कोर्ट में हर दिन अलग-अलग तरह के केस आते हैं। कोई केस हैरान करता है तो कोई केस सोचने पर मजबूर करता हैं। इस बार एक केस पुणे से सामने आया है। जहां एक पत्नी ने कोर्ट से कहा कि शादी के बाद भी पति ने लगातार शारीरिक संबंध बनाने से इनकार किया। इससे वैवाहिक जीवन केवल औपचारिकता बनकर रह गया। मामला इतना गंभीर था कि कोर्ट को सीधे शादी की वैलिडिटी पर फैसला सुनाना पड़ा। पति ने भी संबंध न बनने की बात स्वीकार की जिसके बाद कोर्ट ने बिना किसी लंबी सुनवाई के शादी को रद्द कर दिया।
इस केस में पत्नी ने कोर्ट को बताया कि उसने वैवाहिक जीवन को सामान्य बनाने की कई कोशिशें कीं। लेकिन पति की ओर से लगातार दूरी बनाए रखी गई। शादी के बाद भी पति-पत्नी के बीच कोई सहमतिपूर्ण शारीरिक संबंध नहीं बना। जब स्थिति असहनीय हो गई तो पत्नी ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट में पति ने भी इसे स्वीकार कर लिया। यही स्वीकारोक्ति इस केस का टर्निंग पॉइंट बनी और जज ने लंबी सुनवाई की जरूरत ही नहीं समझी।
कोमल और अक्षय (दोनों के नाम बदले हुए) का विवाह शिक्षित परिवारों की सहमति से पंजीकृत विवाह के रूप में हुआ था। शादी के बाद पत्नी अपने नए जीवन की उम्मीद लेकर ससुराल पहुंची, लेकिन जल्द ही उसे महसूस हुआ कि पति वैवाहिक संबंधों में रुचि नहीं ले रहा है। कई बार बातचीत और प्रयास के बावजूद स्थिति नहीं बदली। अंततः पत्नी मायके लौट गई और शादी को रद्द करने की मांग करते हुए फैमिली कोर्ट याचिका दायर की।
कोर्ट की सुनवाई के दौरान पति ने लिखित रूप में स्वीकार किया कि शादी के बाद दोनों के बीच कोई सहमतिपूर्ण शारीरिक संबंध नहीं हुआ। हिंदू विवाह अधिनियम के तहत यदि तथ्य विवादित न हों और प्रतिवादी गलती स्वीकार कर ले, तो अदालत बिना लंबी गवाही प्रक्रिया के फैसला दे सकती है। जज बी। डी। कदम ने इसी प्रावधान का उपयोग करते हुए विवाह को निरस्त घोषित कर दिया।
फैसले की अहम बातें:
पति ने कोर्ट में लिखित रूप से संबंध न बनने की बात स्वीकार की।
मामले में किसी प्रकार का तथ्यात्मक विवाद नहीं था।
हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विवाह निरस्तीकरण संभव हुआ।
लंबी ट्रायल प्रक्रिया से दोनों पक्षों को राहत मिली।
अदालत ने मानसिक तनाव और समय बचाने पर जोर दिया
कोर्ट ने कानून को कैसे लागू किया?
कोर्ट ने कहा कि विवाह केवल सामाजिक अनुबंध नहीं बल्कि वैवाहिक दायित्वों पर आधारित संस्था है। यदि पति-पत्नी के बीच वैवाहिक संबंध स्थापित ही नहीं होते तो शादी का उद्देश्य ही अधूरा रह जाता है। अदालत ने यह भी माना कि ऐसे मामलों में अनावश्यक देरी दोनों पक्षों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालती है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह निर्णय बताता है कि भारतीय न्यायालय अब वैवाहिक विवादों में व्यावहारिक और संवेदनशील दृष्टिकोण अपना रहे हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि विवाह में शारीरिक संबंध केवल निजी मामला नहीं बल्कि वैवाहिक जीवन का आवश्यक तत्व है। यदि यह पूरी तरह अनुपस्थित हो और दोनों पक्ष इसे स्वीकार करें, तो विवाह निरस्तीकरण कानूनी रूप से उचित माना जा सकता है।
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