केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। मंदिर का मैनेजमेंट देखने वाले त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड के वकील एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, किसी धर्म की प्रथा सही है या नहीं, यह तय होगा उसी समुदाय की आस्था के आधार पर। जज खुद यह तय नहीं करेंगे कि धर्म के लिए क्या सही है, क्या गलत।'
उन्होंने कहा कि धर्म एक समूह या समुदाय की आस्था से जुड़ा है। इसलिए कुछ लोगों (महिलाओं की एंट्री) के अधिकार को पूरे समुदाय के अधिकारों पर हावी नहीं होने दिया जा सकता।
इससे पहले 7 से 9 अप्रैल तक 3 दिन सुनवाई के दौरान भी महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखी गईं। केंद्र सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
केरल हाईकोर्ट ने 1991 में सबरीमाला में 10 से 50 साल की महिलाओं की एंट्री पर बैन लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इसे भेदभावपूर्ण बताते हुए बैन हटा दिया। इसके बाद दायर पुनर्विचार याचिकाओं के आधार पर 7 महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न तय किए गए हैं, जिन पर अब बहस हो रही है
सिंघवी ने कहा- “संवैधानिक नैतिकता” शब्द संविधान में कहीं नहीं लिखा
सिंघवी (मुद्दा 4 – संवैधानिक नैतिकता पर): “संवैधानिक नैतिकता” शब्द संविधान में कहीं लिखा नहीं है। अंबेडकर ने इस शब्द का इस्तेमाल एक सवाल के जवाब में किया था। उनसे पूछा गया था कि आप इतना डिटेल संविधान क्यों बना रहे हैं?
तो उन्होंने कहा कि भारत जैसे नए देश में संवैधानिक नैतिकता अभी सिर्फ ऊपर-ऊपर है, गहराई में नहीं बैठी है। इसलिए प्रशासन के नियम विस्तार से देना जरूरी है, ताकि समय के साथ यही नियम लोगों में संवैधानिक नैतिकता पैदा करें।
सिंघवी बोले- धार्मिक अधिकार सामाजिक सुधार से ऊपर नहीं
सिंघवी: 3 शर्तों (सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य) के अलावा, अनुच्छेद 26(ख) उस कानून के अधीन होगा जो सार्वजनिक स्वरूप वाले हिंदू धार्मिक संस्थानों को सभी के लिए खोलता है।
यह अनुच्छेद 25(2)(ख) के पहले पांच शब्दों के भी अधीन हो सकता है, लेकिन शर्त यह है कि सामाजिक सुधार धर्म को खत्म या कमजोर न करे।
जस्टिस नागरत्ना: तो आपके हिसाब से श्री वेंकटरमण देवरू केस फैसला सही है?
सिंघवी: अगर यह कहा जाए कि 26(ख), 25(2)(ख) के दूसरे हिस्से से ऊपर है—मैं सहमत नहीं। अगर यह कहा जाए कि 26(ख), पहले पाँच शब्दों से भी ऊपर है—मैं इससे भी सहमत नहीं।
संविधान सभा की बहसों में यह साफ नहीं मिलता कि “अन्य प्रावधानों के अधीन” शब्द 25 में क्यों जोड़े गए और 26 में क्यों नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि अनुच्छेद 26 को भाग 3 के अन्य प्रतिबंधों के अधीन नहीं माना जा सकता।
सिंघवी (T.M.A. Pai केस का हवाला): इस फैसले में कहा गया कि 26 में “अन्य प्रावधान” शब्द नहीं होने का मतलब यह नहीं कि 26 बाकी अधिकारों से ऊपर है। इसका मतलब यह हुआ कि अदालत ने इस अंतर (शब्दों की कमी) को महत्व ही नहीं दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने दरगाह कमिटी केस और तिलकायत श्री गोविंदलालजी महाराज केस का हवाला दिया, और कहा कि 26, 25 के अधीन है—चाहे शब्द लिखे हों या नहीं।
यह बहुत बड़ा निष्कर्ष है, जो संविधान को ही बदलने जैसा है। और भी हैरानी की बात यह है कि जस्टिस खरे का यह निष्कर्ष, जो ऊपर बताए गए मामलों पर आधारित बताया गया, असल में उन मामलों में कहीं नहीं मिलता।
इसलिए यह निष्कर्ष गलत है और कानून की नजर में मान्य नहीं माना जा सकता। यह सिर्फ एक टिप्पणी (ओबिटर) है, इसे 11 जजों का फैसला नहीं माना जा सकता।
दो कारण:
इस मामले में अनुच्छेद 25 और 26 का मुद्दा था ही नहीं, बल्कि 29 और 30 की व्याख्या थी।11 जजों की पीठ में किसी भी अन्य जज ने इस राय को नहीं माना।
इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि अनुच्छेद 26, भाग 3 के अन्य प्रावधानों के अधीन है।
SC में अनुच्छेद 25-26 पर टकराव, जज ने संप्रदाय बनाम कानून पर सवाल किए
सिंघवी: हालांकि इस कमी को ठीक करने की कोशिश की गई और “सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन” शब्द अनुच्छेद 20 (अब अनुच्छेद 26) में जोड़ दिए गए, लेकिन “और इस भाग के अन्य प्रावधानों के अधीन” शब्द जानबूझकर नहीं जोड़े गए।
इससे साफ है कि संविधान बनाने वालों का इरादा था कि अनुच्छेद 26 को भाग 3 के बाकी प्रावधानों के अधीन न रखा जाए।
जस्टिस सुंदरेश: धार्मिक संप्रदाय क्या होता है? इसे कैसे समझा जाता है? यह विश्वास रखने वाले लोगों का समूह ही है, है न? तो क्या अनुच्छेद 25 इन लोगों पर लागू होगा?
