इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी आपराधिक मामले में गंभीर और गैर-जमानती धाराएं जोड़ने की केवल प्रस्तावित कार्यवाही के आधार पर आरोपितों को आत्मसमर्पण कर नई जमानत लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक नई धाराएं विधिवत रूप से आरोप के रूप में जोड़ी या परिवर्तित नहीं कर दी जातीं, तब तक आरोपितों से नई जमानत लेने की अपेक्षा करना कानून सम्मत नहीं है।

यह आदेश न्यायमूर्ति श्री प्रकाश सिंह की एकल पीठ ने गोंडा जिले के एक पाक्सो मामले में दाखिल धारा 482 की याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया।

मामले के अनुसार, वर्ष 2020 में दर्ज एफआइआर में आरोपितों के खिलाफ शुरुआत में केवल छेड़छाड़ और धमकी देने जैसी धाराएं लगाई गई थीं।

बाद में पीड़िता द्वारा न्यायालय में दिए गए बयान के आधार पर सरकारी पक्ष ने भारतीय दंड संहिता की धारा 376-डीए तथा पाक्सो अधिनियम की धारा 5(जी)/6 के तहत अधिक गंभीर आरोप जोड़ने का अनुरोध किया।

इस पर ट्रायल कोर्ट ने आरोपों में संशोधन की प्रक्रिया शुरू करते हुए आरोपितों को अदालत में उपस्थित होकर जमानत लेने का निर्देश दिया था। याचियों की ओर से दलील दी गई कि फिलहाल केवल आरोपों में संशोधन का प्रस्ताव है और नई धाराएं अभी अंतिम रूप से जोड़ी नहीं गई हैं। ऐसे में आत्मसमर्पण कर नई जमानत लेने का निर्देश देना विधि के अनुरूप नहीं है।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 216 के तहत ट्रायल कोर्ट को आरोपों में परिवर्तन या संशोधन का अधिकार प्राप्त है, लेकिन वर्तमान मामले में यह प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है।

अदालत ने आरोपितों को सुनवाई का अवसर दिया है और अभी यह तय होना बाकी है कि नई गंभीर धाराएं जोड़ी जाएंगी या नहीं। ऐसी स्थिति में आरोपितों को नई जमानत लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

पीठ ने यह भी कहा कि उच्चतम न्यायालय के पूर्व निर्णयों में यह सिद्धांत स्थापित है कि जब गंभीर और गैर-जमानती धाराएं वास्तव में जोड़ दी जाती हैं, तब आरोपित को नई जमानत के लिए आवेदन करना पड़ सकता है।

हालांकि, केवल प्रस्तावित आरोपों के स्तर पर यह नियम लागू नहीं होता। इन्हीं आधारों पर हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के 23 फरवरी 2026 के आदेश को उस सीमा तक निरस्त कर दिया, जिसमें आरोपितों को अदालत में उपस्थित होकर जमानत लेने का निर्देश दिया गया था।

हालांकि, आरोपों में संशोधन संबंधी अन्य कार्यवाही को यथावत रखते हुए ट्रायल कोर्ट को कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

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