जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने सरकारी एक अहम फैसले में कहा कि कि सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा किसी भी व्यक्ति को कानूनी अधिकार नहीं देता। अदालत ने अखनूर क्षेत्र में सरकारी जमीन पर किए गए अतिक्रमण को हटाने के आदेश को बरकरार रखते हुए इस मामले में दायर याचिका को खारिज कर दिया।

यह फैसला जस्टिस वसीम सादिक नरगल ने अखनूर में सरकारी भूमि पर हुए अतिक्रमण पर पारित आदेश को चुनौती देती याचिक पर सुनाया। उन्होंने अपने आदेश में कहा कि डिवीजनल कमिश्नर जम्मू की ओर से जारी आदेश पूरी तरह से वैध, उचित और रिकार्ड के अनुरूप है।इसके खिलाफ दायर याचिका निराधार है।

याचिकाकर्ता भीम सेन और रोमेश लाल, जो तहसील अखनूर के गांव नजला चक के निवासी हैं, ने छह मार्च 2026 को डिवीजनल कमिश्नर की ओर से जारी आदेश को चुनौती दी थी। डिवीजनल कमिश्नर ने आदेश में पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए तहसीलदार को 23.17 कनाल जमीन (खसरा नंबर 36) से सभी अवैध कब्जाधारियों को बेदखल करने के निर्देश दिए गए थे।

कब्जे को गलत तरीके से वैध बनाने का प्रयास हुआ

अदालत ने यह भी कहा कि संबंधित अधिकारी ने नियमों के विपरीत जाकर म्यूटेशन दर्ज कर दिया, जिससे अवैध कब्जे को गलत तरीके से वैध बनाने का प्रयास हुआ।अदालत ने यह स्पष्ट किया कि केवल लंबे समय तक कब्जा बनाए रखने से किसी को स्वामित्व का अधिकार नहीं मिल जाता।

बिना वैध आवंटन के कोई भी व्यक्ति राज्य भूमि पर कब्जा नहीं कर सकता।साथ ही अदालत ने यह दलील भी खारिज कर दी कि याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का अवसर नहीं मिला। रिकार्ड के अनुसार उन्हें पर्याप्त अवसर दिए गए थे, लेकिन वे अपना पक्ष प्रभावी ढंग से नहीं रख पाए।

अंत में अदालत ने याचिका को भ्रामक और निराधार बताते हुए खारिज कर दिया और तहसीलदार को सभी अतिक्रमण हटाने तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए।

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