अगर आप अनुच्छेद 25(2) को इन लोगों पर लागू करते हैं, तो फिर कैसे कह सकते हैं कि यह धार्मिक संप्रदाय पर लागू नहीं होगा? आखिर संप्रदाय का अस्तित्व और अधिकार उन्हीं लोगों के सामूहिक विश्वास से आता है।
तो कानून कैसे लागू होगा? क्या आप कह सकते हैं कि कानून सिर्फ व्यक्तियों पर लागू होगा, लेकिन उनके संप्रदाय पर नहीं?
जस्टिस सुंदरेश: जानबूझकर अनुच्छेद 26 में “अन्य प्रावधानों के अधीन” नहीं लिखा गया। क्योंकि यह अपने आप समझा जाता है कि अनुच्छेद 25 की बातें 26 पर भी लागू होंगी। वरना इसका कोई मतलब नहीं रहेगा। आप नहीं कह सकते कि ये बातें व्यक्तियों पर लागू हों, लेकिन उन्हीं से बने धार्मिक संप्रदाय पर नहीं।
सिंघवी: मंदिर प्रवेश के मामले में मैंने विस्तार से कहा है— अनुच्छेद 25(2)(ख) का दूसरा हिस्सा, अनुच्छेद 26(ख) पर हावी होगा।
दूसरा, अगर सामाजिक सुधार के लिए कानून बनाया जाए, और वह धर्म को खत्म या कमजोर न करे, तो वह भी 26(ख) पर हावी होगा।
लेकिन अगर मायलॉर्ड्स यह कहें कि “भाग 3 के अन्य प्रावधान” भले 26 में लिखे नहीं हैं, फिर भी लागू माने जाएं, तो मैं इससे असहमत हूं।
अनुच्छेद 26 को जानबूझकर बाकी प्रावधानों (अनुच्छेद 14 से 32 तक) से अलग रखा गया है।
जस्टिस नागरत्ना: तो फिर अनुच्छेद 25(2)(ख) का इस्तेमाल सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य बनाए रखने के उद्देश्य से ही होना चाहिए।
सिंघवी ने कहा- अनुच्छेद 26 को जानबूझकर अन्य प्रावधानों से अलग रखा गया
जस्टिस सुंदरेश: शर्त यह है कि अगर कोई धार्मिक संस्था “सार्वजनिक स्वरूप” की है, तो राज्य उसमें दखल कर सकता है।
सिंघवी : क्या अनुच्छेद 26 के अधिकार, भाग 3 के बाकी प्रावधानों के अधीन हैं?
सिंघवी: अनुच्छेद 26 की भाषा देखें, तो यह अनुच्छेद 25(1) से अलग है। अनुच्छेद 25(1) साफ कहता है—यह बाकी प्रावधानों के अधीन है। लेकिन अनुच्छेद 26 में ऐसा नहीं है।
इसका मतलब—अनुच्छेद 26 को जानबूझकर बाकी प्रावधानों के अधीन नहीं रखा गया। संविधान सभा की बहसें भी यही दिखाती हैं। यह फैसला सोच-समझकर लिया गया था।
सिंघवी (ड्राफ्ट अनुच्छेद 19 और 20 का भी जिक्र करते हैं): 7 दिसंबर 1948 को ड्राफ्ट अनुच्छेद 20 (आज का 26) पेश हुआ। तब अंबेडकर ने उस समय संशोधन में “सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य” जैसे शब्द जोड़ने की बात कही थी।
डॉ. अंबेडकर जानते थे कि पहले अनुच्छेद में “अन्य प्रावधानों के अधीन” लिखा है। फिर भी उन्होंने यहां वह शब्द नहीं जोड़े। यानी यह जानबूझकर किया गया फैसला था।
सिंघवी बोले- अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संप्रदायों के अधिकार ज्यादा मजबूत
सिंघवी (अपनी बातों को संक्षेप में बताते हुए) :
यह पूरी तरह सही नहीं है।
(क) धार्मिक संप्रदाय और उनके हिस्से भी अनुच्छेद 26 के तहत सुरक्षित हैं।
(ख) उनके धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार छीना नहीं जा सकता। हां, संपत्ति से जुड़े मामलों को कानून नियंत्रित कर सकता है।
(ग) अगर अनुच्छेद 25(1) और 26 में टकराव हो, तो संप्रदाय का अधिकार (अनुच्छेद 26) ज्यादा मजबूत होगा।
(घ) अनुच्छेद 25(2)(ख) के कानून ऊपर से 26(ख) के खिलाफ लग सकते हैं, लेकिन दोनों को साथ पढ़ना जरूरी है।
