राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया है कि न्याय पाने के लिए हर बार कोर्ट का दरवाजा खटखटाना अनिवार्य नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि यदि किसी मामले में एक आरोपी को राहत मिलती है और सह-आरोपी की परिस्थितियां समान हैं, तो उसे भी स्वतः उसी राहत का लाभ मिल सकता है।

इसी सिद्धांत को लागू करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने एक मामले में बिना याचिका दायर किए ही सह-आरोपी को बड़ी राहत देते हुए उसके खिलाफ दर्ज FIR, चार्जशीट और ट्रायल कोर्ट में लंबित पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया।

राजस्थान हाईकोर्ट का यह निर्णय न्यायिक व्यवस्था में समानता और निष्पक्षता का मजबूत उदाहरण है।

हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि

न्याय केवल प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका उद्देश्य हर उस व्यक्ति तक पहुंचना है जो समान परिस्थितियों में है—चाहे वह कोर्ट आया हो या नहीं।

जस्टिस अनिल कुमार उपमन की एकलपीठ ने यह रिपोर्टेबल जजमेंट संयुक्त शेखारी की ओर से दायर आपराधिक याचिका पर दिया है।

क्या था मामला?

यह मामला जोधपुर के नागौरी गेट थाना क्षेत्र में वर्ष 2016 में दर्ज मुकदमे से जुड़ा है।

मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता भगवती चौहान ने याचिकाकर्ता संयुक्त शेखारी और सुनील बावेजा पर आरोप लगाया कि आरोपियों ने लोकल डिस्ट्रीब्यूटर्शिप के नाम पर ₹2,96,000 की राशि ली, लेकिन बाद में सामान की आपूर्ति नहीं की।

जांच पूर्ण होने पर पुलिस ने दोनों आरोपियों के विरुद्ध चार्जशीट दाखिल की और मामला ट्रायल कोर्ट में लंबित था।

चूंकि याचिकाकर्ता जांच में शामिल नहीं हुआ, इसलिए उसके विरुद्ध धारा 299 Cr.P.C. के तहत आरोप-पत्र दाखिल किया गया।

आरोप-पत्र के बाद ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए सह-आरोपी के विरुद्ध आरोप तय किए, जबकि याचिकाकर्ता को फरार घोषित कर उसके विरुद्ध कार्यवाही लंबित रखी गई।

दो में से एक ने दायर की याचिका

इस मामले को लेकर दोनों आरोपियों में से केवल वर्तमान याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जबकि सह-आरोपी सुनील बावेजा ने याचिका दायर नहीं की।

याचिकाकर्ता की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि यह विवाद पूरी तरह से व्यापारिक लेन-देन से जुड़ा है और वर्ष 2018 में दोनों पक्षों के बीच समझौता भी हो चुका है, जिसके तहत पूरी राशि वापस चुका दी गई थी।

पुलिस ने जांच के बाद IPC की धारा 420 (धोखाधड़ी), 406 (आपराधिक विश्वासघात) और 120B (षड्यंत्र) के तहत चार्जशीट दाखिल कर दी और मामला ट्रायल कोर्ट में विचाराधीन था।

याचिकाकर्ता का पक्ष

याचिकाकर्ता की ओर से याचिका में मुख्य रूप से यह तर्क दिया गया कि पूरा मामला मूल रूप से एक सिविल विवाद है, जिसे गलत तरीके से आपराधिक रूप दे दिया गया है।

शिकायतकर्ता के अनुसार यह एक व्यावसायिक समझौते (डिस्ट्रीब्यूटर्शिप एग्रीमेंट) पर आधारित मामला था, जिसमें विवाद सामान की सप्लाई को लेकर उत्पन्न हुआ, जो कि व्यापारिक लेन-देन का हिस्सा है और इसका समाधान सिविल कोर्ट में होना चाहिए, न कि आपराधिक कानून के तहत।

समझौता और रकम वापसी का तथ्य

मामले की सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि वर्ष 2018 में ही दोनों पक्षों के बीच समझौता हो चुका था और विवादित राशि ₹2.96 लाख डिमांड ड्राफ्ट के जरिए वापस कर दी गई थी।

