मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण का मामला लंबे समय से अदालत में अटका हुआ था, जिससे लाखों लोगों की नजर इस फैसले पर टिकी हुई है। अब आखिरकार हाईकोर्ट ने सुनवाई की तारीख तय कर दी है, जिससे उम्मीद जगी है कि इस बार कोई ठोस फैसला सामने आ सकता है। कोर्ट ने 27, 28 और 29 अप्रैल को लगातार तीन दिन तक सुनवाई करने का फैसला लिया है। मामले में सबसे खास बात यह है कि इन तीनों दिनों में पूरा समय सिर्फ इसी मामले को दिया जाएगा, जिससे प्रक्रिया तेज होने की संभावना बढ़ गई है।
बता दें कि यह मामला कई बार अलग-अलग कारणों के चलते टलता रहा, जिससे लोगों में काफी निराशा देखने को मिली। लेकिन एक बार फिर से कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि किसी भी पक्ष को सुनवाई टालने की इजाजत नहीं दी जाएगी। यानी अब जो तारीख तय हो गई है, उसी पर सुनवाई होगी और मामले को लंबा खींचने की कोशिश नहीं की जाएगी।
दूसरा मुद्दा भी उठाया
वहीं इस मामले में सुनवाई के दौरान एक दूसरा मुद्दा भी उठा, जिसने सभी को हैरान कर दिया। एक पक्ष की तरफ से सवाल उठाया गया कि इस मामले की सुनवाई कर रहे जज किस वर्ग से आते हैं, यानी वे ओबीसी हैं या सामान्य वर्ग से। इस दलील के पीछे यह तर्क दिया गया कि जज की सामाजिक पृष्ठभूमि फैसले को प्रभावित कर सकती है। हालांकि, इस बात को लेकर कोर्ट में थोड़ी देर के लिए गंभीर माहौल भी बन गया और बहस तेज हो गई।
कोर्ट ने किया खारिज
हालांकि, कोर्ट ने इस तरह की दलीलों को पूरी तरफ से खारिज कर दिया। कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि न्यायपालिका में जज की जाति या वर्ग का कोई महत्व नहीं होता है। कोर्ट ने कहा कि हर जज कानून के आधार पर फैसला करता है, न कि अपनी निजी पृष्ठभूमि के आधार पर। इस टिप्पणी के बाद मामला फिर से अपने मूल मुद्दे पर लौट आया।
क्या है पूरा मामला ?
दरअसल, एमपी में ओबीसी आरक्षण का विवाद 14% कोटे को बढ़ाकर 27% करने से शुरू हुआ। साल 2019 के इस फैसले से कुल आरक्षण 50% की सीमा पार कर 64% हो गया, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। कानूनी पेच के चलते नियुक्तियों में 87-13 का फॉर्मूला लागू है। वहीं 87% पदों पर भर्ती हो रही है, जबकि 13% को विवाद सुलझने तक रोक दिया गया है।
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