(ङ) संतुलन ऐसे बनेगा—बाकी मामलों में 26(ख) चलेगा, लेकिन सामाजिक सुधार या प्रवेश के मामलों में 25(2)(ख) लागू होगा।
(च) फिर भी कुछ सीमाएं रहेंगी। जैसे—मंदिर के सबसे अंदर वाले हिस्से (गर्भगृह) में प्रवेश पर रोक बनी रह सकती है।
(छ) ऐसे मामलों में कानून होना जरूरी है, तभी दखल हो सकता है।
(ज) अनुच्छेद 14 और 15 को 25 के साथ मिलाने की कोशिश होगी, लेकिन अगर संभव न हो, तो 14 और 15 ऊपर रहेंगे।
(झ) अनुच्छेद 26 का संरक्षण ज्यादा मजबूत है, इसे 14 और 15 से नहीं परखा जा सकता।
(ञ) अनुच्छेद 25(2)(क) राज्य को धार्मिक प्रथाओं में दखल नहीं देता, सिर्फ उनसे जुड़ी आर्थिक/व्यावसायिक गतिविधियों को नियंत्रित करता है। धर्म मानने की आजादी बनी रहती है, जब तक वह सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य या नैतिकता के खिलाफ न हो।
जस्टिस नागरत्ना: आपका (च) वाला पॉइंट वैद्यनाथन के तर्क जैसा ही है।
सिंघवी: नहीं, उनका कहना है कि 25(2)(ख) पूरी तरह 26(ख) पर हावी हो जाए यहां तक कि मंदिर में एंट्री के मामले में भी।
जस्टिस नागरत्ना: नहीं, 25(2)(ख) सामाजिक सुधार से जुड़ा है, धार्मिक सुधार से अलग है।
सिंघवी: इसमें दो हिस्से हैं— एक सामाजिक सुधार, दूसरा प्रवेश।
जस्टिस नागरत्ना: यह सिर्फ अंतर का मामला है (डिग्री का फर्क)।
सिंघवी: नहीं, यह मूल अंतर है। कानून कहेगा—आप अंदर जा सकते हैं। लेकिन अनुच्छेद 26(ख) कह सकता है—आप अंदर नहीं जा सकते। और संविधान बनाने वालों ने इस अंतर को जानबूझकर रखा था।
सिंघवी बोले- धर्म की स्वतंत्रता को संविधान के बाकी नियमों के साथ समझना होगा
सिंघवी (रतिलाल केस और श्री वेंकटरमण देवरू केस का जिक्र करते हुए)-
श्री वेंकटरमण देवरू केस में यह मुद्दा तय किया गया था कि क्या अनुच्छेद 26(ख) के तहत किसी धार्मिक संप्रदाय को अपने धार्मिक मामलों को चलाने का अधिकार, अनुच्छेद 25(2)(ख) के तहत बने कानून से सीमित किया जा सकता है। जैसे हिंदू मंदिरों को सभी वर्गों और समुदायों के लिए खोलना।
(क) कोर्ट ने कहा कि अगर केवल अनुच्छेद 26(ख) लागू किया जाए, तो मद्रास मंदिर प्रवेश अनुमति कानून, जो सभी वर्गों को प्रवेश देता है, असंवैधानिक हो जाएगा। इससे अनुच्छेद 26(ख) और 25(2)(ख) के बीच टकराव दिखता है—यहीं पर हमारा वैद्यनाथन से मतभेद है।
(ख) अनुच्छेद 26(ख) को 25(2)(ख) से ऊपर रखने वाले सभी तर्क खारिज कर दिए गए। कोर्ट ने “संतुलित व्याख्या” का सिद्धांत अपनाया। कहा गया कि सामान्य मामलों में अनुच्छेद 26(ख) लागू होगा, लेकिन मंदिर में प्रवेश के मामले में अनुच्छेद 25(2)(ख) प्रभावी रहेगा।
सिंघवी: आदि शैव शिवचारियार्गल नाला संगम बनाम तमिलनाडु सरकार मामले में भी अनुच्छेद 26 की सीमाओं को और स्पष्ट किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धर्म की स्वतंत्रता, संविधान के भाग तीन के अन्य प्रावधानों के अधीन है। इसलिए अनुच्छेद 25 और 26 को भाग तीन के बाकी प्रावधानों के साथ संतुलित तरीके से पढ़ना जरूरी है।
सिंघवी की दलील- कौन-सी प्रथाएं जरूरी, इसमें बाहरी दखल नहीं दे सकता
जस्टिस नागरत्ना: सरदार सैयदना केस मामले में बहिष्कार रोकने वाला कानून सही ठहराया गया था। तो इसका मतलब है कि बहिष्कार हो सकता है?