याचिकाकर्ता ने यह दलील दी कि जब राशि वापस कर दी गई और विवाद समाप्त हो चुका है, तो FIR और आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्यायिक समय और संसाधनों की बर्बादी है।

इसके अलावा यह भी कहा गया कि FIR में लगाए गए आरोपों को यदि सतही तौर पर भी देखा जाए, तो धोखाधड़ी या आपराधिक विश्वासघात का कोई तत्व (mens rea) प्रारंभ से नहीं दिखता।

इसके बावजूद आपराधिक कार्यवाही जारी थी, जिसे याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

शिकायतकर्ता का पक्ष

प्रतिवादी पक्ष की ओर से राज्य और शिकायतकर्ता ने कहा कि आरोपियों ने व्यापारिक समझौते के नाम पर उनसे ₹2,96,000 की राशि प्राप्त की, लेकिन तय शर्तों के अनुसार सामान की आपूर्ति नहीं की।

इस आधार पर उनके खिलाफ IPC की धारा 420, 406 और 120B के तहत मामला दर्ज किया गया। पुलिस ने जांच के बाद चार्जशीट भी पेश की और मामला ट्रायल कोर्ट में विचाराधीन रहा।

हालांकि, जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया कि वर्ष 2018 में शिकायतकर्ता के पति द्वारा एक हलफनामा दिया गया था, जिसमें विवादित राशि प्राप्त होने की पुष्टि की गई। इसके बावजूद प्रारंभिक शिकायत के आधार पर आपराधिक कार्यवाही जारी रखी गई।

राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि केवल अनुबंध का उल्लंघन अपने आप में आपराधिक अपराध नहीं बनता।

कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी या आपराधिक विश्वासघात साबित करने के लिए यह आवश्यक है कि आरोपी की मंशा शुरुआत से ही बेईमानी या धोखे की हो।

कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि आरोपियों ने प्रारंभ से ही शिकायतकर्ता को धोखा देने का इरादा रखा था।

हाईकोर्ट के अनुसार, यह विवाद मूल रूप से एक व्यापारिक लेन-देन से जुड़ा सिविल विवाद है। साथ ही, वर्ष 2018 में ही ₹2,96,000 की राशि वापस कर दी गई थी, जिससे आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून का दुरुपयोग माना गया।

बिना कोर्ट आए सह-आरोपी को राहत क्यों?

इस मामले की सबसे अहम बात यह रही कि सह-आरोपी ने हाईकोर्ट में कोई याचिका दायर नहीं की थी। इसके बावजूद कोर्ट ने उसे भी राहत दी।

अपने आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि दोनों आरोपियों के खिलाफ आरोप और परिस्थितियां समान हैं, ऐसे में एक को राहत और दूसरे को नहीं देना न्याय के खिलाफ होगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत का कर्तव्य है कि समान स्थिति में सभी को समान लाभ दिया जाए।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि समानता और न्याय के सिद्धांत को बनाए रखना आवश्यक है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि समान परिस्थितियों में सह-आरोपी को भी समान राहत मिलनी चाहिए, भले ही वह कोर्ट न आया हो। इसी आधार पर पूरी कार्यवाही रद्द कर दी गई।

अंतिम आदेश

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में जोधपुर के नागौरी गेट थाने में दर्ज एफआईआर 139/2016, उसमें पेश की गई चार्जशीट (2018) और ट्रायल कोर्ट में लंबित पूरी कार्यवाही को रद्द करने का आदेश दिया है।

हाईकोर्ट ने यह आदेश याचिकाकर्ता संयुक्त शेखारी के साथ ही इस मामले के सह-आरोपी सुनील बावेजा के मामले में भी दिया, जबकि सुनील बावेजा ने कोई याचिका दायर नहीं की थी।

दोनों आरोपियों के खिलाफ पूरी कार्यवाही को पूरी तरह से रद्द (Quash) किया जाता है।

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