सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिजली शुल्क (टैरिफ) निर्धारण का पूरा अधिकार राज्य विद्युत नियामक आयोग के पास होता है लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल करते समय सरकार की नीतियों और प्रोत्साहन योजनाओं के उद्देश्य का सम्मान करना जरूरी है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह फैसला आंध्र प्रदेश विद्युत नियामक आयोग से जुड़े एक मामले में सुनाया। यह पवन ऊर्जा कंपनियों को मिलने वाले जनरेशन बेस्ड इंसेंटिव से जुड़ा था।

सुप्रीम कोर्ट ने वितरण कंपनियों की अपील खारिज कर दी और कहा कि जनरेशन बेस्ड इंसेंटिव का लाभ पवन ऊर्जा उत्पादकों को ही मिलना चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में ऐसे मामलों में आयोग को योजनाओं के उद्देश्य को ध्यान में रखकर ही निर्णय लेना चाहिए। योजना वर्ष 2009 में नवीन एवं नवीनीकरणीयीय ऊर्जा मंत्रालय की तरफ से शुरू की गई थी। इसके तहत पवन ऊर्जा उत्पादकों को प्रति यूनिट बिजली पर 50 पैसे की अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि दी जाती है, ताकि नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा मिल सके।

नियामक आयोग के पास टैरिफ तय करने की पूरी शक्ति- कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियामक आयोग के पास टैरिफ तय करने की पूरी शक्ति है और वह केंद्र या राज्य सरकार द्वारा दी गई सब्सिडी या प्रोत्साहन को भी ध्यान में रख सकता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इन प्रोत्साहनों को सीधे टैरिफ से घटा दिया जाए। मामले में आयोग ने टैरिफ तय करते समय जनरेशन बेस्ड इंसेंटिव को शामिल तो किया लेकिन उसकी राशि को टैरिफ से घटाकर उसका फायदा बिजली वितरण कंपनियों को दे दिया। कोर्ट ने इस तरीके को गलत बताया और कहा कि इससे योजना का असली उद्देश्य खत्म हो जाता है।

योजना क्यों बनाई गई, जानना जरूरी

अदालत ने साफ कहा कि ध्यान में रखने (टेक इनटु अकाउंट) का मतलब यह नहीं है कि हर बार प्रोत्साहन को टैरिफ से कम कर दिया जाए। बल्कि यह देखना जरूरी है कि योजना किस उद्देश्य से बनाई गई है। अगर योजना का मकसद बिजली उत्पादकों को बढ़ावा देना है, तो उसका लाभ उन्हीं को मिलना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि नियामक आयोग को अपने अधिकारों का इस्तेमाल सहयोगात्मक तरीके से करना चाहिए, जिससे कि सरकार की नीतियों और योजनाओं का सही प्रभाव बना रहे।

शीर्ष अदालत ने दो  साल से जेल में बंद आरोपी को दी जमानत

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि मुकदमे की सुनवाई शुरू किए बिना ही आरोपी को जेल में रखना सजा के समान है। हत्या की कोशिश के एक मामले में पंजाब के एक व्यक्ति को जमानत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने बिना मुकदमा शुरू हुए ही जेल में दो साल गुजार दिए हैं। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस पीवी वराले की पीठ ने 13 मार्च के अपने आदेश में कहा कि प्रदीप कुमार उर्फ बानू के खिलाफ फरवरी 2024 में हत्या के प्रयास सहित विभिन्न अपराधों के तहत मामला दर्ज किया गया था लेकिन अभियोजन पक्ष ने अभी तक इस मामले से जुड़े 23 गवाहों में से किसी से भी पूछताछ भी नहीं की है।

पीठ ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के 11 जुलाई, 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कुमार की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपीलकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए 23 गवाहों से पूछताछ किए जाने का प्रस्ताव रखता है, लेकिन अभी तक किसी से भी पूछताछ नहीं की गई है। इसलिए, मुकदमे को पूरा होने में कुछ समय लगने की संभावना है।

पीठ ने कहा कि कुमार की गिरफ्तारी को करीब दो साल हो चुके हैं, लेकिन अभी तक न तो उस पर मुकदमा शुरू हुआ है और न ही उसका कोई अंत ही नजर आ रहा है। मामले पर समग्र रूप से विचार करते हुए, पीठ इस राय पर पहुंची कि मुकदमे की सुनवाई लंबित रहने तक अपीलार्थी को और अधिक हिरासत में रखना आवश्यक नहीं है और चूंकि अपील स्वीकार किए जाने योग्य है, इसलिए अपीलार्थी को जमानत दिए जाने का आदेश पारित किया जा सकता है।

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