सिंघवी: कानून के हिसाब से बहिष्कार सामाजिक सुधार या कल्याण के खिलाफ माना जाता है।
जस्टिस बागची: सुधार संबंधी कानून में बहिष्कार को गैरकानूनी बताया गया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया, क्योंकि यह अनुच्छेद 25(1) का उल्लंघन था।
सिंघवी: असली कसौटी यह है कि क्या आप धर्म को ही खोखला कर रहे हैं। शब्दों के स्तर पर, बहिष्कार धर्म का जरूरी हिस्सा माना जा सकता है। लेकिन मायलॉर्ड्स इसे “जरूरी है या नहीं” में गए बिना भी ठीक कर सकते हैं।
सिंघवी (सिद्धांत समझाते हुए): अनुच्छेद 25 और 26 के तहत दिए गए अधिकार केवल मान्यता या विश्वास तक सीमित नहीं हैं। ये उन कामों तक भी फैलते हैं जो धर्म के अनुसार किए जाते हैं। इसमें पूजा, रीति-रिवाज, रस्में और तरीके शामिल हैं जो धर्म का हिस्सा हैं।
सिंघवी (शिरूर मठ मामला का संदर्भ देते हुए):
अनुच्छेद 26(b) के तहत, किसी धार्मिक संप्रदाय या संस्था को यह पूरा अधिकार है कि वह तय करे कि उसके अनुसार कौन-सी रस्में और प्रथाएं जरूरी हैं। इसमें कोई बाहरी हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
लेकिन अनुच्छेद 26(d) के तहत, धार्मिक संस्था को अपनी संपत्ति का प्रबंधन कानून के अनुसार करने का अधिकार है। कानून कुछ सीमाएं और नियम तय कर सकता है। लेकिन अगर कोई कानून संस्था से उसका प्रबंधन का अधिकार पूरी तरह छीनकर किसी और को दे दे, तो यह अनुच्छेद 26(d) का उल्लंघन होगा।
जस्टिस नागरत्ना बोलीं- समाज सुधार के नाम पर धर्म खत्म नहीं कर सकते
CJI: सामाजिक कल्याण को प्राथमिकता दी जा सकती है, लेकिन सामाजिक कल्याण के नाम पर इसे संरक्षित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस नागरत्ना: सामाजिक कल्याण और सुधार के नाम पर आप धर्म को पूरी तरह से खत्म नहीं कर सकते।
जस्टिस सुंदरेश: सामाजिक सुधार का काम सरकार और राज्य का है
सिंघवी: संतुलन (हॉर्मोनाइजेशन) के मुद्दे पर, अगर मायलॉर्ड्स चाहें तो सरदार सैयदना के उस पैराग्राफ को स्पष्ट कर सकते हैं।
जस्टिस सुंदरेश: हमारे लिए यह करना काफी जोखिम भरा होगा कि हम इसे इस तरह पढ़ें कि “सामाजिक सुधार के बावजूद भी” कोई अलग अर्थ निकले।
सिंघवी: वैद्यनाथन से अलग, मैं अनुच्छेद के दूसरे हिस्से के साथ-साथ पहले हिस्से को भी सुरक्षित रख रहा हूं। सैयदना फैसले का मूल हिस्सा (core) बना रहना चाहिए, लेकिन बिना यह कहे भी रास्ता निकाला जा सकता है कि 9 जजों की बेंच ने “जरूरी प्रथाओं” (essentiality) को मान लिया है।
जस्टिस सुंदरेश: जब सामाजिक कल्याण या सुधार की बात आती है, तो वह सरकार/राज्य का क्षेत्र है और कुछ हद तक अदालत का भी। इसे हम “नैतिकता” या “सार्वजनिक व्यवस्था” के तहत सीधे नहीं जोड़ सकते।
सिंघवी: सामाजिक सुधार और कल्याण की इजाजत होनी चाहिए और अनुच्छेद के पहले पांच शब्दों को भी पूरा अर्थ दिया जाना चाहिए।
जस्टिस सुंदरेश: हमने उदाहरण दिया था- हिंदू सक्सेशन एक्ट, यह एक सामाजिक सुधार है।
सीजेआई: यह हर मामले के आधार पर अलग-अलग तय होगा।
जस्टिस बागजी बोले- कोर्ट को तय करना होगा कौन सी प्रथा जरूरी है
जस्टिस बागची: आप यह कह रहे हैं कि कुछ धार्मिक प्रथाएं जरूरी होती हैं और कुछ गैर-जरूरी। जब अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत किसी कानून की जांच होगी, तो अदालत को यह तय करना पड़ेगा कि कौन-सी प्रथा सच में जरूरी है यानी इसमें कोर्ट को खुद फैसला करना होगा।
सिंघवी: मायलॉर्ड्स सही हैं, लेकिन अनुच्छेद 25(2)(b) के दूसरे हिस्से से मैं सहमत नहीं हूं।
जस्टिस बागची: पहला हिस्सा तो साफ है कि धार्मिक प्रथाएं और उनसे जुड़ी आर्थिक या सांसारिक गतिविधियां अलग होती हैं। लेकिन जब (b) के तहत सुधार के लिए कानून बनता है, तब यह देखना जरूरी होगा कि कहीं धर्म की मूल प्रकृति तो खराब नहीं हो रही—यह एक अहम कसौटी होगी।
सिंघवी: यही उलझन है जिसे 9 जजों की बेंच को साफ करना चाहिए। “जरूरी होने” वाली जांच को इसमें नहीं लाना चाहिए।
जस्टिस सुंदरेश: “सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता” की जगह “सामाजिक कल्याण” शब्द क्यों इस्तेमाल किया गया?
