षिप्त आदेश में केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह 4 फरवरी 2026 को याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए प्रतिनिधित्व पर विचार करे और उचित कार्रवाई के बाद उन्हें अपने फैसले से अवगत कराए।
याचिका में क्या कहा गया?
याचिका में कहा गया था कि शिक्षा के अधिकार कानून का लाभ देश के सभी बच्चों को समान रूप से मिलना चाहिए और अल्पसंख्यक संस्थानों को इससे बाहर रखना समानता के सिद्धांत के खिलाफ है। इसके साथ ही मदरसा शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक शिक्षा प्रणाली के अनुरूप लाने की भी मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह साफ किया कि फिलहाल वह इस विषय पर कोई प्रत्यक्ष आदेश पारित नहीं कर रही है। कोर्ट ने कहा कि पहले केंद्र सरकार को इस मामले पर अपना रुख स्पष्ट करने और याचिकाकर्ता की मांगों पर विचार करने का अवसर दिया जाना चाहिए।
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