राज्य मानवाधिकार आयोग की शक्तियों की सीमा को लेकर लगातार उठते सवालों के बीच अब पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने इसका उत्तर देने की तैयारी कर ली है।
हाईकोर्ट ने अब इस कानूनी प्रश्न को लेकर सुनवाई करने का निर्णय लिया है। मानवाधिकार आयोग के फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाएं हाईकोर्ट में लगातार दाखिल की जा रही थीं कि आयोग को केवल सिफारिश करने का अधिकार है, निर्देश जारी नहीं किए जा सकते।
करीब 19 साल पुराने विवाद को लेकर मानवाधिकार आयोग के कहने पर दर्ज हुई एफआईआर के बाद यह सांविधानिक और वैधानिक मुद्दा अदालत के सामने आया है। याची ने आरोप लगाया है कि सिविल प्रकृति के मामले को दबाव बनाने के लिए आपराधिक रंग दिया गया। अप्रैल 2007 में याची ने लुधियाना में तीन एकड़ से अधिक भूमि बेचने का समझौता किया था। इस सौदे के तहत एक करोड़ रुपये बतौर बयाना राशि दी गई थी।
हालांकि यह भूमि पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित मुकदमे से जुड़ी थी इसलिए अंतिम बिक्री उस फैसले पर निर्भर थी। बाद में मूल खरीदार पीछे हट गया और उसकी जगह एक कंपनी लाई गई जिसके साथ नया एग्रीमेंट किया गया। याचिकाकर्ता के अनुसार सुप्रीम कोर्ट से अपने पक्ष में फैसला आने के बाद भी कंपनी ने सौदा पूरा नहीं किया। इसके चलते समझौता रद्द कर दिया गया। इसी मामले को लेकर दिल्ली में एफआईआर दर्ज हुई थी। बाद में एक शिकायत पंजाब मानवाधिकार आयोग को दी गई और आयोग के आदेश पर मार्च 2026 में दूसरी एफआईआर दर्ज कर दी गई।
हाईकोर्ट को बताया गया कि आयोग ने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्य किया है। अब हाईकोर्ट यह तय करेगा कि क्या है और क्या आयोग सीधे एफआईआर दर्ज कराने का आदेश दे सकता है या उसकी भूमिका केवल सिफारिश तक सीमित है।
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