सिंघवी: कुछ प्रथाएं ऐसी होती हैं जो धार्मिक मानी जाती हैं, लेकिन सही मानकों पर ठीक नहीं ठहरतीं—जैसे बहुविवाह।
जस्टिस बागची: सापिंड विवाह को भी सुधार कहा जा सकता है, क्योंकि यह धर्म की मूल प्रथाओं को नहीं बदलता। अगर हम “जरूरी” या “मूल” की जगह “अलग न की जा सकने वाली धार्मिक प्रथाएं” कहें, तो क्या आप उससे भी असहमत होंगे?
सिंघवी: यह भी “जरूरी होने” वाली बात का ही एक और रूप है।
सिंघवी बोले- समाज सुधार के नाम पर धर्म को खत्म नहीं किया जा सकता
सिंघवी: आर्टिकल 25(2)(b) के पहले शब्द 'सोशल वेलफेयर एंड रिफॉर्म'। ये दोनों अपने आप में स्वतंत्र हैं। यानी इनका मकसद है समाज सुधार करना।
बहुविवाह, पर्सनल लॉ में बदलाव। ये सब समाज सुधार के तहत आ सकते हैं। लेकिन सीमाएं भी हैं। सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए बनाए गए कानूनों का मतलब यह नहीं है कि विधायिका (सरकार) किसी धर्म को पूरी तरह बदल दे या उसकी पहचान ही खत्म कर दे।
उदाहरण: सती प्रथा खत्म हुई क्योंकि वह सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ थी।
सिंघवी बोले- आर्टिकल 26 को जानबूझकर कम प्रतिबंधों के साथ रखा गया
सिंघवी: आर्टिकल 25(2)(b) का प्रावधान सिर्फ इस बारे में है कि सार्वजनिक हिंदू मंदिरों में सभी लोगों को एंट्री मिले। एंट्री और एक्सेस अलग चीज है। मंदिर में एंट्री और पहुंच आर्टिकल 25(2)(b) के तहत आएंगे।
एक बार जब कोई व्यक्ति मंदिर के अंदर आ जाता है। उसके बाद आर्टिकल 26 लागू होगा। यानी मंदिर/संप्रदाय तय करेगा कि पूजा कैसे होगी और कौन क्या करेगा।
सिंघवी: संविधान सभा की बहस में आर्टिकल 25 और आर्टिकल 26 को अलग तरीके से बनाया गया है। मतलब आर्टिकल 25 पर ज्यादा स्पष्ट सीमाएं हैं। जबकि आर्टिकल 26 को जानबूझकर कम प्रतिबंधों के साथ रखा गया।
सिंघवी: आर्टिकल 26 (तब आर्टिकल 20) में “public order, health” जोड़ने की बात हुई थी। एक सदस्य (Mr. Ahmed) ने सुझाव दिया कि राज्य को ज्यादा शक्ति मिले। पब्लिक शब्द भी जोड़ा जाए। लेकिन यह संशोधन स्वीकार नहीं हुआ।
अगर पब्लिक शब्द जुड़ जाता तो बाहरी दखल वाला सिस्टम लागू हो जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ इसलिए धार्मिक मामलों में ज्यादा सब्जेक्टिव (आस्था आधारित) टेस्ट लागू होगा।
जस्टिस सुंदरेश का सवाल: सार्वजनिक स्वरूप का मतलब क्या है?
सिंघवी का जवाब: कोई मंदिर शुरुआत में निजी हो सकता है लेकिन बाद में वह पब्लिक टेंपल बन सकता है।
जस्टिस नागरत्ना: सच्चाई देखने का सबका अलग-अलग तरीका हो सकता है
जस्टिस बागची: संविधान के आर्टिकल 26 में जो 'Subject To' शब्द है। उसका कोई ठोस मतलब निकालना होगा। यानी धार्मिक संस्थाओं के अधिकार पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हैं। उन पर कुछ सीमाएं भी लागू होती हैं
जस्टिस नागरत्ना: आर्टिकल 25 सभी धर्मों पर लागू होता है। कोई भी धर्म दूसरे से बड़ा या छोटा नहीं है। हर व्यक्ति को अपनी आस्था रखने का अधिकार है। मतलब सच्चाई एक हो सकती है लेकिन लोग उसे अलग-अलग तरीके से समझते हैं।
सिंघवी: अधिकारों में टकराव हो सकता है। कभी-कभी आर्टिकल 25 (धार्मिक अधिकार), आर्टिकल 14 (समानता) और आर्टिकल 19 (स्वतंत्रता) आपस में टकरा सकते हैं।
