इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि माता-पिता और भाई-बहनों के प्रति जिम्मेदारियां पत्नी के भरण-पोषण के प्राथमिक दायित्व से मुक्त नहीं कर सकतीं। जस्टिस विनोद दिवाकर की पीठ ने रेलवेकर्मी द्वारा दायर आपराधिक पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
मामले में फैमिली कोर्ट इटावा ने पत्नी के लिए मासिक भरण-पोषण की राशि 3500 से बढ़ाकर 8000 और नाबालिग पुत्र के लिए 1500 से बढ़ाकर 4000 रुपये की थी। कोर्ट में दलील दी कि रेलवे में ग्रुप-डी कर्मचारी करीब 55,000 रुपये प्रतिमाह कमाता है। दैनिक खर्चों के साथ-साथ वृद्ध माता-पिता और अविवाहित भाई-बहनों का भी पालन-पोषण करना पड़ता है।
'55 हजार की मासिक आय इतनी कम नहीं'
हालांकि, हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि 55,000 रुपये की मासिक आय इतनी कम नहीं है कि पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी निभाने में असमर्थ हो। कोर्ट ने आपराधिक निगरानी याचिका खारिज करते हुए बढ़ाई गई भरण-पोषण राशि बरकरार रखी।
'पत्नी सम्मानजनक जीवन जी सके, इसलिए भरण-पोषण का प्रावधान'
हाईकोर्ट ने कहा कि पारिवारिक जिम्मेदारियों का हवाला देकर पति अपने वैधानिक कर्तव्य से बच नहीं सकता। पत्नी का भरण और पोषण उसकी प्राथमिक जिम्मदारी है। भरण-पोषण का प्रावधान इसलिए किया गया है ताकि पति की आय के अनुरूप पत्नी सम्मानजनक जीवन जी सके। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही मानते हुए पति की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट की तरफ से बढ़ाई गई भरण-पोषण राशि बरकरार रखी है।
पति ने याचिका में दी थीं ये दलीलें
हाईकोर्ट में दाखिल अपनी याचिका में पति का कहना था कि उसे अपने दैनिक खर्चों के साथ बुजुर्ग माता-पिता और अविवाहित भाई और बहनों का भी पालन पोषण करना पड़ता है। ऐसे में उसकी आर्थिक स्थित पर दबाव है पर अदालत ने उसकी दलील पर विचार करने से इनकार कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि उसे अपनी पत्नी और बच्चे को बढ़ा हुआ गुजारा भत्ता देना होगा।
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