मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कानून के दुरुपयोग और प्रशासनिक रसूख की कोशिशों पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने पश्चिम-मध्य रेलवे के तीन सतर्कता अधिकारियों के खिलाफ दर्ज 12 साल पुराने आपराधिक मामले को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। दरअसल, यह पूरा मामला एक सीनियर IPS अधिकारी और शिकायतकर्ता के बीच सामाजिक निकटता और अधिकार क्षेत्र के उल्लंघन के इर्द-गिर्द बुना गया था, जिसे कोर्ट ने अब बेनकाब कर दिया है।
 

क्या था पूरा मामला?

29 दिसंबर 2011 को जबलपुर-रीवा इंटरसिटी एक्सप्रेस में एक विजिलेंस इंस्पेक्शन हुआ था। शिकायतकर्ता टिकट कलेक्टर प्यार सिंह मीणा ने आरोप लगाया कि विजिलेंस टीम ने उनके साथ जातिगत भेदभाव और गाली-गलौज की। जीआरपी जबलपुर ने पहली जांच में विजिलेंस टीम और आरपीएफ जवानों को क्लीन चिट दे दी थी।

IG की 'एंट्री' से पलटा मामला

देखा जाए तो असली खेल तब शुरू हुआ जब शिकायतकर्ता ने रीवा के तत्कालीन आईजी गजी राम मीणा से संपर्क किया। आईजी ने नियमों को ताक पर रखते हुए जीआरपी कटनी को मामला दोबारा खोलने का आदेश दे दिया। बता दें कि यह घटना कटनी के अधिकार क्षेत्र में थी ही नहीं, फिर भी आईजी के दबाव में एक नई एफआईआर दर्ज कर ली गई।

हाईकोर्ट ने क्या लिखा?

हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि आईजी और शिकायतकर्ता का एक ही जाति से होना और बिना किसी कानूनी मंजूरी ( Section 197 CrPC ) के कार्रवाई का आदेश देना, संदेह पैदा करता है।

अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने में दिखाई गई असामान्य जल्दबाजी और अधिकार क्षेत्र की अनदेखी यह बताती है कि बाहरी प्रभाव के तहत काम किया गया। यह आशंका निराधार नहीं है कि तत्कालीन आईजी अपने प्रभाव का इस्तेमाल शिकायतकर्ता की मदद के लिए कर रहे थे।

यहां समझिए पूरा विवाद

दिसंबर 2011 इंटरसिटी एक्सप्रेस में विजिलेंस चेकिंग के दौरान विवाद
जनवरी 2012 जीआरपी जबलपुर ने जांच में अधिकारियों को क्लीन चिट दी
फरवरी 2012 आईजी रीवा के निर्देश पर कटनी में नई FIR दर्ज
साल 2012 अधिकारियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, निष्पक्ष जांच की मांग की
अप्रैल 2026 हाईकोर्ट ने एफआईआर और सभी कार्यवाही को रद्द कर दिया

 

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