कोर्ट को पहले कोशिश करनी चाहिए कि सभी अधिकारों के बीच संतुलन बने। अगर संतुलन संभव न हो तब आर्टिकल 25 में जो 'Subject To' लिखा है उसे प्राथमिकता देनी होगी। यानी धार्मिक अधिकार कुछ हद तक सीमित किए जा सकते हैं।
जस्टिस नागरत्ना बोलीं- एक बार मंदिर के अंदर जाने के बाद भेदभाव न हो
जस्टिस नागरत्ना: जब सभी लोगों को मंदिर में प्रवेश मिल गया तो अंदर भेदभाव नहीं होना चाहिए।
उदाहरण: कई बार अलग-अलग जातियों को अलग कमरों में बैठाकर खाना खिलाया जाता है। यह गलत है
सिंघवी का जवाब: कुछ उदाहरण ऐसे हो सकते हैं जैसे कोई संप्रदाय कहे कि लोग दूर खड़े होकर ही दर्शन करें। ऐसे मामलों में हर चीज कोर्ट तय नहीं कर सकता
सिंघवी: धार्मिक अधिकारों पर कोई भी रोक सिर्फ “कानून” के जरिए ही लगाई जा सकती है। सिर्फ आदेश, निर्देश या सरकारी फैसले से नहीं। क्योंकि धर्म की आजादी एक मौलिक अधिकार है। इसे कमजोर नहीं किया जा सकता
अगर बिना कानून के दखल हुआ तो सरकार मनमाने तरीके से अधिकारों में हस्तक्षेप कर सकती है।
सिंघवी बोले- कोर्ट धार्मिक प्रथाओं को व्याख्या से बदल नहीं सकता
सिंघवी: कोर्ट को किसी धर्म की प्रथाओं को सिर्फ उस समुदाय की आस्था से देखना चाहिए। न कि सही-गलत मानकों से। कोर्ट धार्मिक प्रथाओं को बदल नहीं सकता। अगर कोई प्रथा किसी धर्म का स्थापित हिस्सा है। तो कोर्ट उसे अपनी व्याख्या से बदल नहीं सकता।
जस्टिस सुंदरेश का सवाल: जैसे हिंदू उत्तराधिकार कानून (महिलाओं को बराबरी का हक) आखिर यह किस आधार पर आया?
जस्टिस नागरत्ना का सवाल: आर्टिकल 15(3) (महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान) भी लागू हो सकता है क्या?
जस्टिस सुंदरेश: जब कानून बना हो, तो कोर्ट कितनी दखल दे सकता है? खासकर सामाजिक सुधार के मामलों में(
सिंघवी: आर्टिकल 25(2)(b) का मतलब सिर्फ इतना है कि सार्वजनिक हिंदू मंदिरों को सभी वर्गों के लिए खोलना। हालांकि मंदिर के अंदर पूजा कैसे होगी कौन क्या करेगा। यह धर्म तय करेगा, राज्य नहीं।
सिंघवी बोले- धर्म में हस्तक्षेप शुरू हुआ तो कितना लंबा चलेगा, कोई नहीं जानता
सिंघवी: अगर कोर्ट यह तय करने लगे कि कौन-सी धार्मिक प्रथा जरूरी है और कौन-सी नहीं। तो जज खुद धर्म से जुड़े फैसले लेने लगेंगे और यह हस्तक्षेप कितना लंबा चलेगा, कोई नहीं जानता।
इस बीच सवाल उठा कि अगर कोई धर्म बहुत अजीब या गलत लगने वाली प्रथा अपनाए तो क्या कोर्ट कुछ नहीं कर सकता?
सिंघवी: अगर यह सामूहिक आस्था नहीं है। यह सिर्फ कुछ लोगों का दावा है और पूरे समुदाय की मान्यता नहीं है। तो इसे धर्म से जुड़ी मान्यता नहीं माना जाएगा। अगर यह कानून के खिलाफ है तो ऐसी प्रथाएं तुरंत रुक सकती हैं।
अगर कोई प्रथा किसी मान्यता प्राप्त धर्म का हिस्सा है और समुदाय उसे सच में मानता है। तो कोर्ट सिर्फ 'यह गलत लगता है' कहकर उसे खत्म नहीं कर सकता। लेकिन कोर्ट यह जरूर देख सकता है कि क्या वह प्रथा कानून की सीमाओं के खिलाफ तो नहीं है।
उदाहरण: जैन दिगंबर संप्रदाय में दिगंबर जैन साधु नग्न रहते हैं। सामान्य समाज में यह गलत/अजीब लग सकता है लेकिन यह उनके धर्म का हिस्सा है। इसलिए इसे सिर्फ 'असभ्य' कहकर खत्म नहीं किया जा सकता जस्टिस नागरत्ना: यहां 'संवैधानिक नैतिकता' नहीं बल्कि सार्वजनिक नैतिकता देखी जाएगी।
