इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मदरसा प्रबंधन समिति की मान्यता रद्द करने के आदेश को निरस्त कर दिया है और मामले को पुनः विचार के लिए संबंधित प्राधिकारी के पास भेज दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि प्रशासनिक प्रक्रिया में गंभीर त्रुटियां हुईं, जिससे याचिकाकर्ताओं को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर नहीं मिल सका।
यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकलपीठ ने आजमगढ़ की कमेटी मैनेजमेंट ऑफ दारुल उलूम अहले सुन्नत मदरसा अशरफिया मिसबाहुल उलूम और अन्य की याचिका पर दिया है। नौ जनवरी 2026 के आदेश से मदरसे की मान्यता रद्द कर दी गई थी। कमेटी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
याची अधिवक्ता ने दलील दी कि सात जनवरी 2026 को याचिकाकर्ताओं को नोटिस जारी कर सात दिन का समय जवाब दाखिल करने के लिए दिया गया था। हालांकि, निर्धारित समय पूरा होने से पहले ही आदेश पारित कर दिया गया। यह भी दलील दी कि उन्हें समय दिया जाता तो वह धन के दुरुपयोग और कथित राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के आरोपों पर महत्वपूर्ण दस्तावेज प्रस्तुत कर सकते थे। विवादित राशि पहले ही सरकारी खजाने में जमा कर दी गई है।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि नोटिस गलती से जारी हुआ था और बाद में उसे वापस ले लिया गया। कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि याची का पक्ष सुने बिना आदेश पारित करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। कोर्ट ने विवादित आदेश रद्द कर दिया और कहा कि याचिकाकर्ताओं को एक सप्ताह का समय देकर नया जवाब मांगा जाए और संबंधित प्राधिकारी 14 दिनों में कारणयुक्त नया निर्णय पारित करें।
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