इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 18 साल पुराने अपहरण और दुष्कर्म मामले में कहा कि सिर्फ पुलिस के समक्ष दिए गए बयान के आधार पर किसी आरोपी को दोषी ठहराना उचित नहीं माना जा सकता। जब तक उसके समर्थन में ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य न हों। कोर्ट ने उम्रकैद की सजा पाए आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने आरोपी रजनीश की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए दिया।
मेरठ निवासी नाबालिग के पिता ने आरोपी रजनीश के खिलाफ अपहरण और दुष्कर्म समेत गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया था। अभियोजन के अनुसार मृतक के पिता ने आरोप लगाया था कि नाबालिग बेटी पांच नवंबर 1997 को शौच के लिए घर से निकली थी लेकिन लौटी नहीं। बाद में पुलिस ने नाबालिग को आरोपी पक्ष के लोगों के साथ एक बुग्गी से बरामद किया। नाबालिग ने पुलिस के समक्ष दिए बयान में आरोप लगाया था कि आरोपी ने गन्ने के खेत में उसके साथ दुष्कर्म किया।
उसी रात उसने फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली थी। मुकदमे में अभियोजन का मुख्य आधार मृतका का वह बयान था जिसे पुलिस ने दर्ज किया था। ट्रायल कोर्ट ने इसी बयान को मृत्युपूर्व कथन मानते हुए आरोपी को दोषी करार दिया था। हाईकोर्ट ने कहा कि विशेष परिस्थितियों में पुलिस के समक्ष दिए बयान को मृत्युपूर्व कथन के रूप में स्वीकार किया जा सकता है लेकिन उसकी विश्वसनीयता का कठोर परीक्षण जरूरी है। कोर्ट ने मेरठ की ट्रायल कोर्ट की ओर से 21 मई 2008 को सुनाई गई दोषसिद्धि और सजा को निरस्त कर दिया।
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