सिंघवी: अगर तीर्थयात्रियों के लिए बस खरीदी जाती है। तो उसका एक धार्मिक उद्देश्य हो सकता है लेकिन बस खरीदने का तरीका (पैसा, अकाउंट, भ्रष्टाचार, महंगी गाड़ी लेना)। यह सब सेक्युलर (प्रशासनिक/आर्थिक) हिस्सा है। CJI: कोर्ट सिर्फ जनरल प्रिंसिपल्स तय कर सकता है। हर केस का फैसला अलग-अलग होगा। सिंघवी: कोर्ट को यह नहीं कहना चाहिए कि कोई भी धार्मिक प्रथा फिजूल है। क्योंकि यह कोर्ट का अधिकार क्षेत्र नहीं है। सिंघवी: पुराने फैसलों (जैसे शिरूर मठ) में धार्मिक और गैर-धार्मिक गतिविधियों का फर्क बताया गया था। लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि धर्म को जरूरी और गैर-जरूरी के बीच बांटा जाए।
जस्टिस बागची: कोर्ट कैसे तय करेगा क्या धार्मिक है, क्या सेक्युलर
जस्टिस बागची का सवाल: कई गतिविधियों में धार्मिक + सेक्युलर दोनों पहलू होते हैं। ऐसे में कोर्ट कैसे तय करेगा कि यह धार्मिक है या सेक्युलर? उदाहरण: पूजा के लिए चीनी खरीदना। श्रद्धालुओं के आने-जाने के लिए बस खरीदना। इनमें धार्मिक जुड़ाव भी है, लेकिन ये काम खुद में सेक्युलर (व्यावहारिक/प्रशासनिक) भी हैं। सिंघवी का जवाब: कोई एक नियम नहीं हो सकता। हर मामले को केस टू केस बेसिस पर देखना होगा। उदाहरण- अगर पूजा के लिए घी खरीदा जा रहा है। यह धार्मिक जरूरत से जुड़ा है, लेकिन अगर उसमें गड़बड़ी/भ्रष्टाचार हो (जैसे ज्यादा दाम दिखाना)। तो यह हिस्सा सेक्युलर (गैर-धार्मिक) हो जाएगा और राज्य इसमें दखल दे सकता है।
जस्टिस बागची: कोर्ट कैसे तय करेगा क्या धार्मिक है, क्या सेक्युलर
जस्टिस बागची का सवाल: कई गतिविधियों में धार्मिक + सेक्युलर दोनों पहलू होते हैं। ऐसे में कोर्ट कैसे तय करेगा कि यह धार्मिक है या सेक्युलर?
उदाहरण: पूजा के लिए चीनी खरीदना। श्रद्धालुओं के आने-जाने के लिए बस खरीदना। इनमें धार्मिक जुड़ाव भी है, लेकिन ये काम खुद में सेक्युलर (व्यावहारिक/प्रशासनिक) भी हैं।
सिंघवी का जवाब: कोई एक नियम नहीं हो सकता। हर मामले को केस टू केस बेसिस पर देखना होगा। उदाहरण- अगर पूजा के लिए घी खरीदा जा रहा है। यह धार्मिक जरूरत से जुड़ा है लेकिन अगर उसमें गड़बड़ी/भ्रष्टाचार हो (जैसे ज्यादा दाम दिखाना)। तो यह हिस्सा सेक्युलर (गैर-धार्मिक) हो जाएगा और राज्य इसमें दखल दे सकता है।
कौन-सी गतिविधि धार्मिक है, कौन सी सेक्युलर; अब इस पर बहस
कोर्ट रूम में अब बहस इस पर हो रही है कि कौन-सी गतिविधि धार्मिक है और कौन-सी सेक्युलर (गैर-धार्मिक), और कोर्ट इसे कैसे तय करेगा।
सिंघवी बोले- कोर्ट इस पर फैसला धर्म के नजरिए से करे
सिंघवी: कोर्ट यह देख सकता है कि कोई प्रथा धर्म का हिस्सा है या नहीं। लेकिन यह जांच समुदाय की आस्था के आधार पर होनी चाहिए।
SG मेहता: शिरूर मठ केस में यह कहा गया था कि सिर्फ जरूरी (essential) प्रथाएं ही सुरक्षित हैं। लेकिन बाद में दरगाह केस में इसे गलत तरीके से “essential practice” का नियम बना दिया गया।
सिंघवी: शिरूर मठ में कोर्ट ने कहा था कि किसी धर्म की जरूरी प्रथा क्या है, यह उसी धर्म की मान्यताओं से तय होगा। और राज्य सिर्फ उन गतिविधियों को नियंत्रित कर सकता है जो आर्थिक, व्यावसायिक या राजनीतिक हों। धार्मिक प्रथाओं में दखल नहीं कर सकता।
जस्टिस नागरत्ना: अगर कोई चीज सेक्युलर (गैर-धार्मिक) है, तो राज्य उसे नियंत्रित कर सकता है लेकिन आप कह रहे हैं कि ‘essential practice test’ हटा देना चाहिए?
सिंघवी: कोर्ट सिर्फ यह देखे कि यह धर्म का मामला है या नहीं लेकिन यह तय करना कि “यह कितना जरूरी है”। कोर्ट के लिए यह आंकलन करना बेहतर नहीं होगा।
जांच का तरीका धार्मिक मान्यताओं को मानने वालों के नजरिए से देखना होगा न कि जज के अपने नजरिए से।
जस्टिस नागरत्ना: जो चीज आर्टिकल 25(2)(a) (यानी आर्थिक/सेक्युलर गतिविधियों) में नहीं आती तो उसे संरक्षण मिलना चाहिए।
सिंघवी: धर्म की कोई सटीक परिभाषा नहीं है, लेकिन इसमें एक समुदाय के लोगों की साझा मान्यताएं और प्रथाएं होती हैं।
सिंघवी: किसी धर्म की प्रथा सही है या नहीं, यह तय होगा उसी समुदाय की आस्था के आधार पर। जज खुद यह तय नहीं करेंगे कि धर्म के लिए क्या सही है, क्या गलत।
सिंघवी: कई रस्में, पूजा-पद्धतियां, अनुष्ठान भले सामान्य लगें लेकिन अगर वे धर्म का हिस्सा हैं। तो उन्हें अनुच्छेद 25 का पूरा संरक्षण मिलेगा।
सिंघवी: आर्टिकल 25 समुदाय की साझा आस्था को भी बचाता है। इसलिए कोई एक व्यक्ति अपने अधिकार के नाम पर पूरे समुदाय की धार्मिक प्रथाओं को कमजोर नहीं कर सकता।
सिंघवी: कोर्ट को समुदाय की आस्था को मानना चाहिए। उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए कोर्ट को धर्म की व्याख्या करके आस्था पर सवाल नहीं उठाना चाहिए।
सिंघवी: आर्टिकल 25 में 'essential' या 'integral' शब्द नहीं है। इसलिए यह कहना कि सिर्फ “जरूरी (essential)” प्रथाएं ही सुरक्षित हैं। यह गलत है। सभी धार्मिक प्रथाएं (essential हों या नहीं) संविधान के तहत सुरक्षित हैं।
जस्टिस नागरत्ना: “Essential test इसलिए बनाया गया ताकि तय हो सके कि क्या संरक्षित है और क्या नहीं?
सिंघवी: असल में कोर्ट को सिर्फ यह देखना चाहिए कि यह धर्म या आस्था से जुड़ा है या नहीं। न कि यह कितना जरूरी है।
सिंघवी बोले- धर्म सिस्टम ऑफ बिलीफ पर आधारित होता है
धर्म सिर्फ व्यक्तिगत सोच नहीं होता बल्कि एक समूह/समुदाय की साझा आस्था होता है। मतलब एक धर्म या संप्रदाय में लोगों की सोच, मान्यताएं और पूजा-पद्धति समान होती हैं। यही 'कॉमन विश्वास' उन्हें जोड़ता है।
संविधान का अनुच्छेद 25 हर व्यक्ति को धर्म मानने, पालन करने और प्रचार करने का अधिकार देता है। लेकिन यह अधिकार सीमित है यानी कोई व्यक्ति ऐसा कुछ नहीं कर सकता। जिससे उसी धर्म के बाकी लोगों के अधिकार प्रभावित हों।
धर्म एक सिस्टम ऑफ बिलीफ (साझा मान्यताओं) पर आधारित होता है।
अगर कोई व्यक्ति उस सिस्टम से अलग अपनी अलग सोच रखता है तो वह सोच हर बार संविधान के तहत सुरक्षित नहीं होगी।
एडवोकेट सिंघवी बोले- परंपराओं का फैसला समुदाय के आधार पर होना चाहिए
एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड की ओर से कोर्ट में 5 मुख्य बातें रखीं:
धर्म एक समूह या समुदाय की आस्था से जुड़ा है। इसलिए किसी एक व्यक्ति के अधिकार को पूरे समुदाय के अधिकारों पर हावी नहीं होने दिया जा सकता।
किसी धर्म की मान्यताएं और प्रथाएं उसी समुदाय के विश्वास के आधार पर तय होंगी। अगर परंपरा सच्ची है, तो कोर्ट उसे मान लेगा। कोर्ट खुद यह तय नहीं करेगा कि क्या सही है या गलत।
संविधान में जो लिखा है, वही लागू होगा। कोर्ट उसमें अपनी तरफ से कुछ जोड़ या घटा नहीं सकता। कुछ पुराने फैसलों में जो अतिरिक्त बातें जोड़ी गई हैं, वे गलत हो सकती हैं।
संविधान सभा ने पहले ही तय कर दिया है कि धार्मिक अधिकारों पर कब और कैसे रोक लग सकती है। कोर्ट अगर नई शर्तें जोड़ता है तो यह संतुलन बिगड़ जाएगा।
धार्मिक अधिकार (Article 25) अकेले नहीं हैं। इन्हें संविधान के बाकी अधिकारों के साथ मिलाकर समझना होगा।
सबरीमाला में 10 से 50 साल की महिलाओं को एंट्री नहीं, पूरा मामला 5 पॉइंट्स में
- सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं की एंट्री पहले बैन थी। वजह पीरियड्स और भगवान अयप्पा के ब्रह्मचर्य व्रत को माना गया। इसी नियम को लेकर विवाद शुरू हुआ।
- 1990 में मामला उठा, बाद में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 2006 में कोर्ट ने नोटिस जारी किया। 2008 में केस 3 जजों की बेंच को गया।
- 2016 में सुनवाई शुरू हुई। 2017 में मामला 5 जजों की संविधान पीठ को भेजा गया। 2018 में 4-1 बहुमत से सभी उम्र की महिलाओं को एंट्री की अनुमति मिली।
- कोर्ट ने प्रतिबंध को असंवैधानिक बताया। विरोध के बीच बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी ने मंदिर में प्रवेश किया।
- 2019 में मामला 9 जजों की बड़ी बेंच को भेज दिया गया। बाद में दूसरे धर्मों से जुड़े महिला प्रवेश मामलों को भी इसमें जोड़ा गया।
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